Friday, April 29, 2016

New Nationalist Wave in India


राष्ट्रवाद का बढ़ता उफ़ान... 


जब किसी रबर की बड़ी गेंद को लगातार दबाया जाता है, तो एक सीमा के पश्चात वह दबाने वाले को वापस एक जोरदार धक्का लगाती है. जिसे हम “एक्शन का रिएक्शन” कहते हैं. कुछ सप्ताह पहले जब JNU में उमर खालिद और उसके कुछ जेहादी दोस्तों ने “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह” जैसे नारे लगाए होंगे तो उन्हें अनुमान भी नहीं होगा कि उनकी इस हरकत की प्रतिक्रिया में सोशल मीडिया से पैदा हुआ तूफ़ान न सिर्फ उन्हें उड़ा ले जाएगा, बल्कि भारत में एक नई राष्ट्रवादी लहर का निर्माण भी कर देगा. “पिछले कुछ दिनों से “भारत माता की जय” बोलना या नहीं बोलना तेजी से एक मुद्दा बनता जा रहा है, विपक्षी दल यह आरोप लगा रहे हैं कि संघ और भाजपा ने जानबूझकर इसे मुद्दा बनाया है ताकि मूल मुद्दों से ध्यान हटाया जा सके... लेकिन यह सच नहीं है. वास्तविकता तो यह है कि “भारत माता की जय” का मुद्दा जनता का अपना मुद्दा है, जिसे जनता ही परवान चढ़ाया और जनता के बीच उपजे क्रोध ने इस मुद्दे को यहाँ तक पहुंचा दिया है. आखिर इस उफनते राष्ट्रवाद और देशप्रेमी नारों की वजह क्या है, इसके लिए हमें इस विमर्श को हालिया घटनाओं में मद्देनज़र देखना होगा. तथ्यों को देखने पर यह पता चल जाएगा कि “भारत माता की जय” संघ-भाजपा का नहीं, बल्कि क्रोधित जनता का स्वयं का मुद्दा है. 


भारत माता की जय” इससे पहले कभी भी मुद्दा नहीं था, लेकिन JNU के इन वामपंथी सोच वाले छात्रों और उन्हें शह देने वाले प्रोफेसरों के कारण इस ““एक्शन” की “रिएक्शन”” हुई. ऐसा नहीं है कि JNU में ऐसे भारत विरोधी, व्यवस्था विरोधी एवं भारत से घृणा दर्शाते हुए नारे पहली बार लगे हों. JNU पिछले काफी समय से देशद्रोहियों का अड्डा बनता जा रहा था, यह बात यूपीए सरकार के बाशिंदे भी जानते थे, परन्तु अपने हितों एवं वामपंथ के साथ उनके मधुर संबंधों के कारण समस्या को लगातार उपेक्षित करते रहे. नतीजा यह हुआ कि JNU के ये भस्मासुर लगातार अपना आकार बढ़ाते गए. लेकिन इस बार एक बड़ा अंतर आ गया, वह है सोशल मीडिया. JNU में उस काली रात को सबसे पहली बार जब ये नारे लगे, उस समय लगभग रात के नौ बजे थे, नारे लगाने वालों ने अपना मुंह ढंक रखा था. कन्हैया और उमर खालिद के सामने ये नारे लगाए जा रहे थे और ये दोनों छात्र नेता न सिर्फ ऐसी हरकतों पर चुप्पी साधे हुए थे, बल्कि अपनी बॉडी लैंग्वेज द्वारा उसे मूक समर्थन भी दे रहे थे. जबकि छात्रसंघ अध्यक्ष होने के नाते कन्हैया का यह कर्त्तव्य था कि वह न सिर्फ ऐसे देशद्रोही नारे लगाने वालों (तथाकथित अज्ञात) को न सिर्फ रोकता, बल्कि उनकी पहचान करके खुद ही पहल करते हुए बाकायदा पुलिस में FIR दर्ज करता, परन्तु न तो ऐसा होना था और न हुआ, क्योंकि “भारत तेरे टुकड़े होंगे” की लालसा तो इन दोनों छात्र नेताओं के मन में भी थी. नारे लगाने वाले, जो कि ज़ाहिर है किसी पहचान वाले के साथ ही कैम्पस में आए होंगे और उन्हें दर्जनों छात्र पहचानते भी होंगे, चुपचाप कैम्पस में ही विलीन हो गए. ऐसी हरकतें JNU में कई बार दिनदहाड़े भी हो चुकी थीं, परन्तु इस बार मामला उलट गया. उधर रात नौ बजे नारे लगे, और इधर सवा नौ बजे उन नारों का वीडियो देशद्रोही नारों की स्पष्ट आवाज़ के साथ इंटरनेट पर अपलोड हो गया. देखते ही देखते यह वीडियो वायरल हो गया और समूचे देश के “टेक-सेवी” युवाओं को दो घंटे में ही पता चल गया कि JNU में पिछले कुछ वर्षों से क्या चल रहा था. फिर क्या था, बस एक बार पिटारा खुलने की देर थी, आजकल तो हर हाथ में मोबाईल है, देखते ही देखते अगले तीन दिनों में सात और वीडियो सामने आ गए, जिसमें स्पष्ट रूप से देशद्रोही नारे लगाने वाले “कथित छात्र” दिखाई दिए. भारत की तथाकथित मुख्य धारा की मीडिया, जिसने अभी तक JNU की इन हरकतों पर आँखें मूँद रखी थीं, सोशल मीडिया की इस जोरदार मुहीम के कारण उसे मजबूरी में ये हरकतें दिखानी पड़ीं. जब छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने CRPF के छिहत्तर जवान मार दिए थे, उस समय भी JNU में जश्न मनाया गया था, लेकिन हमारी मीडिया जो सिर्फ “धंधा करना” जानती है, उसने कभी भी ऐसे देशद्रोही विचारों और घटनाओं को तरजीह नहीं दी. 

धंधेबाज मीडिया यहीं नहीं रुका, मीडिया में बैठे वामपंथी पिठ्ठुओं ने कन्हैया और उमर खालिद को “क्रांतिकारी हीरो” के रूप में पेश करना शुरू कर दिया. उमर खालिद को बेक़सूर तथा कन्हैया को मासूम बताया जाने लगा. इसे देखते हुए देश की जनता का क्रोध धीरे-धीरे बढ़ने लगा. लेकिन मीडिया चाहे जितना प्रयास कर ले, आज के युग में कोई खबर दबाना मुश्किल हो चूका है. “भारत तेरे टुकड़े होंगे” जैसे नारे और विचार काफी लम्बे समय से JNU में पाले-पोसे जा रहे हैं, लेकिन देश की सामान्य जनता को इसकी खबर नहीं थी, परन्तु जब उमर खालिद और कन्हैया के बहाने सोशल मीडिया पर JNU के सारे कारनामे एक-एक करके सामने आने लगे, तब जाकर जनता को पता चला कि न सिर्फ ऐसी हरकतें इस विश्वविद्यालय में आम हो चली हैं, बल्कि वहां के प्रोफेसरों और छात्रों ने मिलकर एक ऐसा “गिरोह” तैयार कर लिया है जो अरशद आलम और खुर्शीद अनवर जैसे दुष्कर्म के आरोपियों के बचाव में भी सक्रीय हो जाता है. इस देशद्रोही घटना के बाद ही जनता का ध्यान इस बात पर गया कि JNU अथवा फिल्म इंस्टीट्यूट पुणे में भारत के करदाताओं की गाढ़ी कमाई से कैसे-कैसे लोग मस्ती छान रहे हैं, तीस-पैंतीस-चालीस साल की आयु तक के मुफ्तखोर वहां “छात्र”(??) बने बैठे हैं, होस्टलों के कमरों पर कब्जे जमाए बैठे हैं, शिक्षा सब्सिडी की आड़ में सस्ते कमरे और सस्ते भोजन के चक्कर में वर्षों से वहां जमे हुए हैं और विभिन्न NGOs के जरिये अपनी राजनीति चला रहे हैं. देश की जनता यह जानकार हैरान थी कि जाने कैसे-कैसे “फर्जी कोर्सेस” की आड़ में यह सारा खेल वर्षों से चल रहा था. इस समय तक “भारत माता की जय” जैसा कहीं कोई मुद्दा नहीं था. 



देश की जनता के खदबदाते क्रोध के बीच ही मानव संसाधन मंत्रालय का यह निर्णय आया कि युवाओं में देशप्रेम की भावना जागृत करने के लिए देश के सभी विश्वविद्यालयों में २०० फुट ऊंचा तिरंगा फहराया जाएगा. चेन्नई, हैदराबाद और JNU में जिस तरह की विचारधारा का पालन-पोषण किया जा रहा है और जिन लोगों द्वारा किया जा रहा है, उन्हें यह निर्णय कतई पसंद नहीं आया. तिरंगा फहराने जैसे सामान्य से देशप्रेमी निर्णय का भी दबे स्वरों में विरोध शुरू हो गया, क्योंकि मोदी के सत्ता में आने के बाद से ही देश में कुछ कथित बुद्धिजीवियों का एक ऐसा गिरोह तैयार हो गया है, जिसे सरकार के प्रत्येक निर्णय पर अपना विरोध जताना ही है. देश का मध्यमवर्ग यह हरकतें देखकर हैरान-परेशान था, आखिर ये हो क्या रहा है. इस नाजुक मोड़ पर संघ प्रमुख का बयान आया कि “सभी को भारत माता की जय बोलना ही चाहिए”. बस फिर क्या था, दिन-रात संघ को पानी पी-पीकर कोसने वाले तथा “राष्ट्रवाद” नामक शब्द से भी घृणा करने वाले उछलकूद मचाने लगे. सबसे पहले हमेशा की तरह ओवैसी सामने आए. एक हास्यास्पद बयान में उन्होंने कहा कि “संविधान में कहीं भी ऐसा नहीं लिखा है, कि भारत माता की जय बोलना जरूरी है”. ओवैसी ने तिरंगे को धर्म से जोड़ने की जो फूहड़ कोशिश की, उसके कारण इस विवाद में जो कुछ तटस्थ लोग थे, वे भी न सिर्फ आश्चर्यचकित हुए, बल्कि क्रोधित भी हुए. सामान्य लोग यह सोचकर हैरान होने लगे कि आखिर तिरंगा फहराने और भारत माता की जय बोलने जैसे मुद्दों में धर्म और विचारधारा कहाँ से घुस आई. देश की जनता यह सोचने पर मजबूर हो गई कि आखिर देश के विश्वविद्यालयों में तथा राजनीति में यह कैसा ज़हर भर गया है, कि मोदी और भाजपा से घृणा करने वाले अब तिरंगे और भारत माता से भी घृणा करने लगे? उल्लेखनीय है कि मोहम्मद अली जिन्ना ने कभी भी “भारत माता की जय” का नारा नहीं लगाया, जबकि मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद ने इस नारे का गर्व से उद्घोष किया. ओवैसी के ऐसे घृणित बयान से यह समझ में आता है कि ओवैसी जानबूझकर जिन्ना की राह पर आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि तिरंगे और भारत माता को इस्लाम से जोड़ने की हिमाकत कोई मूर्ख या धूर्त ही कर सकता है. 

लेकिन बात यहीं तक नहीं थमी, ओवैसी के सुर में सुर मिलाते हुए देवबंद से सम्बंधित दारुल इफ्ता ने भी एक मुस्लिम के सवाल पूछने पर 19 मार्च को यह फ़तवा जारी किया कि “इस्लाम में भारत माता की जय बोलना निषिद्ध है, क्योंकि इस्लाम में बुत-परस्ती की मनाही है”. फतवे में कहा गया कि चूंकि भारत माता को एक मूर्ति के रूप में, एक देवी के रूप में पेश किया गया है इसलिए इसकी वंदना करना इस्लाम के अनुरूप नहीं है. जबकि सामान्य बुद्धि वाला कोई भी व्यक्ति बता सकता है कि भारत माता को देवी के रूप में किसी भी संगठन ने प्रोजेक्ट नहीं किया है. भारत माता की एक काल्पनिक छवि संघ ने जरूर गढ़ी है, परन्तु उसे सर्वमान्य रूप से “देवी” नहीं बल्कि “माता” के रूप में चित्रित किया जाता है. अब भला माता को पूजने अथवा उसके सामने सर झुकाने में क्या तकलीफ है? यदि हम बांग्लादेश के राष्ट्रीय गीत को ध्यान से सुनें और उसका अर्थ निकालें तो साफ़-साफ़ पता चलेगा कि उसमें भी “आमार शोनार बांगला” को मातृभूमि के रूप में पेश किया गया है और उसकी वंदना की गयी है. तो फिर ओवैसी अथवा देवबंद के उलेमाओं ने यह तर्क इस्लाम की किस किताब से निकाल लिया कि “माँ के आगे सजदा नहीं किया जा सकता”?? दरअसल यह कुछ और नहीं सिर्फ और सिर्फ मोदी एवं संघ का अंध-विरोध भर है. चूंकि संघ ने कहा है कि इसलिए हम उसका ठीक उल्टा ही करेंगे, यही जिद देश के लिए घातक है. 


पाठकों को याद ही होगा कि इससे पहले भी काफी लम्बे समय से इस्लामी “विद्वान”(??) वन्देमातरम का विरोध करते आए हैं. जबकि स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में गांधी-नेहरू के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर लड़ने वाले कई इस्लामी नेताओं ने उन दिनों बड़े गर्व से वन्देमातरम का नारा लगाया था, यह गीत भी गाया था. फिर पिछले साठ साल में ऐसा क्या हो गया कि “वन्देमातरम” गीतों को भी साम्प्रदायिक की श्रेणी में डाल दिया गया? सरस्वती वंदना के मामले में तो एकबारगी समझ में आता है, कि चूंकि वह हिन्दू देवी हैं, इसलिए इस्लामी कट्टरता सरस्वती वंदना का विरोध करते हैं, परन्तु “भारत माता” कोई देवी नहीं है, वह तो जन्मभूमि का पर्याय है. तो क्या जन्मभूमि की भी वंदना नहीं की जा सकती? ऐसा कट्टर रवैया ठीक नहीं है. यही नियम सूर्य नमस्कार एवं योग पर भी लागू होता है. सूर्य कोई भगवान् नहीं हैं, वह तो एक अखंड ज्योति पुंज है, जिसके बिना धरती पर जीवन संभव नहीं है. माना कि इस्लामी मान्यताओं में “ॐ सूर्याय नमः” कहना निषिद्ध है, लेकिन क्या अपने और अपने बच्चों के स्वास्थ्य हेतु बिना मन्त्र का उच्चारण किए सूर्य नमस्कार नहीं लगाए जा सकते? देवबंद के कट्टरपंथी मौलवियों द्वारा मनमाने तरीके से इस्लाम की व्याख्या करने के कारण ही उदारवादी मुस्लिम तबका भी धीरे-धीरे समाज से कटता चला जाता है. जबकि आज भी देश के हजारों गाँवों में रामनवमी की शोभायात्रा में मुस्लिम समाजजन फूलों से स्वागत करते हैं और ताजिए के जुलूस में कई हिन्दू भाई कन्धा लगाते हैं. ओवैसी और देवबंद जैसे लोगों के कारण अब “भारत माता” और सूर्य को भी संघी या साम्प्रदायिक बना दिया गया है, बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. अपनी राजनीति चमकाने के लिए ओवैसी के अनुयायी कैसे अंध विरोध में उतर सकते हैं, इसका उदाहरण है महाराष्ट्र विधानसभा में MIM के सदस्य वारिस पठान द्वारा सदन के अन्दर भी वन्देमातरम अथवा भारत माता की जय नहीं बोलने पर अड़ गए. स्वाभाविक है कि जब एक पक्ष अड़ियल रवैया अपनाता है तो सामने वाला पक्ष भी और अधिक अड़ियल बन जाता है. नतीजा यह हुआ कि शिवसेना और भाजपा के विधायकों ने एकमत से वारिस पठान को विधानसभा से निलंबित करवा दिया. कांग्रेस और वामपंथियों का तो क्या कहना, ये लोग भी बिलकुल कट्टर इस्लामी मानसिकता के समकक्ष व्यवहार करते हैं, अर्थात यदि मोदी-संघ-भाजपा ने कोई बात कही है तो चाहे वह कितनी भी अच्छी या सही हो, उसका विरोध जरूर करेंगे, और विरोध भी ऐसा कि ये लोग राष्ट्रहित के मुद्दे पर भी एकदम दुसरे छोर पर जा बैठते हैं. 



विपक्षी दलों एवं कथित बुद्धिजीवियों के इसी अंध-विरोध तथा जिद के कारण श्रीनगर की NIT में भी “राष्ट्रवादी विचार विस्फोट” हो गया. काँग्रेस शासन के दौरान वर्षों से स्थानीय कश्मीरियों द्वारा सताए जाने और अपमान झेलने के लिए अभिशप्त NIT श्रीनगर के छात्रों ने आखिर JNU के इस देशद्रोही कृत्य को देखते हुए तिरंगा उठा ही लिया... और जो काम श्रीनगर की वादी में पिछले बीस-पच्चीस वर्ष में नहीं हुआ था, वह इन उत्साही छात्रों ने कर दिखाया. श्रीनगर में तिरंगा लहराना और भारत माता की जय के नारे लगाते हुए दौड़ लगाना एक क्रान्तिकारी कदम कहा जाना चाहिए. हालाँकि छात्रों का यह दुस्साहस श्रीनगर के स्थानीय छात्रों एवं जम्मू-कश्मीर पुलिस-प्रशासन में घुसे बैठे देशद्रोही तत्त्वों को रास नहीं आया, और उन्होंने एकमत होकर बाहर से पढ़ाई करने आए छात्रों के साथ बुरी तरह मारपीट की, लड़कियों को अश्लील गालियाँ दीं और फोन पर ह्त्या करने की धमकी दी. ऐसे समय में जो कथित रूप से निष्पक्ष बुद्धिजीवी JNU मामले में अपना गला फाड़ रहे थे, अभिव्यक्ति स्वतंत्रता की दुहाई दे रहे थे और शिक्षा कैम्पस में पुलिस कैसे घुसी जैसे अनर्गल प्रश्नों का प्रलाप कर रहे थे, वे लोग अचानक गायब हो गए. इन वामपंथी प्रोफेसरों और समाजसेवा का झण्डा उठाए बुद्धिजीवियों को NIT श्रीनगर के छात्रों से कोई लेना-देना ही नहीं रहा. उमर खालिद के समर्थन में सरकार को कोसने वाले NIT श्रीनगर मामले में एकदम चुप्पी साध गए, क्योंकि भले ही दोनों स्थानों पर छात्र ही शामिल हों, लेकिन JNU में वामपंथ के प्यारे-दुलारे देशद्रोही नारे लगे थे जबकि श्रीनगर में वामपंथ को चिढ़ाने वाले “भारत माता की जय” के नारे लग रहे थे. अर्थात इनके सिद्धांत, इनकी कथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, इनके दवात शिक्षा कैम्पसों की स्वायत्तता की बातें आदि सिर्फ और सिर्फ “वैचारिक पाखण्ड” निकला. देशवासी समझ गए कि छात्रों द्वारा “अफज़ल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं” तो वामपंथ का प्रिय नारा हो सकता है, लेकिन ऐसे ही छात्रों द्वारा श्रीनगर में “भारत माता की जय” का नारा इन्हें बीमार कर देता है. तात्पर्य यह है कि इस विवाद ने वामपंथियों को पूरी तरह बेनकाब कर डाला. 

यानी जो हंगामा JNU के देशद्रोहियों द्वारा उनकी राजनीति चमकाने और गिरोह बढाने के लिए शुरू किया गया था, वह ठेठ इस्लाम और कांग्रेस तक जा पहुंचा. वामपंथ ने इस देश के बौद्धिक वातावरण का बहुत नुकसान किया है. भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता वगैरह तो खैर उनके शब्दकोष में है ही नहीं, लेकिन वामपंथ ने कभी भी भारत को एक “राष्ट्र” माना ही नहीं. वामपंथियों के अनुसार भारत सिर्फ कुछ राज्यों का संघ है, जिसे जबरदस्ती एक साथ रखा गया है. इसीलिए जब जनेवि में ““भारत तेरे टुकड़े होंगे”” के नारे लगते हैं तो उसका बचाव करने के लिए सबसे पहले और सबसे आगे वामपंथी ही दिखाई देते हैं. दिनदहाड़े देश को तोड़ने का सपना देखने वाले इस वामपंथ को देश का युवा काफी पहले समझ चूका है, और इसी युवा ने विकास और रोजगार के लिए मोदी को केंद्र की सत्ता तक पहुँचाया है. यानी विचारधारा का मरते जाना, विभिन्न राज्यों में सीटों का सिमटते जाना और एक क्षेत्रीय दल के रूप में लगभग पहचान खोते जाने के सदमे ने वामपंथियों को खुलेआम देशद्रोह के साथ खड़े होने की स्थिति में ला दिया है. “भारत माता की जय” का विरोध इसी श्रृंखला की एक कड़ी है. मुख्यधारा से लगभग कट जाने की वजह से वामपंथ ने अब नई चाल चलने का फैसला किया है, और वह है देश के तमाम विश्वविद्यालयों में युवाओं को झूठी कहानियाँ सुनाकर भड़काने की. कभी रोहित वेमुला को नकली दलित बनाकर पेश करना, तो कभी आंबेडकर-पेरियार के नाम पर जातिवाद का ज़हर घोलना तो कभी उमर खालिद जैसे लोगों को सरेआम समर्थन देकर युवाओं में असंतोष भड़काना हो... ये सारे कारनामे वामपंथी या तो खुले तौर पर कर रहे हैं, या फिर वर्षों से विभिन्न संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में जमेजमाए बैठे उनके गुर्गे प्रोफेसरों और NGOs के माध्यम से, जैसे भी हो और जितना भी हो मोदी सरकार के खिलाफ तथा देश-समाज को तोड़ने की दिशा में काम किए जा रहे हैं. परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि “एक्शन” का “रिएक्शन” तो होता ही है, इसीलिए जब JNU में मुठ्ठी भर लोग “भारत तेरे टुकड़े होंगे” के नारे लगाते हैं तो उसकी प्रतिक्रिया में समूचे देश में राष्ट्रवाद एवं भारत माता की जय का रिएक्शन शुरू हो जाता है, क्योंकि अब देश का युवा समझदार हो चूका है. युवाओं को भी समझ में आने लगा है कि फैक्ट्रियों, उद्योगों, विश्वविद्यालयों एवं संस्थाओं में बैठे ये वामपंथी उन्हें अपना मोहरा बनाकर हड़ताल, धरने, प्रदर्शनों में झोंक देते हैं और खुद अपनी राजनीति चमकाकर चुपके से पीछे हट जाते हैं. 

पाठकों को याद होगा कि उमर खालिद और कन्हैया के साथ सरेआम देशद्रोही नारे लगाने वालों में एक और नाम आया था “अपराजिता राजा” का. यह कन्या वामपंथी नेता डी.राजा की बेटी है. अपराजिता राजा का गुनाह भी उमर खालिद और उसके साथियों जितना ही था. लेकिन क्या अब उसका नाम कहीं भी दिखाई देता है? क्या किसी पुलिस FIR में अथवा किसी न्यायालयीन मामले में अपराजिता राजा जुडी हुई दिखाई देती हैं? नहीं... क्योंकि वह बड़े वामपंथी नेता की बेटी है. यानी डी. राजा साहब ने अपनी बेटी को तो बड़े सुरक्षित तरीके से इस मामले से बाहर करके उसका भविष्य सुरक्षित कर लिया, लेकिन फँस गए उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य. सुनने में आया है कि केंद्र सरकार की एजेंसियों और डी. राजा के बीच अपराजिता को लेकर कोई गुप्त सौदा हुआ है, जिसके अनुसार सरकार ने अपराजिता को इस मामले से एकदम गायब करने के बदले, संसद में कुछ बिलों पर वामपंथी दलों सरकार को सहयोग करेंगे. संसद के बजट सत्र में हमने इस गुप्त समझौते की एक बानगी भी देख ली, जब सिर्फ GST को छोड़कर लगभग सभी बिल सरकार ने पास करवा लिए. विश्लेषकों का मानना यह भी है, कि यह मुद्दा दोनों की आपसी “गुप्त डील” के तहत बनाया गया, ताकि बंगाल चुनावों में काँग्रेस को थोड़ा नीचे किया जा सके. यानी डी.राजा भी खुश, उनकी राजनीति भी चमक गयी और इधर सरकार भी खुश... अब खालिद, अनिर्बान और कन्हैया विभिन्न मामलों एवं न्यायालयों में वर्षों तक रगड़े जाएंगे, जबकि अपराजिता राजा कुछ वर्ष बाद अपने पिता की वामपंथी पार्टी में किसी प्रमुख पद पर दिखाई देगी. अर्थात “राष्ट्रवाद का यह भावनात्मक उफान, तथा “भारत माता की जय”” विवाद भले ही अनजाने में एक बड़ा मुद्दा बन गया हो, परन्तु यह सरकार के लिए भी लाभ का सौदा रहा कि इधर संसद में उसके कुछ बिल पास हो गए और उधर श्रीनगर में राष्ट्रवाद के नारे पहली बार बुलंद हुए... और वामपंथियों के लिए भी, जिनकी राजनीति उनके वोट बैंक के बीच थोड़ी चमक गई, ताकि बंगाल के चुनावों में वे ममता से ढंग का मुकाबला कर पाएँगे. 

पुनश्च :- राष्ट्रवादी भावनाओं का यह तूफ़ान सिर्फ भारत में ही सीमित नहीं है, विश्व के अनेक देशों में राष्ट्रवाद की यह भावना तीव्र से तीव्रतर होती जा रही है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में सबसे आगे चल रहे डोनाल्ड ट्रम्प. ट्रम्प ने अपने भाषणों में जिस तरह से खुलेआम इस्लामी आतंकवाद से निपटने के लिए अतिवादी उपाय अपनाने के संकेत दिए हैं, उसने समूचे विश्व को बेचैन कर दिया है. डोनाल्ड ट्रम्प की बढ़ती लोकप्रियता, एवं अमेरिकी युवाओं को अपने उत्तेजक भाषणों के जरिये उकसाने की उनकी शैली से परम्परागत अमेरिकी राजनीति में हलचल मची हुई है. अमेरिका वैसे ही 9/11 की घटना के बाद मुस्लिम प्रवासियों के प्रति कठोर रवैया अपना ही रहा है, लेकिन यदि डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो इस्लामी देशों के प्रति उसकी नीतियों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं. इसी प्रकार ISIS के अत्याचारों से तंग आकर सीरिया सहित अनेक इस्लामी देशों से जो शरणार्थी यूरोप पहुँचने में कामयाब हो गए, वे वहाँ के खुले समाज को देखकर खुद पर काबू नहीं रख पा रहे. आए दिन जर्मनी, स्वीडन, नॉर्वे, बेल्जियम इत्यादि देशों से मुस्लिम शरणार्थियों द्वारा लूटपाट, बलात्कार की ख़बरें आना शुरू हो गई हैं. इन हरकतों की वजह से यूरोप में भी “प्रतिकारक रिएक्शन” की एक लहर जागने को है. यूरोप के निवासी सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि हमने इन जंगलियों को शरण देकर कहीं गलती तो नहीं कर दी. यदि मुस्लिम शरणार्थी नहीं सुधरे और उन्होंने सम्बन्धित देशों के नियम-कानूनों को नहीं माना तो “राष्ट्रवादी भावनाओं” के उभार की शुरुआत जो हमेशा की तरह जर्मनी और रूस से शुरू हुई है, आगे चलकर न सिर्फ उन शरणार्थियों, बल्कि कुछ इस्लामी देशों को भारी पड़ेगी. संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि जैसे भारत में JNU की नारेबाजी ने “उत्प्रेरक” का काम किया, वैसे ही अलग-अलग देशों में अलग-अलग मुद्दों पर युवा एवं देशप्रेमी जनता के बीच “राष्ट्रवाद” की भावना उफान मारने लगी है. कम से कम भारत में तो इसके लिए हमें वामपंथियों को धन्यवाद देना ही चाहिए, कि उन हरकतों की वजह से एक “अ-मुद्दा” भी महत्त्वपूर्ण बन गया, जिसने देश में जागरूकता बढ़ाने एवं एकात्मकता कायम करने में अच्छी भूमिका निभाई और इसी बहाने कुछ “तटस्थ” लोगों को भी संघ के पाले में धकेल दिया है.

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