Friday, August 28, 2015

Congress Internal Politics and Rahul Gandhi

काँग्रेस : थोथा चना, बाजे घना 

सामान्यतः किसी राज्य के नगर निगम चुनावों पर देश में किसी का ध्यान नहीं जाता. आए दिन कई राज्यों में इस प्रकार के नगरीय निकाय चुनाव आते-जाते रहते हैं. लेकिन हाल ही में मध्यप्रदेश में सम्पन्न हुए नगरीय निकाय चुनावों (MP Nigam Elections) को सभी प्रमुख राजनैतिक विश्लेषकों एवं राजनैतिक पार्टियों ने बड़े ध्यान से देखा, यहाँ तक कि भाजपा ने भी. इन मामूली निकाय चुनाव परिणामों को ध्यान से देखने की वजह थी, “व्यापमं” (Vyapam) नामक भर्ती घोटाला. चूँकि संसद के मानसून सत्र में काँग्रेस ने जिन दो प्रमुख मुद्दों पर संसद को ठप करके रखा, कोई काम नहीं होने दिया, उसमें से व्यापमं घोटाला भी एक था. व्यापमं घोटाले और ललित मोदी मामले को लेकर काँग्रेस ने संसद के मानसून सत्र में जमकर हंगामा किया. देश के राजनैतिक विश्लेषक यह समझने को उत्सुक थे कि क्या व्यापमं घोटाले का जैसा भयावह स्वरूप पेश किया जा रहा था, उससे मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह की राजनैतिक पकड़ ढीली होती है या नहीं? जिस घोटाले को लेकर देश भर में जबरदस्त नकारात्मक प्रचार चला, उस घोटाले से सर्वाधिक प्रभावित उसके गृहप्रदेश में भाजपा की क्या स्थिति है, यह समझने के लिए कई लोग बेचैन थे. मध्यप्रदेश के इन नगरीय निकाय चुनावों ने कई विश्लेषकों को हैरान कर दिया, चंद राजनैतिक पार्टियों के सारे अनुमान गड़बड़ा दिए. हालिया जीत के बाद मध्यप्रदेश के सभी 16 नगर निगमों एवं अधिकाँश नगरपालिकाओं सहित जनपद एवं जिला पंचायतों पर भी भाजपा निर्णायक रूप से काबिज हो चुकी है. मप्र काँग्रेस में आपसी गुटबाजी और सिर-फुटव्वल इतनी ज्यादा है कि मप्र अब काँग्रेस मुक्त होने की कगार पर आ चुका है. 


यहाँ मध्यप्रदेश में यह हुआ, और उधर संसद में सत्र समापन से दो दिन पहले चहुँओर आलोचना से घिरी काँग्रेस ने उसकी “रणनीति” (जिस पर प्रश्नचिन्ह है) के तहत संसद में निलंबन के बाद वापस लौटने के बावजूद 25 सांसदों के शोरशराबे के बीच विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने जिस जोश एवं तथ्यों के साथ ललित मोदी काण्ड पर अपना पक्ष रखा, उससे सोनिया गाँधी हक्की-बक्की रह गईं. सुषमा स्वराज ने जिस हमलावर अंदाज़ में राहुल गाँधी एवं काँग्रेस सहित समूचे गाँधी परिवार के इतिहास की बखिया उधेड़ी, वह न सिर्फ लाजवाब था, बल्कि सुषमा स्वराज के स्वभाव को देखते हुए राजनैतिक विश्लेषकों के लिए हैरानी भरा भी था. वास्तव में सुषमा स्वराज (Sushma Swaraj)  राहुल गाँधी द्वारा संसद के बाहर दिए गए उस बयान से बुरी तरह आहत थीं, जिसमें राहुल ने कहा था कि “ललित मोदी (Lalit Modi) को मदद करने के लिए सुषमा के खाते में कितना पैसा मिला?”. देश की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी पार्टी के उपाध्यक्ष द्वारा इस प्रकार के राजनैतिक अपरिपक्व और बचकाने बयान के बाद तो सुषमा स्वराज का भड़कना स्वाभाविक ही था. “Attack is the best Defence” सिद्धांत के तहत संसद में जिस प्रकार आदिल शहरयार से लेकर वॉरेन एण्डरसन तथा क्वात्रोच्ची के भारत से निकलने, उन्हें सुरक्षित भागने और भारत सहित विदेशों में उनकी कानूनी मदद करने के जो तथ्यात्मक इल्ज़ाम सुषमा स्वराज ने लगाए, उसका कोई जवाब सोनिया-राहुल अथवा काँग्रेस पार्टी के प्रवक्ताओं के पास नहीं था. संसद और संसद के बाहर तमाम काँग्रेसी बगलें झाँकते नज़र आए...


ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर काँग्रेस पार्टी को क्या हो गया है? ऐसी “आत्मघाती गोल” टाईप की राजनीति वह क्यों कर रही है? क्या काँग्रेस में अच्छे वक्ताओं की कमी हो गई है, या रणनीतिक चतुराई और संसदीय मर्यादाओं में कमी आ गई है? विश्लेषक सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि आखिर काँग्रेस इस प्रकार की नकारात्मक राजनीति पर क्यों उतर आई है? क्या वह पिछले एक-सवा वर्ष में भी अपनी ऐतिहासिक हार को पचा नहीं पा रही या काँग्रेस में कोई ऐसा गुट है जो चाहता हो कि सोनिया गाँधी की अस्वस्थता को देखते हुए, अभी से राह में काँटे बिछाते हुए भविष्य में राहुल गाँधी को किनारे कर दिया जाए? क्या काँग्रेस में राजनैतिक सलाहकारों का स्थान पूर्ण रूप से चाटुकारों ने ले लिया है? 

पिछले एक वर्ष से लगातार काँग्रेस इस बात की कोशिश कर रही है कि किसी भी तरह मोदी सरकार को घेरा जाए, उसे फँसाया जाए अथवा कम से कम एक-दो मंत्रियों अथवा मुख्यमंत्रियों के इस्तीफे तो ले ही लिए जाएँ, ताकि नरेंद्र मोदी की साफ़ छवि में एक-दो दाग लगाए जा सकें. काँग्रेस की रणनीति यह भी है कि इस सरकार को काम ही न करने दिया जाए. राज्यसभा में बहुमत के कारण काँग्रेस और विपक्ष इस स्थिति में हैं कि वे जब चाहें किसी भी महत्त्वपूर्ण बिल को पास होने से रोक सकते हैं. संसद में यही किया जा रहा है, ताकि सरकार के कामकाज की गति बाधित हो, विदेशी निवेश थमे और आवश्यक प्रोजेक्ट्स में देरी के कारण जनता के बीच मोदी सरकार की अकर्मण्यता को लेकर भ्रम पैदा किया जा सके. परन्तु सवाल यह है कि क्या ऐसी राजनीति करके काँग्रेस खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मार रही? जनता के मन में यह सन्देश जा रहा है कि जो क़ानून खुद काँग्रेस लेकर आई थी, जिन कानूनों को पास करवाने के लिए काँग्रेस ने लगभग सभी तैयारियाँ कर ली थीं अचानक उन कानूनों पर काँग्रेस ने “यू-टर्न” क्यों मार दिया? भाजपा ने भी ऐसा किया था, इसलिए हम भी करेंगे... भाजपा ने भी संसद बाधित की थी, इसलिए हम भी करेंगे... इस प्रकार की “बदले की राजनीति” काँग्रेस का स्वभाव नहीं है, ना ही होना चाहिए. जनता इतनी समझदार तो है कि वह समझ सकती है कि भाजपा ने जब संसद को ठप्प किया तब कॉमनवेल्थ, 2G, कोयला जैसे महाघोटाले हुए थे, उसके मुकाबले अब तक नरेंद्र मोदी की सरकार काफी साफसुथरा काम कर रही है. व्यापमं घोटाला एक राज्य विशेष तक सीमित है, जिसकी चर्चा मप्र विधानसभा में होना चाहिए. पहले भी मप्र हाईकोर्ट की निगरानी में विशेष जाँच दल (STF) अपनी जाँच कर रहा था... हालाँकि फिर भी लगातार होती जा रही मौतों के कारण CBI की जाँच मंजूर हो गई है और अब मामला उच्चतम न्यायालय की निगरानी में है. व्यापमं घोटाले की परतें जैसे-जैसे खुलेंगी वैसे-वैसे जनता समझती जाएगी कि यह मामला सिर्फ शिवराज सरकार तक सीमित नहीं है, 1993 से अर्जुन सिंह के जमाने से इस प्रकार की फर्जी नियुक्तियाँ होती आई हैं. सूत्र बताते हैं कि दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में भी राघौगढ-अशोकनगर-गुना से आने वाले व्यक्ति की नियुक्ति सिर्फ सिगरेट की डिब्बियों पर हाथ से लिखकर रातोंरात हो जाती थीं. शिवराज सिंह सरकार ने इस तमाम फर्जीवाड़े को बन्द किया, व्यापमं जैसा बोर्ड गठित किया और पिछले बारह वर्ष में हुईं लाखों नियुक्तियों और परीक्षाओं के मुकाबले सिर्फ 1500-2000 मामले ऐसे हैं जिन्हें संदिग्ध माना जा सकता है, ज़ाहिर है कि यह बहुत छोटा सा प्रतिशत है. सबसे बड़ी बात यह है कि यदि शिवराज सिंह इस घोटाले में शामिल होते, तो वे जाँच शुरू ही क्यों करते? न्यायालय का सहयोग ही क्यों करते? ऐसे घोटाले प्रत्येक राज्य में आज भी जारी हैं, परन्तु हंगामा सिर्फ मप्र के व्यापमं पर ही अधिक हुआ, क्योंकि इसमें मौतें हुईं और “काँग्रेस पोषित मीडिया” ने इसे जमकर हवा भी दी. चूँकि मप्र में काँग्रेस लगभग मरणासन्न अवस्था में है, इसलिए राज्य के इस मामले को लेकर काँग्रेस केन्द्र की राजनीति में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहे तो यह उसकी नासमझी ही कही जाएगी. इसीलिए “व्यापमं” की तथाकथित व्यापकता के बावजूद जब मप्र की जनता ने नगरीय निकायों में शिवराज पर अपना भरोसा जता दिया तो उधर दिल्ली में मानो एक “राजनैतिक सन्नाटा” छा गया. प्रतिदिन टीवी पर दिखाई देने वाले दिग्गी राजा अचानक अज्ञातवास में चले गए और सीबीआई की जाँच आरंभ होते ही, व्यापमं मामले में होने वाली मौतों का सिलसिला भी रहस्यमयी तरीके से थम गया. अर्थात कांग्रेस पार्टी का उद्देश्य किसी भी तरह बदनाम करके शिवराज का इस्तीफा हासिल करने का था, जिसमें वह विफल रही क्योंकि भाजपा ने “रुको और देखो” की रणनीति अपनाई. 


आज की दिनाँक में गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, गोवा, महाराष्ट्र और पंजाब जैसे राज्यों में काँग्रेस को भाजपा ने लगभग धूल चटा रखी है. इसी प्रकार क्षेत्रीय दलों ने तमिलनाडु, आंधप्रदेश, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में तथा आम आदमी पार्टी ने पंजाब और दिल्ली में काँग्रेस को लगभग अप्रासंगिक बना रखा है. इस स्थिति में सोनिया-राहुल को विपक्ष में बैठने का जो पाँच वर्ष का समय मिला है, उसका सदुपयोग पार्टी के ढाँचे में सुधार और संगठनात्मक मजबूती की तरफ नहीं देना चाहिए? विश्लेषक चाहे जो कहें, वे भी मानते हैं कि नरेंद्र मोदी का जादू अभी खत्म नहीं हुआ है. जनता में अभी यह विश्वास बना हुआ है कि पिछले साठ वर्ष की नाकामी और अव्यवस्थाओं को रातोंरात ठीक नहीं किया जा सकता. काँग्रेस और वामपंथी दलों से जो “प्रशासनिक और मानसिक विरासत” भारत को मिली है, उसे बदलने में काफी समय लगने वाला है. ऐसे में भूमि अधिग्रहण बिल अथवा GST बिल पर काँग्रेस की नकारात्मक राजनीति का और भी गलत सन्देश जा रहा है. 44 सीटों पर सिमटने के बावजूद ऐसा लगने लगा है कि काँग्रेस जल्दबाजी में है, जबकि अगले चार वर्ष तो मोदी सरकार रहेगी ही. 

एक कहावत है कि सच्चा और घाघ काँग्रेसी सत्ता की भनक सबसे पहले पा जाता है. जो व्यक्ति, जो मुद्दा उसे सत्ता दिलाए वह बेहिचक सभी गुण-दोषों के साथ उसे स्वीकार कर लेता है. विभिन्न राज्यों में निराशाजनक प्रदर्शन और संसद में 44 सीटों पर सिमट जाने के बाद ऐसा माना जाता है कि काँग्रेस शासित राज्यों में राहुल गाँधी के नेतृत्त्व के विरोध में फुसफुसाहट शुरू हुई. हालाँकि अभी एक सामान्य काँग्रेसी गाँधी परिवार की आभा से मुक्त होने के बारे में सोच भी नहीं सकता, परन्तु जो पुराने और चतुर नेता हैं अथवा राजनीति में अपना करियर चमकाने को आतुर युवा नेता हैं उन्होंने राहुल गाँधी की अत्यधिक सीमित क्षमता को पहचान लिया है. इस आंतरिक खदबदाहट को सोनिया गाँधी के वफादारों ने उन तक पहुँचाया और राहुल गाँधी की जो तथाकथित आक्रामकता हम आज देख रहे हैं, यह उसी घबराहट का नतीजा है. यानी जो पार्टी अपनी विश्वसनीयता इतनी खो चुकी हो, उस पार्टी को तो गहराई से आत्ममंथन करना चाहिए, लेकिन वह नकली आक्रामकता दिखा रही है. संसद में बिल पास नहीं करने दे रही और अपनी छवि और गिराती जा रही है. निश्चित ही या तो यह एक बड़ी रणनीतिक चूक है या फिर चिदंबरम, एंटोनी, दिग्विजयसिंह जैसे कुछ और नेताओं द्वारा काँग्रेस में आंतरिक षड्यंत्र के तहत ऐसा हो रहा है. 


इसी आत्म-घातक तथाकथित रणनीति के तहत काँग्रेस ने मानसून सत्र में GST बिल को पास नहीं होने दिया, ताकि यह मामला लगभग एक वर्ष और पीछे चला जाए. लेकिन काँग्रेस द्वारा ऐसा करने से उद्योग जगत जो इतने वर्षों से लगातार काँग्रेस का प्यारा रहा है, वह भी नाराज हो गया. खास बात यह है कि GST बिल को काँग्रेस ही लाई थी, उसमें सारे संशोधन पूरे हो चुके थे. सभी दलों की आपत्तियाँ और राज्यों के दावे-प्रतिदावों की संतुष्टिपूर्ण सुनवाई हो चुकी थी, संसद की स्थायी समिति ने इसे हरी झंडी दे दी थी. लेकिन फिर भी काँग्रेस ने इसे जानबूझकर अटकाया ताकि मोदी सरकार कहीं इसका श्रेय ना ले ले. राहुल गाँधी के साथ असली समस्या यह है कि उन्हें अपनी पार्टी का इतिहास पता ही नहीं है. राजनैतिक चातुर्य तो राहुल में कभी था ही नहीं, लेकिन संसद में प्रधानमंत्री पर शाब्दिक हमला करते समय जिस बचकाने तरीके से वे भाषण दे रहे थे उसने पार्टी की भद और भी पिटवाई. गाँधी जी के तीन बंदरों की कहावत भारत में तीसरी कक्षा का कोई भी बच्चा बड़े आराम से सुना देगा, लेकिन इतनी मामूली सी कहावत के लिए भी राहुल गाँधी को तीन बार कागज़ देखना पड़ा. रही-सही कसर एक पत्रकार द्वारा उनके हाथ में रखे पर्चे की तस्वीर ने पूरी कर दी, जो सोशल मीडिया और बाद में अखबारों में जमकर प्रसारित हुआ. उस कागज़ के पुर्जे के चित्र ने साफ़ कर दिया कि राहुल गाँधी मुद्दों से बिलकुल अनजान रहते हैं, और सामान्य भाषण से लेकर कहावतों और उक्तियों का उल्लेख करने में भी बुरी तरह से अपने सलाहकारों पर निर्भर रहते हैं. भला ऐसा में पता नहीं उनके किस सलाहकार ने उन्हें “केजरीवाल छाप” आरोपों की राजनीति करने की सलाह दी और उन्होंने सुषमा स्वराज पर संसद के बाहर खड़े होकर आरोप जड़ दिया, जो बाद में उन्हीं की पार्टी के गले पड़ा. 

राहुल गाँधी के इन्हीं “अतिरिक्त-समझदार” सलाहकारों ने उन्हें “वन रैंक वन पेंशन” मुद्दे को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और धरना दे रहे पूर्व सैनिकों के बीच जाने को उकसाया, ताकि सैनिकों के बीच भाजपा की छवि को खराब करके कुछ राजनैतिक बढ़त हासिल की जा सके. लेकिन इसका उल्टा नतीजा यह हुआ कि वहाँ “राहुल गाँधी वापस जाओ” के नारे लगे, पूर्व सैनिकों ने काँग्रेस के खिलाफ जमकर नारेबाजी की. गडबड़ी यह हुई कि राहुल गाँधी को इतिहास की जानकारी ही नहीं थी, उन्हें यह पता ही नहीं था कि इंदिरा गाँधी ने ही 1973 में सेना हेतु “वन रैंक वन पेंशन” को खत्म कर दिया था. उसके बाद सैनिकों की यह माँग चालीस वर्ष तक काँग्रेस ने ही लटकाए रखी और अब मोदी सरकार के पन्द्रह माह में ही अचानक काँग्रेस को पूर्व सैनिकों की याद आ गई. जंतर-मंतर पर जाने की बजाय राहुल गाँधी चुप भी बैठ सकते थे, अथवा पूर्व सैनिक रहे किसी काँग्रेसी को ही अपना प्रतिनिधि बनाकर वहाँ भेज सकते थे, परन्तु अपरिपक्वता के कारण ऐसा नहीं किया गया और अंततः काँग्रेस को इस “स्टंट” का नुक्सान ही उठाना पड़ा. 

ललित मोदी और सुषमा स्वराज के मामले में भी काँग्रेस द्वारा ऐसी ही अज्ञानता का प्रदर्शन हुआ था. सभी जानते हैं कि ललित मोदी एक व्यवसायी है, उसके जितने मधुर सम्बन्ध वसुंधरा राजे सिंधिया के साथ है, उससे कहीं अधिक मधुर सम्बन्ध क्रिकेट से जुड़े प्रत्येक खास व्यक्ति से हैं, फिर चाहे वे राजीव शुक्ला हों, शरद पवार हों, जगमोहन डालमिया हों, अनुराग ठाकुर हों, जीजाश्री उर्फ वाड्रा हों. IPL के प्रणेता ललित मोदी थे और इस “बिजनेस” में सभी साझीदार रहे हैं. ज़ाहिर है कि सुषमा स्वराज द्वारा ललित मोदी की पत्नी के लिए ब्रिटिश सरकार से यह कहना कि “ब्रिटिश कानूनों के अंतर्गत ललित मोदी की कैंसरग्रस्त पत्नी को जो भी राहत दी जा सकती हो, दे दी जाए” कहीं से भी कदाचार का मामला नहीं बनता. परन्तु जल्दबाजी और सरकार को घेरने के मुद्दों का अभाव इतना ज्यादा था कि राहुल-सोनिया ने मूलभूत बातों को भी ध्यान में रखना उचित नहीं समझा. जिस व्यक्ति को राजनीति की ABCD भी नहीं आती, वह भी सवाल कर रहा है कि ललित मोदी जब भारत से भागा, तब काँग्रेस की सरकार थी. 2011 से 2015 तक ललित मोदी को किसी भी न्यायालय ने “भगोड़ा” घोषित नहीं किया, फिर इस बीच तीन वर्ष तक काँग्रेस की UPA सरकार ने मोदी को वापस लाने के लिए कौन से प्रयास किए? लेकिन पार्टी में विद्रोह के स्वर दबाने और राहुल गाँधी को “असली नेता” साबित करने के चक्कर में सारे तथ्यों को भुला दिया गया, नतीजा यह हुआ कि संसदीय भाषण कैसे किया जाता है, सुषमा स्वराज के हाथों इसका सबक राहुल बाबा को प्राप्त हुआ. 


वस्तुतः काँग्रेस इस समय लगभग उसी दौर से गुज़र रही है, जो दौर इंदिरा गाँधी को “गूँगी गुड़िया” कहने का दौर था. उस समय भी काँग्रेस के दिग्गज नेताओं ने मजबूरी में इंदिरा गाँधी को अपनी नेता स्वीकार किया था, लेकिन भीतर ही भीतर घाट-प्रतिघात का दौर शुरू था, और किसी भी तरह इंदिरा गाँधी को राजनैतिक रूप से काबू करके पार्टी और सरकार में अपनी मनमानी थोपने का इरादा था. उस वक्त इंदिरा गाँधी ने मजबूत राजनैतिक परिपक्वता का परिचय दिया था और अपनी चालों से बड़े-बड़े नेताओं को धूल चटाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत बनाई थी. उस समय और उसके बाद आने वाले कई वर्षों तक इंदिरा गाँधी ने काँग्रेस में किसी भी क्षेत्रीय क्षत्रप को पनपने का मौका ही नहीं दिया. जो भी काँग्रेसी इंदिरा के मुकाबले में अथवा राजनैतिक रूप से सशक्त होता दिखाई देता था, इंदिरा गाँधी बड़ी सफाई से उसका राजनैतिक तबादला या वध कर दिया करती थीं. आज राहुल गाँधी की स्थिति भी कुछ-कुछ ऐसी ही है. खुले तौर पर इक्का-दुक्का काँग्रेसी ही कह रहे हैं, लेकिन दबे-छिपे स्वर में काँग्रेस के घुटे हुए नेता यह मानने लगे हैं कि सत्ता दिलाने के लिए जो “स्पार्क” अथवा “करिश्मा” एक नेता में होना चाहिए, वह राहुल गाँधी में नदारद है. यही बात सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के आसपास जमा चौकड़ी को खाए जा रही है. इससे निपटने के लिए सोनिया गाँधी ने दोहरी रणनीति अपनाई. अपने “पालतू मीडिया” के जरिये क्षेत्रीय क्षत्रपों के पर कतरने शुरू किए. ख़बरों को कैसे “प्लांट” और “लीक” किया जाता है इसमें तो काँग्रेस की वैसे भी मास्टरी है. अतः वीरभद्र सिंह के सेब की खेती वाले पुराने मामले उखाड़े जाने लगे तो वे छिप गए, उधर हरीश रावत का स्टिंग ऑपरेशन सामने आया और वह गायब हो गए. व्यापमं मामले में CBI की जाँच शुरू होने से पहले ही दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में हुई नियुक्तियों का मामला सामने आ गया... दूसरी रणनीति के तहत राहुल गाँधी को दो माह के अज्ञातवास पर भेजकर पहले पार्टी की थाह ली गई और फिर अज्ञातवास से लौटकर उन्होंने अचानक “एंग्री यंगमैन” की भूमिका निभानी शुरू कर दी. राहुल ने केजरीवाल की तरह छापामार युद्ध अर्थात “आरोप लगाओ, और भाग खड़े हो, जब तक उस पर विपक्ष की कोई सफाई आए, तब तक फिर एक नया आरोप मढ़ दो और आगे बढ़ जाओ..” की शैली अपना ली, ताकि उनके नेतृत्त्व को कहीं से भी चुनौती ना मिल सके. ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट और मिलिंद देवड़ा जैसे प्रतिभाशाली और साफ़-सुथरी छवि वाले युवा नेताओं को अपना राजनैतिक करियर बड़ा ही धुँधला सा लगने लगा है, काँग्रेसी परंपरा के अनुसार राहुल गाँधी के सामने इनका आभामण्डल गर्त में चला गया है. इसी प्रकार वीरभद्र सिंह, चिदंबरम, एके एंटोनी जैसे अनुभवी लोग जब राहुल गाँधी जैसे नौसिखिए के सामने कोर्निश बजाते हैं तब निश्चित ही उनकी आत्मा कलपती होगी. परन्तु सोनिया गाँधी को इसकी कतई चिंता नहीं है, राहुल गाँधी के सामने उठ सकने वाले किसी भी नेतृत्त्व के कद की छँटाई करना उनका पहला कर्त्तव्य लगता है. हालाँकि काँग्रेस में जो खेमा अप्रत्यक्ष रूप से पार्टी में महत्त्वपूर्ण स्थान हासिल करना चाहता है वह भी अपनी गोटियाँ बड़ी सफाई से चल रहा है और फूँक-फूँक कर कदम रखते हुए अपनी राजनीति कर रहा है. क्योंकि उन्हें भी पता है कि ना तो काँग्रेस से बाहर निकाले जाने के बाद उनका कोई भविष्य है और ना ही गाँधी परिवार का खुल्लमखुल्ला विरोध करके. इसीलिए इस खेमे ने सबसे पहले राहुल गाँधी के विकल्प के रूप में उभर सकने वाली सबसे तगड़ी शख्सियत अर्थात प्रियंका गाँधी को किनारे किया. रॉबर्ट वाड्रा के भ्रष्टाचार और जमीन सौदों को लेकर उनकी इतनी बदनामी हो चुकी है कि अब प्रियंका गाँधी यदि राजनीति में आने का फैसला भी करें तो DLF का भूत राजनीति में सदैव उनका पीछा करता रहेगा. यानी राहुल विरोधी खेमे ने वाड्रा संबंधी विभिन्न दस्तावेज लीक करके “सेकण्ड लाईन ऑफ डिफेन्स” सबसे पहले गिरा दी. राहुल गाँधी ने अब तक जितनी और जैसी राजनैतिक समझदारी दिखाई है, उसे देखते हुए यह लगने लगा है कि घाघ और शातिर किस्म के राजनैतिक काँग्रेसी जानबूझकर राहुल गाँधी को धीरे-धीरे एक गहरे गढ्ढे की तरफ ले जा रहे हैं, उनसे गलतियाँ करवाई जा रही हैं, ऊटपटांग बयान दिलवाए जा रहे हैं, उन्हें संगठनात्मक कार्यों को मजबूती देने, विभिन्न राज्यों में राजनैतिक रूप की जमीनी लड़ाई में झोंकने की बजाय मनमानी छुट्टियाँ बिताने के लिए भेजा जा रहा है. पिछले दो-तीन वर्ष में जनता ने देखा है कि देश के सामने जब भी कोई महत्त्वपूर्ण मुद्दा होता है तब-तब राहुल गाँधी परिदृश्य से गायब रहते हैं. ऐसी “पार्ट-टाईम” राजनीति काँग्रेस जैसी पार्टी के उपाध्यक्ष के लिए सही नहीं है. भूमि अधिग्रहण बिल पर काँग्रेस ने जैसी तर्कपूर्ण बढ़त हासिल की थी और समूचे विपक्ष के साथ मिलकर सरकार को बैकफ़ुट पर धकेल दिया था, वैसा ललित मोदी, व्यापमं पर वह नहीं कर पाई. क्योंकि मुद्दों में दम नहीं था और संसद को बाधित करने जैसे आत्मघाती खेल में पूरे विपक्ष ने बेमन से उसका साथ दिया था. बल्कि अंतिम दिन आते-आते तो मुलायम सिंह ने तो काँग्रेस को चेतावनी भी दे दी थी. भूमि अधिग्रहण बिल पर जो बढ़त हासिल की गई थी, वह GST को खामख्वाह रोके जाने तथा सुषमा स्वराज पर बेतुके आरोप लगाने से जाती रही और विश्वसनीयता गँवाकर आज काँग्रेस पुनः वहीं आन खड़ी हुई है, जहाँ वह मई 2014 में थी. 

यह लेख लिखे जाने तक राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव भी सम्पन्न हो चुके हैं और वहाँ भी जनता ने काँग्रेस को नकार दिया है. ललित मोदी मामले में काँग्रेस बारम्बार जिस वसुंधरा राजे के इस्तीफे की माँग पर अड़ी हुई थी, फिलहाल जनता ने उस पर विश्वास जता दिया है. लेकिन राजस्थान और मप्र के नगरीय निकायों के परिणामों की तुलना करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि राजस्थान में काँग्रेस ने सिर्फ दो साल में अच्छी खासी मजबूती हासिल कर ली है. इसका कारण है सचिन पायलट की जमीनी मेहनत और पार्टी द्वारा खराब छवि वाले अशोक गहलोत को पीछे करना. इसीलिए जहाँ लोकसभा चुनावों में भाजपा-काँग्रेस के बीच मतों का अंतर बीस प्रतिशत से अधिक था, वहीं सिर्फ डेढ़ साल में यह अंतर घटकर सिर्फ दो प्रतिशत रह गया है. वहीं दूसरी ओर मप्र में काँग्रेस के पास कोई प्रभावशाली नेतृत्त्व ही नहीं है, और ऊपर से व्यापमं की चीख-पुकार के बावजूद शिवराज चौहान की छवि जनता में आज भी अच्छी बनी हुई है. उधर बंगलौर जैसे सुपर-रिच महानगर के नगरीय निकायों में भी मुख्यमंत्री और सत्ता होने के बावजूद काँग्रेस बुरी तरह हार गई.

सत्ता की भनक सूँघने में कांग्रेसियों से ज्यादा माहिर कोई नहीं होता, इसलिए आज यदि कई कांग्रेसियों को लग रहा है कि राहुल गाँधी उन्हें सत्ता दिलवाने में नाकाम हो रहे हैं तो षड्यंत्र और गहराएँगे. इसलिए अंत में, कहने का तात्पर्य यह है कि काँग्रेस पार्टी और खासकर राहुल गाँधी को सबसे पहले “अपने घर” पर ध्यान देना चाहिए. एकाध बार तो ठीक है, परन्तु हमेशा खामख्वाह दाढ़ी बढ़ाकर प्रेस कांफ्रेंस में एंग्री यंगमैन की भूमिका उनके लिए घातक सिद्ध हो रही है. काँग्रेस के सलाहकार और योजनाकार इस बात पर मंथन करें कि राहुल गाँधी के खिलाफ जो अंदरूनी खामोश उठापटक जारी है, उस पर काबू कैसे पाया जाए... जिन राज्यों में काँग्रेस लगभग मरणासन्न अवस्था में पहुँच गई है, वहाँ उसे शक्तिशाली कैसे बनाया जाए... भाषणों में पैनापन कैसे लाया जाए... पिछली UPA सरकार की गलतियों को खुलेआम स्वीकार कैसे किया जाए... भ्रष्ट और दागदार छवि वाले नेताओं को दरकिनार करके सचिन पायलट, सिंधिया, मिलिंद देवड़ा जैसे “यंगिस्तान” को प्रभावी भूमिका कैसे दी जाए...| अभी कम से कम चार वर्ष तो लोकसभा चुनाव होने वाले नहीं हैं, इसलिए काँग्रेस जो इस समय “जल्दबाजी” दिखा रही है, उसे थोड़ा शान्ति रखना चाहिए. यदि राज्यों में काँग्रेस मजबूत होती है, तो मोदी सरकार को घेरने के और भी कई मौके उसे मिलेंगे, अन्यथा वह जनता की निगाह में इसी तरह “थोथा चना, बाजे घना” की हास्यास्पद स्थिति में पड़ी रहेगी. हो सकता है कि इससे राहुल गाँधी का पार्टी पर शिकंजा मजबूत हो जाए, परन्तु यह उनकी पार्टी और देश के लिए अच्छी बात नहीं है. 

Monday, August 24, 2015

Maratha Queen Tarabai and Aurangzeb

रानी ताराबाई : औरंगज़ेब का सपना चूर करने वाली मराठा वीरांगना 


भारत के इतिहास की पुस्तकों में अधिकांशतः हिन्दू राजाओं-रानियों एवं योद्धाओं को “पराजित” अथवा युद्धरत ही दर्शाया गया है. विजेता हिन्दू योद्धाओं के साम्राज्य, उनकी युद्ध रणनीति, उनके कौशल का उल्लेख या तो पुस्तकों में है ही नहीं, अथवा बहुत ही कम किया गया है. ज़ाहिर है कि यह जानबूझकर एवं व्यवस्थित रूप से इतिहास को विकृत करने का एक सोचा-समझा दुष्कृत्य है. जिस समय औरंगज़ेब लगभग समूचे उत्तर भारत को जीतने के पश्चात दक्षिण में भी अपने पैर जमा चुका था, उसकी इच्छा थी कि पश्चिमी भारत को भी जीतकर वह मुग़ल साम्राज्य को अखिल भारतीय बना दे. परन्तु उसके इस सपने को तोड़ने वाला योद्धा कोई और नहीं, बल्कि एक महिला थी, जिसका नाम था “ताराबाई”. ताराबाई के बारे में इतिहास की पुस्तकों में अधिक उल्लेख नहीं है, क्योंकि वास्तव में उसने छत्रपति शिवाजी की तरह कोई साम्राज्य खड़ा नहीं किया, परन्तु इस बात का श्रेय उसे अवश्य दिया जाएगा कि यदि ताराबाई नहीं होतीं तो न सिर्फ मराठा साम्राज्य का इतिहास, बल्कि औरंगज़ेब द्वारा स्थापित मुग़ल साम्राज्य के बाद आधुनिक भारत का इतिहास भी कुछ और ही होता. 


जिस समय मराठा साम्राज्य पश्चिमी भारत में लगातार कमज़ोर होता जा रहा था, तथा औरंगजेब मराठाओं के किले-दर-किले पर अपना कब्ज़ा करता जा रहा था, उस समय ताराबाई (1675-1761) ने सारे सूत्र अपने हाथों में लेते हुए न सिर्फ मराठा साम्राज्य को खण्ड-खण्ड होने से बचाया, बल्कि औरंगज़ेब को हार मानने पर मजबूर कर दिया. छत्रपति शिवाजी के प्रमुख सेनापति हम्बीर राव मोहिते की कन्या ताराबाई का जन्म 1675 में हुआ, ताराबाई ने अपने पूरे जीवनकाल में मराठा साम्राज्य में शिवाजी के राज्याभिषेक से लेकर सन 1700 में औरंगजेब के हाथों कमज़ोर किए जाने, तथा उसके बाद पुनः जोरदार वापसी करते हुए सन 1760 में लगभग पूरे भारत पर मराठा साम्राज्य की पताका फहराते देखा और अंत में सन 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में अहमद शाह अब्दाली के हाथों मराठों की भीषण पराजय भी देखी. ताराबाई का विवाह आठ वर्ष की आयु में शिवाजी के छोटे पुत्र राजाराम के साथ किया गया. छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक के कुछ वर्ष बाद ही 1680 में शिवाजी की मृत्यु हो गई. यह खबर मिलते ही औरंगज़ेब बहुत खुश हो गया. शिवाजी ने औरंगज़ेब को बहुत नुकसान पहुँचाया था, इसलिए औरंगज़ेब चिढ़कर उन्हें “पहाड़ी चूहा” कहकर बुलाता था. आगरा के किले से शिवाजी द्वारा चालाकी से फलों की टोकरी में बैठकर भाग निकलने को औरंगज़ेब अपनी भीषण पराजय मानता था, वह इस अपमान को कभी भूल नहीं पाया. इसलिए शिवाजी की मौत के पश्चात उसने सोचा कि अब यह सही मौका है जब दक्षिण में अपना आधार बनाकर समूचे पश्चिम भारत पर साम्राज्य स्थापित कर लिया जाए. 

शिवाजी की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र संभाजी राजा बने और उन्होंने बीजापुर सहित मुगलों के अन्य ठिकानों पर हमले जारी रखे. 1682 में औरंगजेब ने दक्षिण में अपना ठिकाना बनाया, ताकि वहीं रहकर वह फ़ौज पर नियंत्रण रख सके और पूरे भारत पर साम्राज्य का सपना सच कर सके. उस बेचारे को क्या पता था कि अगले 25 साल वह दिल्ली वापस नहीं लौट सकेगा और दक्षिण भारत फतह करने का सपना उसकी मृत्यु के साथ ही दफ़न हो जाएगा. हालाँकि औरंगजेब की शुरुआत तो अच्छी हुई थी, और उसने 1686 और 1687 में बीजापुर तथा गोलकुण्डा पर अपना कब्ज़ा कर लिया था. इसके बाद उसने अपनी सारी शक्ति मराठाओं के खिलाफ झोंक दी, जो उसकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा बने हुए थे. 


मुगलों की भारीभरकम सेना की पूरी शक्ति के आगे धीरे-धीरे मराठों के हाथों से एक-एक करके किले निकलने लगे और मराठों ने ऊँचे किलों और घने जंगलों को अपना ठिकाना बना लिया. औरंगजेब ने विपक्षी सेना में रिश्वत बाँटने का खेल शुरू किया और गद्दारों की वजह से संभाजी महाराज को संगमेश्वर के जंगलों के 1689 में औरंगजेब ने पकड़ लिया. औरंगजेब ने संभाजी से इस्लाम कबूल करने को कहा, संभाजी ने औरंगजेब से कहा कि यदि वह अपनी बेटी की शादी उनसे करवा दे तो वह इस्लाम कबूल कर लेंगे, यह सुनकर औरंगजेब आगबबूला हो उठा. उसने संभाजी की जीभ काट दी और आँखें फोड़ दीं, संभाजी को अत्यधिक यातनाएँ दी गईं, लेकिन उन्होंने अंत तक इस्लाम कबूल नहीं किया और फिर औरंगजेब ने संभाजी की हत्या कर दी. 

औरंगजेब लगातार किले फतह करता जा रहा था. संभाजी का दुधमुंहे बच्चा “शिवाजी द्वितीय” अब आधिकारिक रूप से मराठा राज्य का उत्तराधिकारी था. औरंगजेब ने इस बच्चे का अपहरण करके उसे अपने हरम में रखने का फैसला किया ताकि भविष्य में सौदेबाजी की जा सके. चूँकि औरंगजेब “शिवाजी” नाम से ही चिढता था, इसलिए उसने इस बच्चे का नाम बदलकर शाहू रख दिया और अपनी पुत्री जीनतुन्निसा को सौंप दिया कि वह उसका पालन-पोषण करे. औरंगजेब यह सोचकर बेहद खुश था कि उसने लगभग मराठा साम्राज्य और उसके उत्तराधिकारियों को खत्म कर दिया है और बस अब उसकी विजय निश्चित ही है. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं पाया. 

संभाजी की मृत्यु और उनके पुत्र के अपहरण के बाद संभाजी का छोटा भाई राजाराम अर्थात ताराबाई के पति ने मराठा साम्राज्य के सूत्र अपने हाथ में लिए. उन्होंने महसूस किया कि इस क्षेत्र में रहकर मुगलों की इतनी बड़ी सेना से लगातार युद्ध करना संभव नहीं है, इसलिए उन्होंने अपने पिता शिवाजी से प्रेरणा लेकर, अपने विश्वस्त साथियों के साथ लिंगायत धार्मिक समूह का भेष बदला और गाते-बजाते आराम से सुदूर दक्षिण में जिंजी के किले में अपना डेरा डाल दिया. इसके बाद चमत्कारिक रूप से राजाराम ने जिंजी के किले से ही मुगलों के खिलाफ जमकर गुरिल्ला युद्ध की शुरुआत की. उस समय उनके सेनापति थे रामचंद्र नीलकंठ. राजाराम की सेना ने छिपकर वार करते हुए एक वर्ष के अंदर मुगलों की सेना के दस हजार सैनिक मार गिराए और उनका लाखों रूपए खर्च करा दिया. औरंगज़ेब बुरी तरह परेशान हो उठा. दक्षिण की रियासतों से औरंगज़ेब को मिलने वाली राजस्व की रकम सिर्फ दस प्रतिशत ही रह गई थी, क्योंकि राजाराम की सफलता को देखते हुए बहुत सी रियासतों ने उस गुरिल्ला युद्ध में राजाराम का साथ देने का फैसला किया. औरंगज़ेब के जनरल जुल्फिकार अली खान ने जिंजी के इस किले को चारों तरफ से घेर लिया था, परन्तु पता नहीं किन गुप्त मार्गों से फिर भी राजाराम अपना गुरिल्ला युद्ध लगातार जारी रखे हुए थे. यह सिलसिला लगभग आठ वर्ष तक चला. अंततः औरंगज़ेब का धैर्य जवाब दे गया और उसने जुल्फिकार से कह दिया कि यदि उसने जिंजी के किले पर विजय हासिल नहीं की तो गंभीर परिणाम होंगे. जुल्फिकार ने नई योजना बनाकर किले तक पहुँचने वाले अन्न और पानी को रोक दिया. राजाराम ने जुल्फिकार से एक समझौता किया कि यदि वह उन्हें और उनके परिजनों को सुरक्षित जाने दे तो वे जिंजी का किला समर्पण कर देंगे. ऐसा ही किया गया और राजाराम 1697 में अपने समस्त कुनबे और विश्वस्तों के साथ पुनः महाराष्ट्र पहुँचे और उन्होंने सातारा को अपनी राजधानी बनाया. 



82 वर्ष की आयु तक पहुँच चुका औरंगज़ेब दक्षिण भारत में बुरी तरह उलझ गया था और थक भी गया था. अंततः सन 1700 में उसे यह खबर मिली की किसी बीमारी के कारण राजाराम की मृत्यु हो गई है. अब मराठाओं के पास राज्याभिषेक के नाम पर सिर्फ विधवाएँ और दो छोटे-छोटे बच्चे ही बचे थे. औरंगजेब पुनः प्रसन्न हुआ कि चलो अंततः मराठा साम्राज्य समाप्त होने को है. लेकिन वह फिर से गलत साबित हुआ... क्योंकि 25 वर्षीय रानी ताराबाई ने सत्ता के सारे सूत्र अपने हाथ में ले लिए और अपने अपने चार वर्षीय पुत्र शिवाजी द्वितीय को राजा घोषित कर दिया. अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए ताराबाई ने मराठा सरदारों को साम-दाम-दण्ड-भेद सभी पद्धतियाँ अपनाते हुए अपनी तरफ मिलाया और राजाराम की दूसरी रानी राजसबाई को जेल में डाल दिया. मुग़ल इतिहासकार खफी खान लिखते हैं – “राजाराम के साथ रहकर ताराबाई भी गुरिल्ला युद्ध और सेना की रणनीतियों से खासी परिचित हो गई थीं और उन्होंने अपनी बहादुरी से कई मराठा सरदारों को प्रभावित भी किया था”.

अगले सात वर्ष में, अर्थात सन 1700 से 1707 तक ताराबाई ने तत्कालीन सबसे शक्तिशाली बादशाह अर्थात औरंगजेब के खिलाफ अपना युद्ध जारी रखा. वह लगातार आक्रमण करतीं, अपनी सेना को उत्साहित करतीं और किले बदलती रहतीं. ताराबाई ने भी औरंगजेब की रिश्वत तकनीक अपना ली और विरोधी सेनाओं के कई गुप्त राज़ मालूम कर लिए. धीरे-धीरे ताराबाई ने अपनी सेना और जनता का विश्वास अर्जित कर लिया. औरंगजेब जो कि थक चुका था, उसके सामने मराठों की शक्ति पुनः दिनोंदिन बढ़ने लगी थी. 

ताराबाई ने औरंगजेब को जिस रणनीति से सबसे अधिक चौंकाया और तकलीफ दी, वह थी गैर-मराठा क्षेत्रों में घुसपैठ. चूँकि औरंगजेब का सारा ध्यान दक्षिण और पश्चिमी घाटों पर लगा था, इसलिए मालवा और गुजरात में उसकी सेनाएँ कमज़ोर हो गई थीं. ताराबाई ने सूरत की तरफ से मुगलों के क्षेत्रों पर आक्रमण करना शुरू किया और धीरे-धीरे (आज के पश्चिमी मप्र) आगे बढ़ते हुए कई स्थानों पर अपनी वसूली चौकियां स्थापित कर लीं. ताराबाई ने इन सभी क्षेत्रों में अपने कमाण्डर स्थापित कर दिए और उन्हें सुभेदार, कमाविजदार, राहदार, चिटणीस जैसे विभिन्न पदानुक्रम में व्यवस्थित भी किया. 

मराठाओं को खत्म नहीं कर पाने की कसक लिए हुए सन 1707 में 89 की आयु में औरंगजेब की मृत्यु हुई. वह बुरी तरह टूट और थक चुका था, अंतिम समय पर उसने औरंगाबाद में अपना ठिकाना बनाने का फैसला किया, जहाँ उसकी मौत भी हुई और आखिर अंत तक वह दिल्ली नहीं लौट सका. औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुगलों ने उसके द्वारा अपहृत किये हुए पुत्र शाहू को मुक्त कर दिया, ताकि सत्ता संघर्ष के बहाने मराठों में फूट डाली जा सके. यह पता चलते ही रानी ताराबाई ने शाहू को “गद्दार” घोषित कर दिया. ताराबाई ने विभिन्न स्थानों पर दरबार लगाकर जनता को यह बताया कि इतने वर्ष तक औरंगजेब की कैद में रहने और उसकी पुत्री द्वारा पाले जाने के कारण शाहू अब मुस्लिम बन चुका है, और वह मराठा साम्राज्य का राजा बनने लायक नहीं है. रानी ताराबाई के इस दावे की पुष्टि खुद शाहू ने की, जब वह औरंगजेब को श्रद्धांजलि अर्पित करने नंगे पैरों उसकी कब्र पर गया. ताराबाई के कई प्रयासों के बावजूद शाहू मुग़ल सेनाओं के समर्थन से लगातार जीतता गया और सन 1708 में उसने सातारा पर कब्ज़ा किया, जहाँ उसे राजा घोषित करना पड़ा, क्योंकि उसे मुगलों का भी समर्थन हासिल था. 

ताराबाई हार मानने वालों में से नहीं थीं, उन्होंने अगले कुछ वर्ष के लिए अपने मराठा राज्य की नई राजधानी पन्हाला में स्थानांतरित कर दी. अगले पाँच-छह वर्ष शाहू और ताराबाई के बीच लगातार युद्ध चलते रहे. मजे की बात यह कि इन दोनों ने ही दक्षिण में मुगलों के किलों और उनके राजस्व वसूली को निशाना बनाया और चौथ वसूली की. आखिरकार शाहू भी ताराबाई से लड़ते-लड़ते थक गया और उसने एक अत्यंत वीर योद्धा बालाजी विश्वनाथ को अपना “पेशवा” (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया. बाजीराव पेशवा के नाम से मशहूर यह योद्धा युद्ध तकनीक और रणनीतियों का जबरदस्त ज्ञाता था. बाजीराव पेशवा ने कान्होजी आंग्रे के साथ मिलकर 1714 में ताराबाई को पराजित किया तथा उसे उसके पुत्र सहित पन्हाला किले में ही नजरबन्द कर दिया, जहाँ ताराबाई और अगले 16 वर्ष कैद रही. 


1730 तक ताराबाई पन्हाला में कैद रही, लेकिन इतने वर्षों के पश्चात शाहू जो कि अब छत्रपति शाहूजी महाराज कहलाते थे उन्होंने विवादों को खत्म करते हुए सभी को क्षमादान करने का निर्णय लिया ताकि परिवार को एकत्रित रखा जा सके. हालाँकि उन्होंने ताराबाई के इतिहास को देखते हुए उन्हें सातारा में नजरबन्द रखा, लेकिन संभाजी द्वितीय को कोल्हापुर में छोटी सी रियासत देकर उन्हें वहाँ शान्ति से रहने के लिए भेज दिया. बालाजी विश्वनाथ उर्फ बाजीराव पेशवा प्रथम और द्वितीय की मदद से शाहूजी महाराज ने मराठा साम्राज्य को समूचे उत्तर भारत तक फैलाया. 1748 में शाहूजी अत्यधिक बीमार पड़े और लगभग मृत्यु शैया पर ही थे, उस समय ताराबाई 73 वर्ष की हो चुकी थीं लेकिन उनके दिमाग में मराठा साम्राज्य की रक्षा और सत्ता समीकरण घूम रहे थे. शाहूजी महाराज के बाद कौन?? यह सवाल ताराबाई के दिमाग में घूम रहा था. वह पेशवाओं को अपना साम्राज्य इतनी आसानी से देना नहीं चाहती थीं. तब ताराबाई ने एक फर्जी कहानी गढी और लोगों से बताया कि उसका एक पोता भी है, जिसे शाहूजी महाराज के डर से उसके बेटे ने एक गरीब ब्राह्मण परिवार में गोद दे दिया था, उसका नाम रामराजा है और अब वह 22 साल का हो चुका है, उसका राज्याभिषेक होना चाहिए. ताराबाई मजबूती से अपनी यह बात शाहूजी को मनवाने में सफल हो गईं और इस तरह 1750 में उस नकली राजकुमार रामराजा के बहाने ताराबाई पुनः मराठा साम्राज्य की सत्ता पर काबिज हो गई. रामाराजा को उसने कभी भी स्वतन्त्र रूप से काम नहीं करने दिया और सदैव परदे के पीछे से सत्ता के सूत्र अपने हाथ में रखे. 

इस बीच मराठों का राज्य पंजाब की सीमा तक पहुँच चुका था. इतना बड़ा साम्राज्य संभालना ताराबाई और रामराजा के बस की बात नहीं थी, हालाँकि गायकवाड़, भोसले, शिंदे, होलकर जैसे कई सेनापति इसे संभालते थे, परन्तु इन सभी की वफादारी पेशवाओं के प्रति अधिक थी. अंततः ताराबाई को पेशवाओं से समझौता करना पड़ा. मराठा सेनापति, सूबेदार, और सैनिक सभी पेशवाओं के प्रति समर्पित थे अतः ताराबाई को सातारा पर ही संतुष्ट होना पड़ा और मराठाओं की वास्तविक शक्ति पूना में पेशवाओं के पास केंद्रित हो गई. ताराबाई 1761 तक जीवित रही. जब उन्होंने अब्दाली के हाथों पानीपत के युद्ध में लगभग दो लाख मराठों को मरते देखा तब उस धक्के को वह बर्दाश्त नहीं कर पाई और अंततः 86 की आयु में ताराबाई का निधन हुआ. परन्तु इतिहास गवाह है कि यदि 1701 में ताराबाई ने सत्ता और मराठा योद्धाओं के सूत्र अपने हाथ में नहीं लिए होते, औरंगज़ेब को स्थान-स्थान पर रणनीतिक मात नहीं दी होती और मालवा-गुजरात तक अपना युद्धक्षेत्र नहीं फैलाया होता तो निश्चित ही औरंगज़ेब समूचे पश्चिमी घाट पर कब्ज़ा कर लेता. मराठों का कोई नामलेवा नहीं बचता और आज की तारीख में इस देश का इतिहास कुछ और ही होता. समूचे भारत पर मुग़ल सल्तनत बनाने का औरंगज़ेब का सपना, सपना ही रह गया. इस वीर मराठा स्त्री ने औरंगज़ेब को वहीं युद्ध में उलझाए रखा, दिल्ली तक लौटने नहीं दिया. औरंगज़ेब के बाद मुग़ल सल्तनत वैसे ही कमज़ोर पड़ गई थी. इस वीरांगना ने अकेले दम पर जहाँ एक तरफ औरंगज़ेब जैसे शक्तिशाली मुगल बादशाह को बुरी तरह थकाया, हराया और परेशान किया, वहीं दूसरी तरफ धीरे-धीरे मराठा साम्राज्य को भी आगे बढाती रहीं... 

एक समय पर मराठों का साम्राज्य दक्षिण में तंजावूर से लेकर अटक (आज का अफगानिस्तान) तक था, लेकिन आपको अक्सर इस इतिहास से वंचित रखा जाता है और विदेशी हमलावरों तथा लुटेरों को विजेता, दयालु और महान बताया जाता है, सोचिए कि ऐसा क्यों है??

Saturday, August 22, 2015

Terrorist Naved Wants to Kill "Hindus" only...

नावेद के बहाने हिंदुओं के लिए कुछ ज्ञान... 

(भाई तुफैल चतुर्वेदी जी की कलम से)...  

ख़ासा स्मार्ट, परिवार या पास-पड़ौस के ही शरारती लड़के जैसा किशोर, अभी मसें भी नहीं भीगीं, मीठी मुस्कराहट बिखेरता चेहरा और उदगार "मैं यहाँ हिन्दुओं को मारने आया हूं, मुझे ऐसा करने में मज़ा आता है " ये वर्णन जम्मू के नरसू क्षेत्र में बीएसएफ की एक बस पर ताबड़तोड़ फायरिंग के बाद गांव वालों की साहसिक सूझ-बूझ से दबोचे गये एक आतंकवादी का है। उसके जैसा ही एक हत्यारा मारा भी गया। इस पाकिस्तानी आतंकी की कई स्वीकारोक्तियों के अनुसार उसका नाम क़ासिम ख़ान या उस्मान या नावेद...ऐसा कुछ है और उसकी आयु भी 16 वर्ष से 20 वर्ष के बीच कहीं है। ये शायद वो भारतीय न्यायव्यवस्था के समक्ष अपने को नाबालिग़ बताने के लिए कर रहा है। 


भारत आकर ऐसी स्वीकारोक्ति करने वाले इस पाकिस्तानी आतंकवादी के मानस को समझना इस लिये भी आवश्यक है कि उसने कहा है " मैं यहाँ हिन्दुओं को मारने आया हूं, मुझे ऐसा करने में मज़ा आता है "। उसके कथन के दो भाग हैं। पहला " मैं यहाँ हिन्दुओं को मारने आया हूँ " यानी आप होंगे जाटव, कुर्मी, राजपूत, यादव, जाट, बाल्मीक, ब्राह्मण, बनिये इत्यादि कोई भी मगर आपको मारने आने वाले दुश्मन को आपकी वो असली पहचान पता है जिसे आप जान कर भी नहीं जानना चाहते। आप अपनी नज़र में पिछड़े, अन्त्यज, अनुसूचित, सवर्ण कोई तीसमारखां हों, मगर उसके और उसकी सोच वालों के लिये आप सब एक हैं। वो यहाँ जम्मू के डोगरे, पंजाबी, गुजरती, मराठी, तमिल, तेलगू, मलयाली, कन्नड़, बिहारी, असमी, नगा, मणिपुरी, बंगाली इत्यादि प्रान्त के किसी निवासी को मारने नहीं आया। न ही वो बाल्मीक, यादव, जाटव, ब्राह्मण, गूजर, राजपूत, जाट, वैश्य, तेली इत्यादि किसी जाति के व्यक्ति को मारने आया है। वो हिन्दुओं को मारने आया है। यहाँ क्या ये सवाल अपने आप से पूछना उचित और आवश्यक नहीं है कि दुश्मन के लिये आप सब एक हैं तो आप सब आपस में एक क्यों नहीं हैं ? एक इस्लामी आतंकी की दृष्टि में हम सब जातियों में बंटे समाज नहीं है बल्कि हिन्दू हैं तो हम इससे निबटने के लिये केवल और केवल हिन्दू क्यों नहीं हैं ? 

दूसरे उसने कहा है " मुझे ऐसा करने में मज़ा आता है " अर्थात ये एक विक्षिप्त उन्मादी का ही किया एक काम भर नहीं है अपितु लगातार की जा रही घटनाओं की एक अटूट श्रंखला है। वो पाकिस्तान से आया है। भारत का विभाजन कर बनाये गये देश पाकिस्तान में करोड़ों हिन्दुओं ने वहीँ रहने को प्राथमिकता दी थी। इस नरपिशाच के "मुझे ऐसा करने में मज़ा आता है" से मतलब ये है कि ये और उसके जैसे राक्षसों को पाकिस्तान में ऐसा करते रहने का अभ्यास है। आख़िर " मज़ा आता है " कथन इस बात का द्योतक है कि उसके लिये ये एक अनवरत प्रक्रिया है। बंधुओ ! पाकिस्तान में करोड़ों हिन्दू छूटे थे। विभाजन के बाद पाकिस्तानी जनसँख्या में हिन्दुओं का प्रतिशत दहाई के आंकड़ों में था। अब पाकिस्तान अपनी जनसंख्या में हिन्दू 1 प्रतिशत से भी कम क्यों दिखता है ? हमारे वो सारे भाई कहाँ गये ? उनका क्या हाल हुआ ? इस और इस जैसे इसके साथी लोगों ने पाकिस्तान में बचे हिन्दुओं की क्या दुर्दशा की ? आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का बहुत प्रसिद्द कथन है "साहित्य समाज का दर्पण है" आइये इस दर्पण को देखते हैं। पाकिस्तान के शाइर रफ़ी रज़ा साहब का एक शेर देखिये।

तलवार तो हटा मुझे कुछ सोचने तो दे 
ईमान तुझ पे लाऊँ कि जज़िया अदा करूँ 

कोई घटना यूँ ही शेर में नहीं ढलती। ये करोड़ों लोगों के साथ हुआ व्यवहार है जिसे रफ़ी रज़ा साहब ने बयान किया है। यही वो व्यवहार है जिसके कारण विश्व भर में इस्लाम का प्रसार हुआ है। आतंक एक उपकरण है और इसका प्रयोग इस्लाम में अरुचि रखने वालों को डराने और इस्लाम की धाक जमाने के लिये किया जाता है। बंधुओ ये जम्मू में हुई एक घटना भर नहीं है बल्कि सैकड़ों वर्षों से अनवरत चली आ रही घटनाओं की अटूट श्रंखला है। अफ़ग़ानिस्तान की सीमा पर एक पहाड़ का नाम ही हिन्दू-कुश है। इस शब्द का अर्थ है वो स्थान जहाँ हिन्दू काटे गये। अफ़ग़ानिस्तान हिन्दू क्षेत्र था और उसका इस्लामी स्वरूप अपने आप नहीं आया है। ऐसे ही हत्यारे वहां भी कार्यरत रहे हैं और उनके लगातार प्रहार करते रहने, राज्य के इन बातों पर ध्यान न देने, इन दुष्टों पर भरपूर प्रहार करके इन्हें नष्ट न करने का परिणाम अफ़ग़ानिस्तान का वर्तमान स्वरुप है। पाकिस्तान के ख़ैबर-पख्तूनख्वा क्षेत्र के चित्राल जनपद में कलश जनजाति समूह रहता है। ये बहुदेव-पूजक दरद समूह के लोग हैं। दरद योद्धाओं का वर्णन महाभारत में मिलता है। दुर्योद्धन के लिये कर्ण ने जो विजय यात्रा की है उसमें दरद लोगों से कर लेने का उल्लेख है। इस क्षत्रिय जाति के लोग महाभारत में कौरवों के गुरु कृपाचार्य के नेतृत्व में लड़े थे। महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भी इनका उल्लेख है। अर्जुन की सेना में ये लोग साथ थे। ईरान सहित ये सारा क्षेत्र महाराज चन्द्र गुप्त मौर्य के शासन क्षेत्र के किनारे का नहीं अपितु मध्य का भाग रहा है। ये लोग भारत-ईरानी मिश्रित मूल की भाषा कलश बोलते हैं। पड़ौस के देश अफ़ग़ानिस्तान के पूर्वी प्रदेश नूरिस्तान जिसे पहले काफ़िरिस्तान कहा जाता था, के निवासी भी इसी भाषा को बोलते थे। उनकी भी संस्कृति हमारी तरह बहुदेव पूजक थी। 1895 में यहाँ के निवासियों को ऐसे ही नृशंस हत्यारों ने मुसलमान बनाया और यहाँ की भाषा, संस्कृति, मान्यताओं को बलात बदला। ज्ञान-शौर्य से चमचमाते माथों वाला यह समाज-क्षेत्र, आज मुसलमान हो चुका है और तालिबान की ख़ुराक बन कर विश्व को जिहाद, आतंक, अशांति का संदेश दे रहा है। 


बंधुओ ! ये बदलाव एक दिन में नहीं आये। ये सब कुछ सायास सोची-समझी गयी कट्टरता का परिणाम है। आख़िर आत्मघाती दुःसाहस अनायास नहीं हो सकता, निरंतर नहीं हो सकता, सदियों नहीं हो सकता। इसकी तह में जाना, इससे जूझने, निबटने की योजना बनाना सुख-चैन से रहने के लिये आवश्यक है। ये आतंकी स्पष्ट रुप से यहां आने का कारण बता रहा है कि " मै यहाँ हिन्दुओं को मारने आया हूं " । कोई बुरे से बुरा हत्यारा भी अकारण हत्याएं नहीं करता। उनकी हत्या नहीं करता जिन्हें वो जानता ही नहीं है। अनदेखे व्यक्तियों पर हमला कौन सी मानसिकता का व्यक्ति कर सकता है ? ऐसे हमले भारत, भारतवासियों पर ही नहीं विश्व भर में सैकड़ों वर्षों से हो रहे हैं। इसका प्रारम्भ इस्लाम की इस मनमानी सोच से हुआ है कि ख़ुदा एक है, उसमें कोई शरीक नहीं है, मुहम्मद उसका अंतिम पैग़म्बर है। जो इसको नहीं मानता वो काफ़िर है और काफ़िर वाजिब-उल-क़त्ल हैं। 

इस विचारधारा का जन्म मक्का में हुआ था और मुहम्मद जी ने अपनी ये सोच मक्का वासियों को मनवाने की कोशिश की। उन्होंने नहीं मानी और मुहम्मद जी के प्रति कड़े हो गए तो मुहम्मद जी भाग कर मदीना चले गए। वहां शक्ति जुटा कर सैन्य बल बनाया और फिर इस्लाम के प्रारंभिक लोगों से ही इन संघर्षों का बीज पड़ा। प्रारम्भिक इस्लामी विश्वासियों ने ही ये हत्याकांड मक्का-मदीना से प्रारम्भ करते हुए इसका दायरा लगातार बड़ा किया था, बढ़ाया था। मुहम्मद और उनके बाद के चार ख़लीफ़ाओं ने इसकी व्यवस्था की कि ऐसा अनवरत चलता रहे और इस्लाम का तलवार से प्रसार होता रहे। परिणामतः कुछ लाख की आबादी के तत्कालीन अरब में चालीस साल में हज़ारों अमुस्लिमों का नरसंहार हुआ और चार में से तीन खलीफा की हत्या हुई । इस्लाम का प्रारंभिक खिलाफत का दौर, तथाकथित स्वर्णिम काल मनुष्यता का काला युग था। उन लोगों ने आतंक का उपयोग कर लोगों को धर्मान्तरित किया। उसी दौर को विश्व भर में लाने के प्रयास फिर से चल रहे हैं। 

इस हत्यारी सोच के बीज मूल इस्लामी ग्रंथों में हैं। क़ुरआन, हदीसों में अमुस्लिम लोगों की हत्या करने, उन्हें लूटने के अनेकों आदेश हैं। ऐसे हत्यारों को मारे जाने पर जन्नत मिलने और वहां ऐश्वर्यपूर्ण जीवन आश्वासन भी इन्हीं ग्रंथों में हैं। कुछ उल्लेख दृष्टव्य हैं।

1) काफिरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 }
2) ओ मुसलमानों तुम गैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 }
और तुम उनको जहां पाओ कत्ल करो { 2-191 }
3) ऐ नबी ! काफिरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 }
4) अल्लाह ने काफिरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { 9-68 }
5) उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आखिरत पर; जो उसे हराम नहीं जानते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है. उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे जलील हो कर जजिया न देने लगें { 9-29 }
6) तुम मनुष्य जाति में सबसे अच्छे समुदाय हो, और तुम्हें सबको सही राह पर लाने और गलत को रोकने के काम पर नियुक्त किया गया है { 3-110 }
7) जो कोई अल्लाह के साथ किसी को शरीक करेगा, उसके लिये ने जन्नत हराम कर दी है. उसका ठिकाना जहन्नुम है { 5-72 }
8) मुझे लोगों के खिलाफ तब तक लड़ते रहने का आदेश मिला है, जब तक ये गवाही न दें कि अल्लाह के सिवा कोई दूसरा काबिले-इबादत नहीं है और मुहम्मद अल्लाह का रसूल है और जब तक वे नमाज न अपनायें और जकात न अदा करें [ सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 33 }

अफ़ज़ल गुरू, अजमल कसाब, याक़ूब मेमन, नावेद, बोको हराम और आई एस आई एस के आतंकी सब एक ही श्रंखला के राक्षस हैं। ये उसी हत्यारे दर्शन में विश्वास रखते हैं और वही कर रहे है जो इनके प्रारम्भिक लोगों ने किया था और भारत में जिसकी शुरुआत हिन्द-पाक के मुसलमानों के चहेते हीरो मुहम्मद बिन कासिम ने की थी। इस हत्यारे आक्रमणकारी ने इस्लामी इतिहासकार के ही अनुसार 60 हज़ार लोगो (महिलाओं सहित) बंदी बनाया। मुहम्मद बिन कासिम ने इस्लामी कानून के मुताबिक़ लूट का 1/5 हिस्सा दमिश्क में खिलाफत निजाम को भेजा और बाकी मुस्लिम फौज में बांटा { reference- al-Baladhuri in his book The Origins of the Islamic State }। आज अफ़ज़ल गुरू, अजमल कसाब, याक़ूब मेमन, नावेद जो कर रहे हैं वो उनकी ही नहीं इस्लाम की दृष्टि में भी जन्नत का मार्ग खोलने का काम है। कई मुसलमान बड़े आराम से यह कह देते है ये या बोको हराम, आई एस आई एस के लोग जो कर रहे हैं वह इस्लाम नहीं है। बंधुओ ये केवल तब तक सायास बोला जाने वाला झूट है जब तक खुल कर कहने और सारे अमुस्लिम समाज को समाप्त करने का अवसर नहीं आ जाता।

ऐसी हत्यारी सोच ज्ञान के प्रकाश से समाप्त हो सकती थी अतः सावधान इस्लामी आचार्यों ने ज्ञान-विज्ञान को इसी लिये वर्जित घोषित कर दिया। 900 साल पहले मौलाना गजाली ने गणित को शैतानी ज्ञान बता कर वर्जित कर दिया था। अब उसी पथ पर आगे बढ़ते हुए अल-बग़दादी के ख़िलाफ़त निज़ाम ने PHILOSOPHY और CHEMISTRY पढने पर प्रतिबंध लगा दिया है। कोढ़ में खाज ये है कि पाकिस्तान की उजड़ी-बिखरी राजनैतिक स्थितियां, देश में आयी मदरसों की बाढ़, सऊदी अरब-क़तर से उँडेले जाते खरबों पेट्रो डॉलर ऐसे संगठनों के लिये अबाध भर्ती की परिस्थितियां बनाते हैं। इस या इस जैसी विचारधारा को चुनौती न देने के परिणाम व्यक्ति, देश और सम्पूर्ण मानवता हर स्तर पर भयानक होते हैं। अभी कुछ दिन पहले दुबई की एक घटना के बारे में जानना उपयुक्त होगा। एक पाकिस्तानी मूल का परिवार समुद्र में नहाने के लिये गया। 20 वर्ष की बेटी गहरे पानी में फंस गयी। रक्षा-कर्मी दल के लोग बचाव के लिये बढे तो उसके पिता ने उन्हें यह कह कर रोक दिया कि ग़ैर मर्द बेटी को छुएं इससे तो बेहतर है कि वो डूब कर मर जाये। वो लड़की मर गयी। ये मृत्यु उसके पिता के कारण नहीं हुई है। ये मृत्यु इस्लाम की सोच के कारण हुई है। इसका पाप इस्लाम के सार है. 


अंत में प्रेस के वाचालों, कोंग्रेसियों, सैक्यूलरवाद की खाल ओढ़े वामपंथी भेड़ियों का एक सामान्य दावा भी परखना चाहूंगा। इन ढपोरशँखों के अनुसार आतंकियों का कोई मज़हब नहीं होता ? चलिये मान लेते हैं, वाक़ई नहीं होता होगा मगर क्या कीजिये कि हम सबने अमरनाथ यात्रा पर घात लगा कर आतंकी हमले देखे-सुने हैं, मंदिरों पर हमले देखे-जाने हैं। क्या कभी किसी ने कभी हजयात्रियों पर आतंकी हमला सुना है ? क्या वाक़ई आतंकियों का कोई मज़हब नहीं होता ? वो सारे शरीर के बाल उतरवा कर अपनी समझ से ग़ुस्ल, नमाज़ अदा कर नास्तिकता के पथ पर जाने के लिये या इस्लाम छोड़ने के लिये निकलते हैं ?

ये सारे काम हमारे पड़ौसी देश पाकिस्तान से संचालित हो रहे हैं। ज़ाहिर है पाकिस्तान हमारा पड़ौसी देश है और हम पड़ौसी बदल नहीं सकते। हम पड़ौसी की चौखट पर गाँधीवादी मार्ग पर चलते हुए फूल तो रख सकते हैं ? बंधुओ ऐसी स्थितियों में फूल भेंट करने की सर्वोत्तम जगह क़ब्र है। ये भयानक-लोमहर्षक बदला लेने, उसकी योजना बनाने का क्षण है। यहाँ एक सवाल नावेद को पकड़ने वाले लोगों से भी करना है। क्या आपके घर में कोई चाक़ू, पेंचकस, हथौड़ा नहीं था। एक हत्यारा आतंकी समूचा-साबुत पुलिस को कैसे मिल गया ? आपसे उसके हाथ पैरों में 10-20 छेद नहीं किये गये ? उसके दोनों हाथ के अंगूठे नहीं काटे गये ? आपमें से कई बंधु अंगूठे काटने का अर्थ नहीं समझ पा रहे होंगे। इसका अर्थ है जब तक जीना पूर्ण अपाहिज हो जाना। अंगूठे के बिना कोई शौच-स्थान साफ़ तक नहीं कर सकता, खाना नहीं खाया जा सकता। कपड़े नहीं पहने जा सकते। हर पकड़ अंगूठे से ही सम्भव होती है। उसे पता तो चले चोट क्या होती है ? दर्द क्या होता है ? इस रास्ते पर अगले बढ़ने वाले को भी तो ये ध्यान रहे भारतीय केवल बिरयानी ही नहीं खिलते, ख़ून के आंसू भी रुलाते हैं।

- तुफ़ैल चतुर्वेदी

Tuesday, August 11, 2015

Indian Ancient Knowledge and Culture

अभिमन्यु, वामकुक्षी और भारतीय शौच पद्धति...


सदियों से भारतीय ज्ञान एवं संस्कारों की एक महान परंपरा रही है. वेदों-पुराणों-ग्रन्थों सहित विभिन्न उत्सवों एवं सामान्य सी दिखाई देने वाली प्रक्रियाओं में भी हमारे ऋषि-मुनियों ने मनुष्य के स्वास्थ्य एवं प्रकृति के संतुलन का पूरा ध्यान रखा है. जो परम्पराएं, रीति-रिवाज एवं खानपान से लेकर पहनावे तक जो भी ज्ञान ऋषि-मुनियों ने हमें विरासत में दिया है, वह न सिर्फ अदभुत है, बल्कि पूर्णतः तर्कसम्मत एवं वैज्ञानिक भी है. प्रस्तुत लेख में मैं सिर्फ तीन उदाहरण देना चाहूँगा. 

हमारे बुज़ुर्ग हमेशा कहा करते हैं कि गर्भवती स्त्री को हमेशा सदविचार रखने चाहिए, सात्त्विक भोजन करना चाहिए और उससे हमेशा मृदु भाषा में ज्ञानपूर्ण बातचीत करनी चाहिए, ताकि होने वाली संतान भी तेजोमय एवं बुद्धिमान हो. इन बुजुर्गों को यह ज्ञान कहाँ से मिला?? क्या उन दिनों तथाकथित आधुनिक विज्ञान की पढ़ाई होती थी? फिर इन लोगों ने कैसे जान लिया कि गर्भवती स्त्री का भ्रूण सुनने-समझने की क्षमता रखता है? हम सभी ने महाभारत की वह कथा पढ़ी है, जिसमें अर्जुन अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदन के गुप्त रहस्यों एवं पद्धति के बारे में विस्तार से बताते हैं. उस समय उनका पुत्र अभिमन्यु अपनी माता के गर्भ में था. यह बात हजारों वर्ष पूर्व लिखी गई महाभारत में कही गई है कि “गर्भवती स्त्री के गर्भ में पल रहा भ्रूण एक निश्चित समय के पश्चात पूरी तरह सुनने-समझने और स्मरण रखने की शक्ति रखता है”. जब अर्जुन ने चक्रव्यूह भेदन का रहस्य बताया उस समय सुभद्रा जाग रही थीं, लेकिन जब अर्जुन चक्रव्यूह तोड़कर बाहर निकलने की योजना बता रहे थे उस समय सुभद्रा सो गई थीं. इसीलिए अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसना तो स्मरण था, परन्तु उससे बाहर निकलने की कला उन्हें ज्ञात नहीं थी. 




अब ये वर्षों पुराना सिद्धांत पश्चिम के वैज्ञानिक हमें ही सिखा रहे हैं. वैज्ञानिक इस बात पर शोध कर रहे हैं कि गर्भवती स्त्री का भ्रूण किस सीमा तक सुनने-समझने-सोचने की क्षमता रखता है. आधुनिक विज्ञान द्वारा हमें बताया जा रहा है कि यह एक नई खोज है. कितना हास्यास्पद है ना?? 

मित्रों आपने अपने बुजुर्गों से “वामकुक्षी” नामक शब्द के बारे में तो सुना ही होगा, बहुत पुराना शब्द है, पीढ़ियों से चला आ रहा है. “वाम” यानी बाँया और “कुक्षी” यानी करवट. वामकुक्षी का अर्थ है बाँई करवट लेटना. हमारे बुजुर्गों को उनके आयुर्वेद एवं अनुभव ज्ञान से इस बात की पूरी जानकारी थी कि मनुष्य को भोजन के पश्चात कुछ देर “वामकुक्षी” लेनी चाहिए, अर्थात बाँई करवट लेटना चाहिए, ताकि पाचन क्रिया दुरुस्त रहती है. जब बुजुर्गों को यह बात पता थी, तो स्वाभाविकतः इसका अर्थ यह भी होता है कि निश्चित हेए उन्हें इसके पीछे छिपे विज्ञान एवं शारीरिक संरचना की जानकारी भी होगी, अन्यथा वे दाँयी करवट लेटने को भी कह सकते थे... या यह भी कह सकते थे कि भोजन के पश्चात वज्रासन में बैठने की बजाय रस्सी कूदना चाहिए. अब पश्चिमी विज्ञान हमें बता रहा है कि बाँई करवट सोने से लीवर में स्थित “पाचक अम्ल” नीचे की तरफ होता है, जिससे भोजन अच्छे से पचता है और यह ह्रदय के लिए भी लाभकारी होता है. तात्पर्य यह कि भारतीयों को “वामकुक्षी” से मिलने वाले शारीरिक लाभों की पूरी जानकारी थी. कैसे थी? क्या यह विज्ञान नहीं था?? या फिर विज्ञान उसी को माना जाए, जो अंग्रेजी शब्दों में पश्चिम के गोरे हमें बताएँ?? 


तीसरा उदाहरण है भारतीय पद्धति की शौच व्यवस्था. जैसा कि हम सभी जानते हैं भारत में सदियों से उकडूँ बैठकर शौच करने की परंपरा रही है. यहाँ तक कि हमें बचपन से यह सिखाया जाता है कि नीचे बैठकर ही मूत्र त्याग करना चाहिए. महिलाएँ तो आज भी बैठकर ही मूत्र-त्याग करती हैं, लेकिन अधिकाँश पुरुषों ने पश्चिम की नक़ल एवं पैंट-शर्ट वाले पहनावे के कारण खड़े-खड़े मूत्र त्याग की पद्धति अपना ली है. परन्तु पुराने जमाने ने जब पुरुष भी धोती धारण करते थे, तब वे नीचे बैठकर ही मूत्र-त्याग करते थे. यही पद्धति हम शौच करते समय भी अपनाते आए हैं. जब से भारतीयों का खान-पान विकृत हुआ है और उनके घुटनों में दर्द रहने लगा है तब से महानगरीय एवं अर्ध-नगरीय भारतीय भी पश्चिम की देन अर्थात “कमोड” का उपयोग करने लगे हैं. आधुनिक(?) वैज्ञानिक जाँच से पता चला है कि यदि शौच करते समय मनुष्य के दोनों घुटने उसके पेडू (या कहें बड़ी आँत) से ऊपर रहें तो बड़ी आँत पर दबाव नहीं रहता तथा शौच खुलकर होता है. जबकि जैसा कि चित्र में दिखाया है, कमोड पर बैठकर शौच करने से बड़ी आँत थोड़ी सी वक्राकार हो जाती है जिससे मल पूरी तरह साफ़ नहीं हो पाता. 


अब बताईये, क्या हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों एवं बुजुर्गों को इसका विज्ञान पता नहीं था?? उन्हें सब कुछ अपने अनुभव और ग्रंथों में लिखे ज्ञान के आधार पर पता था. यहाँ तक कि पर्यावरण और खेतों की उर्वरकता को बरकरार रखने के लिए पुराने जमाने में खेतों के किनारे शौच किया जाता था. अब यह संभव नहीं है, लेकिन फिर भी अपने-अपने घरों में भारतीय पद्धति से शौच तो किया ही जा सकता है. जिन बुजुर्गों अथवा मरीजों को घुटने में समस्या है और वे नीचे नहीं बैठ सकते, उनके कमोड हेतु पश्चिमी देशों से एक नया आविष्कार आया है जिसे “Squatty Potty” का नाम दिया गया है, इसे कमोड के पास पैरों के नीचे रखें ताकि आपके घुटने पेट से ऊपर हो जाएँ. वास्तव में अब पश्चिमी देश भी समझ चुके हैं, कि शौच की भारतीय पद्धति सर्वोत्तम है, लेकिन वहाँ पर भारतीय पद्धति के शौचालय नहीं हैं, तो उन्होंने इसकी जुगाड़ के रूप में इस उपकरण को निकाला है. शौच के पश्चात हाथ राख या मिट्टी से धोने चाहिए, पैरों को पीछे से भी धोना चाहिए, शौच करते समय बात नहीं करनी चाहिए जैसे कई “वैज्ञानिक” नियम हमारे प्राचीन ज्ञान ग्रंथों में मौजूद हैं, लेकिन चूँकि आधुनिक शिक्षा, पश्चिमी शिक्षा, वामपंथी विकृति तथा सेकुलरिज़्म नामक बीमारी के कारण हिन्दू संस्कृति को अक्सर हेय दृष्टि से देखने का फैशन चल पड़ा है. 

विगत साठ वर्षों में भारत की शिक्षा व्यवस्था को वामपंथी एवं सेकुलर बुद्धिजीवियों द्वारा अपने स्वार्थ एवं धर्म विरोधी मानसिकता के कारण इतना दूषित कर दिया है कि अधिकाँश लोगों को हमारे ग्रन्थ अथवा परम्पराएँ बेकार लगती हैं. जब भी पश्चिमी देश कोई शोध करके हमें बताते हैं तब यहाँ के “परजीवी” किस्म के बुद्धिजीवी उनकी जयजयकार में लग जाते हैं. जबकि वही बात सदियों पहले भारत के संत और आयुर्वेदिक चिकित्सक आदि हमें न सिर्फ लिखित में बता चुके थे बल्कि उन्होंने उन बातों को हमारे रोजमर्रा के जीवन में धर्म के साथ इतनी सुन्दर तरीके से पिरोया था कि अब वह हमें सामान्य सी बातें लगती हैं. इस पश्चिमी वैचारिक गुलामी और वैज्ञानिक आधार पर टिके हुए वृहद भारतीय ज्ञान एवं संस्कृति के सैकड़ों और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं... वे फिर कभी किसी अगले लेख में... 

तब तक के लिए नमस्कार...

Friday, August 7, 2015

Indian Muslims in Cognitive Dissonance

Cognitive Dissonance का प्रैशर कुकर


(साभार :- Anand Raajadhyaksh जी) 

सबसे पहले Cognitive Dissonance का अर्थ समझ लें. अगर मनुष्य का किसी ऐसी जानकारी से सामना हो जाये या उसे कोई ऐसी जानकारी दी जाये, जो उसकी कोई दृढ़ मान्यता – विश्वास – श्रद्धा को ध्वस्त कर दें, तो जो मानसिक स्थिति पैदा होती है उसे Cognitive Dissonance कहते हैं । अचानक वो मानसिक रूप से खुद को एक शून्य अवकाश में लटकता पाता है और आधार के लिए हाथ पैर मारता है । Dissonance याने विसंगति, या अगर संगीत के परिभाषा में देखें तो बेसुरापन. मानव का स्वाभाविक आकर्षण सुसंगति या सुर (harmony) में रहने के लिए होता है, और उसका मन वही प्रयास करता है कि Cognitive Harmony पुनर्स्थापित हों । अब इस हेतु वह कोई आधार खोजता है... कोई सबूत खोजता है जो उसे Harmony पुनर्स्थापित करने हेतु योग्य लगे.. लेकिन यहाँ एक खतरा है, जिसमें वह अक्सर फंस ही जाता है. क्या है वह खतरा? 


इस स्थिति में उसका तर्क कठोर नहीं रह जाता. वह निष्पक्ष नहीं रहता. वह यह भी नहीं देखता कि मिलनेवाला तर्क या सबूत सत्यता की कसौटी पर कितना खरा उतरता है. उसके लिए यह काफी है अगर वह उसकी स्थापित मान्यता को फिर से मजबूत कर सके. वह यह नहीं देखता कि जहां से ये आधार लिया जा रहा है वह कितना विश्वसनीय है. उस वक़्त तिनका भी जहाज हो जाता है उसके लिए. 

ऐसा क्यूँ होता है? - असल में सब से बड़ी बात है कि कोई भी व्यक्ति मूर्ख नहीं दिखना चाहता. वह नहीं चाहता कि कोई उस पर हँसे या उसे मूर्ख कहे कि वह किसी झूठ पर कैसे विश्वास करता रहा. इसलिए वह अपने जैसों को खोजता है. कोई महंगी चीज खरीदता है, तो उसके दस और खरीदार ढूँढता है, ताकि कल वह वस्तु फेल हो जाये तो उन दस लोगों का हवाला अपनी पत्नी और बाकी परिवार को दे सके. वह खुद उस वस्तु का मुफ्त प्रचारक भी बन जाता है. अपने निर्णय के समर्थन में संख्या का उसे बड़ा आधार महसूस होता है. जितनी बड़ी संख्या, उतना बड़ा सत्य. 

धर्म के बारे में भी यही चीज होती है. अगर उसका मन उसे सवाल करता भी है, तो अपने मन को यही कहकर चुप कराता है – कि इतने सारे लोग मूर्ख हैं क्या? घर के बड़े, समाज के बड़े और देश और विश्व में इतने लोग अगर इसमें मानते हैं तो क्या वे मूर्ख हैं? मेरे से अधिक जानकार, अधिक विद्वान... और बड़े बड़े तीस्मारखां मानते हैं तो सत्य ही होगा. यहाँ पर एक बात और भी दिखती है. संख्या से जुड़कर न केवल खुद को आश्वस्त किया जाता है, बल्कि संख्या को अपने साथ जोड़कर विरोधी विचारकों को परास्त भी किया जाता है. जहां तक बात चर्चा, संवाद और विवाद तक सीमित है, ठीक है, लेकिन यह अक्सर हिंसा पर भी उतर आती है.

अगर फिर भी उसको कोई टोके या उसके प्रचार को ही नहीं बल्कि उसके विश्वास को ही बेबुनियाद साबित करें तो उसको बड़ा धक्का पहुंचता है. लेकिन इस वक़्त भी वो तिनके ही पहले ढूँढता है, और खोखले तिनकों के देनेवालों को अपना तारणहार मानता है. तर्क से नहीं लेकिन तर्क की परिणति से अधिक डरता है, क्योंकि अंत में जब सत्य का सामना होगा तो तेज:पुंज सामर्थ्यशाली कवचधारी योद्धा, केवल एक बिजूका – कागभगोड़ा दिखाई देगा. उसकी पूरी प्रतिमा ध्वस्त होगी, जिसके रक्षण के लिए वो जरूरत पड़ने पर हिंसक भी हो जाता है. 


वह प्रश्नकर्ता की विश्वसनीयता पर पहला वार करता है – तुम झूठ बोल रहे हो. 

दूसरा वार प्रश्नकर्ता की बनिस्बत अपनी योग्यता पर होता है, वह पूछता है – तुम्हारी औकात क्या है जो हमें सिखाने चले आए हो? 

तीसरा वार प्रश्नकर्ता की निजता पर होता है, जो यूं देखें तो उसको भगाने के लिए होता है – तुम अपनी गिरेबान में झाँको जरा. यहाँ कुछ आरोप लगाकर निकल लेने की कवायद होती है, कि सामनेवाला भी नंगा हो जाये तो चुप हो जाएगा. सत्य का सामना नहीं करना पड़ेगा. 

चौथा और सब से हिंसक वार यह होता है, कि तुम्हें हम से शत्रुता है, इसलिए ऐसे कह रहे हो, तुम्हारे साथ कठोर से कठोर व्यवहार होना चाहिए. अब यहाँ कुछ भी हो सकता है और अक्सर विश्व भर में होता आया है. 

इसी बात के तहत ये मजेदार कहानी भी फिट बैठती है कि :- एक मनुष्य की टांग टूटी तो उसे बैसाखी लेनी पड़ी. बाद में वह तो सामान्य लोगों से भी अधिक चपल हो गया, तो लोगों में जिज्ञासा जागी और उन्होने भी जरूरत न होते भी बैसाखी अपनाई. बाद में तो यह प्रथा ही हो गयी और बगैर बैसाखी चलने पर रोक लगा दी गयी. अगर किसी ने बगैर बैसाखी चलने की जुर्रत की, तो या तो उसकी टांग तोड़ी गयी या वो गाँव छोड़ गए – बेचारे और कर ही क्या सकते थे? 

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इंटरनेट के कारण हिंदुस्तान में Cognitive Dissonance का सब से बड़ा मारा कोई है तो युवा मुसलमान है. वह जानता है कि अब सब जानते हैं कि जब उसके पुरखों ने इस्लाम कुबूल किया होगा, वह कोई बहुत गौरवशाली घटना नहीं होगी. वह जिनसे अपना संबंध बता रहा है, उनकी नजर में तो उसकी औकात धूल बराबर भी नहीं है यह भी सब जानते हैं. समाज के तथाकथित रहनुमाओं ने समाज को मजहब के नाम पर पिछड़ा रखा है, यह भी उसे पता है. वह लगातार जिस मजहब की बड़ाई करता है, उसकी भी जानकारी सब को हासिल होने लगी है, यहाँ तक कि काफिर इस्लाम के बारे में उस से ज्यादा जानने लगे हैं और उनके सवाल, मन में सवाल पैदा कर रहे हैं कि क्या उसकी श्रद्धा सही है? उसकी हालत उस बाप की तरह है जो अपनी बेटी की मासूमियत को चिल्लाकर साबित करने की कोशिश कर रहा हो, और बेटी को उसी वक़्त आई मितली सब के सामने सच्चाई खोल दें.


अब सवाल यह है कि भारत का मुसलमान क्या करेगा? सोशल मीडिया में आजकल वो पहले जैसा आक्रामक नहीं दिखता – बुरी तरह एक्सपोज हो चुका है, और जानता है कि गंदी गालियां देना अपनी जीत नहीं है. वह कहाँ तक ये कह सकता है, कि आप लोग कुछ जानते नहीं तो कुछ बोलना मत, जबकि उसके सामने रखी आयत, खुद उसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर है? कहाँ तक जाति प्रथा को ले कर टोकेगा, जब पास्मांदा और अशरफ के बारे में सवाल पूछे जाएंगे? और कहाँ तक काफिर देवताओं के नाम से गालियां देगा, जब हजरत के चरित्र के प्रसंग सही सबूतों के साथ उजागर किए जाते हैं ? कहीं तो मन के आईने में वो सच्चाई की बदसूरत शक्ल देख ही रहा है. Cognitive Dissonance सिद्धांत अपना काम कर रहा है. उसे समझ आ रहा है कि आज तक उसे सिर्फ इस्तेमाल किया गया है और अभी भी किया जा रहा है. कहीं तो वह वैचारिक खालीपन में सहारा ढूंढ रहा है. 

और इसी स्तर पर उसे सहारा देने के लिए "तिनकों के दुकानदार" दौड़े आ रहे हैं. मेमन को शहीद कहनेवाली यही जमात है. गोद में उठाई जानेवाली छोटी बच्ची को भी हिजाब पहनाने वाले यही हैं. मदरसे में साईंस आवश्यक कर देने पर हल्ला मचानेवाले यही लोग हैं. अपनी दुकानों को ही उन्होने मजहब का नाम दे रखा है और दूकानदारी खतरे में दिखती है, तो मजहब खतरे में होने की आवाज उठाई जाती है.

हिंदुस्तान का युवा मुसलमान वाकई एक प्रैशर कुकर में है. Cognitive Dissonance का अभूतपूर्व प्रैशर है इक्कीसवीं सदी में. देखना यह है कि इस प्रेशर का निपटारा कैसे होगा. दुकानदार तो उन्हें इस तरह आंच दे रहे हैं कि कुकर का विस्फोट ही हो. भाँप अंदर जम रही है, सीटी तो रह रह कर बज रही है. इस खदबदाहट को उचित मार्ग दिखाकर ठण्डा करने में ना तो मुस्लिम धार्मिक नेताओं की रूचि है और ना ही सेकुलर-वामपंथ के पैरोकार इस युवा मुस्लिम को समझाते हैं कि वह किस खोखली जमीन पर खड़ा है...

इस "प्रेशर कुकर" की सीटी किसे सुनाई दे रही है? 
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(फेसबुक के विद्वान श्री आनंद राजाध्यक्ष जी द्वारा लिखा गया अदभुत विश्लेषण) 

Wednesday, August 5, 2015

Impose Ban on Dirty Websites in India

भारत के लिए भस्मासुर हैं अश्लील वेबसाइटें


क्या कभी आपने सोचा है कि हमारी अपनी संस्कृति पर अधिकार जताने के लिए हम क्यों विवश हैं? क्यों ग्लोबलाइजेशन व उदारवादी विश्व अर्थव्यवस्था के नाम पर अनाचार, अश्लील, अनैतिक व अवैध कार्यों को वैध बनाने की कुछ विकृत मानसिकता वाले लोगों व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की साजिश में हमें भागीदार बनाया जा रहा है?

जी हाँ भारत में इंटरनेट क्रांति आने के 10-12 सालों के बाद आखिरकार पोर्न साईटों और समाज व देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले इसके दुष्प्रभावों पर एक खुली बहस छिड़ ही गई है। चुपके-चुपके एक सुनियोजित षडयंत्र के तहत भारत के कानूनों के अनुसार अवैध इन बेवसाइटों को विदेशी सर्वरों के माध्यम से हर घर व आफिस में संवेदनहीन अन्र्तराष्ट्रीय बाजारू ताकतों व उनके भारतीय एजेंटों द्वारा घुसा दिया गया. बिना इस बात का अध्ययन, विश्लेषण, बहस व रक्षात्मक उपाय किये बगैर, कि इस वैचारिक अतिक्रमण व सांस्कृतिक प्रदुषण से आम भारतीय विशेषकर बच्चे, किशोर व औसत बुद्धि के व्यस्क पर क्या दुष्प्रभाव पड़ेंगे? कैसे समाज का पारिवारिक ढांचा टुटने लगेगा और समाज यौन पिपासु हो आत्मघाती होता जायेगा? हमें इस षडयंत्र के भारतीय गुनहगारों को खोजकर सजा दिलानी होगी. 


किन्तु इसकी आवाज उठाने से पूर्व हम अपनी माँग कि अश्लील पोर्न साईटों पर पूर्णतः प्रतिबंध लगना चाहिए के पक्ष में कुछ तर्क रखना चाहते हैं-

- उच्चतम न्यायालय ने पोर्न साईटों से संबंधित याचिका की सुनवाई के समय माना कि ‘चाइल्ड पोनोग्राफी’ गलत है और इससे संबंधित सामग्री को इंटरनेट पर प्रतिबंधित करने के सरकार को आदेश दिये। हमारा उच्चतम न्यायालय से आग्रह है कि जितने संवेदनशील आप उन विदेशी बच्चों के प्रति है जिनका शोषण कर ऐसी पोर्न फिल्मों का निर्माण किया जाता है उतना ही संवेदनशील अपने देश के के बच्चों, किशोरों व औसत बुद्धि के व्यस्कों के प्रति भी हो और उन पर इन साईटों के देखने से पड़ने वाले दुष्प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन करा लेने के बाद ही कोई निर्णय लें। 

- कुछ लोग पोर्न को सही मानते हैं और इसे व्यक्ति की नैसर्गिक जरूरत तक के रूप में परिभाषित करते हैं। उनके अपने तर्क हो सकते हैं, किन्तु हमारे अनुसार किसी भी देश व समाज की अपनी-अपनी संस्कृति, सामाजिक सोच व बौद्धिक विकास की प्रक्रिया व दुनिया को देखने व जीने के तरीका होता है यह सबके लिये एक जैसा हो ही नहीं सकता। 

- मौलिक भारत नामक संस्था ने सैकड़ों सामाजिक व धार्मिक संगठनों के साथ मिलकर पिछले एक वर्ष से अश्लीलता, नशाखोरी व इनके कारण नारी पर हाने वाले अत्याचारों के विरुद्ध एक अभियान चलाया हुआ है। हमें अभी तक 100 प्रतिशत लोगों ने समर्थन दिया है, हमारी खुली चुनौती है कि सरकार इस मुद्दे पर सभी तथ्यों को निष्पक्ष रूप से जनता के सामने रखकर जनमत संग्रह करा लें। हमारा पूरा विश्वास है कि 99 प्रतिशत भारतीय इस प्रकार की अश्लील बेवसाईटों के विरोध में मत देंगे। जनता से प्राप्त सुझावों व उनपर चिंतन-मंथन, विश्लेषण और शोध के उपरान्त हमारे कुछ स्पष्ट मत व तर्क हैं। हमारा उच्चतम न्यायाल व भारत सरकार से अग्रह है कि वे अदालती सुनवाई के समय इन तर्को व प्रश्नों का सारगर्भित जवाब देश की जनता को दे अन्यथा तुरन्त प्रभाव से पोर्न साइटों पर प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया शुरु करें। 

- क्या पश्चिमी देशों में पोर्न साइटों व इनसे संबंधित व्यापारिक गतिविधियों को 5-7 वर्षों के अंदर समाज पर थोप दिया गया था? 
- क्या जिन देशों में पोर्न देखना वैध है उन्होंने पहले किसी अन्य देश की ऐसी फिल्में देखी और फिर अपने देश में ऐसे व्यापार को प्रारंम्भ किया जो हम पर विदेशी पोर्न साइटों को हमसे पूछे बिना व बिना बहस के ही थोप दिया गया। 
- क्या ऐसा कोई विश्वसनीय सर्वेक्षण है जो यह बताता हो कि पोर्न के व्यापार में लगे लोग अपने कार्यों से खुश हैं और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उनके कार्यों को सुरक्षित व्यापार की श्रेणी में मान्यता दी हो? 
- पोर्न साइटों की वकालत करने वाले मीडिया समूह इनका विरोध करने वालों को अपनी कवरेज में जगह क्यों नहीं देते? 
- ऐसे वैज्ञानिक अनुसंधान हमारे पास उपलब्ध हैं जो प्रमाणित करते हैं कि पोर्न-देखने के बाद मानव में पशुता का भाव आ जाता है और उसके मन में रिश्तों की दीवार समाप्त हो जाती है व वह सामने वाले पुरुष या स्त्री को वस्तु की तरह देखने लगता है। विशेषकर स्त्रियों के प्रति आपराधिक होता जाता है। 
- अगर पोर्न देखना, बनाना और दिखाना सही है तो इसे भारत में कानूनी मान्यता क्यों नहीं दी जा रही है? 
- अगर पोर्न जो दिखा रही है वह सही हैं तो फिर विवाह, परिवार व समाज की अन्य संस्थाओं की मान्यता समाप्त की जानी चाहिए। सेंसर बोर्ड व अन्य सभी संबंधित कानूनों को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। 
- जो भारतीय पोर्न देखने के समर्थक हैं वे अपनी पोर्न बनाकर अश्लील साइटों पर क्यों नहीं क्यों नहीं डालते हैं? 
- पोर्न के व्यापार में लगी हुई साइटों से भारत सरकार टैक्स क्यों नहीं वसूलती? निश्चित रूप से इस कर चोरी की आड़ में अरबों रुपयों का अवैध लेन देने होता होगा। 
- क्यों सरकार ने इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडरों को ऐसी अवैध साइटों को नहीं दिखाने की स्पष्ट कार्यनीति व जरूरी संसाधन उपलब्ध नहीं कराये? हमारे खाली पड़े लाखों आई टी इंजीनियर इस दिशा में मददगार सिद्ध होंगे। 
- इन बैवसाइटों पर जाने के लिए कोई पंजीकरण व शुल्क देकर ही प्रवेश करने की प्रक्रिया क्यों नहीं है? 
- भारत सरकार विदेशी सर्वरों पर ही क्यों निर्भर है वह चीन की तरह अपने सर्वर क्यों नहीं विकसित कर रही है? ऐसे में अवैध अश्लील सामाग्री स्वयं ही छंटती जायेगी। 
- क्या भारत जैसा एक विकासशील देश जिसका विश्व अर्थव्यवस्था में मात्रा 2 प्रतिशत व बौद्धिक संपदा में 0.01 प्रतिशत हिस्सा हो, वह अपनी नयी पीढ़ी को पोर्न, नशाखेरी, सट्टे व, उपभोक्तावाद व पश्चिमी अपसंस्कृति को शिकार बना तबाह करने की विदेशी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद फैलाने के षडयंत्र का मोहरा बनता जा रहा है? 90 करोड़ गरीबो के देश में पहले सबका विकास हमारी प्राथमिकता है या पोर्न उन्माद? 
- क्या कहीं ऐसा तो नहीं है कि चूंकि पश्चिमी देशों में भयंकर मंदी व बेरोजगारी है और बाजार अर्थव्यवस्था में नये रोजगार पैदा नहीं हो रहे ऐसे में वे अपनी ही आबादी की ऐसे अधकचरे रोजगारों में धकेल रहे हों और भारत जैसे देश को भी अपन बाजार बना रहे हैं? 
- देश में पोर्न समर्थक मीडिया व बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोग कहीं इन बाजारु शक्तियों के ‘लाॅबिंग एजेन्ट तो नहीं हैं, जो भ्रम फैलकार अपनी फंडिंग एजेंसियों के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं? 
- क्यों पिछले 20-25 वर्षो में बाजारवाद व खुली अर्थव्यवस्था आने के बाद ही अश्लील बेवसाइटों, ड्रग्स व सट्टे का अवैध कारोबार से धन की निकासी भारत में बढ़कर 15 से 20 लाख करोड़ तक हो गयी और इनके नियमन के लिए कोई कानून नहीं बनाये गये। 
- क्या पोर्न समर्थकों ने इन फिल्मों में निर्माण में धकेले गये लोगों के उत्पीड़न व इन पोर्न को देखकर उत्पीड़न का शिकार हुए लोगों की स्थिति जानने की कोशिश की हैं? क्या इनमें मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाई है?
देशवासियों, क्षणिक भावनाओं में आकर अगर आप अपनी नयी पीड़ी व देश के भविष्य को गर्त में ढकेलना चाहते हैं तो आपकी मर्जी मगर हम यह कानते हैं कि हर देश की अपनी संस्कृति व विकास चक्र होता है, ग्लोवलाइजेशन’ को अबाध रूप से थोप देने से जो संवेदनहीन व पशुवत समाज हम बनाते जा रहे हैं वह हमें भस्मासुर’ ही बना रहा है अर्थात हम स्वयं ही स्वयं का सर्वनाश करने का प्रबंध कर रहें हैं।
मौलिक भारत ट्रस्ट का आहवान है कि हम अपनी सोच, संस्कृति, मौलिकता, क्रमिक बौद्धिक विकास व चिंतन मंथन से निकली हुई जीवन शैली को ही स्वीकार करें, ग्लोवलाइजेशन के नाम पर हावी बाजारु ताकतों के जीवन दर्शन को कदापि नहीं। अगर सरकार व न्यायालय इस प्रकार के संविधन कानून मानवता, नैतिकता व जनविरोधी कार्यो को रोक पानें में असमर्थ हैं व इनके परिचालन पर नियंत्रण नहीं कर सकती तो उनका अस्तित्व ही निरर्थक है (चीन ने सफलतापूर्वक यह कर दिखाया है). नेताओं को इस लोकतांत्रिक देश की जनता ने अपने-अपने पदों पर इसीलिये बैठाया है, कि वे देश में यथासंभव कानून का राज्य स्थापित करें न कि अवैध व गैर कानूनी गतिविधियों को संरक्षण दें या उनके आगे आत्मसमर्पण कर दें।

Sunday, August 2, 2015

Missionaries, NGOs and Child Labour

मिशनरी संस्थाएँ और एनजीओ :- बाल श्रमिक तथा यौन शोषण दुष्चक्र  


हमारे भारत के “तथाकथित मेनस्ट्रीम” मीडिया में कभीकभार भूले-भटके महानगरों में काम करने वाले घरेलू नौकरों अथवा नौकरानियों पर होने वाले अत्याचारों एवं शोषण की दहला देने वाली कथाएँ प्रस्तुत होती हैं. परन्तु चैनलों अथवा अखबारों से जिस खोजी पत्रकारिता की अपेक्षा की जाती है वह इस मामले में बिलकुल नदारद पाई जाती है. आदिवासी इलाके से फुसलाकर लाए गए गरीब नौकरों-नौकरानियों की दर्दनाक दास्तान बड़ी मुश्किल से ही “हेडलाइन”, “ब्रेकिंग न्यूज़” या किसी “स्टिंग स्टोरी” में स्थान पाती हैं. ऐसा क्यों होता है? जब एक स्वयंसेवी संस्था ने ऐसे कुछ मामलों में अपने नाम-पते गुप्त रखकर तथा पहचान छिपाकर खोजबीन और जाँच की तब कई चौंकाने वाले खुलासे हुए. दिल्ली-मुम्बई-कोलकाता-अहमदाबाद जैसे महानगरों में की गई इस जाँच से पता चला कि बड़े-बड़े शक्तिशाली NGOs तथा कई मिशनरी संस्थाएँ एक बड़े “रैकेट” के रूप में इस करोड़ों रूपए के “धंधे” को चला रही हैं

इस संस्था को जितनी जानकारी प्राप्त हुई है उसके अनुसार इन NGOs एवं मिशनरी संस्थाओं की कार्यशैली इस प्रकार है. सबसे पहले ईसाई मिशनरियाँ भारत के दूरदराज आदिवासी क्षेत्रों में गरीब आदिवासियों को शहर में अच्छी नौकरी और परिवार को नियमित मासिक धन का ऐसा लालच देती हैं कि उसे नकार पाना मुश्किल ही होता है. उस गरीब परिवार की एक लड़की को वह संस्था पहले अपनी शरण में लेकर ईसाई बनाती है और उसे महानगर में उन्हीं की किसी कथित “प्लेसमेंट एजेंसी” के जरिये नौकरानी बनाकर भेज देती है. यह प्लेसमेंट एजेंसी उस धनाढ्य परिवार से पहले ही 30 से 50,000 रूपए “विश्वसनीय नौकरानी” की फीस के रूप में वसूल लेते हैं. 

गाँव में बैठी मिशनरी संस्था और महानगरों की एजेंसी के बीच में भी “दलालों” की एक कड़ी होती है, जो इन नौकरों-नौकरानियों को बेचने अथवा ट्रांसफर करने का काम करते हैं. यह एक तरह से “मार्केट सप्लाय चेन” के रूप में काम करता है और प्रत्येक स्तर पर धन का लेन-देन किया जाता है. महानगर में जो कथित प्लेसमेंट एजेंसी होती है, वह इन नौकरानियों को किसी भी घर में चार-छह माह से अधिक टिकने नहीं देती और लगातार अलग-अलग घरों में स्थानान्तरित किया जाता है. जो परिवार पूरी तरह सिर्फ नौकरों के भरोसे रहते हैं, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके यहाँ कौन काम कर रहा है, क्योंकि उन्हें तो सिर्फ अपने काम पूर्ण होने से मतलब रहता है. चूँकि विश्वसनीयता (खासकर उस नौकर द्वारा चोरी करने वगैरह) की जिम्मेदारी उस एजेंसी की होती है, इसलिए मालिक को कोई फर्क नहीं पड़ता कि नौकरानी कौन है, कहाँ से आई है या चार महीने में ही क्यों बदल गई? इस प्रकार यह प्लेसमेंट एजेंसी एक ही नौकरानी को तीन-चार-छः घरों में स्थानांतरित करते हुए उन धनाढ्यों से धन वसूलती रहती है.  

सामान्यतः इन घरेलू नौकरानियों को ना तो अच्छी हिन्दी आती है और ना ही अंग्रेजी. चूँकि उधर सुदूर गाँव में मिशनरी ने मोर्चा संभाला हुआ होता है, इसलिए परिवार को भी कोई चिंता नहीं होती, क्योंकि उस नौकरानी के वेतन में से अपना कमीशन काटकर वह NGO उस परिवार को प्रतिमाह एक राशि देता है, इसलिए वे कोई शिकायत नहीं करते. परन्तु इधर महानगर में वह नौकरानी सतत तनाव में रहती है और बार-बार घर बदलने तथा प्लेसमेंट एजेंसी अथवा NGO पर अत्यधिक निर्भरता के कारण अवसादग्रस्त हो जाती है. इसी बीच इन तमाम कड़ियों में कुछ व्यक्ति ऐसे भी निकल आते हैं जो इनका यौन शोषण कर लेते हैं, परन्तु परिवार से कट चुकी इन लड़कियों के पास वहीं टिके रहने के अलावा कोई चारा नहीं होता. एक अनुमान के मुताबिक़ अकेले दिल्ली में लगभग 6000 ऐसी नौकरानियां काम कर रही हैं. जबकि उधर दूरस्थ आदिवासी इलाके में उसका परिवार चर्च से एकमुश्त मोटी रकम लेकर धर्मान्तरित ईसाई बन चुका होता है



अपने “शिकार” पर मजबूत पकड़ तथा इन संस्थाओं की गुण्डागर्दी की एक घटना हाल ही में दिल्ली में दिखाई दी थी, जब एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में ऊँचे वेतन पर पदस्थ एक महिला को दिल्ली पुलिस ने अपनी “नौकरानी पर अत्याचार” के मामले में थाने पर बैठा लिया था. महिला पर आरोप था कि उसने एक नाबालिग आदिवासी लड़की के साथ मारपीट की है. पुलिस जाँच में पता चला कि वह लड़की झारखण्ड के संथाल क्षेत्र से आई है और उसका परिवार बेहद गरीब है. हमारी “सनसनी-प्रिय” मीडिया ने खबर को हाथोंहाथ लपका और दिन भर “बालश्रम” विषय पर तमाम लेक्चर झाडे, खबरें बनाईं. जाँच में आगे पता चला कि उस लड़की को सिर्फ तीन माह पहले ही उस संभ्रांत महिला के यहाँ किसी एजेंसी द्वारा लाया गया था और इससे पहले कम से कम बीस घरों में वह इसी प्रकार काम कर चुकी थी. दिल्ली पुलिस ने जब झारखंड संपर्क किया तो पता चला कि लड़की 18 वर्ष पूर्ण कर चुकी है. यहाँ पर पेंच यह है कि जब उस महिला ने पुलिस को पैसा खिलाने से इनकार कर दिया तब पुलिस ने मामला रफा-दफा कर दिया, जबकि होना यह चाहिए था कि पुलिस उस नौकरानी द्वारा काम किए पिछले सभी घरों की जाँच करती (क्योंकि तब वह नाबालिग थी) और साथ ही उस कथित प्लेसमेंट एजेंसी के कर्ताधर्ताओं की भी जमकर खबर लेती, तो तुरंत ही यह “रैकेट” पकड़ में आ जाता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि जिस NGO और मिशनरी संस्था से उस एजेंसी की साँठगाँठ थी, उसने ऊपर से कोई राजनैतिक दवाब डलवा दिया और वह नौकरानी चुपचाप किसी और मालिक के यहाँ शिफ्ट कर दी गई. केस खत्म हो गया

दिल्ली पुलिस के अधिकारी भी इस रैकेट के बारे में काफी कुछ जानते हैं, परन्तु कोई भी कार्रवाई करने से पहले उन्हें बहुत सोचना पड़ता है. क्योंकि अव्वल तो वह नौकरानी “ईसाई धर्मान्तरित” होती है, और उसके पीछे उसका बचाव करने वाली शक्तिशाली मिशनरी संस्थाएँ, NGOs होते हैं, जिनके तार बड़े राजनेताओं से लेकर झारखंड-उड़ीसा के दूरदराज स्थानीय संपर्कों तक जुड़े होते हैं. इन्हीं संगठनों द्वारा ऐसे ही कामों और ब्लैकमेलिंग के लिए महानगरों में कई मानवाधिकार संगठन भी खड़े किए होते हैं. इसलिए पुलिस इनसे बचकर दूर ही रहती है. दिल्ली की उस संभ्रांत महिला के मामले में भी यही हुआ कि वृंदा करात तत्काल मामले में कूद पड़ी और उस महिला पर दबाव बनाते हुए उसे शोषण, अत्याचार वगैरह का दोषी बता डाला, लेकिन इस बात की माँग नहीं की, कि उस एजेंसी तथा उस नौकरानी के पूर्व-मालिकों की भी जाँच हो. क्योंकि यदि ऐसा होता तो पूरी की पूरी “सप्लाय चेन” की पोल खुलने का खतरा था. यही रवैया दूसरे राजनैतिक दलों का भी रहता है. उन्हें भी अपने आदिवासी गरीब वोट बैंक, मिशनरी संस्थाओं से मिलने वाले चन्दे और दूरदराज में काम कर रहे NGOs से कार्यकर्ता आदि मिलते हैं. इसलिए कोई भी राजनैतिक दल इस मामले में गंभीर नहीं है और यथास्थिति बनाए रखता है

बालश्रम, शोषण के ऐसे मामलों में कुछ शातिर NGOs इसमें भी ब्लैकमेलिंग के रास्ते खोज लेते हैं. चूँकि उनके पास संसाधन हैं, अनुभव है, नेटवर्क है, तो वे धनाढ्य परिवार को धमकाते हैं कि यदि वे अपनी भलाई चाहते हों तथा पुलिस के चक्करों से बचना चाहते हों तो फलाँ राशि उन्हें दें अन्यथा नौकरानी कैमरे और पुलिस के सामने कह देगी कि उसके साथ यौन शोषण भी किया गया है. पुलिस के अनुसार कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि जब उस एजेंसी (अथवा NGO) को यह लगने लगता है कि बात बिगड़ने वाली है या अब उस परिवार को नौकरानी की जरूरत नहीं रहेगी इसलिए भविष्य में उस परिवार से उनकी आमदनी का जरिया खत्म होने वाला है तो वे इन्हीं नौकरानियों को डरा-धमकाकर महँगे माल की चोरी करवाकर उन्हें रातोंरात वापस उनके गाँव भेज देती हैं. यदि कभी कोई लड़की गलती से तेजतर्रार निकली, बातचीत अच्छे से कर लेती हो, थोड़ी बहुत अंग्रेजी भी सीख चुकी है तो उसे “गोद लेने” के नाम पर अपने किसी विदेशी नेटवर्क के जरिये यूरोप अथवा खाड़ी देशों में भेज दी जाती है. 

भारत के मीडिया के बारे में तो कहना ही क्या?? “खोजी पत्रकारिता” किस चिड़िया का नाम है, ये तो वे बरसों पहले भूल चुके हैं. इतने सारे संसाधन और रसूख होने के बावजूद उन्हें मानवता से कोई लेना-देना नहीं. किसी घरेलू नौकरानी के शोषण और अत्याचार का मामला उनके लिए TRP बढ़ाने और सनसनीखेज खबर बनाने का माध्यम भर होता है, उन्हें इस बात की कतई चिंता नहीं है कि आखिर ये नौकरानियाँ कहाँ से आती हैं? क्यों आती हैं? कौन इन्हें लाता है? इनका पूरा वेतन क्या वास्तव में उनके ही पास अथवा परिवार के पास पहुँचता है या नहीं? “प्लेसमेंट एजेंसी” क्या काम कर रही है? उनकी फीस कितनी है? ऐसे अनगिनत सवाल हैं परन्तु मीडिया, नेता, पुलिस, तंत्र सभी खामोश हैं और उधर खबर आती है कि 2014-15 में पश्चिम बंगाल से सर्वाधिक 11,000 लड़कियाँ रहस्यमयी तरीके से गायब हुई हैं, जिनका कोई एक साल से कोई अतापता नहीं चला. 

यदि केन्द्र सरकार अपनी सक्षम एजेंसियों के मार्फ़त महानगरों में काम करने वाली नौकरानियों के बारे में एक विस्तृत जाँच करवाए तो कई जाने-माने मिशनरी संस्थाएँ एवं NGOs के चेहरे से नकाब उतारा जा सकता है, जो दिन में "Save the Girl Child", "Donate for a Girl Child" के नारे लगाते हैं, लेकिन रात में "मानव तस्कर" बन जाते हैं...