Sunday, July 26, 2015

ICHR and Intellectual Thugs

ICHR में बौद्धिक लुटेरे


क्या आपने कभी सुना है कि सरकार ने एक पुस्तक लिखवाने के लिए चालीस लाख रूपए खर्च कर दिए हों? या फिर कभी किसी ऐसे बौद्धिक प्रोजेक्ट(?) के बारे में सुना है जो पिछले 43 वर्ष से चल रहा हो, जिस पर करोड़ों रूपए खर्च हो चुके हों और अभी भी पूरा नहीं हुआ हो? 

यदि नहीं सुना हो, तो दिल थामकर बैठिये... ICHR जिसे हम “भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद्” के नाम से जानते हैं, वहाँ पर ऐसी कई बौद्धिक लूट हुई हैं. जैसा कि शायद आप जानते ही होंगे, पिछले साठ वर्षों से इतिहास शोध, संगोष्ठियों, सेमिनारों, फेलोशिप्स, स्कॉलरशिप से लेकर पाठ्यक्रमों में हिन्दू विरोधी तथा भारत विरोधी ज़हर भरने का ठेका वामपंथ के पास था. केन्द्र में जो भी काँग्रेस सरकार आई, उसने कभी इन अजगरों की आरामतलबी में कोई खलल उत्पन्न नहीं किया, बल्कि इन्हें समुचित हड्डियाँ देकर पाला-पोसा. पिछले कई वर्षों से “स्पेशल रिसर्च प्रोजेक्ट्स” के नाम पर यह बौद्धिक डाकाजनी चल रही थी. 


उपरोक्त स्पेशल रिसर्च प्रोजेक्ट्स, जिन्हें मात्र कुछ वर्षों एवं दो-चार लाख रुपयों में खत्म हो जाना चाहिए था, करदाताओं की गाढ़ी कमाई के बल पर इन्हें लगातार कई वर्षों तक घसीटा गया. ना तो कोई हिसाब दिया गया और ना ही देरी की वजह बताई गई. कई तथाकथित सम्माननीय इतिहासकार और विद्वान इस खुली लूट में शामिल रहे, जिनमें प्रमुख हैं बिपन चंद्रा, इरफ़ान हबीब और के एम श्रीमाली. आधुनिक भारतीय इतिहास के “विद्वान”(??) माने जाने वाले स्वर्गीय बिपन चंद्रा साहब का एक प्रोजेक्ट “Towards Freedom” तो 1972 में शुरू हुआ था, लेकिन आज तक खत्म नहीं हुआ. लाखों रूपए खर्च हो गए, बिपन चंद्रा साहब बिना हिसाब दिए स्वर्गवासी भी हो गए, लेकिन यह प्रोजेक्ट आज भी अधूरा है. ऐसे होते हैं महान बुद्धिजीवी... इसी महालूट से व्यथित होकर ही श्री अरुण शौरी ने 1998 में रोमिला थापर समेत ऐसे ढेरों फर्जी बुद्धिजीवियों की सरेआम पोल खोलते हुए एक पुस्तक लिखी थी “Eminent Historians” जिसमें तथ्य-दर-तथ्य इस गिरोह के बखिए उधेड़े गए हैं. अरुण शौरी के अनुसार बिपन चंद्रा साहब के इस कथित प्रोजेक्ट पर कम से कम तीन करोड़ रूपए खर्च हो चुके थे. पहले बिपन चंद्रा के बचाव में उतरे कुछ बुद्धिजीवियों ने तर्क दिया कि इस प्रोजेक्ट में सहायकों आदि के वेतन भत्ते को भी इस राशि में जोड़ा गया और छवि खराब करने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया. लेकिन जैसे ही पिछली ऑडिट रिपोर्ट सामने आना शुरू हुईं इनके नकली तर्कों और कथित बौद्धिकता की पोल खुल गई. 

ICHR की 2006-07 की सालाना रिपोर्ट के अनुसार प्रोफ़ेसर बिपन चंद्रा को दो सहायक “विशेष बजट मद” के तहत दिए गए थे. प्रोफ़ेसर विशालाक्षी मेनन और IGNOU के प्रोफ़ेसर सलिल मिश्र को बिपन चंद्रा के मदद हेतु नियुक्त किया गया जिसका पूरा खर्च ICHR ने दिया, इस शर्त पर कि पहले ही प्रोजेक्ट देरी से चल रहा है, अतः अब इस प्रोजेक्ट को किसी भी हालत में 2008 तक पूरा किया जाना है. तो अब सवाल उठता है कि 2008 से लेकर बिपन चंद्रा की मौत तक (अर्थात 30 अगस्त 2014 तक) यह प्रोजेक्ट कहाँ अटका पड़ा था?? और इस पर जो खर्च जारी रहा, उसका हिसाब कौन देगा? करदाताओं के धन का ऐसा अनुपम अपव्यय करने वाले ये कथित बुद्धिजीवी इसके लिए जिम्मेदार क्यों नहीं माने जाने चाहिए? 

जब वाजपेयी सरकार ने ऐसे तमाम प्रोजेक्ट्स पर लगाम कसने की कोशिश की थी, उस समय भी पेट पर लात पड़ने के कारण यह गिरोह बुरी तरह बौखला गया था, परन्तु वाजपेयी सरकार को ना तो बहुमत हासिल था और ना उस सरकार में इस गिरोह से निपटने की इच्छाशक्ति थी. इसलिए जब कुछ वामपंथी बुद्धिजीवियों से ऐसे बाँटे गए लाखों रुपयों का हिसाब-किताब और प्रोजेक्ट्स में देरी की वजह पूछी गई तो जवाब देने में भारी टालमटोल की और बहाने बनाए. 

इरफ़ान हबीब और श्रीमाली का मामला भी इतना ही “रोचक”(??) है. इन्हें 1989 में एक प्रोजेक्ट सौंपा गया था, अगले पन्द्रह वर्ष में जिसके नौ खंड प्रकाशित होने चाहिए थे. प्रोजेक्ट का नाम था “Dictionary of Social, Economic and Administrative Terms in Indian/South Asian Inscriptions”, (अर्थात भारत एवं दक्षिण एशियाई देशों के शिलालेखों की सामाजिक, आर्थिक एवं प्रशासनिक डिक्शनरी). आज तक इस प्रोजेक्ट पर 42 लाख रूपए खर्च हो चुके हैं और श्रीमाली साहब ने ICHR में अभी तक पन्द्रह में से एक भी पांडुलिपि जमा नहीं करवाई है. नवनियुक्त अध्यक्ष सुदर्शन राव के अनुसार उन्हें आज भी पता नहीं है कि वास्तव में इस डिक्शनरी प्रोजेक्ट की आज की स्थिति क्या है? रिकॉर्ड के अनुसार 1990 से लेकर अब तक श्रीमाली के पास सिर्फ कुछ हजार कंप्यूटराइज्ड कार्ड भर हैं, जो कि उनके शोध सहायकों ने तैयार किए हैं (जिनका वेतन भी ICHR ने दिया). फिर सवाल उठता है कि पिछले पच्चीस वर्ष में किस बात का शोध हुआ? जो शोध हुआ, उसकी रिपोर्ट क्यों नहीं सौंपी गई? जो पैसा खर्च हुआ, उसका हिसाब कौन देगा? लेकिन यदि आप ऐसे सवाल पूछते हैं तो तत्काल “साम्प्रदायिक” और भाजपा के एजेंट” घोषित कर दिए जाते हैं. 

इरफ़ान हबीब नामक कथित महान इतिहासकार का रिकॉर्ड तो और भी खराब है. वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक़ उन्हें दिए गए प्रोजेक्ट की मियाद 2006-07 में ही खत्म हो चुकी है, लेकिन उन्होंने अभी तक अपनी पांडुलिपि ICHR में जमा ही नहीं की है. मजे की बात यह है कि 2011-12 और 2012-13 की वार्षिक रिपोर्ट में उनके शोध कार्य की फाईल पर “संतोषजनक प्रगति” लिखा गया है. जब कुछ पत्रकारों ने इस सम्बन्ध में पूछताछ की तो पता चला कि हबीब साहब ने खुद को उस प्रोजेक्ट से अलग कर लिया है और अब प्रोफ़ेसर शिरीन मूसावी उस पर काम कर रही हैं. फिर वही सवाल उठता है कि फिर तथाकथित इतिहास शोध के नाम पर जो लाखों रूपए खर्च हुए, उसकी उपयोगिता और हिसाब-किताब कौन देगा? क्या ये पैसा इरफ़ान हबीब से वसूला नहीं जाना चाहिए? 

यह तो मात्र तीन उदाहरण दिए हैं, जबकि वास्तव में यदि काँग्रेस-वामपंथ के तथाकथित बुद्धिजीवियों को मिले फंड्स, ग्रांट्स और फेलोशिप की सूक्ष्मता से जाँच की जाए तो एक विराट फर्जीवाड़ा सामने आ सकता है. इसके अलावा सेमीनार आयोजित करने, संगोष्ठियों और विभिन्न शोध यात्राओं के नाम पर हुए अनाप-शनाप खर्च का तो कोई हिसाब ही नहीं है. क्योंकि “जब सैंयाँ भए कोतवाल तो डर काहे का?”. इसीलिए जब मोदी सरकार पूर्ण बहुमत के साथ आई और स्मृति ईरानी, सुदर्शन राव आदि की नियुक्तियाँ हुईं तो इन कथित बुद्धिजीवियों और तथाकथित प्रोफेसरों/इतिहासकारों की तबियत यकायक गडबड होने लगी. अचानक इन्हें शिक्षा के स्तर की चिंता सताने लगी? इतिहास के विकृतिकरण (जो इन्होंने खुद किया) को लेकर बयान जारी होने लगे... क्योंकि इनकी असली बेचैनी यही है कि पिछले साठ साल की “पोलमपोल” खुलने वाली है. 


इसी ‘हिन्दू विरोधी मानसिकता’ से जुड़ा ताज़ा मामला FTII में गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति को लेकर होने वाले विरोध का है. कथित बुद्धिजीवियों को गजेन्द्र चौहान अयोग्य मालूम पड़ते हैं, लेकिन इन वामपंथी बुद्धिजीवियों ने यूआर अनंतमूर्ति की योग्यता पर कभी सवाल नहीं उठाए, जबकि उनका फिल्मज्ञान शून्य था लेकिन उनकी एकमात्र योग्यता “वामपंथी” और “हिन्दू-विरोधी” होना थी. अब FTII में पिछले दो माह से जो हडताल और प्रदर्शनों की नौटंकी चल रही है, उसकी परतें खुलने लगी हैं और जानकारी मिली है कि लगभग 40 छात्र वहाँ ऐसे हैं जो “घुसपैठिये” हैं. अर्थात जिनका कोर्स और पढ़ाई खत्म हो चुकी है, लेकिन वे होस्टलों पर कब्जा जमाए बैठे हैं और यही लोग गुण्डागर्दी करके बाकी छात्रों को भड़का रहे हैं कि वे गजेन्द्र चौहान का विरोध करें. सवाल उठता है कि पिछले पाँच वर्ष में इन गुर्गों को पाला-पोसा किसने? जवाब वही है... “कथित बौद्धिक गिरोह” ने. 

पिछले साठ वर्ष से “मिलीभगत द्वारा मुफ्त की मलाई” खाती हुई बिल्ली को, अचानक कोई डंडा मार दे, तो वह कैसे किकियाएगी?? बिलकुल वही ICHR, FTII जैसी संस्थाओं में हो रहा है...

Friday, July 17, 2015

Brihadishwara Temple - Classic Indian Architechture

बृहदीश्वर मंदिर : अदभुत वास्तुकला का उदाहरण 


क्या आप पीसा की झुकी हुई मीनार के बारे में जानते हैं?? जरूर जानते होंगे. बच्चों की पाठ्य-पुस्तकों से लेकर जवानी तक आप सभी ने पीसा की इस मीनार के बारे में काफी कुछ पढ़ा-लिखा होगा. कई पैसे वाले भारतीय सैलानी तो वहाँ होकर भी आए होंगे. पीसा की मीनार के बारे में, वहाँ हमें बताया जाता है कि उस मीनार की ऊँचाई 180 फुट है और इसके निर्माण में 200 वर्ष लगे थे तथा सन 2010 में इस मीनार ने अपनी आयु के 630 वर्ष पूर्ण कर लिए. हमें और आपको बताया गया है कि यह बड़ी ही शानदार और अदभुत किस्म की वास्तुकला का नमूना है. यही हाल मिस्त्र के पिरामिडों के बारे में भी है. आज की पीढ़ी को यह जरूर पता होगा कि मिस्त्र के पिरामिड क्या हैं, कैसे बने, उसके अंदर क्या है आदि-आदि. 

लेकिन क्या आपको तंजावूर स्थित “बृहदीश्वर मंदिर” (Brihadishwara Temple) के बारे में जानकारी है? ये नाम सुनकर चौंक गए ना?? मुझे विश्वास है कि पाठकों में से अधिकाँश ने इस मंदिर के बारे में कभी पढ़ना तो दूर, सुना भी नहीं होगा. क्योंकि यह मंदिर हमारे बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल नहीं है. ना तो भारतवासियों ने कभी अपनी समृद्ध परंपरा, विराट सांस्कृतिक विरासत एवं प्राचीन वास्तुकला के बारे में गंभीरता से जानने की कोशिश की और ना ही पिछले साठ वर्ष से लगभग सभी पाठ्यक्रमों पर कब्जा किए हुए विधर्मी वामपंथियों एवं सेकुलरिज़्म की “भूतबाधा” से ग्रस्त बुद्धिजीवियों ने इसका गौरव पुनर्भाषित एवं पुनर्स्थापित करने की कोई कोशिश की. भला वे ऐसा क्योंकर करने लगे?? उनके अनुसार तो भारत में जो कुछ भी है, वह सिर्फ पिछले 400 वर्ष (250 वर्ष मुगलों के और 150 वर्ष अंग्रेजों के) की ही देन है. उससे पहले ना तो कभी भारत मौजूद था, और ना ही इस धरती पर कुछ बनाया जाता था. “बौद्धिक फूहड़ता” की हद तो यह है कि भारत की खोज वास्कोडिगामा द्वारा बताई जाती है, तो फिर वास्कोडिगामा के यहाँ आने से पहले हम क्या थे?? बन्दर?? या भारत में कश्मीर से केरल तक की धरती पर सिर्फ जंगल ही हुआ करते थे?? स्पष्ट है कि इसका जवाब सिर्फ “नहीं” है. क्योंकि वास्कोडिगामा के यहाँ आने से पहले हजारों वर्षों पुरानी हमारी पूर्ण विकसित सभ्यता थी, संस्कृति थी, मंदिर थे, बाज़ार थे, शासन थे, नगर थे, व्यवस्थाएँ थीं... और यह सब जानबूझकर बड़े ही षडयंत्रपूर्वक पिछली तीन पीढ़ियों से छिपाया गया. उन्हें सिर्फ उतना ही पढ़ाया गया अथवा बताया गया जिससे उनके मन में भारत के प्रति “हीन-भावना” जागृत हो. पाठ्यक्रम कुछ इस तरह रचाए गए कि हमें यह महसूस हो कि हम गुलामी के दिनों में ही सुखी थे, उससे पहले तो सभी भारतवासी जंगली और अनपढ़ थे... 


बहरहाल... बात हो रही थी बृहदीश्वर मंदिर की. दक्षिण भारत के तंजावूर शहर में स्थित बृहदीश्वर मंदिर भारत का सबसे बड़ा मंदिर कहा जा सकता है. यह मंदिर “तंजावूर प्रिय कोविल” के नाम से भी प्रसिद्ध है. सन 1010 में अर्थात आज से एक हजार वर्ष पूर्व राजराजा चोल ने इस विशाल शिव मंदिर का निर्माण करवाया था. इस मंदिर की प्रमुख वास्तु (अर्थात गर्भगृह के ऊपर) की ऊँचाई 216 फुट है (यानी पीसा की मीनार से कई फुट ऊँचा). यह मंदिर न सिर्फ वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है, बल्कि तत्कालीन तमिल संस्कृति की समृद्ध परंपरा को भी प्रदर्शित करता है. कावेरी नदी के तट पर स्थित यह मंदिर पूरी तरह से ग्रेनाईट की बड़ी-बड़ी चट्टानों से निर्मित है. ये चट्टानें और भारी पत्थर पचास किमी दूर पहाड़ी से लाए गए थे. इसकी अदभुत वास्तुकला एवं मूर्तिकला को देखते हुए UNESCO ने इसे “विश्व धरोहर” के रूप में चिन्हित किया हुआ है. 


दसवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में चोल वंश के अरुलमोझिवर्मन नाम से एक लोकप्रिय राजा थे जिन्हें राजराजा चोल भी कहा जाता था. पूरे दक्षिण भारत पर उनका साम्राज्य था. राजराजा चोल का शासन श्रीलंका, मलय, मालदीव द्वीपों तक भी फैला हुआ था. जब वे श्रीलंका के नरेश बने तब भगवान शिव उनके स्वप्न में आए और इस आधार पर उन्होंने इस विराट मंदिर की आधारशिला रखी. चोल नरेश ने सबसे पहले इस मंदिर का नाम “राजराजेश्वर” रखा था और तत्कालीन शासन के सभी प्रमुख उत्सव इसी मंदिर में संचालित होते थे. उन दिनों तंजावूर चोलवंश की राजधानी था तथा समूचे दक्षिण भारत की व्यापारिक गतिविधियों का केन्द्र भी. इस मंदिर का निर्माण पारंपरिक वास्तुज्ञान पर आधारित था, जिसे चोलवंश के नरेशों की तीन-चार्फ़ पीढ़ियों ने रहस्य ही रखा. बाद में जब पश्चिम से मराठाओं और नायकरों ने इस क्षेत्र को जीता तब इसे “बृहदीश्वर मंदिर” नाम दिया. 


तंजावुर प्रिय कोविल अपने समय के तत्कालीन सभी मंदिरों के मुकाबले चालीस गुना विशाल था. इसके 216 फुट ऊँचे विराट और भव्य मुख्य इमारत को इसके आकार के कारण “दक्षिण मेरु” भी कहा जाता है. 216 फुट ऊँचे इस शिखर के निर्माण में किसी भी जुड़ाई मटेरियल का इस्तेमाल नहीं हुआ है. इतना ऊँचा मंदिर सिर्फ पत्थरों को आपस में “इंटर-लॉकिंग” पद्धति से जोड़कर किया गया है. इसे सहारा देने के लिए इसमें बीच में कोई भी स्तंभ नहीं है, अर्थात यह पूरा शिखर अंदर से खोखला है. भगवान शिव के समक्ष सदैव स्थापित होने वाली “नंदी” की मूर्ति 16 फुट लंबी और 13 फुट ऊँची है तथा एक ही विशाल पत्थर से निर्मित है. अष्टकोण आकार का मुख्य शिखर एक ही विशाल ग्रेनाईट पत्थर से बनाया गया है. इस शिखर और मंदिर की दीवारों पर चारों तरफ विभिन्न नक्काशी और कलाकृतियां उकेरी गई हैं. गर्भगृह दो मंजिला है तथा शिवलिंग की ऊँचाई तीन मीटर है. आगे आने वाले चोल राजाओं ने सुरक्षा की दृष्टि से 270 मीटर लंबी 130 चौड़ी बाहरी दीवार का भी निर्माण करवाया. सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी तक यह मंदिर कपड़ा, घी, तेल, सुगन्धित द्रव्यों आदि के क्रय-विक्रय का प्रमुख केन्द्र था. आसपास के गाँवों से लोग सामान लेकर आते, मंदिर में श्रद्धा से अर्पण करते तथा बचा हुआ सामान बेचकर घर जाते. सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह है कि यह मंदिर अभी तक छः भूकंप झेल चुका है, परन्तु अभी तक इसके शिखर अथवा मंडपम को कुछ भी नहीं हुआ. दुर्भाग्य की बात यह है कि शिरडी में सांई की “मजार” की मार्केटिंग इतनी जबरदस्त है, परन्तु दुर्भाग्य से ऐसे अदभुत मंदिर की जानकारी भारत में कम ही लोगों को है. इस मंदिर के वास्तुशिल्पी कुंजारा मल्लन माने जाते हैं. इन्होंने प्राचीन वास्तुशास्त्र एवं आगमशास्त्र का उपयोग करते हुए इस मंदिर की रचना में (एक सही तीन बटे आठ या 1-3/8 अर्थात, एक अंगुल) फार्मूले का उपयोग किया. इसके अनुसार इस मात्रा के चौबीस यूनिट का माप 33 इंच होता है, जिसे उस समय "हस्त", "मुज़म" अथवा "किश्कु" कहा जाता था. वास्तुकला की इसी माप यूनिट का उल्लेख चार से छह हजार वर्ष पहले के मंदिरों एवं सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माण कार्यों में भी पाया गया है. कितने इंजीनियरों को आज इसके बारे में जानकारी है??

सितम्बर 2010 में इस मंदिर की सहस्त्राब्दि अर्थात एक हजारवाँ स्थापना दिवस धूमधाम से मनाया गया. UNESCO ने इसे “द ग्रेट चोला टेम्पल” के नाम से संरक्षित स्मारकों में स्थान दिया. इसके अलावा केन्द्र सरकार ने इस अवसर को यादगार बनाने के लिए एक डाक टिकट एवं पाँच रूपए का सिक्का जारी किया. परन्तु इसे लोक-प्रसिद्ध बनाने के कोई प्रयास नहीं हुए. 


अक्सर हमारी पाठ्यपुस्तकों में पश्चिम की वास्तुकला के कसीदे काढ़े जाते हैं और भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा को कमतर करके आँका जाता है अथवा विकृत करके दिखाया जाता है. इस विराट मंदिर को देखकर सहज ही कुछ सवाल भी खड़े होते हैं कि स्वाभाविक है इस मंदिर के निर्माण के समय विभिन्न प्रकार की गणितीय एवं वैज्ञानिक गणनाएँ की गई होंगी. खगोलशास्त्र तथा भूगर्भशास्त्र को भी ध्यान में रखा गया होगा. ऐसा तो हो नहीं सकता कि पत्थर लाए, फिर एक के ऊपर एक रखते चले गए और मंदिर बन गया... जरूर कोई न कोई विशाल नक्शा अथवा आर्किटेक्चर का पैमाना निश्चित हुआ होगा. तो फिर यह ज्ञान आज से एक हजार साल पहले कहाँ से आया? इस मंदिर का नक्शा क्या सिर्फ किसी एक व्यक्ति के दिमाग में ही था और क्या वही व्यक्ति सभी मजदूरों, कलाकारों, कारीगरों, वास्तुविदों को निर्देशित करता था? इतने बड़े-बड़े पत्थर पचास किमी दूर से मंदिर तक कैसे लाए गए?? 80 टन वजनी आधार पर दूसरे बड़े-बड़े पत्थर इतनी ऊपर तक कैसे पहुँचाया गया होगा?? या कोई स्थान ऐसा था, जहाँ इस मंदिर के बड़े-बड़े नक़्शे और इंजीनियरिंग के फार्मूले रखे जाते थे?? फिर हमारा इतना समृद्ध ज्ञान कहाँ खो गया और कैसे खो गया?? क्या कभी इतिहासकारों ने इस पर विचार किया है?? यदि हाँ, तो इसे संरक्षित करने अथवा खोजबीन करने का कोई प्रयास हुआ?? सभी प्रश्नों के उत्तर अँधेरे में हैं. 

संक्षेप में तात्पर्य यह है कि भारतीय कला, वास्तुकला, मूर्तिकला, खगोलशास्त्र आदि विषयों पर ज्ञान के अथाह भण्डार मौजूद थे (बल्कि हैं) सिर्फ उन्हें पुनर्जीवित करना जरूरी है. बच्चों को पीसा की मीनार अथवा ताजमहल (या तेजोमहालय??) के बारे में पढ़ाने के साथ-साथ शिवाजी द्वारा निर्मित विस्मयकारी और अभेद्य किलों, बृहदीश्वर जैसे विराट मंदिरों के बारे में भी पढ़ाया जाना चाहिए. इन ऐतिहासिक, पौराणिक स्थलों की “ब्राण्डिंग-मार्केटिंग” समुचित तरीके से की जानी चाहिए, वर्ना हमारी पीढियाँ तो यही समझती रहेंगी कि मिस्त्र के पिरामिडों में ही विशाल पत्थरों से निर्माण कार्य हुआ है, जबकि तंजावूर के इस मंदिर में मिस्त्र के पिरामिडों के मुकाबले चार गुना वजनी पत्थरों से निर्माण कार्य हुआ है.

Sunday, July 12, 2015

What is Naivaidya and Prasad...

“नैवेद्यं” की परंपरा...

आजकल पश्चिमी शिक्षा एवं वामपंथी दुष्प्रचार तथा सेकुलर ब्रेनवॉश के कारण हिन्दू धर्म, संस्कृति एवं संतों के खिलाफ बोलना व उनकी खिल्ली उड़ाना आम बात हो गई है. सामान्यतः कोई भी हिन्दू ऐसी मूर्खतापूर्ण बातों पर जल्दी उत्तेजित नहीं होता, परन्तु धीरे-धीरे यह प्रमाण बढ़ता ही जा रहा है. ऐसी ही एक घटना हाल ही में घटित हुई जब सोशल मीडिया पर हिन्दू संस्कृति का मजाक उड़ाने वाले एक “मित्र”(??) से चर्चा हुई... 

एक मित्र की फेसबुक वाल पर, उसके दूसरे मित्र “सलीम” ने उसे एक चित्र दिखाते हुए मजाकिया अंदाज में कहा – “तुम्हारे भगवानों को तो अक्सर अपच की शिकायत होती होगी?? करोड़ों लोग ढेरों मंदिरों और घरों में उन्हें नैवेद्य समर्पित करते हैं. जैसा कि एक सहिष्णु हिन्दू करता है, उसने भी शुरू में अपने मित्र के इस कमेन्ट को हलके-फुल्के मजाक के तौर पर लिया और कहा – “हाँ, खासकर उस स्थिति में जब आजकल के पदार्थों में केमिकल की मात्रा भी काफी बढ़ गई है...”.  


लेकिन लगता था, “सलीम” बात आगे बढ़ाने के मूड में है... उसने कहा, “नहीं, मजाक नहीं भाई... जब मैं लाखों हिंदुओं को भगवान की इन मूर्तियों के समक्ष नैवेद्यं और प्रसाद अर्पित करते देखता हूँ तो सोचता हूँ कि क्या ये निष्प्राण मूर्तियाँ कभी ये पदार्थ खा सकती हैं? क्या भगवान इस नैवेद्य को खाते हैं? कैसी मूर्खतापूर्ण और बकवास परंपरा है... 

मित्र ने कहा - हाँ, ये सही है कि हम हिन्दू लोग भगवान को नैवेद्य समर्पित करते हैं, जो वापस हमारे पास “प्रसाद” के रूप में आता है. यह परंपरा तो हम घर में, मंदिरों में सदियों से निभाते आ रहे हैं. 

सलीम : वही तो मैं कह रहा हूँ, आप जैसे पढ़े-लिखे पत्रकार भी ऐसा करते हैं तो आश्चर्य होता है. क्या आप नहीं जानते कि ये नैवेद्य भगवान नहीं खा सकते? ये मूर्तियाँ अपना मुँह नहीं खोल सकतीं? जब भगवान एक सामान्य व्यक्ति की तरह बोल नहीं सकते, अपना मुँह नहीं खोल सकते तो उन्हें यह नैवेद्य अर्पित करना सिर्फ दिखावा है, इसमें आध्यात्म का कोई अंश नहीं है... ऐसे लोग मूर्ख और अंधविश्वासी होते हैं... बड़ा दुःख होता है देखकर... (कथित नास्तिक वामपंथी तर्क सिर चढ़कर बोल रहा था). वास्तव में देखा जाए तो भगवान आपसे कुछ नहीं चाहता, लेकिन आप भगवान से सब कुछ चाहते हैं. तो हमें सिर्फ भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए, जैसा कि इक्कीसवीं सदी के पढ़े-लिखे लोग करते हैं... ये नैवेद्यं वगैरह सिर्फ दिखावा है. 

मित्र : तो क्या भगवान हमारी प्रार्थनाएँ सुनेंगे??  

सलीम : हाँ जरूर... उन्हें आपका भोजन या नैवेद्य नहीं चाहिए. भगवान तो अपने-आप में परिपूर्ण और शक्तिशाली होते हैं, दुनिया की हर बात उन्हीं की मर्जी से चलती है... फिर ये नैवेद्य दिखाने का ढोंग किसलिए? 

मित्र : सलीम भाई, तुम कहना चाहते हो कि भगवान यानी ये मूर्तियाँ, भोजन ग्रहण नहीं कर सकतीं, अपना मुँह तक नहीं खोल सकतीं, बोल तक नहीं सकतीं. तुमने कहा कि भगवान हमारी प्रार्थनाओं को सुनते हैं. यानी तुम्हारे अनुसार हमें सिर्फ भगवान की पूजा-प्रार्थना करना चाहिए. भगवान हमसे कुछ नहीं चाहते. वे सर्वव्यापी और परिपूर्ण हैं... इसी को तुम आधुनिक और वैज्ञानिक विचार कहते हो... ठीक??  

सलीम : हाँ बिलकुल, मैं यही आपको समझाने का प्रयास कर रहा हूँ कि ये भगवान की मूर्तियों के सामने नैवेद्य लगाने की ये प्राचीन परंपरा बकवास है और ये बन्द होनी चाहिए.  

मित्र : नहीं, सलीम... 

सलीम : क्यों?? वह आश्चर्य में पड़ गया... 

मित्र : मैं तुम्हारे तर्क से सहमत नहीं हूँ. तुमने कहा कि भगवान ना तो खा सकता है, ना बोल सकता है और ना ही मनुष्यों की तरह व्यवहार कर सकता है...

सलीम : हाँ हाँ वही... 

मित्र : तो फिर भगवान मनुष्यों द्वारा की गई प्रार्थनाओं को सुन कैसे सकता है? भगवान या अल्लाह से प्रार्थना करने के लिए किसी न किसी भाषा में कुछ ना कुछ उच्चारण तो करना पड़ेगा ना? तो क्या भगवान के मुँह या नाक नहीं हैं, लेकिन कान हैं?? जब वे मनुष्यों की तरह व्यवहार नहीं कर सकते, तो उन्हें कैसे पता चलेगा कि प्रार्थना किस भाषा में की जा रही है? यानी तुम्हारे हिसाब से भगवान खा नहीं सकते, बोल नहीं सकते... लेकिन सुन सकते हैं?? ये कैसा तर्क हुआ?  

सलीम : नहीं ऐसा नहीं है, भगवान अपने दूतों के माध्यम से बात करते हैं. सभी धर्मों में देवदूतों की परंपरा है. 

मित्र : अच्छा!!! तो फिर भगवान अपने इन दूतों के माध्यम से नैवेद्य क्यों नहीं खाते? 

सलीम : सब कुछ भगवान की इच्छा और सोच पर निर्भर है, इसलिए.  

मित्र : लेकिन तुमने तो कहा था कि “इच्छा” और “सोच” तो मानवों का गुण है, भगवान यह नहीं करते. यदि भगवान की सोच है और वे मनुष्य की इच्छा को समझ सकते हैं, इसका मतलब है कि हमारा भगवान के साथ भौतिक सम्बन्ध है. तो फिर सैद्धान्तिक रूप से नैवेद्य अर्पण करने में क्या गलत है?  

सलीम : नहीं, ऐसा नहीं है... हम सिर्फ प्रार्थना कर सकते हैं... भगवान हमारी सुनेंगे... सभी पवित्र धार्मिक पुस्तकों में ऐसा ही लिखा है. 

मित्र : लेकिन तुमने तो अभी कहा था कि भगवान को मनुष्य से कुछ नहीं चाहिए, वह परिपूर्ण है. तो फिर तुम्हारे भगवान ने पवित्र पुस्तकों में उसकी पूजा करने और प्रार्थना करने को क्यों कहा है? 

सलीम : प्रार्थना तो हमारे करने का कार्य है, ईश्वर तो सब जानते हैं. 

मित्र : सलीम, तुम फिर से भ्रमित हो रहे हो, और परस्पर विरोधी बात कर रहे हो. यदि तुम्हारे ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं, जो सभी कुछ जानते हैं, तो हमें भगवान को कुछ बताने की जरूरत क्या है? वे सब जानते हैं कि क्या होने वाला है, वैसा ही होगा, प्रार्थना करने से कुछ बदलने वाला तो नहीं है. या फिर यह हो सकता है कि तुम्हारे भगवान इतने दम्भी और घमंडी हों कि जब तक तुम प्रार्थना नहीं करो, तब तक वे तुम्हारी नहीं सुनेंगे. यदि भगवान परिपूर्ण और सर्वज्ञाता हैं तो नमाज पढ़ने अथवा अज़ान की क्या जरूरत है?  

सलीम कुछ क्षण चुप रहा... बोला एक मिनट रुको, मैं इसका उत्तर सोच रहा हूँ... 

मित्र : तुम्हें इसका उत्तर नहीं मिलेगा, क्योंकि जब आप दूसरे की आस्थाओं की खिल्ली उड़ाते हो, तब स्वयं भी यह सोचना चाहिए कि तुम्हारी आस्थाएँ सही हैं या नहीं? जब अतार्किक आस्थाओं का प्रश्न आता है तब सभी धर्म अनावश्यक हैं, परन्तु जब किसी आस्था का आधार वैज्ञानिक हो तब ऐसा नहीं होता. 

सलीम : चलो कोई बात नहीं, तो फिर तुम ही बताओ कि भगवान को नैवेद्य समर्पित करने के पीछे का तर्क क्या है? 


मित्र : तुम अपनी गर्लफ्रेंड को गुलाब का फूल क्यों भेंट करते हो? प्रेम और समर्पण व्यक्त करने के लिए... इसी तरह भगवान के समक्ष अन्न अथवा मिठाई का नैवेद्य समर्पित करना उनके प्रति प्रेम और समर्पण का सांकेतिक तरीका है. यह उनके प्रति आभार प्रदर्शन का भी तरीका है, क्योंकि उन्हीं के कारण यह अन्न हमें मिला. हिन्दू परिवारों में नैवेद्य का निर्माण पूरे भक्तिभाव, समर्पण एवं शरीर तथा दिमाग की शुद्धता के साथ किया जाता है. उसके बाद यह नैवेद्य भगवान को भेंट किया जाता है. हम जानते हैं कि भगवान खुद तो सीधे यह नैवेद्य खाने वाले नहीं हैं, यह सिर्फ सांकेतिक है. परन्तु धार्मिक क्रियाओं, भजन-आरती के पश्चात इस अन्न-मिठाई को “प्रसाद” के रूप में भक्तों में वितरित कर दिया जाता है. मूर्ति तो नैवेद्य नहीं खा सकती, परन्तु भगवान हमारे माध्यम से उसे ग्रहण करते हैं... क्योंकि हम भी उसी भगवान का अंश हैं. 

मित्र ने आगे कहा : जब हम भगवान को अन्न, नैवेद्य अथवा पुष्प अर्पित करते हैं तो कहते हैं, “समर्पयामि”, अर्थात यह आपका ही है, एवं सर्वप्रथम आपको ही दिया जा रहा है. फिर यही नैवेद्य, प्रसाद के रूप में वापस हमें मिल जाता है. जिस भक्तिभाव से हमने नैवेद्य समर्पित किया था, उसी भक्तिभाव से हम पुनर्वापसी के रूप में प्रसाद ग्रहण कर लेते हैं. ऐसा भी माना जाता है कि प्रतिदिन भगवान का प्रसाद ग्रहण करने से भगवान हमें सदैव अन्न देते रहेंगे तथा घर में खुशहाली होगी. नैवेद्यं की परंपरा सिर्फ घरों में नहीं, बल्कि मंदिरों में भी है. मकर संक्रांति, पोंगल, होली, दीपावली सभी त्यौहारों पर मंदिरों में नैवेद्य अर्पित किया जाता है. भगवान के प्रति समर्पण एवं श्रद्धा दर्शाने की यह एक पद्धति है. 

सलीम : क्या आपके धर्मग्रंथों में भी नैवेद्य के बारे में लिखा है? 

मित्र : सभी ग्रंथों में कहा गया है कि तुम्हें अपने ईश्वर को वस्तुएँ, अन्न आदि समर्पित करना चाहिए. गीता में भी कहा गया है कि, “जो भी तुम खाते हो, जो भी तुम पहनते हो, जो भी तुम करते हो, वह ईश्वर को समर्पित करो.. यहाँ तक कि तुम जो भी तपस्या करते हो, वह भी ईश्वर को भेंट कर दो क्योंकि तुम जो भी करते हो, वास्तव में वह “मैं” (अर्थात ब्रह्म या ईश्वर) ही करता हूँ. इसलिए कुछ भी खाने से पहले उसे ईश्वर को समर्पित करना हमारी संस्कृति और परंपरा का अभिन्न अंग है. 

हमारे पुरखों एवं ऋषि-मुनियों ने अपने ज्ञान एवं शोध से पाया कि भोजन मनुष्य के शरीर एवं मस्तिष्क की ऊर्जा का स्रोत है. मनुष्य को अपने जीवन एवं शक्ति के लिए भोजन करना जरूरी है, लेकिन यह भोजन सिर्फ उसकी व्यक्तिगत खुशी अथवा आनंद के लिए नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति विनम्रता एवं प्रकृति के प्रति जागरूकता के साथ होना चाहिए. मनुष्य के शरीर एवं मस्तिष्क से सम्बन्धित प्रत्येक बीमारी अथवा विकृति “भोजन” के माध्यम से आती है. जैसा कि तुम जानते हो, बाद में इलाज की अपेक्षा पहले परहेज करना उत्तम होता है. इसलिए ऋषियों ने बड़े ही वैज्ञानिक तरीके से पारंपरिक औषधीय व्यवस्था का निर्माण किया, जिसे हम और आप “आयुर्वेद” के नाम से जानते हैं. सलीम, तुम्हें शायद पता नहीं होगा कि आयुर्वेद में “विरुद्ध आहार” एवं “पथ्य-कुपथ्य” (परहेज) पर काफी ध्यान दिया गया है. यदि मनुष्य आयुर्वेद के निर्देशों का पालन करें तो वह बिना किसी बड़ी बीमारी के 120 वर्ष तक जीवित रह सकता है. इसलिए “भोजन” को पवित्र माना गया है. 

प्राचीनकाल में ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था मंदिरों पर आधारित थी, इसलिए ऋषियों ने प्रत्येक मास, ऋतु एवं कालचक्र के अनुसार मनुष्य के शरीर एवं पर्यावरण तथा प्रकृति को ध्यान में रखकर मंदिरों में नैवेद्य अर्पित करने की परंपरा आरम्भ की. यदि व्यक्ति भोजन के इस “पथ्य-कुपथ्य” का पूर्ण पालन करे, तो वह सदैव स्वस्थ रहेगा. ऋषियों ने हमें “सात्त्विक” भोजन की सलाह दी है, ऐसा सात्त्विक भोजन जो पवित्रता एवं समर्पण के साथ पकाया गया हो तथा ईश्वर को अर्पित किया गया हो. वे चाहते थे कि उनके अनुयायी इस वैज्ञानिक सिस्टम का पालन करते रहें, इसलिए उन्होंने इसे भगवान और विश्वास के साथ जोड़ दिया ताकि जो अज्ञानी हों, वे भी भय के कारण ही सही इस “पथ्य” और “विरुद्ध आहार” नियम का पालन करें. आधुनिक लोग तो इन नियमों के बारे में जानते ही नहीं हैं. यहाँ तक कि आजकल के अल्पज्ञानी पुजारी भी इन परम्पराओं के पूरी तरह जानकार नहीं रहे. इसलिए कहीं-कहीं दिखावा अधिक हो जाता है.  

सलीम : मुझे क्षमा करना मित्र, मैंने इस दृष्टि से कभी विचार ही नहीं किया. इसीलिए मुझे नैवेद्यं तथा प्रसाद के बारे में कभी जानकारी मिली नहीं. 

मित्र : कोई बात नहीं सलीम, वैसे भी आजकल यह ज्ञान धीरे-धीरे भारत से वैसे ही विलुप्त होता जा रहा है. मनुष्य के अप्राकृतिक भोजन एवं उसके कारण मानव व्यवहार में विकृति बढ़ती ही जा रही है. क्योंकि हिन्दू धर्म में कहावत है, “जैसा खाओगे अन्न, वैसा ही रहेगा मन”. आधुनिकता एवं प्रगतिशीलता के नाम पर जिस तरह लगातार हिन्दू धर्म, संस्कृति एवं परम्पराओं पर हमला जारी है, ऐसे में मुझे आश्चर्य नहीं होगा यदि किसी दिन मंदिरों में “सात्त्विक भोजन” के स्थान पर पिज्जा अथवा चिकन बिरयानी का “प्रसाद”(??) भी दिखाई दे जाए. जिस तरह अज्ञानी पुजारी-पण्डे तथा ब्रेनवॉश किए जा चुके कथित बुद्धिजीवी चारों तरफ बढ़ रहे हैं, ऐसे में कोई बड़ी बात नहीं कि कुछ वर्षों पश्चात दुग्धाभिषेक की बजाय मदिराभिषेक ही आरम्भ हो जाए... जब अज्ञान का अँधेरा पसरता है, मानसिक विकृति चरम पर होती है, और बिना सोचे-समझे-जाने-पढ़े हिन्दू धर्म की की आस्थाओं की खिल्ली उड़ाना ही परम ध्येय बन चुका हो... तब कुछ भी हो सकता है. 

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साभार : संस्कृति मैग्जीन