Tuesday, July 5, 2016

Love for Outsiders and Ideological Distance : New Avatar of BJP


गैरों पे करम और विचारधारा से भटकाव – भाजपा का नया अवतार

हाल ही में जब उड़ीसा के पूर्व मुख्यमंत्री एवं धुर काँग्रेसी सांसद गिरधर गमांग को भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्त्व ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल किया तो सुदूर कहीं जमीन पर बैठे भाजपा के लाखों कार्यकर्ताओं के दिल के ज़ख्मों से घाव पुनः रिसने लगा. यह ज़ख्म था 1999 में अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार के एक वोट से गिरने का कभी ना भूलने वाला घाव. कड़े जमीनी संघर्षों और कार्यकर्ताओं की अथक मेहनत से अटल जी की वह सरकार सत्ता में आई थी, जिसे संसद में इन्हीं गिरधर गमांग महोदय ने बड़ी दादागिरी से अपने एक “अवैध वोट” द्वारा गिरा दिया था. जब पिछले माह गिरधर गमांग भाजपा नेताओं के साथ मुस्कुरा रहे थे, उस समय इन कार्यकर्ताओं की आँखों के सामने अटल जी का मायूस चेहरा घूम गया. दुर्भाग्य की बात यह है कि गिरधर गमांग ठीक एक वर्ष पहले ही भाजपा में शामिल हुए थे, और उन्होंने भाजपा की विचारधारा अथवा उड़ीसा में पार्टी की उन्नति के लिए ऐसा कोई तीर नहीं मारा था, कि उन्हें सीधे कार्यसमिति सदस्य के रूप में पुरस्कृत कर दिया जाए, परन्तु ऐसा हुआ.... 

राजस्थान के मारवाड़ में एक कहावत है -- "मरण में मेड़तिया और राजकरण में जोधा". इसका अर्थ होता है :- मरने के लिए तो मेड़तिया और राजतिलक के लिए जोधा राठौड़, अर्थात जब युद्ध होता है, तब लड़ने और बलिदान के लिए मेड़तिया आगे किये जाते हैं, लेकिन जब राजतिलक का समय आता है तो जोधा राठौड़ों को अवसर मिलता है. यह कहावत और इसका अर्थ देने की आवश्यकता इसलिए महसूस हुई क्योंकि आजकल भारतीय जनता पार्टी एक नए “अवतार” में नज़र आ रही है. यह अवतार है “गैरों पे करम” वाला. पुरानी फिल्म “आँखें” पाठकों ने देखी ही होगी, उसमें माला सिन्हा पर यह प्रसिद्ध गीत फिल्माया गया था, “गैरों पे करम, अपनों पे सितम... ऐ जाने वफा ये ज़ुल्म न कर”. एक धुर संघी यानी अटलजी की सरकार को अपने वोट रूपी तमाचे से गिराने वाले धुर काँग्रेसी गिरधर गमांग का ऐसा सम्मान इसी का उदाहरण है. शायद आधुनिक भाजपा, डाकू “वाल्मीकि” के ह्रदय परिवर्तन वाली कहानी पर ज्यादा ही भरोसा करती है, हो सकता है कि भाजपा के उच्च रणनीतिकारों का यह विचार हो, कि गिरधर गमांग को इतना सम्मान देने देने से वे ऐसे बदल जाएँगे, कि शायद एक दिन रामायण लिखने लग पड़ें, परन्तु हकीकत में ना कभी ऐसा हुआ है, और न कभी होगा. क्योंकि राजनीति स्वार्थ और लोभ का दूसरा नाम है. मूल सवाल है कि जमीनी कार्यकर्ता की भावना का क्या??  


केदारनाथ त्रासदी आज भी प्रत्येक भारतीय के दिलों में गहन पीड़ा के रूप में मौजूद है. सभी को याद होगा कि उस समय उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री हुआ करते थे बहुगुणा साहब, यानी उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवतीनंदन बहुगुणा के सुपुत्र और पूर्व काँग्रेसी प्रवक्ता रीता बहुगुणा के भाई. अर्थात पूरा का पूरा परिवार वर्षों से धुरंधर काँग्रेसी. जब केदारनाथ त्रासदी हुई थी, उस समय विजय बहुगुणा के निकम्मेपन एवं हिन्दू विरोधी रुख के कारण भाजपा एवं संघ के सभी पदाधिकारियों ने उन्हें जमकर कोसा-गरियाया था. बहुगुणा के कुशासन एवं भूमाफिया के लालची जाल में फँसे केदारनाथ की इस भीषण त्रासदी को गंभीरता से नहीं लेने की वजह से हजारों हिन्दू काल-कवलित हो गए, और कई माह तक हजारों लाशें या तो गायब रहीं अथवा बर्फ व पहाड़ों में दबी रहीं. उत्तराखण्ड के सभी भाजपा नेताओं ने विजय बहुगुणा को “हिन्दू-द्रोही” ठहराया था. हाल ही में उत्तराखण्ड की हरीश रावत सरकार को अस्थिर करने के चक्कर में भाजपा के रणनीतिकारों ने वहाँ विधायकों को लेकर एक गैरजरूरी “स्टंट” किया, और उसमें वे औंधे मुँह गिरे. विधायकों की खरीद-फरोख्त एवं दलबदलुओं के इस स्टंट में काँग्रेस एक माहिर खिलाड़ी रही है. भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश में यह स्टंट सफलतापूर्वक कर लिया था, इसलिए उन्होंने सोचा कि उत्तराखंड पर भी हाथ आजमा लिया जाए, परन्तु यहाँ भाजपा की दाल नहीं गली और हरीश रावत सरकार सभी बाधाओं को पार करते हुए पुनः जस-की-तस सत्तारूढ़ है और जिस लंगड़े घोड़े पर भाजपा ने भरोसे के साथ दाँव लगाया था, वह रेस में खड़ा भी न हो सका. ध्यान देने वाली बात यह है कि हरीश रावत सरकार का अब सिर्फ एक वर्ष का कार्यकाल बचा था, और जनता में सरकार की छवि गिरती जा रही थी. परन्तु विजय बहुगुणा और भाजपा की इस जुगलबंदी के कारण रावत सरकार के प्रति जनता में सहानुभूति की लहर चल पड़ी, और इस कहानी का असली मजेदार पेंच तो यह है कि वर्षों से खाँटी काँग्रेसी रहे एवं खुद भाजपा द्वारा “हिन्दू-द्रोही” घोषित किए जा चुके विजय बहुगुणा साहब भी “स-सम्मान” भाजपा की केन्द्रीय कार्यसमिति में शामिल कर लिए गए... तालियाँ, तालियाँ, तालियाँ. सवाल यह उठता है कि क्या इस कदम को भगतसिंह कोश्यारी एवं भुवनचंद्र खंडूरी के मुँह पर तमाचा माना जा सकता है?? आज तक किसी को समझ में नहीं आया कि आखिर विजय बहुगुणा को किस योग्यता के तहत यह सम्मान दिया गया? कहीं ऐसा तो नहीं कि भाजपा के रणनीतिकार यह सोचे बैठे हों कि बहुगुणा साहब उत्तराखण्ड में भाजपा को फायदा पहुँचाएंगे, भाजपा के वोटों में बढ़ोतरी करेंगे?? क्या भाजपाई आने वाले उत्तराखण्ड चुनावों में बहुगुणा को आगे रखकर चुनाव लड़ेंगे? यदि ऐसा हुआ तो इससे अधिक हास्यास्पद कुछ और नहीं होगा, परन्तु चूँकि “गैरों पे करम” करने की नीति चल पड़ी है तो जमीनी कार्यकर्ता भी क्या करे, मन मसोसकर घर बैठा है. 


भाजपा में गैरों पे करम वाला यह “ट्रेंड” लोकसभा के आम चुनावों से पहले तेजी से शुरू हुआ था. उस समय मौका देखकर काँग्रेस का जहाज छोड़कर भागने वाले कई चूहों को संसद का टिकट मिला और मोदी लहर के बलबूते वे फिर से सांसद बनने में कामयाब रहे. इनमें से कुछ काँग्रेसी तो मंत्रीपद हथियाने में भी कामयाब रहे. इसके बाद तो मानो लाईन ही लग गई. वर्षों से भाजपा के लिए मेहनत करने वाले कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं एवं नेताओं को दरकिनार करते हुए “बाहरियों” को न सिर्फ सम्मानित किया गया, पुरस्कृत किया गया, बल्कि उन्हीं नेताओं के सिर पर बैठा दिया गया, जिनसे वे कल तक वैचारिक और राजनैतिक लड़ाई लड़ते थे. भाजपा के कार्यकर्ताओं को बताया जा रहा है कि एमजे अकबर साहब बहुत बड़े बुद्धिजीवी हैं और पार्टी को एक अच्छा मुस्लिम चेहरा चाहिए था इसलिए उन्हें राज्यसभा सीट देकर उपकृत किया जा रहा है, परन्तु पार्टी में से किसी ने भी यह सवाल नहीं उठाया कि क्या एमजे अकबर पार्टी की विचारधारा के लिए समर्पित हैं? एक पूर्व पत्रकार के नाते गुजरात दंगों के समय अकबर साहब के लेखों को किसी ने पढ़ा होता, तो वह कभी उन्हें भाजपा में घुसने नहीं देता. लेकिन काँग्रेस मुक्त भारत करने के चक्कर में “काँग्रेस युक्त भाजपा” पर ही काम चल रहा है. एमजे अकबर का मध्यप्रदेश से कोई लेना-देना नहीं है, इसी प्रकार नजमा हेपतुल्ला का भी मध्यप्रदेश से कोई लेना-देना नहीं है, राज्यसभा में पहुँचने के बाद वे कभी मध्यप्रदेश की तरफ झाँकने भी नहीं आईं, लेकिन चूँकि भाजपा को कुछ “कॉस्मेटिक” टाईप के मुस्लिम चेहरे चाहिए इसलिए खामख्वाह किसी को भी भरे जा रहे हैं... जबकि उधर मोदी लहर के बावजूद शाहनवाज़ हुसैन बिहार में चुनाव हार गए थे. यह है भाजपा के मतदाताओं का मूड... लेकिन पार्टी इसे समझ नहीं रही और पैराशूट से कूदे हुए लोग सीधे शीर्ष पर विराजमान हुए जा रहे हैं. 


भाजपा जमीनी हकीकत से कितनी कट चुकी है और अपने संघर्षशील कार्यकर्ताओं की उपेक्षा में कितनी मगन है, इसका एक और ज्वलंत उदाहरण है महाराष्ट्र के कोल्हापुर से शिवाजी महाराज के “कथित” वंशज संभाजी राजे को भाजपा ने राज्यसभा में मनोनीत किया है. स्वयं को “छत्रपति” एवं कोल्हापुर के महान समाजसेवी कहलवाने का शौक रखने वाले ये सज्जन पहले राकांपा के टिकट पर कोल्हापुर से ही दो बार लोकसभा का चुनाव हार चुके हैं. परन्तु इनकी “खासियत”(?) सिर्फ इतनी ही नहीं है. संभाजी राजे नामक ये सज्जन महाराष्ट्र की कुख्यात “संभाजी ब्रिगेड” के एक प्रमुख कर्ताधर्ता भी हैं. राजनैतिक गलियारों में सभी जानते हैं कि संभाजी ब्रिगेड नामक यह जहरीली संस्था वास्तव में शरद पवार का जेबी संगठन है. पवार ने अपनी मराठा राजनीति चमकाने के लिए ही इस संगठन को पाला-पोसा और बड़ा किया. सोशल मीडिया पर संभाजी ब्रिगेड जो ब्राह्मण विरोधी ज़हर उगलता है वह तो अलग है ही, इसके अलावा इस संगठन के हिंसक कार्यकर्ताओं का एक बड़ा कारनामा वह था, जब इन्होंने “शिवाजी महाराज की अस्मिता” के नाम पर पुणे के भंडारकर रिसर्च इंस्टीट्यूट में तोड़फोड़ और आगज़नी की थी. कई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक पुस्तकें एवं दुर्लभ पांडुलिपियाँ इस हमले में नष्ट हो गई थीं, पवार साहब के वरदहस्त के चलते किसी का बाल भी बाँका न हुआ. कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे धुर ब्राह्मण विरोधी एवं चुनाव हारे हुए व्यक्ति को भाजपा अपने पाले में लाकर सीधे राज्यसभा सीट का तोहफा देकर क्या हासिल करना चाहती है? क्या पश्चिम महाराष्ट्र में उत्तम मराठा नेताओं की कमी हो गई थी? क्या भाजपा में और कोई मराठा नेता नहीं हैं जो राज्यसभा के लिए उचित उम्मीदवार होते? संभाजी राजे ने हिंदुत्व एवं राष्ट्रवाद के समर्थन में ऐसा क्या कर दिया था कि उन्हें गायत्री परिवार के श्री प्रणव पंड्या द्वारा ठुकराई हुई राज्यसभा सीट पर ताबड़तोड़ मनोनीत करवा दिया गया? क्या पश्चिम महाराष्ट्र में भाजपा की कंगाली इतनी बढ़ गई है कि दो चुनाव हारने वाले व्यक्ति को वह इस क्षेत्र का तारणहार समझ बैठी है? जो संभाजी राजे शरद पवार के इशारे के बिना एक कदम भी नहीं चल पाते हैं, क्या वे “शकर बेल्ट” में भाजपा का जनाधार बढ़ाएँगे? यह तो वैसा ही हुआ जैसे उड़ीसा में वर्षों से संघर्ष कर रहे भाजपा कार्यकर्ताओं-नेताओं को दरकिनार कर, अब गिरधर गमांग साहब भाजपा को उड़ीसा में विजय दिलवाएँगे? खुशफहमी एवं अति-उत्साह की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा इसे, और यह निष्ठावान कार्यकर्ताओं की मानसिक बलि लेकर पैदा हुई है. 


सत्ता के गलियारों में अक्सर कहा जाता है कि यदि आप पार्टी के समर्पित और निष्ठावान कार्यकर्ता का ध्यान रखेंगे तो आपकी पार्टी चाहे जितने चुनाव हार जाए, वह या तो पुनः उठ खड़ी होगी अथवा उसके ये “पुरस्कृत” कार्यकर्ता-समर्थकों का झुण्ड सत्ताधारी दल को आसानी से काम नहीं करने देगा. इस सिद्धांत पर काम करने में काँग्रेस और वामपंथी पार्टियाँ सबसे आगे रही हैं. पिछले साठ वर्षों में काँग्रेस जहाँ-जहाँ और जब-जब सत्ता में रही है, उसने अपने कार्यकर्ताओं, नेताओं यहाँ तक कि अपने समर्थक अफसरों-बाबुओं को भी बाकायदा चुन-चुनकर और जमकर उपकृत किया. काँग्रेस और वामपंथ द्वारा उपकृत एवं पुरस्कृत लेखक, अभिनेता, स्तंभकार, पत्रकार, अफसर, न्यायाधीश ही उसकी असली ताकत हैं, उदाहरण “अवार्ड वापसी गिरोह का हंगामा”. जबकि भाजपा का व्यवहार इसके ठीक उलट है. जब भी और जिन राज्यों में भी भाजपा की सरकारें आती हैं अचानक उन्हें नैतिकता और ईमानदारी का बुखार चढ़ने लगता है. समस्या यह है कि यह बुखार वास्तविक नहीं होता है. नैतिकता, ईमानदारी के बौद्धिक लेक्चर सिर्फ निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को ही पिलाए जाते हैं, जबकि सत्ता की ऊपरी मलाईदार परत पर बिचौलियों, पूर्व कांग्रेसियों एवं नौसिखिए परन्तु “भूखे” भाजपाईयों तथा उनके प्यारे ठेकेदारों का कब्ज़ा हो जाता है. मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि भाजपा के थिंक टैंक या उच्च स्तरीय नेता इस बात का जवाब कभी नहीं दे पाएँगे कि जगदम्बिका पाल जैसे व्यक्ति को भाजपा द्वारा पुरस्कृत करने से भाजपा के उत्तरप्रदेश में कितने प्रतिशत वोट बढ़े... या बिहार में ऐन चुनावों से पहले साबिर अली को भाजपा में शामिल करके कितने प्रतिशत मुस्लिम प्रभावित हुए?? क्या साबिर अली अथवा जगदम्बिका पाल जैसे लोग भाजपा को उनके राज्यों में आगे बढ़ाने में मदद करेंगे? क्या ये भाजपा की विचारधारा के करीब हैं? यदि नहीं, तो फिर जमीनी और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करते हुए ऐसे पैराशूट छाप नेताओं को भाजपा मान-सम्मान क्यों दे रही है, यह समझ से परे है. 

कांग्रेस द्वारा तिरस्कृत व्यक्तियों को भाजपा अपने साथ मिलाकर खुद अपनी फजीहत किस तरह से करवा रही है इस का जीता-जागता उदाहरण बड़ोदरा की पारुल यूनिवर्सिटी के डायरेक्टर जयेश पटेल हैं. जयेश पटेल पूरी जिंदगी कांग्रेस मे रहे. कांग्रेस के टिकट पर तीन बार चुनाव लड़ा, लेकिन सिर्फ 6 महीने पहले यह भाजपा में आ गए और फिर इसने अपने ही यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली एक लड़की का बलात्कार किया. अब स्वाभाविक रूप से मीडिया में बैठे कांग्रेसी बार बार इसे भाजपा नेता कहकर प्रचारित कर रहे है. तकनीकी रूप से देखा जाए तो यह भाजपा के ही नेता माने जाएँगे, लेकिन इस बदनामी के लिए जिम्मेदार भी बीजेपी है, जो कांग्रेस से आए हुए किसी भी ऐरे-गैरे को शामिल कर रही है. इसी प्रकार 2000 करोड़ के ड्रग स्मगलर विक्की राठोड़ के केस में यही हुआ, इसके पिता पूरी जिंदगी कांग्रेस में रहे. कांग्रेस के टिकट पर विधायक भी बने, कांग्रेस की सरकार में मंत्री भी रहे. इन्होंने कांग्रेस के टिकट पर 2014 लोकसभा का चुनाव भी लड़ा लेकिन सिर्फ 3 महीने पहले वह भाजपा में आए और जब उसका बेटा 2000 करोड़ की ड्रग्स रैकेट में पकड़ा गया तो मीडिया और कांग्रेस ने उसे एक भाजपा नेता का बेटा कहकर प्रचारित किया. समझ नहीं आता कि जब भाजपा में इतने अच्छे अच्छे लोग हैं तो फिर इन बाहरियों को शामिल करके खुद की फजीहत करवा रही है ? 

कहने का तात्पर्य यह है कि गमांग, जगदम्बिका पाल, विजय बहुगुणा, संभाजी ब्रिगेडी अथवा साबिर अली को शामिल करने (बल्कि उन्हें राज्यसभा सीट आदि से सम्मानित करने) में पता नहीं कौन सी रणनीति है, जो पार्टी की मूल विचारधारा को खाए जा रही है और उधर लाठी खाने वाला कार्यकर्ता हताश हो रहा है. जो लोग जीवन भर संघ-भाजपा की खिल्ली उड़ाते आए, जिन्होंने अपना राजनैतिक जीवन हिंदुत्व के विरोध एवं काँग्रेस की चाटुकारिता में गुज़ार दी हो, वह कार्यकर्ता से सामंजस्य कैसे बिठाएगा?? यह हताशा सिर्फ इसी स्तर पर ही नहीं है, बल्कि नियुक्तियों और प्रशासनिक स्तर पर भी देखा जाए तो यह सरकार विफल होती दिखाई दे रही है. 

मोदी सरकार के दो वर्ष पूर्ण हो चुके हैं, और इस सरकार से कामकाज के अलावा विचारधारा के स्तर पर जिस काम की अपेक्षा थी, अब जमीनी कार्यकर्ताओं द्वारा उसकी समीक्षा आरम्भ हो चुकी है. यदि कामकाज के स्तर पर देखा जाए तो मनोहर पर्रीकर, सुषमा स्वराज, नितिन गड़करी, पीयूष गोयल और सुरेश प्रभु का कार्य संतोषजनक कहा जा सकता है. परन्तु बाकी के मंत्रालयों की हालत अच्छी नहीं कही जा सकती. केन्द्र सरकार का सबसे महत्त्वपूर्ण मंत्रालय होता है मानव संसाधन मंत्रालय. पिछले पचास वर्षों में इस मंत्रालय पर अधिकांशतः वाम अथवा समाजवाद समर्थक काँग्रेसी की नियुक्ति होती आई है. देश के तमाम विश्वविद्यालयों, शिक्षण संस्थाओं, शोध संस्थाओं सहित अकादमिक गतिविधियों को यह मंत्रालय अरबों रूपए की धनराशि मुहैया करवाता है. काँग्रेस और वाम मोर्चे द्वारा इसी मंत्रालय के जरिये पूरी तीन पीढ़ियों का “ब्रेनवॉश” किया गया है और उन्हें नकली सेकुलरिज़्म एवं कथित प्रगतिशीलता के बहाने भारतीय संस्कृति से तोड़ने का कार्य किया गया है. JNU हो, हैदराबाद विश्वविद्यालय का रोहित वेमुला मामला हो अथवा IIT चेन्नै का आंबेडकर पीठ वाला मामला हो या फिर पुणे की FTII संस्था ही क्यों ना हो... काँग्रेस-वामपंथ द्वारा पालित-पोषित एवं संरक्षित बौद्धिक गिरोह ने मोदी सरकार के प्रत्येक कदम में अड़ंगे लगाए हैं, हंगामे किए और विदेशों में बदनामी करवाई. ऐसा क्यों हुआ? जो काम काँग्रेस की सरकारें सत्ता में आते ही किया करती थीं, वह भाजपा पिछले दो साल में भी नहीं कर पाई है. 2004 को याद करें, जैसे ही वाजपेयी सरकार की विदाई हुई, और सोनिया-मनमोहन की जुगलबंदी वाली यूपीए-१ सरकार ने कार्यभार संभाला, उसके एक माह के भीतर ही काँग्रेस ने तमाम बड़े-बड़े संस्थानों से भाजपा द्वारा नियुक्त किए गए सभी प्रमुख पदों को खाली करवा लिया. जिसने खुशी-खुशी इस्तीफ़ा दिया, उसे सम्मानजनक तरीके से जाने दिया गया और जिसने इनकार किया, उसे बर्खास्त करने में भी कोई कसर बाकी नहीं रखी गई. इसके पश्चात तत्काल काँग्रेसी अथवा वामपंथी विचारधारा को समर्पित व्यक्तियों की नियुक्ति कर दी गई, जो दुर्भाग्य से आज भी कई संस्थानों में कब्ज़ा जमाए बैठे हैं. सरकार के प्रति धारणाएँ बनाने अथवा अवधारणाएँ बिगाड़ने में बौद्धिक जगत का बहुत बड़ा हाथ होता है. स्मृति ईरानी ने जब कार्यभार संभाला, तब उन्होंने शुरुआत तो बड़े धमाकेदार तरीके से की थी परन्तु इस महत्त्वपूर्ण मंत्रालय को लेकर उनसे जो अपेक्षाएँ थीं इन दो वर्षों में वह कोरी बातें, फालतू के विवाद और उनके बड़बोलेपन में ही खत्म होती दिखाई दे रही हैं. 


मानव संसाधन मंत्री ने जेएनयू तथा हैदराबाद विवि के रोहित वेमुला का मामला जिस तरह से हैंडल किया है, उससे यह बात स्पष्ट हो गई है कि स्मृति ईरानी में वामपंथियों जैसी धूर्तता एवं प्रोपोगंडा तकनीक का सर्वथा अभाव है. बौद्धिक क्षेत्र में चारों तरफ घुसे बैठे वामपंथियों एवं कांग्रेसियों से निपटना अनुभवहीन स्मृति ईरानी के बस की बात नहीं है. पिछले दो वर्ष में देश की प्रमुख शिक्षा एवं अकादमिक संस्थाओं में आज भी वही लोग बैठे हैं जो यूपीए-२ कार्यकाल में थे. ऐसा नहीं है कि भाजपा समर्थित विचारधारा में प्रतिभावान लोगों की कमी है, परन्तु भाजपा में नैतिकता बघारने का ऐसा उन्माद है कि स्मृति ईरानी बड़े गर्व से घोषणा करती हैं कि उन्होंने बदले की भावना से काम नहीं किया है और एक-एक करके कई नाम गिना देती हैं कि हमने इन्हें नहीं हटाया. तो सवाल बनता है कि क्यों नहीं हटाया? किस बात का इंतज़ार है? क्या पिछले साठ वर्ष से काँग्रेस-वामपंथ के हाथों मलाई चाटते इन लोगों के ह्रदय परिवर्तन का? या स्मृति ईरानी को विश्वास है कि ये तमाम बुद्धिजीवी इनकी यह नैतिकता देखकर पसीज जाएँगे और अपना संघ-भाजपा-मोदी विरोध वाला रवैया त्याग देंगे? इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने वालों, तीन-तीन पीढ़ियों को अपनी सेकुलर विचारधारा और झूठी कहानियों के माध्यम से बरगलाने वालों तथा बाकायदा अपना गिरोह बनाकर सभी विश्वविद्यालयों से भगवा बुद्धिजीवियों को षड्यंत्रपूर्वक बाहर करते हुए फेलोशिप्स, अवार्ड, ग्रांट्स इत्यादि पर काबिज रहने वालों से निपटना स्मृति ईरानी के बस की बात नहीं लग रही. जेएनयू के उस कुख्यात हंगामे के पश्चात ऐसी कोई गतिविधि नज़र नहीं आई, जिसमें मानव संसाधन मंत्रालय ने वहाँ की कार्यकारी परिषद् अथवा अकादमिक कौंसिल को भंग करने या उसमें व्यापक बदलाव करने की कोई इच्छाशक्ति दिखाई हो. जबकि यही काम काँग्रेस जब सत्ता में आती थी तो आवश्यकता पड़ने पर पहले दो माह में ही निपटा डालती थी. यदि कोई पार्टी अपनी सत्ता के दो वर्ष बाद भी अपनी समर्थित विचारधारा के लोगों को सही स्थान पर फिट नहीं कर पाती या ऐसा कोई उद्यम दिखाई भी नहीं देता तो तय मानिए कि कहीं न कहीं बड़ी गडबड़ी है.  

यहाँ पर एक उदाहरण देना ही पर्याप्त है... ICSSR (भारतीय सामाजिक विज्ञान शोध परिषद्) के अध्यक्ष हैं प्रोफ़ेसर सुखदेव थोरात. इन सज्जन ने दलितों के नाम पर NGO खड़े करके यूरोप एवं फोर्ड फाउन्डेशन से चन्दे लिए हैं. हिन्दू द्वेष एवं दलितों को भड़काने का काम ये साहब बखूबी करते रहे हैं, आज भी कर रहे हैं. इनके स्थान पर समावेशी विचारधारा वाले प्रोफ़ेसर के.वारिकू अथवा प्रोफ़ेसर जितेन्द्र बजाज को लाया जाना चाहिए था, ताकि इस महत्त्वपूर्ण संस्थान में यह हिन्दू द्वेष का ज़हर फैलने से रोका जा सके, लेकिन स्मृति ईरानी इनका कुछ नहीं कर पाईं. इसी प्रकार एक महत्त्वपूर्ण संस्थान है साउथ एशियन यूनिवर्सिटी, जिसके निदेशक प्रोफ़ेसर जीके चढ्ढा साहब पाकिस्तानी छात्रों को अधिक प्राधान्य देते थे और उनके अधिक प्यारे थे. चढ्ढा साहब के स्वर्गवास के पश्चात यह पद अभी खाली पड़ा है, क्योंकि मानव संसाधन मंत्रालय उस वामपंथी बौद्धिक गिरोह के हंगामों से सहमा हुआ रहता है. उधर बच्चों के दिमाग पर प्रभाव डालने वाले एवं पुस्तकों द्वारा बुद्धि दूषित करने वाले प्रमुख संस्थान NCERT में शंकर शरण जैसे विद्वान को होना चाहिए, जो वामपंथियों की नस-नस से वाकिफ हैं, परन्तु यह भी नहीं हो पा रहा. फिर भाजपा के मतदाता कैसे विश्वास करें कि यह सरकार पिछले साठ वर्ष की गन्दगी को साफ़ करने के प्रति गंभीर है तथा वैचारिक लड़ाई के लिए कटिबद्ध है? 

अब बात विचारधारा की निकली ही है तो यह जानना उचित होगा कि राज्यों में भाजपा की सरकारें सत्ता प्राप्त करने के बाद अचानक सेकुलरिज़्म का राग क्यों अलापने लगती हैं. जब तक भाजपा विपक्ष में रहती है वह भावनाओं को भड़काकर अपने समर्थकों को एक टांग पर खड़ा रखती है, परन्तु जैसा कि ऊपर केन्द्र का उदाहरण दिया कि सत्ता मिलते ही इनका “वैचारिक स्खलन” शुरू हो जाता है. ठीक वही स्थिति राज्यों में भी है. जिसमें सबसे (कु)ख्यात मामला है मध्यप्रदेश की भोजशाला का विवाद है. पिछले कई वर्षों से मध्यप्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला में वसंत पंचमी के दिन हिन्दू संगठन माँ सरस्वती की पूजा करते आए हैं, वहीं अतिक्रमण करके मुस्लिमों ने बाहर एक मस्जिद खड़ी कर ली है. मप्र में भाजपा की सरकार बने लगभग तेरह-चौदह वर्ष होने को आए, आज भी प्रतिवर्ष हिन्दू संगठनों को भोजशाला में पूजा-अर्चना करने के लिए या तो प्रशासन के आगे गिडगिडाना पड़ता है अथवा संघर्ष करना पड़ता है. हर बार हिन्दू संगठनों को लॉलीपाप देकर चलता कर दिया जाता है, जबकि मुस्लिम संगठन ठप्पे के साथ बाकायदा प्रशासन के संरक्षण में नमाज पढ़ते हैं. “मामाजी” की भाजपा सरकार को सेकुलरिज्म का ऐसा बुखार चढ़ा हुआ है कि वह इस मामले में अपने मातृ संगठन को भी अँधेरे में रखने से बाज नहीं आती. सत्ता की खातिर यह विचारधारा से भटकाव नहीं तो और क्या है? यदि हिन्दू भाजपा वोट देकर जितवाता है तो वह अपनी सरकार से उम्मीद भी तो रखता है कि वर्षों से लंबित पड़े विवादित मामलों में भाजपा सरकार या तो न्यायालयीन अथवा प्रशासनिक तरीके से उन्हें ख़त्म करे, परन्तु तेरह वर्ष की सत्ता के बावजूद हर साल क़ानून-व्यवस्था के नाम पर सरस्वती भक्त हिन्दुओं पर लाठियाँ बरसें यह उचित नहीं है. यही हाल राजस्थान में भी है. रानी साहिबा वसुंधरा राजे को भी केवल “सबका साथ, सबका विकास” का चस्का लगा हुआ है. विकास की दौड़ में रानी साहिबा ने जयपुर के वर्षों पुराने कई मंदिरों को सडक, पुल या मेट्रो की चाह में ध्वस्त कर दिया. कई मंदिर ऐसे भी थे जो आराम से विस्थापित किए जा सकते थे, जबकि कुछ मंदिरों को बचाते हुए सड़क का मार्ग बदला भी जा सकता था, कुछ मज़ारों और मस्जिदों को बचाने के लिए ऐसा किया भी गया. तमाम हिन्दू संगठनों ने इन मंदिरों को तोड़ने से बचाने के लिए अथवा वैकल्पिक मार्ग सुझाने के लिए कई आन्दोलन किए, परन्तु नतीजा शून्य. महारानी के बुलडोज़रों ने “अपने ही कार्यकर्ताओं और अपने ही मतदाताओं” की एक न सुनी. जोधपुर, अजमेर, जैसलमेर तथा बाड़मेर के कई इलाके तेजी से मुस्लिम बहुल बनते जा रहे हैं. इन क्षेत्रों में कई प्रकार की संदिग्ध गतिविधियाँ चल रही हैं. सीमा सुरक्षा बल लगातार चेतावनी जारी कर रहे हैं, परन्तु वसुंधरा राजे पर राजस्थान को औद्योगिक राज्य बनाने का भूत सवार है. राजस्थान में “मार्बल माफिया” के कई किस्से बच्चे-बच्चे की ज़बान पर मशहूर हैं, परन्तु शायद राजस्थान सरकार के कानों तक यह आवाज़ नहीं पहुँचती या शायद सेकुलरिज्म के बुखार से तप्त वह सुनना ही नहीं चाहतीं. राजस्थान में भाजपा का शासन आए तकरीबन तीन साल हो रहे हैं. हमेशा की तरह भाजपा कुछ ज्यादा ही नैतिक हो रही है. वे कर्मचारी जो संघी या भाजपा के मतदाता होने के कारण गहलोत सरकार द्वारा जानबूझकर रिमोट एरिया में फेंके गए थे, वे आज तक वहीँ पड़े सड़ रहे हैं, भाजपा को ऐसे समर्थक कर्मचारियों की सुध बुध लेने की कोई फ़िक्र नहीं और उधर काँग्रेस के लालित-पालित कर्मचारी अपनी पट्टाशुदा जगहों पर आज भी ठाठ से जमे हैं. यदि कांग्रेस अथवा वामपंथ का शासन होता तो पहले छः माह में ही उन्होंने अपने समर्थित कर्मचारियों को अपनी मनपसंद जगह पर पोस्ट कर दिया होता. लेकिन भाजपा निराली है, यहाँ दरी -पट्टी उठाने, सडकों पर उतरने, नारे लगा लगा कर गला फाड़ने, पुलिस के डंडे खाने अथवा मीडिया एवं सोशल मीडिया में विचारधारा का पक्ष रखने वालों को प्रतिबद्ध कार्यकर्ता अथवा 'त्यागी-बलिदानी' के रूप में आगे खड़ा कर दिया जाता है, और जब भाजपा को सत्ता मिलती है तो लाभ लेने के लिए गमांग-बहुगुणा टाइप नेता और जिन्दगी भर संघ की खिल्ली उड़ाने वाले नवप्रविष्ट 'भाई साहब' आगे आ जाते हैं. 


बालासाहब ठाकरे और अटलबिहारी वाजपेयी के ज़माने से महाराष्ट्र में शिवसेना, भाजपा की सबसे पुरानी और सबसे विश्वस्त साथी रही है. जब गुजरात दंगों के बाद अटल जी मोदी को गुजरात से लगभग हटाने ही वाले थे, तब बालासाहब चट्टान की तरह मोदी के पीछे खड़े रहे और अटल जी से स्पष्ट शब्दों में मोदी को बनाए रखने की बात कही थी. यदि बालासाहब ने उस समय अटल जी को उस समय वह धमकी ना दी होती, तो अटल जी की नैतिकता(??) और सरलता(?) तथा “कथित राजधर्म” के चक्कर में मोदी पता नहीं कहाँ ट्रांसफर कर दिए जाते. तब न तो मोदी गुजरात में बारह साल शासन कर पाते, और ना ही वाइब्रेंट गुजरात के जरिये अपनी छवि चमकाकर आज प्रधानमंत्री पद तक पहुँच पाते. यह संक्षिप्त भूमिका इसलिए बताई जा रही है कि महाराष्ट्र के गत विधानसभा चुनावों के पहले से ही भाजपा की “विस्तारवादी” नीतियों के कारण जिस तरह से केन्द्रीय नेतृत्त्व ने शिवसेना के साथ अपमानजनक एवं नीचा दिखाने जैसा व्यवहार किया है, यह हिंदुत्व के लिए ठीक नहीं है. यदि भाजपा को अपना विस्तार करना ही है तो महाराष्ट्र पर गिद्ध दृष्टि क्यों? वहां तो पहले से ही भाजपा का विश्वस्त सहयोगी मौजूद है, जो इक्का-दुक्का बार छोड़कर सदैव भाजपा के साथ खड़ा रहा है. महाराष्ट्र विधानसभा में “अकेले” बहुमत हासिल करने की होड़ में शिवसेना को तोड़ने का प्रयास करना अथवा शरद पवार जैसे भीषण भ्रष्ट व्यक्ति के साथ गलबहियाँ करना भाजपा को शोभा नहीं देता. परन्तु जब विचारधारा पर सत्ता प्राप्ति हावी हो जाती है, तब ऐसा ही होता है. ये बात और है कि शिवसेना टूटी नहीं, लेकिन फिर भी भाजपा ने संयुक्त मंत्रिमंडल में लगातार शिवसेना को दबाए रखा है और गाहे-बगाहे दोनों पार्टियों में चिंगारियाँ फूटती रहती हैं. जैसा कि लेख में पहले बताया जा चूका है, “संभाजी ब्रिगेड” नामक जहरीला संगठन शरद पवार का जेबी संगठन है और यह लगातार हिन्दुओं में फूट डालने तथा ब्राह्मणों को गाली देने का काम करता है, ऐसे संगठन के प्रति भाजपा में अचानक प्रेम की कोंपलें फूट पडी हैं. संघ की विचारधारा एवं हिंदुत्व के लिए यह अच्छे संकेत नहीं हैं. अपनी जड़ों को छोड़कर कोई भी वृक्ष अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकता. 

पश्चिम भारत के गोवा में एक छोटा सा संगठन है “सनातन संस्था” जो कि हिन्दू जनजागृति समिति के बैनर तले हिंदुत्व जागरण के अपने कई कार्यक्रम आयोजित करता है. यहाँ मैंने “छोटा संगठन” इसलिए कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे विराट संगठन तथा भाजपा जैसे विशाल पार्टी के सामने तुलनात्मक रूप से यह छोटा संगठन ही है. इस संगठन का विस्तार फिलहाल केवल महाराष्ट्र एवं कर्नाटक में ही थोडा बहुत प्रभावशाली है, परन्तु बाकी राज्यों में भी अब यह धीरे-धीरे अपने पैर पसार रहा है. यह संगठन राजनैतिक नहीं है, इसलिए यह “सत्ता प्राप्ति की लालसा” अथवा सेकुलरिज्म का भूत चढ़ने जैसी बीमारियों से बचा हुआ है. यह संगठन सिर्फ और सिर्फ हिन्दू जागरण, हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की परम्पराओं एवं विधियों तथा विभिन्न प्रकार के हिन्दू-समाजसेवी कार्यक्रमों में भाग लेता रहता है. इस संगठन के मुखिया डॉक्टर आठवले जी अधिकाँश समय एकांतवास में ही रहते हैं. कांग्रेस और वामपंथियों तथा हाल ही में अपनी राजनैतिक महत्त्वाकांक्षाओं के तहत आपियों ने लगातार सनातन संस्था पर कई वैचारिक हमले किए हैं. महाराष्ट्र की पिछली कांग्रेस सरकार ने सनातन संस्था के खिलाफ कई मामले दर्ज कर रखे हैं. दाभोलकर एवं कलबुर्गी की हत्या के आरोप में खोजबीन और पूछताछ के बहाने महाराष्ट्र पुलिस सनातन संस्था के आश्रमों एवं गोवा के प्रमुख केंद्र पर जब-तब धावा बोलती रहती है. पिछले पांच वर्ष से यह संस्था अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन का आयोजन करती है, जिसमें देश-विदेश से दर्जनों ऐसे कार्याकार्य एवं संगठन भाग लेते हैं जो जमीनी स्तर पर हिंदुत्व के कार्य में जुटे हैं. इनमें बांग्लादेश, नेपाल जैसे देशों से भी प्रतिनिधि आते हैं जहां हिन्दुओं पर विभिन्न प्रकार के अत्याचार हो रहे हैं. बांग्लादेश के एक मानवाधिकार वकील हैं रवीन्द्र घोष, जो वहां के अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय के खिलाफ होने वाले अपराधों एवं उत्पीड़न के खिलाफ आए दिन लड़ते रहते हैं. बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिन्दुओं की हालत बेहद दयनीय है यह बात सभी जानते हैं. पिछले चार वर्ष से रवीन्द्र घोष गोवा के इस हिन्दू अधिवेशन में भाग लेने आते रहे हैं, परन्तु इस वर्ष केंद्र सरकार ने रवीन्द्र घोष को वीसा नहीं दिया. इस अनुमति को नकारने के लिए क़ानून-व्यवस्था एवं बांग्लादेश से संबंधों का कारण दिया गया. गत वर्ष हुए चौथे हिन्दू अधिवेशन में भी कर्नाटक से प्रमोद मुथालिक इस सम्मेलन में आने वाले थे, परन्तु गोवा में भाजपा की “हिन्दुत्ववादी” सरकार ने प्रमोद मुतालिक के गोवा में घुसने पर प्रतिबन्ध लगा दिया. अब सोचने वाली बात यह है कि प्रमोद मुतालिक पर कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने कुछ मामले दर्ज कर रखे हैं, परन्तु गोवा में उनके खिलाफ एक भी मामला नहीं है. ऐसे में भारत के एक नागरिक को जो कि शांतिपूर्ण तरीके से एक अधिवेशन में भाग लेने जा रहा हो, किसी अंग्रेजी क़ानून के तहत, तानाशाहीपूर्ण पद्धति से राज्य में घुसने से रोकना और वो भी खुद को संघ की राजनैतिक बाँह कहलाने वाली भाजपा सरकार के शासन में?? इतना अन्याय तो कांग्रेस की सरकारों ने भी नहीं किया. परन्तु जैसा कि मैंने कहा, जब विचारधारा पर सत्ता हावी हो जाती है तब “अपने” लोग भी दुश्मन नज़र आने लगते हैं. 


सनातन संस्था एक पूर्णतः धार्मिक एवं हिंदुत्वनिष्ठ गैर-राजनैतिक संस्था है, जिसकी कोई राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा अभी तक सामने नहीं आई है, और मजे की बात यह है कि इस संस्था का संघ एवं उसकी कार्यशैली से तिनका भर भी सम्बन्ध नहीं है. संक्षेप में कहा जाए तो ऐसी कई संस्थाएं या संगठन हैं जो सिर्फ हिन्दू धर्म एवं हिंदुत्व तथा राष्ट्रवाद की “मूल विचारधारा” के लिए काम कर रहे हैं, परन्तु उनका सीधा सम्बन्ध संघ-भाजपा से नहीं है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ऐसी संस्थाओं एवं संगठनों को “राजनैतिक संरक्षण” देना हिन्दू हित का दम भरने वाली सत्ताधारी पार्टी का काम नहीं है?? क्या भाजपा-संघ की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह ऐसे संगठनों को जो कि उसके प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि पूरक हैं, उन्हें हर प्रकार की मदद करे? जब ऐसे संगठन अथवा समाज में बैठे हजारों-लाखों लोग जो कि भाजपा के सदस्य नहीं हैं परन्तु हिंदुत्व की विचारधारा के लिए काम करते हैं, वोट देते हैं और जिस कारण भाजपा को सत्ता की मलाई खाने मिलती है, क्या ऐसे लोगों का ख़याल रखना भाजपा की राज्य एवं केंद्र सरकार का काम नहीं है?? ऐसे हिन्दू संगठन किसी मदद के लिए किसकी तरफ आशा की निगाह से देखें, वैचारिक पितृ संगठन और पार्टी की तरफ या ओवैसी और चर्च की तरफ?? 

संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि “काँग्रेस मुक्त भारत” के नशे में भाजपा तेजी से “काँग्रेस युक्त भाजपा” की तरफ बढ़ती जा रही है. विचारधारा के स्खलन संबंधी और समर्थकों की नियुक्तियों को सही स्थान पर फिट नहीं करने संबंधी ऊपर जिन विभिन्न उदाहरणों को उल्लेखित किया है, उस प्रकार की ढीलीढाली कार्यशैली को देखते हुए काँग्रेस मुक्त भारत का सपना “राजनैतिक” रूप से तो संभव है, क्योंकि मूल काँग्रेस इस समय सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है. परन्तु उस काँग्रेस को विस्थापित करने वाली यह जो “डुप्लिकेट काँग्रेस” अर्थात भाजपा है वह प्रशासनिक रूप से कभी भी काँग्रेस मुक्त भारत नहीं कर सकती. पिछले साठ वर्ष में जिस चतुराई और धूर्तता से काँग्रेस और वामपंथ ने अपने मोहरे देश के प्रत्येक क्षेत्र में फिट कर रखे हैं उसका दस प्रतिशत भी प्राप्त करने में भाजपा को पूरे दस वर्ष चाहिए, परन्तु सत्ता में आने के बाद जिस प्रकार भाजपा पर “सेकुलरिज़्म का बुखार” चढ़ता है, एवं त्याग-बलिदान के बौद्धिक डोज़ पिलाते हुए पार्टी में अपनों की उपेक्षा की जाती है, उसे देखते हुए तो यह संभव नहीं लगता. 

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