Friday, September 25, 2015

Owaisi Monarchy and History of Kasim Rizvi

ओवैसियों का काला इतिहास और कासिम रिज़वी...


आजकल भारत की राजनीति में तेजी से उभरता हुआ नाम है असदुद्दीन ओवैसी. AIMIM अर्थात ऑल इण्डिया “मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन” के नेता और मुस्लिमों के बीच तेजी से अपनी पैठ बनाते जा रहे हैदराबादी. असदुद्दीन ओवैसी ने लन्दन से वकालत की पढ़ाई की है, इसीलिए अक्सर चैनलों पर बहस में अथवा साक्षात्कारों में बेहतरीन तरीके से “कुतर्क” कर लेते हैं. इन्हीं के छोटे भाई हैं अकबरुद्दीन ओवैसी (Akbaruddin Owaisi). अकबरुद्दीन की अभी कोई खास देशव्यापी पहचान नहीं बन पाई है, सिवाय इसके कि पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान इन्होंने कई चुनावी सभाओं में जहरीले भाषण दिए. जिस कारण इन पर कुछ मुक़दमे दर्ज हुए और चंद दिनों हवालात में काटकर आए. तेलंगाना विधानसभा में एक विधायक से अधिक फिलहाल उनकी हैसियत सिर्फ असदउद्दीन ओवैसी के भाई की ही है. खैर, यह तो हुआ AIMIM का संक्षिप्त वर्तमान इतिहास, लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया कि अकबरुद्दीन ओवैसी जहरीले भाषण क्यों देता है? अथवा असदउद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) सिर्फ मुस्लिमों की राजनीति क्यों करता है? इनके भाषण और इंटरव्यू अक्सर मुस्लिम साम्प्रदायिकता के इर्द-गिर्द क्यों रहते हैं? इसके लिए आपको AIMIM के इतिहास, उसके जन्म और पिछले नेताओं के बारे में जानना जरूरी है.


आईये चलते हैं देश की आज़ादी के कालखण्ड में. जैसा कि हम सभी जानते हैं स्वतंत्रता प्राप्ति के समय सरदार पटेल को गृह मंत्रालय सौंपा गया था ताकि वे देश की पाँच सौ से अधिक रियासतों और राजाओं को समझाबुझा कर भारत गणराज्य में शामिल करें, ताकि यह देश एक और अखंड बने. अंग्रेजों के जाने के बाद उस समय अधिकाँश रियासतों ने खुशी-खुशी भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार किया और आज जो भारत हम देखते हैं वह इन्हीं विभिन्न रियासतों से मिलकर बना. उल्लेखनीय है कि उस समय कश्मीर को छोड़कर देश की बाकी रियासतों को भारत में मिलाने का काम सरदार पटेल को सौंपा गया था, जिसे उन्होंने बखूबी अंजाम दिया. नेहरू ने उस समय कहा था कि कश्मीर को मुझ पर छोड़ दो, मैं देख लूँगा. इस एकमात्र रियासत को भारत में मिलाने का काम अपने हाथ में लेने वाले नेहरू की बदौलत, पिछले साठ वर्ष में कश्मीर भारत की छाती पर नासूर ही बना हुआ है. ऐसा ही एक नासूर दक्षिण भारत में “निजाम राज्य” भी बनने जा रहा था. उन दिनों वर्तमान तेलंगाना और मराठवाड़ा के कुछ हिस्सों को मिलाकर हैदराबाद रियासत अस्तित्त्व में थी, जिस पर पिछले कई वर्षों से निजाम शासन कर रहे थे. सरदार पटेल ने निजाम से आग्रह किया था कि भारत में मिल जाईये, हम आपका पूरा ख़याल रखेंगे और आपका सम्मान बरकरार रहेगा. निजाम रियासत की बहुसंख्य जनता हिन्दू थी, जबकि शासन निजाम का ही होता था. लेकिन निजाम का दिल पाकिस्तान के लिए धड़क रहा था. वे ऊहापोह में थे कि क्या करें? क्योंकि हैदराबाद की भौगोलिक स्थिति भी ऐसी नहीं थी, कि वे पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के साथ को जमीनी तालमेल बना सकें, क्योंकि बाकी चारों तरफ तो भारत नाम का गणराज्य अस्तित्व में आ ही चुका था. फिर निजाम ने ना भारत, ना पाकिस्तान अर्थात “स्वतन्त्र” रहने का फैसला किया. निजाम की सेना में फूट पड़ गई, और दो धड़े बन गए. पहला धड़ा जिसके नेता थे शोएबुल्लाह खान और इनका मानना था कि पाकिस्तान से दूरी को देखते हुए यह संभव नहीं है कि हम पाकिस्तानी बनें, इसलिए हमें भारत में विलय स्वीकार कर लेना चाहिए, लेकिन दूसरा गुट जो “रजाकार” के नाम से जाना जाता था वह कट्टर इस्लामी समूह था और उसे यह गुमान था कि मुसलमान हिंदुओं पर शासन करने के लिए बने हैं और मुग़ल साम्राज्य फिर वापस आएगा. रजाकारों के बीच एक व्यक्ति बहुत लोकप्रिय था, जिसका नाम था कासिम रिज़वी. 


(Kasim Rizvi) 

कासिम रिज़वी अलीगढ़ से वकालत पढ़कर आया था और उसके जहरीले एवं उत्तेजक भाषणों की बदौलत वह जल्दी ही रियासत के प्रधानमंत्री मीर लईक अली का खासमखास बन गया. कासिम रिज़वी का स्पष्ट मानना था कि निजाम को दिल्ली से संचालित हिंदुओं की सरकार के अधीन रहने की बजाय एक स्वतन्त्र राज्य बने रहना चाहिए. अपनी बात मनवाने के लिए रिज़वी ने सरदार पटेल के साथ कई बैठकें की, परन्तु सरदार पटेल इस बात पर अड़े हुए थे कि भारत के बीचोंबीच एक “पाकिस्तान परस्त स्वतंत्र राज्य” मैं नहीं बनने दूँगा. कासिम रिज़वी धार्मिक रूप से एक बेहद कट्टर मुस्लिम था. सरदार पटेल के दृढ़ रुख से क्रोधित होकर उसने रजाकारों के साथ मिलकर निजाम रियासत में उस्मानाबाद, लातूर आदि कई ठिकानों पर हिन्दुओं की संपत्ति लूटना, हत्याएँ करना और हिन्दुओं को मुस्लिम बनाने जैसे “पसंदीदा” कार्य शुरू कर दिए. हालाँकि कासिम के इस कृत्य से निजाम सहमत नहीं थे, लेकिन उस समय तक सेना पर उनका नियंत्रण खो गया था. इसी बीच कासिम रिज़वी ने भारत में विलय की पैरवी कर रहे शोएबुल्ला खान की हत्या करवा दी. MIM का गठन नवाब बहादुर यार जंग और कासिम रिजवी ने सन 1927 में किया था, जब हैदराबाद में उन्होंने इसे एक सामाजिक संगठन के रूप में शुरू किया था. लेकिन जल्दी ही इस संगठन पर कट्टरपंथियों का कब्ज़ा हो गया और यह सामाजिक की जगह धार्मिक-राजनैतिक संगठन में बदल गया. 1944 में नवाब जंग की असमय अचानक मौत के बाद कासिम रिज़वी MIM का मुखिया बना और अपने भाषणों की बदौलत उसने “रजाकारों” की अपनी फ़ौज खड़ी कर ली (हालाँकि आज भी हैदराबाद के पुराने बाशिंदे बताते हैं कि नवाब जंग कासिम के मुकाबले काफी लोकप्रिय और मृदुभाषी था, और कासिम रिजवी ने ही जहर देकर उसकी हत्या कर दी). MIM के कट्टर रुख और रजाकारों के अत्याचारों के कारण 1944 से 1948 तक निजाम राजशाही में हिंदुओं की काफी दुर्गति हुई. बहरहाल, अब तक आपको MIM के मूल DNA के बारे में काफी कुछ समझ में आ गया होगा. अब आगे... 

सरदार पटेल MIM और कासिम की रग-रग से वाकिफ थे. October Coup – A Memoir of the Struggle for Hyderabad नामक पुस्तक के लेखक मोहम्मद हैदर ने कासिम रिजवी से इंटरव्यू लिया था उसमें रिजवी कहता है, “निजाम शासन में हम भले ही सिर्फ बीस प्रतिशत हों, लेकिन चूँकि निजाम ने 200 साल शासन किया है, इसका अर्थ है कि हम मुसलमान शासन करने के लिए ही बने हैं”, इसी पुस्तक में एक जगह कासिम कहता है, “फिर एक दिन आएगा, जब मुस्लिम इस देश पर और निजाम हैदराबाद पर राज करेंगे”. जब सरदार पटेल ने देखा कि ऐसे कट्टर व्यक्ति के कारण स्थिति हाथ से बाहर जा रही है, तब भारतीय फ़ौज ने “ऑपरेशन पोलो” के नाम से एक तगड़ी कार्रवाई की और रजाकारों को नेस्तनाबूद करके सितम्बर 1948 में हैदराबाद को भारत में विलय करवा दिया. सरदार पटेल ने MIM पर प्रतिबन्ध लगा दिया और कासिम रिजवी को गिरफ्तार कर लिया गया. चूँकि उस पर कमज़ोर धाराएँ लगाई गईं थीं, और उसने भारत सरकार की यह शर्त मान ली थी कि रिहा किए जाने के 48 घंटे के भीतर वह भारत छोड़कर पाकिस्तान चला जाएगा, सिर्फ सात वर्ष में अर्थात 1957 में ही वह जेल से बाहर आ गया. माफीनामे की शर्त के मुताबिक़ उसे 48 घंटे में भारत छोड़ना था. कासिम रिजवी ने ताबड़तोड़ अपने घर पर MIM की विशेष बैठक बुलाई.  


(Abdul Wahid Owaisi) 

डेक्कन क्रॉनिकल में इतिहासकार मोहम्मद नूरुद्दीन खान लिखते हैं कि भारतीय फ़ौज के डर से कासिम रिजवी के निवास पर हुई इस आपात बैठक में MIM के 120 में से सिर्फ 40 प्रमुख पदाधिकारी उपस्थित हुए. इस बैठक में कासिम ने यह राज़ खोला कि वह भारत छोड़कर पाकिस्तान जा रहा है और अब सभी लोग बताएँ कि “मजलिस” की कमान संभालने में किसकी रूचि है? उस बैठक में मजलिस (MIM) में भर्ती हुआ एक युवा भी उत्सुकतावश पहुँचा हुआ था, जिसका नाम था अब्दुल वाहिद ओवैसी (अर्थात वर्तमान असदउद्दीन ओवैसी के दादा). बैठक में मौजूद वरिष्ठ नवाब मीर खादर अली खान ने ओवैसी का नाम प्रस्तावित किया और रिजवी ने इस पर अपनी सहमति की मुहर लगाई और पाकिस्तान चला गया. वह दिन है, और आज का दिन है... तब से MIM पर सिर्फ ओवैसी परिवार का पूरा कब्ज़ा है. 


अब्दुल वाहिद ओवैसी ने MIM के साथ All India शब्द भी जोड़ दिया और वह AIMIM बन गई. कासिम रिजवी से प्राप्त “कट्टर इस्लामिक परंपरा” को अब्दुल वाहिद ने भी जारी रखा, और जहरीले भाषण देने लगा. 14 मार्च 1958 को हैदराबाद पुलिस ने ओवैसी को भडकाऊ भाषण, दंगा फैलाने, गैर-मुस्लिमों के प्रति घृणास्पद बयान देने के कारण गिरफ्तार कर लिया. वाहिद ओवैसी ग्यारह महीने तक चंचलगुडा जेल में कैद रहा. वाहिद ओवैसी की गिरफ्तारी को उनके बेटे सुलतान सलाहुद्दीन ओवैसी ने आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने उसे खारिज कर दिया और ओवैसी को जेल में ही रहना पड़ा. 1976 में अपने पिता की मौत के बाद सुलतान सलाउद्दीन ओवैसी ने AIMIM की ताजपोशी हासिल की और पूरे आंध्रप्रदेश में इसका विस्तार करना आरम्भ किया. ओवैसी परिवार शुरू से ही हैदराबाद को अपनी रियासत समझता रहा है, इसीलिए बादशाहों की तर्ज पर पहले अब्दुल वाहिद, फिर सुलतान सलाहुद्दीन और अब असदउद्दीन ओवैसी इस पार्टी को अपनी निजी जागीर समझकर चलाते आए हैं. मैं समझ सकता हूँ, कि आपको अचानक कश्मीर याद आ गया होगा, जहाँ शेख अब्दुल्ला, फारुक अब्दुल्ला और अब उमर अब्दुल्ला अपनी “जागीर” चला रहे हैं.  


(Sultan Salahuddin Owaisi) 

बहरहाल, जब हैदराबाद में आप ओवैसी खानदान के किसी चश्मो-चिराग से AIMIM का इतिहास पूछेंगे अथवा उनकी वेबसाईट पर जाएँगे तो आपको बताया जाएगा कि AIMIM की स्थापना मौलवी अब्दुल वाहिद ओवैसी ने 1958 में की, जिन्हें “राजनैतिक कारणों और मुसलमानों की आवाज़ उठाने” के जुर्म में दस माह की जेल हुई थी. अपना “काला इतिहास” बताने में AIMIM को इतनी शर्म (या कहें धूर्तता) आती है कि वेबसाईट कासिम रिज़वी और उसके रजाकारों द्वारा किए गए कट्टर और हिंसक कारनामों के बारे में एकदम खामोश रहती है. “अल-तकैया” की नीति अपनाते हुए 1948 से 1957 के बीच का इतिहास गायब कर दिया गया है. अब आपको अकबरुद्दीन ओवैसी के जहरीले और धार्मिक भाषणों तथा पुराने हैदराबाद में ओवैसी परिवार की बेताज बादशाहत एवं अकूत धन-संपत्ति सहित इसी परिवार के विभिन्न ट्रस्टों के माध्यम से तमाम स्कूल-कॉलेज-अस्पताल-संस्थाएँ आदि पर पूर्ण कब्जे की कहानी और इसका DNA समझ में आ गया होगा.  

ओवैसी के बढ़ते राजनैतिक रसूख से यूपी-बिहार और महाराष्ट्र सहित देश के कई भागों में एक विशिष्ट किस्म की “सेकुलर बेचैनी” उभरने लगी है. महाराष्ट्र विधानसभा के गत चुनावों में ओवैसी ने अपने कई उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे, और उनमें से दो विधायक चुने भी गए. इसके अलावा औरंगाबाद नगर निगम में भी AIMIM दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. फिलहाल असदउद्दीन ओवैसी इसके लोकसभा सांसद हैं, और अकबरुद्दीन ओवैसी सहित इस पार्टी के सात विधायक तेलंगाना विधानसभा में मौजूद हैं. मुस्लिम वोटों के प्रमुख सौदागर अर्थात समूचे देश में काँग्रेस, यूपी में मुलायम सिंह, बिहार में लालू-नीतीश और महाराष्ट्र में NCP ये सभी लोग मुसलमानों के बीच ओवैसी के चढ़ते बुखार से परेशान हैं. अपने पिछले बयानों में ये सभी पार्टियाँ AIMIM और ओवैसी बंधुओं को “सेकुलरिज़्म” का सर्टिफिकेट बाँट चुकी हैं, परन्तु जब ओवैसी ने पहले महाराष्ट्र और अब बिहार चुनावों में मजबूत दस्तक दी है, तब से (कु) बुद्धिजीवियों द्वारा सेकुलरिज़्म का यह सर्टिफिकेट उनसे वापस लिया जा रहा है. मजे की बात यह है कि पुराने हैदराबाद में ओवैसी के एकछत्र साम्राज्य और अन्य राज्यों के मुस्लिम वोटरों में सेंधमारी से सिर्फ सेकुलर बिरादरी ही परेशान है, मुस्लिमों का एक वर्ग भी अब ओवैसी बंधुओं की अनियमितताओं और दबाव की राजनीति के खिलाफ आवाज़ उठाने लगा है. 


(Asaduddin Owaisi) 

हाल ही में मुस्लिम मिरर.कॉम नामक वेबसाईट पर आए एक लेख में ओवैसी बंधुओं पर कई तीखे सवाल दागे गए हैं. किसी मुस्लिम द्वारा ही लिखे गए इस लेख में ओवैसी बंधुओं से उनका इतिहास खोदते हुए सवाल पूछा गया है कि जब कासिम रिज़वी पाकिस्तान भाग गया तो उस समय AIMIM के पास जो संपत्ति और मालमत्ता थी उस पर ओवैसी परिवार ने कब्ज़ा कर लिया, वह संपत्ति कितनी थी और उसका हिसाब-किताब क्या है? इसी प्रकार इस मुस्लिम लेखक ने इस लेख में यह सवाल भी किया है कि सुलतान सलाहुद्दीन ओवैसी के जमाने से वक्फ की संपत्ति जिस अनुपात में घटती गईं, ओवैसी परिवार की संपत्ति उसी अनुपात में बढ़ती गई, ऐसा क्योंकर हुआ? सलाहुद्दीन ओवैसी वर्षों तक सांसद रहे, उसके बाद असदउद्दीन भी सांसद हैं, एक ही परिवार से अकबरुद्दीन भी विधायक हैं, इसके अलावा चचेरे-ममेरे-फुफेरे भाईयों-भतीजों की टीम भी विधायकी, महापौर और पार्षदों के पदों पर काबिज है, इस “ओवैसी परिवारवाद” के बारे में कोई जवाब नहीं मिलता. ओवैसी बंधुओं से इस लेखक का अधिक चुभने वाला सवाल यह है कि हैदराबाद और तेलंगाना के बड़े हिस्से में दारुल उलूम द्वारा संचालित मुसलमानों की शिक्षण संस्थाएँ और मदरसे धीरे-धीरे बन्द क्यों होते चले गए, जबकि ओवैसी परिवार के ट्रस्ट द्वारा संचालित निजी स्कूल-कॉलेज जमकर फल-फूल रहे हैं. इसके अलावा जब से ओवैसी परिवार की मुठ्टी में सत्ता बन्द है, तब से लेकर आज तक हैदराबाद में कई बार हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए, लेकिन फिर भी उस समय ओवैसियों ने सत्ताधारी काँग्रेस का दामन नहीं छोड़ा, ना ही काँग्रेस की कोई आलोचना की. चलो माना कि ये तो सुलतान सलाहुद्दीन के समय की बात थी, लेकिन जब से असदउद्दीन ओवैसी के हाथ में AIMIM के सत्ता-सूत्र आए हैं, उसके बाद ओल्ड मलकापेट मस्जिद की जमीन अतिक्रमणकारियों ने हथियाई, रामोजी फिल्म सिटी में वक्फ बोर्ड की जमीन रामोजी ने कब्ज़ा कर ली, किरण कुमार रेड्डी तथा राजशेखर रेड्डी के रिश्तेदारों ने भी हैदराबाद में वक्फ बोर्ड की मौके की जमीन लूट ली, लेकिन असदुद्दीन ओवैसी चुप्पी साधे रहे. ओवैसी बंधुओं को अचानक इस्लाम की याद तब आई जब मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी से उनके सम्बन्ध खटास भरे हुए और रेड्डी ने “ओवैसी परिवार की शिक्षा और चिकित्सा इंडस्ट्री” अर्थात मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों की जाँच और अनियमितताओं के बारे में पूछताछ आरम्भ की. 

फिलहाल ओवैसी बंधु अपनी पार्टी को “अखिल भारतीय” बनाने के चक्कर में पूरे देश में मुस्लिम वोटरों की थाह ले रहे हैं और कथित सेकुलरों का दुर्भाग्य कहें कि मुस्लिमों का एक तबका इनकी पार्टी की तरफ आकर्षित भी हो रहा है. हिन्दू संगठन ओवैसी को शुरू से ही संदेह की निगाह से देखते आए हैं, क्योंकि अधिकाँश हिंदुओं को उनके परिवार और रजाकारों के “काले इतिहास” के बारे में जानकारी है. क्या अब तक आप ओवैसियों के इस पाकिस्तान परस्त, धार्मिक कट्टरतापूर्ण व्यवहार तथा हैदराबाद में उनके भ्रष्टाचार, एकाधिकार और कब्जे की राजनीति के इतिहास से परिचित थे? मुझे यकीन है, नहीं होंगे. क्योंकि जब हमारे देश के कथित सेकुलर बुद्धिजीवी, वामपंथी इतिहासकार और पत्रकारनुमा व्याख्याकारों को दिल्ली में ठीक उनकी नाक के नीचे इमाम बुखारी की “तमाम बीमारियाँ” ही नहीं दिखाई देतीं, तो हैदराबाद तो उनके लिए बहुत दूर है. 

Tuesday, September 22, 2015

Why Hindu Nationalistic Academia is Lagging Behind

विचार, प्रचार और राष्ट्रवादी बौद्धिक असफलताएँ : कारण और निवारण 

(बंगलौर निवासी भाई गौरव शर्मा द्वारा लिखित एक उम्दा लेख जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगा) 

विषय प्रवेश
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किसी भी समाज में विचार बरसों बरस के लिए कैसे स्थापित होते हैं इसको समझना है तो भारत में वामपंथ को समझिए , आज गंभीर "राष्ट्रवादियों" का एक बहुत बड़ा तबका वामपंथियों को कोसने में अपना समय खर्च करता है , क्यों ? क्या वामपंथी एक दो राज्य छोड़कर कहीं सत्ता में हैं ? क्या उनका कोई व्यापक जनाधार है ? क्या उनका काडर बेस है ? क्या यूवा उनके विचार की तरफ तरफ आकर्षित हैं ? नहीं , सबका जवाब नहीं में ही आएगा , ऐसा कुछ भी नहीं है फिर भी देश के केंद्र में और आधे राज्यों में राज करने वाली विचारधारा के लोग वामपंथ से भयाक्रांत हैं ? क्यों ? जवाब है  उस विचार को जीने वाले और उसके लिए माहौल बनाने वाले विचारक / प्रचारकों का  "बौद्धिक विमर्श" (intellectual discourse) और सूचना की व्याख्या (interpretation of information ) करने वाली लगभग सभी प्रकार की संस्थाओं पर प्रभुत्व !! आगे बढ़ने से पहले ये भी बताना ज़रूरी है की एक प्रबुद्ध विचारक एक अच्छा प्रचारक भी सिद्ध हो ये ज़रूरी नहीं , खासकर वह जो समकालिक (contemporary ) विचारों को स्वीकारते हुए भी अपनी विचारधारा को समझा और फैला सके !!

दरअसल जब जब भी मैं वामपंथ को इस लेख में संदर्भित करूँ तब तब आप उसे समाजवाद , नेहरुवाद , जिहादवाद के साथ ही समझियेगा क्योंकि ये सब चचेरे ममेरे भाई हैं , सब एक दूसरे के पूरक हैं और एक दूसरे को बचाने समय समय पर आगे आते रहे हैं , यही पूरी बहस का सबसे रोचक पहलु भी है और सबसे दुःखद भी , क्योंकि राष्ट्रवाद इतना सहज और पवित्र विचार होते हुए भी अलग थलग दिखाई देता है  , संघ परिवार के उद्भव के सौ साल बाद तक भी राष्ट्रवाद अकेला चल रहा है , लाखों करोड़ों की पैदल सेना है , पर प्रचारक रुपी किले नहीं है !! मैं बचपन से संघ के वातावरण में ही पला बढ़ा हूँ , सैकड़ों संत रुपी विचारनिष्ठ तपस्वियों और मनीषियों को बहुत करीब से देखा है , इसलिए ये कहना की संघ परिवार के पास विचारक ही नहीं है ये उस महान संगठन के ऊपर मेरे जैसे अल्पज्ञानी का दिया हुआ लांछन होगा !! पर याद रखें आप जनता का दिल जीत लें , पर राज्य तो किले जीतने वाले का ही कहलाता है , "राज्य" के संदर्भ यहाँ उस  बौद्धिक विमर्श से है जिसमे हम हमेशा हारते आये हैं , पैदल की सेना रवीश कुमार पर गालियों की बौछार कर सकती है पर उसे हरा नहीं सकती , रवीश कुमार को हराने के लिए रवीश कुमार जैसे ही चाहिए ,रवीश कुमार महान भाषायी छलावे बाज हो , प्रोपगेंडिस्ट हो , पर लोग उसे सुनते हैं , सुनना चाहते हैं , और यही हमारी कुंठा का भी कारण है की हम उसे वैचारिक रूप से परास्त क्यों नहीं कर पा रहे ? उसी कुंठा से गालियां पैदा होती हैं !! 

बहस को थोड़ा सा अलग मोडते हुए ,  रवीश कुमार और उनके सोशल मीडिया छोड़ने की बहस के और भी पहलु हैं जिन्हे यहाँ बताना जरूरी है , उदाहरणतः , 2011  की कोई बहस हाल ही में यूट्यब पर देख रहा था जिसमे विनोद दुआ नरेंद्र मोदी के लिए ये शब्द इस्तेमाल करते हैं की " दस साल से ये आदमी गुजरात की जनता को टोपी पहना रहा है" , उसी दौर की ऐसी ही किसी बहस का मुझे याद है जिसमे रवीश कुमार मोदी के लिए कहते हैं " मजमा लगाकर चूरन बेचने और देश के लिए जान देने में फर्क है " , अब आप मुझसे इसपर बहस मत कीजियेगा की ये वाक्य किसी राज्य के निर्वाचित मुख्यमंत्री के लिए  "अपशब्द" या गाली की श्रेणी में नहीं आते !! अब इन स्टूडियो मठाधीशों के अहंकार में खलल इसलिए पड़ गया की जो जनता इनके ऐसे कथन सुनकर घर के ड्राइंग रूम में गालियां देती थी वो अब टेक्नोलॉजी के माध्यम से इतनी सक्षम हो गयी है की आपकी फेसबुक वॉल पर आकर आपको गालियां दे सके  और उसी से आपके अहम को चोट पहुँच रही है !! खैर ,  रवीश कुमार को हराना है तो गाली गलौच नहीं बल्कि अपनी तरफ के  "रवीश कुमार" खड़े करने होंगे , आइये ये समझते हैं की इस विचारधारा की लड़ाई में ऐसे प्रचारक क्यों जरूरी हैं !! 


प्रचारक रुपी किले क्यों जरूरी  ?
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आप में से कई बी पी सिंघल साहब को जानते होंगे , अब स्वर्गीय हैं , भगवान उनकी आत्मा को शांति दे , 2010 से 2012 -13 तक लगातार भाजपा , संघ की तरफ से सांस्कृतिक मुद्दों की पैरवी करने टीवी चैनलों पर आते थे , पैरवी क्या करते थे एक तरफा जीता जिताया मुद्दा हरवा कर आ जाते थे आप में से कोई आज भी उनकी बहसें देखेगा तो सोचेगा की ये वैचारिक आत्महत्या जैसा काम भाजपा इतने सालों तक कैसे करती रही ? कैसे इतनी आत्म मुग्ध बनी रही की जनता ऐसे प्रवक्ताओं के बारे में क्या सोच रही है उसे पता ही नहीं चला ? आपको बता दूँ सिंघल साहब यूपी के रिटायर्ड डायरेक्टर जनरल थे , मतलब उनकी वैचारिक क्षमता पर टिप्पणी शायद नहीं की जा सकती , तो फिर कमी कहाँ थी ? इसका व्यतिरेक (contrast ) समझना हो तो आज राकेश सिन्हा जी को सुनिए , कितनी बुद्धिमत्ता और अकाट्य ऐतिहासिक सन्दर्भों से समकालिक होते हुए अपनी बात को रखते हैं , शायद रवीश कुमार का असली "तोड़" गाली गलौच नहीं बल्कि राकेश सिन्हा जैसे हज़ारों प्रभावी विचारक / प्रचारक इस देश में पैदा करना है !! इसके एक दूसरे पर बड़े पहलु पर जाते हैं , इस देश में JNU जैसी कई संस्थाएं हैं जहाँ संपादकों , पत्रकारों और साहित्यकारों का सृजन होता है , यही सब "बुद्धिजीवी" मिलकर जनमानस का सृजन करते हैं ,  ऐसी संस्थाओं पर अपनी विचारधारा का प्रभुत्व कैसे हो इस पर भी सोचना होगा , क्योंकि ये प्रभुत्व ही आपके विचारों की छाप नीचले पायदानों तक ले जाने का काम करेगा !! 


प्रभावी प्रचारकों की कमी क्यों ?
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शीर्षक गलत है दरअसल , प्रभावी प्रचारकों की कमी नहीं बल्कि उन्हें मौके देने की कमी महसूस होती है , संघ जैसे अनुशासित संगठन में ऐसा होना प्राकृतिक सा लगता है , ऐसा होता है की "आधिकारिक लाइन" एक होती है और उसे भी व्यक्त करने वाले बहुत चुनिंदा लोग होते हैं , इसलिए विचारों की उन्निस्सी बीसी संभव ही नहीं होती , सेना की तरह स्वयंसेवक "विचारवान" होते हुए भी उस लाइन से अलग नहीं जाते , और जब लगातार पालन करते हुए ये एक परम्परा बन गयी तो लाइन से अलग बोलने लिखने वालों को अनुशासनहीन माना जाने लगा और छिठक दिया गया, गोविंदाचार्य जैसे उदाहरण हमारे पास हैं !! तो होता ये है की जब शीर्ष स्तर पर विचारों का तरलीकरण (dilution) सम्भव नहीं होता तो नीचे की पैदल सेना तक भी वही बात निर्मित होती है जिसमे लीक से एक प्रतिशत हटकर बात करने की भी कोई गुंजाईश ही नहीं होती , और यहीं से शुरू होता है "राष्ट्रवाद" का एकाकीपन , अब ये तो सब ही मानते हैं की संघ ही भारत में राष्ट्रवाद का ध्वजवाहक या ब्रांड एम्बेसेडर है , इसीलिये राष्ट्रवाद के चिंतन में सबसे ज्यादा अपेक्षाएं भी संघ से ही होनी चाहिए , एक उदाहरण देता हूँ , किसी भी राष्ट्रीय मुद्दे पर हमारा स्वर सबसे ऊंचा और प्रभावी तो होता है पर इकलौता होता है , पर "सुर से सुर" मिलाने वाली ना प्रवृत्ति होती है ना ऐसे लोग हमारे साथ होते हैं  , वो आवश्यक वृंदगान (chorus ) नहीं बनता जिससे उस मुद्दे पर जनभावना और जनजागृती और तीव्र हो उठे !! जैसे वामपंथी और नेहरूवादी विचारकों का उदाहरण लेते हैं , इस्लामिक आतंकवाद या वोटबैंक की राजनीती के मुद्दे पर मौलवियों को या इस्लामिक बुद्धिजीवियों को अकेले अपनी पैरवी नहीं करनी पड़ती  , ये स्टूडियो में आस पास बैठे , अख़बारों में स्तम्भ लिखने वाले तथाकथित विचारक उस वृंदगान का निर्माण कर देते हैं जिससे उस मुद्दे के खिलाफ प्रभावी तरीके से लड़ा जा सके , इधर हम अकेले थे और पूरे देश पर सत्तासीन होते हुए भी अकेले ही हैं !! तो ये वृंदगान कैसे बने , कैसे हमारे विचारों के करीब वाले लोग (दस बीस प्रतिशत इधर या उधर वाले या कहें उन्नीसे बीसे ) हम से जुड़ें और हमारे विचार को और मजबूत बनायें इसको हम नीचे समझेंगे , पर उससे पहले ये शंका दूर करना जरूरी है की सरकार बन जाना ही विचारधारा की जीत है क्या !!


क्या सरकार बन जाना ही विचारधारा की जीत है ? 
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कई लोगों को ये भ्रान्ति है की सरकार में निर्वाचित होना उस विचारधारा का जनता द्वारा अनुमोदन है , ये उतना ही गलत है जितना ये सोचना की दिल्ली के लोगों ने केजरीवाल को इसलिए चुना क्योंकि उन्होंने भ्र्ष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी !! 2014 के लोकसभा चुनाव में दरअसल कांग्रेस हारी है और एक व्यक्ति जीता है जिसका नाम है नरेंद्र मोदी।  विचारधारा ने उस व्यक्ति के लिए संघर्ष किया होगा , कहीं कहीं उत्प्रेरक का काम भी किया होगा पर इसे  ब्रांड "हिंदुत्व" को  भारतीय जनमानस का अनुमोदन समझने की भूल ना करें , कहीं अंतर्मन में उसके लिए सहानुभूति और प्रेम हो पर अनुमोदन तो कतई नहीं है ,  यही घर वापसी जैसे मुद्दों पर जनता की प्रतिक्रिया के रूप में हम देख भी चुके हैं !! इसके उलट, इतिहास में केंद्र और राज्यों की भाजपा शासित सरकारों ने भी ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे ये लगे की वे इसे जनता का अनुमोदन मानकर काम कर रहे हैं , उन्होंने ठीक वैसे काम किया जैसे राजनीतिक दल सामान्यतः काम करते हैं , अंग्रेजी में कहें तो performative या symbolic aspect अलग (की हाँ हम भी इस विचारधारा के लिए कटिबद्ध हैं ) और कार्यशैली निरीह सामान्य , हाँ थोड़ी बहुत ईमानदारी वाला प्रशासन जरूर दिखता रहा है !! इस विषय पर भी जिम्मेदार लोग दो तरह की बातें करते हैं , एक तरफ तो कहते हैं की सरकार बन जाने  से विचारधारा जीती है और दूसरी और चुनाव के वक्त सुनाई पड़ता है की " हमारे लिए विधायक या सांसद सिर्फ एक हाथ है जो संसद में वोटिंग के समय बटन दबायेगा , इसलिए हम इसकी ज्यादा चिंता नहीं करते" , कहीं सुनाई पड़ता है की " राजनीती में जीतना किसी भी हाल में जरूरी है" और उसी तर्क पर कांग्रेस से आये दलबदलूओं को लगे हाथ सत्ता की चाबी दी जाती है , आश्चर्य नही की फिर यही "हाथ" जब स्मार्टफोन पकडे विधानसभा में पोर्न फिल्म देखते हैं तो बिचारी विचारधारा ओंधे मुह धड़ाम गिरती सी दिखती है !! इसलिए एक विचार पर सहमत होना जरूरी है , सरकार बनने से विचारधारा की जीत है या नहीं है ?

भाजपा ने विचारधारा को मजबूत करने के लिए क्या काम किया इसकी भी बात करेंगे पर पहले समझते हैं की हमारे विचार से निकटता रखने वालों को कैसे जोड़ा जाए !! (जो आपके ना होकर भी आपके मुद्दे पर सहमती का माहौल बनायें )


वृंदगान कैसे बने 
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मेरे पाठक ज्यादातर सोशल मीडिया से हैं , उन्हें राजीव मल्होत्रा जी का नाम बताने की ज़रुरत नहीं है , इस एक मनीषी ने राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की जितनी सेवा है उसे व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं , पढ़े लिखे शहरी युवा या कहें बुद्धिजीवी वर्ग को एक मुख्यधारा (मुख्यधारा है मानवतावाद , धर्म निरपेक्षता ) से अलग विचार के लिए संतुष्ट करना बहुत टेढ़ी खीर होती है , मल्होत्रा जी ने ये जटिल काम एक बहुत बड़ी सफलता के साथ पूरा किया है !! एक बार किसी पत्रकार ने उनसे विश्व हिन्दू परिषद या संघ से जुड़ा कोई प्रश्न पूछा , उन्होंने सीधे कहा " उनसे जुड़े प्रश्न उनसे ही पूछिये " , इतना कहना समझने वालों के लिए काफी होगा की दूरियां किस कदर हैं , वृंदगान बनाना तो दूर की बात यहाँ लोग मौन स्वीकृति भी देना नहीं चाहते !! इसमें दोनों और के अहम को मैं दोष देना चाहूंगा , एक तरफ एक संगठन है जो सोचता है की हमारे विचार से उन्नीसे व्यक्ति से हमें कोई लेना देना नहीं , दूसरी और व्यक्ति हैं जिनका अपना "हठ" है , ये सब करीब आना तो दूर एक हॉल में एक साथ किसी मिलन समारोह में भी साथ नहीं बैठना चाहते !! पर ये बात याद रखी जानी चाहिए की वैचारिक लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती , खासकर तब जब आप को शत्रु के केम्प में कौन कौन है और किस किस भेस में बैठा है उसका भी ज्यादा भेद नहीं हो , आज पत्रकार , साहित्यकार , संपादक , यहाँ तक की फिल्म डाइरेक्टर और कलाकार तक भी किसी न किसी विचारधारा को आगे बढ़ाने एक "एजेंट" की भूमिका में है , सामान्य जनता ये न कभी समझी थी ना कभी समझेगी , इसलिए उन्हें लगातार बेनकाब करने के कुचक्र में फंसकर अपनी जगहंसाई और अपना समय और ऊर्जा बर्बाद करने में कोई बुद्धिमत्ता नहीं !! बुद्धिमत्ता इसमें है की आप भी ऐसे प्रचारक विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित कीजिये जो समय समय पर अलग अलग मुद्दों पर तटस्थ आवाज़ के तौर पर आपके साथ वृंदगान कर सकें !! इसके तीन उदाहरण देता हूँ , राम सेतु के मुद्दे पर हम सब भावनात्मक बचाव करते रहे , जबकि पर्यावरणविदों का एक बहुत बड़ा समूह भी राम सेतु को बचाने के पक्ष में था , पर दिक्कत ये थी की ना वे हमारे साथ खड़े होना चाहते थे ना हम उनके साथ , इसलिए वृंद बनने की सारी संभावनाएं होते हुए भी नहीं बन पाया , सोचिये अगर पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्र में जुड़े और हमारे विचार के निकट लोगों को हमने जोड़ने की कोशिश की होती तो माहौल क्या और अच्छा नहीं बनता ? दूसरा उदाहरण , साध्वी प्रज्ञा को कैंसर है , हमारे सारे संगठनों को जैसे लकवा मारा हुआ है , कोई कुछ बोलता ही नहीं , इस डर में की लांछन उनपर भी ना लग जाए , क्या कुछ मानवाधिकार संगठनों में हमारी पैठ होती या पांच दस हमारे पैसे से खड़े हुए संगठन होते तो हमें भी बोलने की ज़रुरत नहीं पड़ती और काम ज्यादा प्रभावी ढंग से सध जाता !! तीसरा उदाहरण , समान नागरिक संहिता की बात हम करते हैं तो वो सांप्रदायिक रंग ले लेती है , क्यों ना ये आवाज़ लोकतान्त्रिक नागरिक अधिकारों की बात करने वाला कोई एनजीओ उठाये ? क्या फर्क नहीं पड़ेगा ? क्या असर ज्यादा नहीं होगा ?  सोचिये अगर ऐसा गैर राजनीतिक वृंदगान जनता में समान नागरिक संहिता के लिए लहर पैदा कर दे तो सरकार के लिए ये निर्णय लेना तो चुटकियों का काम हो जाये , पर सरकार भी किस किस्म की निठल्ली हैं इसको आगे समझते हैं , देखते हैं भाजपा की सरकारों ने आजतक विचारधारा के लिए  क्या किया -  


भाजपा का वैचारिक दामन 
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इस पूरी बहस में सबसे ज्यादा निराश भाजपा ने किया है , अगर आप किसी भाजपा शासित प्रदेश में रहते हैं और रोज़ अख़बार पढ़ते हैं तो आप देखते होंगे की मुख्यमंत्री के लिए हमेशा वहां के संपादकों और पत्रकारों की भाषा में एक नरम रुख रहेगा , कई बार तो उनका महिमामंडन और यश गान ही देखा जायेगा , पर हिंदुत्व , राष्ट्रवाद या फिर संघ के लिए वही जहर उगलू और प्रोपेगेंडा वाली भाषा रहेगी , समझने वाले समझ ही जाते हैं की पैसा कहाँ और किसके लिए लगा है  !! इसका थोड़ा थोड़ा असर तो अब दिल्ली के मीडिया हाउसों में भी देखने को मिल रहा है , जहाँ प्रधानमंत्री का यश गान तो हो रहा है पर राष्ट्रवाद का ? क्या पता !! विचारधारा की रीढ़ तो दूर की कौड़ी है , किसी ज़माने में जब इस दल के शीर्षस्थ नेताओं के मुख्य सलाहकार बृजेश मिश्र और सुधींद्र कुलकर्णी जैसे राष्ट्रवाद से नफरत करने वाले लोग हों तो सोचना पड़ेगा की सत्ता में आने के बाद ये वैचारिक नपुंसकता का कारण क्या होता होगा !! वैसे हमें ये भी समझना होगा की बिना विचारकों और प्रचारकों की रीढ़ तैयार किये , बिना उनके सृजन केन्द्रों (जो हमने पहले खडं में समझा ) पर प्रभुत्व स्थापित किये विचारधारा का गुणगान इन कॉर्पोरेट दलालों से करवाना लगभग असंभव ही है !! एक उदाहरण देता हूँ , आपके राज में एक सरस्वती शिशु मंदिर का आचार्य अरबपति खनन कारोबारी बन गया , और ये तो सिर्फ एक उदाहरण है , ऐसे सेकड़ो व्यापारी , बिल्डर , उद्योगपति आपसे लाभान्वित होते हैं , क्या ऐसे धन्ना सेठ कोई अख़बार , कोई न्यूज़ चैनल खड़े नहीं कर सकते जिनका स्तर इन एनडीटीवी और टाइम्स नाउ से बेहतर हो और जो राष्ट्रवाद की अलख भी जगाये ? 

इसका व्यतिरेक देखना हो तो पश्चिम बंगाल के अख़बार उठाइये , ममता बेनर्जी के सत्ता में आने के इतने साल बाद भी वहां के लेख और ख़बरों में वामपंथ की बू आती है , बंगाल की आधी आबादी बिना कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बने वामपंथ की तरह सोचती समझती और सांस लेती है , आप आज जो ये हिंदुत्व पर विष वमन करते मुख्यधारा के पत्रकार , संपादक , फिल्म निर्देशक देखते हैं उनका अतीत टटोलियेगा , कहीं न कहीं बंगाल उनके बायोडाटा में होगा ही ,इसे अंग्रेजी में कहते हैं "ब्रेनवाश" या डीएनए मेनिपुलेशन  !! 

ये कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी की भाजपा तो विचारकों और प्रचारकों की ऐसी रीढ़ बनाना ही नहीं चाहती क्योंकि ऐसा हो गया तो ये रीढ़ और ये वैचारिक प्रचारक किले उनके ऑडिटर या ombudsmen की तरह हो जायेंगे जो ये सुनिश्चित करेंगे की पार्टी या सरकार विचारधारा से भटके नहीं और कोई एक सत्तारूढ़ व्यक्ति जो चाहे मन मुताबिक शासन कर सके और वही "परम सत्य" कहलाने लगे !! आजकल तो संघ का मार्गदर्शन भी कईयों को नागवार गुज़रता है , तभी तो वे दिन रात हिंदुत्व को गरियाने वाले राजदीप सरदेसाई की पुस्तक का विमोचन करने बेझिझक पहुँच पाते हैं , तभी तो वादे "जुमले" हो जाते हैं , तभी तो गजेन्द्र चौहान जैसे Yes Man से अच्छा व्यक्ति पूरे फिल्म जगत में उन्हें कोई मिल ही नहीं पाता , तभी तो नेताजी की फाइलें खुल ही नहीं पाती , तभी तो संघ के हस्तक्षेप से पहले तक वन रेंक वन पेंशन के वादे को डकारने का मूड बन जाता है ,तभी तो तरुण विजय , शेषाद्री चारी , अरुण शौरी जैसे विचारवान लोग हाशिये पर चले जाते हैं , तभी तो !! 

अंत में
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हिंदुत्व कह लीजिये , राष्ट्रवाद कह लीजिये या भारतीयता कह लीजिये , इस विचार में अनंत संभावनाएं हैं , इस विचार में मानवता की सेवा की , विश्व कल्याण करने की अपार शक्ति है , आज के पाखंड से भरे मानवतावाद और सेक्युलरवाद धीरे धीरे फेल हो रहे हैं , लोग दूसरे विचारों की और देख रहे हैं , इसी के लिए आने वाले दिनों में समकालिक होते हुए , यूवा और आधुनिक सोच को आत्मसात किये हुए , राष्ट्रवाद का प्रबल और प्रभावी प्रस्तुतीकरण करने वाले हज़ारों विचारक - प्रचारक हमें चाहिए होंगे, उनका बड़े पैमाने पर सृजन कैसे हो उसकी चिंता हमें करनी होगी , हम पहले से ही देरी से चल रहे हैं , वृंद गान के लिए हज़ारों लोग सैकड़ों संगठनों से चाहिए होंगे जिनका हमारे संगठन से कोई सम्बन्ध न हो फिर भी वैचारिक रूप से हम और वे एक साथ खड़े दिखें , हम अकेले नहीं चल सकते , अगर चलते हैं तो ये हमारा अहंकार है ,  हम इस विचारधारा के ध्वजवाहक हैं , हमारे पीछे चल रहे लोग हमारे साथ वैचारिक तारतम्य में है की नहीं ये देखना भी हमारा कर्तव्य है !! जब तक ये नहीं होगा तब तक रिमोट चालित पैदल सेना ऐसे ही गाली गलौच से किले फतह करने की कोशिश करती रहेगी और चुनिंदा सत्तासीन अपने ड्राइंग रूम से इस नज़ारे के चटकारे उड़ाते रहेंगे !! लड़ाई बहुत भीषण है , लड़ाई सभ्यताओं की है , मोदी या राहुल या केजरीवाल की नहीं !! तैयार रहें !!

Saturday, September 12, 2015

Census 2011 Illusionary Christian Population and Dalits of India

जनगणना के धार्मिक आँकड़े : बिगड़ती स्थिति और शतुरमुर्ग हिन्दू


हाल ही में केन्द्र सरकार ने विभिन्न संगठनों की माँग पर 2011 की जनगणना के धर्म संबंधी आँकड़े आधिकारिक रूप से उजागर किए हैं. जैसे ही यह आँकड़े सामने आए, उसके बाद से ही देश के भिन्न-भिन्न वर्गों सहित मीडिया और बुद्धिजीवियों में बहस छिड़ गई है. हिन्दू धार्मिक संगठन इन प्रकाशित आँकड़ों को गलत या विवादित बता रहे हैं, क्योंकि आने वाले भविष्य में इन्हीं का अस्तित्त्व दाँव पर लगने जा रहा है. जैसे-जैसे यह लेख आगे बढ़ेगा आप समझ जाएँगे कि उपरोक्त बात डराने-धमकाने के लिए नहीं की जा रही, बल्कि इसके पीछे तथ्य-आँकड़े और इतिहास मौजूद है. इन आँकड़ों पर सवाल उठाने वाले संगठनों एवं बुद्धिजीवियों का मानना है कि जनगणना के इन आँकड़ों में हिन्दू जनसँख्या को बढ़ाचढ़ाकर दिखाया गया है. जबकि मुस्लिमों और ईसाईयों की जनसँख्या के आँकड़े बेहद संदिग्ध हैं. इस समूची चर्चा में अधिकाँश वाद-विवाद-प्रतिवाद मुस्लिमों की जनसँख्या को लेकर हो रहा है, परन्तु जिस प्रमुख मुद्दे की तरफ लोगों का ध्यान अभी भी नहीं जा रहा, वह है ईसाई जनसँख्या. मुस्लिमों की जनसँख्या के आँकड़े सामने आते ही तमाम सेकुलर बुद्धिजीवियों ने इस आशय के लेख धड़ाधड़ लिखने आरम्भ कर दिए कि हिन्दू संगठन, मुस्लिम जनसँख्या को लेकर भय का झूठा माहौल पैदा करते हैं. हालाँकि आँकड़ों को गहराई से देखने के बाद इन सेकुलर-वामपंथी बुद्धिजीवियों का यह प्रचार भी नकली ही सिद्ध होगा. लेकिन असली चिंताजनक बात यह है कि ईसाई जनसँख्या के आँकड़े को लेकर कहीं कोई विमर्श नहीं चल रहा, जबकि वेटिकन के आश्रय में चर्च के माध्यम से धर्मांतरण की गतिविधियाँ सर्वाधिक चल रही हैं. जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 2011 में भारत में हिन्दू 80.5%, मुस्लिम 13.4%, ईसाई 2.3% हैं, यह तीनों ही आँकड़े संदिग्ध हैं. 



चलिए आगे बढ़ने से पहले एक परीक्षण करते हैं... जरा अपनी सामान्य समझ के अनुसार बताईये कि “क्रिस्टोफर पीटर”, “अनुष्का विलियम” और “सुनीता चौहान” में से कौन सा नाम ईसाई है?? ज़ाहिर है कि आप पहले नाम को तो निःसंकोच रूप से ईसाई घोषित कर देंगे, दूसरे नाम पर आप भ्रम में पड़ जाएँगे, लेकिन फिर भी संभवतः उसे ईसाई कैटेगरी में ही रखेंगे... लेकिन सुनीता चौहान जैसे नाम पर तो आप कतई शक ज़ाहिर नहीं कर सकते कि वह ईसाई हो सकती है, लेकिन ऐसा हो रहा है और जमकर हो रहा है. हाल ही में प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी दिनेश कार्तिक ने अपनी बचपन की मित्र दीपिका पल्लीकल से विवाह किया. अगले कुछ दिनों बाद अखबारों के माध्यम से देश को पता चला कि दिनेश-दीपिका का विवाह समारोह पहले एक चर्च में आयोजित किया गया, उसके कुछ दिन बाद हिन्दू रीतिरिवाजों से एक बार पुनः विवाह किया गया. ज़ाहिर है कि यह उनका निजी मामला है, परन्तु इससे आम जनता के मन में जो सवाल उठा, वह ये था कि “दिनेश” और “दीपिका” में से ईसाई कौन है? आखिर इन्हें चर्च में विवाह करने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? इन दोनों के नाम से तो यह कतई ज़ाहिर नहीं होता कि इनमें कोई ईसाई भी होगा. जब कुछ लोगों ने खोजबीन की तो पता चला कि दीपिका पल्लीकल ईसाई हैं, तो सब हैरत में पड़ गए. इसलिए प्रमुख बात यह है कि ईसाई जनसँख्या के वर्तमान आँकड़ों से यह पता करना लगभग असंभव है कि “हिंदुओं जैसे नाम रखने वाले” कितने लाख लोग ऐसे हैं, जिन्होंने जनगणना के समय अपना सही धर्म लिखवाया? भारत में कितने लोग हैं जो यह जानते हों कि आंधप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री “राजशेखर रेड्डी” कट्टर ईसाई थे और उनके दामाद अनिल कुमार तो घोषित रूप से वेटिकन के एवेंजलिस्ट (ईसाई धर्म प्रचारक) हैं?? यह एक तरफ हिंदुओं में अज्ञानता का आलम तो दर्शाता ही है, दूसरी तरफ हिन्दू दलितों एवं ग्रामीणों के धर्मांतरण हेतु वेटिकन की धोखाधड़ी और धूर्तता को भी प्रदर्शित करता है. 

पहले हम चंद आँकड़ों पर निगाह डाल लेते हैं, उसके बाद इस झूठ और धूर्तता के कारणों को समझने का प्रयास करेंगे. 2011 के जनगणना आंकड़ों के अनुसार भारत के ईसाईयों की जनसँख्या पन्द्रह राज्यों में बढ़ी है, जबकि छः राज्यों में कुछ कम हुई है. अरुणाचल प्रदेश में ईसाई जनसँख्या 18.70 से बढ़कर 30.30 प्रतिशत हो गई है, मणिपुर में ईसाईयों की संख्या 34% से बढ़कर 41.30% हुई है, जबकि मेघालय में ईसाई जनसँख्या 70.30% से बढ़कर 74.60% हुई है. उत्तर-पूर्व के राज्यों में सांख्यिकी और जनसँख्या अनुपात ईसाईयों के पक्ष में किस तेजी से बिगड़ा है, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1981 से 2001 के बीच में नागालैंड में हिन्दू जनसंख्या 14.36% से घटकर सिर्फ 7.70% रह गई, जबकि ईसाई जनसँख्या 80.2% से बढ़कर 90% हो गई. ध्यान देने वाली बात यह है कि 1951 में नागालैंड में 52% ईसाई थे. फिर पिछले पचास-साठ वर्ष में नागालैंड में ईसाईयों की जनसँख्या इतनी क्यों और कैसे बढ़ी? क्या ईसाई पंथ अचानक इतना अच्छा हो गया कि नागालैंड के आदिवासी ईसाई बनने के लिए उतावले हो उठे? नहीं... इसका जवाब वही है जो नागालैंड में जमीनी स्तर पर दिखाई देता है, अर्थात आदिवासियों का जमकर धर्मांतरण और बन्दूक के बल पर “नागालैंड फॉर क्राईस्ट” के नारे और पोस्टरों के जरिये दबाव बनाकर. क्या दिल्ली में बैठे और गुडगाँव/नोएडा तक सीमित किसी कथित राष्ट्रीय चैनल पर आपने इस बारे में कोई बहस या रिपोर्ट देखी-सुनी है? नहीं देखी होगी, क्योंकि विकृत सेकुलरिज़्म द्वारा “साम्प्रदायिकता” का अर्थ सिर्फ और सिर्फ हिन्दू साम्प्रदायिकता से लिया जाता रहा है. 

बहरहाल आगे बढ़ते हैं... जनगणना के सबसे चौंकाने वाले आँकड़े यह हैं कि अब भारत के सात राज्य ऐसे हैं, जहाँ हिंदुओं की जनसँख्या 50% से नीचे आ चुकी है, अर्थात वे तेजी से वहाँ अल्पसंख्यक बनने की कगार पर हैं. जम्मू-कश्मीर में हिन्दू 28.4%, पंजाब में 38.5%, नागालैंड में 8.7%, मिजोरम में सिर्फ 2.7%, मेघालय में 11.5%, अरुणाचल प्रदेश में 29% और मणिपुर में 41.4%. सुदूर स्थित केंद्रशासित लक्षद्वीप में हिंदुओं की संख्या सिर्फ 2.8% है. इस स्थिति में हमारे देश के कथित बुद्धिजीवियों को जो प्रमुख सवाल उठाना चाहिए वह ये है कि क्या इन राज्यों में हिंदुओं को “अल्पसंख्यक” के तौर पर रजिस्टर्ड किया जा चुका है? क्या इन राज्यों में हिंदुओं को वे तमाम सुविधाएँ मिलती हैं, जो अन्य राज्यों में मुस्लिमों और ईसाईयों को मिलती हैं? क्या इन राज्यों की योजनाओं एवं छात्रवृत्तियों में गरीब हिन्दू छात्रों एवं कामगारों को अल्पसंख्यक होने का लाभ मिलता है?? परन्तु ऐसे सवाल पूछेगा कौन? “तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी” तो मोदी सरकार को कोसने में लगे हुए हैं और नेशनल मीडिया(??) को इंद्राणी मामले से ही फुर्सत नहीं है. 


ईसाईयों की जनसंख्या के जो आँकड़े ऊपर दिए हैं वे प्रमुखता से उत्तर-पूर्व के राज्यों से हैं, चूँकि ये आँकड़े घोषित रूप में हैं. परन्तु इससे भी बड़ी समस्या उस ईसाई जनसँख्या की है, जिसने अपना धर्म छिपा रखा है, अघोषित रूप से वे ईसाई हैं, परन्तु हिन्दू नामों के साथ समाज में विचरते हैं. उड़ीसा के कंधमाल की घटना और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या को कोई भी भूला नहीं है. वह घटना क्यों हुई थी? ज़ाहिर है ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में जमकर हो रहे ईसाई धर्मांतरण की वजह से. अब यह कोई रहस्य नहीं रह गया है कि वेटिकन और चर्च का मुख्य ध्यान भारत के दूरदराज आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों पर होता है, जहाँ ये लोग “सेवा” के नाम पर बड़ी मात्रा में धर्मान्तरण करवा रहे हैं. गुजरात का डांग, मध्यप्रदेश के झाबुआ-बालाघाट, छत्तीसगढ़ का जशपुर, उड़ीसा के कंधमाल जैसे भारत के किसी भी दूरदराज कोने में आप चले जाईये वहाँ आपको एक चर्च जरूर मिलेगा. कई-कई गाँव ऐसे दिखाए जा सकते हैं, जहाँ एक भी ईसाई नहीं रहता, परन्तु वहाँ भी चर्च स्थापित है, ऐसा क्यों और कैसे? वास्तव में ईसाई धर्मांतरण हेतु चर्च, साम-दाम-दण्ड-भेद सभी नीतियाँ अपनाता है, इसके अलावा छल-कपट और धोखाधड़ी भी महत्त्वपूर्ण मानी जाती है. पहले “सेवा” के नाम पर अस्पताल, डिस्पेंसरी, स्कूल आदि खोले जाते हैं, फिर वहाँ आने वालों का धीरे-धीरे “ब्रेन वॉश” किया जाता है. चूँकि भारत में गरीबी जबरदस्त है, इसलिए चर्च को पैसों के बल पर धर्मान्तरण करवाने में अधिक समस्या नहीं आती. एक तो इनका “कथित सेवाकार्य” और दूसरे धन का लालच, इस चक्कर में बड़ी आसानी से भोले-भाले आदिवासी इनके जाल में फँस जाते हैं. जहाँ धन की जरूरत नहीं है, उदाहरणार्थ नागालैंड-मिजोरम जैसे इलाके जहाँ ईसाईयों की जनसँख्या 90% के आसपास है, वहाँ आदिवासियों को डरा-धमका कर ईसाई बनाया जाता है, जबकि केरल में कई ग्रामीण क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ छल-कपट का सहारा लिया जाता है. केरल में ईसाईयों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में जो चर्च स्थापित किए जा रहे हैं, वे छोटी-छोटी झोंपडियों में हैं, जिन पर “माता मरियम का मंदिर” लिखा जाता है, वहाँ पर “भगवा वस्त्र पहने हुए पादरी” मिलेगा ताकि ग्रामीणों में भ्रम पैदा किया जा सके. उसके बाद धोखाधड़ी के सहारे धीरे-धीरे धर्मांतरण करवा लिया जाता है. जिस प्रकार देश के कई जिले अब मुस्लिम बहुल बन चुके हैं इसी प्रकार देश के कई जिले अब ईसाई बहुल भी बन चुके हैं. निकोबार द्वीप समूह में 67% ईसाई हैं, कन्याकुमारी जिला 44.5% ईसाईयों को समेटे हुए है और केरल के कोट्टायम जिले में ईसाई जनसँख्या 44.6% है. इनके अलावा तमिलनाडु के तूतीकोरिन, तिरुनेलवेली जैसे जिलों में बड़े-बड़े विराट चर्चों का निर्माण कार्य आसानी से देखा जा सकता है. यह तो हुई ईसाई जनसँख्या की बात, जरा हम पहले मुस्लिम जनसँख्या को भी संक्षेप में देख लें, फिर वापस आएँगे ईसाईयों द्वारा हिन्दू नाम धरकर छल करने की समस्या के बारे में. 

2011 की जनगणना के अनुसार मुस्लिमों की संख्या 14.8% ही बताई जा रही है. यह आँकड़ा भी भ्रामक और जानबूझकर फैलाया जा रहा मिथ्या तथ्य है. क्योंकि केरल, असम, बंगाल, उत्तरप्रदेश, दिल्ली-बिहार जैसे राज्यों में जिस रफ़्तार से मुस्लिम जनसँख्या बढ़ रही है, यह आँकड़ा विश्वसनीय नहीं हो सकता. असम में मुस्लिम जनसँख्या का प्रतिशत 30.9 से बढ़कर 34.2, पश्चिम बंगाल में मुस्लिम प्रतिशत 25.2 से बढ़कर 27.9, केरल में 24.7 प्रतिशत से बढ़कर 26.6 प्रतिशत जबकि उत्तराखंड में यह प्रतिशत 11.9 से 13.9 हो गया है. असम के धुबरी जिले में मुस्लिम जनसँख्या 80% तक पहुँच चुकी है, इसी प्रकार पश्चिम बंगाल के लगभग 17 जिले ऐसे हैं जहाँ मुस्लिम जनसंख्या 40% के आसपास है, जबकि केरल के मलप्पुरम जैसे जिले 50% मुस्लिम आबादी वाले हो चुके हैं. बढ़ती मुस्लिम जनसंख्या पर तो कई संगठन अपनी चिंताएँ जता ही रहे हैं, इसलिए इस लेख में उस पर अधिक चर्चा नहीं की जा रही. असली समस्या है ईसाईयों द्वारा हिन्दू नामधारी होकर अपना धर्म छिपाना. 

हम सभी जानते हैं कि जब भी कोई मुस्लिम मतांतरण स्वीकार करता है तो उसे सबसे पहले अपना नाम बदलना होता है. किसी भी मुस्लिम नाम को समझना एक आम हिन्दू के लिए कतई भ्रामक या कठिन नहीं होता. परन्तु वेटिकन इस मामले में बहुत चतुर है, अर्थात जब कोई ग्रामीण या शहरी हिन्दू अथवा आदिवासी धर्मान्तरित होकर ईसाई बनता है तो उसे अपना नाम बदलने की कोई बाध्यता नहीं होती. इसीलिए हम और आप दीपिका पल्लीकल को हिन्दू ही मानते-समझते रहते हैं. भारत के सिर्फ ग्रामीण-आदिवासी क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी ऐसे लाखों-करोड़ों ईसाई हैं जो “गुपचुप” ईसाई बन चुके हैं, लेकिन यह बात सरकार को पता ही नहीं है. क्योंकि ना तो इन्होंने अपना हिन्दू नाम बदला है, और ना ही जनगणना के समय अपना धर्म ईसाई घोषित किया है. इन्होंने सिर्फ अपने घरों से हिन्दू देवी-देवताओं को बाहर करके यीशु और क्रॉस लगा लिया है, अपनी पूजा पद्धति बदल ली है. अब सवाल उठता है कि इन्होंने ऐसा क्यों किया? अपना धर्म छिपाकर इन्हें क्या हासिल होगा? इसका जवाब है हमारे देश की आरक्षण पद्धति एवं आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था. 


जैसा कि सभी जानते हैं, भारत के संविधान में आरक्षण की व्यवस्था हिन्दू, सिख और बौद्ध धर्म के SC (Scheduled Caste) दलितों को प्रदान की गई है. जबकि आदिवासियों को जो विशेष ST (Scheduled TRIBE) दर्जा हासिल है, उसमें वे किसी भी धर्म के तहत ST ही माने जाएँगे और उनका आरक्षित दर्जा बरकरार रहेगा. चर्च और धर्मांतरण कर चुके ईसाईयों की चालबाजी, धोखाधड़ी और कपट पद्धति यह होती है कि यदि धर्मान्तरित हो चुके दलितों ने घोषित कर दिया कि वे अब हिन्दू नहीं रहे, ईसाई बन चुके हैं तो वे तत्काल आरक्षण के सभी लाभों से वंचित हो जाएँगे. परन्तु यदि वे अपना हिन्दू नाम नहीं बदलें और हिन्दू SC-ST-OBC बनें रहें तो उन्हें नियमों के तहत आरक्षण मिलता रहेगा. भारत के संविधान और हिन्दू दलितों के साथ यही खेल हो रहा है. यह घातक खेल भारत की जनगणना के आँकड़ों को भी प्रभावित कर रहा है. 2011 के आंकड़ों के अनुसार हिन्दू जनसँख्या 80% के आसपास है, लेकिन वास्तव में यह बहुत ही कम है क्योंकि धर्मान्तरित दलितों ने अपना ईसाई धर्म घोषित नहीं किया है. राजशेखर रेड्डी और उनके दामाद की मेहरबानियों की वजह से तटीय आंध्रप्रदेश का 30% से अधिक हिस्सा ईसाई बन चुका है, लेकिन वे बड़े आराम से हिन्दू नामधारी बने हुए हैं तथा हिंदू दलितों के आरक्षण का हक छीन रहे हैं. भारत के तथाकथित “दलित चिंतकों” को इस बात की या तो फ़िक्र नहीं है, या शायद ऐसा हो कि फिलहाल भारत में जो दलित नेतृत्त्व है उनमें भी कई धर्मान्तरित हो चुके हैं. दिल्ली में चर्च के प्रमुख सत्ता केन्द्र में जॉन दयाल जैसे कट्टर ईसाई और NGOs पोषित-पल्लवित एवेंजेलिस्टो का गिरोह पिछले दस वर्ष से लगातार UPA सरकार पर दबाव बनाए हुए था कि “दलित ईसाईयों” को भी आरक्षण का लाभ मिले. इसके लिए संविधान संशोधन करना जरूरी है और यह UPA सरकार के लिए संभव नहीं था. 

अब वर्तमान स्थिति यह है कि लाखों-करोड़ों की संख्या में अनुसूचित जाति (SC) के लोगों ने पैसा लेकर ईसाई धर्म तो अपना लिया है, परन्तु नाम हिन्दू ही रखा है और जनगणना में अपना धर्म भी हिन्दू ही बताया हुआ है. ये लोग मजे से दोहरा लाभ ले रहे हैं, यानी वेटिकन से पैसा और सुविधाएँ तथा संविधान के तहत हिन्दू दलितों के हिस्से का आरक्षण भी. ऐसे में हो यह रहा है कि आरक्षण का जो वास्तविक हकदार है उसे आरक्षण नहीं मिल पाता. जिस दिन देश के दुर्भाग्य से “दलित ईसाईयों”(??) को भी आरक्षण मिलने लगेगा, उसी दिन ये सभी छद्म नामधारी अपने असली रूप में आ जाएँगे और खुद को हिन्दू धर्म से अलग घोषित कर देंगे. ऐसे लोग तन-मन-धन से तो काफी पहले ईसाई बन चुके हैं. हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति, हिन्दू परम्पराओं को सतत कोसने और गाली देने का काम तो वे आज भी “प्रगतिशीलता” के नाम पर कर ही रहे हैं और साथ ही आरक्षण की मलाई भी खा रहे हैं.  


जनगणना के फॉर्म में सिर्फ छह धर्मों की घोषणा करने को कहा गया है, हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन. इनके अलावा व्यक्ति यदि किसी और धर्म का है तो वह “अन्य” लिख सकता है. देश के कई हिस्सों में तथाकथित आधुनिक शिक्षा की बदौलत अमेरिका की देखादेखी एक “नया वर्ग” पैदा हो गया है, जो खुद को “एथेइस्ट” (अर्थात किसी भी धर्म को नहीं मानने वाला अथवा नास्तिक). दक्षिण भारत और विशेषकर तमिलनाडु में करूणानिधि जैसे नेता स्वयं को “नास्तिक” कहते हैं और रामसेतु को तुड़वाने के लिए पूरा जोर लगा देते हैं. ऐसे तथाकथित नास्तिकों की संख्या भी लाखों में पहुँच चुकी है जिन्होंने जनगणना में स्वयं को हिन्दू घोषित नहीं किया है, परन्तु वास्तविकता यह है कि इनमें से अधिकाँश संख्या में धर्मान्तरित ईसाई ही हैं. इनमें तमिलनाडु की द्रविड़ पार्टियों के नेता और कार्यकर्ता, नक्सल समर्थक वामपंथी और स्वयं को प्रगतिशील कहलाने वाले शहरी बुद्धिजीवी भी शामिल हैं. धर्मांतरण के लिए चर्च सारे हथकण्डे अपना रहा है, जहाँ एक तरफ वह मानवाधिकार समूहों, धर्म का अधिकार माँगने वाले समूहों तथा हिन्दू संस्कृति का हरसंभव और हर मुद्दे पर विरोध करने वाले NGOs को पैसा देकर पोषित कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह हिंदुओं में फ़ैली जाति व्यवस्था, कुप्रथाओं एवं कुरीतियों के खिलाफ काम कर रहे समूहों को भड़काकर तथा उन्हें धन मुहैया करवाकर हिंदुओं के बीच खाई को और चौड़ा करने का प्रयास भी कर रहा है. दुःख की बात यह है कि अपने इस कुत्सित प्रयास में चर्च काफी सफल हुआ है, और मजे की बात यह है कि अज्ञानतावश दलित संगठन एवं दलित बुद्धिजीवी चर्च को अभी भी अपना खैरख्वाह मानते हैं, जबकि चर्च उन्हीं के पीठ पीछे उन्हीं की जातियों में सेंध लगाकर उन्हें तोड़ रहा है. एक छोटा उदाहरण, वर्ष 2013-14 में सिर्फ तीन देशों अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी ने भारत में काम कर रहे ईसाई समर्थक NGOs तथा चर्च संबंधी मामलों को “आधिकारिक” रूप से 1960 करोड़ रुपयों की आर्थिक मदद पहुँचाई है. FCRA (विदेशी मुद्रा अधिनियम) के ये आँकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं. जिस तरह से वेटिकन, धर्मांतरण करवाने वाली संस्थाओं, एवेंजेलिस्ट कार्यकर्ताओं को अरबों रुपया पहुँचा रहा है, उसी से ज़ाहिर है कि इनका मकसद सिर्फ “सेवा” तो कतई नहीं हो सकता. जब नरेंद्र मोदी सरकार ने विदेशी मुद्रा अधिनियम में संशोधन करके विदेश से आने वाले धन का उपयोग लिखित स्वरूप में बताने को अनिवार्य बना दिया तथा दुनिया भर में सबसे बड़े चन्दा देने वाली दो संस्थाओं अर्थात “ग्रीनपीस” और “फोर्ड फाउन्डेशन” पर लगाम कसना आरम्भ किया, तब हल्ला मचाने और छाती पीटने वालों में सबसे आगे यही NGOs थे, जिनकी रोजी-रोटी धर्मान्तरण से चलती है. समस्या यह है कि भारत के गरीब हिन्दू दलित (और इनके नेता तथा संगठन) अभी चर्च की इस चालबाजी को समझ नहीं पा रहे.  

असल में जनगणना के समय जो फॉर्म भरा जाता है उसमें माँगी जाने वाली जानकारी बिलकुल सटीक प्रश्नों पर आधारित होनी चाहिए. धर्म के सम्बन्ध में “अन्य” वाला कॉलम तो बिलकुल हटा ही दिया जाना चाहिए. जिसका जो भी धर्म हो वह स्पष्ट लिखे, नास्तिक हो तो नास्तिक लिखे. इसके अलावा प्रत्येक परिवार में जितने भी अवयस्क हैं उनका धर्म संबंधी कॉलम अलग होना चाहिए. ऐसा करना इसलिए जरूरी है, ताकि यदि वह नाबालिग दो भिन्न धर्मों के माता-पिता से पैदा हुई संतान है तो उस पर पिता का धर्म लादने की जरूरत नहीं. हो सकता है कि अगली जनगणना में वह संतान वयस्क हो जाए और माता की तरफ का या दूसरा कोई धर्म अपना ले. साथ ही केन्द्र सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी कीमत पर “दलित ईसाईयों” (अर्थात धर्मान्तरण कर चुके) को आरक्षण का लाभ कतई ना मिलने पाए, चाहे इसके लिए संविधान संशोधन ही क्यों ना करना पड़े. इसी प्रकार OBC एवं दलितों के बीच यह जागरूकता फैलाने की भी आवश्यकता है कि आरक्षण के वास्तविक हकदार सिर्फ और सिर्फ वे ही हैं, ना कि धर्म बदल चुके उनके सजातीय बंधु. इन्हीं जातियों और समाजों के बीच में छिपे बैठे ईसाईयों को पहचान कर उन्हें आरक्षण से बाहर किया जाना जरूरी है, ऐसा करने से “वास्तविक हिन्दू दलित-ओबीसी” के आरक्षण प्रतिशत में अपने-आप वृद्धि हो जाएगी. दावे के साथ कहा जा सकता है कि यदि सरकार किसी दिन यह कह दे कि धर्मान्तरित हो चुके दलित-ओबीसी को भी हिंदुओं की तरह आरक्षण मिलेगा, तो वेटिकन के निर्देश पर ये छद्म हिन्दू नामधारी नव-ईसाई ताबड़तोड़ अपने “असली रूप यानी घोषित ईसाई” के रूप में आ जाएँगे और उस समय हिंदुओं को अपनी सही जनसँख्या और औकात पता चल जाएगी.

अब वर्तमान स्थिति यह है कि आधिकारिक रूप से भारत में हिन्दू जनसँख्या जो 2001 की जनगणना में 85% थी, अब 2011 में 80% से नीचे आ चुकी है. लेकिन क्या यह भी वास्तविक आँकड़ा है?? मूलनिवासी आंदोलन के नाम से जो भौंडा और घृणा फैलाने वाला आंदोलन समाज के अंदर ही अंदर चल रहा है, वे लोग खुद को हिन्दू मानते ही नहीं हैं. हिन्दू नामधारी लेकिन धर्मान्तरित हो चुके दलित भी ईसाई हो गए, हिन्दू नहीं रहे. नास्तिकतावादी और वामपंथी भी सिर्फ नाम के लिए हिन्दू हैं, यानी वे भी हिन्दू धर्म से अलग हुए. दक्षिण की द्रविड़ पार्टियों के नेता और समर्थक भी खुद को हिन्दू नहीं मानते. बांग्लादेश से अनाधिकारिक रूप से लगभग तीन करोड़ घुसपैठिये भारत में बैठे हैं, जिनके पास राशनकार्ड और आधार कार्ड भी है, इस 2% को भी जोड़िए... तो अब बताईये इस देश में “वास्तविक हिन्दू जनसंख्या” कितनी हुई? क्या यह 50-60% के नीचे नहीं है?? तो फिर जनगणना के ऐसे भ्रामक आँकड़े जारी करने की क्या तुक है? और क्या एक सभ्य देश को ऐसा करना चाहिए? जबकि सबसे बड़ा और डरावना सवाल यह है कि आखिर स्वयं “हिन्दू” लोग और “हिन्दू संगठन” छद्म रूप धारण किए हुए हिंदुओं की इस विकराल होती समस्या के प्रति क्या कर रहे हैं?? उनका रुख क्या है? उनकी योजना क्या है??

Friday, September 4, 2015

FTII Pune Communist White Paper

FTII के “लाल” कारनामों का श्वेत-पत्र 


जब से मोदी सरकार ने केन्द्र में सत्ता संभाली है, अक्सर हमें विभिन्न चैनलों और अखबारों में कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी “भगवाकरण हो रहा है” जैसा कुछ बडबडाते हुए मिल ही जाते हैं. “संस्थाओं का, शिक्षा का भगवाकरण हो रहा है” यह कथित आरोप कोई नई बात नहीं है, जब वाजपेयी सरकार में मुरलीमनोहर जोशी मानव संसाधन मंत्री थे, तब भी ऐसे कथित बुद्धिजीवी यही बात लगातार दोहराते थे. चूँकि मोदी सरकार इस बार पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई है, इसलिए वामपंथ नियंत्रित और विदेशों की नाजायज़ स्कॉलरशिप से “पोषित” बुद्धिजीवियों के गिरोह का स्वर इस बार और भी तीखे हैं. पिछले दो-तीन माह से पुणे स्थित फिल्म एंड टीवी इंस्टीट्यूट (FTII) में गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति को लेकर जो बवाल काटा जा रहा है, वह इसी गिरोह की कारस्तानी है. FTII में छात्रों के कंधे पर रखकर जो वामपंथी बन्दूक चल रही है, उसकी जड़ में इस संस्थान पर पिछले कई वर्षों का कब्ज़ा गँवाने का डर तथा इन वर्षों में किए गए तमाम लाल-काले कारनामों के उजागर होने का डर, यह दो प्रमुख कारण हैं. 


हाल ही में आई किसी नई फिल्म में एक संवाद था कि, “वो करें तो चमत्कार, और हम करें तो बलात्कार”. शिक्षा संस्थाओं के “भगवाकरण” और अन्य संस्थाओं को दक्षिणपंथी बनाने का आरोप ठीक ऐसा ही है जैसे कोई बलात्कारी व्यक्ति खुद को संत घोषित करते हुए सामने वाले पर चोरी का आरोप मढ़ने की कोशिश करे. मोदी सरकार द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र का उपयोग करते हुए जनता के धन से चलने वाली इस संस्था का प्रमुख नियुक्त करने को लेकर जैसा फूहड़ आंदोलन किया जा रहा है, वह इसी मानसिकता का नतीजा है. 1960 से लेकर अभी तक पिछले चालीस-पचास साल में वामपंथियों ने देश की विभिन्न शैक्षिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के साथ “बौद्धिक बलात्कार” किया है वह अकल्पनीय है, और यही लोग जब अचानक “भगवाकरण-भगवाकरण” चिल्लाने लगते हैं तो फिल्म का वही संवाद याद आता है. आईये पहले संक्षेप में देखें कि देश की जनता के टैक्स के पैसों पर चलने वाले इस संस्थान में इन बुद्धिजीवियों ने पिछले तमाम वर्षों में कैसी “लालमलाल” मचा रखी थी. 

FTII की स्थापना 1960 में पुणे स्थित प्रभात स्टूडियो के परिसर में हुई. आरम्भ में इसका नाम सिर्फ “फिल्म इंस्टीट्यूट ऑफ इण्डिया” (FII) था, 1974 में इसमें टीवी शब्द जोड़कर इसे FTII बनाया गया. इस संस्था के गठन का उद्देश्य था कि देश की नई पीढ़ी के प्रतिभावान छात्रों को दृश्य-श्रव्य माध्यमों की तकनीकी जानकारी और फिल्म निर्माण की बारीकियाँ सिखाई जाएँ. उस समय देश को आज़ादी मिले हुए अधिक समय नहीं हुआ था, गाँधी के वध के पश्चात नेहरू ने देश की सत्ता पर पूर्ण पकड़ बना ली थी. नेहरू ने वामपंथ के प्रति अपना प्रेम कभी नहीं छिपाया, इसलिए उन दिनों से ही वामपंथी विचारधारा ने भी कुछ क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करना आरम्भ कर दिया था. शीतयुद्ध के दिन थे और नेहरू का सोवियत प्रेम उफान पर था. भारत सिर्फ कहने भर का “गुटनिरपेक्ष” देश था, लेकिन वास्तव में वह रूस का बगलबच्चा ही बनता चला जा रहा था. भारत की प्रत्येक नीति और संस्थाओं का गठन रूस की साम्यवादी संस्थाओं के पैटर्न पर बनती थी. जैसा सोवियत संघ ने अपने देश की प्रत्येक संस्था पर पूर्णतः काबिज होने की नीति बनाई, ठीक उसी तरह भारत में भी नेहरू और वामपंथियों ने बिलकुल निचले स्तर तक शासकीय नियंत्रण के सहारे विचारधारा का प्रसार किया. देश के युवाओं की विचारधारा पर नियंत्रण का सबसे अच्छा माध्यम होता है साहित्य, शिक्षा, नाटक, फ़िल्में और टीवी. 1960 में सोवियत संघ ने इन सभी विधाओं की संस्था पर पूर्ण नियंत्रण बनाए रखा, यही भारत में भी किया गया. FTII की स्थापना का उद्देश्य भी देश के युवाओं को भारत की संस्कृति और हिन्दू सभ्यता से तोड़कर, वामपंथ और समाजवाद की दिशा में मोड़ने का ही था. मजे की बात यह है कि भारत को मिलाकर विश्व में सिर्फ पाँच ही देश ऐसे हैं, जहाँ शासकीय धन और संरक्षण में फिल्मों से सम्बन्धित पढ़ाई करवाई जाती है, अन्य देश हैं रूस, क्यूबा, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया. 


(नक्सलवादियों के समर्थक :- मृणाल सेन) 

1962 से 1971 तक इंस्टीट्यूट के कर्ताधर्ता थे जगत मुरारी. इस समय तक इस संस्थान को वामपंथी “लाल रंग” से पोतने का काम पूरा नहीं हो पाया था. इसी दौरान देश के राजनैतिक फलक पर नेहरू की तानाशाह बेटी इंदिरा का आगमन हुआ. 1967 से 1971 के बीच इंदिरा गाँधी ने काँग्रेस पार्टी और देश की सत्ता पर लगभग पूर्ण तानाशाही स्टाईल का नियंत्रण हासिल कर लिया था. इंदिरा गाँधी ने कई निजी संस्थाओं को “राष्ट्रीय” बना दिया. 1971-72 में टेलीविजन के आगमन की आहट पर इस संस्थान के नाम में टीवी भी जोड़ा गया. FTII का उपयोग दूरदर्शन के कर्मचारियों को ट्रेनिंग देने के लिए भी किया जाने लगा. उद्देश्य था कि इसी माध्यम से टीवी कलाकारों और समाचारों पर सरकारी नियंत्रण कायम रहे. 1970-71 में ही इंदिरा गाँधी और भारत के वामपंथियों के बीच एक “अलिखित समझौता” हो गया कि जिन क्षेत्रों में काँग्रेस मजबूत है, वहाँ वामपंथी दखल नहीं देंगे और शिक्षा और मीडिया के क्षेत्र में वामपंथी दबदबे को काँग्रेस तब तक चुनौती नहीं देगी, जब तक उसके हितों पर आँच न आए. यह अलिखित समझौता आज तक चला आ रहा है. 

बहरहाल, 1971 में इंदिरा गाँधी ने “शिक्षा मंत्री” के रूप में अपनी पहली कठपुतली चुनी, जिसका नाम था डॉक्टर नूरुल हसन. नूरुल हसन एक घोषित वामपंथी थे, जो राज्यसभा के मार्ग से मंत्रिमंडल में घुसे. इनके नेतृत्व में ही सबसे पहले वामपंथियों ने देश की शिक्षा और मीडिया संस्थाओं पर कब्ज़ा करना आरम्भ किया. देश के बौद्धिक वातावरण को लाल रंग से पोतने का काम पूरा किया गया, जिससे यह देश आज तक नहीं उबर सका है. 1974 से 1977 तक FTII के अध्यक्ष बने अनवर जमाल किदवई. ये सज्जन भी सिर्फ रीढ़विहीन नौकरशाह थे जो इंदिरा गाँधी का हुक्म तामील करते थे. किदवई ने जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर का गठन किया ताकि “अपने लोगों” को वहाँ समाहित किया जा सके. किदवई साहब का फिल्मों या फिल्म की तकनीक अथवा ज्ञान से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं था. इनके बाद आए एसएम बर्नी, ये भी चाटुकार नौकरशाह ही थे जिन्हें जामिया मिलिया इस्लामिया विवि से उठाकर FTII में थोपा गया था. ज़ाहिर है कि बर्नी साहब का फ़िल्मी ज्ञान भी एकदम शून्य था, लेकिन उस समय भी छात्रों ने कोई आंदोलन नहीं किया. आश्चर्य तो इस बात का है कि इन पाँच वर्षों में FTII और जामिया इस्लामिया विवि का “अदभुत और रहस्यमयी प्रेम” किसी की निगाह में नहीं आया. इन दोनों मुस्लिम नौकरशाहों ने आपातकाल के दौरान FTII और मीडिया पर पूरा दबदबा बनाए रखा, ताकि उनकी मालकिन इंदिरा गाँधी और उनके आपातकाल के खिलाफ कोई चूं भी ना कर सके. गजेन्द्र चौहान से फ़िल्मी अनुभव और तकनीकी ज्ञान के बारे में सवाल करने वाले (कु)बुद्धिजीवियों को भी FTII के इन दोनों “फिल्म ज्ञान-शून्य रीढ़विहीन” नौकरशाहों के बारे में सब पता है, परन्तु जब बुद्धि बेच खाई हो तो बेशर्मी भी आ ही जाती है. 

खैर, 1977 में आपातकाल खत्म हुआ, इंदिरा गाँधी सत्ता से गईं तब जनता पार्टी ने प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण को FTII का अध्यक्ष बनाया. लक्ष्मण साहब की सभी लोग इज्जत करते थे, कला के प्रति समर्पित यह सज्जन मना व्यक्ति राजनीति से दूर ही रहता था. 1977 से 1980 के दौरान FTII बिना किसी दिक्कत के चला. लेकिन फिर वही एक बात, कि आरके लक्ष्मण को भी फिल्मोग्राफी और सिनेमा के बारे में कतई कोई ज्ञान नहीं था, गजेन्द्र चौहान के पास तो फिर भी ढेर सारा है. अर्थात FTII के शुरुआती तीनों अध्यक्षों का फिल्मों से कोई लेना-देना नहीं था. 


(फ़िल्मी ज्ञान एवं फिल्मोग्राफी का शून्य ज्ञान रखने वाले अनंतमूर्ति) 

1980 में जनता सरकार गई और इंदिरा की वापसी हुई. देश के मूड को भांपते हुए इंदिरा गाँधी ने श्याम बेनेगल को FTII का अध्यक्ष नियुक्त किया. ज़ाहिर है कि बेनेगल की फिल्मों एवं उनके गहन फ़िल्मी ज्ञान के बारे में कोई सवाल ही नहीं है, लेकिन एक बात निश्चित है कि श्याम बेनेगल कट्टर नेहरूवादी थे. नेहरू की लिखी हुई “डिस्कवरी ऑफ इण्डिया” के प्रत्येक शब्द पर उन्हें भगवदगीता के बराबर भरोसा था. इसी नाम से बनाई उनकी प्रसिद्ध डॉक्यूमेंट्री में उन्होंने नेहरू की अंधभक्ति में लीन होकर, आर्यों का भारत पर आक्रमण भी दिखा दिया. जबकि भारत पर इस्लाम के वास्तविक आक्रमण को सफाई से छिपा गए. इसके बाद इस कुर्सी पर पधारे मृणाल सेन... होंगे बड़े जाने-माने फिल्मकार, लेकिन इन्होंने भी खुलेआम नक्सलियों और हिंसक मार्क्सवादियों की तारीफ़ में कसीदे काढ़े. (ध्यान रहे नक्सलियों की तारीफ़ करना प्रगतिशीलता कहलाती है, लेकिन संघ की तारीफ़ करने भर से आप अचानक अछूत हो जाते हैं). मृणाल सेन के बाद 1987 से 1995 तक अडूर गोपालकृष्णन FTII के अध्यक्ष बने, इस दौरान देश की राजनैतिक उथल-पुथल के बावजूद इस संस्था ने वाकई अच्छा काम किया. हिन्दू संगठनों की बढ़ती ताकत और बाबरी ढाँचे के ध्वंस के पश्चात वाजपेयी सरकार बनने की आशंका के बीच 1995 से FTII में वामपंथियों ने अपना पूरा ज़ोर लगाना शुरू कर दिया. 

1995 में अपसंस्कृति फैलाने में माहिर फिल्मकार महेश भट्ट को FTII का अध्यक्ष बनाया गया. 1998 तक महेश भट्ट के कार्यकाल में यह संस्था पूरी तरह से हिन्दू विरोधी बन गई. महेश भट्ट न सिर्फ वामपंथियों से सहानुभूति रखते थे, बल्कि उनकी और उनके “सुपुत्र” की इस्लामी आतंकियों के प्रति सहानुभूति भी किसी से छिपी नहीं थी. महेश भट्ट ने ही एक बार कश्मीर मसले को लेकर “भारत सरकार एक आततायी सरकार है” जैसा बयान दिया था. इन्हीं महाशय के कार्यकाल में FTII ने सामाजिक क्रान्ति के नाम पर एकदम घटिया और “सी” ग्रेड की फ़िल्में भी बनाईं. 1999 में स्थिति और भी खराब हो गई, जब गिरीश कर्नाड को इस संस्था का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. कर्नाड तो खुलेआम हिन्दू संस्कृति को गाली देते रहे. उन्होंने अपने नाटकों में हिंदुओं और भारतीय संस्कृति की खिल्ली उड़ाने और भौंडे तरीके से मुग़ल शासकों को महान बताने का कृत्य भी किया. गिरीश कर्नाड के अनुसार प्राचीन भारत की संस्कृति हिंसा और सेक्स से भरी हुई थी. हाल ही में गिरीश कर्नाड ने बंगलौर में “बीफ-महोत्सव” का आयोजन भी किया और कहा गौमांस खाना उनका अधिकार है. सोचिये ऐसे-ऐसे “धुरंधर हिन्दू विरोधी” लोग FTII के अध्यक्ष रह चुके हैं... लेकिन अभी सूची खत्म कहाँ हुई है... आगे चलिए.. 


("सी" ग्रेड फ़िल्में बनाने वाले महेश भट्ट)

गिरीश कर्नाड के बाद 2002 से 2005 तक विनोद खन्ना इस संस्था के अध्यक्ष रहे, लेकिन प्रशासनिक रूप से वे अपनी कोई छाप नहीं छोड़ पाए और संस्था को बिना कोई विशेष योगदान दिए, UPA सरकार के गठन के पश्चात वे चलते बने. विनोद खन्ना के बाद पुनः यह संस्था वामपंथियों के कब्जे में आ गई. इस कुर्सी पर आए चरम वामपंथी यूआर अनंतमूर्ति. यूआर अनंतमूर्ति का फिल्म ज्ञान भी एकदम शून्य था, परन्तु उनकी एकमात्र योग्यता यही थी कि वे हिन्दू संगठनों, हिन्दू त्यौहारों, हिन्दू परम्पराओं को जमकर कोसते थे. वे खुलेआम अपना वामपंथ प्रेम प्रदर्शित भी करते थे. 2004 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को रोकने की खातिर उन्होंने चुनाव भी लड़ा, लेकिन असफल रहे. इसी प्रकार 2014 के आम चुनावों से पहले यूआर अनंतमूर्ति ने यह बयान दिया था कि, “यदि नरेंद्र मोदी इस देश के प्रधानमंत्री बन गए तो वे देश त्याग देंगे”, हालाँकि झूठे वामपंथियों की तरह ही उन्होंने अपनी इस बात पर अमल नहीं किया और अंततः भारत में ही मरे. गजेन्द्र चौहान के फ़िल्मी ज्ञान पर सवाल उठाने वालों के लिए यह दूसरा तमाचा है कि यूआर अनंतमूर्ति, जिन्होंने कभी कैमरा तक अपने हाथ में नहीं पकड़ा, वे दो-दो बार इस संस्था के अध्यक्ष बने... क्योंकि उनकी एकमात्र योग्यता थी हिन्दू संस्थाओं, संस्कृति, परम्पराओं को गरियाना और काँग्रेस-वामपंथ के तलवे चाटना. 


(गौमांस खाने के समर्थक - गिरीश कर्नाड) 

दो-दो बार कब्जे बाद अनंतमूर्ति का स्थान लेने आए सईद अख्तर मिर्ज़ा. ये साहब भी खुलेआम वामपंथी हैं और गुजरात में काँग्रेस पोषित NGOs गिरोह की सरगना शबनम हाशमी की संस्था “अनहद” के सक्रिय सदस्य रहे (अन्य सदस्यों में हर्ष मंदर और के एन पणिक्कर जैसे धुर वामपंथी). “अनहद” का गठन गुजरात दंगों के बाद NGOs गिरोह ने किया था और इसके कई सदस्य सोनिया गाँधी की किचन कैबिनेट अर्थात NAC (जो मनमोहन सिंह को कठपुतली की तरह नचाती थी) के सदस्य भी थे.  

कहने का तात्पर्य यह है कि केन्द्र सरकार के आश्रय में चलने और करदाताओं के पैसों पर पलने वाली FTII संस्था का फिल्मों, पढ़ाई, तकनीकी ज्ञान आदि से कोई लेना-देना नहीं था, पिछले चालीस-पचास साल से यह विशुद्ध रूप से राजनैतिक पद बना हुआ है, जिसमें अध्यक्ष की नियुक्ति का पूरा अधिकार केन्द्र सरकार का है. गजेन्द्र चौहान को लेकर जो हालिया प्रदर्शन जारी है वह वामपंथियों द्वारा अपनी खिसकती जमीन को बचाने तथा भ्रष्टाचार के नए आयाम स्थापित कर चुके तथा करोड़ों-अरबों रूपए की सब्सिडी तथा शोध सहायता के नाम पर अफरा-तफरी किए हुए धन की पोल खुलने की चिंता में है. कथित आंदोलनकारी कहते हैं कि यह संस्था स्वतन्त्र और स्वायत्त है, निरा झूठ है. जैसा कि ऊपर कई उदाहरण देकर बताया है, यह संस्था कभी भी स्वतन्त्र और लोकतांत्रिक नहीं थी, इसमें अधिकाँश बार चमचे किस्म के, रीढ़विहीन अथवा धुर हिन्दू-विरोधी लोगों का जमावड़ा बना रहा है. जिस उद्देश्य से इस संस्था का गठन हुआ था, वह तो कभी भी पूरा नहीं हुआ, उलटे लगभग 50 छात्र(??) ऐसे हैं जो पिछले दस-बारह वर्ष से इसी संस्था में जमे हुए हैं, अधेड़ हो चुके लेकिन अभी तक उनसे एक लघु-फिल्म भी नहीं बन पाई, फिर भी होस्टलों के मजे लूट रहे हैं. प्राप्त जानकारी के अनुसार सरकार IIT के एक छात्र पर जितना पैसा खर्च करती है, उससे कहीं अधिक सब्सिडीयुक्त धन इस संस्था के छात्रों पर खर्च किया जाता है. मोदी सरकार के आने के बाद से ही इस मक्कारी और मुफ्तखोरी पर लगाम कसने की तैयारी शुरू हो चुकी थी. जो “गिरोह” पिछले कई वर्षों से बंगाल और केरल में आंदोलन, धरना, प्रदर्शन, घेराव, तालाबन्दी वगैरह में मास्टरी हासिल कर चुके हैं, वे FTII में यही कर रहे हैं... देश की जनता के सामने इन्हें बेनकाब करना बहुत जरूरी है. सरकार को अब पीछे नहीं हटना चाहिए और ऐसी सभी संस्थाओं में “सफाई अभियान” चलाना चाहिए, जहाँ से विषाक्त वामपंथी विचारधारा बहती है.