Friday, October 30, 2015

Congress Dirty Tricks on Coffin and 2G Scam (Part 1)

पर्दाफ़ाश होते काँग्रेसी षड्यंत्र और झूठ.. (भाग १)..


भारत में ये कहावत अक्सर सुनी जाती हैं, कि “जब मुसीबतें और बुरा वक्त आता है, तो चारों तरफ से आता है”... आज ये कहावत देश में काँग्रेस की स्थिति और उसके द्वारा रचित झूठों, जालसाजियों और षडयंत्रों पर पूरी तरह लागू होती दिखाई दे रही है. 16 मई 2014 को भारत की जनता ने काँग्रेस को उसके पिछले दस वर्षों के भ्रष्टाचार, कुशासन और अहंकार की ऐसी बुरी सजा दी, कि उसे मात्र 44 सीटों पर संतोष करना पड़ा. इस करारी हार ने काँग्रेस को बुरी तरह सन्नाटे में ला दिया और मानसिक रूप से त्रस्त कर दिया. जिस व्यक्ति अर्थात नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द तमाम तरह के आरोप, बयानबाजी और “मौत का सौदागर” जैसी घटिया भाषा का उपयोग किया गया, वही व्यक्ति समूचे विपक्ष की नाक पर घूँसा लगाते हुए न सिर्फ प्रधानमंत्री बना, बल्कि पूर्ण बहुमत के साथ बना. देश के कई “कथित” बुद्धिजीवियों ने कभी सोचा भी न होगा कि तीन-तीन बार मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्होंने जिस व्यक्ति को अमेरिका का वीज़ा न मिले, इस हेतु जी-तोड़ कोशिशें और पत्राचार किया गया, आज वही व्यक्ति प्रधानमंत्री के रूप में एक वर्ष में तीन-तीन बार ससम्मान अमेरिका गया. सोनिया गाँधी की किचन कैबिनेट अर्थात NAC में शामिल जिस शक्तिशाली “NGOs गिरोह” ने देश-विदेश में नरेंद्र मोदी के खिलाफ दुष्प्रचार और कानाफूसियों का दौर चला रखा था, वे NGOs अब अपनी आय के स्रोत सूखते देखकर बौखलाने लगे हैं. इसी के साथ TRP के भूखे भेड़ियों और एक जमात विशेष का एजेंडा चलाने वाले मीडिया समूहों ने “गुजरात 2002” से लगातार जिस एक व्यक्ति के खिलाफ घृणा अभियान चलाया, वह मोदी की इतनी शानदार जीत के बावजूद बदस्तूर जारी है. विगत कुछ दिनों में देश की सर्वोच्च न्यायपालिका अर्थात सुप्रीम कोर्ट ने लगातार तीन-चार ऐसे फैसले दिए हैं, जिससे “काँग्रेस-NGOs-मीडिया” का यह “नापाक गठबंधन” बुरी तरह शर्मसार हुआ और सत्य की जीत हुई है. हालाँकि अभी भी इस गिरोह ने कोई सबक नहीं सीखा, और अपनी गलतियों पर ध्यान देने, पश्चाताप करने अथवा सुधार करने की कोई इच्छा नहीं दिखाई है. नरेंद्र मोदी, जॉर्ज फर्नांडीस, भाजपा को विशुद्ध लाभ पहुँचाने वाले सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को जानबूझकर “काँग्रेस पोषित मीडिया चैनलों” ने दबाए रखा. देश को “बीफ”, “गौमांस”, “आरक्षण” जैसी बातों में उलझाए रखा गया, ताकि सुप्रीम कोर्ट के इन ऐतिहासिक निर्णयों का जनता को पता ना चले. परन्तु अब ऐसा होने वाला नहीं है, देश की जनता न सिर्फ जागरूक हो गई है, बल्कि सोशल मीडिया पर लगातार पोल खुलने के कारण जनता ने इन चैनलों पर भरोसा करना भी कम कर दिया है. आगामी जनवरी 2016 में जब केन्द्र सरकार नेताजी सुभाषचंद्र बोस की गुप्त फाईलों को सार्वजनिक करना आरम्भ करेगी, तब इस “गिरोह” का और भी पर्दाफ़ाश होगा. 


बहरहाल, हम लौटते हैं हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा काँग्रेस को लगाई गई फटकारों और काँग्रेसी षड्यंत्रों पर. पाठकों को “ताबूत घोटाला” नाम का काण्ड जरूर याद होगा. कारगिल युद्ध के समय वाजपेयी सरकार ने मृत सैनिकों के शव सुरक्षित रूप से रखने और लाने के लिए एक अमेरिकी कम्पनी, ब्यूत्रों एंड बायजा से अल्युमीनियम के ताबूत आयात किए थे. भारत ने यह युद्ध 1999 में लड़ा था और उसमें विजय प्राप्त की. तत्कालीन विपक्ष में बैठी काँग्रेस को वाजपेयी सरकार की यह उपलब्धि फूटी आँख नहीं सुहाई और उसने षड्यंत्र रचने का फैसला कर लिया. संसद में वाजपेयी के क्षीण बहुमत को देखते हुए काँग्रेस ने उस समय के सबसे ईमानदार समाजवादी व्यक्ति जॉर्ज फर्नांडीस जो कि रक्षामंत्री भी थे, को निशाना बनाने का फैसला किया. अपने “पालतू” अखबारों एवं चैनलों के माध्यम से ताबूत घोटाले के आरोप जमकर लगाए गए. कई दिनों तक संसद में लगातार हंगामा किया गया, और कार्यवाही ठप्प रखी गई. अंततः मीडिया के दबाव में वाजपेयी जी ने फर्नांडीस को रक्षामंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के लिए राजी कर लिया. हालाँकि उस समय भी जॉर्ज फर्नांडीस ने संसद में अपने लिखित बयान में यह कहा था कि, “इस ताबूत खरीदी से उनका कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि जिस समय इन्हें खरीदने का फैसला हुआ, उस समय वे रक्षामंत्री थे ही नहीं और खरीद प्रक्रिया में उनका कोई दखल नहीं था. क्योंकि यह खरीद रक्षा सचिव के स्तर तक ही सीमित थी”. भारत और अमेरिका के राजदूतों ने भी एक प्रेस कांफ्रेंस में उन ताबूतों की वास्तविक कीमत वही बताई जिस भाव पर खरीदी की गई. परन्तु “काँग्रेस-मीडिया-NGO” का यह त्रिकोणीय गिरोह वाजपेयी सरकार के एक शक्तिशाली मंत्री की “बलि” आवश्यक समझता था, इसलिए इतना शोर मचाया गया कि देश की जनता भी इसे सच मानने लगी. अंततः जॉर्ज फर्नांडीस को बेआबरू होकर जाना ही पड़ा. 


इस घटना ने उनके बेदाग़ राजनैतिक करियर पर एक गहरा दाग लगा दिया और वे सदमे में चले गए. ताबूत घोटाले को लेकर सबसे पहली FIR यूपीए शासनकाल के दौरान 2006 में दायर की गई. जॉर्ज फर्नांडीस को सीबीआई, जाँच आयोग और जनहित याचिकाओं के माध्यम से लगातार परेशान किया जाता रहा. उस समय काँग्रेस (यूपीए) की ही सरकार थी, CBI भी काँग्रेस के दबाव में थी. लेकिन 2009 तक जॉर्ज फर्नांडीस के खिलाफ एक भी सबूत एकत्रित करने में नाकाम रही. अंततः CBI ने हथियार डाल दिए और विशेष सीबीआई कोर्ट ने जॉर्ज फर्नांडीस को बाइज्जत बरी कर दिया. लेकिन काँग्रेस में एक “डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेंट” (शातिर दिमागों और घटिया चालों का विभाग) भी है, वह इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था, पाले-पोसे हुए NGOs किस दिन काम आते. इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करवा दी गई, और यह मामला फिर से उलझा दिया गया. अंततः विगत 13 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने ताबूत घोटाले से सम्बन्धित सभी “जनहित”(??) याचिकाओं को बकवास और झूठा करार देते हुए उन्हें खारिज कर दिया और अपने निर्णय में कहा है कि “ताबूत घोटाला” नाम का कोई घोटाला हुआ ही नहीं है और इस तरह के झूठे मामलों में न्यायालय का समय बर्बाद नहीं किया जावे. परन्तु काँग्रेस को शर्म तो आती नहीं है, इसलिए उसकी तरफ से कोई सफाई आने का सवाल नहीं था. परन्तु देश का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया के रुख इस कथित घोटाले पर जैसा था, वह बेहद निराशाजनक और बिकाऊ किस्म का था. उल्लेखनीय है कि ताबूत घोटाले को सबसे पहले प्रमुखता से उठाने वाले थे “तहलका” के संपादक तरुण तेजपाल, जो आजकल यौन हिंसा के एक मामले में जमानत पर चल रहे हैं. खैर... यह तो था काँग्रेस को पड़ने वाला पहला तमाचा, परन्तु अफ़सोस यह रहा कि जॉर्ज फर्नांडीस इस समय “अल्ज़ईमर” रोग से पीड़ित हो चुके हैं और वे अपनी इस जीत पर कुछ कहने अथवा इसका आनंद लेने की स्थिति में नहीं हैं. 

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सुनवाई कर रही विशेष सीबीआई कोर्ट ने हाल ही में काँग्रेस के एक और घृणित षड्यंत्र का पर्दाफ़ाश किया. जैसा अब पूरा देश और दुनिया जानती है कि यूपीए शासनकाल में चरम पर पहुँच चुके भ्रष्टाचार में “लूट का सिरमौर” 2G स्पेक्ट्रम घोटाला रहा है. भारत की जनता और खजाने को सुव्यवस्थित रूप से चूना लगाने के इस “भ्रष्ट महाअभियान” में खरबों रूपए का हेर-फेर हुआ. 2G और कोयला घोटाला इन्हीं दो प्रमुख महाघोटालों की वजह से मनमोहन सिंह की छवि रसातल में पहुँची. परन्तु यूपीए सरकार के अंतिम वर्षों में केन्द्रीय मंत्री इतने अहंकारी और षडयंत्रकारी बन चुके थे कि सबसे पहले तो कपिल सिब्बल साहब “जीरो लॉस” नाम की नायाब थ्योरी खोज लाए. सिब्बल के अनुसार 2G कोई घोटाला ही नहीं था, और इससे सरकारी राजस्व को कतई कोई नुक्सान नहीं हुआ है. उन्होंने तो CAG विनोद राय को भी झूठा और बेईमान घोषित कर दिया था. लेकिन जब चारों तरफ से नए-नए खुलासे होने लगे, सुप्रीम कोर्ट से लताड़ पड़ने लगी और सिब्बल की जीरो लॉस थ्योरी खुद ही शून्य बन गई तब यूपीए के एक और शक्तिशाली मंत्री चिदंबरम ने अपने आकाओं के इशारे पर यह “अदभुत रचना” की, कि 2G घोटाला आज का नहीं है, बल्कि वाजपेयी सरकार के समय से चला आ रहा है. सोनिया गाँधी सहित सभी मंत्रियों ने विभिन्न प्रसार माध्यमों में आकर जोर-शोर से चीखना आरम्भ कर दिया कि वाजपेयी सरकार के समय प्रमोद महाजन और अरुण शौरी ने विभिन्न कंपनियों को मनमाने दामों पर स्पेक्ट्रम बेचकर देश का करोड़ों रूपए का नुक्सान किया है. देश की जनता को भ्रम में डालने और अपने अपराधों से हाथ धोने की इस कवायद में “काबिल वकील” कपिल सिब्बल और चिदंबरम ने काफी मदद की. यूपीए सरकार को लगा कि तीसरी बार भी वही सत्ता में आएगी, इसीलिए बड़ी बेशर्मी से यूपीए सरकार द्वारा एक झूठे और गढे हुए मामले को न्यायालय में ले जाया गया, ताकि वाजपेयी सरकार की छवि खराब करके स्वयं का राजनैतिक घाटा कम किया जा सके. 


चूँकि काँग्रेस के बुरे दिन अभी खत्म नहीं हुए हैं, इसीलिए अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट के विशेष जज ओपी सैनी ने यूपीए सरकार द्वारा दायर इस मामले को पूरी तरह खारिज करते हुए तत्कालीन दूरसंचार सचिव श्यामल घोष तथा भारती सेल्युलर, हचिंसन और वोडाफोन द्वारा सन 2002 में पूर्णतः वैध तरीके से हासिल किए गए स्पेक्ट्रम और उसकी प्रक्रिया को वाजिब ठहराया. न्यायाधीश ओपी सैनी ने 235 पृष्ठ के अपने फैसले में लिखा है कि “FIR एवं अन्य सबूतों को देखने पर साफ़ पता चलता है कि यह मामला राजनैतिक विद्वेष से दायर किया गया है. इसमें कोई तथ्य नहीं हैं और यह आरोप-पत्र पूर्णतः फर्जी और गढा हुआ प्रतीत होता है. तत्कालीन दूरसंचार मंत्री प्रमोद महाजन ने उस समय की परिस्थितियों के अनुसार एकदम सही निर्णय लिया था. न्यायाधीश ने सिब्बल-चिदंबरम की जोड़ी पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी करते हुए लिखा है कि “यह चार्जशीट बड़े ही योजनाबद्घ तरीके और इस सफाई से तैयार की गई है, मानो इन कंपनियों को अतिरिक्त स्पेक्ट्रम प्रदान करने के लिए अकेले प्रमोद महाजन ही जिम्मेदार हों”. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आने के बाद भाजपा के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने काँग्रेस और कपिल सिब्बल द्वारा देश से माफी की माँग की, जो “काँग्रेस के स्वभाव को देखते हुए” तत्काल खारिज भी हो गई, वैसे भी काँग्रेस पार्टी ने उनके दूरसंचार मंत्री ए.राजा के तमाम गुनाहों से पहले ही अपना पल्ला झाड़ रखा था. 

असल में कपिल सिब्बल साहब ने अपने एक चहेते रिटायर्ड जज शिवराज पाटिल को इस बात की जिम्मेदारी सौंपी थी कि, वे 1999 से 2002 के बीच हुए स्पेक्ट्रम आवंटन की सभी फाईलों में से कुछ न कुछ ऐसा खोज निकालें जिससे वाजपेयी सरकार और खासकर प्रमोद महाजन को कठघरे में खड़ा किया जा सके. उसी को आधार बनाकर मनगढंत कहानी के रूप में साक्ष्य प्रस्तुत किए गए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की निगरानी के कारण यह षड्यंत्र पकड़ में आ गया. श्यामल घोष, जो कि एक बेहद ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ अधिकारी माने जाते थे, उन्होंने हमेशा इस बात का खंडन किया कि तीनों दूरसंचार कंपनियों का उन पर कोई दबाव था अथवा प्रमोद महाजन से उनकी कोई साँठगाँठ थी. एक बार सर्वोच्च अदालत ने यूपीए सरकार के कार्यकाल में सीबीआई को “तोते” की संज्ञा दी थी, उसके पीछे कारण यही था कि अपने शासनकाल में यूपीए ने लगभग सभी संस्थाओं का ऐसा नाश कर दिया था, कि वे सिर्फ काँग्रेस की पालतू बनकर रह गई थीं. इसी “तोते” ने श्यामल घोष और एयरटेल, वोडाफोन तथा हचिंसन के बीच किए गए काल्पनिक भ्रष्टाचार की कुछ ऐसी कहानी रची, जिससे तोते के मालिक खुश हो जाएँ. जस्टिस ओपी सैनी ने सीबीआई अधिकारियों को लताड़ लगाते हुए पूछा कि, “इस कथित षड्यंत्र में षड्यंत्रकारी के रूप में सिर्फ श्यामल घोष का ही नाम क्यों है? षड्यंत्र के मामले में किसी एकल व्यक्ति के खिलाफ चार्जशीट कैसे दायर हो सकती है? और आरोपी कहाँ हैं? श्यामल घोष ने किसके साथ मिलकर यह षड्यंत्र रचा?”. यूपीए रचित झूठे कागजातों पर खड़ी सीबीआई के पास इसका कोई जवाब नहीं था. फटकार खाने के बाद तत्कालीन सीबीआई ने सुनील मित्तल, रवि रुईया और असीम घोष के नाम भी आरोप-पत्र में जोड़े, परन्तु कोई भी प्रामाणिक तथ्य नहीं होने की वजह से पहले सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अल्तमश कबीर ने इस नकली चार्जशीट पर स्थगन दे दिया और इसी वर्ष जनवरी 2015 में जस्टिस दत्तू की खंडपीठ ने तीनों कंपनियों के प्रमुखों के खिलाफ इस चार्जशीट को ही खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने वास्तविक न्याय करते हुए यूपीए शासनकाल के दौरान की गई इस झूठी और द्वेषपूर्ण कार्रवाई के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए तत्कालीन जाँच अधिकारी आरए यादव के खिलाफ जाँच का आदेश दिया है और न्यायालय का समय खराब करने और त्रुटिपूर्ण एवं बनावटी तथ्य पेश करने हेतु आलोचना करते हुए ईमानदार अधिकारियों को परेशान करने से बाज आने की सलाह दी है. अब उन सभी सीबीआई अधिकारियों के खिलाफ जाँच की जाएगी, जिन्होंने तत्कालीन काँग्रेस सरकार के दबाव में आकर नकली तथ्य पेश किए, झूठी कहानियाँ रचीं, परन्तु केन्द्रीय मंत्री अरुण जेटली ने महत्त्वपूर्ण सवाल उठाया है कि अधिकारियों के साथ-साथ उन काँग्रेस सरकार के उन मंत्रियों सिब्बल और चिदंबरम को भी कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए, जिन्होंने प्रमोद महाजन और वाजपेयी सरकार को बदनाम करने के लिए यह षड्यंत्र रचा. 


कहने का तात्पर्य यह है कि अपनी बदनामी और कुकर्मों को छिपाने के लिए काँग्रेस किस हद तक जा सकती है, यह मामला उसकी मिसाल है. पहले वाले मामले में बेचारे जॉर्ज फर्नांडीस अब अल्जाइमर से पीड़ित हैं, इसलिए ना तो वे अपनी जीत की खुशी मना सकते हैं और ना ही काँग्रेस के इस झूठ के खिलाफ कोई बयान दे सकते हैं. ठीक वही स्थिति प्रमोद महाजन की है, क्लीन चिट् मिलने से पहले ही उनकी मृत्यु हो चुकी है. परन्तु जिस मीडिया ने “ताबूत घोटाले” के समय फर्नांडीस और 2G मामले में प्रमोद महाजन की छवि खराब करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनकी चुप्पी के गहरे मायने हैं. सुप्रीम कोर्ट द्वारा काँग्रेस को मारे गए उक्त दोनों ही तमाचों की गूँज किसी भी चैनल पर सुनाई नहीं दी, यह बड़ा ही रहस्यमयी लगता है. 

धन्यवाद...

Tuesday, October 27, 2015

Sanjeev Bhatt and Congress Dirty Tricks (Part 2)

पर्दाफ़ाश होते काँग्रेसी षड्यंत्र और झूठ... (भाग..२) 


(पिछले भाग से जारी... पिछला भाग यहाँ क्लिक करके पढ़ें...) 

काँग्रेस के बुरे दिनों को जारी रखते हुए सबसे ताज़ा मामला, अर्थात काँग्रेस के मुँह पर पड़ने वाला “तीसरा तमाचा” रहा संजीव भट्ट केस. पाठकों को याद होगा कि गुजरात 2002 के दंगों के पश्चात नरेंद्र मोदी को घेरने के लिए काँग्रेस-NGOs-मीडिया गठबंधन के दो-तीन प्रमुख पोस्टर चेहरे हुआ करते थे, पहली थीं तीस्ता जावेद सीतलवाड, दूसरी थीं अहसान जाफरी की विधवा और तीसरे थे पुलिस अफसर संजीव भट्ट. इनमें से तीस्ता जावेद द्वारा पोषित NGOs को काँग्रेस सरकारों ने आर्थिक और नैतिक(??) मदद तो पहुँचाई ही, तीस्ता जावेद सीतलवाड को काँग्रेस ने पद्म पुरस्कार से भी सम्मानित कर दिया. पिछले वर्ष गुजरात दंगों को लेकर तीस्ता सीतलवाड के तमाम दस्तावेज कूटरचित एवं नकली पाए गए, तथा दंगों में पीड़ित मुस्लिमों के नाम पर तीस्ता ने अपने NGO के जरिए किस प्रकार लाखों रूपए की धोखाधड़ी की और नकली शपथ-पत्र पेश किए, उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तीस्ता और शबनम हाशमी के “NGOs गिरोह” को जमकर लताड़ लगाई थी. परन्तु संजीव भट्ट ने अपने इन “गुरुओं” की हालत से कोई सबक नहीं सीखा और वही गलतियाँ कीं जो उन्होंने की थीं. उल्लेखनीय है कि संजीव भट्ट IPS अधिकारी रहे हैं और हाल ही में उन्हें सेवा से बर्खास्त किया गया है. संजीव भट्ट की बर्खास्तगी को काँग्रेस ने “तानाशाही” और “लोकतंत्र की हत्या” निरूपित किया था, जबकि वास्तविकता यह है कि नरेंद्र मोदी को फाँसने के लिए काँग्रेस ने पहले दिन से ही संजीव भट्ट को मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया था. अब “ईनाम” स्वरूप संजीव भट्ट को काँग्रेस ने कितने रूपए दिए यह तो जाँच के बाद ही पता चलेगा, लेकिन संजीव भट्ट की पत्नी को चुनाव लड़ने के लिए काँग्रेस का टिकट और पार्टी फंड से चन्दा जरूर दिया था. तो ऐसे महानुभाव संजीव भट्ट जी ने नरेंद्र मोदी को दंगाई साबित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने यह शपथ पत्र दायर किया था कि पुलिस के आला अधिकारियों की जिस बैठक में “कथित रूप से” नरेंद्र मोदी ने यह कहा था कि, “हिंदुओं को अपना गुस्सा उतार लेने दो, दंगे हो जाने दो” उस बैठक में मैं अर्थात संजीव भट्ट खुद भी शामिल थे. यह शपथ पत्र और संजीव भट्ट की यह याचिका, गत माह सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी और भट्ट के दावे को पूरी तरह से नकली और मनगढंत बताया. 


चूँकि गुजरात दंगों से सम्बन्धित प्रत्येक मामले की जाँच एक विशेष SIT कर रही है जिसके प्रत्येक कदम पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी और सहमति है, उस SIT ने अपनी जाँच में पाया कि संजीव भट्ट के दावे न सिर्फ झूठ का पुलिंदा हैं, बल्कि उसने न्यायालय को गुमराह करने तथा तथ्यों-सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने में अपनी सारी सीमाएँ तोड़ दीं. गुजरात दंगों को “राज्य-प्रश्रय” आधारित बताने के चक्कर में संजीव भट्ट ने अपनी “गुरु माँ” अर्थात तीस्ता जावेद सीतलवाड़ का मार्ग अपनाया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में उसके द्वारा पेश नकली शपथ पत्रों और फर्जी ई-मेल की एक न चली. सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस महत्त्वपूर्ण निर्णय में संजीव भट्ट और NGOs गिरोह की जमकर खिंचाई की है. सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की विशेष बेंच इस बात से खासी नाराज थी, कि संजीव भट्ट ने जानबूझकर अपने राजनैतिक संपर्कों, अपने पुलिस अधिकारी होने के रसूख और NGOs साथियों के साथ मिलकर नरेंद्र मोदी को जबरन फाँसने की कोशिश की. सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि संजीव भट्ट और “नर्मदा बचाओ आंदोलन” के एक प्रमुख कार्यकर्ता के बीच जो ई-मेल का आदान-प्रदान हुआ है, उसमें संजीव भट्ट यह कहता हुआ पाया गया है कि “हमें ऐसी स्थिति पैदा करनी चाहिए जिससे SIT का काम करना मुश्किल हो जाए. कृपया दिल्ली स्थित अपने संचार संपर्कों और रायशुमारी बनाने वाली एजेंसियों को इस काम में लगाओ..”. फरवरी 2002 की उस शासकीय मीटिंग में संजीव भट्ट ने अपनी उपस्थिति सिद्ध करने के लिए ना सिर्फ फर्जी ई-मेल का सहारा लिया, बल्कि एक चतुर पुलिस अधिकारी की तरह जानबूझकर कोर्ट में आधे-अधूरे साक्ष्य प्रस्तुत किए. सुप्रीम कोर्ट ने भट्ट के वकील से पूछा कि “संजीव भट्ट को 2011 में इतने वर्ष के बाद ऐसे संवेदनशील और विस्फोटक आरोप करने की याद क्यों आई? यह बात भट्ट ने पहले SIT को क्यों नहीं बताई?”. 


संजीव भट्ट शुरू से गुजरात में काँग्रेस के मोहरे और नरेंद्र मोदी विरोधियों के पसंदीदा चेहरे रहे हैं. हाल ही में एक सोशल मीडिया पर एक ऑडियो क्लिप जारी हुई थी, जिसमें संजीव भट्ट अर्जुन मोधवाडिया से पूछ रहे हैं कि “मेरा ब्लैकबेरी फोन अभी तक मुझे नहीं मिला है, कब पहुँचाओगे? और जिस ईनाम की बात हुई थी, वह कहाँ है?”. सुप्रीम कोर्ट ने अपनी जाँच में यह भी पाया कि IPS होने का दबाव डालकर संजीव भट्ट ने गुजरात दंगों के एक प्रमुख गवाह हवलदार केडी पंत को भी धमकाने और उस पर अपने पक्ष में बयान देने के लिए दबाव बनाया था. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी होने तथा सिस्टम से परिचित होने के कारण ही 25 मार्च 2011 को संजीव भट्ट ने यह दबाव बनाया था कि हवलदार पंत की पूछताछ उसके सामने की जाए, लेकिन मामला SIT के हाथ में होने के कारण उसकी दाल नहीं गली. 



1990 से ही संजीव भट्ट और एक निलंबित जज आरके जैन की साँठगाँठ के कई आपराधिक मामले विभाग के अधिकारियों की जानकारी में थे. भट्ट नारकोटिक्स विभाग में होने के कारण कई मासूमों को धमकाने का काम कर चुका था, और SIT ने अपनी जाँच में पाया कि नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने से पहले ही संजीव भट्ट पर ब्लैकमेलिंग के कई मामले विभिन्न थानों में दर्ज थे, परन्तु IPS होने की धौंस, जजों से पहचान तथा NGOs के लोगों द्वारा दबाव बनाकर खुद को “पीड़ित” दर्शाने की उसकी चालबाजी पुरानी थी. लेकिन ज्यादा चतुर बनने के चक्कर में खुद अपने ही बिछाए जाल में फंसते हुए संजीव भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट में जिन ई-मेल को तथ्य-सबूत कहते हुए पेश किया था, उससे यह भी सिद्ध हो गया कि संजीव भट्ट ने तत्कालीन अतिरिक्त एडवोकेट जनरल श्री तुषार मेहता का ई-मेल अकाउंट भी हैक किया था, ताकि इस मामले में चल रही अंदरूनी जानकारी एवं पत्राचार के बारे में ख़ुफ़िया ख़बरें हासिल की जा सकें. संजीव भट्ट को बर्खास्त करने के लिए इतने कारण पर्याप्त थे, लेकिन काँग्रेस को यह सब रास नहीं आ रहा था. बर्खास्तगी के बाद राशिद अल्वी ने बयान दिया कि “नरेंद्र मोदी के शासन में अफसरशाही पर दबाव बनाया जा रहा है और भट्ट जैसे पुलिस अधिकारियों के खिलाफ बदले की भावना से काम किया जा रहा है”. हालाँकि अल्वी सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों और SIT की जाँच के बारे में कुछ भी कहने से बचते रहे. सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि संजीव भट्ट ने इस मामले को खामख्वाह सनसनीखेज बनाने के लिए झूठे तथ्यों एवं नकली शपथ-पत्रों का सहारा लिया, और न्यायालय को प्रभावित करने के लिए अपने मीडियाई संपर्कों, NGOs गिरोह और “एक विपक्षी राजनैतिक पार्टी” का सहारा लिया. नरेंद्र मोदी के खिलाफ याचिका को खारिज करते हुए न्यायालय ने संजीव भट्ट पर आगे कार्रवाई जारी रखने के भी निर्देश दिए. परिणाम यह हुआ है कि मोदी-भाजपा-संघ को फाँसने के चक्कर में “सत्य की ताकत” के कारण काँग्रेस का यह मोहरा भी पिट गया है, लेकिन फिर भी मीडिया में इस मामले की कोई विशेष चर्चा नहीं होना बड़ा रहस्यमयी है. 

इस प्रकार सितम्बर-अक्टूबर 2015 के दो माह में ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा काँग्रेस पार्टी और उसके काले कारनामों एवं षडयंत्र की पोल खोलते हुए जिस तरह लगातार निर्णय आए हैं, उसने काँग्रेस को सन्निपात की अवस्था में धकेल दिया है. चूँकि मीडिया-NGOs और काँग्रेस का बहुत पुराना गठबंधन है, इसलिए इन जॉर्ज फर्नांडीस, प्रमोद महाजन और संजीव भट्ट इन तीनों ही मामलों को लगभग नगण्य कवरेज मिला और आम जनता से यह सच बड़ी सफाई से छिपा लिया गया और उसे जानबूझकर बीफ-गौमांस-साहित्य अकादमी जैसे फालतू विवादों में उलझाए रखा गया है. हालाँकि इन तमाम हथकण्डों के बावजूद काँग्रेस की मुश्किलें अभी कम होने वाली नहीं हैं, बल्कि और बढ़ने वाली ही हैं, क्योंकि जल्दी ही सोनिया गाँधी और काँग्रेस पर “नेशनल हेराल्ड” अखबार की संपत्ति हथियाकर उसे पारिवारिक स्वरूप देने के मामले में भी न्यायालयीन केस तेजी से आगे बढ़ेगा. इसके अलावा हाल ही में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के परिजनों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर उनकी रहस्यमयी मृत्यु से सम्बन्धित सभी गुप्त दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की जो माँग की थी, वह न सिर्फ प्रधानमंत्री द्वारा मान ली गई है, बल्कि 23 जनवरी 2016 की तारीख भी घोषित की गई है, जिसके बाद केन्द्र सरकार के पास नेहरू-बोस-पटेल से सम्बन्धित जो भी दस्तावेज हैं उन्हें सार्वजनिक कर दिया जाएगा. इस दिशा में तत्काल पहला कदम बढ़ाते हुए केन्द्र सरकार ने रूस और जापान की सरकारों से सुभाषचंद्र बोस से सम्बन्धित सभी दस्तावेजों की माँग की है. अर्थात 23 जनवरी 2016 के बाद काँग्रेस के लिए “एक और बुरा सपना” आरम्भ होने की पूरी उम्मीद है. 

बहरहाल... आगे बढ़ते हैं और संक्षिप्त में एक और मुद्दा समझने की कोशिश करते हैं, वह मुद्दा है देश के कुछ साहित्यकारों की संवेदनशीलता का “अचानक” जागृत होना. पिछले कुछ दिनों में खासकर दादरी की घटना के बाद देश के कुछ चुनिंदा साहित्यकारों की आत्मा अचानक जागृत हो गई है. 1975 के आपातकाल के बाद अब जाकर कुछ साहित्यकारों को “अचानक” अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की याद आने लगी है... कुछ कथित साहित्यकार तो अचानक इतने आहत हो गए हैं कि उन्हें यह देश डूबता नज़र आने लगा है. जबकि ऐसा कुछ नहीं हुआ है. जैसा कि मैंने ऊपर बताया, नरेंद्र मोदी की सरकार को बदनाम करने और भारत की छवि को विदेशों में धूमिल करने के लिए “एक समूचा NGOs गिरोह” काम कर रहा है, जिसे मिशनरी पोषित मीडिया और काँग्रेस का पूर्ण समर्थन हासिल है. कुछ मामूली से तथ्यों पर गौर करें... अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के दाभोलकर की हत्या हुई महाराष्ट्र में, उस समय वहाँ NCP-काँग्रेस की सरकार थी, चव्हाण मुख्यमंत्री थे... लेकिन उस समय किसी साहित्यकार ने ना तो पृथ्वीराज चव्हाण का इस्तीफा माँगा और ना ही उनकी अंतरात्मा जागृत हुई. कर्नाटक में काँग्रेस शासन के अंतर्गत साहित्यकार कल्बुर्गी की हत्या हुई, परन्तु साहित्य अकादमी से सम्मानित किसी भी लेखक को उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुहावरा याद नहीं आया. इसी प्रकार दादरी में इखलाक की जो हत्या हुई, वह स्पष्ट रूप से क़ानून-व्यवस्था का मामला था जो कि राज्य सरकार के अधीन होता है. परन्तु किसी भी संवेदनशील(??) कवि या शायर ने अखिलेश यादव से इस्तीफ़ा नहीं माँगा.... क्या कभी इस बात पर विचार हुआ है कि हर बार ऐसा क्यों होता है कि पिछले 18 माह में देश में कहीं भी दूरदराज कोई भी घटना होती है तो तत्काल हमारा मीडिया और कुछ “संगठन” अचानक नरेंद्र मोदी जवाब दें, नरेंद्र मोदी इस्तीफ़ा दें की टेर लगाने लगते हैं?? साहित्य अकादमी द्वारा अज्ञात कारणों के लिए पुरस्कृत कुछ तथाकथित साहित्यकार (जिनमें से कुछ की रचनाएँ तो विशुद्ध कूड़ा हैं) विदेशी संचार माध्यमों तथा NGOs के बहकावे में आकर सम्मान-पुरस्कार लौटाने का जो कदम उठा रहे हैं, यह उन्हीं को हास्यास्पद बना रहा है. ऐसा इसलिए, क्योंकि इनकी आत्मा-अंतरात्मा-संवेदनशीलता वगैरह जो भी है वह बड़े दोहरे मापदण्ड लिए हुए और वैचारिक पाखण्ड से भरी हुई है... चंद उदाहरण देखें... 

१) नेहरू की भांजी नयनतारा सहगल को जब साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया, उस समय अर्थात 1984 में दिल्ली जैसे स्थान पर 3000 से अधिक सिखों की हत्या उन्हीं की पसंदीदा पार्टी के लोगों (HKL भगत, सज्जन कुमार, जगदीश टाईटलर) द्वारा की गई थी. कुछ माह बाद ही सहगल को यह सम्मान दिया गया, जिसे उनहोंने खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया... 

२) 1990 के उन काले दिनों में जब कश्मीर से बाकायदा आव्हान करके पंडितों को मारा-खदेड़ा जा रहा था, कश्मीर से लाखों शरणार्थी अपने ही देश में शरण लेने के लिए मजबूर हो रहे थे उस समय शशि देशपांडे नाम की लेखिका को मानवाधिकार और असहिष्णुता नज़र नहीं आ रही थी. उन्होंने भी उस समय अकादमी पुरस्कार डकार लिया. 


३) केरल की एक वामपंथी लेखिका हैं सारा जोसफ (आजकल आम आदमी पार्टी की केरल संस्थापक हैं), इनका मामला तो और भी मजेदार है. आज मोदी और भाजपा को जमकर कोसने वाली इन लेखिका को गुजरात दंगों अर्थात 2002 के बाद तत्कालीन भाजपा सरकार के हाथों ही साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था, तब उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, बढ़ती हुई साम्प्रदायिकता जैसे नुमाईशी वाक्य याद नहीं आ रहे थे... 

४) एक और सज्जन हैं अशोक वाजपेयी साहब. ये साहब अर्जुन सिंह के खासुलखास हुआ करते थे. जिस समय मध्यप्रदेश में अर्जुन सिंह की तूती बोलती थी, उस समय प्रदेश के साँस्कृतिक परिदृश्य पर वाजपेयी साहब का एकाधिकार और कब्ज़ा था. इन्हीं के एक हमकदम साहित्यकार उदय प्रकाश तो अशोक वाजपेयी को सरेआम “पावर ब्रोकर” (सत्ता के दलाल) घोषित कर चुके हैं. ऐसे महान सज्जन अशोक वाजपेयी जी को जब यह बताया गया कि भोपाल में भीषण गैस काण्ड हुआ है, हजारों लोग मारे गए हैं तो आगामी दिनों में होने वाले साहित्य-नाटक सम्मेलन स्थगित कर दिए जाने चाहिए. तब वाजपेयी जी का जवाब था, “मुर्दों के साथ मरा नहीं करते, कार्यक्रम तो होगा”. ऐसी होती है लेखकीय संवेदनशीलता. 

गत वर्ष अक्टूबर 2014 में काँग्रेस शासित कर्नाटक में बंगलौर के पास एक “जीवदया समिति कार्यकर्ता” को मुस्लिमों की भीड़ ने पीट-पीटकर अधमरा कर दिया था, उसका दोष सिर्फ इतना था कि वह गौ-हत्या विरोधी कुछ पुस्तकें बाँट रहा था... इसी प्रकार सितम्बर 2014 में भोपाल में पशुओं के लिए काम करने वाली प्रसिद्ध संस्था PETA की एक मुस्लिम मोहतरमा की मुस्लिमों द्वारा ही जमकर पिटाई की गई, क्योंकि वह “शाकाहारी बकरीद” बनाने की अपील कर रही थी, और इन सभी के ऊपर हैं तस्लीमा नसरीन.. जब हैदराबाद में AIMIM के कार्यकताओं ने तस्लीमा पर हमला किया, उस समय यह पुरस्कार सम्मान लौटाने की नौटंकी करने वाला “लेखक-कवि गिरोह” अपने मुँह में दही जमाकर बैठ गया था

ये तो सिर्फ चंद ही उदाहरण हैं, यदि पुरस्कार लौटाने वाले प्रत्येक साहित्यकार की पृष्ठभूमि और उनके कार्यकलापों पर नज़र घुमाई जाए तो साफ़-साफ़ दिखाई देगा कि “अधिकाँश” (सभी नहीं, अधिकाँश) लेखकों, साहित्यकारों को जो भी सम्मान-पुरस्कार आदि मिले हैं वह सत्ता की नज़दीकी, परिवार और पार्टी विशेष की चापलूसी के कारण ही मिले हैं, और इनमें से बहुत सारे लेखक-साहित्यकार-कवि किसी न किसी NGO से जरूर जुड़े हैं. जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, उसने NGOs का टेंटुआ दबाना शुरू किया है, ग्रीनपीस और फोर्ड फाउन्डेशन जैसे बड़े मगरमच्छों पर लगाम की कार्रवाई आरम्भ की है, तभी से यह “गिरोह” बेचैन है. पिछले अठारह माह में इनका काम यही रह गया है कि येन-केन-प्रकारेण नरेंद्र मोदी सरकार को किसी न किसी “अ-मुद्दे” में उलझाए रखना, भारत को विदेशों में बदनाम करने के लिए नित-नए षड्यंत्र रचना, अपने पालतू मीडिया चैनलों के सहारे सिर्फ वही नकारात्मक ख़बरें दिखाना जिसमें सरकार की आलोचना का मौका मिले. इस गिरोह को केन्द्र सरकार की एक भी बात सकारात्मक नहीं दिखाई देती. चूँकि काँग्रेस के पास खोने के लिए तो अब कुछ बचा ही नहीं, इसलिए अपने “मोदी-द्वेष” के कारण खुल्लमखुल्ला इस खेल में शामिल है. काँग्रेस ने पिछले साठ वर्ष में प्रशासनिक स्तर पर, अकादमिक स्तर पर, मीडियाई स्तर पर एवं NGOs के स्तर पर जो नेटवर्क खड़ा किया है, उसे अब पूरी तरह सरकार के खिलाफ “एक्टिव” कर दिया गया है. इसीलिए संजीव भट्ट जैसे “आपराधिक पुलसिए” को भी आराम से NGOs में शरण मिल जाती है तथा जॉर्ज फर्नांडीस अथवा प्रमोद महाजन को क्लीन चिट् मिलने की ख़बरें भी बड़े आराम से चुपचाप दबा ली जाती हैं. हालाँकि यह बेचैनी बेवजह नहीं है, क्योंकि यह “गिरोह” जानता है कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह और अजित डोभाल जैसे लोग इनका क्या हश्र कर सकते हैं... सिर्फ समय की बात है. 

Saturday, October 24, 2015

Why Ganesh Devy Returned Sahitya Akademi Award

प्रोफ़ेसर गणेश देवी ने साहित्य अकादमी सम्मान क्यों लौटाया?? 


आजकल देश के साहित्यकारों-लेखकों में सम्मान-पुरस्कार लौटाने की होड़ बची हुई है. बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में देश को यह बताने की कोशिश की जा रही है कि भारत में “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में है”, “लेखकों को दबाया जा रहा है”, “कलम को रोका जा रहा है”... आदि-आदि-आदि. इस सम्मान लौटाने की नौटंकी के बाद कम से कम देश को यह तो पता चला कि “अच्छा!!! इसे भी पुरस्कार मिला हुआ है??”, “अच्छा!!! इसे कब सम्मान मिल गया, लिखता तो दो कौड़ी का भी नहीं है..”. साथ ही इसी बहाने ऐसे सभी सम्मान पुरस्कार लौटाऊ साहित्यकारों की “पोलमपोल” लगातार खुलती जा रही है. इसी कड़ी में एक नाम है वडोदरा के सयाजीराव विवि के भूतपूर्व प्रोफेसर गणेश देवी साहब का... 



गणेश देवी को भी साहित्य अकादमी सम्मान मिला हुआ है, और आपको भले ही जानकारी नहीं हो गणेश देवी साहब को कोई पद्म पुरस्कार भी मिला हुआ है. गणेश देवी ने सिर्फ साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया है, पद्म पुरस्कार नहीं लौटाया... और अकादमी पुरस्कारों के साथ मिली हुई मोटी राशि मय ब्याज तो लौटाने के बारे में सोचा भी नहीं है. बहरहाल, अब जैसी कि “परंपरा” है, उसी के अनुसार गणेश देवी साहब का एक NGO भी है. NGO का नाम है “भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर”, बताते हैं कि इस NGO के तहत देवी साहब भारतीय भाषाओं पर काम करते हैं. गणेश देवी साहब प्रभावशाली और अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त लेखक बताए जाते हैं, इसलिए इनका यह NGO विदेशों से भी अनुदान एवं सहायता प्राप्त करता है (यह भी उसी परंपरा का ही एक अंग है). पिछले आठ वर्षों से इनके NGO “भाषा” को लगातार मोटी रकम विदेशों से अनुदान के रूप में प्राप्त होती रही है... लेकिन NGO के बही-खाते के अनुसार इस वर्ष, अर्थात नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद, अर्थात 2014-15 में... अर्थात नरेंद्र मोदी द्वारा विदेशी फोर्ड फाउन्डेशन जैसे संदिग्ध दानदाताओं की नकेल कसने तथा NGOs के खातों एवं खर्चों को अपडेट रखने के निर्देश देने के बाद से इन्हें सिर्फ और सिर्फ 31 लाख रूपए का ही चंदा मिला... “सिर्फ” 31 लाख?? जी हाँ, 31 लाख जैसी मोटी रकम को मैंने “सिर्फ” क्यों लिखा, यह आप जल्दी ही समझ जाएँगे. 

2014-15 के खातों के अनुसार गणेश देवी साहब के NGO को "सिर्फ" 31 लाख रूपए मिले... 

जबकि 2013-14 में “भाषाओं के उत्थान” के लिए इस NGO को एक करोड़ चौबीस लाख रूपए मिले थे, जिसमें से 56 लाख रूपए तो अकेले फोर्ड फाउन्डेशन ने दिए थे... 

उससे पहले 2012-13 में गणेश देवी साहब को एक करोड़ नब्बे लाख रूपए का चन्दा मिला था, इस रकम में भी 55 लाख रूपए फोर्ड फाउन्डेशन ने दिए थे, जबकि नीदरलैंड के एक और संदिग्ध दानदाता ने भी खासी मोटी रकम दान में दी थी... 

सन 2011-12 के रिकॉर्ड के अनुसार देवी साहब के NGO को एक करोड़ 67 लाख रूपए मिले, जिसमें से 42 लाख रूपए फोर्ड फाउन्डेशन ने दिए थे. इसके अलावा “एक्शन होम्स, जर्मनी” ने भी एक मोटी रकम दी है. 

सन 2010-11 में चन्दे की रकम एक करोड़ 99 लाख रूपए तक पहुँची थी. इसमें से लगभग 45 लाख रूपए फोर्ड फाउन्डेशन ने, जबकि 50 लाख रूपए का दान “कैथोलिक रिलीफ सर्विस” नामक संस्था ने दिए थे. 

सन 2009-10 में गणेश देवी साहब को विदेशों से दो करोड़ चौबीस लाख रूपए मिले. इसमें फोर्ड फाउन्डेशन ने 56 लाख रूपए दिए, फ्रांस की एक संस्था ने 66 लाख रूपए वोकेशनल ट्रेनिंग, मोटर रिपेयरिंग, कंप्यूटर खरीदी आदि के लिए दिए, जबकि कैथोलिक रिलीफ सर्विस ने सेमिनार आयोजित करने के लिए सात लाख रूपए दिए थे

सन 2008-09 में देवी साहब के NGO को एक करोड़ 55 लाख रूपए मिले थे, जिसमें से 25 लाख फोर्ड फाउन्डेशन ने, जबकि अमेरिका की “एक्शन एड” नामक संस्था ने 46 लाख रूपए का चंदा दिया (सनद रहे कि “एक्शन एड” वही संस्था है, जिसने नर्मदा बचाओ आंदोलन और अरविन्द केजरीवाल के NGO को भी मोटी रकम प्रदान की थी). 

सन 2007-08 में NGO “भाषा” ने एक करोड़ 15 लाख का दान हासिल किया था, जिसमें फोर्ड फाउन्डेशन ने दो किस्तों में 25 लाख और 27 लाख की रकम प्रदान की थी. 

कहने का तात्पर्य यह है कि पिछले आठ साल से लगातार गणेश देवी साहब को विदेशों से एक करोड़, सवा करोड़, डेढ़ करोड़, दो करोड़ जैसे मोटे-मोटे चन्दे मिल रहे थे (भगवान जाने इस रकम का कितना, कैसा और कहाँ उपयोग उन्होंने किया होगा?)... लेकिन बुरा हो नरेंद्र मोदी का, जिनके आने के बाद इसी वर्ष उन्हें “सिर्फ और सिर्फ” 31 लाख रूपए का चन्दा ही मिल पाया, जिसमें फोर्ड फाउन्डेशन ने फूटी कौड़ी भी नहीं दी... 

अब बताईये, ऐसे माहौल में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाना बनता है कि नहीं?? मोदी ने कुछ साहित्यकारों(??) को ऐसी गरीबी और भुखमरी की स्थिति में ला पटका है, कि वे क्या तो साहित्य रचें, क्या तो भाषा के लिए काम करें और क्या तो खर्चा-पानी चलाएँ और क्या सेमीनार करें?? ज़ाहिर है कि चन्दे में भारी कमी से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में आनी ही थी, फोर्ड फाउन्डेशन को “तड़ीपार” करने से लोकतंत्र का गला घुटना ही है... इससे अच्छा है कि “स्वामिभक्ति” दिखाते हुए पुरस्कार ही लौटा दिया जाए, कम से कम “दानदाताओं” की निगाह में छवि तो बनी रहेगी और देश की जनता भी यह जान लेगी कि वे “सम्मानित बुद्धिजीवी” हैं... 

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नोट :- सभी आँकड़े FCRA (Foreign Contribution Regulatory Act) की वेबसाईट एवं deshgujrat.com के सौजन्य से... 

Friday, October 16, 2015

Anuradha of Andaman - Wonderful and Stunning

अंडमान की "द्वीपशिखा" अनुराधा... 


मूल मराठी लेख श्री विक्रम श्रीराम एडके के सौजन्य से... 
(हिन्दी अनुवाद – सुरेश चिपलूणकर) 

पोर्ट ब्लेयर से मात्र दस मिनट की दूरी पर एक द्वीप है, जिसका नाम है “रौस द्वीप”. एक ब्रिटिश खलासी डेनियल रौस के नाम पर इस द्वीप का नामकरण किए गया था. उस द्वीप पर एक देवी रहती हैं, जिसका नाम है “अनुराधा”. लेकिन मैं आपको इस अनुराधा की कहानी क्यों सुना रहा हूँ? आखिर अनुराधा में ऐसा क्या खास है? यदि सरल शब्दों में कहूँ तो अनुराधा अंडमान की सबसे महत्त्वपूर्ण बात है. जिस तरह से स्वच्छ समुद्र किनारों और सेल्युलर जेल के बिना अंडमान का इतिहास नहीं बताया जा सकता, उससे भी महत्त्वपूर्ण है अनुराधा

अनुराधा के पिता रौस द्वीप के ही निवासी थे. उनकी मृत्यु के पश्चात जब अनुराधा इस द्वीप पर रहने आई, उस समय उनकी आयु मात्र तीन वर्ष थी. उन दिनों इस द्वीप पर खरगोश, हिरन, मोर, बुलबुल आदि पशु-पक्षियों की भरमार थी. परन्तु शासकीय कर्मचारी गाहे-बगाहे द्वीप पर आते, जानवरों का शिकार करते और पेड़ों को काटकर लकडियाँ ले जाते. जब भी कोई नेता या बड़ा अफसर अंडमान के दौरे पर आता तो हिरन का शिकार करके माँस की पार्टी की जाती. धीरे-धीरे इस द्वीप पर गिने-चुने प्राणी ही बच गए, वे भी ज़ख़्मी हालत में और भूखे-प्यासे. अनुराधा नाम की यह बच्ची चुपचाप सब देखती रहती और चिढती. एक बार उसने उन क्रूर सरकारी कर्मचारियों को रोकने का प्रयास भी किया, लेकिन उन्होंने अनुराधा को जमकर पीटा. बस उसी दिन से अनुराधा ने किसी भी व्यक्ति से बातचीत करना बन्द कर दिया. उसी द्वीप पर रहने वाले एक मछुआरे की सहानुभूति अनुराधा के साथ थी. उस बच्ची की दोस्ती उस मछुआरे से हो गई. यह छोटी सी बच्ची दिन भर उस मछुआरे के कन्धों पर चढ़कर पेड़ों के पत्ते तोड़कर दिन भर इधर-उधर भटकते हुए उन जानवरों को खिलाती. बिलकुल रोज़ाना नियम से वह जानवरों को पत्तियाँ-फल खिलाती. जहाज़ों से आने वाले खलासी अनुराधा को पागल समझने लगे. जब भी कोई अनुराधा से बात करने की कोशिश करता, तो वह पत्थर लेकर मारने दौडती. ऐसा करने से लोगों ने अनुराधा को पूरा पागल समझ लिया


अनुराधा की यह दिनचर्या एक-दो वर्ष नहीं, पूरे बीस वर्ष तक चली. यह बीस वर्ष उसके जीवन के बेहद संघर्षमयी और कठोर थे. इन वर्षों में उसने कई लोगों के हाथों दर्जनों बार जमकर पिटाई खाई, एक-दो बार उसकी पसलियाँ भी टूटीं. इन बीस वर्षों में अनुराधा ने क्या कमाया?? अनुराधा की इस “एकल तपस्या” के कारण जिस द्वीप पर सिर्फ गिनती के जानवर बचे रह गए थे, आज उन प्राणियों की संख्या हजार से ऊपर हो गई है. 1987 में इस द्वीप को भारतीय सेना ने अपने कब्जे में ले लिया, और इसी के साथ अनुराधा के कष्ट भरे दिन समाप्त हुए. भारतीय सेना ने न सिर्फ अनुराधा की समस्त योजनाओं और कल्पनाओं को ध्यान से सुना, बल्कि मदद भी की. सिर्फ और सिर्फ अनुराधा के कारण यह द्वीप और इसकी प्रकृति एवं इसका पारिस्थितिकी संतुलन बचा रहा. आज अनुराधा 51 वर्ष की हो चुकी हैं और वे यहाँ की आधिकारिक स्थलदर्शी (यानी गाईड) हैं... और सबसे लोकप्रिय गाईड हैं. लेकिन अनुराधा की कहानी यहीं पर समाप्त नहीं हुई है... 

जब हम अनुराधा से भेंट करने रौस द्वीप पहुँचे तो वे इस द्वीप के इतिहास और प्रकृति के बारे में जानकारी देने लगीं. इतने में एक हिरन दिखाई दिया, उसे देखते ही अनुराधा ने जोर से पुकारा, “ए राजू... इधर आ”. हमारे आश्चर्य की उस समय सीमा नहीं थी, जब वह हिरन इतने सारे मनुष्यों की भीड़ के बावजूद चुपचाप अनुराधा के पास आकर खड़ा हो गया. अनुराधा उस हिरन से बातें करने लगी. सभी पर्यटक अनुराधा के साथ-साथ आगे चलने लगे और समूह बढ़ता गया. हमारे समूह में हिरन तो थे ही, खरगोश और मोर भी आए, कुछ पक्षी भी आए... अनुराधा उन सभी से आराम से बात करते चली जा रही थीं. जिस प्रकार हम अपने मित्रों-रिश्तेदारों के बारे में बताते हैं, ठीक वैसे ही अनुराधा उन पशु-पक्षियों की आदतों और स्वभाव के बारे में हमें बताने लगी. चलते-चलते बीच में ही उसने एक मोरनी को आवाज़ दी, “रेशमा, तेरा बच्चा तो बीमार था ना? किधर है दिखा?” और वह मोरनी अपने बच्चे को लेकर आई. अनुराधा ने मोर के बच्चे को टटोलकर देखा और कहा, “अरे? यह तो ज़ख़्मी है, जा उस वाले पेड़ के पत्ते का रस लगा दे”... घोर आश्चर्य कि सचमुच वह मोरनी इंगित पेड़ के पास गई और उसके पत्ते चबाने लगी. अचानक हमारी भीड़ के सिर के ऊपर से बुलबुलों का एक बड़ा सा झुण्ड उड़ता हुआ निकला. अनुराधा ने उन्हें भी एक विशिष्ट आवाज़ देकर बुलाया. कुछ पक्षी हमारे आजू-बाजू एकत्रित हो गए. फिर से अनुराधा ने कहा “जाओ, जा के बाकी दोस्तों को भी बुला लाओ, उनसे कहो अम्मा बुला रही है”. तत्काल दो पक्षी उड़े और आसपास से लगभग डेढ़ सौ बुलबुलों को लेकर आए. सारे पक्षी चुपचाप बैठे रहे तब अनुराधा ने उनसे कहा, “अभी ये नए लोग हैं, इन्होंने तुम्हें कभी नजदीक से देखा नहीं है... ये लोग तुम्हारे फोटो लेंगे, डरना नहीं हँ...” और तमाम देशी-विदेशी पर्यटकों को चमत्कृत करते हुए हम ने सभी पक्षियों को आराम से छुआ और एकदम पास से उनकी फोटो खींची. 

ऐसी हैं अंडमान की अनुराधा, जितने पशु-पक्षी उसके आसपास मंडरा रहे थे, उनमें से किसी को भी उसने कोई प्रशिक्षण नहीं दिया है. परन्तु उनका आपसी “पारिवारिक बंधन” इतना मजबूत है कि वह उनकी भाषा समझती है और वे जानवर भी इसकी हिन्दी-अंग्रेजी समझ लेते हैं. सुनामी में अनुराधा का पूरा परिवार खत्म हो गया, तब से यही मोर-हिरन-खरगोश-बुलबुल ही उसका परिवार हैं. कम से कम पच्चीस बार ऐसा हुआ है कि इन पशु-पक्षियों को बचाने के लिए अनुराधा ने अपने प्राण खतरे में डाले हैं और अक्सर घायल हुई हैं. अनुराधा के कई ऑपरेशन हो चुके हैं, परन्तु उनकी इस दिनचर्या में एक दिन का भी खलल नहीं आया. 

मैंने पूछा, “इतनी खराब तबियत के बावजूद आप यह कैसे कर लेती हैं?”

अनुराधा बोलीं – “वो जो ऊपर बैठा है ना, उससे मेरा बहुत बड़ा झगड़ा चल रहा है. मैंने उसे बोल दिया है कि अगर ये जानवर जिन्दा रखने हैं, तो मुझे मेरे पैरों पर खड़ा रहने दे, वर्ना बेशक मार दे मुझे... मेरा क्या है? आगे-पीछे कोई रोनेवाला नहीं है. मगर इन बेजुबानों का कोई नहीं है मेरे सिवा. बस तब से भगवान मुझे मारता नहीं... बचा ही लेता है कैसे भी..” 

वहाँ से निकलते समय हमने उसे पाँच सौ रूपए दिए तो उसने थैंक्यू बोलकर चुपचाप रख लिए. हमारी देखादेखी, अन्य लोग भी उसे कुछ न कुछ देने लगे, तो उसने किसी से एक रुपया भी नहीं लिया, बोली – “इतने ज्यादा पैसे मैं नहीं ले सकती, पाँच सौ काफी हैं मेरे लिए.” कई बार तो मैं टूरिस्टों से पैसा लेती भी नहीं, हाँ, लेकिन कोई एमपी-एमेले आए तो छोडती नहीं साले को. गाईड बनके मनमर्जी के पैसे वसूल करती हूँ. हरामी रोज लूटते हैं हमें, कभी तो उनकी भी जेब ढीली करूँ..”  

पिछले महीने वो तुम्हारे ठाकरे का बच्चा आया था मुझसे मिलने के वास्ते... उसके पहले ही उसका PA आ धमका मेरे पास. बोलने लगा कि, - सुना है तुम किसी भी मिनिस्टर और पॉलिटिशियन को जो मन में आए बोल देती हो? हमारे साहब के सामने ऐसा मत करना हाँ!... मैं बोली, क्यूँ ना करु? अगर वह कुछ ग़लत बोलेगा तो मैं उसे नहीं छोडूँगी! बाद में जब उसका साहब आया तो मैंने उससे पूछा, तेरा पीए ऐसा बोल रहा था. तो वह बत्तीस दाँत दिखा के हँसने लगा! बोला, नहीं अम्मा जो तुमको ठीक लगे वहीं बोलो. छोडा नहीं मैंने उसको भी... 

अपने जीवन के भूतकाल की कटु यादों के कारण अनुराधा सभी राजनेताओं की बातों पर उखड़ जाती है. हालाँकि वह एकदम मुंहफट है, परन्तु फिर भी एक व्यक्ति के लिए उसके मन में अगाध श्रद्धा भरी है. महाराष्ट्र से हजारों किमी दूर रहते हुए भी अनुराधा हमें बता रही थीं, कि – “जब दुनिया का अंत होता है ना, तब नई संस्कृति पनपती है... वे लोग जमीन खोदते हैं तो पिछली सभ्यता के कुछ बर्तन मिलते हैं, मूर्तियां मिलती हैं... वो लोग उन्हीं को भगवान मानकर पूजा करने लगते हैं. जब हमारी नस्ल खत्म हो जाएगी ना, तब आनेवाली नस्ल भी ऐसी ही खुदाई करेगी. उस मिट्टी से पता है कौन सा भगवान निकलेगा?? उस मिट्टी से निकलने वाले भगवान होंगे “वीर विनायक दामोदर सावरकर...”. जब वह नस्ल सावरकर जी को भगवान मानना शुरू कर देगी, बस तभी से धरती का स्वर्ग बनना शुरू हो जाएगा..

जिन सावरकर के गृहराज्य में ही उनकी ब्राह्मण जाति देखकर उनसे घृणा करने वाले नराधम रहते हों, वहाँ से हजारों किमी दूर एक द्वीप पर रहने वाली यह अनुराधा नाम की औरत सावरकर को भगवान मानते हुए हमें उनकी महिमा सुना रही थी. हमारी आँखों से आँसू निकलने लगे और कान सुन्न हो गए. उस क्षण हमें लगा कि हम कितने अज्ञानी हैं और यह संघर्षशील महिला कितनी महान आत्मा है... यह सामान्य मानव नहीं हो सकती, यह तो “द्वीपशिखा” है. अगली बार जब भी आप लोग अंडमान के दौरे पर जाएँ तो वहाँ अनुराधा और उसके “विशाल परिवार” से जरूर-जरूर मिलें... यह अदभुत अनुभव आप कभी भुला नहीं पाएँगे...

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(इस अदभुत सत्य घटना के मराठी में मूल लेखक हैं श्री विक्रम श्रीराम एडके. आप अहमदनगर (महाराष्ट्र) निवासी लेखक एवं व्याख्यानकार हैं...)

Wednesday, October 14, 2015

Manohar Parrikar : Man of Simplicity and Honesty

सादगी और ईमानदारी की प्रतिमूर्ति मनोहर पर्रीकर... 


सुबह के लगभग छह बजने वाले थे, पणजी के मुख्य मार्गों पर इक्का-दुक्का वाहन चल रहे थे. अधिकाँश गोवा निवासी उस समय भी नींद में ही थे. परन्तु हमेशा की आदत के अनुसार एक स्कूटर सवार अपने ऑफिस जा रहा था. बीच-बीच में उसकी नज़र अपनी कलाई घड़ी पर चली जाती थी, क्योंकि उस व्यक्ति को प्रतिदिन की अपेक्षा आधा घंटा देर हो गई थी. सुबह के छः बजे भी पणजी के सभी मुख्य चौराहों के ट्रैफिक सिग्नल चालू थे. स्कूटर सवार जैसे ही एक चौराहे पर पहुँचा, लाल बत्ती से उसका सामना हो गया. मन ही मन हल्का सा चिढ़ते हुए उसने अपना स्कूटर रोक दिया. उसी समय एक आलीशान बड़ी सी कार भी उस स्कूटर के पीछे आ रही थी. रास्ते पर एक भी गाड़ी न होने के बावजूद इस स्कूटर सवार को अपने आगे ब्रेक मारते देखकर वह बड़ी कारवाला गड़बडा गया. उसने भी स्कूटर के पीछे जोर से ब्रेक मारे और गुस्से में कार से उतरकर कोंकणी भाषा में बोला, “कित्यां थाम्बलो रे?” (क्यों रुक गया रे?). स्कूटर वाले ने शान्ति से जवाब दिया, “सिग्नल बघ मरे” (लाल सिग्नल देखो”)... यह सुनकर कार सवार धनवान का पारा और चढ़ गया, “बाजू हो, तुका माहित असा मिया कोण असंय ता? मी पणजी पोलीस स्टेशन च्या PI चो झील” (अपनी स्कूटर बाजू कर, तुझे पता नहीं मैं कौन हूँ, मैं पणजी पुलिस स्टेशन का इंस्पेक्टर हूँ”). स्कूटर सवार ने फिर भी शान्ति से ही जवाब दिया, “अस्से? मग तुझ्या बापसाक जाऊन सांग की माका गोव्याचो मुख्यमंत्री भेटलो होतो”. (ऐसा क्या? तो अपने बाप से जाकर कहो कि आज मुझे गोवा का मुख्यमंत्री मिला था). भौंचक्का कार वाला उस स्कूटर सवार के पैर पकड़ने लगा, लेकिन उसे रोकते हुए स्कूटर सवार ने सिर्फ इतना कहा कि, “सिग्नल और नियम का पालन किया करो” और वह अपने दफ्तर की ओर निकल गया. 



गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री और भारत के वर्तमान रक्षामंत्री मनोहर गोपालकृष्ण पर्रीकर की सादगी के ऐसे कई किस्से गोवा में प्रसिद्ध हैं. सादगी और ईमानदारी का ढोंग करने वाले कई नेता भारत ने देखे हैं, परन्तु यह गुण पर्रीकर के खून में ही है, उसमें रत्ती भर का भी ढोंग या पाखण्ड नहीं है. गोवा में ऐसे कई लोग मिलेंगे जिन्होंने अनेक बार सुबह छः बजे किसी ठेले पर चाय पीते अथवा रात ग्यारह बजे किसी सामान्य से रेस्टोरेंट में अकेले खड़े नाश्ता करते हुए मनोहर पर्रीकर को देखा है. मुख्यमंत्री रहते हुए भी पर्रीकर कभी भी शासकीय आवास में नहीं रहे, और शासकीय गाड़ी का उपयोग भी आवश्यकता होने पर ही करते रहे. वे अपने बड़े बेटे के साथ 2BHK के उस फ़्लैट में रहते थे, जिसकी EMI वे आज भी भरते हैं. 



म्हापसा के एक गौड़ सारस्वत परिवार में मनोहर पर्रीकर का जन्म हुआ. बचपन से ही उन के मन पर RSS के संस्कार पड़े. पर्रीकर आज भी गर्व से संघ में बिताए उन दिनों को स्मरण करते हैं. उच्च शिक्षा के लिए पर्रीकर का चयन IIT मुम्बई में हुआ. उनकी ईमानदारी का एक किस्सा IIT के दिनों का है, उनके मित्र बताते हैं कि एक बार सुबह चार बजे पर्रीकर अपने मित्र के साथ कल्याण से दादर स्टेशन जाने के लिए स्टेशन पहुँचे, लेकिन टिकिट खिड़की का कर्मचारी गहरी नींद में था. उसे उठाने का काफी प्रयास किया परन्तु अंततः उन्हें बिना टिकट दादर जाना पड़ा. दादर में टिकट चेकर ने दोनों को पकड़ लिया और पर्रीकर से बीस पैसे टिकट के और चालीस पैसे दण्ड के अर्थात साठ पैसे वसूल किए. पर्रीकर को बहुत क्रोध आया, वे तो टिकट लेना चाहते थे, शासकीय कर्मचारी की गलती थी. उनकी कोई गलती नहीं होते हुए भी उन्हें दण्ड भरना पड़ा था इस कारण उन्होंने निश्चय किया कि बदले में वे भी सरकार का नुक्सान करेंगे. अगले बारह-पन्द्रह दिन तक लगातार वे बिना टिकट दादर गए. अचानक उन्होंने हिसाब लगाया तो पाया कि उन्होंने सरकार को दो रूपए ज्यादा का चूना लगा दिया है. मन ही मन उन्हें अपराधी भावना होने लगी. वे तुरंत पोस्ट ऑफिस गए और दो रूपए का डाक टिकट खरीदा और फाड़कर फेंक दिया. तब उन्हें यह समाधान हुआ कि अब सरकार से उनका “हिसाब बराबर” हुआ है. एक मुख्यमंत्री के रूप में भी पर्रीकर हमेशा अपने नियमों, अनुशासन एवं ईमानदारी के प्रति एकनिष्ठ बने रहे. 


IIT पास करके मनोहर वापस गोवा आए, एक छोटा सा उद्योग आरम्भ किया और साथ ही संघ का कार्य भी देखते रहे. उन दिनों गोवा में भाजपा का नामोनिशान तक नहीं था. सिर्फ दो अर्थात, काँग्रेस और गोमांतक पार्टी की जनता पर पकड़ थी. ऐसी परिस्थिति में संघ के कार्यकर्ताओं के सहारे पर्रीकर ने राजन आर्लेकर, लक्ष्मीकांत पार्सेकर, श्रीपाद नाईक जैसे युवाओं के साथ मिलकर सिर्फ पन्द्रह वर्षों में भाजपा को सत्ता की सीढ़ी तक पहुँचा दिया. 2012 के चुनावों में उनके नेतृत्त्व में भाजपा ने पूर्ण बहुमत से सत्ता हासिल की. अपनी दूसरी पारी में मुख्यमंत्री बनते ही पर्रीकर ने दो महत्त्वपूर्ण निर्णय किए. उन्होंने सबसे पहले गोवा में चल रहे अवैध खनन को पूरी तरह बन्द कर दिया और पेट्रोल-डीजल पर लगने वाला 20% टैक्स घटाकर सिर्फ 0.2% कर दिया. गोवा में पेट्रोल बीस रूपए सस्ता हो गया. इस निर्णय की बहुत आलोचना हुई और सरकार को होने वाली राजस्व नुक्सान की भरपाई कैसे होगी इस पर दिल्ली तक चर्चा होने लगी. यह सवाल उठाया जाने लगा कि क्या गोवा सरकार दिवालिया होने की कगार पर है? लेकिन पर्रीकर के पास पूरी योजना तैयार थी. सबसे पहले उन्होंने डाबोलिम अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर विमानों को लगने वाले “व्हाईट पेट्रोल” से भी कर घटा दिया. इसके बाद उन्होंने विमान कंपनियों से आग्रह करके उनके किराए में भारी कमी करवाई, ऐसा करते ही पहले से लोकप्रिय गोवा में देशी-विदेशी पर्यटकों की मानो बाढ़ आ गई. इसके बाद उन्होंने गोवा के सभी कैसीनो पर टैक्स बढ़ा दिया, जिससे राजस्व की भरपाई आराम से हो गई. पर्रीकर कहते हैं कि मैं गोवा की जनता का ट्रस्टी हूँ और ऐसे में सरकार अथवा जनता का नुक्सान मेरा व्यक्तिगत नुक्सान है. इसलिए जनता का कोई भी नुक्सान हो पाए, ऐसा कोई निर्णय मैं लेने वाला नहीं हूँ, और गोवा की जनता भी पर्रीकर के इन शब्दों पर पूरा भरोसा करती है. पिछले तीन वर्ष में गोवा के प्रशासन से भ्रष्टाचार बहुत-बहुत कम हुआ है. गोवा की छोटी-छोटी गलियों में भी साफ़-सुथरे और चमकदार रास्ते और बिजली की स्थिति देखकर भरोसा कायम होता है. 



अलग-अलग तरीकों से मनोहर पर्रीकर को रिश्वत देने की कोशिशें भी हुईं, लेकिन उनका कठोर व्यक्तित्त्व और स्पष्ट वक्ता व्यवहार के कारण उद्योगपति इसमें सफल नहीं हो पाते थे और पर्रीकर के साथ जनता थी, इसलिए उन्हें कभी झुकने की जरूरत भी महसूस नहीं हुई. एक बार पर्रीकर के छोटे पुत्र को ह्रदय संबंधी तकलीफ हुई. डॉक्टरों के अनुसार जान बचाने के लिए तत्काल मुम्बई ले जाना आवश्यक था. उस समय गोवा का एक उद्योगपति उन्हें विमान से मुम्बई ले गया. चूँकि पर्रीकर के बेटे को स्ट्रेचर पर ले जाना था, इसलिए विमान की छह सीटें हटाकर जगह बनाई गई और उसका पैसा भी उस उद्योगपति ने ही भरा. पर्रीकर के बेटे की जान बच गई. उस उद्योगपति के मांडवी नदी में अनेक कैसीनो हैं और उसमें उसने अवैध निर्माण कर रखे थे. बेटे की इस घटना से पहले ही पर्रीकर ने उसके अवैध निर्माण तोड़ने के आदेश जारी किए हुए थे. उस उद्योगपति ने सोचा कि उसने पर्रीकर के बेटे की जान बचाई है, इसलिए शायद पर्रीकर वह आदेश रद्द कर देंगे. काँग्रेस को भी इस बात की भनक लग गई और वह मौका ताड़ने लगी, कि शायद अब पर्रीकर जाल में फंसें. लेकिन हुआ उल्टा ही. पर्रीकर ने उस उद्योगपति से स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि एक पिता होने के नाते मैं आपका आजन्म आभारी रहूँगा, परन्तु एक मुख्यमंत्री के रूप में अपना निर्णय नहीं बदलूँगा. उसी शाम उन्होंने उस उद्योगपति के सभी अवैध निर्माण कार्य गिरवा दिए और विमान की छः सीटों का पैसा उसके खाते में पहुँचा दिया. पढ़ने में भले ही यह सब फ़िल्मी टाईप का लगता है, परन्तु जो लोग पर्रीकर को नज़दीक से जानते हैं, उन्हें पता है कि पर्रीकर के ऐसे कई कार्य मशहूर हैं. चूँकि भारत की मीडिया गुडगाँव और नोएडा की अधिकतम सीमा तक ही सीमित रहती है और टेबल पर बैठकर “दल्लात्मक” रिपोर्टिंग करती है, इसलिए पर्रीकर के बारे में यह बातें अधिक लोग जानते नहीं हैं. 



58 वर्षीय मनोहर पर्रीकर आज भी सोलह से अठारह घंटे काम करते हैं. गोवा के मुख्यमंत्री रहते समय मुख्यमंत्री कार्यालय के कर्मचारियों को साँस लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती थी. एक बार पर्रीकर अपने सचिव के साथ रात बारह बजे तक काम कर रहे थे. जाते समय सचिव ने पूछा, “सर, यदि कल थोड़ी देर से आऊँ तो चलेगा क्या?”, पर्रीकर ने कहा, “हाँ ठीक है, थोड़ी देर चलेगी, थोड़ी देर यानी सुबह साढ़े छः तक आ ही जाना”. सचिव महोदय ने सोचा कि वही सबसे पहले पहुँचेंगे, लेकिन जब अगले दिन सुबह साढ़े छः बजे वे बड़ी शान से दफ्तर पहुँचे तो चौकीदार ने बताया कि पर्रीकर साहब तो सवा पाँच बजे ही आ चुके हैं. ऐसे अनमोल रतन की परख करके नरेंद्र मोदी नामक पारखी ने उन्हें एकदम सटीक भूमिका सौंपी है, वह है रक्षा मंत्रालय. पिछले चालीस वर्षों में दलाली और भ्रष्टाचार (अथवा एंटनी के कार्यकाल में अकार्यकुशलता एवं देरी से लिए जाने वाले निर्णयों) के लिए सर्वाधिक बदनाम हो चुके इस मंत्रालय के लिए मनोहर पर्रीकर जैसा व्यक्ति ही चाहिए था. यह देश का सौभाग्य ही है कि पर्रीकर जैसे क्षमतावान व्यक्ति के सुरक्षित हाथों में रक्षा मंत्रालय की कमान है.  

जिस समय पर्रीकर को शपथविधी के लिए दिल्ली आमंत्रित किया गया था, उस समय एक “सत्कार अधिकारी” नियुक्त किया गया. जब अधिकारी ने पर्रीकर से संपर्क किया तो उन्होंने कहा, “आपको एयरपोर्ट पर आने की जरूरत नहीं, मैं खुद आ जाऊँगा”. जब होटल के सामने ऑटो रिक्शा से सादे पैंट-शर्ट में “रक्षामंत्री” को उतरते देखा तो दिल्ली की लग्ज़री लाईफ में रहने का आदी वह अधिकारी भौंचक्का रह गया


Sunday, October 11, 2015

Free IIT Courses from NPTEL

मुफ्त में IIT की पढ़ाई करें... 


देश में ज्ञान की बढ़ती भूख, इंटरनेट के बढ़ते उपयोग तथा छात्रों और शिक्षकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए, भारत सरकार ने मानव संसाधन मंत्रालय के तत्त्वावधान में “नेशनल प्रोग्राम फॉर टेक्नोलॉजी एन्हांस्ड लर्निंग (NPTEL)” के नाम से एक अभिनव उपक्रम आरम्भ किया है. इस उपक्रम को भारत के सातों प्रमुख IIT (अर्थात मुम्बई, दिल्ली, गुवाहाटी, कानपुर, खडगपुर, चेन्नई एवं रुड़की) तथा बंगलौर के सुप्रसिद्ध IISc ने आपस में मिलकर डिजाइन किया है. यह कुछ-कुछ “ओपन यूनिवर्सिटी” की ही तरह है, जिसमें भारत के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक आपस में जुड़े रहते हैं तथा इंटरनेट पर ही सुदूर छात्रों को इंजीनियरिंग, साईंस, टेक्नालॉजी, प्रबंधन, मानविकी, रसायन सहित लगभग सभी विषयों पर अपने अनुभव एवं ज्ञान से प्रकाशमान करते हैं. 


इस संस्था के वेब-पोर्टल (http://nptel.ac.in) पर इन शिक्षकों ने जो सामग्री उपलब्ध करवाई है, वह विभिन्न शैक्षिक संस्थानों द्वारा उपयोग में लाई जा रही है. देश भर के शिक्षक यहाँ से सामग्री लेकर उनके विश्वविद्यालय अथवा महाविद्यालय के पाठ्यक्रम एवं योजनाएँ तैयार करते हैं. इस पोर्टल के सहारे लाखों छात्र अपनी डिग्री अथवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने में जुटे हैं. इंटरनेट पर उपलब्ध यह “मुक्त विश्वविद्यालय” अमेरिका के सर्वश्रेष्ठ तकनीकी संस्थान MIT के “मुक्त शिक्षा” से प्रेरित है... और सबसे बड़ी बात यह है कि यह एकदम मुफ्त है



अगस्त 2015 तक NPTEL ने अपने इस उपक्रम में 440 वेब पाठ्यक्रम तथा लगभग 500 वीडियो पाठ्यक्रम अपलोड किए जा चुके हैं, जिन्हें ऊपर दी गई साईट की लिंक पर मुफ्त में प्राप्त किया जा सकता है. इन पाठ्यक्रमों में कुल 921 प्रकार के कोर्स हैं और प्रत्येक कोर्स के लगभग 40 वीडियो लेक्चर हैं जो एक-एक घंटे के हैं. इसके अलावा इस वेबसाईट पर ऑनलाईन चर्चा फोरम भी बना रखे हैं, जहाँ छात्र अपने प्रश्न पूछ सकते हैं, जिनके जवाब देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक देंगे. सभी वीडियो पाठ्यक्रमों को MP4 एवं 3gp फॉर्मेट में डाउनलोड भी किया जा सकता है. इसके अलावा यदि छात्र चाहें तो मामूली से शुल्क पर उन्हें उनका सम्बन्धित पाठ्यक्रम (वीडियो सहित) चेन्नई स्थित NPTEL के ऑफिस से उनकी हार्ड डिस्क पर भी दिया जा सकता है. NPTEL का उद्देश्य है कि देश में छात्रों को सर्वश्रेष्ठ उच्च शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा एवं दूरस्थ शिक्षा का लाभ घर बैठे ही मिल सके. 

उपरोक्त वेबसाइटों पर जाकर आप भी इनका लाभ प्राप्त कर सकते हैं...

Friday, October 2, 2015

RSS-BJP Coordination Meeting

संघ-भाजपा समन्वय बैठक : सिर्फ समन्वय या नाराजी और दबाव? 


यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि वह दूध में घुली हुई शकर को देख सकता है, या छानकर दोनों को अलग-अलग कर सकता है, तो निश्चित ही या तो वह कोई महात्मा होगा या फिर कोई मूर्ख होगा. इसी प्रकार जब कोई यह कहता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा सरकारों का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है, संघ एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है और वह किसी भी सरकार के काम में दखलंदाजी नहीं करता, तो बरबस हँसी छूट ही जाती है. 



सितम्बर के पहले सप्ताह में देश के मुख्यधारा मीडिया ने दिल्ली के मध्यप्रदेश भवन “मध्यांचल” में सम्पन्न हुई संघ-भाजपा की “समन्वय बैठक” को लेकर जैसा हंगामा मचाया उससे यह पता चलता है कि या तो ये कथित पत्रकार अपरिपक्व हैं, या फिर संघ की कार्यशैली को जानते नहीं हैं या फिर खामख्वाह विरोध के लिए विरोध कर रहे हैं. RSS-भाजपा की ऐसी समन्वय बैठकें लगातार होती रहती हैं और आगे भी होती रहेंगी, क्योंकि परोक्ष एवं अपरोक्ष रूप से दोनों एक ही हैं. जो भी विश्लेषक संघ को पिछले पचास वर्ष से जानता है, उसे यह पता होना ही चाहिए कि यह एक “मातृसंस्था” है, जिसमें से निकली हुई विभिन्न संतानें, चाहे वह विश्व हिन्दू परिषद् हो, भाजपा हो, भारतीय मजदूर संघ हो या विद्या भारती हो, सभी एक छाते के नीचे हैं. ऐसे में केन्द्र की “पूर्ण बहुमत” वाली पहली भाजपा सरकार के साथ “समन्वय बैठक” करना कोई अजूबा नहीं था, न है और न होना चाहिए.

असल में मीडिया में इस प्रकार के विवाद पैदा होने का एक प्रमुख कारण संघ की मीडिया से दूरी बनाए रखने की नीति भी है. जब भी RSS की कोई प्रमुख बैठक होती है, अथवा चिंतन शिविर होता है अथवा विशिष्ट पदाधिकारियों के साथ भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ कोई समन्वय बैठक होती है तो संघ की “परंपरा” के अनुसार मीडिया को उससे बाहर रखा जाता है. ऐसा करने से मीडिया में सिर्फ वही बात आती है, जो बाद में एक प्रेस विज्ञप्ति के जरिये उन्हें बता दी जाती है और उसका अर्थ वे लोग अपने-अपने स्वार्थों एवं अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार लगाकर जनता के समक्ष पेश करते हैं. संघ की इस “मीडिया दुत्कारो नीति” को लेकर जानकारों में मतभेद हैं, कुछ लोगों का मानना है कि संघ की अंदरूनी बातें मीडिया तक नहीं पहुँचनी चाहिए, इसलिए यह इंतजाम ठीक है. जबकि कुछ लोगों का मानना है कि ऐसा करने से मीडिया अपनी मनमर्जी के अनुसार संघ की छवि गढ़ता है या विकृत करता है. वर्तमान में चाहे कोई भी देश हो, मीडिया एक प्रमुख हथियार है और यदि कोई संगठन इस हथियार से ही दूरी बनाकर रखे तो यह सही नहीं है. लेकिन संघ ने शुरू से ही मीडिया और जनता के सामने स्वयं को रहस्य के आवरण में ढँका हुआ है. इसके निर्णय तभी सामने आते हैं जब उन पर अमल शुरू हो जाता है. 


दिल्ली में जो “समन्वय” बैठक हुई, वह भी रहस्य के आवरणों में ही लिपटी हुई थी. इस तीन दिवसीय बैठक में स्वयं संघ प्रमुख और कई अन्य प्रमुख पदाधिकारी उपस्थित थे. इस बैठक में संघ के पूर्व प्रवक्ता और फिलहाल जम्मू-कश्मीर प्रभारी राम माधव एक समन्वयक के रूप में मौजूद थे, जबकि सत्ता केन्द्र के सभी प्रमुख मंत्री अर्थात श्रीमती सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, मनोहर पर्रीकर और नितिन गड़करी एक के बाद एक पधारे और उन्होंने अपनी बात रखी, जिसे समन्वय नाम दिया गया. लेकिन चूँकि भारत के (अधिकांशतः हिन्दू विरोधी) मीडिया को नरेंद्र मोदी नाम की “रतौंधी” है, इसलिए सबसे अधिक हल्ला उस बात पर मचा, जब यह निश्चित हुआ कि इस समन्वय बैठक के अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसमें भाग लेंगे. वर्षों से एक परिवार द्वारा पार्टी पर कब्ज़ा जमाए रखने वाले उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट करके व्यंग्य किया कि यह सरकार की “अप्रेज़ल मीटिंग” है, जिसमें मंत्रियों और प्रधानमंत्री के कामकाज की समीक्षा होगी और तदनुसार उनका कद बढ़ाया (अथवा घटाया) जाएगा. जबकि योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को बुरी तरह बेइज्जत करके बाहर निकालने तथा अपनी आलोचना सुनने की बर्दाश्त न रखने वाले तानाशाह केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने इसे संविधान के खिलाफ ही बता दिया. वहीं दूसरी तरफ पिछले साठ वर्षों से एक परिवार पर आश्रित, तथा पिछले दस वर्ष तक “महारानी सोनिया गाँधी” के किचन से चलने वाली NAC (राष्ट्रीय सलाहकार परिषद्) जैसी असंवैधानिक संस्था और प्रेस कांफ्रेंस में सरेआम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का अपमान करते हुए कागज़ फाड़ने वाले युवराज की पार्टी, काँग्रेस भी संघ-भाजपा की इस बैठक की आलोचना करने से नहीं चूकी. 

बहरहाल, ऐसी आलोचनाएँ करना तो विपक्ष का धर्म और परंपरा ही है, इसलिए उस पर ध्यान देने की बजाय फोकस इस बात पर होना चाहिए कि आखिर संघ-भाजपा की इस महत्त्वपूर्ण बैठक में क्या हुआ होगा? किन प्रमुख मुद्दों पर चर्चा हुई होगी? संघ किन मंत्रियों से खुश है और किससे नाखुश है? ज़ाहिर है कि ये सारे सवाल गहरे रहस्य के परदे में हैं. किसी को नहीं पता कि आखिर इस बैठक में क्या हुआ, लेकिन सभी “तथाकथित” विद्वान अपनी-अपनी लाठियाँ भाँजने में लगे हुए हैं. बैठक की समाप्ति के पश्चात दत्तात्रय होसबोले द्वारा जो प्रेस विज्ञप्ति “पढ़ी एवं वितरित” की गई, उसके अनुसार केन्द्र सरकार “सही दिशा” में जा रही है और ठीक काम कर रही है. विज्ञप्ति की प्रमुख बात यह थी कि अभी सरकार को सिर्फ 14 माह ही हुए हैं, इसलिए जल्दबाजी में इससे परिणामों की अपेक्षा करना ठीक नहीं है, परन्तु कई क्षेत्रों में सुधार और तेजी की आवश्यकता है. अब प्रत्येक विश्लेषक अपनी-अपनी समझ के अनुसार इस प्रेस विज्ञप्ति का अर्थ निकालने में लगा हुआ है. मैं इस बात पर नहीं जाऊँगा कि संघ-भाजपा (यानी सरकार) के बीच ऐसी कोई बैठक उचित अथवा संवैधानिक है या नहीं, क्योंकि ठेठ कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक पिछले साठ वर्षों से हमारे सामने सभी राजनैतिक दलों के उदाहरण मौजूद हैं जिन्होंने अपनी पार्टी के “आंतरिक लोकतंत्र” की कैसी धज्जियाँ उड़ाई हैं और “कैसे-कैसे परिवार” सत्ता पर काबिज रहे हैं. उन नेताओं और पार्टियों के मुकाबले भाजपा काफी लोकतांत्रिक है और RSS भी कोई अछूत या व्यवस्था से अनधिकृत संस्था नहीं है, क्योंकि इसके लाखों सदस्य भी भारत के नागरिक ही हैं. 


छन-छन कर आने वाली ख़बरों, कुछ सूत्रों और अनुमानों के आधार पर इस समन्वय बैठक को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है. पहला है संघ की सरकार (या मंत्रियों) से अपेक्षा और नाराजी तथा दूसरे और अंतिम भाग (अर्थात प्रधानमंत्री के आगमन पश्चात) में संतुष्टि और सलाह. प्रधानमंत्री और सरकार का एजेंडा राजनैतिक होता है जबकि संघ का एजेंडा हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को मजबूत करने का होता है, ऐसे में नीतियों को लेकर समन्वय स्थापित करना बेहद जरूरी हो जाता है, वर्ना बैलगाड़ी के दोनों बैल एक ही दिशा में एक साथ कैसे चलेंगे? नरेंद्र मोदी की चिंता यह है कि भूमि अधिग्रहण बिल और GST क़ानून कैसे पास करवाया जाए और राज्यसभा में बहुमत हासिल करने के लिए बिहार और उत्तरप्रदेश में किस प्रकार की जातीय अथवा साम्प्रदायिक अरहर दाल पकाई जाए, जिसमें “विकास” का तड़का लगाकर लक्ष्य को हासिल किया जा सके. एक बार राज्यसभा में भी इस सरकार का बहुमत स्थापित हो गया तो फिर बल्ले-बल्ले ही समझिए. जबकि संघ की चिंता यह है कि संगठन और भाजपा का विस्तार उन राज्यों में कैसे किया जाए, जहाँ इनकी उपस्थिति नहीं के बराबर है. इसके अलावा राम मंदिर, धारा 370 तथा समान नागरिक क़ानून इत्यादि जैसे “हार्डकोर” मुद्दों को सुलझाने (अथवा निपटाने) हेतु सरकार की क्या-क्या योजनाएँ हैं. क्या मोदी सरकार इन तीन प्रमुख मुद्दों पर कुछ कर रही है अथवा फिलहाल राज्यसभा में बहुमत का इंतज़ार कर रही है? 

मोदी सरकार ने कश्मीर में जिस तरह अपने समर्थकों के विरोध की परवाह न करते हुए PDP के साथ मिलकर सरकार बनाई है तथा मृदुभाषी लेकिन फुल खाँटी संघी और युवा राम माधव को संघ से मुक्त करते हुए कश्मीर का प्रभारी बनाया है, उससे यह तो निश्चित है कि धारा 370 को लेकर RSS-मोदी के दिमाग में कोई न कोई खिचड़ी जरूर पक रही है. नेशनल कांफ्रेंस और PDP की अंदरूनी उठापटक, विरोधाभास और हुर्रियत की पाकिस्तान परस्त बेचैनी को देखते हुए साफ़ ज़ाहिर हो रहा है कि कश्मीर में शह-मात का खेल खेला जा रहा है. यदि कोई अनहोनी घटना अथवा आग भड़काने वाली कोई “विशिष्ट चिंगारी” नहीं भड़की, तो अगले पाँच वर्ष में इस मुद्दे पर कुछ न कुछ ठोस न सही हल्का-पतला जरूर निकलकर सामने आएगा. तीनों प्रमुख मुद्दों में से यही मुद्दा समन्वय बैठक में सर्वोच्च वरीयता प्राप्त रहा. 

ये बात संघ भी जानता है और मोदी भी जानते हैं कि सिर्फ “विकास” के सहारे चुनाव नहीं जीते जाते. यहाँ तक कि 2014 में जीता हुआ लोकसभा का चुनाव में भी नरेंद्र मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व और भाषणों अथवा सोशल मीडिया के सहारे नहीं जीता गया, बल्कि इसमें सदा की तरह RSS के जमीनी और हवाई कैडर ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. इनके अलावा काँग्रेस के कुकर्म ही इतने अधिक बढ़ चुके थे और प्रचार पा चुके थे कि काँग्रेस नामक मिट्टी के ढेर को हल्का सा धक्का देने भर की जरूरत थी. यह काम संघ के कैडर ने पूरी ताकत के साथ किया. लेकिन चुनाव जीतने के लिए विकास की नहीं धर्म-जाति के गणित भी ध्यान में रखने पड़ते हैं. पिछले दस वर्ष में UPA सरकार के दौरान जिस तरह पूरी बेशर्मी के साथ हिंदुओं की भावनाओं एवं उनके सम्मान का दमन किया गया, उससे इस युवा देश की बड़ी आबादी के बीच आक्रोश फ़ैल चुका था. उस आक्रोश को सही दिशा में घुमाकर लोकसभा चुनाव जीतना भी मोदी की विशेष सफलता थी. इसलिए “कैडर” और “हिन्दू नेटीजनों” को संतुष्ट रखना संघ का पहला कर्त्तव्य है. सूत्रों के अनुसार समन्वय बैठक में अरुण जेटली पर सर्वाधिक सवाल दागे गए. संघ का एक बड़ा तबका जेटली को नापसंद करता रहा है, और इस सरकार में मोदी की शह पर दो-दो महत्त्वपूर्ण मंत्रालय कब्जे में रखे हुए जेटली, संघ की हिंदूवादी नीतियों के रास्ते में कंकर-काँटा बने हुए हैं. यह कोई रहस्य नहीं रह गया है कि देश के अधिकाँश मीडिया घराने “हिन्दू विरोधी” हैं. ऐसे में सूचना-प्रसारण मंत्रालय जेटली के पास में होने के बावजूद ऊलजलूल ख़बरें परोसना और सरकार विरोधी माहौल बनाने की कोशिश के बावजूद कुछ नहीं कर पाने को लेकर संघ में जेटली के कामकाज को लेकर बेचैनी है. स्वयं जेटली भी कह चुके हैं कि उनके स्वास्थ्य के कारण उन पर दो-दो मंत्रालयों का बोझ ठीक नहीं है, अतः बिहार चुनावों के बाद वहाँ के परिणामों के आधार पर मंत्रिमंडल में फेरबदल हो सकता है. यदि भाजपा (यानी NDA) पूर्ण बहुमत से बिहार में सत्ता पा जाता है तो केन्द्र में मंत्रियों के विभागों में मामूली फेरबदल हो सकता है, लेकिन यदि भाजपा बिहार में चुनाव हार जाती है तो “सर्जरी” किस्म का फेरबदल होगा, और बिहार से सम्बन्धित वर्तमान मंत्रियों में से कुछ को दरवाजा दिखाया जा सकता है. 

मीडिया की हिन्दू विरोधी बौखलाहट पर नियंत्रण के अलावा इस समन्वय बैठक में NGOs के मकड़जाल और काँग्रेस के शासन में दीमक की तरह फैले पैंतीस लाख NGOs की गतिविधियों पर भी बात हुई. जैसा कि अब धीरे-धीरे सामने आने लगा है यूपीए सरकार के दौरान सोनिया गाँधी की शरण में चल रही NAC नामक सर्वोच्च संस्था (जो सीधे मनमोहन सिंह को निर्देशित करती थी), कुछ और नहीं सिर्फ NGOs चलाने वालों का ही एक “गिरोह” था. अरुणा रॉय, हर्ष मंदर, शबनम हाशमी, तीस्ता सीतलवाड जैसे कई लोग NAC के सदस्य रहे और इन्होंने ग्रीनपीस और फोर्ड फाउन्डेशन जैसे महाकाय NGOs के साथ “तालमेल” बनाकर विभिन्न ऊटपटांग योजनाएँ बनाईं और देश को अच्छा ख़ासा चूना लगाया. इसके अलावा इन्हीं NGOs के माध्यम से कतिपय लोगों ने जमकर पैसा भी कूटा और साथ ही अपना हिन्दू-विरोधी एजेंडा भी जमकर चलाया. RSS के विचारक और कार्यकर्ता NGOs के खिलाफ नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा जारी कार्रवाई से संतुष्ट तो नहीं थे, परन्तु यह भी मानते हैं कि ग्रीनपीस और फोर्ड फाउन्डेशन जैसे “दिग्गजों” की नकेल कसना इतना आसान नहीं है, इसलिए इस मामले सरकार को और समय देना होगा. फिलहाल सरकार सही दिशा में कदम उठाने लगी है. 


सुषमा स्वराज, नितिन गड़करी और मनोहर पर्रीकर के मंत्रालयों की समीक्षा के दौरान अधिक माथापच्ची नहीं करनी पड़ी, क्योंकि इनके काम से संघ में लगभग सभी लोग संतुष्ट हैं. संघ के लिए तीन मंत्रालय सबसे महत्त्वपूर्ण हैं, गृह, सूचना-प्रसारण और मानव संसाधन. राजनाथ सिंह से भी कई मुद्दों पर जवाबतलबी हुई है, क्योंकि पिछले एक वर्ष में कुछ ऐसे मुद्दे उभरकर सामने आए, जिसमें गृह मंत्रालय या तो ढीला साबित हुआ, या फिर खामख्वाह विवादों में रहा. परन्तु चूँकि अरुण जेटली की ही तरह राजनाथ सिंह का रवैया भी उनके मीडिया मित्रों के प्रति “दोस्ताना” रहता है, इसलिए मीडिया ने कभी भी इन दोनों को निशाना नहीं बनाया और ना ही विवादों को अधिक हवा दी. मीडिया की आलोचना और समालोचना का सारा फोकस पिछले चौदह साल से नरेंद्र मोदी पर ही है. 

बताया जाता है कि केन्द्र में जिस मंत्री से RSS सर्वाधिक खफ़ा है, वे हैं मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी. लगातार अपने बयानों और टीवी शो में उनकी विवादित उग्रता को छोड़ भी दिया जाए, तो स्मृति ईरानी ने अभी तक पिछले चौदह माह में मानव संसाधन मंत्रालय में कोई विशेष छाप नहीं छोड़ी है. शिक्षा संस्थानों और विश्वविद्यालयों में पिछले साठ वर्ष में जिस तरह से वामपंथी विचारधारा ने अपनी गहरी पैठ बनाई है उसे देखते हुए ईरानी से अपेक्षा थी कि वे तेजी से काम करेंगी, परन्तु ऐसा हो नहीं रहा. क्योंकि ना तो इधर स्मृति ईरानी और ना ही उधर राज्यवर्धनसिंह राठौर को वामपंथी साहित्यकारों, फिल्मकारों और लेखकों की धूर्तता और “कब्जाऊ नीयत एवं नीति” के बारे में समुचित जानकारी है. चाहे IIT चेन्नई का मामला हो, या FTII का मामला हो अथवा JNU में बैठे “बौद्धिक घुसपैठियों” का मामला हो, सभी मोर्चों पर स्मृति ईरानी तथा जेटली-राठौर जोड़ी लगभग असफल ही सिद्ध हुए हैं. अतः ऐसी संभावना बन रही है कि बिहार चुनावों के बाद स्मृति ईरानी का मंत्रालय बदल दिया जाएगा. 


अब सबसे अंत में सबसे प्रमुख बात. कुछ “तथाकथित” विश्लेषक फिलहाल इस बात पर कलम घिस रहे हैं कि RSS और नरेंद्र मोदी में मतभेद हो गए हैं. वास्तव में ऐसे बुद्धिजीवियों की सोच पर तरस भी आता है और हँसी भी आती है. ये कथित सेकुलर विश्लेषक यह भूल जाते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनावों हेतु जिस समय आडवाणी प्रधानमंत्री पद की दावेदारी हेतु ख़म ठोंक रहे थे, उस समय “नागपुर” की हरी झंडी की बदौलत ही नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी सुनिश्चित हुई. मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी लगभग हमउम्र हैं, और उनकी आपसी “ट्यूनिंग” काफी बेहतर है. यदि संघ उस समय अपना रुख स्पष्ट नहीं करता तो आडवाणी गुट पूरा रायता फैला सकता था, लेकिन जैसे ही संघ मजबूती से मोदी के पीछे खड़ा हुआ, सब ठंडे हो गए. प्रधानमंत्री बनने के बाद भी एक बार नरेंद्र मोदी सरेआम कह चुके हैं कि “उन्हें संघ का स्वयंसेवक होने का गर्व है”, यदि फिर भी कोई बुद्धिजीवी यह सोचता फिरे कि मोदी और संघ के बीच कोई खटास है, तो उसका भगवान ही मालिक है. आज की तारीख में RSS और उसके लाखों स्वयंसेवक “चुनाव जिताने” का एक विशाल ढाँचा हैं. अन्य पार्टियों को लाखों-करोड़ों रूपए फूँक कर कार्यकर्ता खरीदने पड़ते हैं, जबकि भाजपा सुखद स्थिति में है कि उसे RSS के रूप में गाँव-गाँव की ख़ाक छानने वाले मुफ्त के कार्यकर्ता मिल जाते हैं, जो “साम-दाम-दण्ड-भेद” की राजनीति में भी माहिर हैं. ऐसे में यदि कोई सोचे कि वह संघ को नाराज करके अपना काम चला लेगा तो निश्चित ही वह नासमझ होगा. वर्ष में एक बार ऐसी समन्वय बैठकें इसीलिए की जाती हैं कि सरकार, संगठन और पार्टी में तालमेल बना रहे, कहाँ-कहाँ के पेंच-बोल्ट ढीले हो रहे हैं इसकी जानकारी मिल जाए और भविष्य की रणनीति पर सभी एक साथ मिलजुलकर चलें. चूँकि सरकार को सिर्फ पन्द्रह माह हुए हैं अतः संघ भी समझता है कि पिछले साठ वर्षों की “काँग्रेसी प्रशासनिक दुर्गन्ध” को साफ करने में वक्त लगेगा, फिर भी इस समन्वय बैठक में राम मंदिर सहित भाजपा के मूल मुद्दों पर चर्चा करके संघ ने दिशा तय कर दी है, अब सिर्फ “उचित समय” और “सही गोटियों” का इंतज़ार है ताकि 2017 के अंत तक अगली चाल चली जाए.