Monday, July 18, 2016

Communist, Atheists - A Fraud


वामपंथी नास्तिकता : झूठ और धूर्तता 

(आशीष छारी जी की फेसबुक पोस्ट से साभार) 

कुछ दिन पहले जावेद अख्तर बड़े फकर से कह रहे थे कि वे एथीस्ट हैं, एथीस्ट मने नास्तिक....... बतला रहे थे कि जवान होते होते वे एथीस्ट हो गए थे, वे किसी अल्लाह को नहीं मानते, कभी रोज़ा नहीं रखा, मस्जिद नहीं गए नमाज़ नहीं पढ़े...... टोटल एथीस्ट....,,., लेकिन जब भी मैं इनकी दीवार फ़िल्म देखता हूँ तो चक्कर खा जाता हूँ, शक होता है कि ये एथीस्ट झूठ तो नहीं बोल रहा कहीं....... फ़िल्म देखिये, फ़िल्म में क्या दिखाया है कि वर्मा जी का लौंडा विजय (अमिताभ बच्चन) बचपन से ही भगवान से रूठ जाता है, मंदिर नहीं जाता, अपनी माँ सुमित्रा (निरुपमा रॉय) के कहने पर भी मंदिर की सीढ़ी नहीं चढ़ता...... जोर जबरदस्ती करने पर मंदिर का पुजारी टोक देता है, नहीं बहन भगवान् की पूजा जोर जबरदस्ती से नहीं होती श्रद्धा से होती जब इसके दिल में श्रद्धा जागेगी तब ये खुद ही मंदिर आ जाएगा....... वाह कितनी प्यारी बात कहीं पुजारी ने, खैर अच्छा था कि जगह मंदिर थी और सामने पुजारी था, कहीं मस्जिद होती और सामने मौलवी साहब होते तो पक्का फतवा जारी हो जाता...... ला हॉल विला कूवत इल्ला बिल्ला अल्लाह की तौहीन की है इस लौंडे ने, दीन को मानने से मना किया है इसने, ये काफ़िर हो चुका है, काफिरों के लिए मुताबिक ए दीन बस एक ही सजा है..... मुरतीद मुरतीद..... मने सर कलम कर फुटबॉल खेली जाए........ हुक्म की तालीम हो...... हेहेहे..... 


खैर छोड़िये, पिछली बात पे वापस आते हैं, तो मामला ये है कि पूरी फ़िल्म में विजय भगवान से छत्तीस का आंकड़ा बना कर चलता है, जताया कुछ यूँ गया है कि फ़िल्म का नायक भगवान् को नहीं मानता और मंदिर नहीं जाता......... मने एथीस्ट हो चुका है पर जब डॉकयार्ड पर काम करने वाले रहीम चच्चा विजय को उसकी बांह पर बंधे 786 नंबर के लॉकेट के बारे में इल्म देते हैं, कि बेटा 786 का मतलब होता है बिस्मिल्लाह, इसे हम लोगों में बड़ा मुबारक समझा जाता है......... सामन्त के आदमी की चलाई गोली जब विजय को लगती है, और बिल्ले की वजह से विजय बच जाता है तब विजय को इल्हाम होता है कि 786 नंबर तो बड़ा पावरफुल है तब वो बिल्ले को बार बार चूमता है और हमेशा अपने पास सीने से लगा कर रखता है और चूमता रहता है मने एक एथीस्ट को बिस्मिल्लाह में तो विश्वास है लेकिन भगवान में नहीं............. 

सियापे की हद तो देखिये जब विजय की माँ बीमार होती है, जिंदगी और मौत से जूझ रही होती है तब विजय को मंदिर की याद आती है अल्लाह मियाँ फ्रेम से ग़ायब हो जाते हैं...... मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ विजय भगवान् के सामने खड़ा है और कहता है- मैं आज तक तेरी सीढ़ियाँ नहीं चढ़ा...... अब कोई पूछे कि bc अब क्यों चढ़ा बे........ मैंने आज तक तुझसे कुछ नहीं माँगा....... तो अब क्यों मांग रहा है भो%* के............ बताओ भला अब ये क्या बात हुयी यार, वैसे एथीस्ट हैं, मंदिर की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ेंगे पर बिस्मिल्लाह (786) को चूमेंगे दिन में दस बार, छाती से चिपका कर रखेंगे और कहीं कुछ गलत हो जाए तो भगवान् की ऐसी-तैसी करेंगे, शुरू हो जाएंगे भगवन को हूल-पट्टी देने....... 


जावेद अख्तर साहब कहते हैं कि वे शुरू से एथीस्ट रहे हैं लेकिन फ़िल्म की कहानी लिखते समय इस्लाम की ओर झुक जाते हैं, उनका नायक एथीस्ट है, भगवान को नहीं मानता लेकिन अल्लाह और 786 को पूरी शिद्दत से मानता है, ये कैसा एथिस्टपना हुआ........ ये तो बिलकुल वैसा ही हुआ जैसे उमर खालिद की बहन कहती है कि उसका भाई किसी इस्लाम को नहीं मानता लेकिन नारे वो JNU में इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह के लगवाता है और पूरी शिद्दत से अपनी कौम के प्रति पूरी निष्ठा निभाते हुए हर मुस्लिम की तरह दूसरे मुस्लिम (अफज़ल गुरु) के प्रति पूरी वफादारी रखता है............ पिताजी जब ज़िंदा थे तो वे बताते थे कि जब ये फ़िल्म दीवार आई थी तब बहुत से लौंडे खुद को अमिताभ बच्चन समझकर मंदिर की सीढ़ियों पर मुंह फुलाये बैठे देखे जाते थे, मेले ठेलों से 786 के लॉकेट और बिल्ले खरीदकर अपनी चौड़े कॉलर की नीली शर्ट की ऊपरी जेब जो दिल के पास होती है उसमें खूब रखते देखे जाते थे......... खैर मैं फ़िल्में बहुत देखता हूँ और फिल्मों में अक्सर देखता है कि फ़िल्म का हिन्दू नायक भगवान में विश्वास नहीं रखता, मंदिर की सीढ़ी नहीं चढ़ता, प्रसाद नहीं खाता वगैरह वगैरह लेकिन आज तक किसी मुस्लिम या ईसाई नायक को अल्लाह या गॉड की खिलाफत करते नहीं देखा......... मस्जिद या गिरजे की सीढ़ियों पर बैठे नहीं देखा...... अल्लाह या गॉड से मुंह फुलाये नहीं बल्कि अपने मजहब के प्रति पूरी निष्ठा रखते जरूर देखा है....... दिखाया जाता है कि फ़िल्म के मुस्लिम या ईसाई नायक का अपने रिलिजन में पूरा पूरा फेथ रखता है बस असली गड़बड़ तो हीरो को भगवान् से है........ ये फिल्मों का ही असर है कि जब मैंने कई सुतियों को खुद को किसी फ़िल्मी नायक की तरह आज भी भगवान से मुंह फुलाये मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे देखा है....... 

एथीस्ट होना तो जैसे आजकल फैशन हो गया है वैसे ही जैसे JNU में हो गया है..... मैं फ़िल्मी एथीस्ट और JNU छाप एथीस्ट में बहुत समानता पाता हूँ........ फ़िल्मी एथीस्ट की लड़ाई सिर्फ भगवान से है बाकी अल्लाह और गॉड से उसे कोई दिक्कत नहीं, ठीक ऐसे ही JNU छाप एथीस्ट भी भगवान् के पीछे लठ्ठ लिए फिरते हैं....... देवी दुर्गा एक हिन्दू मिथक है लेकिन महिषासुर वास्तविकता है, माँ दुर्गा की पूजा करना अन्धविश्वास है लेकिन महिषासुर को पूजना आधुनिकता है......... राम राम बोलना कट्टरता है लेकिन इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह बोलना धार्मिकता है, दिवाली होली मनाना बुजुरुआ बोडमता का प्रतीक है लेकिन ईद और क्रिसमस मनाना साम्यवादिता का लोगो है, JNU कम्युनिस्ट कहते हैं कि वे एथीस्ट हैं धर्म उनके लिए अफीम है लेकिन उनका एथीसिस्म इस्लाम और ईसाईयत को रसगुल्ला समझता है और हिंदुत्व को अफीम, गांजा, चरस, कोकीन, हेरोइन......... सारी हूल-पट्टी भगवान् के लिए रख जोड़ी हैं बाकी अल्लाह या गॉड के लिए चूमा चाटी का इल्हाम है, बड़ा अजीब एथीसिस्म है यार इनका....... 

मैंने दुनिया में कई एथीस्ट ऐसे देखे हैं जिनका एथीस्टपना सभी मजहब के लिए बराबर होता है, वे जिनती ईमानदारी से दूसरे धर्म की कमियां निकालते हैं उससे अधिक ईमानदारी दिखाते हुए वे अपने धर्म की बखिया उधेड़ देते हैं लेकिन JNU में एथीस्ट होने के मायने थोड़ा अलग है बिकुल दीवार फ़िल्म के नायक के जैसे........... भगवान् से रूठकर मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ जाइए लेकिन जैसे ही 786 का बिल्ला मिले तो उसको चुमिये, माथे से लगाइये........ 

दरअसल JNU ही नहीं पूरे देश में एथीस्ट होने का मतलब है सिर्फ और सिर्फ हिन्दुज्म का आलोचक होना है गोया हिन्दुज्म न हुआ एथीस्टों की प्रेक्टिस के लिए पंचिंग बेग हो गया.........

(मूल लेखक - आशीष छारी)

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