Thursday, December 31, 2015

Kejriwal and Rajinder Kumar Corruption Case

उल्टा चोर कोतवाल को डांटे... 

भारत में चोरों को लेकर तीन कहावतें मशहूर हैं, पहली “चोरी और सीनाजोरी”, अर्थात चोरी करने के बावजूद न सिर्फ बेख़ौफ़ रहना बल्कि दबंगई दिखाना... दूसरी कहावत है “चोर मचाए शोर” अर्थात जब चोर सार्वजनिक रूप से चोरी करता हुआ पकड़ा जाए तो वह भीड़ का ध्यान बँटाने के लिए शोर मचाने लगे, ताकि उसकी चोरी की तरफ कम लोगों का ध्यान जाए... और तीसरी कहावत है “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे” यानी जो व्यक्ति चोर हो, वह अपनी चोरी छिपाने के लिए पकड़ने वाले कोतवाल को ही डाँटने लगे... हाल ही में भारतीय राजनीति में ऐसी ही दो प्रमुख घटनाएँ घटित हुईं जहाँ उक्त कहावतें साक्षात चरितार्थ होती दिखाई दीं. पहली घटना है नेशनल हेराल्ड अखबार का मामला और दूसरी घटना है केजरीवाल के प्रमुख सचिव राजेन्दर कुमार के दफ्तर पर सीबीआई का छापा.

इन दोनों ही मामलों में देश ने तमाम तरह की नौटंकियाँ, धरने, प्रदर्शन और बयानबाजी देखी-सुनी और पढ़ी. सामान्य तौर पर आम जनता चैनलों पर अंग्रेजी में जारी बकबक को देखती नहीं है, देखती है तो गहराई से समझती नहीं है. इसलिए वास्तव में जनता को पता ही नहीं है कि नेशनल हेरल्ड मामला क्या है और राजिंदर कुमार पर छापों की वास्तविक वजह क्या है? जनता की इसी अज्ञानता का फायदा उठाकर काँग्रेस (यानी सोनिया-राहुल की जोड़ी) ने “पीड़ित-शोषित” कार्ड खेलने की कोशिश की तथा संसद को बंधक बना लिया. वहीं दूसरी तरफ दिल्ली के युगपुरुष केजरीवाल ने भी इस “पीड़ित-शोषित” गेम (जिसके वे शुरू से ही माहिर रहे हैं) को और विस्तार देते हुए अरुण जेटली को इसमें लपेट लिया, ताकि जनता के मन में उनके “क्रांतिकारी” होने का भ्रम बना रहे. दोनों मामलों के तथ्य एक के बाद एक सामने रखकर देखना ही उचित होगा कि काँग्रेस द्वारा लोकतंत्र को बंधक बनाने, न्यायपालिका के निर्णय पर राजनैतिक रोटियाँ सेंकने का जो खेल खेला गया वह कितना खोखला है. चूँकि काँग्रेस तो अब अपने अस्तित्त्व की लड़ाई लड़ रही है, चवालीस सांसदों के होते हुए भी उसमें अभी तक जिम्मेदार विपक्ष का कोई गुण नहीं आया है इसलिए काँग्रेस-सोनिया और नेशनल हेरल्ड की बात बाद में करेंगे... पहले हम देखते हैं कि “ट्वीटोपाध्याय, क्रान्तिकारीभूषण, स्वराज-प्रतिपादक, झाड़ूधारी, IIT-दीक्षित, सिनेमा रिव्यू लेखक, सलीम उर्फ योगेन्द्रमारक, 49 दिवसीय भगोड़े, निर्भया बलात्कारी प्रेमी, अर्थात युगपुरुष श्रीश्रीश्री अरविन्द केजरीवाल के मामले को...

जिस दिन सीबीआई ने दिल्ली में राजिंदर कुमार के दफ्तर पर छापा मारा, उस दिन केजरीवाल को कतई अंदाजा नहीं था कि कभी ऐसा भी हो सकता है. परन्तु सीबीआई अपने पूरे कानूनी दस्तावेजों के साथ आई और उसने “आप” सरकार के प्रमुख सचिव राजिंदर कुमार के यहाँ छापा मारा. ऐसा नहीं है कि उस दिन अकेले राजिंदर कुमार के दफ्तर पर छापा पड़ा हो, बल्कि सीबीआई 2002 से लेकर 2012 तक के बीच दिल्ली में हुए कई घोटालों की जाँच पहले से कर रही थी, इसलिए उस दिन नौ और बड़े अफसरों के यहाँ छापा मारा गया. परन्तु ईमानदारी की कसमें खाने वाले, भ्रष्टाचार निर्मूलन के वादे करने वाले राजा हरिश्चंद्र के अंतिम अवतार उर्फ अरविन्द केजरीवाल से यह सहन नहीं हुआ. उन्होंने बिना सीबीआई से कोई बातचीत किए, बिना अदालती कागज़ देखे, मामले की पड़ताल किए बिना ही सुबह दस बजे से ताबड़तोड़ ट्वीट के गोले दागने शुरू कर दिए. केजरीवाल क्रोध में इतने अंधे हो गए कि उन्होंने मुख्यमंत्री पद की गरिमा को किनारे रखते हुए दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुने हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “कायर” और “मनोरोगी” तक कह डाला (यही वह केजरीवाल थे, जो कुछ दिनों पहले भाजपा को “असहिष्णुता” के मुद्दे पर लेक्चर दे रहे थे). किसी को समझ नहीं आया कि आखिर केजरीवाल के इतना बिलबिलाने की वजह क्या थी. असल में सीबीआई के इस छापे ने केजरीवाल की “कथित ईमानदार” वाली छवि (जो उन्होंने अन्ना हजारे के साथ पहले साँठगाँठ करके, फिर उन्हीं की पीठ में छुरा घोंपकर बड़ी मुश्किल से रची है) को बुरी तरह तार-तार कर दिया. आगे बढ़ने से पहले हमें यह देखना होगा कि आखिर राजिंदर कुमार कौन हैं, और क्या चीज़ हैं? 


जनता को जितना पता है, वह यह है कि राजिंदर कुमार 1989 बैच के IAS अधिकारी हैं, सरकार में विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं. लेकिन CBI छापों से पहले यह बात कम लोग जानते थे कि राजिंदर कुमार IIT खडगपुर से पढ़े हुए हैं और केजरीवाल के खास दोस्तों में से एक हैं. लेकिन केजरीवाल के बिलबिलाने की एकमात्र वजह मित्रता नहीं, बल्कि उनकी “गढी हुई छवि” के ध्वस्त होने की चिंता है. बहरहाल, सीबीआई ने जो छापा मारा वह राजिंदर कुमार द्वारा 2007 से 2014 के बीच उनके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों को लेकर था. इस कालावधि के दौरान पहले पाँच ठेकों में साढ़े नौ करोड़ के भ्रष्टाचार की शिकायत सीबीआई को मिली थी. इन ठेकों में दिल्ली जल बोर्ड का 2.46 करोड़ का वह ठेका भी शामिल है, जिसे राजिंदर कुमार ने पहले शासकीय सार्वजनिक कम्पनी ICSIL कंपनी को दिया, लेकिन उस कम्पनी ने “रहस्यमयी” तरीके से यह ठेका फरवरी 2014 में एन्डेवर सिस्टम्स नामक कंपनी को दे दिया. यह वही समय था, जब केजरीवाल अपनी 49 दिनों की सरकार से भागने की तैयारी में थे और राजिंदर कुमार उनके सचिव थे. यह एन्डेवर सिस्टम्स नाम की कम्पनी 2006 में बनाई गई जिसके चार निदेशक थे योगेन्द्र दहिया, विकास कुमार, संदीप कुमार और दिनेश गुप्ता. आगे चलकर दहिया और विकास कुमार ने इस्तीफ़ा दे दिया और कम्पनी संदीप कुमार और दिनेश गुप्ता के पास 80% - 20% की भागीदारी में बनी रही. लेकिन इस भ्रष्टाचार की परतें उस समय खुलनी शुरू हुईं, जब दिल्ली संवाद आयोग के सदस्य एक अफसर आशीष जोशी ने दिल्ली पुलिस की भ्रष्टाचार निवारण शाखा में लिखित आवेदन दिया. दिल्ली पुलिस ने मामले की गंभीरता और उलझन को देखते हुए यह आवेदन सीबीआई को सौंप दिया. आशीष जोशी वही अधिकारी हैं जिन्हें दिल्ली सरकार ने काम के दौरान गुटखा खाने के “भयानकतम आरोप” के तहत निकाल बाहर किया था. जबकि उन्हें निकालने की असल वजह यह थी कि आशीष जोशी, दिल्ली संवाद आयोग के उपाध्यक्ष आशीष खेतान की मनमानी और ऊटपटांग निर्णयों के सामने झुकने को तैयार नहीं थे और इसे लेकर खेतान से एक बार उनकी तीखी झड़प भी हुई थी. चूँकि आशीष खेतान, केजरीवाल के खासुलखास हैं इसलिए ईमानदार अफसर आशीष जोशी को हटाने के लिए “गुटखे” का बहाना खोजा गया. सीबीआई ने मामले की तहकीकात की और आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी के आरोपों पर राजिंदर कुमार, संदीप कुमार व दिनेश गुप्ता पर मामला दर्ज कर लिया. सीबीआई द्वारा दर्ज रिपोर्ट में ICSIL के एमडी एके दुग्गल, जीके नंदा और आरएस कौशिक के नाम भी शामिल हैं.

जाँच आगे बढ़ी तो पता चला कि ICSIL ने अपनी साख के चलते कई सरकारी ठेके हासिल किए, लेकिन रहस्यमयी तरीके से उसने ये सारे ठेके सिर्फ और सिर्फ एंडेवर सिस्टम्स को ट्रांसफर कर दिए. सूत्रों के अनुसार जब राजिंदर कुमार दिल्ली सरकार में सचिव थे, तब उन्होंने ही इस कम्पनी एंडेवर सिस्टम्स को ज़ोरशोर से बड़ी रूचि लेकर आगे बढ़ाया. इसी को आधार बनाकर सीबीआई ने एंडेवर सिस्टम्स और राजिंदर कुमार के आपसी रिश्तों और रूचि को लेकर जाँच शुरू की और पाया कि जब राजिंदर कुमार स्कूली शिक्षा विभाग में सचिव रहे तब भी उन्होंने पाँच ठेके एन्डेवर सिस्टम्स कम्पनी को दिलवाए थे. जिसमें 2009 में बिना कोई टेंडर निकाले डाटा मैनेजमेंट सिस्टम का चालीस लाख का एक ठेका, फिर 2010 में स्वास्थ्य सचिव रहते हुए ICSIL के माध्यम से 2.43 करोड़ का एक ठेका, 2012 में टैक्स कमिश्नर के पद पर रहते हुए सॉफ्टवेयर विकास का 3.66 करोड़ का एक ठेका तथा 2013 में इसी कम्पनी को 45 लाख का एक और ठेका दिलवाने में राजिंदर कुमार की खासी रूचि रही. “खले रहस्य” की बात यह कि जब-जब और जहाँ-जहाँ राजिंदर कुमार पद पर रहे, उन सभी विभागों से एंडेवर सिस्टम्स को ही ठेके मिल जाते थे. राजिंदर कुमार के खिलाफ लगातार दबी ज़ुबान से शिकायतें मिलती रहती थीं, परन्तु केजरीवाल का वरदान उन पर होने के कारण कोई खुलकर कुछ नहीं बोलता था. 2009 से 2014 के बीच ऊर्जा, रियल एस्टेट, कोचिंग, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट इत्यादि के नाम पर धीरे-धीरे कई कम्पनियाँ खड़ी की गईं. इन सभी कंपनियों के मालिकों का पता एक जैसा था और इन कंपनियों के निदेशक भी एक जैसे ही थे, और जाँच में पाया गया कि अधिकाँश निदेशकों के नाते-रिश्ते राजिंदर कुमार के साथ जुड़े हुए थे. तो ऐसे “उम्दा कारीगर” यानी राजेंदर कुमार, अरविन्द केजरीवाल के खास चहेते अफसर थे.


ऐसे “कर्मठ”(??) अफसर के साथ ईमानदारी की प्रतिमूर्ति बने बैठे केजरीवाल का मधुर सम्बन्ध इतना अधिक मधुर था कि विश्वव्यापी भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाली अन्तर्राष्ट्रीय संस्था “ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल” ने जब केजरीवाल को बाकायदा लिखित में यह बताया कि राजेंदर कुमार एक दागी अफसर हैं और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं, तो केजरीवाल ने राजिंदर कुमार को हटाना तो दूर, इस पत्र का कोई जवाब तक नहीं दिया. और जब ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने इस पत्र की प्रति उप-राज्यपाल नजीब जंग को भेजकर उनसे कार्रवाई की माँग की तो केजरीवाल ने इसे अपने अधिकारों में हस्तक्षेप बता दिया. कहने का तात्पर्य यह है कि केजरीवाल द्वारा प्रधानमंत्री के प्रति “कायर-मनोरोगी” जैसे शब्द उपयोग करना इसी बौखलाहट का नतीजा है कि मेरे परम मित्र को सीबीआई ने हाथ कैसे लगाया? जबकि राजिंदर कुमार की (कु)ख्याति रही है कि वे जिस विभाग में भी पदस्थ हुए, वहीं उन्होंने नए विवादों को जन्म दिया. फिर चाहे VAT कमिश्नर के रूप में उनके तुगलकी आदेश हों, अथवा ऊर्ज सचिव के रूप में निजी विद्युत कंपनियों को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर वित्तीय संस्थानों से ऋण हासिल करने की सलाह देना हो... अथवा ऊर्जा मंत्री सत्येन्द्र जैन से मिलीभगत करके तत्कालीन ऊर्जा सचिव शकुंतला गैम्लिन को धमकाने का मामला हो... सभी जगह राजिंदर कुमार की टांग फँसी हुई दिखाई देती है, लेकिन केजरीवाल ऐसे अधिकारी को बेगुनाह साबित करने के लिए कभी सीबीआई, कभी अरुण जेटली तो कभी प्रधानमंत्री को कोसने में लगे हुए हैं, जबकि सीबीआई ने न्यायालय की अनुमति से छापा मारा था. होना तो यह चाहिए था कि केजरीवाल खुद आगे बढ़कर यह कहते कि चूँकि मैंने अपनी “क्रान्ति” भ्रष्टाचार के खिलाफ ही की है, इसलिए मैं जाँच में पूर्ण सहयोग करूँगा. लेकिन ऐसा कहते ही केजरीवाल खुद अपने ही चक्रव्यूह में घिर जाते कि जब छह माह पहले ही उन्हें बताया जा चुका था कि राजिंदर कुमार के खिलाफ पिछले कई मामलों में जाँच हो रही है तथा “ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल” भी उन्हें चेतावनी दे चुका है फिर भी उन्होंने ऐसे अफसर को अपना प्रमुख सचिव क्यों नियुक्त किया? अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि केजरीवाल अपनी छवि के मोह में ऐसे फँसे हुए हैं कि वे खुद को ऐसे “मिडास” समझने लगे हैं कि वे जिस व्यक्ति को छू दें, वह ईमानदार माना जाएगा. और बिना किसी सबूत के सिर्फ प्रेस कांफ्रेंस में जिस पर आरोप मढ़ देंगे वह दोषी माना जाएगा. दिल्ली विधानसभा चुनावों से पहले शीला दीक्षित के खिलाफ 370 पृष्ठों का सबूत होने का दावा केजरीवाल ने किया था, परन्तु अभी तक शीला के खिलाफ कोई मुकदमा दायर होना तो दूर, दिल्ली सरकार ने उन्हें क्लीन चिट तक दे दी है.  

असल में केजरीवाल की दूसरी चिंता सिर पर खड़े पंजाब चुनाव भी हैं. चूँकि केजरीवाल की महत्त्वाकांक्षा सिर्फ दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने की नहीं है, उनके लक्ष्य ऊँचे हैं. इसीलिए उन्होंने दिल्ली में खुद के पास कोई विभाग नहीं रखा है, वे देश के अकेले मुख्यमंत्री हैं जिनके पास कोई काम नहीं है, सिवाय दूसरों के फटे में टांग अडाने के. चूँकि कोई काम नहीं है, इसलिए वे कभी गुजरात जाकर भ्रष्टाचार खोजते हैं तो कभी बनारस जाकर चुनाव लड़ते हैं तो कभी फिल्मों के रिव्यू लिखते रहते हैं. यहाँ तक कि बिहार जाकर लालू जैसे “घोषित एवं साक्षात भ्रष्टाचार” से गले मिलने में भी केजरीवाल को कतई शर्म महसूस नहीं होती, परन्तु केजरीवाल के पास नौटंकी करने, चिल्लाचोट करने, तमाशा और हंगामा करने का तथा मीडिया का ध्यान आकर्षित करने जो “गुण” मौजूद है, उसके कारण हमेशा वे खुद को पीड़ित-शोषित और ईमानदारी के एकमात्र जीवित मसीहा के रूप में पेश करते आए हैं. परन्तु उन्होंने सोचा भी नहीं था कि ऐन उनकी नाक के नीचे बैठे मुख्य सचिव पर सीबीआई हाथ डाल देगी. सूत्रों के अनुसार सीबीआई को राजिंदर कुमार के दफ्तर से “आआपा” सरकार के दो अन्य मंत्रियों के खिलाफ भी कुछ तगड़े सबूत हाथ लगे हैं, और इसी बात ने अरविन्द केजरीवाल को अंदर तक हिला दिया है और इस कारण उस दिन वे अंट-शंट ट्वीट करने लगे. पंजाब के चुनावों में केजरीवाल के पास “खुद के हस्ताक्षरित” ईमानदारी सर्टिफिकेट के अलावा और कोई सकारात्मक बात नहीं है. चूँकि पंजाब की जनता अकालियों के भ्रष्टाचार, भाजपा के निकम्मेपन और नशीले पदार्थों के रूप में फैले सामाजिक कोढ़ से बुरी तरह त्रस्त हो चुकी है. इसलिए वहाँ आम आदमी पार्टी के बहुत उजले अवसर हैं. ऐसे में केजरीवाल यह जानते हैं कि दिल्ली में सीबीआई का यह छापा, राजिंदर कुमार की भ्रष्ट छवि तथा नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभद्र भाषा उन्हें ख़ासा नुक्सान पहुँचा सकती है. इसीलिए मामले को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए उन्होंने सदा की तरह हंगामे, आरोपों और प्रेस कांफ्रेंस को अपना हथियार बनाया है. यह कितना काम करेगा, अभी से कहना मुश्किल है, परन्तु वे जानते हैं कि पंजाब के आगामी विधानसभा चुनावों में यदि एक शक्ति के रूप में उभरना है तो उन्हें जल्दी से जल्दी इस प्रकरण में अपने हाथ साफ़ करने होंगे. इसलिए देशवासी आगामी कुछ माह तक नित नई नौटंकियाँ झेलने को अभिशप्त है.  

खैर यह तो हुई “चोर मचाए शोर” एपिसोड की पहली कथा... अब देखेंगे इसी सीरीज की दूसरी कथा अर्थात “उल्टा चोर, कोतवाल को डांटे” टाईप नेशनल हेरल्ड और सोनिया-राहुल गाँधी का मामला. जो कि इस लेख के अगले भाग में जारी रहेगी... तब तक, जय झाड़ू, जय चन्दा, जय (बे)ईमानदारी...

अगले भाग को पढ़ने के लिए (यहाँ क्लिक करें...)

Sonia Rahul and National Herald Corruption Case

चोर मचाए शोर (भाग - २) 


पिछले भाग (यहाँ क्लिक करके पढ़ें) में आपने पढ़ी “चोर मचाए शोर” एपिसोड की पहली कथा... अब देखेंगे इसी सीरीज की दूसरी कथा अर्थात “उल्टा चोर, कोतवाल को डांटे” टाईप नेशनल हेरल्ड और सोनिया-राहुल गाँधी का मामला.

केजरीवाल का मामला तो उनके सचिव से जुड़ा हुआ था, लेकिन नेशनल हेरल्ड मामले में तो सीधे-सीधे सोनिया गाँधी और राहुल फँसते नज़र आ रहे हैं. डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी के बारे में उनके दोस्त व दुश्मन दोनों एक बात जरूर कहते हैं, कि स्वामी जी को कभी भी हलके में नहीं लेना चाहिए, वे हमेशा गंभीरता से हर लड़ाई लड़ते हैं. परन्तु देश के कांग्रेसी तीर्थस्थल उर्फ “पवित्र परिवार” (यानी ऐसा परिवार, जिस पर देश में कोई उँगली नहीं उठा सकता) ने हमेशा डॉक्टर स्वामी को मजाक में लिया और यह सोचते रहे कि यह अकेला आदमी क्या कर लेगा जिसकी ना तो कोई अपनी राजनैतिक पार्टी है और ना ही कोई राजनैतिक रसूख. इसीलिए पिछले दस-बारह वर्ष से लगातार काँग्रेस ने डॉक्टर स्वामी के आरोपों की सिर्फ खिल्ली उड़ाई, क्योंकि काँग्रेस को विश्वास था कि उनके खिलाफ कोई सबूत ला ही नहीं सकता, भारत में प्रशासन से लेकर न्यायपालिका तक उनके “स्लीपर सेल” समर्थक इतने ज्यादा हैं, कि उन्हें आसानी से कानूनी जाल में फँसाया ही नहीं जा सकता, परन्तु गाँधी परिवार यह भूल गया कि डॉक्टर स्वामी भी हारवर्ड शिक्षित हैं, ख्यात अर्थशास्त्री हैं, चीन और रूस में उन्हें गंभीरता से सुना जाता है तथा उनका पिछला इतिहास भी सदैव उठापटक वाला रहा है, चाहे वह राजीव गाँधी की हत्या का मामला हो, चंद्रास्वामी का केस हो, जयललिता से दुश्मनी हो अथवा वाजपेयी सरकार को गिराने के लिए उसी जयललिता को साधना हो... डॉक्टर स्वामी हमेशा तनी हुई रस्सी पर आराम से कसरत कर लेते हैं. इसीलिए सन 2012 में जब एक सार्वजनिक सभा में राहुल गाँधी ने तत्कालीन जनता पार्टी अध्यक्ष डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी को यह धमकी दी कि यदि उन्होंने नेशनल हेरल्ड मामले में अपनी बयानबाजी जारी रखी तो वे उन पर मानहानि का मुकदमा दायर कर देंगे, राहुल ने आगे कहा कि उन पर तथा सोनिया गाँधी पर स्वामी के सभी आरोप मिथ्या, दुर्भावनापूर्ण और तथ्यों से परे हैं. उस समय एक और दरबारी जनार्दन द्विवेदी ने यह कहा था कि प्रत्येक लोकतांत्रिक देश के समाज में ऐसे लोग मिल ही जाते हैं जो ऊटपटांग बकवास करते रहते हैं, कोई उन्हें गंभीरता से नहीं लेता... तब सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा कि यदि काँग्रेस में हिम्मत है तो मुझ पर मानहानि का दावा करे, मैं सिद्ध कर दूँगा कि सोनिया-राहुल ने “यंग इन्डियन” नामक कंपनी बनाकर नेशनल हेराल्ड की समूची संपत्ति (जो कि लगभग 5000 करोड़ है) हड़प कर ली है. उसके बाद काँग्रेसी खेमे में चुप्पी छा गई और आज चार वर्ष बाद जब निचली अदालत ने गाँधी परिवार को “समन” जारी किए और अदालत में पेशी रुकवाने के लिए सोनिया-राहुल ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की तो उल्टा हाईकोर्ट ने इस मामले में “प्रथमदृष्टया आपराधिक षड्यंत्र” होने की टिप्पणी भी इसमें जोड़ दी तथा काँग्रेस को जोर का झटका, धीरे से दे दिया


नेशनल हेरल्ड का यह मामला अभी भी जिनकी जानकारी में नहीं है, आगे बढ़ने से पहले मैं उन्हें संक्षेप में समझा देता हूँ कि आखिर रियल एस्टेट की यह “सबसे बड़ी लूट” किस तरह से की गई. 

१) पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आजादी से पहले 1938 में नेशनल हेरॉल्‍ड अखबार की स्थापना की थी. वर्ष 2008 में इसका प्रकाशन बंद हो गया. इस अखबार का स्वामित्व एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) नाम की कम्पनी के पास था, जिसे कांग्रेस से आर्थिक कोष मिलता था. देश उस समय आज़ाद नहीं हुआ था. 

२) समय के साथ धीरे-धीरे यह अखबार और इसकी साथी पत्रिकाएँ कुप्रबंधन के कारण बन्द होती चली गईं, परन्तु देश में लगातार काँग्रेस की सत्ता होने के कारण इस अखबार को देश के कई प्रमुख शहरों में मौके की जमीन और इमारतें “समाजसेवा” के नाम पर लगभग मुफ्त दी गईं. अखबार का घाटा बढ़ता ही गया और एक समय आया जब 2008 में यह बन्द हो गया. 

३) इसके बाद 2011 में “यंग इन्डियन” नामक गैर-लाभकारी (Section 25) कंपनी बनाई गई, जिसके 76% शेयर मालिक सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी हैं, बाकी के शेयर मोतीलाल वोरा, सुमन दुबे और सैम पित्रोदा के पास हैं. 26 फरवरी 2011 को बन्द हो चुकी कम्पनी अर्थात AJL (Associated Journal Limited) के बोर्ड ने प्रस्ताव पास किया कि वे काँग्रेस पार्टी से शून्य ब्याज दर पर नब्बे करोड़ का ऋण लेकर अपनी समस्त देनदारियाँ चुकाएँगे. वैसा ही किया गया, जबकि क़ानून के मुताबिक़ कोई राजनैतिक पार्टी किसी निजी कम्पनी को ऋण नहीं दे सकती. 

४) काँग्रेस पार्टी द्वारा की गई इस “कृपा” के बदले में AJL कम्पनी ने अपने नौ करोड़ शेयर (दस रूपए प्रति शेयर) के हिसाब से नब्बे करोड़ रूपए “यंग इन्डियन” कंपनी के नाम ट्रांसफर कर दिए और इसके मूल शेयरधारकों को इसकी सूचना भी नहीं दी (यह भी कम्पनी कानूनों के मुताबिक़ अपराध ही है). इस प्रकार सिर्फ पचास लाख रूपए से शुरू की गई कंपनी अर्थात “यंग इन्डियन” देखते ही देखते पहले तो नब्बे करोड़ की वसूली की अधिकारी हो गई और फिर AJL की सभी संपत्तियों की मालिक बन बैठी.  


डॉक्टर स्वामी ने न्यायालय में मूल सवाल यह उठाया है कि गठन के एक माह के भीतर ही सोनिया-राहुल की मालिकी वाली यंग इन्डियन कम्पनी, AJL की मालिक कैसे बन गई? अपना नब्बे करोड़ का ऋण चुकाने के लिए AJL कम्पनी ने अपनी देश भर में फ़ैली चल संपत्तियों का उपयोग क्यों नहीं किया, जबकि बड़े आराम से ऐसा किया जा सकता था, क्योंकि AJL के पास वास्तव में 5000 करोड से अधिक की संपत्ति है. सिर्फ दिल्ली के भवन की कीमत ही कम से कम 500 करोड़ है. असल में यह सारा खेल काँग्रेस के वफादार मोतीलाल वोरा को आगे रखकर खेला गया है और परदे के पीछे से सोनिया-राहुल इसमें सक्रिय भूमिका निभा रहे थे. 

अब मजा देखिये... AJL के प्रबंध निदेशक “मोतीलाल वोरा” ने, यंग इन्डियन के 12% शेयरधारक “मोतीलाल वोरा” से कहा कि वे काँग्रेस के कोषाध्यक्ष “मोतीलाल वोरा” से ऋण दिलवाएँ और फिर AJL के “मोतीलाल वोरा” ने यंग इन्डियन के “मोतीलाल वोरा” को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए समस्त ऋणों के चुकता करने के बदले में अपने समस्त शेयर (बिना इसके शेयरधारकों की अनुमति के) ट्रांसफर कर दिए, और इस तरह यंग इन्डियन के 76% मालिक अर्थात सोनिया-राहुल AJL की विराट संपत्ति के मालिक बन बैठे और यह सब कागज़ों पर ही हो गया, क्योंकि लेने वाला, बेचने वाला, अनुमति देने वाला और फायदा उठाने वाला सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे थे

नेशनल हेरॉल्‍ड अखबार के “मास्टहेड” के ठीक नीचे उद्देश्य वाक्य लिखा रहता था - ‘फ्रीडम इज इन पेरिल, डिफेंड इट विद ऑल योर माइट (अर्थात आज़ादी खतरे में है, अपनी पूरी ताकत से इसकी रक्षा करो). यह वाक्य एक पोस्टर से उठाया गया था, जिसे इंदिरा गांधी ने ब्रेंटफोर्ड, मिडिलसेक्स से नेहरू जी को भेजा था. यह ब्रिटिश सरकार का पोस्टर था. नेहरू को यह वाक्य इतना भा गया कि इसे उन्होंने अपने अखबार के माथे पर चिपका दिया. दुर्भाग्य है कि नेहरू के वारिस तमाम बातें करते रहे, पर उन्होंने जानबूझकर इस अखबार और उसके संदेश को कभी गंभीरता से नहीं लिया. पहले नेहरू की पुत्री ने देश पर आपातकाल थोपा और अब इंदिरा की पुत्रवधू ने बड़ी ही सफाई से पहले तो नरसिंहराव और सीताराम केसरी को निकाल बाहर किया और षड्यंत्रपूर्वक नेहरू की इस विरासत पर कब्ज़ा कर लिया. 

“नेशनल हेरॉल्‍ड”, “नवजीवन” और “कौमी आवाज” की मिल्कियत वाले एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड की परिसंपत्तियों की कीमत एक हजार से पांच हजार करोड़ तक आंकी जा रही है. इस कंपनी के पास दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, पटना, इंदौर, भोपाल और पंचकूला में जमीनें और भवन हैं. ये सभी संपत्तियां इन शहरों के मुख्य इलाकों में स्थित हैं 

- दिल्ली के बहादुरशाह जफर मार्ग पर मूल्य और आकार के अनुसार सबसे बड़ी संपत्ति है, जहां एक लाख वर्ग फुट में पांच-मंजिला भवन बना है. इस संपत्ति की कम-से-कम कीमत 500 करोड़ रुपये है. इसकी दो मंजिलें विदेश मंत्रालय और दो मंजिलें टीसीएस ने किराये पर लिया है, जिनमें पासपोर्ट संबंधी काम होते हैं. ऊपरी मंजिल खाली है, जिसे “यंग इंडियन कंपनी” ने अपने जिम्मे ले रखा है. इस भवन से हर साल सात करोड़ रुपये की आमदनी होती है. (जो पता नहीं किसके खाते में जाती है).  

- लखनऊ के ऐतिहासिक कैसरबाग में स्थित भवन से तीन भाषाओं में अखबार छपते थे. इस दो एकड़ जमीन पर 35 हजार वर्ग फुट में दो भवन हैं. अभी एक हिस्से में राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा इंदिरा गांधी नेत्र चिकित्सालय एवं शोध संस्थान संचालित किया जाता है. यहां से निकलनेवाले संस्करण 1999 में बंद हो गये.  

- मुंबई के बांद्रा में अखबार को 3,478 वर्ग फुट जमीन 983 में दी गयी थी. यह जमीन अखबार निकालने और नेहरू पुस्तकालय एवं शोध संस्थान बनाने के लिए दी गयी थी, लेकिन 2014 में इस जमीन पर 11-मंजिला वाणिज्यिक भवन बना दिया गया है. नियम के अनुसार गैर-लाभकारी संस्था को आवंटन के तीन वर्षों के अंदर भवन बना लेना चाहिए था, जिसका उपयोग सिर्फ मूल उद्देश्य के लिए किया जा सकता था. इसमें 14 कार्यालय और 135 कार पार्किंग हैं. एक लाख वर्ग फुट से अधिक के कार्यालय क्षेत्र के इस संपत्ति की कीमत करीब 300 करोड़ रुपये है. इसका किराया और दुकानों-दफ्तरों की बिक्री का पैसा किसके खाते में गया किसी को नहीं मालूम. 

- इसी प्रकार पटना के अदालतगंज में दी गयी जमीन खाली पड़ी है और फिलहाल उस पर झुग्गियां बनी हुई हैं. इस प्लॉट की कीमत करीब सौ करोड़ है. इस पर कुछ दुकानें बनाकर बेची भी गयी हैं. 

- पंचकूला में 3,360 वर्ग फुट जमीन अखबार को 2005 में हरियाणा सरकार ने दी थी. इस पर अभी एक चार-मंजिला भवन है जो अभी हाल में ही बन कर तैयार हुआ है. इस संपत्ति की कीमत 100 करोड़ आंकी जाती है. 

- इंदौर की संपत्ति इस लिहाज से खास है कि यहां से अब भी नेशनल हेरॉल्‍ड एक फ्रेंचाइजी के जरिये प्रकाशित होता है. एबी रोड पर 22 हजार वर्ग फुट के इस प्लॉट की कीमत करीब 25 करोड़ है. भोपाल के एमपी नगर में हेरॉल्‍ड की जमीन को एक कांग्रेसी नेता ने फर्जी तरीके से एक बिल्डर को बेच दिया था, जिसने उस पर निर्माण कर उन्हें भी बेच दिया था. इसकी कीमत तकरीबन 150 करोड़ आंकी जाती है. 



तात्पर्य यह है कि AJL की तमाम संपत्तियों के रखवाले(??) यंग इण्डियन तथा काँग्रेस के लेन-देन और खातों की गहराई से जाँच की जाए तो पता चल जाएगा कि कितने वर्षों से यह गड़बड़ी चल रही है, और अभी तक इस लावारिस AJL नामक भैंस का कितना दूध दुहा जा चुका है. काँग्रेस और सोनिया-राहुल पर यह संकट इसलिए भी अधिक गहराने लगा है कि अब इस लड़ाई में AJL के शेयरधारक भी कूदने की तैयारी में हैं. प्रसिद्ध वकील शांतिभूषण भी एक शेयरधारक हैं और उन्होंने कम्पनी एक्ट के तहत मामला दायर करते हुए पूछा है कि कंपनी की संपत्ति और शेयर बेचने से पहले शेयरधारकों से राय क्यों नहीं ली गई? उन्हें सूचित तक नहीं किया गया. इसी प्रकार मार्कंडेय काटजू के पास भी पैतृक संपत्ति के रूप में AJL के काफी शेयर हैं, और वे भी इस घोटाले से खासे नाराज बताए जाते हैं. जब नेशनल हेरल्ड की स्थापना हुई थी, उस समय जवाहरलाल नेहरू के अलावा, कैलाशनाथ काटजू, रफ़ी अहमद किदवई (मोहसिना किदवई के पिता), कृष्णदत्त पालीवाल, गोविन्दवल्लभ पंत (केसी पंत के पिता) इसके मूल संस्थापक थे. वर्तमान में AJL के 1057 शेयरधारक हैं, जिनमें से एक को भी नहीं पता कि इस कंपनी की संपत्ति को लेकर मोतीलाल वोरा, सोनिया-राहुल, सैम पित्रोदा, सुमन दुबे और ऑस्कर फर्नांडीस ने परदे के पीछे क्या गुल खिलाए हैं. अब तक तो पाठकगण समझ ही गए होंगे कि किस तरह बड़े ही शातिर तरीके से यह सारा गुलगपाड़ा किया गया. 

डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी को जब यह भनक लगी तब उन्होंने अपने निजी स्तर पर खोजबीन आरम्भ की और कई तथ्य उनके हाथ लगे, जिसके आधार पर उन्होंने न्यायालय में 2012 में मामला दायर किया, उस समय स्वामी जनता पार्टी के अध्यक्ष थे, भाजपा से उनका कोई सम्बन्ध नहीं था. दस्तावेजों की जाँच-पड़ताल के बाद 26 जून 2014 को मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट गोमती मनोचा ने सभी को समन्स जारी किए और उन्हें 7 अगस्त 2014 को अदालत में पेश होने का आदेश दिया. अपने निर्णय में मजिस्ट्रेट ने कहा कि प्रथमदृष्टया साफ़ दिखाई देता है कि “यंग इण्डियन” कम्पनी का गठन सार्वजनिक संपत्ति और AJL को निशाने पर रखकर किया गया तथा सभी कंपनियों एवं संस्थाओं में मौजूद व्यक्तियों के आपसी अंतर्संबंध मामले को संदेहास्पद बनाते हैं”. पेशी पर रोक लगवाने हेतु सोनिया-राहुल ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन हुआ उल्टा ही. सात दिसंबर 2015 के अपने आदेश में न्यायाधीश सुनील गौड़ ने ‘कांग्रेस द्वारा एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) को ब्याज-मुक्त कर्ज देने और 90 करोड़ के कर्ज को यंग इंडियन को देने’ पर सवाल खड़ा किया, जिसका आधार यह था कि कांग्रेस के पास धन सामान्यतः चंदे के द्वारा आता है और उस कर्ज को AJL की परिसंपत्तियों के द्वारा चुकाया जा सकता था. न्यायाधीश ने कहा कि ‘इसमें अपराध की बू है, धोखाधड़ी की गंध है’, और “इसलिए इसकी पूरी पड़ताल जरूरी है” अतः आरोपियों को कोर्ट में पेशी से छूट नहीं दी जा सकती. अब, जबकि दो भिन्न-भिन्न न्यायाधीश अपने न्यायिक ज्ञान के प्रयोग द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, तो इसे राजनीतिक बदला कैसे कहा जा सकता है? परन्तु काँग्रेस इसे यही रंग देने में लगी हुई है... जबकि हकीकत यह है कि डॉक्टर स्वामी किसी की सुनते नहीं हैं, वे अपने मन के राजा हैं और “वन मैन आर्मी” हैं, फिर भी काँग्रेस की पूरी कोशिश यही है कि नेशनल हेरल्ड मामले को नरेंद्र मोदी से जोड़कर इसे “राजनैतिक बदला” कहकर भुनाया जाए. 



दरअसल, काँग्रेस इस समय सर्वाधिक मुश्किल में फँसी हुई है. जहाँ एक तरफ उसका कैडर राहुल गाँधी की भविष्य की क्षमताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाने के मूड में दिखाई दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ यूपीए-२ के काले कारनामे लंबे समय तक उसका पीछा छोड़ने वाले नहीं हैं. अगले दस वर्ष में काँग्रेस के कई नेताओं को भारत की “महीन पीसने वाली चक्की” अर्थात न्यायपालिका के चक्कर लगाते रहने पड़ेंगे, और जब आगाज़ ही सोनिया-राहुल से हुआ है तो अंजाम कैसा होगा? चूँकि भारत के मतदाता न सिर्फ भोलेभाले और भावुक होते हैं, बल्कि वे जल्दी ही माफ भी कर देते हैं. ऐसे में यदि चुनावी मंचों से सोनिया गाँधी सिर पर पल्ला लेकर और आँखों में आँसू लेकर जनता से कहेंगी कि नरेंद्र मोदी उन्हें झूठा ही फँसा रहे हैं तो महँगाई से त्रस्त ग्रामीण मतदाता का बड़ा हिस्सा काँग्रेस की भावनाओं में बह सकता है. 44 सीटों पर सिमटने के बाद लोकसभा में काँग्रेस के पास खोने के लिए कुछ है नहीं, सौ साल पुरानी पार्टी अब इससे नीचे क्या जाएगी? इसलिए काँग्रेस की रणनीति यही है कि कैसे भी हो सोनिया-राहुल की अदालत में पेशी को राजनैतिक रंग दिया जाए, इसीलिए आठ दिनों तक संसद को भी बंधक बनाकर रखा गया और पेशी के वक्त भी जमकर नौटंकी की गई. कुछ जानकारों को उस समय आश्चर्य हुआ जब सोनिया-राहुल ने जमानत लेने का फैसला किया. परन्तु यह भी काँग्रेस की रणनीति का ही भाग लगता है कि चूँकि फिलहाल किसी भी बड़े राज्य में तत्काल विधानसभा चुनाव होने वाले नहीं हैं, तथा यह सिर्फ पहली ही पेशी थी और अभी मामला विधाराधीन है, आरोप भी तय नहीं हुए हैं. इसलिए अभी जमानत से इनकार करके जेल जाने का कोई राजनैतिक लाभ नज़र नहीं आता था. हमारी धीमी न्याय प्रक्रिया के दौरान अभी ऐसे कई मौके आएँगे जब इस मामले में सोनिया-राहुल खुद को “शहीद” और “बलिदानी” सिद्ध करने का मौका पा सकेंगे, बशर्ते डॉक्टर स्वामी के पास सबूतों के रूप में कोई “तुरुप के इक्के” छिपे हुए ना हों. इस तरह जमानत लेने और जेलयात्रा नहीं करने का फैसला एक “सोचा-समझा जुआ” लगता है, जिसे उचित समय आने पर भुनाने की योजना है, तब तक राज्यसभा में अपने बहुमत की “दादागिरी” के बल पर मोदी सरकार को सभी महत्त्वपूर्ण बिल और कानूनों को पास नहीं करने दिया जाए, ताकि जनता के बीच सरकार की छवि गिरती रहे.  

लब्बेलुआब यह है कि जहाँ एक तरफ केजरीवाल अपनी सनातन नौटंकियाँ जारी रखेंगे, छापामार आरोप लगाते रहेंगे, केन्द्र-दिल्ली सरकार के अधिकारों को लेकर नित-नए ड्रामे रचते रहेंगे, और दिल्ली में एक अच्छी सरकार देने की बजाय अपने मंत्रियों एवं समर्थकों पर लगने वाले प्रत्येक आरोप को आंतरिक लोकपाल द्वारा निपटाने लेकिन “मोदी” से जोड़ने की कोशिश जरूर करेंगे... वहीं दूसरी तरफ गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबे काँग्रेसी अपनी “रानी मधुमक्खी” पर क़ानून की आँच आती देखकर उत्तेजित होंगे, एकजुट होंगे तथा और अधिक कुतर्क करेंगे. कुल मिलाकर बात यह है कि आगामी दो वर्ष के भीतर होने वाले पंजाब, बंगाल, उत्तरप्रदेश और उत्तराखण्ड के विधानसभा चुनाव बड़े ही रंगीले किस्म के होंगे, जहाँ भारतवासियों को नए-नए दांवपेंच, नई-नई रणनीतियाँ, विशिष्ट किस्म की नौटंकियाँ देखने को मिलेंगी...

Wednesday, December 23, 2015

Psychopath Acts of Kejriwal

मनोरोगी और उसकी हरकतें.... 


श्री श्री श्री 1008 महामहिम, ट्वीटोपाध्याय, क्रांतिकारीभूषण, स्वराज-प्रतिपादक, झाडूधारी, IIT-दीक्षीत, सिनेमारिव्यू लेखक, सलीम उर्फ योगेंद्र मारक, 49 दिवसीय भगोड़े, निर्भया बलात्कारी-प्रेमी युगपुरुष उर्फ अरविंद केजरीवाल गुस्से में तमतमाते हुए घर पहुँचे... कोने में अपनी दिखावटी घिसी हुई चप्पलें फेंकी और सोफे में अपना ईमानदार पिछवाड़ा लगभग पटक दिया. लड़की ने डरते-डरते पानी का गिलास आगे किया, युगपुरुष गिलास मुँह से लगाने ही वाले थे कि उनका लड़का चिल्लाया, “बाप्पू... सायकोपाथ की स्पेलिंग आपने गलत लिखी है, अब कल स्कूल में भक्तगण मेरी बुरी तरह से क्लास ले लेंगे... जितनी आज आपकी नहीं ली, उससे भी ज्यादा लेंगे... मैं किसे अपना मुँह दिखाऊँगा?" 

युगपुरुष के होंठ थरथराए, उनके मुँह से “साले” शब्द निकलने ही वाला था परन्तु बेटे ने माहौल को भाँपते हुए तत्काल यू-टर्न लिया और अपने कमरे में निकल गया. किचन के दरवाजे से सुनीता भाभी ने मन ही मन शान्ति की साँस लेते हुए कहा, “कितना गुणी बच्चा है, बिलकुल अपने बाप पर गया है..”. इस बीच युगपुरुष पानी का गिलास गटागट खत्म कर चुके थे, और उन्हें अचानक अपने आमरण अनशन की याद आ गई. रालेगन सिद्धि के (अ)सिद्ध पुरुष से आशीर्वचन लेने के लिए उन्होंने अपनी जेब से मोबाईल निकाला तो उधर से सनातन धीमे सुरों में कोमल आवाज़ आई, “मय तुमको बोला था. बाबा, ये राजनीति अपना काम नही हय, पर तेरे को नई समझा. ग्लायकोडीन के नशे में कुच भी ट्वीट कर बैठता हय.. सार्वजनिक जीवन मे अपनी ईमानदारी पर इतराने वाले आदमी को ऐसे अपशब्द नही वापरने चाहिये बाबा...”. युगपुरुष चिढ़ गए, उन्होंने फोन कट कर दिया. 


सुनीता भाभी अभी भी किचन के दरवाजे से माहौल भाँपने की कोशिश कर रही थीं. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आज क्या हो गया है, राजा हरिश्चंद्र की “बॉडी लैंग्वेज” उनकी अस्वस्थता दर्शा रही थी. पहले की बात और थी, जब भी युगपुरुष का मूड ऑफ होता था, उनके घर पहुँचने से पहले ही देवर सलीम SMS पर सावधान कर देते थे, लेकिन आजकल वे भी दूर हो गए हैं. सुनीता भाभी ने व्हाट्स एप्प मैसेज चेक किया तो देखा कि देवर सलीम उर्फ योगेन्द्र ने तीन हँसने वाली स्माईली और एक बैंगनी रंग के सींगों वाले राक्षस की स्माईली भेजी है. उन्होंने तड़ से सलीम को ब्लॉक मार दिया. मोबाईल पर स्क्रोल किया, तो विश्वास भाई का एक शेर दिखा. 

“सीबीआय की रेड हो गयी तो मचल बैठा हंगामा
हमारे बिल में कोई गर घुस गया तो हंगामा
वो थप्पड़ थी बहुत अच्छी, मगर ये रेड बुरा सपना
न जाने और कोई है, पर मोदी पे ये हंगामा” 

“कुछ भी ऊटपटांग शेर और तुकबंदी लिखते रहते हैं” यह सोचकर सुनीता भाभी ने विश्वास देवरजी को इग्नोर किया और स्क्रीन को नीचे स्क्रोल किया. देखा तो देवर आशुतोष का स्टेटस “Typing” दिखा रहा था. दो घंटे पहले ही तो इस पगले आशुतोष ने फोन करके पूछा था कि “भाभी, दिल्ली में सायको “पाथ” किस एरिया में पड़ता है?” भाभी ने आगे स्क्रोल किया, देखा तो बाबा रामदेव का भी मैसेज था, लिखा था... “बेटा जिंदगी में ऐसा होता रहता है, केजू को बोलना अनुलोम विलोम चालू रखे..” और एक आँख मारते हुए स्माईली भी लगी हुई थी. सुनीता भाभी ने गहन श्वास लेकर मन ही मन मान लिया कि अनुलोम हो गया है, और आगे देखा तो देवर सिसोदिया का भी मैसेज था. अब सुनीता भाभी को चैन आया. सिसोदिया जी ने लिखा था, “भाभी, जल्दी से टीवी चालू करो, टीवी पर युगपुरुष के आज के महान कारनामे के चर्चे हैं. वे आनंदित हुईं और तेजी से ड्राइंगरूम में पहुँचकर टीवी ऑन किया. टीवी देखते ही युगपुरुष का खून खौल उठा, टीवी पर थे “स्पेशल छब्बीस” फिल्म आ रही थी. उन्होंने पत्नी के हाथ से मोबाईल खींचकर न्यूज़ चैनल लगा दिया और अपनी वीर रस वाली मुठ्ठी ताने छवि को देखकर उन्हें अपने आंदोलनकारी दिन याद आ गए. सोमनाथ भारती के दी हुई पायरेटेड डीवीडी का निश्चित फायदा हुआ है, वैसे भी उन्हें IIT के जमाने से ही नाटक-नौटंकी का शौक रहा था. उन्हें संतोष हुआ कि जो काम वे उस समय ठीक से नहीं कर सके थे, अब पूरी तरह निभा रहे हैं. 


लेकिन लोगों को उनका सुख देखा कहाँ जाता?? इतने में फोन की घंटी बजी... उस तरफ से सोनिया मैडम जी बोल रही थीं... – “ख्या, खेज्रिवाल जी, आपने हमारा स्क्रिप्ट चुरा लिया, हामने जो चार डीन पहले बोला, वोही आपने आज रिपीट किया??” 

युगपुरुष चीखे, - “खबरदार, हम ओरिजिनल हैं जी, हमारे पास सर्टिफिकेट भी है और उसके नीचे मेरे दस्तखत भी हैं.”

मैडम बोलीं, - “काल आपने मेरे राहुल को बाच्चा बोला, लेकिन आज तो आपका ही खाटजू हो गया” (उधर से इटालियन भाषा में हँसी की आवाज़ आई)... याद राखना खेज्रिवाल जी, भागवान के घार ढेर हाय आंढेर नाही, याद राखना हाम इंडिराजी का बाहू हाय”. 

अब युगपुरुष की बारी थी, वे बोले “रहने दीजिए मैडम जी आप से तो मोदी का पुतला तक ठीक से नहीं संभलता”. (उधर से इटालियन भाषा की कुछ गालियाँ सुनाई दीं और फोन पटक दिया गया). उस गहन चिढात्मक मानसिकता में भी युगपुरुष को लगान फिल्म का संवाद याद आ गया, “थुम हमको डुगना लगान डेगी”... वे दीवार की तरफ देखकर मुस्कुराने लगे. यह ठीक माहौल देखकर सुनीता भाभी को अच्छा लगा. 

उन्होंने किचन में जाकर फिर अपना मोबाईल खोला... आशुतोष देवरजी का स्टेटस अभी भी “Typing” ही आ रहा था. और नीचे स्क्रोल किया, तो देखा कि "आज तक" वाले वाजपेयी ने चार अँगूठे दिखाते हुए “बहुत क्रान्तिकारी, बहुत ही क्रान्तिकारी” लिखा था, उन्हें कुछ समझ नहीं आया. उन्होंने मोबाईल रख दिया और बेडरूम की तरफ चल दीं. युगपुरुष भी ग्लायकोडीन का तगड़ा डोज़ लेकर गहरे नशे में पहुँच चुके थे. आखिरकार आशुतोष देवरजी का मैसेज स्क्रीन पर चमका, उन्होंने लिखा था “भाभी, भाभी.. मुझे सायकोपाथ शब्द का अर्थ मिल गया, मैंने गूगल से खोज निकाला, ये देखिये... “A person suffering from chronic mental disorder with abnormal or violent social behavior.”. अब चिढ़ने की बारी सुनीता भाभी की थी. उन्होंने सोचा कि अच्छा हुआ यह मैसेज मेरे युगपुरुष ने नहीं पढ़ा, वर्ना उन्हें लगता कि आशुतोष भी प्रशांत भूषण से जा मिला है और गूगल से खोजकर उन्हीं को चिढ़ा रहा है... थककर सुनीता भाभी ने मोबाईल साईलेंट पर कर दिया.

समूची दिल्ली कोहरे के आगोश में जा चुकी थी. हिमालय की ठण्डी हवा झेलते हुए दिल्ली की इमारतें आम आदमी को लेकर सोने जा चुकी थीं. संसद भी कल पुनः ठप्प होने के लिए सो गई थी. इधर युगपुरुष भी जोरदार खर्राटे भरने लगे थे. 

मूल मराठी लेखक :- © चिराग पत्की
(हिन्दी अनुवाद - सुरेश चिपलूनकर) 

Wednesday, December 16, 2015

Osho Rajneesh and Secret of Jesus Christ

ओशो रजनीश एवं ईसा मसीह का रहस्य... 

ओशो का वह प्रवचन, जिससे ईसायत तिलमिला उठी थी और अमेरिका की रोनाल्‍ड रीगन सरकार ने उन्‍हें हाथ-पैर में बेडि़यां डालकर गिरफ्तार किया और फिर मरने के लिए थेलियम नामक धीमा जहर दे दिया था। इतना ही नहीं, वहां बसे रजनीशपुरम को तबाह कर दिया गया था और पूरी दुनिया को यह निर्देश भी दे दिया था कि न तो ओशो को कोई देश आश्रय देगा और न ही उनके विमान को ही लैंडिंग की इजाजत दी जाएगी। ओशो से प्रवचनों की वह श्रृंखला आज भी मार्केट से गायब हैं।

पढिए वह चौंकाने वाला सच...

ओशो उवाच...

जब भी कोई सत्‍य के लिए प्‍यासा होता है, अनायास ही वह भारत आने के लिए उत्‍सुक हो उठता है। अचानक पूरब की यात्रा पर निकल पड़ता है। और यह केवल आज की ही बात नहीं है। यह उतनी ही प्राचीन बात है, जितने पुराने प्रमाण और उल्‍लेख मौजूद हैं। आज से 2500 वर्ष पूर्व, सत्‍य की खोज में पाइथागोरस भारत आया था। ईसा मसीह भी भारत आए थे. 

ईसा मसीह के 13 से 30 वर्ष की उम्र के बीच का बाइबिल में कोई उल्‍लेख नहीं है। और यही उनकी लगभग पूरी जिंदगी थी, क्‍योंकि 33 वर्ष की उम्र में तो उन्‍हें सूली ही चढ़ा दिया गया था। तेरह से 30 तक 17 सालों का हिसाब बाइबिल से गायब है! इतने समय वे कहां रहे? आखिर बाइबिल में उन सालों को क्‍यों नहीं रिकार्ड किया गया? उन्‍हें जानबूझ कर छोड़ा गया है, कि ईसायत मौलिक धर्म नहीं है, कि ईसा मसीह जो भी कह रहे हैं वे उसे भारत से लाए हैं. यह बहुत ही विचारणीय बात है। वे एक यहूदी की तरह जन्‍मे, यहूदी की ही तरह जिए और यहूदी की ही तरह मरे। स्‍मरण रहे कि वे ईसाई नहीं थे, उन्‍होंने तो-ईसा और ईसाई, ये शब्‍द भी नहीं सुने थे। फिर क्‍यों यहूदी उनके इतने खिलाफ थे? यह सोचने जैसी बात है, आखिर क्‍यों ? न तो ईसाईयों के पास इस सवाल का ठीक-ठाक जवाबा है और न ही यहूदियों के पास। क्‍योंकि इस व्‍यक्ति ने किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। ईसा उतने ही निर्दोष थे जितनी कि कल्‍पना की जा सकती है.  

पर उनका अपराध बहुत सूक्ष्‍म था। पढ़े-लिखे यहूदियों और चतुर रबाईयों ने स्‍पष्‍ट देख लिया था कि वे पूरब से विचार ले रहे हैं, जो कि गैर यहूदी हैं। वे कुछ अजीबोगरीब और विजातीय बातें ले रहे हैं। और यदि इस दृष्टिकोण से देखो तो तुम्‍हें समझ आएगा कि क्‍यों वे बार-बार कहते हैं- '' अतीत के पैगंबरों ने तुमसे कहा था कि यदि कोई तुम पर क्रोध करे, हिंसा करे तो आंख के बदले में आंख लेने और ईंट का जवाब पत्‍थर से देने को तैयार रहना। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं कि अगर कोई तुम्‍हें चोट पहुंचाता है, एक गाल पर चांटा मारता है तो उसे अपना दूसरा गाल भी दिखा देना।'' यह पूर्णत: गैर यहूदी बात है। उन्‍होंने ये बातें गौतम बुद्ध और महावीर की देशनाओं से सीखी थीं. ईसा जब भारत आए थे-तब बौद्ध धर्म बहुत जीवंत था, यद्यपि बुद्ध की मृत्‍यु हो चुकी थी। गौतम बुद्ध के पांच सौ साल बाद जीसस यहां आए थे। पर बुद्ध ने इतना विराट आंदोलन, इतना बड़ा तूफान खड़ा किया था कि तब तक भी पूरा मुल्‍क उसमें डूबा हुआ था। बुद्ध की करुणा, क्षमा और प्रेम के उपदेशों को भारत पिए हुआ था.  

जीसस कहते हैं कि '' अतीत के पैगंबरों द्वारा यह कहा गया था।'' कौन हैं ये पुराने पैगंबर?'' वे सभी प्राचीन यहूदी पैगंबर हैं: इजेकिएल, इलिजाह, मोसेस,- '' कि ईश्‍वर बहुत ही हिंसक है और वह कभी क्षमा नहीं करता है!? '' यहां तक कि प्राचीन यहूदी पैगंबरों ने ईश्‍वर के मुंह से ये शब्‍द भी कहलवा दिए हैं कि '' मैं कोई सज्‍जन पुरुष नहीं हूं, तुम्‍हारा चाचा नहीं हूं। मैं बहुत क्रोधी और ईर्ष्‍यालु हूं, और याद रहे जो भी मेरे साथ नहीं है, वे सब मेरे शत्रु हैं।'' पुराने टेस्‍टामेंट में ईश्‍वर के ये वचन हैं, और ईसा मसीह कहते हैं, '' मैं तुमसे कहता हूं कि परमात्‍मा प्रेम है।'' यह ख्‍याल उन्‍हें कहां से आया कि परमात्‍मा प्रेम है? गौतम बुद्ध की शिक्षाओं के सिवाए दुनिया में कहीं भी परमात्‍मा को प्रेम कहने का कोई और उल्‍लेख नहीं है। उन 17 वर्षों में जीसस इजिप्‍त, भारत, लद्दाख और तिब्‍बत की यात्रा करते रहे। यही उनका अपराध था कि वे यहूदी परंपरा में बिल्‍कुल अपरिचित और अजनबी विचारधाराएं ला रहे थे। न केवल अपरिचित बल्कि वे बातें यहूदी धारणाओं के एकदम से विपरीत थीं। तुम्‍हें जानकर आश्‍चर्य होगा कि अंतत: उनकी मृत्‍यु भी भारत में हुई! और ईसाई रिकार्ड्स इस तथ्‍य को नजरअंदाज करते रहे हैं। यदि उनकी बात सच है कि जीसस पुनर्जीवित हुए थे तो फिर पुनर्जीवित होने के बाद उनका क्‍या हुआ? आजकल वे कहां हैं ? क्‍योंकि उनकी मृत्‍यु का तो कोई उल्‍लेख है ही नहीं ! 


सच्‍चाई यह है कि वे कभी पुनर्जीवित नहीं हुए। वास्‍तव में वे सूली पर कभी मरे ही नहीं थे। क्‍योंकि यहूदियों की सूली आदमी को मारने की सर्वाधिक बेहूदी तरकीब है। उसमें आदमी को मरने में करीब-करीब 48 घंटे लग जाते हैं। चूंकि हाथों में और पैरों में कीलें ठोंक दी जाती हैं तो बूंद-बूंद करके उनसे खून टपकता रहता है। यदि आदमी स्‍वस्‍थ है तो 60 घंटे से भी ज्‍यादा लोग जीवित रहे, ऐसे उल्‍लेख हैं। औसत 48 घंटे तो लग ही जाते हैं। और जीसस को तो सिर्फ छह घंटे बाद ही सूली से उतार दिया गया था। यहूदी सूली पर कोई भी छह घंटे में कभी नहीं मरा है, कोई मर ही नहीं सकता है. यह एक मिलीभगत थी, जीसस के शिष्‍यों की पोंटियस पॉयलट के साथ। पोंटियस यहूदी नहीं था, वो रोमन वायसराय था। जूडिया उन दिनों रोमन साम्राज्‍य के अधीन था। निर्दोष जीसस की हत्‍या में रोमन वायसराय पोंटियस को कोई रुचि नहीं थी। पोंटियस के दस्‍तखत के बगैर यह हत्‍या नहीं हो सकती थी।पोंटियस को अपराध भाव अनुभव हो रहा था कि वह इस भद्दे और क्रूर नाटक में भाग ले रहा है। चूंकि पूरी यहूदी भीड़ पीछे पड़ी थी कि जीसस को सूली लगनी चाहिए। जीसस वहां एक मुद्दा बन चुका था। पोंटियस पॉयलट दुविधा में था। यदि वह जीसस को छोड़ देता है तो वह पूरी जूडिया को, जो कि यहूदी है, अपना दुश्‍मन बना लेता है। यह कूटनीतिक नहीं होगा। और यदि वह जीसस को सूली दे देता है तो उसे सारे देश का समर्थन तो मिल जाएगा, मगर उसके स्‍वयं के अंत:करण में एक घाव छूट जाएगा कि राजनैतिक परिस्थिति के कारण एक निरपराध व्‍यक्ति की हत्‍या की गई, जिसने कुछ भी गलत नहीं किया था. 

तो पोंटियस ने जीसस के शिष्‍यों के साथ मिलकर यह व्‍यवस्‍था की कि शुक्रवार को जितनी संभव हो सके उतनी देर से सूली दी जाए। चूंकि सूर्यास्‍त होते ही शुक्रवार की शाम को यहूदी सब प्रकार का कामधाम बंद कर देते हैं, फिर शनिवार को कुछ भी काम नहीं होता, वह उनका पवित्र दिन है। यद्यपि सूली दी जानी थी शुक्रवार की सुबह, पर उसे स्‍थगित किया जाता रहा। ब्‍यूरोक्रेसी तो किसी भी कार्य में देर लगा सकती है। अत: जीसस को दोपहर के बाद सूली पर चढ़ाया गया और सूर्यास्‍त के पहले ही उन्‍हें जीवित उतार लिया गया। यद्यपि वे बेहोश थे, क्‍योंकि शरीर से रक्‍तस्राव हुआ था और कमजोरी आ गई थी। पवित्र दिन यानि शनिवार के बाद रविवार को यहूदी उन्‍हें पुन: सूली पर चढ़ाने वाले थे। जीसस के देह को जिस गुफा में रखा गया था, वहां का चौकीदार रोमन था न कि यहूदी। इसलिए यह संभव हो सका कि जीसस के शिष्‍यगण उन्‍हें बाहर आसानी से निकाल लाए और फिर जूडिया से बाहर ले गए।
जीसस ने भारत में आना क्‍यों पसंद किया? क्‍योंकि युवावास्‍था में भी वे वर्षों तक भारत में रह चुके थे। उन्‍होंने अध्‍यात्‍म और ब्रह्म का परम स्‍वाद इतनी निकटता से चखा था कि वहीं दोबारा लौटना चाहा। तो जैसे ही वह स्‍वस्‍थ हुए, भारत आए और फिर 112 साल की उम्र तक जिए. कश्‍मीर में अभी भी उनकी कब्र है। उस पर जो लिखा है, वह हिब्रू भाषा में है। स्‍मरण रहे, भारत में कोई यहूदी नहीं रहते हैं। उस शिलालेख पर खुदा है, '' जोशुआ''- यह हिब्रू भाषा में ईसामसीह का नाम है। 'जीसस' 'जोशुआ' का ग्रीक रुपांतरण है। 'जोशुआ' यहां आए'- समय, तारीख वगैरह सब दी है। ' एक महान सदगुरू, जो स्‍वयं को भेड़ों का गड़रिया पुकारते थे, अपने शिष्‍यों के साथ शांतिपूर्वक 112 साल की दीर्घायु तक यहांरहे।' इसी वजह से वह स्‍थान 'भेड़ों के चरवाहे का गांव' कहलाने लगा। तुम वहां जा सकते हो, वह शहर अभी भी है-'पहलगाम', उसका काश्‍मीरी में वही अर्थ है-' गड़रिए का गाँव'. जीसस यहां रहना चाहते थे ताकि और अधिक आत्मिक विकास कर सकें। एक छोटे से शिष्‍य समूह के साथ वे रहना चाहते थे ताकि वे सभी शांति में, मौन में डूबकर आध्‍यात्मिक प्रगति कर सकें। और उन्‍होंने मरना भी यहीं चाहा, क्‍योंकि यदि तुम जीने की कला जानते हो तो यहां (भारत में)जीवन एक सौंदर्य है और यदि तुम मरने की कला जानते हो तो यहां (भारत में)मरना भी अत्‍यंत अर्थपूर्ण है। केवल भारत में ही मृत्‍यु की कला खोजी गई है, ठीक वैसे ही जैसे जीने की कला खोजी गई है। वस्‍तुत: तो वे एक ही प्रक्रिया के दो अंग हैं। 

यहूदियों के पैगंबर मूसा ने भी भारत में ही देह त्‍यागी थी! इससे भी अधिक आश्‍चर्यजनक तथ्‍य यह है कि मूसा (मोजिज) ने भी भारत में ही आकर देह त्‍यागी थी! उनकी और जीसस की समाधियां एक ही स्‍थान में बनी हैं। शायद जीसस ने ही महान सदगुरू मूसा के बगल वाला स्‍थान स्‍वयं के लिए चुना होगा। पर मूसा ने क्‍यों कश्‍मीर में आकर मृत्‍यु में प्रवेश किया? मूसा ईश्‍वर के देश 'इजराइल' की खोज में यहूदियों को इजिप्‍त के बाहर ले गए थे। उन्‍हें 40 वर्ष लगे, जब इजराइल पहुंचकर उन्‍होंने घोषणा की कि, '' यही वह जमीन है, परमात्‍मा की जमीन, जिसका वादा किया गया था। और मैं अब वृद्ध हो गया हूं और अवकाश लेना चाहता हूं। हे नई पीढ़ी वालों, अब तुम सम्‍हालो!'' मूसा ने जब इजिप्‍त से यात्रा प्रारंभ की थी तब की पीढ़ी लगभग समाप्‍त हो चुकी थी। बूढ़े मरते गए, जवान बूढ़े हो गए और नए बच्‍चे पैदा होते रहे। जिस मूल समूह ने मूसा के साथ यात्रा की शुरुआत की थी, वह बचा ही नहीं था। मूसा करीब-करीब एक अजनबी की भांति अनुभव कर रहे थेा उन्‍होंने युवा लोगों शासन और व्‍यवस्‍था का कार्यभार सौंपा और इजराइल से विदा हो लिए। यह अजीब बात है कि यहूदी धर्मशास्‍त्रों में भी, उनकी मृत्‍यु के संबंध में , उनका क्‍या हुआ इस बारे में कोई उल्‍लेख नहीं है। हमारे यहां (कश्‍मीर में ) उनकी कब्र है। उस समाधि पर भी जो शिलालेख है, वह हिब्रू भाषा में ही है। और पिछले चार हजार सालों से एक यहूदी परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन दोनों समाधियों की देखभाल कर रहा है। 

मूसा भारत क्‍यों आना चाहते थे ? केवल मृत्‍यु के लिए ? हां, कई रहस्‍यों में से एक रहस्‍य यह भी है कि यदि तुम्‍हारी मृत्‍यु एक बुद्धक्षेत्र में हो सके, जहां केवल मानवीय ही नहीं, वरन भगवत्‍ता की ऊर्जा तरंगें हों, तो तुम्‍हारी मृत्‍यु भी एक उत्‍सव और निर्वाण बन जाती है. सदियों से सारी दुनिया के साधक इस धरती पर आते रहे हैं। यह देश दरिद्र है, उसके पास भेंट देने को कुछ भी नहीं, पर जो संवेदनशील हैं, उनके लिए इससे अधिक समृद्ध कौम इस पृथ्‍वी पर कहीं नहीं हैं। लेकिन वह समृद्धि आंतरिक है।
~ओशो (पुस्‍तक: मेरा स्‍वर्णिम भारत)

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Courtsey :- Mr. Anubhav Mishra's Facebook Wall 
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Thursday, December 10, 2015

Relation of Rajendra Prasad and Jawaharlal Nehru

डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद और नेहरू का दुराग्रह 


डा.राजेन्द्र प्रसाद की शख्सियत से पंडित नेहरु हमेशा अपने को असुरक्षित महसूस करते रहे। उन्होंने राजेन्द्र बाबू को नीचा दिखाने का कोई अवसर भी हाथ से जाने नहीं दिया। हद तो तब हो गई जब 12 वर्षों तक रा्ष्ट्रपति रहने के बाद राजेन्द्र बाबू देश के राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद पटना जाकर रहने लगे, तो नेहरु ने उनके लिए वहां पर एक सरकारी आवास तक की व्यवस्था नहीं की, उनकी सेहत का ध्यान नहीं रखा गया। दिल्ली से पटना पहुंचने पर राजेन्द्र बाबू बिहार विद्यापीठ, सदाकत आश्रम के एक सीलनभरे कमरे में रहने लगे। उनकी तबीयत पहले से खराब रहती थी, पटना जाकर ज्यादा खराब रहने लगी। वे दमा के रोगी थे, इसलिए सीलनभरे कमरे में रहने के बाद उनका दमा ज्यादा बढ़ गया। वहां उनसे मिलने के लिए श्री जयप्रकाश नारायण पहुंचे। वे उनकी हालत देखकर हिल गए। उस कमरे को देखकर जिसमें देश के पहले राष्ट्रपति और संविधान सभा के पहले अध्यक्ष डा.राजेन्द्र प्रसाद रहते थे, उनकी आंखें नम हो गईं। उन्होंने उसके बाद उस सीलन भरे कमरे को अपने मित्रों और सहयोगियों से कहकर कामचलाउ रहने लायक करवाया। लेकिन, उसी कमरे में रहते हुए राजेन्द्र बाबू की 28 फरवरी,1963 को मौत हो गई। क्या आप मानेंगे कि उनकी अंत्येष्टि में पंडित नेहरु ने शिरकत करना तक भी उचित नहीं समझा। वे उस दिन जयपुर में एक अपनी  ‘‘तुलादान’’ करवाने जैसे एक मामूली से कार्यक्रम में चले गए। यही नहीं, उन्होंने राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल डा.संपूर्णानंद को राजेन्द्र बाबू की अंत्येष्टि में शामिल होने से रोका। नेहरु ने राजेन्द्र बाबू के उतराधिकारी डा. एस. राधाकृष्णन को भी पटना न जाने की सलाह दे दी। लेकिन, डा0 राधाकृष्णन ने नेहरू के परामर्श को नहीं माना और वे राजेन्द्र बाबू के अंतिम संस्कार में भाग लेने पटना पहुंचे। इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि नेहरू किस कदर राजेन्द्र प्रसाद से दूरियां बनाकर रखते थे।


इस मार्मिक और सनसनीखेज तथ्य का खुलासा खुद डा.संपूर्णानंद ने किया है। संपूर्णानंद जी ने जब नेहरू को कहा कि वे पटना जाना चाहते हैं, राजेन्द्र बाबू की अंत्येष्टि में भाग लेने के लिए तो उन्होंने (नेहरु) संपूर्णानंद से कहा कि ये कैसे मुमकिन है कि देश का प्रधानमंत्री किसी राज्य में आए और उसका राज्यपाल वहां से गायब हो। इसके बाद डा. संपूर्णानंद ने अपना पटना जाने का कार्यक्रम रद्द किया। हालांकि, उनके मन में हमेशा यह मलाल रहा कि वे राजेन्द्र बाबू के अंतिम दर्शन नहीं कर सके। वे राजेन्द्र बाबू का बहुत सम्मान करते थे। डॉक्टर सम्पूर्णानंद ने राजेन्द बाबू के सहयोगी प्रमोद पारिजात शास्त्री को लिखे गए पत्र में अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए लिखा था कि ‘‘घोर आश्चर्य हुआ कि बिहार के जो प्रमुख लोग दिल्ली में थे उनमें से भी कोई पटना नहीं गया, (किसके डर से?) सब लोगों को इतना कौन सा आवश्यक काम अचानक पड़ गया, यह समझ में नहीं आया, यह अच्छी बात नहीं हुई। यह बिलकुल ठीक है कि उनके जाने न जाने से उस महापुरुष का कुछ भी बनता बिगड़ता नहीं। परन्तु, ये लोग तो निश्चय ही अपने कर्तव्य से विमुख रहे.

ये बात भी अब सबको मालूम है कि पटना में डा. राजेन्द्र बाबू को उत्तम क्या मामूली स्वास्थ्य सुविधाएं तक नहीं मिलीं। उनके साथ बेहद बेरुखी वाला व्यवहार होता रहा, मानो सबकुछ केन्द्र के निर्देश पर हो रहा हो। उन्हें कफ की खासी शिकायत रहती थी। उनकी कफ की शिकायत को दूर करने के लिए पटना मेडिकल कालेज में एक मशीन थी कफ निकालने वाली। उसे भी केन्द्र के निर्देश पर मुख्यमंत्री ने राजेन्द्र बाबू के कमरे से निकालकर वापस पटना मेडिकल काॅलेज भेज दिया गया। जिस दिन कफ निकालने की मशीन वापस मंगाई गई उसके दो दिन बाद ही राजेन्द बाबू खाँसते-खाँसते चल बसे, यानी राजेन्द्र बाबू को मारने का पूरा और पुख्ता इंतजाम किया गया था. कफ निकालने वाली मशीन वापस लेने की बात तो अखबारों में भी आ गई हैं.


दरअसल नेहरु अपने को राजेन्द्र प्रसाद के समक्ष बहुत बौना महसूस करते थे। उनमें इस कारण से बड़ी हीन भावना पैदा हो गई थी और वे उनसे छतीस का आंकड़ा रखते थे। वे डा. राजेन्द्र प्रसाद को किसी न किसी तरह से आदेश देने की मुद्रा में रहते थे, जिसे राजेन्द्र बाबू मुस्कुराकर टाल दिया करते थे। नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद से सोमनाथ मंदिर का 1951 में उदघाटन न करने का आग्रह किया था। उनका तर्क था कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के प्रमुख को मंदिर के उदघाटन से बचना चाहिए। हालांकि, नेहरू के आग्रह को न मानते हुए डा. राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर में शिव मूर्ति की स्थापना की. डा. राजेन्द्र प्रसाद मानते थे कि ‘‘धर्मनिरपेक्षता का अर्थ अपने संस्कारों से दूर होना या धर्मविरोधी होना नहीं हो सकता।’’ सोमनाथ मंदिर के उदघाटन के वक्त डा. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, लेकिन नास्तिक राष्ट्र नहीं है. डा. राजेंद्र प्रसाद मानते थे कि उन्हें सभी धर्मों के प्रति बराबर और सार्वजनिक सम्मान प्रदर्शित करना चाहिए। एक तरफ तो नेहरु डा. राजेन्द्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर में जाने से मना करते रहे लेकिन, दूसरी तरफ वे स्वयं 1956 के इलाहाबाद में हुए कुंभ मेले में डुबकी लगाने चले गए. बताते चलें कि नेहरु के वहां अचानक पहुँच जाने से कुंभ में अव्यवस्था फैली और भारी भगदड़ में करीब 800 लोग मारे गए।

हिन्दू कोड बिल पर भी राजेन्द्र प्रसाद, नेहरु से अलग राय रखते थे. जब पंडित जवाहर लाल नेहरू हिन्दुओं के पारिवारिक जीवन को व्यवस्थित करने के लिए हिंदू कोड बिल लाने की कोशिश में थे, तब डा.राजेंद्र प्रसाद इसका खुलकर विरोध कर रहे थे। डा. राजेंद्र प्रसाद का कहना था कि लोगों के जीवन और संस्कृति को प्रभावित करने वाले कानून न बनाये जायें। दरअसल जवाहर लाल नेहरू चाहते ही नहीं थे कि डा. राजेंद्र प्रसाद देश के राष्ट्रपति बनें। उन्हें राष्ट्रपति बनने से रोकने के लिए उन्होंने ‘‘झूठ’’ तक का सहारा लिया था। नेहरु ने 10 सितंबर, 1949 को डा. राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर कहा कि उन्होंने (नेहरू) और सरदार पटेल ने फैसला किया है कि सी.राजगोपालाचारी को भारत का पहला राष्ट्रपति बनाना सबसे बेहतर होंगा। नेहरू ने जिस तरह से यह पत्र लिखा था, उससे डा.राजेंद्र प्रसाद को घोर कष्ट हुआ और उन्होंने पत्र की एक प्रति सरदार पटेल को भिजवाई। पटेल उस वक्त बम्बई में थे। कहते हैं कि सरदार पटेल उस पत्र को पढ़ कर सन्न थे, क्योंकि, उनकी इस बारे में नेहरू से कोई चर्चा नहीं हुई थी कि राजाजी (राजगोपालाचारी) या डा. राजेंद्र प्रसाद में से किसे राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए। न ही उन्होंने नेहरू के साथ मिलकर यह तय किया था कि राजाजी राष्ट्रपति पद के लिए उनकी पसंद के उम्मीदवार होंगे। यह बात उन्होंने राजेन्द्र बाबू को बताई। इसके बाद डा. राजेंद्र प्रसाद ने 11 सितंबर,1949 को नेहरू को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ‘‘पार्टी में उनकी (डा0 राजेन्द प्रसाद की) जो स्थिति रही है, उसे देखते हुए वे बेहतर व्यवहार के पात्र हैं। नेहरू को जब यह पत्र मिला तो उन्हें लगा कि उनका झूठ पकड़ा गया। अपनी फजीहत कराने के बदले उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करने का निर्णय लिया।



नेहरू यह भी नहीं चाहते थे कि हालात उनके नियंत्रण से बाहर हों और इसलिए ऐसा बताते हैं कि उन्होंने इस संबंध में रातभर जाग कर डा. राजेन्द्र प्रसाद को जवाब लिखा। डा. राजेन्द्र बाबू, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के विरोध के बावजूद दो कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति चुने गए थे। बेशक, नेहरू सी राजगोपालाचारी को देश का पहला राष्ट्रपति बनाना चाहते थे, लेकिन सरदार पटेल और कांग्रेस के तमाम वरिष्ठ नेताओं की राय डा. राजेंद्र प्रसाद के हक में थी। आखिर नेहरू को कांग्रेस नेताओं सर्वानुमति की बात माननी ही पड़ी और राष्ट्रपति के तौर पर डा. राजेन्द्र प्रसाद को ही अपना समर्थन देना पड़ा।

जवाहर लाल नेहरू और डा. राजेंद्र प्रसाद में वैचारिक और व्यावहारिक मतभेद बराबर बने रहे थे। ये मतभेद शुरू से ही थे, लेकिन 1950 से 1962 तक राजेन्द्र बाबू के राष्ट्रपति रहने के दौरान ज्यादा मुखर और सार्वजनिक हो गए। नेहरु पश्चिमी सभ्यता के कायल थे जबकि राजेंद्र प्रसाद भारतीय सभ्यता देश के एकता का मूल तत्व मानते थे। राजेन्द्र बाबू को देश के गांवों में जाना पसंद था, वहीं नेहरु लन्दन और पेरिस में चले जाते थे। पेरिस के धुले कपड़े तक पहनते थे। सरदार पटेल भी भारतीय सभ्यता के पूर्णतया पक्षधर थे। इसी कारण सरदार पटेल और डा. राजेंद्र प्रसाद में खासी घनिष्ठता थी। सोमनाथ मंदिर मुद्दे पर डा. राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल ने एक जुट होकर कहा की यह भारतीय अस्मिता का केंद्र है इसका निर्माण होना ही चाहिए। 


अगर बात बिहार की करें तो वहां गांधी के बाद राजेन्द्र प्रसाद ही सबसे बड़े और लोकप्रिय नेता थे। गांधीजी के साथ ‘राजेन्द्र प्रसाद जिन्दाबाद’ के भी नारे लगाए जाते थे। लंबे समय तक देश के राष्ट्रपति रहने के बाद भी राजेन्द्र बाबू ने कभी भी अपने किसी परिवार के सदस्य को न पोषित किया और न लाभान्वित किया। हालांकि नेहरु इसके ठीक विपरीत थे। उन्होंने अपनी पुत्री इंदिरा गांधी और बहन विजयालक्ष्मी पंडित को सत्ता की रेवडि़यां खुलकर बांटीं। सारे दूर-दराज के रिश्तेदारों को राजदूत, गवर्नर, जज बनाया। एक बार जब डा. राजेंद्र प्रसाद ने बनारस यात्रा के दौरान खुले आम काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारियों के पैर छू लिए तो नेहरू नाराज हो गए और सार्वजनिक रूप से इसके लिए विरोध जताया, और कहा की भारत के राष्ट्रपति को ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए। हालांकि डा. राजेन्द्र प्रसाद ने नेहरु की आपत्ति पर प्रतिक्रिया देना भी उचित नहीं समझा। राजेन्द्र प्रसाद नेहरू की तिब्बत नीति और हिन्दी-चीनी भाई-भाई की नीति से असहमत थे। नेहरु की चीन नीति के कारण भारत 1962 की जंग में करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। इसी प्रकार राजेन्द्र बाबू और नेहरु में राज्यभाषा हिन्दी को लेकर भी मतभेद था। मुख्यमंत्रियों की सभा (1961) को राष्ट्रपति ने लिखित सुझाव भेजा कि अगर भारत की सभी भाषाएं देवनागरी लिपि अपना लें, जैसे यूरोप की सभी भाषाएं रोमन लिपि में लिखी जाती हैं, तो भारत की राष्ट्रीयता मजबूत होगी। सभी मुख्यमंत्रियों ने इसे एकमत से स्वीकार कर लिया, किन्तु अंग्रेजी परस्त नेहरू की केंद्र सरकार ने इसे नहीं माना क्योंकि, इससे अंग्रेजी देश की भाषा नहीं बनी रहती जो नेहरू चाहते थे।

वास्तव में डा. राजेंद्र प्रसाद एक दूरदर्शी नेता थे वो भारतीय संस्कृति सभ्यता के समर्थक थे, राष्ट्रीय अस्मिता को बचाकर रखने वालो में से थे।जबकि नेहरु पश्चिमी सभ्यता के समर्थक और, भारतीयता के विरोधी थे। बहरहाल आप समझ गए होंगे कि नेहरु जी किस कद्र भयभीत रहते थे राजेन्द्र बाबू से। अभी संविधान पर देश भर में चर्चाएं हो रही हैं। डा0 राजेन्द्र प्रसाद ही संविधान सभा के अध्यक्ष थे और उन्होंने जिन 24 उप-समितियों का गठन किया था, उन्हीं में से एक ‘‘मसौदा कमेटी’’ के अध्यक्ष डा0 भीमराव अम्बेडकर थे। उनका काम 300 सदस्यीय संविधान सभा की चर्चाओं और उप-समितियों की अनुशंसाओं को संकलित कर एक मसौदा (ड्राफ्ट) तैयार करना था जिसे संविधान सभा के अध्यक्ष के नाते डा0 राजेन्द्र प्रसाद स्वीकृत करते थे। फिर वह ड्राफ्ट संविधान में शामिल होता था। संविधान निर्माण का कुछ श्रेय तो आखिरकार देशरत्न डा0 राजेन्द्र प्रसाद को भी मिलना ही चाहिए, लेकिन आंबेडकर पूजा में हम इतने व्यस्त और मस्त हो गए हैं कि राजेन्द्र प्रसाद के योगदान को गायब ही कर दिया. 

संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे थे हमारे-आपके पंडित जवाहरलाल नेहरू... स्वाभाविक है कि उनकी पीढियाँ और पुरखे भी ऐसे ही षडयंत्रकारी, तानाशाही किस्म की मानसिकता के और हिन्दू द्वेषी हैं.

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साभार - श्री आरके सिन्हा भाजपा सांसद.

Tuesday, December 1, 2015

SGFX Financials, Sharad Pawar and Mystery

शरद पवार एवं ब्रिटेन की चमत्कारिक और रहस्यमयी कंपनी SGFX 


शरद गोविंदराव पवार, अर्थात जिन्हें भारत की जनता शरद पवार यानी NCP के सर्वेसर्वा, भूतपूर्व कृषि मंत्री, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री, बारामती के शुगर किंग एवं क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड तथा ICC के अध्यक्ष वगैरह-वगैरह-वगैरह के नाम से जानती है, ऐसे महान और बुद्धिमान व्यक्ति को कुछ “फ्रॉड टाईप”(??) के व्यक्तियों ने ब्रिटेन की एक रहस्यमयी कंपनी SGFX में बोर्ड सदस्य बना लिया और पवार साहब को पता भी नहीं चला, यानी ऐसे चमत्कार भी कभीकभार हो जाते हैं. 13 दिसम्बर 2010 को शरद गोविंदराव पवार अचानक इस कंपनी के बोर्ड सदस्य बने और मात्र बाईस दिन बाद अर्थात 5 जनवरी 2011 को वे इस पद से हट भी गए. है ना चमत्कार!!! 



भाजपा नेता नीरज गुण्डे और डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा किए ट्वीट्स के अनुसार ब्रिटेन में रजिस्टर्ड एक कम्पनी जिसका नाम है (बल्कि “था”) SGFX Financial Co. UK Ltd. में शरद पवार साहब चंद दिनों के लिए शामिल हुए थे. जो दस्तावेज ब्रिटिश सरकार को सौंपे गए हैं, उसमें बाकायदा धड़ल्ले से, छाती ठोक के, शरद पवार का पेशा, “भारत सरकार में केन्द्रीय मंत्री” भी लिखा गया है. 

“असली रहस्य” यहाँ से शुरू होता है कि, शरद पवार का कहना है कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी और उन्हें धोखे से बोर्ड में शामिल किया गया था. 13 दिसम्बर 2010 को जब SGFX कम्पनी ने अपने दस्तावेज रजिस्ट्रार को सौंपे थे, उस समय उसमें शरद पवार का नाम तीन में से एक निदेशक के रूप में था, इस कंपनी के अन्य दो निदेशक थे सर्वेश नरेंद्र गाड़े और शहनाज़ अशरफ भराड़े. कम्पनी को आरम्भ करते समय बताया गया था कि इस कम्पनी के शुरुआती 500 शेयर रहेंगे जिनकी कुल कीमत सात लाख पाउंड होगी. इन शेयरों में से सर्वेश गाड़े के पास 375 शेयर होंगे और शहनाज़ भराड़े के पास 125 शेयर होंगे (प्रति शेयर कीमत 1401 पाउंड). दो सप्ताह बाद जब शरद पवार जैसे अचानक बोर्ड मेंबर बने, और उसी अचानक तरीके से निकल भी गए, इस दिन अर्थात 5 जनवरी 2011 को कम्पनी ने अपनी प्रस्तुत रिपोर्ट में बताया कि कंपनी ने 4500 शेयर और जारी कर दिए हैं, अर्थात अब कंपनी की कुल कीमत 5000 शेयरों की हो गई है, जिसका मूल्य सत्तर लाख पाउंड हो गया... यह था पहला “चमत्कार”. 

कम्पनी की रिपोर्ट के अनुसार 2011 का वर्ष कंपनी के लिए बहुत बेहतरीन रहा, और एक ही साल में कंपनी ने खासी तरक्की कर ली. चमत्कार पर चमत्कार देखिए कि 5 जनवरी 2011 को जो कंपनी सत्तर लाख पाउंड की थी, वह 20 मार्च 2011 को सात सौ करोड़ पौंड की तथा 29 जून 2011 को सत्तर अरब पाउंड की कंपनी बन गई. यानी 5 जनवरी 2011 को शरद पवार के कम्पनी छोड़ने के बाद इस कंपनी ने सिर्फ छह माह में एक लाख गुना की आर्थिक तरक्की कर ली. अगला चमत्कार यह हुआ कि 14 अगस्त 2012 को रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज़ में आवेदन देकर यह कंपनी बन्द कर दी गई. तो फिर यह पैसा कहाँ से आया? किसने यह पैसा लगाया? और फिर अचानक यह भारीभरकम राशि कहाँ गायब हो गई? कंपनी बन्द क्यों और कैसे हो गई? यही तो एक रहस्य है. 


इस चमत्कारी SGFX कंपनी के डायरेक्टर सर्वेश गाड़े की सार्वजनिक जीवन में जो सूचना उपलब्ध है, उसके अनुसार ये सज्जन ब्रिटेन की तीन कंपनियों के डायरेक्टर थे, SGFX Financials के अलावा Angel Investments Co UK Ltd. तथा Online Currency Exchange of UK Ltd. गाड़े साहब अपना व्यवसाय “व्यापारी” बताते हैं और “चमत्कारों की इस श्रृंखला” में हमें जानकारी मिलती है कि उपरोक्त तीनों कम्पनियाँ जिनमें गाड़े साहब डायरेक्टर थे, जून 2010 और मई 2013 के बीच बन्द कर दी गईं. दूसरी डायरेक्टर अर्थात शहनाज़ भराड़े का किस्सा भी कुछ-कुछ ऐसा ही है, ये मोहतरमा भी Angel Investments Co UK Ltd. में निदेशक थीं. क्या गजब का संयोग है ना?? 

ठहरिये... अभी चमत्कार खत्म नहीं हुए हैं. एक और रोचक बात यह है कि जो-जो कम्पनियाँ ब्रिटेन में रजिस्टर की गईं और भारीभरकम संपत्ति के बावजूद तीन साल में ही खत्म कर दी गईं, बिलकुल उन्हीं कंपनियों के नाम से भारत में भी कम्पनियाँ खोली गईं. उदाहरण स्वरूप 5 जुलाई 2013 को Online Currency Exchange of India Ltd. के नाम से कम्पनी खोली गई (U74900MH2013PLC245277) जिसका पता था नवी मुम्बई में वाशी इन्फोटेक पार्क. सर्वेश गाड़े भारत और ब्रिटेन दोनों ही कंपनियों में निदेशक थे, लेकिन मामूली(?) सा अंतर यह था कि भारत में जो कंपनी खोली गई उसमें भराड़े का नाम शहनाज़ भराड़े नहीं, बल्कि शहनाज़ सर्वेश भराड़े था, और भारत की कंपनी में एक और सज्जन भी निदेशक थे, जिनका नाम था राजिन अशरफ भराड़े, जो कि शहनाज़ के भाई हैं. इसी प्रकार SGFX Financials Co of UK Ltd. जैसे ही समान नाम से भारत में जो कंपनी खोली गई उसमें गाड़े और भराड़े के अलावा चिदम्बरेश्वर राव कल्ला नामक सज्जन निदेशक रहे, जो ब्रिटिश कंपनी में भी बोर्ड मेंबर थे. संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि कम्पनियाँ खोलने, बन्द करने और अकूत मात्रा में धन की अफरा-तफरी और हेराफेरी करने का यह खेल पता नहीं कब से चल रहा है और भारत की एजेंसियाँ इस मामले में अब तक क्या कर रही थीं यह शोचनीय विषय है. ज़ाहिर है कि सिर्फ पाँच-छः माह में जिस कंपनी की संपत्ति अचानक लाखों गुना बढ़ जाती हो, वह ना तो किसी ईमानदार उद्योगपति की कंपनी हो सकती है और ना ही साधु-संतों की. 


मामले में ताजा जानकारी यह है कि शरद पवार ने सर्वेश गाड़े और शहनाज़ भराड़े के खिलाफ धोखाधड़ी के आरोप लगाकर पुलिस में FIR कर दी है, साथ ही EOW (आर्थिक अपराध शाखा) में भी शिकायत दर्ज करवा दी है कि मामले की पूरी जाँच की जाए... 

ऐसे में कुछ बेचैन कर देने वाले स्वाभाविक सवाल उठते हैं, वह इस प्रकार हैं... 

(१) यह आधिकारिक “हवाला” कब से, कैसे और क्यों चल रहा है? 

(२) इसमें “मॉरीशस रूट”, “P-Notes” और यूपीए सरकार के तीनों महान अर्थशास्त्री अर्थात मनमोहन सिंह, चिदंबरम और मोंटेकसिंह अहलूवालिया का क्या रोल है? 

(३) क्या शरद पवार की जानकारी एवं अनुमति के बिना उनका नाम डायरेक्टर अथवा बोर्ड मेंबर के रूप में फाईल करने की किसी मामूली व्यक्ति की हिम्मत हो सकती है? यदि नहीं... तो फिर ये गाड़े और शहनाज़ कौन हैं, जिन्हें शरद पवार का, भारतीय कानूनों का, ब्रिटिश कानूनों का कोई डर नहीं है?? शरद पवार तो अत्यधिक "सक्षम" हैं, इसलिए उन्होंने इस धोखाधड़ी के खिलाफ FIR कर दी, कंपनी को कानूनी नोटिस भी दे दिया. लेकिन सोचिये कि जब शरद पवार जैसे व्यक्ति के साथ ऐसा हो सकता है (सच है या झूठ, यह तो जाँच के बाद ही पता चलेगा), तो भारत का सामान्य व्यक्ति जो आए दिन अपने आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी वगैरह की फोटोकॉपी इधर-उधर थोक में बाँटता रहता है, उसके साथ और उसके दस्तावेजों के साथ कितनी आसानी से फ्रॉड किया जा सकता है, और उसे पता भी नहीं चलेगा. 

(४) क्या भारत में सरकार बदलने के बावजूद यह “शक्तिसंपन्न आर्थिक व्यापारी” अब भी बेख़ौफ़ अपना काम कर रहे हैं? यदि हाँ, तो इसका जिम्मेदार कौन है?? 

सवाल तो कई हैं, लेकिन जवाब कुछ भी नहीं मिलते... यहाँ भारत की जनता 150-200 रूपए किलो दाल के लिए संघर्ष कर रही है और उधर सिर्फ छः माह में किसी रहस्यमयी और चमत्कारी कंपनी की संपत्ति लाखों गुना बढ़ जाती है... क्या इसी को “उदार अर्थव्यवस्था” कहते हैं??