Thursday, November 26, 2015

King Kempegowda, Bangaluru and Tipu Sultan

राजा केम्पेगौडा – बंगलौर के संस्थापक


मुस्लिम वोट बैंक के लिए काँग्रेस द्वारा खामख्वाह टीपू सुलतान की जयंती मनाने के भद्दे विवाद के समय प्रसिद्ध लेखक एवं कलाकार गिरीश कर्नाड ने भी अपनी कथित “सेकुलर उपयोगिता” को दर्शाने एवं अपने महामहिमों को खुश करने के लिए एक बयान दिया था कि बंगलौर के अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम केम्पेगौडा टर्मिनल से बदलकर टीपू सुलतान के नाम पर कर दिया जाना चाहिए. हालाँकि एक दिन में ही गिरीश कर्नाड को अक्ल आ गई और वे अपने बयान से पलट गए. ऐसा क्यों हुआ, यह हम लेख में आगे देखेंगे. 

कई मित्रों को केम्पेगौडा के बारे में जानकारी नहीं है. होगी भी कैसे? टीपू सुलतान जैसे क्रूर बादशाह को महिमामंडित करने के चक्कर में फर्जी इतिहासकारों ने कर्नाटक के इस राजा और खासकर विजयनगर साम्राज्य को हमेशा कमतर दर्शाने अथवा उपेक्षित रखने का भरपूर प्रयास किया है, लेकिन स्थानीय भावनाएँ और जातीय व क्षेत्रीय स्वाभिमान तथा बंगलौर के गौरवशाली इतिहास के कारण केम्पेगौडा को कभी भुलाया नहीं जा सकता. हिरिया केम्पेगौडा को जनता केम्पेगौडा के नाम से जानती थी. वे विजयनगरम साम्राज्य के दौरान एक बुद्धिमान एवं कलाप्रेमी राजा के रूप में विख्यात थे. आज जो बंगलौर हमें दिखाई देता है, वह केम्पेगौडा के दिमाग की ही उपज थी. सन 1537 में केम्पेगौडा ने बंगलौर को अपनी राजधानी बनाने का फैसला किया और उसी के अनुसार व्यवस्थित रूप से बंगलौर को डिजाइन किया. राजा केम्पेगौडा “गौड़ा” खानदान से थे, जो कि येलहंकानाडु प्रभु की विरासत से आरम्भ हुआ था. “गौड़ा” शब्द का एक अर्थ भूमिपुत्र अथवा किसान भी होता है. केम्पेगौडा ने सन 1513 से आरम्भ करके कुल 56 वर्ष शासन किया. जबकि इनके पिता केम्पनान्जे गौड़ा ने 70 वर्ष तक शासन किया. केम्पेगौडा बचपन से ही दूरदृष्टा, बुद्धिमान एवं कलाप्रेमी थे. जब उन्होंने बंगलूरू को राजधानी बनाने का फैसला किया तभी उन्होंने निश्चित कर लिया था कि वे इसे एक व्यवस्थित नगर के रूप में विकसित करेंगे. बंगलूरू शहर में उन्होंने एक किला, फ़ौजी छावनी, ढेर सारे तालाब और मंदिरों का निर्माण करवाया. बंगलूरू में केम्पेगौडा ने सड़कों का निर्माण भी अत्यधिक व्यवस्थित पद्धति से करवाया, जिसमें उत्तर से दक्षिण तक तथा पूर्व से पश्चिम तक बहुत चौड़ी सड़कों तथा इन्हें जोड़ने वाली थोड़ी कम चौड़ी सड़कों का निर्माण पहले करवाया. बंगलूरू में आज जिस स्थान पर डोडापेट चौराहा है (चिक्कापेट जंक्शन) वहीं से बैलों द्वारा हल चलाकर बंगलूरू की सड़कों का निर्माण आरम्भ किया था. उन दिनों भी सड़कें इतनी चौड़ी थीं कि तीन-तीन बैलगाडियां आराम से एक साथ चल सकती थीं. 


केम्पेगौडा के शासनकाल में बंगलूरू कपास, चावल, रागी और चूड़ियों के लिए अत्यधिक प्रसिद्ध था. कुरुबारापेट, कुम्बारपेट, गनिगारपेट, उप्पारापेट जैसे इलाके व्यावसायिक केन्द्र थे, जबकि हलसूरपेट, मुटियालापेट, बल्लापुरापेट जैसे कई इलाके रिहायशी बनाए गए. किले के उत्तरी येलहांका द्वारा के पास विनायक एवं आंजनेय के मंदिर बनाए गए (जहाँ आज स्टेट बैंक ऑफ मैसूर का मुख्यालय है). इसके अलावा केम्पेगौडा ने नगर को पानी आपूर्ति हेतु कई विशाल तालाबों का भी निर्माण करवाया, जो कहीं-कहीं आज भी देखे जा सकते हैं. विजयनगर साम्राज्य के प्रमुख शासक केम्पेगौडा के इन कामों से अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्होंने उल्सूर, बेगुर, वर्थुर, जिगनी, थालागात्तापुरा जैसे कई गाँव केम्पेगौडा को भेंट में दिए. सन 1569 में केम्पेगौडा का निधन हुआ, और सन 1609 में उनकी एक धातुमूर्ति शिवगंगा स्थित गंगाधरेश्वर मंदिर में स्थापित की गई. आगे चलकर कर्नाटक सरकार ने केन्द्र को प्रस्ताव भेजा कि बंगलूरू अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम राजा केम्पेगौडा के नाम पर कर दिया जाए. तत्कालीन यूपीए सरकार ने 2012 में कर्नाटक सरकार के इस प्रस्ताव को मंजूरी दी और 18 जुलाई 2013 को कैबिनेट ने सर्वसम्मति से बंगलूरू एयरपोर्ट का नाम “केम्पेगौडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा” कर दिया. 

अब आप सोच रहे होंगे कि जब काँग्रेस सरकार ने ही बंगलूरू एयरपोर्ट का नाम राजा केम्पेगौडा के नाम पर रखा है तो फिर सिद्धरामय्या सरकार और काँग्रेस के खासुलखास गिरीश कर्नाड ने इस मामले को जबरन क्यों उछाला? गिरीश कर्नाड को यह कहने की क्या जरूरत थी कि इस हवाई अड्डे का नाम टीपू सुलतान के नाम पर रखा जाए? ऐसा इसलिए, क्योंकि टीपू के कई इस्लामिक कारनामों की वजह से आज भी मुस्लिमों के दिल में टीपू के प्रति काफी इज्जत है, सो मुसलमानों को खुश करने के लिए काँग्रेस ने गिरीश कर्नाड के मुँह से यह बयान दिलवाया ताकि वह वोट बैंक खुश हो जाए, कि देखो काँग्रेस हमारे नायकों का कितना ख़याल रखती है... और फिर दो दिन बाद ही गिरीश कर्नाड के मुँह से यह बयान भी दिलवा दिया गया कि “मेरे कहने का आशय यह नहीं था, राजा केम्पेगौडा तो महान व्यक्ति थे..”. अब आप फिर सोच में पड़ गए होंगे कि अपने ही बयान से पलटी मारने का क्या मतलब?? तो ऐसा इसलिए क्योंकि कर्नाटक में गौड़ा समुदाय एक शक्तिशाली राजनैतिक वोट बैंक अर्थात “वोक्कालिगा” के अंतर्गत आता है. गिरीश कर्नाड के बयान देते ही राजा केम्पेगौडा के समस्त “गौड़ा” अर्थात वोक्कालिगा समुदाय समर्थक नाराज हो गए.... तत्काल काँग्रेस को समझ में आया कि टीपू सुलतान को लेकर खेला गया यह दाँव महँगा भी पड़ सकता है, तो गिरीश कर्नाड साहब ने तत्काल माफी भी माँग ली. वोट बैंक के लिए दोनों हाथों में लड्डू रखने का यह घृणित खेल काँग्रेस 1948 से खेलती आई है. काँग्रेस ने ही हिंदुओं को खुश करने के लिए राम जन्मभूमि स्थल का ताला खोल दिया था और मुसलमानों को खुश करने के लिए ही शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट को लात मारते हुए संविधान ही बदल दिया

खैर.... अब हम आते हैं भारत के “महान”(??) इतिहासकारों द्वारा टीपू सुलतान और उसके बाप हैदर अली को अत्यधिक सहिष्णु और उदार बादशाह साबित करने के प्रयास का पोल खोलते एक तथ्य पर. बंगलूरू से पचहत्तर किमी दूर मगादी तहसील में केम्पापुरा नामक गाँव है. इस गाँव में सिर्फ साठ मकान हैं और आबादी लगभग पाँच सौ मात्र. यह गाँव राजा केम्पेगौडा की शहीद स्थली है और इसी गाँव में, बंगलूरू जैसा आईटी शहर बसाने और विकसित करने वाले राजा केम्पेगौडा का स्मारक भी है. आश्चर्य की बात है कि यह महत्त्वपूर्ण जानकारी बंगलूरू में बहुत कम लोगों को पता है, क्योंकि इतिहासकारों (यानी कथित इतिहासकारों) ने केम्पेगौडा शासनकाल की उपलब्धियों को आम जनता तक पहुँचने से रोके रखा, उनके लिए इतिहास हैदर अली से शुरू होता था. केम्पापुरा गाँव के रहवासियों से बात करने पर जानकारी मिलती है कि 1568 में इसी गाँव के आसपास हुए भीषण युद्ध में केम्पेगौडा बुरी तरह घायल हुए और उन्होंने इस गाँव में शरण ली, तथा यहीं वीरगति को प्राप्त हुए. केम्पेगौडा के पुत्र इम्मादी ने अपने पिता की स्मृति में यहाँ एक स्मारक बनवाया तथा इसी स्मारक के सामने बासवराज का मंदिर भी निर्मित किया. इस गाँव के सभी निवासी अपने राजा के प्रति अत्यधिक कृतज्ञ थे और प्रति सोमवार को केम्पापुरा का प्रत्येक व्यक्ति राजा केम्पेगौडा के स्मारक पर पुष्प अर्पित कर सामने बने मंदिर में पूजा-आरती करता था. यह सिलसिला सत्रहवीं शताब्दी तक अर्थात लगभग 150-160 वर्ष तक लगातार जारी रहा. 



सत्रहवीं शताब्दी के मध्य तक हैदर अली का आतंक इस पूरे क्षेत्र में छा गया था. एक बार हैदर अली युद्ध लड़ने के लिए इसी केम्पापुरा गाँव से सोमवार को गुजरने वाला था. ग्रामीण भयभीत थे कि कहीं हैदर अली बासवराज मंदिर और केम्पेगौडा के स्मारक को नष्ट ना कर दे, इसलिए उन्होंने पूरे स्मारक और मंदिर को बड़ी-बड़ी झाड़ियों और काँटों से ढँक दिया और गाँव खाली कर दिया. दुर्योग से कुछ ऐसा हुआ, कि हैदर अली को इसी गाँव के पास अपनी सेना के साथ लंबी अवधि तक डेरा डालना पड़ा. हैदर अली के भय से केम्पापुरा के ग्रामीणों ने लंबे समय तक उस स्मारक का रुख ही नहीं किया. इस गाँव के सबसे वृद्ध व्यक्ति 105 वर्षीय चिंगाम्मा गौड़ा बताते हैं कि हैदर अली के बाद टीपू सुलतान बादशाह बना और उसने भी वही आतंक मचाया. अंततः ग्रामीणों ने उधर जाना ही बन्द कर दिया और वह स्मारक तथा वह मंदिर घने जंगलों एवं झाडियों के बीच कहीं खो गया. कभीकभार कुछ बहादुर युवा इस जंगल में जाकर राजा की समाधि के पास सहभोज (पिकनिक) वगैरह मना लिया करते, परन्तु टीपू का भय इतना अधिक था कि किसी ने भी इस स्मारक और मंदिर को सार्वजनिक नहीं किया. टीपू सुलतान की मृत्यु के काफी बाद अर्थात लगभग अठारहवीं सदी के मध्य में अंततः ग्रामीणों ने निश्चय किया कि अब वे अपने प्रिय राजा केम्पेगौडा के स्मारक को पुनर्जीवित करेंगे और वैसा ही किया गया. परन्तु भारत के सेकुलर इतिहासकारों ने केम्पेगौडा के इस स्मारक को पूरी तरह भुला ही दिया, और आज भी यह खराब स्थिति में है, और किसी को इसकी जानकारी नहीं है, क्योंकि जैसा कि मैंने ऊपर लिखा, इतिहासकारों के लिए टीपू सुलतान अधिक महत्त्वपूर्ण थे, ना कि विजयनगरम साम्राज्य अथवा कोई और भारतीय सम्राट. 

संक्षेप में तात्पर्य यह है कि मुस्लिम वोटों के लिए काँग्रेस कितनी भी नीचे गिर सकती है, लेकिन जैसे ही उसे लगता है कि कोई और समुदाय अथवा जाति उसके किसी कदम से नाराज हो रही है और वह भी बड़ा वोट बैंक है तो वे अपने किसी मोहरे को आगे करके झूठी माफी माँगने का नाटक भी रच लेते हैं. बहरहाल, कर्नाटक के गौड़ा समुदाय की जागरूकता के कारण गिरीश कर्नाड (यानी काँग्रेस) की यह चाल सफल नहीं हुई और बंगलूरू के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम टीपू सुलतान के नाम पर होते-होते बच गया

Sunday, November 22, 2015

NGOs Tool for Unrest and US Spy

जासूसी और अस्थिरता फैलाने के लिए NGOs 


मान लीजिए कि आप रेस ट्रैक पर हैं, और बड़े-बड़े दिग्गजों को हराने का माद्दा रखते हुए आप बहुत उत्साह से दौड़ में हिस्सा लेने के लिए उद्यत हैं. यदि ऐसे में सिर्फ आपके पैरों में दो-दो किलो का वजन बाँध दिया जाए तो क्या आप दौड़ पाएँगे? नहीं. या फिर आपने दौड़ना शुरू किया और आगे-आगे कोई आपके मार्ग में कचरा-पत्थर-कीलें फेंकता चले, तो क्या आप दौड़ पाएँगे? नहीं. कुछ-कुछ ऐसा ही अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति-कूटनीति में भी होता है. तरक्की करने वाले किसी दूसरे देश में कैसे अधिकाधिक रोड़े उत्पन्न किए जा सकें अथवा उसकी तरक्की को कैसे धीमा अथवा पटरी से उतारा जा सके, इस हेतु अमेरिका-जर्मनी जैसे देशों ने विभिन्न देशों में अपने-अपने कई फर्जी और गुप्त संगठन तैयार कर रखे हैं. जिनके द्वारा समय-समय पर अलग-अलग पद्धति से उस देश में उनके हितसाधन किए जाते हैं. 

मई 2007 को व्हाईट हॉउस के पूर्वी हॉल में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश एक समारोह की अध्यक्षता कर रहे थे. इस समारोह में जॉर्ज बुश द्वारा देश की सेवा करने वाले कई विशिष्ट संगठनों को पुरस्कृत एवं सम्मानित किया जाना था. सम्मानित होने वाले महानुभावों के बीच एक शख्स था, जिसका नाम के.हायरामाइन था. हायरामाईन कोलोराडो स्थित एक विराट और अरबपति मानवाधिकार संगठन का संस्थापक और अध्यक्ष है. के.हायरामाइन के NGO का नाम है Humanitarian International Services Group अर्थात (अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सेवा समूह). HISG. “कैटरीना” जैसे महा-तूफ़ान के बाद अमेरिकी जनता की सेवा करने के लिए ही इस समारोह में जॉर्ज बुश द्वारा HISG को सम्मानित किया जा रहा था. अमेरिकी राष्ट्रपति से हाथ मिलाने के बाद अपने संक्षिप्त संबोधन में हायरामाइन ने कहा कि, “कैटरीना तूफ़ान आने के बाद एक माह के भीतर ही ह्यूस्टन से हमारे संगठन ने 1500 स्वयंसेवकों की टीम राहत कार्यों के लिए भेजी और पीड़ित अमेरिकी जनता की तन-मन-धन से सेवा की”. यहाँ तक पढ़ने में तो आपको इसमें कोई खास बात नहीं दिखाई दी होगी, NGOs की यह कार्यप्रणाली बड़ी सामान्य प्रक्रिया है. लेकिन इसमें असली पेंच यह है कि के.हायरामाइन और उसका कथित मानवाधिकार NGO अर्थात HISG वास्तव में पेंटागन के जासूस थे, तथा इनके NGO को उच्च स्तरीय रक्षा कार्यक्रमों के जरिये लाखों डॉलर की मदद दी जाती थी, ताकि यह NGO दूसरे देशों में न सिर्फ धर्म परिवर्तन के कामों में निचले संगठनो को सहायता करे, बल्कि उत्तर कोरिया जैसे देशों में अमेरिकी छिपे हुए मोहरे के रूप में काम करके जासूसी करें. 

(जॉर्ज बुश के हाथों पुरस्कार ग्रहण करने के बाद हायरामाइन अपने साथियों के साथ) 

चौंकिए नहीं... अमेरिका सहित विभिन्न पश्चिमी देशों द्वारा पोषित अधिकाँश NGOs यही कार्य करते हैं. हायरामाइन और HISG का मामला भी ऐसा ही है. HISG जैसे ना जाने कितने संगठन भारत सहित अनेक देशों में कार्यरत हैं जिन्हें कभी अमेरिकी रक्षा विभाग के जरिये किसी अज्ञात मद में अथवा फोर्ड फाउन्डेशन एवं ग्रीनपीस जैसे महाकाय NGOs के जरिये आर्थिक रूप से पाला-पोसा जाता है और मनचाहे कार्य करवाए जाते हैं. नई शैली में पेंटागन के इस जासूसी अभियान की शुरुआत दिसम्बर 2004 में ही हो गई थी, जब अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की गुप्तचर सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल विलियम बोयकिन (जो कि घोषित रूप से एवेंजेलिकल ईसाई, अर्थात ईसाई धर्मप्रचारक हैं) ने उत्तर कोरिया में अमेरिकी घुसपैठ बढ़ाने तथा सूचनाएँ एकत्रित करने के लिए NGOs के उपयोग का अपारंपरिक आयडिया सुझाया. 2004 से पूर्व अमेरिकी सरकार NGOs के इस गोरखधंधे में सीधे शामिल नहीं होती थी, बल्कि उसके खास मोहरे अर्थात कई तथाकथित मानवाधिकार संगठन इसमें अपनी दखल रखते और कार्यसिद्ध होने के बाद अमेरिकी सरकार को रिपोर्ट देते एवं पुरस्कार-सम्मान प्राप्त करते. पेंटागन द्वारा रक्षा मद में सीधे किसी NGO को पालने-पोसने का यह पहला मामला है. 

जैसा कि सभी जानते हैं उत्तर कोरिया का परमाणु कार्यक्रम पिछले पन्द्रह-बीस साल से अमेरिका के लिए भीषण सिरदर्द बना हुआ है. अब तक जासूसी के लिए और अपने मोहरे सत्ता प्रतिष्ठान तक फिट करने की योजना में अमेरिका के लिए उत्तर कोरिया सबसे कठिन देश रहा है. लाख कोशिशों के बावजूद CIA और पेंटागन उत्तर कोरिया के अंदरूनी मामलों की अग्रिम जानकारी प्राप्त करने के बारे में “शून्य” की स्थिति में खड़े रहे. लेकिन के.हायरामाइन के इस मानवाधिकार संगठन HISG की वजह से अमेरिका को उत्तर कोरिया में घुसपैठ की कामयाबी हासिल हुई. HISG ने उत्तर कोरिया में आई आपदाओं के समय “मानवता के नाते”(??) सहायता पहुँचाने की पेशकश की और सहमति मिलने के बाद यह संगठन उन इलाकों तक पहुँचा, जहाँ अब से पहले कोई अमेरिकी संगठन नहीं पहुँच पाया था. अपने राजनैतिक, कूटनैतिक एवं सामरिक लाभों के लिए अमेरिका एवं पश्चिमी देशों द्वारा ऐसे NGOs का इस्तेमाल करना कोई नई बात नहीं है. CIA इस खेल में माहिर रही है, और कई वामपंथी देशों में उसने इन्हीं संगठनों की मदद से जनता में असंतोष फैलाकर तख्तापलट करने में सफलता हासिल की है. सनद रहे कि मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले भारत में लगभग 70,000 NGOs काम कर रहे थे, जिनमें से लगभग 28,000 NGOs ने पिछले दस वर्ष से अपने पैसों एवं विदेश से प्राप्त चन्दे का हिसाब-किताब केन्द्र सरकार को नहीं दिया था. 

बहरहाल, वापस लौटते हैं HISG नामक NGO पर. HISG का गठन अमेरिका में 9/11 के हमले के तुरंत बाद किया गया था. के.हेरामाइन ने तीन मित्रों के साथ मिलकर “मानवाधिकार संगठन” के रूप में इसका गठन किया, जिसका उद्देश्य प्राकृतिक आपदाओं के समय एवं युद्धग्रस्त इलाकों में गरीबों की सहायता, दवाई-कपड़े इत्यादि पहुँचाने का घोषित किया गया. चूँकि मानवाधिकार वाला उद्देश्य दिखावटी था ही, अतः शुरुआती दो वर्षों में HISG ने अधिकाँशतः अमेरिका में ही “धर्म-प्रचार समिति” (Christian Evengelism) के रूप में काम किया. जब अमेरिका अफगानिस्तान में घुसा और उसने वहाँ तबाही मचाना शुरू किया तब HISG एक्शन में आया और पहली बार देश के बाहर कदम रखा. जहाज भर खेप में इन्होंने अफगानिस्तान के क्षतिग्रस्त अस्पतालों में दवाओं का वितरण किया. 2003 आते-आते HISG पेंटागन की निगाहों में चढ़ गया. पेंटागन ने इस NGO को अपने अफगानिस्तान ऑपरेशन में शामिल करके इसे वहाँ मिलने वाले निर्माण कार्यों के ठेके में भी सम्मिलित कर दिया. इसी साल पेंटागन में लेफ्टिनेंट विलियम बोयकिन की नियुक्ति रक्षा मंत्रालय अतिरिक्त सचिव के रूप में हुई. 9/11 के हमलों के पश्चात अत्यधिक सतर्क हुए अमेरिका ने बोयकिन को उन देशों का जिम्मा सौंपा, जिन्हें उसने “हाई-रिस्क” पर रखा था, जैसे ईरान और उत्तर कोरिया. बोयकिन को विभिन्न देशों में कई गुप्तचर ऑपरेशन चलाने का अनुभव था. विलियम बोयकिन ने 1993 में सोमालिया में एक आतंकवादी समूह को मार गिराया था और कोलम्बिया में भी कुख्यात ड्रग स्मगलर पाब्लो एस्कोबार का पीछा करके पता लगाने में भी बोयकिन की खास भूमिका थी. तत्कालीन रक्षा सचिव डोनाल्ड रम्सफेल्ड ने बोयकिन को CIA और पेंटागन के साथ मिलकर उत्तर कोरिया पर अपना ध्यान केंद्रित करने की जिम्मेदारी सौंपी थी. जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, उत्तर कोरिया अमेरिका के लिए सबसे कठिन लक्ष्य था, क्योंकि वहाँ किसी भी अमेरिकी संगठन अथवा सरकार की कोई घुसपैठ नहीं हो पा रही थी. ऐसी हालत में वहाँ से गुप्त सूचनाएँ हासिल करना अथवा वहाँ की जनता को भड़काने के लिए उनके बीच अपने नुमाईंदे फिट करना लगभग असंभव हो चला था. ऐसे हालात में पेंटागन ने दूसरे देशों में काम कर रहे NGOs की तर्ज पर HISG को इस महत्त्वपूर्ण काम के लिए चुना. 

(के.हायरामाइन उत्तर कोरिया में)

चूँकि उत्तर कोरिया पर अमेरिका ने कई तरह के प्रतिबन्ध लगा रखे हैं, इसलिए वास्तव में वहाँ की जनता किम जोंग की तानाशाही और गरीबी के तले जी रही है. उत्तर कोरिया अमूमन किसी भी सरकार से सीधे मदद स्वीकार नहीं करता, इसलिए हायरामाइन के NGO ने शुरुआत में प्रयोग के रूप में वहाँ पड़ने वाली कडाके की ठण्ड के दौरान कपड़ों, दवाओं एवं प्राकृतिक आपदा राहत उपकरणों से भरे जहाज “मानवता” के नाम पर भेजे. विशेष तौर पर डिजाइन किए गए इन कपड़ों के बीच विशेष खांचे बनाए गए थे, जिनमें बाईबल रखी जाती थी. उत्तर कोरिया घोषित रूप से वामपंथी देश है, और वहाँ किसी भी प्रकार की धार्मिक गतिविधियों पर रोक है. ऐसे में कपड़ों के बीच छुपाकर बाईबल भेजना एक जोखिम भरा काम था, परन्तु पेंटागन के लिए यह प्रयोग करना जरूरी था. पेंटागन यह जानता था कि अगर बाईबल भेजने की चाल सफल हो गई और पकड़े नहीं गए तो अगली खेप में सैन्य जासूसी उपकरण, सेन्सर्स और छिपे कैमरे-माईक आदि भी उत्तर कोरिया के भीतर भेजे जा सकते थे. HISG द्वारा कपड़ों में बाईबल भेजने की चाल सफल रही और उत्तर कोरिया की सरकार को इसकी भनक भी नहीं लगी. इसके बाद पेंटागन, CIA और इस NGO की हिम्मत खुल गई और उन्होंने चीन में कार्यरत मिशनरी समूहों, मानवीय सहायता कार्यकर्ताओं एवं चीन के स्मगलरों की मदद से इन्होंने उत्तर कोरिया में विभिन्न जासूसी उपकरण “मानवीय सहायता” के नाम पर भेज डाले. मजे की बात यह थी कि चीन के स्मगलरों और HISG के प्रमुख कर्ताधर्ताओं के अलावा किसी को भी इस बात की भनक तक नहीं थी कि वे मानवता के नाम पर चलाए जा रहे इस ऑपरेशन में मोहरे बने हुए हैं और NGO के नाम पर अमेरिका उनसे जासूसी करवा रहा है. उन्हें लगता था कि वे गरीबों की मदद करके कोई पुण्य का काम कर रहे हैं. इस बीच 2007 में के.हायरामाइन भी अपनी चीनी शक्लो-सूरत की वजह से मानवाधिकार संगठन की ढाल लेकर उत्तर कोरिया का दो बार दौरा कर आया. खोजी वेबसाईट The Intercept ने जब इस मामले की खोजबीन शुरू की और अमेरिका के विभिन्न रिटायर्ड फौजियों से बातचीत की तब पता चला कि लगभग 250 से अधिक NGOs ऐसे हैं जिन्हें अमेरिकी सेना, पेंटागन और CIA मिलकर लाखों डॉलर की फंडिंग करते हैं, ताकि विरोधी नीतियों वाले देशों में या तो अपने आदमी फिट करके अमेरिका के अनुकूल नीतियाँ बनवाई जा सकें, अथवा उन देशों में उथलपुथल पैदा करके, जनता में असंतोष भड़काकर अपना उल्लू सीधा किया जा सके. उत्तर कोरिया तो वैसे ही अमेरिका की प्रमुख हिट लिस्ट में है. चूँकि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार संगठनों को विशेष सुरक्षा एवं अधिकार प्राप्त होते हैं, इसलिए उनके नाम पर बने NGOs के जरिए किसी भी देश में घुसपैठ करना आसान होता है. लेकिन इनके कार्यकर्ताओं के जरिये जासूसी करना अथवा करवाना अन्तर्राष्ट्रीय अपराध की श्रेणी में आता है, इसलिए जब वेबसाईट ने जानकारी लेना चाहा तो पेंटागन के अधिकारियों ने HISG से कोई सम्बन्ध होने से ही इंकार कर दिया. जबकि खुद अमेरिकी सरकार ने ही विभिन्न संस्थाओं का मकड़जाल बनाकर HISG को लाखों डॉलर का भुगतान किया है. 2013 में HISG को पूरी तरह से खत्म कर दिया गया, लेकिन उससे पहले इसके कर्ताधर्ताओं को न सिर्फ ऐशोआराम का जीवन प्रदान किया गया, बल्कि उच्च पुरस्कारों से भी नवाजा गया. 

अमेरिकी अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उत्तर कोरिया के रेडियो एवं दूरसंचार उपकरणों के सिग्नल्स को भंग करने एवं उनमें सेंधमारी करने के लिए कई शक्तिशाली जासूसी उपकरण वहाँ प्लांट किए जाने जरूरी थे, ताकि समय-समय पर सूचनाएँ प्राप्त होती रहें. इस काम के लिए मानवाधिकार NGOs से बेहतर कुछ हो नहीं सकता थम क्योंकि कोई भी उन पर शक नहीं करता और उनके द्वारा पहुँचाए जा रहे सामानों की उतनी कड़ाई से जाँच भी नहीं होती.  

HISG जैसे NGOs को भारी मात्रा में पैसा पहुँचाने के लिए जो “मैकेनिज़्म” तैयार किया जाता है, वह भी बड़ा चमत्कारिक किस्म का होता है. चूँकि ऐसा कहीं भी नहीं दिखना चाहिए कि अमेरिकी सरकार इसमें सीधे शामिल है, इसलिए पहले दो प्रकार की कम्पनियाँ खड़ी जाती हैं, पहली For-Profit और दूसरी Non-Profit. दोनों ही कंपनियों में निदेशक एवं पदाधिकारी लगभग समान ही होते हैं. 2009 में HISG ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में बताया था कि उनके पास कोई “वैतनिक कर्मचारी” नहीं है, तीस लोगों की जो टीम है वह सिर्फ अवैतनिक स्वयंसेवक हैं, सिर्फ तीन या चार व्यक्तियों को जो भुगतान प्राप्त होता है वह किसी “सलाहकार कंपनी” के द्वारा किया जाता है. 2009 की ही एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार HISG के असली खिलाड़ी अर्थात के.हायरामाईन ने अपने NGO से कोई वेतन प्राप्त नहीं किया, परन्तु फिर भी एक निजी सलाहकार कंपनी द्वारा उसे बिना कोई काम किए, लगभग तीन लाख डॉलर का भुगतान किया. ज़ाहिर है कि यह पैसा सीधे पेंटागन के द्वारा उस फर्जी कम्पनी के मार्फ़त HISG को पहुँचाया गया. इसके अलावा “वर्किंग पार्टनर्स फाउन्डेशन” एवं “न्यू मिलेनियम ट्रस्ट” जैसे विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से कुल सत्तर लाख डॉलर का भुगतान किया गया, लेकिन कोई माई का लाल इसमें CIA की भूमिका नहीं खोज सकता. फाउन्डेशनों और ट्रस्टों का जाल इसीलिए बिछाया जाता है, ताकि “व्हाईट मनी” के रूप में पैसा सही व्यक्ति तक पहुँचाया जा सके... इन संस्थाओं में “सलाहकार” नामक पद ऐसा विशिष्ट पद होता है, जिसकी कोई सीमा नहीं, कोई आदि नहीं कोई अंत नहीं. निजी बातचीत में वेबसाईट को पेंटागन के ही एक रिटायर्ड अधिकारी ने बताया कि HISG ने इन सात वर्षों के दौरान लगभग तीस देशों में आपदा राहत, गरीबों को भोजन, मुफ्त दवाईयाँ एवं कपड़े पहुँचाने जैसे कई काम अपने हाथ में लिए. नाईजर, माली, इथियोपिया, केन्य, ईरान, लेबनान, यमन और चीन जैसे देशों में HISG ने विभिन्न तरीकों से अपने स्थानीय कार्यकर्ताओं के जरिये पैसा और सामग्री पहुँचाई, जिससे अमेरिकी सरकार HISG से बहुत खुश हुई. जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, HISG का मुख्य काम उत्तर कोरिया में अमेरिकी जासूसों के लिए जमीन और सुरक्षित स्थान की तैयारी करना था. HISG उत्तर कोरिया में समाजसेवी संस्थाओं एवं ऐसे मानवाधिकार अथवा असंदिग्ध और अच्छी छवि वाले लोगों को अपने साथ जोड़ती थी जो बिना किसी दिक्कत के काम कर सकें. इसके बाद कभी डॉक्टर के रूप में, तो कभी किसी संस्था के सहायक के रूप में तो कभी स्वयंसेवकों के रूप में स्थान-स्थान पर व्यक्ति “प्लांट” किए जाते थे. चूँकि उत्तर कोरिया सर्वाधिक खतरनाक देश माना जाता है, जहाँ किसी भी मामूली गलती की सजा सीधे किम जोंग इल द्वारा प्योंगयांग के चौराहे पर गोली मार देने के आदेश से समाप्त होती थी, इसलिए HISG के काम को अमेरिका में उच्च स्तर पर सराहा गया, और सीधे राष्ट्रपति बुश के हाथों “वालंटियर सर्विस अवार्ड” के रूप में पुरस्कार दिया गया. 

(मकड़ी के जाल की तरह NGOs को पैसा पहुँचाया जाता है)

NGOs की आड़ लेकर CIA जैसी अमेरिकी संस्थाएँ कैसे काम करती हैं, इसका एक संक्षिप्त उदाहरण 2011 में पाकिस्तान में देखने को मिलता है, जहाँ हेपेटाईटिस “बी” का टीका लगाने वाली स्वयंसेवी संस्था के जरिये एक पाकिस्तानी डॉक्टर ने एबटाबाद में संदिग्ध लादेन परिवार के DNA सैम्पल लेने की कोशिश की और पकड़ा गया. इस खुलासे के बाद तालिबान इतना नाराज हुआ कि उसने क्षेत्र में काम कर रहे कई डॉक्टरों को मार डाला और अफगानिस्तान और पाकिस्तान के एक बड़े इलाके में पोलियो वैक्सीन का काम भी बन्द करवा दिया, लेकिन अमेरिकी जासूसी संस्थाओं को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. NGOs का उनका जाल इतना विशाल है, कि आप कभी भी पता नहीं कर सकते कि आपके पास “मानवीय सहायता” के नाम पर बैठा हुआ शख्स अमेरिकी जासूस है. पेंटागन और HISG की मिलीभगत संबंधी पोल खुलने का मुख्य कारण रहा HISG के कर्मचारी. असल में जो भी NGO इस प्रकार की गतिविधियों में शामिल रहता है, उसमें सिर्फ उसके उच्चाधिकारियों को ही मालूम रहता है कि वास्तव में वे लोग क्या काम कर रहे हैं, अथवा क्या काम करने किसी देश में जा रहे हैं. जब अमेरिकी सरकार (यानी पेंटागन और CIA) का काम निकल गया तो उन्होंने सन 2013 में HISG की फण्डिंग बन्द कर दी. के.हायरामाइन ने भी अपने वैतनिक कर्मचारियों को बिना कोई नोटिस दिए अचानक घोषणा कर दी, कि अब यह NGO बन्द किया जा रहा है, क्योंकि हमें “समुचित पैसा” नहीं मिल रहा. 

मैं जानता हूँ कि उपरोक्त चौंकाने वाले तथ्य पढ़ने के बाद आपके दिमाग में अचानक भारत में पिछले कुछ वर्षों में हुई घटनाएँ कौंध गई होंगी, जैसे नर्मदा बचाओ आंदोलन के कारण सरदार सरोवर बाँध के निर्माण में देरी... या फिर कुडनकुलम परमाणु बिजलीघर का NGOs द्वारा कड़ा विरोध, जिसके कारण वह प्रोजेक्ट भी पिछड़ा... अथवा फोर्ड फाउन्डेशन की मदद से चलने वाले कुछ “तथाकथित ईमानदारी आंदोलन”... अथवा हाल ही में मोदी सरकार द्वारा फोर्ड फाउन्डेशन एवं ग्रीनपीस के खातों की जाँच तथा उनके द्वारा खर्च किए गए धन का हिसाब-किताब वगैरह माँगे जाने पर अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय बुद्धिजीवियों(??) द्वारा की गई बिलबिलाहट भी आपको याद आ गई होगी. उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार के आने से पहले भारत में लगभग 70,000 NGOs थे, जिनमें से 30% NGOs ऐसे थे, जिन्होंने पिछले दस साल से विदेशों से प्राप्त होने वाले दान(??) का कोई हिसाब सरकार को नहीं दिया था, और मोदी सरकार द्वारा हिसाब माँगते ही ये NGOs अचानक गायब हो गए, कुछ तो कागजों पर ही थे, जबकि कुछ ने अपनी “दुकान” बढ़ा ली. भारत में आई भीषण “सुनामी” के बाद तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश के तटीय इलाकों में बेघरों-गरीबों के बीच जिस तेजी से मिशनरी संस्थाओं ने NGOs के जरिये धर्मान्तरण करवाया, वह भी आँखें खोलने लायक है. परन्तु आँखें किसकी खुलीं?? सोनिया सरकार की या जयललिता-करुणानिधि सरकार की? नहीं, इनमें से किसी ने भी सुनामी प्रभावित क्षेत्रों में NGOs के माध्यम से चल रही गतिविधियों पर रोक लगाने अथवा जाँच करने की कोई पहल नहीं की. सोचिये क्यों?? इसके अलावा भारत ने पिछले पन्द्रह वर्षों में भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र के लगभग दस अत्यधिक प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों को खो दिया है... नहीं, नहीं... वे भारत छोड़कर नहीं गए, बल्कि उनकी रहस्यमयी मौतें हुई हैं, किसी की आत्महत्या हुई तो कोई मानसिक विक्षिप्त हुआ तो किसी पर बलात्कार अथवा यौन शोषण के आरोप लगे... (वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर नम्बी नारायण से सम्बन्धित खतरनाक मामले के लिए ब्लॉग की इस लिंक पर क्लिक करें). औसत बुद्धि से भी विचार करें तो कोई मामूली व्यक्ति भी बता सकता है, कि यह घटनाएँ सामान्य नहीं, “असामान्य” हैं. भारत को पीछे धकेलने, उसके पैरों में पत्थर बाँधकर दौडाने की ऐसी “रहस्यमयी कारगुजारियाँ” भला पश्चिमी देशों और चीन के अलावा और कौन कर सकता है? क्योंकि भारत में काम करने वाले उनके हजारों “मोहरे” NGOs के रूप में हमारे आसपास ही मौजूद हैं...

Sunday, November 15, 2015

Indian Juvenile Act, Nirbhaya and Afroz

क्या “निर्भया” का बलात्कारी आपके आसपास है? 


मैं जानता हूँ कि शीर्षक देखकर आप चौंके होंगे, लेकिन यह सवाल है ही ऐसा. और यह सवाल करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि दिसम्बर 2015 के बाद ऐसा हो सकता है कि दिल्ली-मुम्बई-आजमगढ़-कटिहार से लेकर भारत के किसी भी शहर में आपकी बेटी, या बीवी या बहू के आसपास ही “निर्भया” का बलात्कारी बैठा हो, उनसे बातें कर रहा हो. यह बात मैं आपको डराने के लिए नहीं कर रहा हूँ, बल्कि भारत के वर्तमान कानूनों एवं कथित मानवाधिकारवादियों के समाज-विरोधी कारनामों की वजह से पैदा हुई स्थिति को स्पष्ट करने के लिए कह रहा हूँ... 


जैसा कि अब पूरी दुनिया जानती है 16 दिसम्बर 2012 को दिल्ली में “कुख्यात” निर्भया बलात्कार काण्ड हुआ था. इस घृणित एवं नृशंस हत्याकांड काण्ड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था एवं भारत में महिला सुरक्षा को लेकर कई सुधार हुए, नए क़ानून बने. इस भीषण बलात्कार काण्ड के अधिकाँश आरोपियों को पहले-दूसरे चरण में फाँसी की सजा हो चुकी है, अंतिम अपील वाला चरण बाकी है. बीबीसी की एक संवाददाता ने बड़ी बेशर्मी से इन दुर्दांत अपराधियों में से एक आरोपी रामसिंह पर एक डाक्यूमेंट्री को टीवी चैनलों पर प्रसारित भी कर दिया जिसमें उस बलात्कारी को बड़ी निर्लज्जता के साथ इंटरव्यू देते हुए भी दिखाया जा चुका है. परन्तु इस काण्ड का एक प्रमुख अपराधी जिसका नाम मोहम्मद अफरोज है, वह अपराध के समय सत्रह वर्ष का होने के कारण भारत के कानूनों की पतली गली (अर्थात जुवेनाईल एक्ट) द्वारा नाबालिग होने की वजह से ना सिर्फ फाँसी से बच गया, बल्कि पूरे देश के माता-पिताओं के लिए चिंता की बात यह है कि आगामी दिसम्बर 2015 के मध्य में उसे “बाल सुधार गृह” से वापस उसके घर भेज दिया जाएगा... बिलकुल सुरक्षित, बिलकुल आराम से और बिना कोई सजा दिए. जी हाँ, यह जानकर अब आपकी रीढ़ की हड्डी में कंपकंपी छूटी होगी. मोहम्मद अफरोज नामक दरिंदा जिसने पहले तो निर्भया और उसके मित्र को बस में चढ़ने के लिए पटाया, और जब ये पाँच दरिंदे और अफरोज़ मिलकर निर्भया के साथ बलात्कार कर चुके थे, तब अफरोज़ ने निर्भया की योनि में लोहे की राड भी घुसेड़ी थी... यह सब उसने पूरे होशोहवास और समझदारी के साथ किया था. लेकिन अपराध करते समय उसकी आयु सत्रह वर्ष थी, इसलिए उसे बालिग़ होने के बाद सिर्फ दो वर्ष के लिए बाल अपराधी सुधार गृह में रहने की कथित सजा(???) मिली, और अब वह उससे भी आज़ाद होने जा रहा है. 

बाल सुधार गृह के नियमों के मुताबिक़ बाल अपराधियों के दिमाग को अपराध से मुक्त करने तथा उन्हें सुधारने के लिए एक मनोचिकित्सक, एक वकील एवं एक सलाहकार (काउंसलर) की नियुक्ति होती है, जो उन अपराधियों से बातचीत करके, उनकी गतिविधियों पर निगाह रखकर उनके बारे में अपनी रिपोर्ट देते हैं. भारत के कानूनों के अनुसार नाबालिग अपराधी (चाहे उसने कितना भी घृणित अपराध किया हो) की पहचान उजागर नहीं की जाती. मोहम्मद अफरोज़ के मामले में भी यही होने जा रहा है, लेकिन इस बीच अफरोज़ बीस वर्ष का हो चुका है और काउंसिलर के मुताबिक़ अफरोज़ को अपने किए का कतई पछतावा नहीं है. वह अपने उस दुष्कर्म को बड़े ठंडे दिमाग से बयान करता है. अफरोज़ के अनुसार निर्भया को बस में चढाने से पहले उसने एक और अकेली लड़की को बस में बैठने के लिए आमंत्रित किया था, परन्तु अचानक वहाँ एक ऑटो आ गया और वह लड़की उसमें चली गई, परन्तु निर्भया और उसका दोस्त दुर्भाग्यशाली निकले और इनके चंगुल में फँस गए. अफरोज़ की काउंसिलिंग करने वाले सलाहकार के अनुसार उसकी मानसिक स्थिति में कोई खराबी नहीं है, बल्कि तथाकथित सुधार गृह में दूसरे बाल(??) अपराधियों के साथ रहकर वह इतना शातिर हो चुका है कि अब वह कोई भी वस्तु अथवा उसकी नाजायज़ माँग पुलिस या प्रशासन से नहीं माँगता, न्यायालय के माध्यम से माँगता है. क्योंकि उसे पता है कि पुलिस उसे कुछ नहीं देगी, लेकिन क़ानून की खामियों के चलते वह न्यायालय से हासिल कर लेगा. दिल्ली पुलिस ने चिकित्सक की रिपोर्ट के साथ न्यायालय में शपथ-पत्र दायर करके यह बता दिया है कि मोहम्मद अफरोज़ के सभी पुरुष प्रधान अंग पूर्ण विकसित एवं स्वस्थ हैं तथा निर्भया के साथ बलात्कार करते समय उसने जैसी क्रूरता और बर्बरता दिखाई है उसे देखते हुए अफरोज़ को सुधार गृह से तिहाड़ भेजा जाए. परन्तु वर्तमान कानूनों की पतली गलियों के कारण अफरोज़ को रिहा किया जाने वाला है. बाल सुधार गृह के समूचे स्टाफ को न्यायालय द्वारा चेतावनी दी जा चुकी है कि किसी भी परिस्थिति में मोहम्मद अफरोज़ का चेहरा जनता के बीच न पहुँचने पाए, उसकी पहचान समाज में उजागर ना होने पाए (ऐसा ही क़ानून है). यानी जनवरी 2016 के बाद यह बलात्कारी समाज में कहाँ जाकर छिप जाएगा, और अपने कुकर्मों को अंजाम देता रहेगा कौन जाने


इस बिंदु पर कई कानूनविदों में मतभेद हैं, अधिकाँश का मानना है कि जिस लड़की का बलात्कार हुआ है उसकी पहचान छिपाना तो वैध कारण माना जा सकता है, परन्तु जो खतरनाक अपराधी अब पूर्ण बालिग़ होकर समाज की मुख्यधारा में जाने वाला है उसकी पहचान छिपाने का क्या मतलब?? इससे तो उसे छिपने में आसानी ही होगी. अव्वल तो अफरोज़ जैसे अपराधी कभी सुधरते नहीं हैं, लेकिन यदि कोई बाल अपराधी वास्तव में सुधर भी गया हो तब भी उसका चेहरा और पहचान छिपाकर रखना समाज के लिए भविष्य में बेहद घातक सिद्ध हो सकता है. यही हो रहा है. काउंसिलर के अनुसार पिछले तीन वर्ष में अफरोज़ ने जेल में सिवाय मौज-मस्ती और चित्रकारी के अलावा कुछ नहीं किया. बढ़िया भोजन मिलने के कारण उसका वजन भी दस किलो बढ़ गया है. पिछले तीन साल में सिर्फ उसकी माँ उससे चार-छः बार मिलने आई, और कोई नहीं आया. 

बाल सुधार गृह एवं “जुवेनाईल एक्ट” का गठन इसलिए किया गया था, ताकि बाल अपराधियों को सजा की बजाय सुधारा जा सके. परन्तु भारत जैसे देश में ये कथित “बाल सुधार गृह”(?) कितने सक्षम एवं सफल हुए हैं इस बात पर कोई शोध अब तक नहीं किया गया है. बाल संरक्षण गृहों एवं सुधार गृहों के भ्रष्टाचार से सभी वाकिफ हैं, वहाँ के हालातों की दयनीय स्थिति और जिस निचले सामाजिक वातावरण से ऐसे अपराधी पनपते हैं, उसे देखते हुए मोहम्मद अफरोज़ जैसे अपराधियों में सुधार होने की उम्मीद नहीं के बराबर ही है. मूल सवाल यह है कि क्या अब भारत के जुवेनाईल एक्ट में संशोधन नहीं किया जाना चाहिए?? आधुनिक युग में जब छोटे-छोटे बच्चे टीवी और मोबाईल के कारण समय से पहले बड़े हो रहे हैं तब सत्रह साल के युवक को “नाबालिग” कैसे माना जा सकता है? निर्भया के साथ अफरोज़ ने जो हिंसक कृत्य किया, वह करते समय उसकी हरकतें पूर्ण वयस्क के समान थीं

इसके अलावा दूसरा डरावना सवाल यह है कि चूँकि अफरोज़ की पहचान गुप्त रखी गई है, इसलिए क्या यह संभव नहीं कि वह दुर्दान्त बलात्कारी अभी इस समय आपके आसपास ही हो... संभव है कि वह आपकी बेटी के स्कूल बस का ड्रायवर हो... या बाज़ार जा रही आपकी बीवी का ऑटोचालक हो... ऐसे में तथाकथित मानवाधिकारवादियों से यह माँग होनी चाहिए कि वे मोहम्मद अफरोज़ को अगले तीन-चार वर्ष तक अपने घर में रखें. चूँकि उन्हें विश्वास है कि अफरोज़ “सुधर” गया है, तो वे तमाम “एक्टिविस्ट” अपनी बेटी से उसकी दोस्ती करवाएँ. क्या यह माँग जायज़ नहीं है?? यदि यह माँग गलत है, तो फिर क्यों ना अफरोज़ की पहचान उजागर कर दी जाए, ताकि जनता उसे पहचान ले और सावधान रहे. 

Thursday, November 5, 2015

JNU Style Tolerance, Freedom and Democracy

JNU छाप लोकतंत्र, सहिष्णुता एवं अभिव्यक्ति स्वतंत्रता... 

इन दिनों भारत में लेखकों, साहित्यकारों, कलाकारों द्वारा पुरस्कार-सम्मान लौटाए जाने का “मौसम” चल रहा है. विभिन्न चैनलों द्वारा हमें बताया जा रहा है कि भारत में पिछले साठ वर्ष में जो कभी नहीं हुआ, ऐसा कुछ “भयानक”, “भीषण” जैसा कुछ भारत में हो रहा है. पुरस्कार-सम्मान लौटाने वाले जो भी “तथाकथित” बुद्धिजीवी हैं, उनकी पृष्टभूमि कुरेदते ही पता चल जाता है कि ये सभी स्वयं को “प्रगतिशील” कहलाना पसंद करते हैं (वास्तव में हैं नहीं). फिर थोड़ा और कुरेदने से पता चलता है कि इनमें से अधिकाँश शुरू से भाजपा-संघ-मोदी विरोधी रहे हैं. फिर थोड़ा और आगे बढ़ने पर यह जानकारी भी मिलती है कि जिन्होंने सम्मान लौटाने अथवा “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा”, “बढ़ती असहिष्णुता” जैसे फैशनेबल मुद्दों पर मोदी सरकार की आलोचना के झण्डे उठाए हैं, उनमें से लगभग सभी कलाकारों-साहित्यकारों में से किसी न किसी का, कोई न कोई सम्बन्ध दो-तीन बातों से जरूर है. पहली, अफज़ल गूरू, याकूब मेमन की फाँसी माफी हेतु दया याचिका लगाने अथवा राष्ट्रपति को लिखी गई चिठ्ठी में इनके हस्ताक्षर हैं... या तो फिर दूसरी बात यह कि तीन-तीन बार एक चुने हुए एक मुख्यमंत्री अर्थात नरेंद्र मोदी को अमेरिका का वीज़ा न मिले इस हेतु अमेरिकी राष्ट्रपति को लिखी गई चिठ्ठी में उनके हस्ताक्षर हैं... या फिर तीसरी बात यह कि इनमें से कई साहित्यकारों-लेखकों-कलाकारों के कोई NGO हैं, जिन्हें फोर्ड फाउन्डेशन अथवा ग्रीनपीस से मोटा चन्दा प्राप्त होता है... प्रस्तावना के रूप में संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि सम्मान-पुरस्कार वगैरह लौटाने की जो नौटंकी चल रही है, उसमें सिद्धांत अथवा नैतिकता वगैरह का कोई स्थान नहीं है... यह कदम “विशुद्ध रूप से राजनैतिक” है. जब से नरेंद्र मोदी की सरकार आई है, अर्थात मई 2014 से ही यह “राजनैतिक गुट” बेचैन है. उन्हें अब भी विश्वास नहीं हो रहा है कि जिस व्यक्ति को उन्होंने लगातार बारह साल तक पानी पी-पीकर कोसा, उसके खिलाफ दुष्प्रचार किया वह इस देश की जनता द्वारा प्रधानमंत्री चुन लिया गया है.


बहरहाल, हम आते हैं मूल मुद्दे पर अर्थात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय उर्फ JNU छाप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सहिष्णुता और लोकतांत्रिक अधिकारों के पाखण्ड पर. इन तमाम फैशनेबल मुद्दों पर सीधे “ग्राउंड रिपोर्ट” लेते हैं. आप पूछेंगे कि JNU ही क्यों?? इसका जवाब है कि ऊपर के पैराग्राफ में जिन महानुभावों का ज़िक्र किया गया है, उनमें से अधिकाँश अपनी “वैचारिक खुराक” यहीं से पाते हैं. अर्थात JNU ही वह नर्सरी है, जहाँ से सेकुलर-वामपंथी विषवृक्ष तैयार होते हैं और ये “साहित्यिक विषवृक्ष” भारत के तमाम हिंदुओं को अपने गढे हुए पाठ्यक्रमों और पुस्तकों द्वारा यह बताते हैं कि “तुम कुछ भी नहीं हो... तुम्हारी संस्कृति कुछ नहीं है... तुम्हारी परम्पराएं बेकार है... तुम्हारे ग्रन्थ बकवास हैं....” आदि-आदि. यही “वामपंथी अकादमिक विषवृक्ष” पिछले साठ साल से भारत की जनता को सहिष्णुता, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी महान बातें बताते-पढ़ाते आए हैं, परन्तु यह तमाम उपदेश सिर्फ दूसरों के लिए ही होते हैं यह उन पर लागू नहीं होते. तो क्यों ना एक निगाह सहिष्णुता, अभिव्यक्ति स्वतंत्रता वगैरा का ज्ञान पेलने वाली नर्सरी(??) उर्फ JNU पर डाल ली जाए, इन उपदेशकों का थोड़ा पिछला हिसाब-किताब भी देख लिया जाए... 

असल में जब कोई वामपंथी यह कहता है कि वह “वाद-संवाद संस्कृति” में यकीन रखता है, तो उसका मतलब यह होता है कि वह अकेला और एकपक्षीय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग करेगा, अर्थात वामपंथ में “अभिव्यक्ति स्वतंत्रता” और “सहिष्णुता” सिर्फ वन-वे-ट्रैफिक के रूप में होती है. इसके उदाहरण स्वरूप तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का उदाहरण सर्वश्रेष्ठ होगा, क्योंकि काँग्रेस की छत्रछाया और “वित्तपोषण” के बल पर ही JNU में यह विषवृक्ष पला-बढ़ा और पल्लवित हुआ है. नवंबर 2005 में (यानी आज से दस साल पहले) मनमोहन सिंह JNU के एक कार्यक्रम में व्याख्यान देने आए थे. उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकारों ने डॉक्टर सिंह के भाषण में लगातार व्यवधान उत्पन्न किए, नारेबाजी की, पर्चे फेंके गए. मनमोहन सिंह को नव-उदारवाद का चेहरा बताते हुए पोस्टर छपवाए गए कि JNU के छात्र उनका भाषण सुनने न जाएँ. “सहिष्णुता” की टेर लगाने वालों ने इतना हंगामा मचाया कि अंततः पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को उस स्थान से खदेड़ दिया, तभी वह भाषण पूरा हुआ. ऐसी होती है वामपंथी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सहिष्णुता... 

अगस्त 2008 में विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ विभाग ने अमेरिका के अतिरिक्त सचिव रिचर्ड बाउचर को भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के सम्बन्ध में चर्चा सत्र एवं विमर्श हेतु आमंत्रित किया था. लेकिन “आम आदमी पार्टी” के संस्थापकों में से एक, वामपंथी प्रोफ़ेसर कमल मित्र चिनॉय ने अपनी “सहिष्णुता” दिखाते हुए छात्रों से आव्हान किया कि वे यह कार्यक्रम न होने दें... “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” का लाल झण्डा उठाए लंगूरों को मौका ही चाहिए था, उन्होंने “अमेरिका हाय-हाय”, “परमाणु समझौता रद्द करो” जैसे नारे लगाते हुए बाउचर के उस कार्यक्रम हो नहीं होने दिया, ना तो रिचर्ड बाउचर को बोलने दिया गया और ना ही छात्रों को सुनने दिया गया... ऐसी होती है वामपंथी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सहिष्णुता... 


2014 से पहले तक JNU के कैम्पस में इज़राईल के किसी व्यक्ति अथवा राजदूत तक का घुसना भी प्रतिबंधित हुआ करता था... अक्सर वामपंथी “सहिष्णु”(??) विश्वविद्यालय प्रशासन को हिंसा होने की संभावना की धमकी देकर इजरायल के राजदूत को JNU में घुसने तक नहीं देते थे. परन्तु अप्रैल 2014 में JNU के विदेश शिक्षा विभाग ने “पश्चिम एशिया” विषय पर छात्रों का मार्गदर्शन एवं चर्चा करने हेतु इज़राईल के राजदूत को आमंत्रित कर लिया और “वैचारिक स्वतंत्रता” के उपदेशकों को उनके आगमन की पूर्व सूचना नहीं मिल पाई, इसलिए कार्यक्रम हो गया. परन्तु “लेखकों की आवाज़ दबाई जा रही है” छाप अरण्य-रुदन करने वाले वामपंथी नेताओं ने राजदूत के जाने के बाद सम्बन्धित विभाग के प्रोफ़ेसर के साथ गालीगलौज की और उनके इस कृत्य को “अनैतिक और अलोकतांत्रिक” भी घोषित कर दिया... साथ ही यह धमकी भी दे डाली कि यदि भविष्य में इज़राईल के राजदूत को विश्वविद्यालय में आमंत्रित किया तो गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे... ऐसी होती है वामपंथी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सहिष्णुता... (अब वैसे भी यह कोई रहस्य नहीं रह गया है कि वामपंथ का फिलीस्तीन प्रेम और कश्मीरी पंडितों से नफरत का कारण क्या है). 

2001 में JNU प्रशासन ने विश्वविद्यालय में एक संस्कृत केन्द्र खोलने का निर्णय किया. लेकिन “लाल गुण्डों और उनके झाड़ू छाप भगुओं” ने इस निर्णय का कड़ा विरोध किया. शुरुआती दिनों में इन “सहिष्णु वामपंथियों” ने रात को संस्कृत केन्द्र की निर्माणाधीन दीवार को भी गिरा दिया था. संस्कृत विभाग खोलने का विरोध करने का कोई वैध कारण तो “लाल लंगूरों” के पास था ही नहीं, इसलिए पर्चे छपवाकर यह खिल्ली उड़ाई गई कि क्या JNU से संस्कृत पढ़कर या यहाँ पर संस्कृत पढ़ाकर हमें पण्डे-पुजारियों की नियुक्ति करनी है?? हालाँकि इस बात का इन वामपंथी उत्पातियों के पास कोई जवाब नहीं था कि यदि उनका विरोध संस्कृत से है, तो फिर JNU में अरबी और फ़ारसी भाषा के विभाग क्यों चल रहे हैं? ऐसी होती है पाखण्डी वामपंथी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ढकोसलेबाज सहिष्णुता... 


2014 के आम चुनावों से पहले सभी वामपंथी पार्टियों ने निश्चय किया कि वे वाराणसी में अरविन्द केजरीवाल का प्रचार करने जाएँगे. ठीक है, यह कोई बड़ी बात नहीं है, सभी के अपने-अपने राजनैतिक विचार होते हैं. समस्या यह हुई कि इन पार्टियों ने JNU स्टूडेंट्स युनियन का “नाम और बैनर” उपयोग करने का भी निश्चय किया. जब इस बात का पता छात्रों को चला तो कम से कम दस छात्र प्रतिनिधियों ने लिखित में इस पर अपना विरोध जताया, परन्तु स्टूडेंट्स यूनियन की आम बैठक में ना तो इस पर कोई चर्चा हुई, और ना ही इस प्रस्ताव का विरोध करने वाले छात्र प्रतिनिधियों को वहाँ बोलने दिया गया. ऐसी होती है वामपंथी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सहिष्णुता... 

गत वर्ष सितम्बर में JNUSU के नवनिर्वाचित प्रतिनिधिमंडल की पहली आम बैठक हुई थी, उसमें सीरिया में कार्यरत इस्लामिक स्टेट और अफ्रीकी इस्लामिक संगठन बोको हरम की निंदा करने का प्रस्ताव लाया जाना था. बारह प्रतिनिधियों ने यह लिखित प्रस्ताव पेश भी कर दिया था. परन्तु वामपंथी छात्र गिरोहों ने आपस में गोलबंदी करके वोटिंग से अनुपस्थित रहने का फैसला कर लिया ताकि प्रस्ताव पास ही न हो सके. फिलीस्तीन का समर्थन और ISIS के विरोध प्रस्ताव का विरोध करने वाले “सेकुलर गैंग” के क्रियाकलापों द्वारा हमें पता चलता है कि, ऐसी होती है वामपंथी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सहिष्णुता... 

यह तो मात्र कुछ ही उदाहरण हैं, जिसमें यह पता चलता है कि पश्चिम बंगाल और केरल में किस तरह विपक्षी आवाजों को दबाने के लिए हिंसा-हत्या और धमकी का उपयोग किया जाता है. परन्तु जिन लोगों का घोषवाक्य ही यह हो कि “सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है”, उन के मुँह से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सहिष्णुता वगैरह की बातें सुनना बड़ा अजीब सा लगता है. इसीलिए अपने आरम्भ से अब तक लगातार JNU में हिन्दू संस्कृति, हिन्दू परम्पराओं एवं हिन्दू देवी-देवताओं के खिलाफ जमकर ज़हर उगला जाता रहा है. हिन्दू छात्रों (विशेषकर SC-ST-OBC) को सदैव धमकाया और प्रताड़ित किया जाता है. इन्हें बताया जाता है कि तुम हिन्दू धर्म के नहीं हो, ताकि वे विभिन्न होस्टलों में जारी पूजा समारोहों में शामिल होने से पहले डरें. वामपंथी गिरोह हिन्दू संस्कृति की मान्यताओं की खूब खिल्ली उड़ाते हैं, और प्रशासन पर उनके दबाव के कारण दूरदराज इलाकों से आए गरीब छात्र माथे पर तिलक और कलाई में पवित्र कलावा बाँधने से भी घबराते हैं, कि पता नहीं कब, कौन सा पागल आकर उनका सार्वजनिक अपमान कर दे. आज से कुछ वर्ष पहले तक तो स्थिति इतनी बुरी थी, कि बेचारे बंगाली छात्रों को “काली पूजा” मनाने, धार्मिक क्रियाएँ करने के लिए कैम्पस से बाहर CR पार्क के सार्वजनिक दुर्गापूजा पाण्डाल तक जाना पड़ता था. रात को वापस आते समय ये छात्र इस बात का खास ख़याल रखते थे कि पूजा अथवा धार्मिक क्रिया के कोई चिन्ह-निशान उनके माथे-कपड़े पर दिखाई ना दें. 

1998-99 से ABVP ने JNU में मजबूती से कदम रखना शुरू किया, और यह वही वर्ष था जब कैम्पस के पेरियार होस्टल के एक कमरे में पहली बार हंगामे, आलोचना और हिंसा के बीच दुर्गापूजा मनाई गई. वामपंथी स्टाईल की धार्मिक स्वतंत्रता 2001 में तब देखी गई थी, जब पहली बार JNU में सार्वजनिक स्थान पर दुर्गापूजा का आयोजन हुआ था... उस समय तत्कालीन डीन एमएच कुरैशी ने वामपंथियों और उनके “स्वाभाविक मित्रों” अर्थात इस्लामी गुण्डों से आव्हान किया कि दुर्गापूजा के हवन कुण्ड को तोड़ दें तथा देवी की मूर्ति को JNU से बाहर फेंक दे. हालाँकि यह प्रयास सफल नहीं हुआ, क्योंकि शायद उन्हें JNU में हिंदुओं की बढ़ती संख्या और ताकत का भान नहीं था. कुरैशी के इस आव्हान को सुनकर पांडाल में हिन्दू छात्र एकत्रित होने लगे. हिन्दू छात्रों में माँ दुर्गा के इस अपमान और अपनी धार्मिक आस्थाओं पर चोट को लेकर जबरदस्त क्रोध था. माहौल बिगड़ता देखकर, वामपंथी और उनके इस्लामी दोस्त वहाँ से चुपचाप निकल गए. छात्रों के क्रोध का गुबार डीन कुरैशी ने भी भाँप लिया और वह वहाँ से भागकर पास में ही स्थित कावेरी होस्टल के एक “हिन्दू” वार्डन के यहाँ जा छिपे.  


हिन्दू संस्कृति, हिन्दू देवी-देवताओं एवं हिन्दू परम्पराओं के प्रति वामपंथ और इस्लाम की मिलीजुली घृणा, असहिष्णुता का यह नंगा प्रदर्शन JNU में गाहे-बगाहे होता ही रहता है. इस गिरोह द्वारा दूरदराज से आए गरीब और भोले SC/ST/OBC छात्रों को जानबूझकर मानसिक रूप से सताया जाता है. उन्हें बारम्बार यह बताया जाता है कि तुम हिन्दू नहीं हो, हिन्दू संस्कृति नाम की कोई बात होती ही नहीं है, देवी-देवताओं को पूजना एक बकवास और मूर्खतापूर्ण कार्य है आदि-आदि. जो तथाकथित बुद्धिजीवी आज मोदी सरकार के खिलाफ अपने पुरस्कार-सम्मान लौटा रहे हैं, उनकी वैचारिक नर्सरी JNU ही है. यहीं से उन्हें इस प्रकार के हिन्दू विरोधी विचार “पोलियो ड्रॉप” की तरह पिलाए जाते हैं. इसीलिए जब हिंदुओं की देवी माँ दुर्गा को JNU में सरेआम “रंडी” कहा जाता है, और महिषासुर का पूजन किया जाता है, तब इन बुद्धिजीवियों की ज़बान पर ताला लग जाता है, और यदि इस धार्मिक दुष्कृत्य के खिलाफ हिन्दू छात्र आवाज़ उठाएँ तो तत्काल उन्हें “भगवा गुण्डे” अथवा “असहिष्णु” कहकर उन पर संघी होने का लेबल चिपका दिया जाता है. वामपंथ की “असहिष्णुता” और कथित “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” का आलम यह है कि JNU में ऐसा एक भी हिन्दू त्यौहार अथवा कोई भी हिन्दू धार्मिक गतिविधि तब तक संचालित नहीं होती, जब तक वामपंथियों-सेकुलरों और इस्लामिक तत्त्वों द्वारा हिंदुओं के प्रति घृणा फैलाने वाले, हिन्दू मान्यताओं/परम्पराओं की भद्दी और अश्लील खिल्ली उड़ाने वाले पोस्टर न लगाए जाएँ. 

JNU स्टाईल का वामपंथ, वैचारिक रूप से कितना खोखला तथा सहिष्णुता, संवाद एवं स्वतंत्रता के प्रति इनका दृष्टिकोण कितना पाखण्ड भरा एवं हिंसक है इसके दो संक्षिप्त उदाहरण और भी हैं. इस वर्ष स्कूल ऑफ लैंग्वेज में ABVP के टिकट पर एक “शिया” छात्र चुनाव लड़ रहा था. उसे वामपंथियों एवं वहाबी छात्रों ने लगातार परेशान किया, भ्रमित करने की कोशिश की क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान उसने यह बयान दिया था कि जब कुरआन भी इस्लाम के प्रचार-प्रसार की इजाज़त देता है तो हिन्दू संगठनों के “घर-वापसी” कार्यक्रम में कुछ भी गलत नहीं है. परन्तु यह बात “सहिष्णुता के पैरोकार” वामपंथ को रास नहीं आई और कुछ दिनों बाद हुई अध्यक्षीय पद हेतु वाद-विवाद प्रतियोगिता में उस शिया छात्र की “इस्लाम-विरोधी” कहकर संयुक्त रूप से आलोचना की गई. इसी प्रकार 2014 में एक मुस्लिम लड़की छात्रसंघ चुनाव में अध्यक्ष पद हेतु खड़ी हुई थी, AISA नामक संगठन ने मुस्लिम छात्रों के बीच, उस मुस्लिम लड़की और उसके हिन्दू मित्रों के चित्रों को वितरित किया, उसकी बदनामी करने की कोशिश की तथा यह प्रचारित किया कि अब वह लड़की मुस्लिम नहीं रही. ऐसी होती है वामपंथी “सहिष्णुता”, “महिला सम्मान” और “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता”... 

हाल ही में JNU के एक होस्टल (जिसमें मुस्लिम छात्रों की बहुलता है) में नवनिर्वाचित अध्यक्ष ने यह नोटिस चस्पा कर दिया कि आगामी दीपावली उत्सव पर आर्थिक एवं राजनैतिक कारणों की वजह से प्रतिबन्ध रहेगा. यदि छात्र दीवाली मनाना चाहते हों तो उन्हें उच्चाधिकारियों से अनुमति लेनी होगी. जब हिन्दू छात्रों ने इस “तुगलकी फरमान” का कड़ा विरोध किया और यह धमकी दी कि यदि हमें दीवाली नहीं मनाने दी गई तो भविष्य में इस होस्टल में ईद और रमजान भी नहीं मनाने देंगे, तब जाकर नोटिस वापस लिया गया. लेकिन वामपंथ की “काली परंपरा” के अनुसार हिन्दू छात्रों के इस कृत्य को “असहिष्णुता” और “साम्प्रदायिकता” कहकर खूब रुदालीगान किया गया. 2001-02 से पहले की स्थिति अलग थी, लेकिन अब JNU में वामपंथियों द्वारा जब भी ऐसी कोई घटिया हरकत की जाती है तो स्वाभाविक रूप से हिन्दू छात्रों द्वारा विरोध किया जाता है तब वामपंथ द्वारा इसे “असहिष्णुता”, “फासीवाद”, “संघी गुण्डागर्दी” आदि कहा जाता है. 

संक्षेप में तात्पर्य यह है कि वामपंथी परिभाषा के अनुसार “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” सिर्फ उसी को है, जो वामपंथी-सेकुलर अथवा मुल्लावाद की बात करे, यदि हिंदुओं ने प्रतिकार किया तो उसे “असहिष्णुता” का नाम दिया जाएगा. इसी प्रकार वामपंथी परिभाषा के अनुसार “स्वस्थ संवाद” सिर्फ तभी हो सकता है, जब किसी सभागार अथवा सेमिनार में हिन्दू संस्कृति, हिन्दू देवताओं एवं परम्पराओं को गाली देने वाले, कोसने वाले ही मौजूद हों... अरबी और फारसी भाषा की बात करना सेकुलरिज़्म है, लेकिन संस्कृत भाषा की पैरोकारी की तो JNU में साम्प्रदायिकता फैलती है... जब इस वर्ष इतिहास में पहली बार छात्रसंघ चुनावों में ABVP ने संयुक्त सचिव पद पर विजय प्राप्त की, तो “सहिष्णुता” और “अभिव्यक्ति” के नकली झंडाबरदार वामपंथियों की पहली प्रतिक्रिया थी, “हम तो उसे JNU स्टूडेंट्स युनियन का सदस्य भी नहीं मानते, वह किसी मीटिंग में शामिल होकर तो दिखाए, जो करना है कर लो”... 

चूँकि लेख का विषय सिर्फ JNU है इसलिए “नकली वामपंथी सहिष्णुता” के तमाम चिथड़ों-पोतड़ों में मैं मंगलेश डबराल- राकेश सिन्हा प्रकरण तथा गोविन्दाचार्य-अरुंधती रॉय जैसे “वैचारिक छुआछूत” वाले प्रकरण को शामिल नहीं कर रहा हूँ, वर्ना वामपंथी “बौद्धिक पाखण्ड” और तथाकथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तमाम नग्न किस्से, बंगाल से लेकर केरल तक बिखरे पड़े हैं... मैंने इस लेख में JNU में सम्पन्न किए जाने वाले "प्रगतिशील छिछोरेपन"... अर्थात "किस ऑफ लव", अथवा "समलैंगिकता के समर्थन" जैसी बातों को भी शामिल नहीं किया है... और मजे की बात यह कि फिर भी बड़ी बेशर्मी से ये लोग संघ-भाजपा और हिंदुओं को सहिष्णुता का ज्ञान बाँटते फिरते हैं... ऐसी होती है वामपंथी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतंत्र और विमर्श... 

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www.indiafacts.com पर JNU के शोधार्थी भाई अभिनव प्रकाश द्वारा दिए गए इनपुट्स पर आधारित...