Sunday, January 10, 2016

Minority Vs Majority Discourse

अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक विमर्श..

इस देश में अल्पसंख्यकों (Minorities) और बहुसंख्यकों (Majority) का वैमर्शिक ताना बाना कितना बेमेल और बेडौल हो चुका है उसकी बानगी कभी कभी बहुत साधारण लोगों की बातचीत एक अजनबी के रूप में दूर से पढ़ने सुनने पर प्रतीत मिलती है !! अभी कुछ दिनों पहले मेरे एक मित्र ने एक फोटो फेसबुक पर शेयर किया , कोई मुस्लिम ट्विटर पर ये कह रहा था की हमें हिन्दुओं के प्रति आभार प्रकट करना चाहिए की सैकड़ों सालों के हिन्दुओं के नरसंहार से भरे पड़े नकारात्मक इतिहास के बावजूद उन्होंने हमें अपना लिया , आत्मसात कर लिया और पिछली किसी याद को अपने संबंधों का आधार नहीं बनाया !! इस पोस्ट पर एक ईसाई मोहतरमा आपत्ति दर्ज़ कराने आयीं और कहने लगी की भारत को और सहिष्णु होना होगा , इस पर मेरे मित्र ने कहा की जितनी सहिष्णुता "आपको" यहाँ मिल रही है दुनिया के बड़े बड़े देशों में भी नहीं मिल रही (जैसे कल ट्रम्प की रैली से एक मुस्लिम महिला को हूट कर बाहर खदेड़ दिया गया , और ऐसा हम भारत में कल्पना में भी नहीं कर सकते) !! इस पर उन ईसाई मोहतरमा को बड़ा बुरा लगा और कहने लगी "आपको" नहीं "हम सब को" "तुम्हारा देश" नहीं "हमारा देश" !! 

इस बहस का मेरा आंकलन यहाँ से शुरू हुआ जो बिन्दुवार प्रस्तुत है 

1 . इस देश का कोई भी ईसाई तब आपत्ति दर्ज़ क्यों नहीं कराता जब इनके जॉन दयाल जैसे बड़े बड़े नेता और धर्मगुरु किसी चर्च में छोटी छोटी चोरी की घटनाओं तक पर कहते फिरते हैं की "ईसाई भारत में डर के साये में जी रहे हैं" या की "अल्पसंख्यक" खतरे में हैं" ? तब इन सभी की "भारतीयता" की भावना अपने "ईसाई" होने की भावना के सामने क्यों क्षीण होने लगती है ? तब कानून व्यवस्था से जुड़ा मुद्दा धार्मिक मुद्दा कैसे बन जाता है ? तब "आपका" और "हमारा" का भेद क्यों खत्म होने लगता है ? 

2. कई विचारवान हिन्दू भी अलग अलग विमर्शों में बार बार हिन्दू शब्द का प्रयोग करने की बजाये "भारतीय" शब्द का प्रयोग करने पर जोर देने लगे हैं , पर वे इस बारीक कड़ी को कभी नहीं जोड़ पाते या इस "फाल्ट लाइन" को कभी नहीं समझ पाते जिसके तहत अल्पसंख्यकों का खतरे में होना सीधे सीधे बहुसंख्यकों के प्रति दुर्भावना नहीं तो कम से कम दुष्प्रचार की भावना तो निर्मित करता ही है , जिसके मूल में दूरगामी धर्म परिवर्तन की चेष्टाएँ हमेशा रही ही हैं , कई लोगों को ये समझाना बड़ा दुश्वर होने लगा है की कोई भी "अल्पसंख्यक" समूह अगर डर के साये में जीने का आरोप करता है तो चाहे आप माने या ना माने आरोप सीधे "बहुसंख्यक समूह " पर ही लग रहा है नाकि किसी सरकार पर या किसी विचारधारा पर !! 


3. इसलिए इस पूरे विमर्श का सबसे बड़ा पाखंडी संकट तब उत्पन्न हो जाता है जब अल्पसंख्यकों को तो अपने अल्पसंख्यक होने का पूरा अधिकार मिल जाता है , अपने ऊपर हुए किसी भी तथाकथित अपराध को "अल्पसंख्यक" के ऊपर हुए अपराध का दर्जा देने का मौका मिल जाता है जो की अन्यथा (अगर सब भारतीयता की भावना लिए होते तो ) सिर्फ एक कानून व्यव्यस्था का विषय बनता , पर अगर उसी विषय पर बहुसंख्यक अपने बहुसंख्यक होने पर गौरवान्वित हो अपनी अच्छाईयां बताने का अपराध करे (जो की उसका अधिकार है क्योंकि आरोप उस पर लगा है ) तो उसे तुरंत सिर्फ "भारतीय" होने का उलाहना देकर चुप करने की या नीचा दिखाने की कोशिश होती है और यहीं कहीं से शायद शुरू होता है इस देश का "लिबरल बौद्धिक आतंक"!! 

4. अपने आस पास देखिये थोड़े अच्छे पढ़े लिखे सर्कल में , आप अपने "हिन्दू" होने की बात करेंगे या उससे जुड़ा कोई मुद्दा उठाएंगे तो उसे सीधे नकरात्मक भाव में ही लिया जायेगा जैसे की हिन्दू का सिर्फ हिन्दू होना ही, ये पहचान स्थापित हो जाना भर ही अल्पसंख़्यकों के साथ उनके सह अस्तित्व को ख़त्म करता है , भारतीयता को खत्म करता है , इसलिए इस "धर्मनिरपेक्ष" मानसिक अवस्था में मुस्लिम शान से मुस्लिम बने रहें , ईसाई शान से ईसाई बने रहें पर हिन्दू सिर्फ भारतीय बने रहें , क्योंकि उनके हिन्दू बन जाने भर से अल्पसंख्यक असुरक्षित महसूस करते हैं !! 

5. आखिरी बात , थोड़ी गहरी है , पर इस विस्तृत मनोवैज्ञानिक कूटनीति को समझिए , हिन्दुओं को सिर्फ और सिर्फ भारतीय बने रहने का ये बहुपक्षीय बहुआयामी दबाव क्यों ? क्योंकि उसके पीछे छिपा वामपंथी बुद्धिजीवियों का ये डर है की हिन्दू पहचान स्थापित हो गयी तो , इतिहास की कलाई भी खुलेगी , उसमे छिपे गौरवान्वित पल भी खुलेंगे , बच्चा बच्चा ये समझने लगेगा की जो आज अपने अल्पसंख्यक होने का दम्भ भर रहे हैं अथवा असुरक्षित होने का रोना रोकर राजनीतिक रूप से संरक्षित हैं उन्हें हज़ारों साल इस देश में किसने पाला ? और सबसे महत्वपूर्ण बात ये की कौन है इस ज़मीन का असली वंशज ? और जब वे ये समझ जायेंगे तो ये पूरी अल्पसंख्यक बहुसंख्यक बहस की जीत किसकी झोली में गिरेगी ये भी समझा जा सकता है !! इसलिए हिन्दुओं को आधुनिक सेक्युलर कोन्वेंटी मदरसों में "सेक्युलर भारतीयता" का पाठ पढ़ाओ और अल्पसंख्यकों को सिर्फ अपनी पहचान में जीने का !! मालिक को किरायेदार सी असुरक्षा दो और किरायेदारों को मालिक सा ढांढस , इसी में सेक्युलरिस्म की सफलता छिपी है !! 

6 . तो मेरे लेख के मुताबिक क्या मुस्लिम और ईसाई इस देश में किरायेदार हुए ? नहीं भी और हाँ भी !! अगर हम सब बिना शर्त सिर्फ और सिर्फ भारतीय हैं तो "नहीं" , अगर तुम मुस्लिम हो , तुम ईसाई हो तो "हाँ" , तो मैं हिन्दू हूँ , मकान मालिक हूँ और तुम किरायेदार !! सच्ची भारतीयता तभी स्थापित होगी जब अल्पसंख्यक शब्द पर प्रतिबन्ध लगे , बोलिए है मंजूर ?? 

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साभार :- फेसबुक वॉल गौरव शर्मा (Gaurav Sharma)

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