Thursday, January 28, 2016

Liberal Intolerance : The Real Face

वास्तविक असहिष्णुता 

(यह लेख श्री बी. जयमोहन जी के सौजन्य से) 

‘सत्ता’ का असली अर्थ मुझे तब समझ में आया जब दिल्ली में मुझे 1994 में “संस्कृति सम्मान” पुरस्कार मिला .वहां स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) में मैं दो दिनों तक रुका था.वैसे भी सूचना और संस्कृति मंत्रालयों से मेरा जुडाव तो था ही ,परन्तु इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) वो जगह है जहाँ 'सत्ता' सोने की चमकती थालियों में परोसी जाती है. इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) एक शांत, और भव्य बंगले में स्थित है जिसमे हरे भरे लॉन , उच्च स्तरीय खाने और पीने की चीजों के साथ शांति से घूमते हुए वेटर हैं , ऊपर वाले होंठो को बगैर पूरा खोले ही मक्खन की तरह अंग्रेजी बोलने वाले लोग हैं , लिपिस्टिक वाले होठों के साथ सौम्यता से बालों को सुलझाती हुई महिलायें हैं, जो बिना शोर किये हाथ हिलाकर या गले मिलकर शानदार स्वागत करते हैं. मैं अब तक कई अच्छे होटलों में रुक चुका हूँ लेकिन IIC जैसी सुविधा मुझे अब तक किसी जगह देखने को नहीं मिली

भारत सरकार द्वारा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) की स्थापना एक स्वायत्त संस्था के रूप में स्वच्छन्द विचारधारा और संस्कृति के उत्थान के लिए की गयी. और जहाँ तक मेरी याददाश्त ठीक है तो मुझे याद हैं की मैं उस शाम डॉ कर्ण सिंह से, जो इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) के प्रमुख रह चुके हैं , मिला था. मैंने उन सब बुद्धिजीवियों को वहां देखा जिनके बारे में मैं अंग्रेजी साहित्य और पत्रिकाओं के माध्यम से जानता था. यू.आर.अनंतमूर्ति वहां पिछले चार सालो से एक स्थायी स्तम्भ की तरह जमे हुए थे. गिरीश कर्नाड वहां कुछ दिनों से रह रहे थे. प्रितीश नंदी, मकरंद परांजपे , शोभा डे जैसे जाने कितने लेखक ,पत्रकार और विचारक IIC के कोने कोने में दिख रहे थे. 

ये सच है की उस दिन मैं बिलकुल ही अभिभूत था . गिरीश कर्नाड को देखते ही मेरी अर्धांगिनी अरुनमोझी दौड़ के उनके पास गयीं थीं और उनको अपना परिचय दिया था .मुझे पता चला कि नेहरू परिवार की वंशज नयनतारा सहगल यहाँ प्रतिदिन “ड्रिंक करने” के लिए आया करतीं थीं. मैंने उस दिन भी उन्हें देखा था .साथ ही मुझे ये भी महसूस हुआ कि राजदीप सरदेसाई और अनामिका हक्सर भी , जिन्हें मेरे साथ ही पुरस्कार दिया गया था , वहां रोजाना आने वालों में से ही थे. बंगाली कुर्ता और कोल्हापुरी चप्पलें पहने हुए इन लोगों की आँखों पर छोटे छोटे शीशे वाले चश्मे थे .सफ़ेद बालों और खादी साड़ियों में लिपटी महिलाओ में से एक की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने बताया था कि ये कपिला वात्स्यायन हैं .उन्होंने ये भी बताया था कि पुपुल जयकर भी आयेंगी. जिधर भी मुड़ो वहां बस साहित्यिक बाते और कला से सम्बंधित वार्तालाप ही नजर आ रहे थे. 

इस जलसे से मुझे थोड़ी सिहरन सी होने लगी थी, वहां की अत्याधुनिक बुद्धिजीविता के दर्शन ने मुझे अलग थलग सा कर दिया .वेंकट स्वामीनाथन जिनसे उसके अगले दिन मुलाकात हुई थी उन्होंने मेरी बेचैनी के भाव को भांप लिया. उन्होंने कहा –“ इस भीड़ का तीन चौथाई भाग महज कौवों का झुण्ड है. विभिन्न “पॉवर सेंटर्स “ के पैरों तले रहकर ये अपना जीवन निर्वाह करते हैं. इसमें से ज्यादातर लोग सिर्फ सत्ता के दलाल हैं. बड़ी कोशिश से इतने सारे लोंगों में से सम्मान और आदर के लायक सिर्फ एक या दो लोग ही मिलेंगे और ये लोग इस वातावरण को सहन न कर पा सकने की स्थिति में स्वयं कुछ देर बाद यहाँ से निकल लेंगे." 

लेकिन ये वो लोग हैं हैं जो हमारे देश की संस्कृति का निर्धारण करते हैं .एक निश्चित शब्दजाल का प्रयोग करते हुए ये किसी भी विषय पर रंगीन अंग्रेजी में घंटे भर तो बोलते हैं परन्तु इकसाठवें मिनट में ही इनका रंग फीका पड़ना शुरू हो जाता है. वास्तव में ये किसी चीज के बारे में कुछ नहीं जानते”. वेंकट स्वामीनाथन ने कहा. “ सेवा संस्थानों और सांस्कृतिक संस्थानों के नाम इनके पास चार पांच ट्रस्ट होते हैं और ये उसी के सम्मेलनों में भाग लेने के लिए इधर उधर ही हवाई यात्रायें करते रहते हैं. एक बार कोई भी सरकारी सुविधा या आवास मिलने के बाद इन्हें वहां से कभी नहीं हटाया जा सकता .अकेले दिल्ली में करीब पांच हज़ार बंगलो पर इनके अवैध कब्जे हैं.और दिल्ली में ही इनकी तरह एक और पॉवर सेण्टर JNU भी है. वहां की भी कहानी यही है.” 

तो सरकार खुद इन्हें हटाती क्यों नहीं ? मैंने कहा. उन्होंने कहा “पहली बात तो सरकार इस बारे में सोचती ही नहीं .क्योंकि नेहरू के ज़माने से ही ये लोग इससे चिपके हुए हैं .ये लोग एक दुसरे का सपोर्ट करते हैं.अगर कभी किसी आईएएस अधिकारी ने इन्हें हटाने की कोशिश भी की तो ये सत्ताधारी लोगों के पैर पकड लेते हैं और बच जाते हैं”. “इसके अलावा एक और बात है” . वेंकट स्वामीनाथन ने कहा. “ये महज एक परजीवी ही नहीं हैं अपितु स्वयं को प्रगतिशील वामंथी कहकर अपनी शक्ति का निर्धारण करते हैं “ आपने देखा कि नहीं ? “हाँ”- मैंने आश्चर्य चकित होते हुए कहा.

“दुनिया भर में विभिन्न प्रकार के सेमिनार में उपस्थित होने के कारण ये दुनिया भर में जाने जाते हैं .ये बहुत ही अच्छे तरीके से एक दूसरे के साथ बंधे हुए हैं .दुनिया भर के पत्रकार भारत में कुछ भी होने पर इनकी राय मांगते हैं .इन्ही लोगों ने ही कांग्रेस को एक वामपंथी आवरण दे रखा है, उस हिसाब से अगर आप देखते है तो इन पर खर्च की गयी ये धनराशि तो बहुत ही कम है.”उन्होंने कहा. “ये लोग सरकार के सिर पर बैठे हुए जोकर की तरह हैं और कोई भी इनका कुछ नहीं कर सकता. और ये भारत की कला , संस्कृति और सोच का निर्धारण करते हैं.” 

मैं अपने मलयालम पत्रकार मित्रों के साथ अकसर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) में रहा हूँ .उनके लिए लिए IIC अफवाहों को उठाकर “न्यूज” में बदल देने वाली जगह है. इसमें कोई रहस्य नहीं कि शाम ढलते ही इनके अन्दर अल्कोहल इनके सर चढ़कर बोलता है. लेकिन मुझे उन लोगों पर दया आती है जो इन “बुद्धिजीवियों” द्वारा किसी अंग्रेजी अखबार के बीच वाले पेज पर परोसे गए “ ज्ञान के रत्नों” पर हुई राजनैतिक बहस में भागीदारी करते हैं.इन बुद्धिजीवियों को वास्तव में वास्तविक राजनीति का जरा भी ज्ञान नहीं होता . ये बस अपने उथले ज्ञान के आधार पर जरुरत से ज्यादा चिल्लाते हैं और अपने नेटवर्क द्वारा प्रदत्त स्थान में मुद्दे उठाते हैं. बस. 

इनके बारे में लिखते हुए जब मैंने ये कहा कि बरखा दत्त और कोई नहीं बल्कि एक दलाल है सत्ता की,  तो मेरे अपने ही मित्र मुझसे एक “प्रगतिशील योद्धा” की छवि आहत करने को लेकर झगड़ बैठे. पर मेरा सौभाग्य था की कुछ दिन के अन्दर ही बरखा दत्त की टाटा के साथ की गयी दलाली नीरा रडिया टेप के लीक होने पर प्रकाश में आई(इस केस का क्या हुआ .क्या किसी को पता है?). ऐसे भीषण खुलासे भी बरखा दत्त को उसके पद से एक महीने के लिए भी नहीं हटा सके .ये स्तर है इनकी शक्ति का. लेकिन अब , स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार किसी ने इस चक्रव्यूह को तोड़ने की हिमाकत की है .चेतावनियाँ पिछले छह महीने से ही इन्हें दी जाती रही है. पिछले हफ्ते सांस्क्रतिक मंत्रालय ने इन्हें नोटिस भेजने का निश्चय किया.इन बुद्धिजीवियों द्वारा “असहिष्णुता” की आग फैलाने का कारण यही है शायद. 

उदाहरण के लिए पेंटर जतिन दास, जो कि बॉलीवुड एक्टर नंदिता दास के पिता हैं ,इन्होने पिछले कई सालों से दिल्ली की जानी मानी एरिया में एक सरकारी बंगले पर कब्ज़ा कर रखा है.सरकार ने उन्हें बंगले को खाली करने का नोटिस दे दिया .यही कारण हैं कि नंदिता दास लगातार अंग्रेजी चैनलों पर असहिष्णुता के ऊपर बयानबाजी कर रही है और अंग्रेजी अखबारों (जो कि इन लोगों के नेटवर्क द्वारा ही पोषित है ) में कॉलम लिख रही हैं . मोदी जैसे एक मजबूत आदमी ने भी मुझे लगता है कि इनकी दुखती नस पर हाथ रख दिया है. ये तथाकथित बुद्धिजीवी बेहद शक्तिशाली तत्व हैं.मीडिया के द्वारा ये भारत को नष्ट कर सकते हैं .ये पूरी दुनिया की नजर में ये ऐसा दिखा सकते हैं कि जैसे भारत में खून की नदियाँ बह रही हों .ये विश्व के बिजनेसमैन लॉबी को भारत में निवेश करने से रोक सकते हैं.पर्यटन इंडस्ट्री को बर्बाद कर सकते हैं .सच्चाई ये है कि इनके जैसी भारत में कोई दूसरी शक्ति ही नहीं हैं .भारत के लिए इनको सहन करना अनिवार्य है. और इनके प्रति मोदी जी की असहिशुणता बेहद खतरनाक है ..सिर्फ उनके लिए ही नहीं बल्कि देश के लिए भी.

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टीप :- नागरकोविल के रहने वाले बी. जयमोहन जी एक जाने माने साहित्य समालोचक, समकालीन तमिल और मलयालम साहित्य के बेहद प्रभावशाली लेखकों में से एक हैं. “असहिष्णुता” पर लिखे उनके एक लेख का ये हिन्दी अनुवाद है.

Monday, January 25, 2016

Fake Dalit Concerns by Muslims

मुस्लिमों का नकली दलित प्रेम... 


हाल ही में हैदराबाद विश्वविद्यालय के एक छात्र रोहित वेमुला को गुंडागर्दी एवं देशद्रोही हरकतों के लिए विश्वविद्यालय से निकाला गया था, जिसके बाद उसने आत्महत्या कर ली और इस मामले को भारत के गैर-जिम्मेदार मीडिया ने जबरदस्त तूल देते हुए इस मुद्दे को दलित बनाम गैर-दलित बना दिया. हालाँकि रोहित वेमुला की जातिगत पहचान अभी भी संदेह और जाँच के घेरे में है, लेकिन भारत के अवार्ड लौटाऊ नकली बुद्धिजीवियों ने देश को तोड़ने वाली ताकतों के साथ मिलकर इस मुद्दे पर जमकर वैचारिक दुर्गन्ध मचाई. दिल्ली में रोज़ाना ठण्ड से दस व्यक्तियों की मौत होती है, लेकिन केजरीवाल साहब को गरीबों की सुध लेने की बजाय सुदूर हैदराबाद जाना जरूरी लगा, इस प्रकार सभी “गिद्धों” ने रोहित की लाश पर अपना-अपना भोज किया. रोहित वेमुला की मृत्यु के पश्चात देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा सोशल मीडिया पर एक विशेष “ट्रेण्ड” देखने को मिला, जिसमें देखा गया कि स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गेनाइजेशन तथा ईसाईयों के कुछ संगठन अपने “घडियाली आँसू” बहाते नज़र आए. सोशल मीडिया में कई चित्रों, पोस्ट्स एवं कमेंट्स में मुस्लिमों का दलित प्रेम उफन-उफन कर बह रहा था. 


हाल ही में केन्द्र सरकार ने देश के दो प्रमुख इस्लामिक विश्वविद्यालयों अर्थात अलीगढ़ मुस्लिम विवि तथा जामिया मिलिया इस्लामिया विवि को कारण बताओं नोटिस जारी करके पूछा है कि, क्यों ना इनका “अल्पसंख्यक संस्था” वाला दर्जा समाप्त कर दिया जाए?? केन्द्र सरकार ने यह कदम इसलिए उठाया है कि स्वयं को अल्पसंख्यक संस्थान कहलाने वाले ये दोनों विश्वविद्यालय, क़ानून और नियमों की आड़ लेकर अपने यहाँ दलितों को आरक्षण की सुविधा नहीं देते हैं. जैसा कि सभी को पता है, “अल्पसंख्यक संस्थानों” में दलितों को आरक्षण नहीं मिलता है, बल्कि अलीगढ़ या जामिया में 50% सीटें मुस्लिमों के लिए आरक्षित हैं, जबकि बची हुई पचास प्रतिशत “सभी के लिए ओपन” हैं, ऐसे में दलितों को इन विश्वविद्यालयों में प्रवेश ही नहीं मिल पाता. मुस्लिमों द्वारा दलितों के प्रति प्रेम की झूठी नौटंकी को उजागर करने तथा दलितों के साथ होने वाले इस अन्याय को रोकने के लिए केन्द्र सरकार अब उच्चतम न्यायालय के जरिये इन दोनों विश्वविद्यालयों का अल्पसंख्यक दर्जा छीनने जा रही है. एक दलित केन्द्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत ने कहा कि दलितों के साथ यह भेदभाव हम नहीं चलने देंगे, जब देश के सभी विश्वविद्यालयों में दलितों को संविधान के अनुसार आरक्षण दिया जाता है तो अलीगढ़ और जामिया में भी मिलना चाहिए. चूँकि इन दोनों विश्वविद्यालयों का “अल्पसंख्यक संस्थान दर्जा” असंवैधानिक है, इसलिए सरकार न्यायालय के जरिए ऐसे सभी अल्पसंख्यक संस्थानों में दलितों को आरक्षण दिलवाने के लिए कटिबद्ध है. 

उल्लेखनीय है कि दलितों की हितचिन्तक कही जाने वाली सभी राजनैतिक पार्टियों ने इन दोनों विश्वविद्यालयों के इस ज्वलंत मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है. जब यूपीए-२ की सरकार थी, तब भी 2006 से लेकर अब तक मनमोहन-सोनिया सरकार ने अपने वोट बैंक संतुलन की खातिर असंवैधानिक होने के बावजूद ना तो दलितों को न्याय दिलवाया, और ना ही इन दोनों विश्वविद्यालयों की यथास्थिति के साथ कोई छेड़खानी की. 2011 में भी काँग्रेस की केन्द्र सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुप्पी साधे रखी और मामले को टाल दिया. 

वास्तव में इतिहास इस प्रकार है कि, मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज (जिसे 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विवि में बदल दिया गया था) भारत के उच्चतम न्यायालय ने 1967 में ही एक निर्णय में कह दिया था कि इसे अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा नहीं दिया जा सकता. लेकिन उस समय दलितों के मुकाबले मुसलमानों का वोट बैंक अधिक मजबूत होने की वजह से इंदिरा गाँधी ने जस्टिस अज़ीज़ बाशा के इस निर्णय को मानने से इनकार कर दिया तथा संसद के द्वारा क़ानून में ही बदलाव करवा दिया ताकि इन संस्थानों का अल्पसंख्यक स्तर बरकरार रहे. इस निर्णय को चुनौती दी गई और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2006 में इस प्रावधान को हटाने के निर्देश दिए, जिसे मनमोहन सरकार ने ठंडे बस्ते में डाले रखा. अब सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार से पूछा है कि इन दोनों विश्वविद्यालयों के प्रति उनकी सरकार का मत है. इस पर केन्द्र सरकार ने लिखित में कह दिया है कि “चूँकि इन संस्थानों की स्थापनों सिर्फ मुस्लिमों ने, मुस्लिमों के लिए नहीं की है तथा जामिया एवं अलीगढ़ दोनों ही विश्वविद्यालय केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैं इसलिए 1967 के उस फैसले के अनुसार इन्हें अल्पसंख्यक दर्जा प्रदान नहीं किया जा सकता और इन संस्थानों को दलित छात्रों को एडमिशन देना ही होगा”. यहाँ तक कि काँग्रेस के दो पूर्ववर्ती शिक्षा मंत्रियों एमसी छागला और नूरुल हसन ने भी अलीगढ़ मुस्लिम विवि को अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय के दर्जे का विरोध किया था (हालाँकि इंदिरा गाँधी की तानाशाही के आगे उनकी एक न चली)


विपक्षी पार्टियों का “नकली दलित प्रेम” एक झटके में उस समय उजागर हो गया, जब आठ विपक्षी दलों ने केन्द्र सरकार के इस निर्णय का विरोध करते हुए कहा कि वे इस निर्णय के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाएंगे तथा राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपेंगे. यानी कल तक जो विपक्षी पार्टियाँ दलितों पर अत्याचार और अन्याय के खिलाफ चिल्ला रही थीं, उन्हें अब अचानक अल्पसंख्यक वोटों का ख़याल आने लगा है. और मुसलमानों का तो कहना ही क्या? खुद इस्लाम में तमाम तरह की ऊँच-नीच और जाति प्रथा होने के बावजूद अपना घर सुधारने की बजाय, उन्हें हिन्दू दलितों की “नकली चिंता” अधिक सताती है. विभिन्न फोरमों एवं सोशल मीडिया में असली-नकली नामों तथा वामपंथी बुद्धिजीवियों के फेंके हुए बौद्धिक टुकड़ों के सहारे ये मुस्लिम बुद्धिजीवी हिंदुओं में दरार बढ़ाने की लगातार कोशिश करते रहते हैं. जबकि इनके खुद के संस्थानों में इन्होंने दलितों के लिए दरवाजे बन्द कर रखे हैं

पिछली सरकारों के दौरान तमाम मुस्लिम सांसदों के लिखित भाषणों की प्रतियाँ भी एकत्रित की जा रही हैं, जिनमें उन्होंने देश के सेकुलर ढाँचे को देखते हुए इन विश्वविद्यालयों के अल्पसंख्यक दर्जे का विरोध किया था. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई चार अप्रैल को होने जा रही है, जिसमें मानव संसाधन मंत्रालय अपना लिखित जवाब प्रस्तुत करेगा और माननीय न्यायालय से अनुरोध करेगा कि इन दोनों विश्वविद्यालयों का अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त करके दलित छात्रों को भी इसमें समुचित आरक्षण दिलवाया जाए. इस कदम से “मुस्लिमों का नकली दलित प्रेम” तो उजागर होगा ही, विपक्षी “कथित सेकुलर” राजनैतिक पार्टियों का मुखौटा भी टूट कर गिर पड़ेगा, क्योंकि यदि वे केन्द्र सरकार के इस निर्णय का विरोध करती हैं तो उनका भी “दलित प्रेम” सामने आ जाएगा, और यदि समर्थन करती हैं तो उन्हें मुस्लिम वोट बैंक खोने का खतरा रहेगा. कुल मिलाकर वामपंथी-सेकुलर बुद्धिजीवियों तथा दलितों के नकली प्रेमियों के सामने साँप-छछूंदर की स्थिति पैदा हो गई है. बहरहाल, रोहित वेमुला की लाश पर रोटी सेंकने वाले सोच में पड़ गए हैं, क्योंकि शुरुआत अलीगढ़ और जामिया विवि से हुई है और यह आगे किन-किन संस्थानों तक जाएगी, कुछ कहा नहीं जा सकता. एक बात तो निश्चित है कि इन “तथाकथित अल्पसंख्यक” संस्थानों में, दलितों को प्रवेश दिलवाने के मामले में मोदी सरकार गंभीर नज़र आती है.

रही बात काँग्रेस की, तो रोहित वेमुला की मौत पर राजनैतिक रोटियाँ सेंकने को बेताब यह पार्टी शुरू से ही दलित विरोधी रही है... फिर चाहे बाबा साहेब आंबेडकर को मृत्यु के 34 वर्ष बाद भारत रत्न का सम्मान देने वाली बात हो, या फिर एक दलित पार्टी अध्यक्ष सीताराम केसरी की धोती फाड़कर उन्हें काँग्रेस से बाहर फेंकने जैसा मामला हो... इसलिए काँग्रेस के बारे में कुछ लिखना बेकार ही है. वह भी रोहित वेमुला के इस दुखद अवसर को "राजनैतिक गिद्ध" के रूप में ही देखती है. 

Wednesday, January 13, 2016

Free Basics Vs Net Neutrality (in Hindi)


फ्री बेसिक्स बनाम नेट न्यूट्रीलिटी... 


Compare Mobiles with Artificial Intelligence

बचपन में आपने जादूगर जैसे उस ठग की कहानी जरूर सुनी होगी, जिसमें एक ठग रोज़ाना गाँव में आता और छोटे-छोटे बच्चों को टॉफी-बिस्किट देकर लुभाता था. धीरे-धीरे गाँव के सभी बच्चों को टॉफी` खाने की लत लग गई और वे टॉफी खाए बिना रह नहीं सकते थे, उस मुफ्त बिस्किट के मोहपाश में बंध चुके थे. आगे चलकर उस ठग ने अपना असली रूप दिखाना शुरू किया, और बच्चों तथा उनके माँ-बाप से पैसा ऐंठना शुरू कर दिया. बचपन की यही कहानी लगभग अपने मूल स्वरूप में हमारी पीढ़ी के समक्ष आन खड़ी हुई है. इसमें बच्चे हैं इंटरनेट का उपयोग करने वाले तमाम भारतवासी, टॉफी-बिस्किट हैं अभी तक मुफ्त में मिल रही फेसबुक/गूगल की सुविधा और ठग की भूमिका में हैं फेसबुक के मालिक जुकरबर्ग एवं रिलायंस के मालिक मुकेश अंबानी. 

ज़ाहिर है कि आरंभिक प्रस्तावना पढ़कर कोई चौंका होगा, कोई घबराया होगा तो करोड़ों लोग ऐसे भी हैं जो पूरे मामले से बिलकुल ही अनजान हैं. संक्षेप में शुरू करूँ तो बात ऐसी है कि पिछले कुछ माह से देश में एक खामोश क्रान्ति चल रही है, और उस क्रान्ति को दबाने के लिए पूँजीपति भी अपने तमाम हथियार लेकर मैदान में हैं. यह क्रान्ति इसलिए शुरू हुई है, क्योंकि जल-जंगल-जमीन वगैरह पर कब्जे करने के बाद विश्व के बड़े पूंजीपतियों के दिमाग में, विश्व के सबसे सशक्त आविष्कार अर्थात “मुक्त इंटरनेट” पर कब्ज़ा करने का फितूर चढा है. इसकी शुरुआत उस समय हुई जब फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग ने “रिलायंस जिओ” के साथ गठबंधन और समझौता करके Internet.org नामक संस्था बनाई और यह घोषणा की, कि यह तकनीकी प्लेटफार्म उपभोक्ताओं को मुफ्त इंटरनेट सुविधा देगा. जुकरबर्ग-अंबानी की यह जुगलबंदी देश के दूरदराज इलाकों में ग्रामीणों और किसानों को मुफ्त इंटरनेट सुविधा देगी, ताकि भारत में इंटरनेट का प्रसार बढ़े, उपभोक्ताओं की संख्या बढ़े और देश के सभी क्षेत्र इंटरनेट की पहुँच में आ जाएँ, जिससे ज्ञान और सूचना का प्रसारण अधिकाधिक हो सके. सुनने में तो यह प्रस्ताव बड़ा ही आकर्षक लगता है ना..?? कोई भी व्यक्ति यही सोचेगा कि वाह, जुकरबर्ग और अंबानी कितने परोपकारी हैं और नरेंद्र मोदी के डिजिटल इण्डिया के नारे पर इन्होंने कितनी ईमानदारी से अमल किया है ताकि देश के गरीबों और किसानों को मुफ्त इंटरनेट मिले. परन्तु दुनिया में कभी भी, कुछ भी “मुफ्त” नहीं होता, “मुफ्त” नहीं मिलता यह एक सर्वमान्य सिद्धांत है जो हम भारतवासी अक्सर भूल जाते हैं. जब Internet.org की योजनाओं का गहराई से विवेचन किया गया तब पता चला कि वास्तव में यह योजना “इंटरनेट रूपी टॉफी की लत लगे हुए भारतीयों के लिए” उस ठग का एक मायाजाल ही है. 


शुरुआत में भारत के इंटरनेट उपभोक्ताओं ने Internet.org की इस योजना को कोई विशेष महत्त्व नहीं दिया, उसे बहुत ही कम समर्थन प्राप्त हुआ. अधिकाँश ने इसकी आलोचना की और इसे “मुफ्त और मुक्त इंटरनेट” तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” पर एक हमला बताया एवं खारिज कर दिया. चूँकि भारत में फोन-मोबाईल और इंटरनेट से सम्बन्धित कोई भी योजना TRAI की मंजूरी के बिना शुरू नहीं की जा सकती और बहुत से बुद्धिजीवियों ने Internet.Org की इस योजना को मंजूरी नहीं देने हेतु TRAI में शिकायत कर डाली और इस कारण इसे तात्कालिक रूप से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. अब जुकरबर्ग-अंबानी की जोड़ी ने नया पैंतरा खेला और इसी संस्था का नाम बदलकर “Free Basics” कर दिया. चूँकि हम भारतवासियों में “मुफ्त” शब्द का बड़ा आकर्षण होता है, इसलिए इस कमज़ोर नस को दबाते हुए इसका नाम Free Basics रखा गया. ऊपर बताया हुआ सिद्धांत, कि “दुनिया में कभी भी, कुछ भी मुफ्त में नहीं मिलता” हम भारत के लोग अक्सर भूल जाते हैं. इसलिए इस बार “Free Basics” के नाम से यह योजना का प्रचार-प्रसार बड़े जोर-शोर से आरम्भ किया गया. फेसबुक पर धडल्ले से इसका समर्थन करने के लिए अपीलें प्रसारित की जाने लगीं, बड़े-बड़े मेट्रो स्टेशनों पर होर्डिंग और बैनर लगाकर इस योजना के कारण “गरीबों, किसानों और छात्रों” को होने वाले फायदों(??) के बारे में बताया जाने लगा. दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) को भरमाने के लिए यह चाल चली गई कि 30 दिसम्बर तक भारत के करोड़ों इंटरनेट उपभोक्ताओं द्वारा ई-मेल करके यह बताया जाना था कि उन्हें “फ्री-बेसिक” चाहिए अथवा “नेट न्यूट्रलिटी”? यदि अधिकाधिक उपभोक्ता “फ्री बेसिक्स” के पक्ष में मतदान करें तो TRAI को इसे मंजूरी दे देनी चाहिए. 

Compare Mobiles with Artificial Intelligence

जो नए पाठक हैं अथवा जो इस गंभीर मुद्दे से अपरिचित हैं, पहले वे “नेट न्यूट्रलिटी” के बारे में संक्षेप में समझ लें. Net Neutrality का अर्थ है पूरी दुनिया में इंटरनेट एकदम तटस्थ और मुक्त रहेगा, इस पर किसी का आधिपत्य नहीं होना चाहिए. Net Neutrality का अर्थ है कि मोबाईल अथवा नेट कनेक्शन के लिए उपभोक्ता ने जितना पैसा दिया वह उस राशि से इंटरनेट पर जो चाहे वह साईट देखे, उतने पैसों में वह मनचाहा डाउनलोड करे. जबकि जुकरबर्ग-अंबानी द्वारा पोषित Free Basics की अवधारणा यह है कि यदि आप रिलायंस का मोबाईल और रिलायंस का नेट कनेक्शन लें तो आपको (उनके द्वारा) कुछ निर्धारित वेबसाइट मुफ्त में देखने को मिलेंगी, लेकिन उन मुफ्त वेबसाईटों के अलावा किसी दूसरी साईट पर जाना हो तो उसका अतिरिक्त पैसा लगेगा. “जुकर-मुकेश” द्वारा खैरात में दी जाने वाली “फ्री-फ्री-फ्री” वेबसाईटों से आप मुफ्त में कुछ भी डाउनलोड कर सकते हैं परन्तु उनके अलावा किसी अन्य वेबसाईट से यदि आप कुछ डाउनलोड करेंगे तो उतनी राशि चुकानी होगी, जितनी अंबानी तय करेंगे. 

आगे बढ़ने से पहले आप समस्या को ठीक से समझ सकें इसलिए हम दो छोटे-छोटे उदाहरण और देखेंगे. मान लीजिए कि आपको एक निमंत्रण पत्र मिला जिसमें कहा गया कि आप एक सेमीनार में आमंत्रित हैं, जहाँ “मुफ्त भोजन” मिलेगा. जब आप वहाँ पहुँचते हैं तो आप पाते हैं कि सेमिनार तो घटिया था ही, वहां मिलने वाला मुफ्त भोजन भी बेहद खराब, निम्न क्वालिटी का और आपकी पसंद के व्यंजनों का नहीं था. जब आप आयोजकों से इस सम्बन्ध में शिकायत करते हैं तो आपको टका सा जवाब मिलता है कि “मुफ्त” में जो मिल रहा है, वह यही है और यदि आपको अच्छा और पसंदीदा भोजन चाहिए तो पास के महँगे रेस्टोरेंट में चले जाईये, मनमाने दाम चुकाईये और खाईये. जब आप उस रेस्टोरेंट में पहुँचते हैं तो पाते हैं कि वहाँ का भोजन तो अति-उत्तम और सुस्वादु है लेकिन उसके रेट्स बहुत ही गैर-वाजिब और अत्यधिक हैं. जब आप इसकी शिकायत करना चाहते हैं तो पाते हैं कि उस रेस्टोरेंट का मालिक वही व्यक्ति है, जो थोड़ी देर पहले आपको “मुफ्त भोजन” के नाम पर घटिया खाना परोस रहा था. दूसरा उदाहरण डिश टीवी (अथवा टाटा स्काई) के किसी उपभोक्ता से समझा जा सकता है. यदि आपको मुफ्त चैनल देखने हैं तो आपको दूरदर्शन के एंटीना पर जाना होगा, वहाँ आपको कोई मासिक शुल्क नहीं लगेगा और सरकार द्वारा दिखाए जा रहे सभी चैनल आपको मुफ्त में देखने को मिलेंगे. लेकिन यदि आपको विविध मनोरंजन, ख़बरें, नृत्य एवं फ़िल्में देखना चाहते हैं तो आपको निजी कंपनियों की सेवा लेनी पड़ेगी, समाचार देखने हैं तो उसका “पॅकेज” अलग, फ़िल्में देखनी हों तो उसका “पॅकेज” अलग होगा... और उसकी दरें भी मनमानी होंगी उसमें उपभोक्ता का कोई दखल नहीं होगा, वहाँ पर बाज़ार का एक ही सिद्धांत चलेगा कि “जेब में पैसा है तो चुकाओ और मजे लो, वर्ना फूटो यहाँ से...”. फ्री बेसिक्स और नेट न्यूट्रलिटी को लेकर जो खतरनाक शाब्दिक जंग और पैंतरेबाजी चल रही है वह भारत में इंटरनेट की तेजी से बढ़ते उपभोक्ताओं, भारत के युवाओं में ऑन्लाइन के बढ़े आकर्षण के कारण और भी गहरी हो चली है. इंटरनेट के बाजार पर निजी नियंत्रण और “बाजारू” कब्जे के जो गंभीर परिणाम होंगे उन्हें अभी कोई समझ नहीं पा रहा है. Free Basics के खतरे को एक और उदाहरण से समझिए... 


मान लीजिए कि IIT कोचिंग हेतु कोटा का प्रसिद्ध बंसल इंस्टीट्यूट, बिरला की कम्पनी आईडिया से हाथ मिला लेता है कि जिस बच्चे के पास आईडिया का नेट कनेक्शन होगा, उसे तो बंसल इंस्टीट्यूट की कोचिंग के सभी नोट्स एवं अभ्यास क्रम मिल्कुल मुफ्त में मिलेंगे. यानी अगर आप Idea की सिम और इंटरनेट डाटा पैक के ग्राहक हैं तो आपका बच्चा मुफ्त में बंसल इंस्टीट्यूट के कोचिंग वीडियो और नोट्स प्राप्त कर लेगा, लेकिन यदि आपने रिलायंस अथवा एयरटेल का कनेक्शन लिया है तो वे आपसे भारी शुल्क वसूलेंगे, जबकि उन्होंने भी अपने इंटरनेट डाटा पैक का पैसा पहले ही वसूल कर लिया है. इसी प्रकार यदि आईडिया वाला कोई उपभोक्ता अगर इंटरनेट पर मुफ्त में मिलने वाले संजीव कपूर के खाना-खजाना को देखने की कोशिश करेगा तो उसकी जेब से ज्यादा पैसा काटा जाएगा, क्योंकि हो सकता है कि संजीव कपूर का अनुबंध टाटा के डोकोमो से हो. संक्षेप में कहने का अर्थ यह है कि “फ्री बेसिक्स” के लागू होने के बाद आप किसी कम्पनी के बँधुआ गुलाम बन जाएँगे. वह कम्पनी आपको जो वेबसाईट्स दिखाना चाहती है वही दिखाएगी और चूँकि आप भी एक बार उस कम्पनी का मोबाईल खरीद चुके तथा उसी कम्पनी को आपने इंटरनेट डाटा पैक का भी पैसा दे दिया है, इसलिए आप अधिक पैसा देकर किसी “Paid” वेबसाईट पर भला क्यों जाने लगे? यही तो वह कम्पनी चाहती है कि आप उतना ही सोचें, उतना ही देखें, उतना ही सुनें जितना वह कम्पनी आपको दिखाना-सुनाना-पढ़ाना चाहती है. जबकि इस समय स्थिति बिलकुल उलट है, आज की तारीख में यदि आपने एक बार इंटरनेट डाटा पैक ले लिया अथवा अपने घर में किसी कम्पनी से वाई-फाई कनेक्शन ले लिया तो आप जो मर्जी चाहें, उस वेबसाइट पर जा सकते हैं. आज की तारीख में आप पर ऐसा कोई बंधन नहीं है कि आपको बंसल इंस्टीट्यूट अथवा एलेन इंस्टीट्यूट में से किसी एक का ही चुनाव करना पड़ेगा... फिलहाल आप पर यह बंधन भी नहीं है कि आप तरला दलाल या संजीव कपूर में से किसी एक से ही कुकिंग सीख सकते हैं... चूँकि अभी जुकरबर्ग-अंबानी की चालबाजी सफल नहीं हुई है, इसलिए फिलहाल आप टाईम्स, एक्सप्रेस से लेकर वॉशिंगटन-जर्मनी तक के अपने सभी पसंदीदा अखबार पढ़ सकते हैं, “फ्री-बेसिक्स” लागू होने के बाद संभव है कि रिलायंस के मोबाईल पर आपको सिर्फ दैनिक भास्कर ही पढ़ने को मिले, क्योंकि एक-दो अखबार ही “मुफ्त” में मिलेंगे, बाकी कुछ पढ़ना हो तो पैसा चुकाना पड़ेगा. मान लीजिए जैसे आज फेसबुक और रिलायंस का गठबंधन है, वैसे ही यदि गूगल और एयरटेल का समझौता हो गया तो रिलायंस के नेट कनेक्शन से गूगल पर कोई बात सर्च करना हो तो अतिरिक्त्त पैसा लगेगा, जबकि एयरटेल के कनेक्शन वाले को यदि फेसबुक पर मित्रों से बात करनी है तो वह उसका पैसा लेगा. यानी आपकी स्वतंत्रता खत्म... फ्री-बेसिक्स का विरोध क्यों हो रहा है कुछ समझे आप?? लेकिन समस्या यह है कि भारत में खासे पढ़े-लिखे लोगों को भी “मुफ्त” “फ्री” के नाम पर आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है, इसीलिए लाखों लोगों ने फेसबुक पर चल रहे विज्ञापनों एवं उनके द्वारा आए ई-मेल के झाँसे में आकर बिना सोचे-समझे-पढ़े, “हाँ, मैं फ्री बेसिक्स का समर्थन करता हूँ” कहते हुए TRAI को ई-मेल भी भेज डाला है. अब देखते हैं कि आगे क्या होता है. 


फ्री-बेसिक्स के विरोधियों अर्थात नेट-न्यूट्रलिटी के समर्थकों का यह तर्क उचित जान पड़ता है कि जब उपभोक्ता ने एक बार इंटरनेट डाटा पैक के पैसे चुका दिए हैं तो उसे यह स्वतंत्रता मिलनी चाहिए कि वह “एक-समान स्पीड” से दुनिया की किसी भी वेबसाईट पर जा सके. यदि कंपनियों को इंटरनेट डाटा पैक के दाम बढ़ाने हों तो वे TRAI की अनुमति लेकर बेशक बढ़ाएँ परन्तु एक बार नेट कनेक्शन लेने के बाद उपभोक्ता को किसी टेलिकॉम कम्पनी अथवा किसी वेबसाईट की दादागिरी ना सहनी पड़े कि वह फलाँ चीज ही देखे या फलाँ न्यूज़ ही पढ़े. यही सच्चा लोकतांत्रिक व्यवहार और सिद्धांत है. जबकि फ्री-बेसिक्स के समर्थकों (खासकर मार्क जुकरबर्ग) का कहना है कि यह योजना लागू की जानी चाहिए, ताकि देश में इंटरनेट के उपयोगकर्ता बढ़ें, इस योजना से इंटरनेट की पहुँच गरीबों, किसानों और छात्रों तक सुलभ होगी. रिलायंस का मोबाईल खरीदते ही उपभोक्ता को बिना किसी नेट कनेक्शन के उनके द्वारा निर्धारित कई वेबसाईट्स मुफ्त में देखने को मिलेंगी. जुकरबर्ग का कहना है कि भारत में इसका विरोध क्यों हो रहा है, उन्हें समझ नहीं आता क्योंकि फिलीपींस, मलावी, बांग्लादेश, थाईलैंड और मंगोलिया जैसे कई देशों में “फ्री-बेसिक्स” योजना लागू है. 

जैसा कि फेसबुक और अंबानी दावा कर रहे हैं कि “फ्री-बेसिक्स” के नाम पर वे यह सब इसलिए कर रहे हैं ताकि देश के गरीबों-किसानों तक इंटरनेट की पहुँच बन सके उन्हें लाभ पहुँचे तो उनके पास फ्री-बेसिक्स के अलावा दूसरे भी विकल्प हैं जिसमें “नेट न्यूट्रलिटी” भी बरक़रार रहेगी और उपभोक्ता की स्वतंत्रता भी. उदाहरणार्थ रिलायंस यह घोषणा कर सकता है कि जो उनका मोबाईल खरीदेगा उसे 100MB तक फेसबुक मुफ्त देखने को मिलेगा. यदि एयरटेल का समझौता गूगल के साथ हो जाता है तो एयरटेल घोषणा कर सकता है कि उनका मोबाईल खरीदने पर अथवा एयरटेल का कनेक्शन लेने पर ग्राहक को 200MB तक का डाटा बहुत तेज गति से लेकिन मुफ्त मिलेगा, परन्तु उसके बाद उसे सामान्य इंटरनेट डाटा पैक शुल्क चुकाना होगा. दूसरा सुझाव यह है कि यदि उन्हें वास्तव में गरीबों की चिंता है तो उन्हें सस्ते एंड्रायड मोबाईल बाज़ार में उतारकर “दस-दस रूपए में 300MB” के छोटे-छोटे रिचार्ज वाउचर निकालने चाहिए ताकि किसान को जितनी जरूरत हो वह उतना ही इंटरनेट उपयोग करे, लेकिन वह दुनिया की कोई भी वेबसाइट खोलकर देख सके, ना कि जुकरबर्ग और अंबानी की पसंद की. बांग्लादेश में मोज़िला कंपनी ने “ग्रामीण-फोन” नामक इंटरनेट सेवा प्रदाता से समझौता किया है, जिसके अनुसार कोई भी उपभोक्ता रोज़ाना 20MB तक का डाटा बिलकुल मुफ्त उपयोग कर सकता है, और बदले में उसे सिर्फ एक विज्ञापन देखना होता है. यदि वाकई में “सेवाभाव” की बात है तो यह नियम भारत में भी लागू किया जा सकता है. जिसे मुफ्त में डाटा चाहिए होगा, पहले वह विज्ञापन देखेगा, इसमें क्या दिक्कत है? एक और उदाहरण अफ्रीका का भी है, जहाँ Orange नामक कम्पनी 37 डॉलर (लगभग 2300 रूपए) का मोबाईल बेचती है, जिस पर उपभोक्ता को प्रतिमाह 500MB का इंटरनेट डाटा मुफ्त मिलता है. अंबानी-बिरला और मित्तल यदि वास्तव में गरीब छात्रों के हितचिन्तक हैं तो उनके लिए यह योजना भी लागू की जा सकती है. लेकिन यह “फ्री-बेसिक्स” की जिद क्यों?? उपभोक्ता उनके द्वारा तय की गई सूची के हिसाब से क्यों देखे-पढ़े-सुने? उसे चुनाव की स्वतंत्रता चाहिए. 


असल में मार्क जुकरबर्ग को यह समझने और समझाने की जरूरत है कि “फ्री-बेसिक” की अवधारणा भारत में तेजी से पनप रहे “युवा स्टार्ट-अप” के लिए भी खतरनाक है. मान लीजिए कि कोई युवा एक शानदार स्टार्ट-अप कम्पनी खड़ी करता है, उसकी वेबसाईट पर सारी जानकारियाँ देता है, अपना बिजनेस बढ़ाने के लिए डिजिटल इण्डिया के नारे के तहत तमाम वेबमीडिया का सहारा लेने की कोशिश करता है. लेकिन उसे पता चलता है कि चूँकि एयरटेल ने गूगल के साथ, फेसबुक ने अंबानी के साथ अथवा आईडिया ने किसी और बड़े मगरमच्छ के साथ अपने-अपने गठबंधन एवं समझौते कर लिए हैं तथा वे उनके मोबाईल और नेट कनेक्शन पर “उनकी सूची” के मुताबिक़ फ्री इंटरनेट सेवा दे रहे हैं तो फिर इस नए स्टार्ट-अप कम्पनी की वेबसाईट पर कौन आएगा? कैसे आएगा और क्यों आएगा? यानी एक स्थिति यह भी आएगी कि उस स्टार्ट-अप कम्पनी को रिलायंस अथवा गूगल के सामने गिडगिडाना पड़ेगा कि “हे महानुभावों, मुझ गरीब की इस वेबसाइट को भी अपनी मुफ्त वाली सूची में शामिल कर लो”, हो सकता है कि ये महाकाय कम्पनियाँ उस छोटी स्टार्ट-अप से इसके लिए भी कोई वार्षिक शुल्क लेना शुरू कर दें. और ऐसी किसी भी वेबसाईट के मालिक को यह प्रक्रिया उन सभी गठबंधनों के साथ करनी पड़ेगी जहाँ-जहाँ वह अपनी वेबसाईट मुफ्त में ग्राहकों को दिखाना चाहता है. यदि रिलायंस के मोबाईल पर स्नैपडील की साईट मुफ्त है लेकिन मुझे फ्लिप्कार्ट से सामान खरीदना है तो मुझे अतिरिक्त पैसा चुकाना पड़ेगा, फिर मैं फ्लिप्कार्ट की साईट पर क्यों जाने लगा? यानी अंततः बेचारी फ्लिप्कार्ट को भी मजबूरी में नाक रगड़ते हुए रिलायंस के साथ गठबंधन करना होगा, इसी प्रकार स्नैपडील को एयरटेल से करना पड़ेगा. यानी हमारी पसंद-नापसंद का मालिक कौन हुआ?? ज़ाहिर है कि चंद बड़े उद्योगपति... यानी जुकरबर्ग-अंबानी-मित्तल-बिरला आदि. यह पूर्णतः अलोकतांत्रिक विचार है तथा आपसी मुक्त प्रतिस्पर्धा एवं इंटरनेट के मूल सिद्धांत के खिलाफ है. अब आप खुद सोचिये कि “नौकरी.कॉम” जैसी बड़ी वेबसाईट भला यह क्यों चाहेगी कि उसके बेरोजगार ग्राहकों को फेसबुक अपनी मनमर्जी से चलाए और विभिन्न वेबसाईटों की तरफ Redirect करके उन्हें चूना लगाए? फेसबुक अथवा गूगल की एकाधिकारवादी मानसिकता खुलकर सामने आने लगी है, उनका पेट विज्ञापनों से होने वाली अरबों-खरबों रूपए से भी नहीं भर रहा, इसीलिए अब वे “गिरोह” बनाकर इंटरनेट जैसी शानदार चीज़ पर कब्ज़ा जमाना चाहते हैं ताकि वे अपने हिसाब से उपभोक्ताओं को हाँक सकें. यानी जो ठग शुरू में मुफ्त की चॉकलेट और बिस्किट देकर हमें उसकी लत लगा चुका है, वह अब अपनी कीमत वसूलने पर आ गया दीखता है

Sunday, January 10, 2016

Minority Vs Majority Discourse

अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक विमर्श..

इस देश में अल्पसंख्यकों (Minorities) और बहुसंख्यकों (Majority) का वैमर्शिक ताना बाना कितना बेमेल और बेडौल हो चुका है उसकी बानगी कभी कभी बहुत साधारण लोगों की बातचीत एक अजनबी के रूप में दूर से पढ़ने सुनने पर प्रतीत मिलती है !! अभी कुछ दिनों पहले मेरे एक मित्र ने एक फोटो फेसबुक पर शेयर किया , कोई मुस्लिम ट्विटर पर ये कह रहा था की हमें हिन्दुओं के प्रति आभार प्रकट करना चाहिए की सैकड़ों सालों के हिन्दुओं के नरसंहार से भरे पड़े नकारात्मक इतिहास के बावजूद उन्होंने हमें अपना लिया , आत्मसात कर लिया और पिछली किसी याद को अपने संबंधों का आधार नहीं बनाया !! इस पोस्ट पर एक ईसाई मोहतरमा आपत्ति दर्ज़ कराने आयीं और कहने लगी की भारत को और सहिष्णु होना होगा , इस पर मेरे मित्र ने कहा की जितनी सहिष्णुता "आपको" यहाँ मिल रही है दुनिया के बड़े बड़े देशों में भी नहीं मिल रही (जैसे कल ट्रम्प की रैली से एक मुस्लिम महिला को हूट कर बाहर खदेड़ दिया गया , और ऐसा हम भारत में कल्पना में भी नहीं कर सकते) !! इस पर उन ईसाई मोहतरमा को बड़ा बुरा लगा और कहने लगी "आपको" नहीं "हम सब को" "तुम्हारा देश" नहीं "हमारा देश" !! 

इस बहस का मेरा आंकलन यहाँ से शुरू हुआ जो बिन्दुवार प्रस्तुत है 

1 . इस देश का कोई भी ईसाई तब आपत्ति दर्ज़ क्यों नहीं कराता जब इनके जॉन दयाल जैसे बड़े बड़े नेता और धर्मगुरु किसी चर्च में छोटी छोटी चोरी की घटनाओं तक पर कहते फिरते हैं की "ईसाई भारत में डर के साये में जी रहे हैं" या की "अल्पसंख्यक" खतरे में हैं" ? तब इन सभी की "भारतीयता" की भावना अपने "ईसाई" होने की भावना के सामने क्यों क्षीण होने लगती है ? तब कानून व्यवस्था से जुड़ा मुद्दा धार्मिक मुद्दा कैसे बन जाता है ? तब "आपका" और "हमारा" का भेद क्यों खत्म होने लगता है ? 

2. कई विचारवान हिन्दू भी अलग अलग विमर्शों में बार बार हिन्दू शब्द का प्रयोग करने की बजाये "भारतीय" शब्द का प्रयोग करने पर जोर देने लगे हैं , पर वे इस बारीक कड़ी को कभी नहीं जोड़ पाते या इस "फाल्ट लाइन" को कभी नहीं समझ पाते जिसके तहत अल्पसंख्यकों का खतरे में होना सीधे सीधे बहुसंख्यकों के प्रति दुर्भावना नहीं तो कम से कम दुष्प्रचार की भावना तो निर्मित करता ही है , जिसके मूल में दूरगामी धर्म परिवर्तन की चेष्टाएँ हमेशा रही ही हैं , कई लोगों को ये समझाना बड़ा दुश्वर होने लगा है की कोई भी "अल्पसंख्यक" समूह अगर डर के साये में जीने का आरोप करता है तो चाहे आप माने या ना माने आरोप सीधे "बहुसंख्यक समूह " पर ही लग रहा है नाकि किसी सरकार पर या किसी विचारधारा पर !! 


3. इसलिए इस पूरे विमर्श का सबसे बड़ा पाखंडी संकट तब उत्पन्न हो जाता है जब अल्पसंख्यकों को तो अपने अल्पसंख्यक होने का पूरा अधिकार मिल जाता है , अपने ऊपर हुए किसी भी तथाकथित अपराध को "अल्पसंख्यक" के ऊपर हुए अपराध का दर्जा देने का मौका मिल जाता है जो की अन्यथा (अगर सब भारतीयता की भावना लिए होते तो ) सिर्फ एक कानून व्यव्यस्था का विषय बनता , पर अगर उसी विषय पर बहुसंख्यक अपने बहुसंख्यक होने पर गौरवान्वित हो अपनी अच्छाईयां बताने का अपराध करे (जो की उसका अधिकार है क्योंकि आरोप उस पर लगा है ) तो उसे तुरंत सिर्फ "भारतीय" होने का उलाहना देकर चुप करने की या नीचा दिखाने की कोशिश होती है और यहीं कहीं से शायद शुरू होता है इस देश का "लिबरल बौद्धिक आतंक"!! 

4. अपने आस पास देखिये थोड़े अच्छे पढ़े लिखे सर्कल में , आप अपने "हिन्दू" होने की बात करेंगे या उससे जुड़ा कोई मुद्दा उठाएंगे तो उसे सीधे नकरात्मक भाव में ही लिया जायेगा जैसे की हिन्दू का सिर्फ हिन्दू होना ही, ये पहचान स्थापित हो जाना भर ही अल्पसंख़्यकों के साथ उनके सह अस्तित्व को ख़त्म करता है , भारतीयता को खत्म करता है , इसलिए इस "धर्मनिरपेक्ष" मानसिक अवस्था में मुस्लिम शान से मुस्लिम बने रहें , ईसाई शान से ईसाई बने रहें पर हिन्दू सिर्फ भारतीय बने रहें , क्योंकि उनके हिन्दू बन जाने भर से अल्पसंख्यक असुरक्षित महसूस करते हैं !! 

5. आखिरी बात , थोड़ी गहरी है , पर इस विस्तृत मनोवैज्ञानिक कूटनीति को समझिए , हिन्दुओं को सिर्फ और सिर्फ भारतीय बने रहने का ये बहुपक्षीय बहुआयामी दबाव क्यों ? क्योंकि उसके पीछे छिपा वामपंथी बुद्धिजीवियों का ये डर है की हिन्दू पहचान स्थापित हो गयी तो , इतिहास की कलाई भी खुलेगी , उसमे छिपे गौरवान्वित पल भी खुलेंगे , बच्चा बच्चा ये समझने लगेगा की जो आज अपने अल्पसंख्यक होने का दम्भ भर रहे हैं अथवा असुरक्षित होने का रोना रोकर राजनीतिक रूप से संरक्षित हैं उन्हें हज़ारों साल इस देश में किसने पाला ? और सबसे महत्वपूर्ण बात ये की कौन है इस ज़मीन का असली वंशज ? और जब वे ये समझ जायेंगे तो ये पूरी अल्पसंख्यक बहुसंख्यक बहस की जीत किसकी झोली में गिरेगी ये भी समझा जा सकता है !! इसलिए हिन्दुओं को आधुनिक सेक्युलर कोन्वेंटी मदरसों में "सेक्युलर भारतीयता" का पाठ पढ़ाओ और अल्पसंख्यकों को सिर्फ अपनी पहचान में जीने का !! मालिक को किरायेदार सी असुरक्षा दो और किरायेदारों को मालिक सा ढांढस , इसी में सेक्युलरिस्म की सफलता छिपी है !! 

6 . तो मेरे लेख के मुताबिक क्या मुस्लिम और ईसाई इस देश में किरायेदार हुए ? नहीं भी और हाँ भी !! अगर हम सब बिना शर्त सिर्फ और सिर्फ भारतीय हैं तो "नहीं" , अगर तुम मुस्लिम हो , तुम ईसाई हो तो "हाँ" , तो मैं हिन्दू हूँ , मकान मालिक हूँ और तुम किरायेदार !! सच्ची भारतीयता तभी स्थापित होगी जब अल्पसंख्यक शब्द पर प्रतिबन्ध लगे , बोलिए है मंजूर ?? 

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साभार :- फेसबुक वॉल गौरव शर्मा (Gaurav Sharma)