Wednesday, April 29, 2015

Baji Rao Peshwa - The Great Maratha Warrior

अदभुत योद्धा... बाजीराव पेशवा 

(भाई विशाल अग्रवाल की फेसबुक वाल से साभार ग्रहण).

 विश्व इतिहास, कई सारी महान सभ्यताओं के उत्थान और पतन का गवाह रहा है। अपने दीर्घकालीन इतिहास में हिंदू सभ्यता ने दूसरों द्वारा अपने को नष्ट करने के लिए किये गये विभिन्न आक्रमणों और प्रयासों को सहा है। यद्यपि इसके चलते इसने वीरों और योद्धाओं की एक लंबी शृंखला उत्पन्न की है, जो आक्रान्ताओं से अपनी मातृभूमि की रक्षा करने के लिए समय-समय पर उठ खड़े हुए हैं। भारत के इतिहास में एक ऐसे ही महान योद्धा और हिंदू धर्म के संरक्षक के रूप में प्रख्यात नाम है- 18वीं शताब्दी में उत्पन्न बाजीराव पेशवा। अपने अद्वितीय पराक्रम द्वारा ‘राव के नाम से सभी को डराने वाले’ ऐसी धाक निर्माण करनेवाले, मात्र बीस वर्ष की कार्यकाल में धुआंधार पराक्रम के नए–नए अध्याय रचने वाले, विविध अभियानों में लगभग पौने दो लाख किलोमीटर की घुडदौड करने वाले, ‘देवदत्त सेनानी’ ऐसी लोकप्रियता प्राप्त करने वाले, तथा मराठा साम्राज्य की धाक संपूर्ण हिंदुस्थान पर निर्माण करने वाले इन्हीं ज्येष्ठ बाजीराव पेशवाजी का 28 अप्रैल को निर्वाण दिवस है।


जैसा कि हम जानते हैं कि विजयनगर राज्य के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा व्यवस्थित तरीके से स्थापित हिंदू पद पादशाही के अंतर्गत एक नवीन हिंदू राज्य का पुनर्जन्म किया गया, जिसने पेशवाओं के समय में एक व्यापक आकार ले लिया। इसी "पेशवा" पद को एक नई उँचाई तक ले जाने वाले कोंकण क्षेत्र के प्रतिष्ठित और पारंपरिक चितपावन ब्राह्मण परिवार के बालाजी विश्वनाथ राव के सबसे बड़े पुत्र के रूप में बाजीराव का जन्म 18 अगस्त 1700 ई. को हुआ था। बालाजी विश्वनाथ (बाजीराव के पिता) यद्यपि पेशवाओं में तीसरे थे लेकिन जहाँ तक उपलब्धियों की बात है, वे अपने पूर्ववर्तियों से काफी आगे निकल गये थे।


इस प्रकार बाजीराव जन्म से ही समृद्ध विरासत वाले थे। बाजीराव को उन मराठा अश्वारोही सेना के सेनापतियों द्वारा भली प्रकार प्रशिक्षित किया गया था, जिन्हें 27 वर्ष के युद्ध का अनुभव था। माता की अनुपस्थिति में किशोर बाजीराव के लिए उनके पिता ही सबसे निकट थे, जिन्हें राजनीति का चलता-फिरता विद्यालय कहा जाता था। अपनी किशोरावस्था में भी बाजीराव ने शायद ही अपने पिता के किसी सैन्य अभियान को नजदीक से न देखा हो जिसके चलते बाजीराव को सैन्य विज्ञान में परिपक्वता हासिल हो गई। बाजीराव के जीवन में पिता बालाजी की भूमिका वैसी ही थी, जैसी छत्रपति शिवाजी के जीवन में माता जीजाबाई की। 1716 में जब महाराजा शाहू जी के सेनाध्यक्ष दाभाजी थोराट ने छलपूर्वक पेशवा बालाजी को गिरफ्तार कर लिया, तब बाजीराव ने अपने गिरफ्तार पिता का ही साथ चुना, जब तक कि वह कारागार से मुक्त न हो गए। बाजीराव ने अपने पिता के कारावास की अवधि के दौरान दी गई सभी यातनाओं को अपने ऊपर भी झेला और दाभाजी के छल से दो-चार होकर नितांत नए अनुभव प्राप्त किये।

कारावास के बाद के अपने जीवन में बालाजी विश्वनाथ ने मराठा-मुगल संबंधों के इतिहास में नया आयाम स्थापित किया। किशोर बाजीराव उन सभी विकासों के चश्मदीद गवाह थे। 1718 ई. में उन्होंने अपने पिता के साथ दिल्ली की यात्रा की जहाँ उनका सामना अकल्पनीय षडयंत्रों से हुआ, जिसने उन्हें शीघ्र ही राजनीतिक साजिशों के कुटिल रास्ते पर चलना सीखा दिया। यह और अन्य दूसरे अनुभवों ने उनकी युवा ऊर्जा, दूरदृष्टि और कौशल को निखारने में अत्यन्त सहायता की, जिसके चलते उन्होंने उस स्थान को पाया जिसपर वह पहुँचना चाहते थे। वह एक स्वाभाविक नेता थे, जो अपना उदाहरण स्वयं स्थापित करने में विश्वास रखते थे। युद्ध क्षेत्र में घोड़े को दौड़ाते हुए मराठों के अत्यधिक वर्तुलाकार दंडपट्ट तलवार का प्रयोग करते हुए अपने कौशल द्वारा अपनी सेना को प्रेरित करते थे।

वो 2 अप्रैल 1719 का दिन था, जब पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने अपनी अंतिम साँसे ली। ऐसे में सतारा शाही दरबार में एकत्रित विभिन्न मराठा शक्तियों के जेहन में केवल एक ही प्रश्न बार-बार आ रहा था कि क्या दिवंगत पेशवा का मात्र १९ वर्षीय गैर-अनुभवी पुत्र बाजीराव इस सर्वोच्च पद को सँभाल पाएगा? वहाँ इस बात को लेकर आलोचना-प्रत्यालोचनाओं का दौर चल रहा था कि क्या इतने अल्प वयस्क किशोर को यह पद दिया जा सकता है? ऐसे में मानवीय गुणों की परख के महान जौहरी महाराजा शाहू ने इस प्रश्न का उत्तर देने में तनिक भी देर नहीं लगाई और तुरंत ही बाजीराव को नया पेशवा नियुक्त करने की घोषणा कर दी जिसे शीघ्र ही एक शाही समारोह में परिवर्तित कर दिया गया।

17 अप्रैल 1719 को तलवारबाजी में दक्ष, निपुण घुड़सवार, सर्वोत्तम रणनीतिकार और नेता के रूप में प्रख्यात बाजीराव प्रथम ने मात्र बीस वर्ष की आयु में शाही औपचारिकताओं के साथ पेशवा का पद ग्रहण किया। उन्हें यह उच्च प्रतिष्ठित पद आनुवंशिक उत्तराधिकार या उनके स्वर्गीय पिता के द्वारा किये गये महान कार्यों के फलस्वरूप नहीं दिया गया, अपितु उनकी राजनैतिक दूरदर्शिता से युक्त दृढ़ मानसिक और शारीरिक संरचना के कारण सौपा गया। इसके बावजूद भी कुछ कुलीन जन और मंत्री थे, जो बाजीराव के खिलाफ अपने ईर्ष्या को छुपा नहीं पा रहे थे परन्तु बाजीराव ने राजा के निर्णय के औचित्य को गलत ठहराने का एक भी अवसर अपने विरोधियों को नहीं दिया, और इस प्रकार अपने विरोधियों का मुँह को बंद करने में वह सफल रहे। 


(मध्यप्रदेश के सनावद में स्थित है बाजीराव पेशवा की समाधि)

बाजीराव का शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज्य या "हिंदू पद पादशाही" के उदात्त स्वप्न में अटूट विश्वास था और इस स्वप्न को मूर्त रूप देने हेतु अपने विचारों को छत्रपति शाहू के दरबार में रखने का उन्होंने निश्चय किया। उन्होंने मुग़ल साम्राज्य की कमज़ोर हो रही स्थिति का फ़ायदा उठाने के लिए शाहू महाराज को उत्साहित करने के लिए कहा कि - 'आइये हम इस पुराने वृक्ष के खोखले तने पर प्रहार करें, शाखायें तो स्वयं ही गिर जायेंगी, हमारे प्रयत्नों से मराठा पताका कृष्णा नदी से अटक तक फहराने लगेगी।' इसके उत्तर में शाहू ने कहा था कि, 'निश्चित रूप से ही आप इसे हिमालय के पार गाड़ देगें, क्योंकि आप योग्य पिता के योग्य पुत्र हैं।'

छत्रपति शाहू ने धीरे धीरे राज-काज से अपने को क़रीब-क़रीब अलग कर लिया और मराठा साम्राज्य के प्रशासन का पूरा काम पेशवा बाजीराव पर सौंप दिया। उन्होंने वीर योद्धा पेशवा को अपनी सेना का नेतृत्व करते हुए आगे बढ़ने की अनुमति दे दी और छत्रपति शिवाजी के स्वप्न को पूरा करने के लिए उन्हें हर मार्ग अपनाने की पूरी स्वतंत्रता प्रदान की। बाजीराव की महान सफलता में, उनके महाराज का उचित निर्णय और युद्ध की बाजी को अपने पक्ष में करने वाले उनके अनुभवी सैनिकों का बड़ा योगदान था। इस प्रकार उनके निरंतर के विजय अभियानों ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में मराठा सेना की वीरता का लोहा मनवा दिया जिससे शत्रु पक्ष मराठा सेना का नाम सुनते ही भय व आतंक से ग्रस्त हो जाता था।

बाजीराव का विजय अभियान सर्वप्रथम दक्कन के निजाम निजामुलमुल्क को परास्त कर आरम्भ हुआ जो मराठों के बीच मतभेद के द्वारा फूट पैदा कर रहा था। 7 मार्च, 1728 को पालखेड़ा के संघर्ष में निजाम को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा और ‘मुगी शिवगांव’ संधि के लिए बाध्य होना पड़ा जिसकी शर्ते कुछ इस प्रकार थीं-शाहू को चौथ तथा सरदेशमुखी देना, शम्भू की किसी तरह से सहायता न करना, जीते गये प्रदेशों को वापस करना एवं युद्ध के समय बन्दी बनाये गये लोगों को छोड़ देना आदि। 1731 में एक बार पुनः निज़ाम को परास्त कर उसके साथ की गयी एक सन्धि के द्वारा पेशवा को उत्तर भारत में अपनी शक्ति का प्रसार करने की छूट मिल गयी। बाजीराव प्रथम का अब महाराष्ट्र में कोई भी प्रतिद्वन्द्वी नहीं रह गया था और राजा शाहू का उनके ऊपर केवल नाम मात्र नियंत्रण था।

दक्कन के बाद गुजरात तथा मालवा जीतने के प्रयास में बाजीराव प्रथम को सफलता मिली तथा इन प्रान्तों में भी मराठों को चौथ एवं सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार प्राप्त हुआ। ‘बुन्देलखण्ड’ की विजय बाजीराव की सर्वाधिक महान विजय में से मानी जाती है। मुहम्मद खां वंगश, जो बुन्देला नरेश छत्रसाल को पूर्णतया समाप्त करना चाहता था, के प्रयत्नों पर बाजीराव प्रथम ने छत्रसाल के सहयोग से 1728 ई. में पानी फेर दिया और साथ ही मुगलों द्वारा छीने गये प्रदेशों को छत्रसाल को वापस करवाया। कृतज्ञ छत्रसाल ने पेशवा की शान में एक दरबार का आयोजन किया तथा काल्पी, सागर, झांसी और हद्यनगर पेशवा को निजी जागीर के रूप में भेंट किया।

बाजीराव लगातार बीस वर्षों तक उत्तर की तरफ बढ़ते रहे, प्रत्येक वर्ष उनकी दूरी दिल्ली से कम होती जाती थी और मुगल साम्राज्य के पतन का समय नजदीक आता जा रहा था। यह कहा जाता है कि मुगल बादशाह उनसे इस हद तक आतंकित हो गया था कि उसने बाजीराव से प्रत्यक्षतः मिलने से इंकार कर दिया था और उनकी उपस्थिति में बैठने से भी उसे डर लगता था। मथुरा से लेकर बनारस और सोमनाथ तक हिन्दुओं के पवित्र तीर्थयात्रा के मार्ग को उनके द्वारा शोषण, भय व उत्पीड़न से मुक्त करा दिया गया था। बाजीराव की राजनीतिक बुद्धिमता उनकी राजपूत नीति में निहित थी। वे राजपूत राज्यों और मुगल शासकों के पूर्व समर्थकों के साथ टकराव से बचते थे, और इस प्रकार उन्होंने मराठों और राजपूतों के मध्य मैत्रीपूर्ण संबंधों को स्थापित करते हुए एक नये युग का सूत्रपात किया। उन राजपूत राज्यों में शामिल थे- बुंदी, आमेर, डूंगरगढ़, उदयपुर, जयपुर, जोधपुर इत्यादि।

खतरनाक रूप से दिल्ली की ओर बढ़ते हुए खतरे को देखते हुए सुल्तान ने एक बार फिर पराजित निजाम से सहायता की याचना की। बाजीराव ने फिर से उसे घेर लिया। इस कार्य ने दिल्ली दरबार में बाजीराव की ताकत का एक और अप्रतिम नमूना दिखा दिया। मुगल, पठान और मध्य एशियाई जैसे बादशाहों के महान योद्धा बाजीराव के द्वारा पराजित हुए। निजाम-उल-मुल्क, खान-ए-दुर्रान, मुहम्मद खान ये कुछ ऐसे योद्धाओं के नाम हैं, जो मराठों की वीरता के आगे धराशायी हो गये। बाजीराव की महान उपलब्धियों में भोपाल और पालखेड का युद्ध, पश्चिमी भारत में पुर्तगाली आक्रमणकारियों के ऊपर विजय इत्यादि शामिल हैं।

बाजीराव ने 41 से अधिक लड़ाइयाँ लड़ीं और उनमें से किसी में भी वह पराजित नहीं हुए। वह विश्व इतिहास के उन तीन सेनापतियों में शामिल हैं, जिसने एक भी युद्ध नहीं हारा। कई महान इतिहासकारों ने उनकी तुलना अक्सर नेपोलियन बोनापार्ट से की है। पालखेड का युद्ध उनकी नवोन्मेषी युद्ध रणनीतियों का एक अच्छा उदाहरण माना जाता है। कोई भी इस युद्ध के बारे में जानने के बाद उनकी प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता। भोपाल में निजाम के साथ उनका युद्ध उनकी कुशल युद्ध रणनीतियों और राजनीतिक दृष्टि की परिपक्वता का सर्वोत्तम नमूना माना जाता है। एक उत्कृष्ट सैन्य रणनीतिकार, एक जन्मजात नेता और बहादुर सैनिक होने के साथ ही बाजीराव, छत्रपति शिवाजी के स्वप्न को साकार करने वाले सच्चे पथ-प्रदर्शक थे।

मशहूर वॉर स्ट्रेटिजिस्ट आज भी अमरीकी सैनिकों को पेशवा बाजीराव द्वारा पालखेड में निजाम के खिलाफ लड़े गए युद्ध में मराठा फौज की अपनाई गयी युद्धनीति सिखाते हैं| ब्रिटेन के दिवंगत सेनाप्रमुख फील्ड मार्शल विसकाउंट मोंटगोमेरी जिन्होने प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मन्स के दाँत खट्टे किए थे, वे पेशवा बाजीराव से ख़ासे प्रभावित थे उनकी तारीफ वे अपनी किताब 'ए कन्साइस हिस्टरी ऑफ वॉरफेयर' में इन शब्दों में करते हैं -----The Palkhed Campaign of 1728 in which Baji Rao I out-generalled Nizam-ul-Mulk , is a masterpiece of strategic mobility -----British Field Marshall Bernard Law Montgomery, The Concise History of Warfare, 132

अप्रैल 1740 में, जब बाजीराव अपने जागीर के अंदर आने वाले मध्य प्रदेश के खरगौन के रावरखेडी नामक गाँव में अपनी सेना के साथ कूच करने की तैयारी कर रहे थे, तब वे गंभीर रूप से बीमार हो गये और अंततः नर्मदा के तीर पर 28 अप्रैल 1740 को उनका देहावसान हो गया। एक प्रख्यात अंग्रेज इतिहासकार सर रिचर्ड कारनैक टेंपल लिखते हैं, "उनकी मृत्यु वैसी ही हुई जैसा उनका जीवन था- तंबूओं वाले शिविर में अपने आदमियों के साथ। उन्हें आज भी मराठों के बीच लड़ाकू पेशवा और हिंदू शक्ति के अवतार के रूप में याद किया जाता है।" 


(बाजीराव पेशवा की समाधि) 

जब बाजीराव ने पेशवा का पद सँभाला था तब मराठों के राज्य की सीमा पश्चिमी भारत के क्षेत्रों तक ही सीमित थी। 1740 में, उनकी मृत्यु के समय यानि 20 वर्ष बाद में, मराठों ने पश्चिमी और मध्य भारत के एक विशाल हिस्से पर विजय प्राप्त कर लिया था और दक्षिण भारतीय प्रायद्वीप तक वे हावी हो गये थे। यद्यपि बाजीराव मराठों की भगवा पताका को हिमालय पर फहराने की अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं कर पाए, लेकिन उनके पुत्र रघुनाथ राव ने1757 ई. में अटक के किले पर भगवा ध्वज को फहराकर और सिंधु नदी को पार कर के अपने पिता को स्वप्न को साकार किया।

निरंतर बिना थके 20 वर्षों तक हिंदवी स्वराज्य स्थापित करने के कारण उन्हें (बाजीराव को) हिंदू शक्ति के अवतार के रूप में वर्णित किया गया है। उनके पुत्रों बालाजी उर्फ नाना साहेब, रघुनाथ, जनार्दन, उनकी मुस्लिम प्रेमिका मस्तानी से शमशेर बहादुर और छोटे भाई चिमाजी अप्पा के पुत्र सदाशिवराव भाऊ ने भगवा पताका को दिग-दिगंत में फहराने के उनके मिशन को जारी रखते हुए 1758 में उत्तर में अटक के किले पर विजय प्राप्त करते हुए अफगानिस्तान की सीमा को छू लिया, और उसी समय में भारत के दक्षिणी किनारे को भी जीत लिया। लोगों में स्वतंत्रता के प्रति उत्कट अभिलाषा की प्रेरणा द्वारा और आधुनिक समय में हिंदुओं को विजय का प्रतीक बनाने के द्वारा वे धर्म की रचनात्मक और विनाशकारी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते थे। पेशवा बाजीराव प्रथम अपने जीवन काल में महानायक के रूप में प्रख्यात थे और मृत्यु के बाद भी लोगों के मन उनकी यह छवि उसी प्रकार विद्यमान थी। उनकी उपस्थिति हिंदू जन मानस पर अमिट रूप से अंकित हो चुकी है और इसे समय के अंतराल द्वारा भी खंडित नहीं किया जा सकता।

बाजीराव के बारे में “History of the Marathas” में जे. ग्रांट डफ कहते हैं: "सैनिक और कूटनीतिज्ञ के रूप में लालित और पालित बाजीराव ने कोंकण के ब्राह्मणों को विशिष्ट बनाने वाली दूरदर्शिता और पटुता के माध्यम से शिष्ट तरीके से मराठा प्रमुख के साहस, जोश और वीरता को संगठित रूप दिया। अपने पिता की आर्थिक योजना से पूर्ण परिचित बाजीराव ने एक सामान्य प्रयास द्वारा महाराष्ट्र के विभिन्न जोशीले किन्तु निरुद्देश्य भटकने वाले समुदायों को संगठित करने के लिए उन योजनाओं के कुछ अंशों को प्रत्यक्ष रूप से अमली जामा पहनाया। इस दृष्टिकोण से, बाजीराव की बुद्धिमता ने अपने पिता की अभीप्सित योजनाओं का विस्तार किया; उनके बारे में यह सत्य ही कहा गया है- उनके पास योजना बनाने हेतु एक मस्तिष्क और उसे कार्यान्वित करने हेतु दो हाथ थे, ऐसी प्रतिभा विरले ही ब्राह्मणों में पायी जाती है।

“Oriental Experiences” में सर आर. टेम्पल कहते हैं: "बाजीराव एक उत्कृष्ट घुड़सवार होने के साथ ही (युद्ध क्षेत्र में) हमेशा कार्रवाई करने में अगुआ रहते थे। वे मुश्किल हालातों में सदा अपने को सबसे आगे कर दिया करते थे। वह श्रम के अभ्यस्त थे और अपने सैनिकों के समान कठोर परिश्रम करने में एवं उनकी कठिनाइयों को अपने साथा साझा करने में स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते थे। राजनैतिक क्षितिज पर बढ़ रहे उनके पुराने शत्रुओं मुसलमानों और नये शत्रुओं यूरोपीय लोगों के खिलाफ उनके अंदर राष्ट्रभक्तिपूर्ण विश्वास के द्वारा हिंदुओं से संबंधित विषयों को लेकर राष्ट्रीय कार्यक्रमों की सफलता हेतु एक ज्वाला धधक रही थी। अरब सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी तक पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में मराठों के विस्तार को देखना ही उनके जीवन का ध्येय था। उनकी मृत्यु वैसी ही हुई जैसा उनका जीवन था- तंबूओं वाले शिविर में अपने आदमियों के साथ। उन्हें आज भी मराठों के बीच लड़ाकू पेशवा और हिंदू शक्ति के अवतार के रूप में याद किया जाता है।

“Peshwa Bajirao I and Maratha Expansion” की प्रस्तुति में जदुनाथ सरकार कहते हैं: "बाजीराव दिव्य प्रतिभा संपन्न एक असाधारण घुड़सवार थे। पेशवाओं के दीर्घकालीन और विशिष्ट प्रभामंडल में अपनी अद्वितीय साहसी और मौलिक प्रतिभा और अनेकानेक अमूल्य उपलब्धियों के कारण बाजीराव बल्लाल का स्थान अतुलनीय था। वह एक राजा या क्रियारत मनुष्य के समान वस्तुतः अश्वारोही सेना के वीर थे। यदि सर राबर्ट वालपोल ने इंग्लैंड के अलिखित संविधान में प्रधानमंत्री के पद को सर्वोच्च महत्ता दिलाई तो बाजीराव ने ऐसा ही तत्कालीन समय के मराठा राज में पेशवा पद के लिए किया।"

यह बाजीराव ही थे जिन्होंने महाराष्ट्र से परे विंध्य के परे जाकर हिंदू साम्राज्य का विस्तार किया और जिसकी गूँज कई सौ वर्षों से भारत पर राज कर रहे मुगलों की राजधानी दिल्ली के कानों तक पहुँच गयी। हिंदू साम्राज्य का निर्माण इसके संस्थापक शिवाजी द्वारा किया, जिसे बाद में बाजीराव द्वारा विस्तारित किया गया, और जो उनकी मृत्यु के बाद उनके बीस वर्षीय पुत्र के शासन काल में चरम पर पहुँचा दिया गया। पंजाब से अफगानों को खदेड़ने के बाद उनके द्वारा भगवा पताका को न केवल अटक की दीवारों पर अपितु उससे कहीं आगे तक फहरा दिया गया। इस प्रकार बाजीराव का नाम भारत के इतिहास में हिंदू धर्म के एक महान योद्धा और सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक के रूप अंकित हो गया... उनके निर्वाण दिवस पर कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि... 

(भाई श्री विशाल अग्रवाल की फेसबुक वाल से साभार) 
इनकी वाल पर पहुँचने के लिए क्लिक करें... https://www.facebook.com/CHIRAG.VANDEMATRAM 

Monday, April 27, 2015

Anti Modi Propaganda and Secular Intellectuals in India

विकास एजेंडे को पीछे करती दुष्प्रचार की दुर्गन्ध...

गत दिनों एक सामूहिक चर्चा के दौरान कुछ युवाओं ने मुझसे शिकायत की, कि नरेंद्र मोदी तो तेजी से अपने आर्थिक एजेंडे, विदेश नीति एवं विकास की राजनीति को बढ़ाने में लगे हुए हैं, ताकि देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो और युवाओं को रोजगार मिले, लेकिन विभिन्न चर्चों पर लगातार “हिन्दूवादियों” द्वारा किए जा रहे हमलों के कारण देश की छवि भी खराब हो रही है और अंदरूनी माहौल पर भी बुरा असर पड़ रहा है... इसे जल्द से जल्द रोकना होगा. उस समय मैंने स्पष्टीकरण देने की कोशिश की, परन्तु मीडिया का “प्रभाव” (?) इतना ज्यादा है कि उन युवाओं को यह भरोसा दिलाना कठिन था कि चर्च पर हुए तमाम हमलों की सच्चाई कुछ और है.

जैसा कि सभी जानते हैं स्वतन्त्र मीडिया एक दोधारी तलवार की तरह होता है. यदि इसकी कुछ जिम्मेदारियाँ होती हैं तो कुछ अधिकार भी होते हैं. भारत के मुख्यधारा के मीडिया के सन्दर्भ में यह बात अर्धसत्य है. यहाँ मीडिया सिर्फ अपने अधिकारों की बात करता है, जिम्मेदारी की नहीं. ऊपर से इस मीडिया को सेकुलर-प्रगतिशील “कहे जाने वाले” एवं वामपंथी बुद्धिजीवियों का पूर्ण आर्थिक, नैतिक, वैचारिक और राजनैतिक समर्थन हासिल है. इस कारण स्थिति “करेला, वह भी नीम चढ़ा” जैसी हो गई है... इसीलिए हमारा तथाकथित “नेशनल” मीडिया दिल्ली के किसी मामूली से चर्च की दो खिडकियों के काँच फूटने अथवा छोटी-मोटी चोरी को “चर्च पर हमला”, “हिन्दूवादियों की करतूत”, “अल्पसंख्यकों में आक्रोश” जैसी ब्रेकिंग न्यूज़ तो चलाता है ताकि TRP हासिल हो, लेकिन यही मीडिया उन घटनाओं के हल होने के बाद यह कभी नहीं बताता कि चर्च की खिड़कियाँ फोड़ने वाले शराबी भी ईसाई ही थे और दूसरे चर्च में चोरी करने वाला चोर भी उसी चर्च का कर्मचारी था, जो वेतन नहीं मिलने से नाराज था... मीडिया को यह दूसरा पक्ष दिखाना ही नहीं है, क्योंकि उसका स्वार्थ सिद्ध हो चुका है. चाहे जैसे भी हो नरेंद्र मोदी सरकार को बदनाम करो... चाहे जो भी हो नरेंद्र मोदी के भाषणों में कोई विवादास्पद मुद्दा खोजो... चाहे कुछ भी करना पड़े, मोदी सरकार के मंत्रियों के खिलाफ आलोचना एवं दुष्प्रचार जारी रखो... यही इनका मूल एजेंडा है. 


क्या यह महज संयोग है कि जब भी नरेंद्र मोदी विदेश यात्रा पर जाते हैं, तभी भारत में किसी चर्च पर हमला होता है. फिर अचानक अमेरिका सरकार की सार्वजनिक नसीहत भी सुनाई देती है और इधर दिल्ली में मोमबत्ती मार्च भी होता है. इसीलिए जब-जब दिल्ली-आगरा-मुम्बई आदि स्थानों पर चर्च हमले अथवा मूर्ति तोड़ने जैसे मामले सामने आते हैं, तब-तब मीडिया को “सेकुलर हिस्टीरिया” के दौरे पड़ने शुरू हो जाते हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि चर्च पर हमले, आज़म-आज़मी-ओवैसी के जहरीले बयान, मीडिया द्वारा भाजपा अथवा मोदी के बयानों को तोड़मरोड़ कर पेश करना... ध्यान से देखें तो इन घटनाओं में एक “निश्चित पैटर्न” है.

फरवरी 2015 में जब बीबीसी की संवाददाता लेस्ली उडविन ने तिहाड़ जेल जाकर निर्भया बलात्कार मामले में सजायाफ्ता मुकेश सिंह से मुलाक़ात कर उसका इंटरव्यू बीबीसी पर दिखाया था, उस समय भी यही बौद्धिक षड्यंत्र काम कर रहा था कि, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि “बलात्कारियों के देश” के रूप में बनाने की पूरी कोशिश की जाए. ज़ाहिर है कि मोदी सरकार द्वारा NGOs पर लगाम कसने तथा भ्रष्टाचार के तमाम रास्ते धीरे-धीरे बन्द करते जाने एवं विकासवादी एजेंडे को लागू किए जाने के कारण विपक्षी खेमे में बौखलाहट का माहौल है. अभी तक पिछले एक वर्ष में दिल्ली विधानसभा चुनावों को छोड़कर लगभग सभी चुनावों में मोदी की लोकप्रियता बरकरार दिखी है और भाजपा ने चुनाव जीते हैं. इसीलिए काँग्रेस, जनता परिवार, NGOs “गिरोह” तथा बुद्धि बेचकर जीविका कमाने वाले प्रगतिशील बुद्धिजीवियों में भारी बेचैनी है और अब वे दुष्प्रचार के जरिये मोदी सरकार पर हमले किए जा रहे हैं, और इस काम में इन्हें काँग्रेस और मिशनरी का पूरा सहयोग प्राप्त हो रहा है. जैसा कि विश्व भर के तमाम उदाहरण बताते हैं कि मिशनरी संस्थाएँ दुष्प्रचार के मामले में बेहद निपुण और संसाधन सम्पन्न हैं.

मिशनरी संस्थाओं की संगठित शक्ति येन-केन-प्रकारेण नरेंद्र मोदी सरकार की छवि को आम जनमानस तथा विदेशों में बदनाम और बदरंग करने के लिए कमर कसे हुए है. मीडिया के साथ मिली-जुली संयुक्त शक्ति द्वारा समूचे विश्व में यह बात फैलाई जा रही है कि भारत में एक “हिन्दू-सरकार” है, जो सिर्फ हिंदुओं के हित देखती है और अल्पसंख्यकों पर भारी अत्याचार हो रहे हैं. इसीलिए पाकिस्तान अथवा बांग्लादेश में हजारों हिन्दू महिलाओं पर रोज़ाना हो रहे बलात्कारों के बारे में भारत का कोई चैनल अथवा अखबार जनता को सच्चाई नहीं बताता, परन्तु पश्चिम बंगाल के दूरदराज इलाके में एक वृद्ध नन के साथ हुई लूटपाट को “नन के साथ बलात्कार” कहकर इतना जबरदस्त कवरेज मिलता है कि पश्चिमी देशों की कुछ सरकारें भी इस पर अपने चिंता व्यक्त कर देती है... और जब जाँच में यह पता चलता है कि उस वृद्धा नन के साथ कोई बलात्कार हुआ ही नहीं था, अपितु यह एक सामान्य लूटपाट की घटना थी तथा लूटपाट करने वाले भी किसी हिन्दू संगठन के सदस्य नहीं बल्कि बांग्लादेश से आए हुए अवैध मुस्लिम घुसपैठिये थे, तो मीडिया ने तत्काल इस मामले को ठन्डे बस्ते में डाल दिया.

सामान्य तथ्य है कि दृश्य माध्यमों का प्रभाव (बल्कि दुष्प्रभाव कहना अधिक उचित होगा) ज्यादा पड़ता है, बजाय प्रिंट माध्यम के. इसीलिए भारत के टीवी चैनल “पीड़ितों”(?) को अधिकाधिक नाटकीय बनाकर पेश करने की कोशिश करते हैं. पीड़ित अथवा बलात्कृत महिला के मामले में भी यह देखा जाता है कि महिला किस जाति अथवा धर्म की है. इसीलिए दूरदराज के किसी इलाके में हुए बलात्कार की खबर अचानक राष्ट्रीय स्तर पर बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाती है. सिर्फ दिल्ली में पिछले एक वर्ष में २५६ मंदिरों में चोरी, मूर्तियों से छेड़छाड़ आदि के मामले हुए हैं, लेकिन क्या किसी ने भी इनके बारे में कथित नेशनल मीडिया में कोई खबर देखी? अथवा किसी हिन्दू संगठन को मोमबत्ती लेकर प्रदर्शन करते देखा? परन्तु दिल्ली के किसी मामूली से चर्च की चार खिड़कियों के कांच फूटना अथवा किसी शराबी कर्मचारी द्वारा अपने ही चर्च में चोरी की घटना को अन्तर्राष्ट्रीय रंग मिल जाता है... जब तक जाँच नहीं होती, तब तक सेकुलरिज़्म के पुरोधा बलात्कार को धर्म से जोड़कर हिन्दू धर्म (अर्थात प्रकारांतर से मोदी सरकार) पर लगातार हमले बोलते हैं, लेकिन जब जाँच के बाद यह पता चलता है कि पूरी घटना में किसी हिन्दू संगठन का हाथ नहीं था, बल्कि यह कोई अंदरूनी घटना थी या इसमें किसी मुस्लिम व्यक्ति का ही हाथ था, तो अचानक सभी बुद्धिजीवी चुप्पी साध लेते हैं. जब अधिक कुरेदा जाता है तो बड़े दार्शनिक अंदाज में कह दिया जाता है कि “अपराधी का कोई धर्म नहीं होता..”... यही असली पेंच है.

सेकुलर बुद्धिजीवियों द्वारा महाराष्ट्र और हरियाणा सरकारों द्वारा गौहत्या बंदी क़ानून तथा गौमांस पर प्रतिबन्ध के खिलाफ भी यही “बदनाम करो... पीड़ित दर्शाओ” का खेल खेला गया. भारत के तेजी से घटते गौवंश की सुरक्षा एवं हिंदुओं की पूज्य गौ की हत्या से उत्पन्न आक्रोश के कारण जब महाराष्ट्र की सरकार ने “बीफ” पर प्रतिबन्ध की घोषणा की, तो मानो तूफ़ान ही आ गया. सारे के सारे प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को अचानक गरीबों के प्रोटीन की चिंता सताने लगी... भोजन के अधिकार याद आने लगे... कुरैशी समुदाय के आर्थिक हितों के बारे में बौद्धिक विमर्श होने लगे. मजे की बात यह कि इस मामले में मुस्लिमों की तरफ से कोई धरना-प्रदर्शन आदि आयोजित नहीं हुआ, बल्कि उच्चवर्गीय कहे जाने वाले कथित हिन्दू सेलेब्रिटी ही आगे बढ़चढ़कर भाजपा सरकारों के खिलाफ धार्मिक भेदभाव के आरोप लगाने लगे. गिरीश कर्नाड जैसे कथित बुद्धिजीवी ने तो सरेआम गौमांस खाकर सरकार के खिलाफ नाराजगी व्यक्त कर डाली, मानो वे बचपन से गौमांस खाकर ही बड़े हुए हों. वास्तव में इन बुद्धिजीवियों को गौमांस के प्रोटीन अथवा गरीबों की कतई चिंता नहीं है, इनका असली उद्देश्य था देश-विदेश में भाजपा सरकारों की छवि खराब करना, यह प्रचारित करना कि मोदी सरकार मुस्लिम एवं ईसाई विरोधी है... क्योंकि जहाँ एक तरफ मुस्लिम समुदाय बीफ कारोबार से गहरे जुड़ा हुआ है, वहीं केरल, तमिलनाडु, आंधप्रदेश, गोवा के ईसाई परिवारों में गौमांस उनके नियमित भोजन का हिस्सा है. भले ही वैज्ञानिक रूप से साबित हो चुका हो कि बीफ (गौमांस) का निर्माण करने में पानी की खपत सर्वाधिक होती है, भले ही यह साबित हो चुका हो कि बीफ के मुकाबले सोयाबीन में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है... फिर भी गौमांस पर प्रतिबन्ध के खिलाफ सर्वाधिक हल्ला मचाया गया क्योंकि इससे सेकुलरिज़्म के पुरोधाओं का अपने विदेशी आकाओं की निगाह में स्कोर बढ़ता है और फडनवीस और खट्टर सरकारों के खिलाफ हमला बोलने का मौका भी बार-बार मिलता रहता है. हालाँकि दोनों ही सरकारें फिलहाल इस निर्णय पर कायम हैं, इसलिए महाराष्ट्र के सीमावर्ती जिलों से गौवंश की तस्करी भी थमी है. कसाईयों ने धीरे-धीरे अपने लिए दुसरे काम खोजने शुरू कर दिए हैं और उधर सुदूर बांग्लादेश में गौमांस की कीमतें आसमान छूने लगी हैं क्योंकि अब पश्चिम बंगाल तक अवैध गौवंश पहुँच ही नहीं रहा... लेकिन भारत में सेक्यूलरिज्म के नाम पर इस प्रकार की नौटंकियाँ सतत जारी रहती हैं.

कहावत है कि धूर्त दावा करते हैं और मूर्ख उसे मान लेते हैं. भारत में ऐसा ही कुछ “सेक्यूलरिज्म” के नाम पर भी होता आया है. विश्व के अन्य देशों में सेक्यूलरिज्म का अर्थ है “धर्म को राजनीति से अलग रखना” और इस परिभाषा का उद्भव भी पश्चिम में ही हुआ. लेकिन जो मुस्लिम संगठन अरब देशों में सेक्यूलरिज़्म का “स” भी नहीं उच्चारते वे भारत में सेक्यूलरिज़्म की माला जपते हैं. यही हाल ईसाई संगठनों का है, पश्चिम में चर्च और वेटिकन प्रत्येक राजनैतिक मामले में अपनी पूरी दखल रखते हैं (यहाँ तक कि भारत में भी केरल, उड़ीसा में कई मामलों में चर्च ने खुद अपने “सेक्यूलर उम्मीदवार” तय किए हैं). लेकिन यही ईसाई संगठन भारत में सेक्यूलरिज्म के पुरोधा बने फिरते हैं. ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि भारत में सेक्यूलरिज़्म की अवधारणा “हिन्दू विरोधी विचारधारा” के रूप में है. हिन्दू धर्म, हिंदुत्व, हिन्दू परम्पराओं, हिन्दू विश्वासों-अंधविश्वासों के खिलाफ जो भी अधिकाधिक जोरशोर से चिल्लाएगा, उसे भारत में सेक्यूलर माना जाएगा... परन्तु यह नियम विश्व के इस्लामी-ईसाई देशों में लागू नहीं होता. ज़ाहिर है कि कोई भी ईसाई अथवा मुस्लिम कभी सेक्यूलर हो ही नहीं सकता. इसलिए जब हम सेक्यूलर शब्द का उच्चारण करते हैं तो वह वास्तव में जन्मना हिन्दू के लिए ही होता है जिसके मन में भारतीय परम्पराओं एवं हिन्दू धर्म के प्रति संशय की भावना बलवती है.

इस नकली सेक्यूलरिज़्म का ही दबाव है कि जब मिशनरी संस्थाएँ बाकायदा सुसंगठित अभियान के तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भाजपा सरकारों को बदनाम करती हैं, चर्चों पर “कथित हमलों” अथवा “नन के साथ बलात्कार” अथवा “ग्राहम स्टेंस की हत्या” के खिलाफ हाहाकाल मचाती हैं तो सरकार मजबूती से कभी यह नहीं पूछती कि इन तमाम हमलों में कोई वैचारिक कोण नहीं है, ये सिर्फ चोरी-लूटपाट की सामान्य घटनाएँ हैं तो इन्हें धर्म से जोड़कर क्यों देखा जा रहा है? उलटे वह सार्वजनिक रूप से आश्वासन देती है कि “चर्च पर हुए हमलों” के प्रति सख्त दृष्टिकोण अपनाएगी... ऐसा करके भाजपा खुद अपने ही शत्रुओं के जाल में फँस जाती है. यही दब्बूपन कश्मीर मसले पर भी होता आया है. पाकिस्तान से जोर देकर पाक अधिकृत कश्मीर खाली करने को कहना हो, अथवा पाक अधिकृत कश्मीर का कुछ हिस्सा चीन को सौंपने के के विरोध में दबाव बनाना हो अथवा बलूचिस्तान में आत्मनिर्णय की माँग को हवा देना हो... भारत की सरकारें दब्बूपन की शिकार रही हैं.


सेक्यूलरिज़्म के नाम पर चल रहे इसी अन्तर्राष्ट्रीय “गेम” का एक हिस्सा है स्मृति ईरानी पर लगातार हमले तथा दीनानाथ बत्रा का कड़ा विरोध. स्मृति ईरानी के मानव संसाधन मंत्रालय संभालने के पहले दिन से ही वे कथित बुद्धिजीवियों की आँखों का काँटा बनी हुई हैं. स्मृति ईरानी को लेकर सतत मीडिया में विवाद पैदा किए जाते रहे हैं, चाहे वह उनके ज्योतिषी को हाथ दिखाने वाला मामला हो अथवा गोवा के स्टोर में छिपा हुआ कैमरा पकड़ने का मामला हो अथवा विश्वविद्यालयों की नियुक्तियों तथा भारतीय इतिहास संकलन एवं अन्य संस्थानों में नियुक्ति का विवाद हो... बारम्बार स्मृति ईरानी को निशाना बनाया जाता रहा है. ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि अब इन कथित सेक्यूलर बुद्धिजीवियों को लग रहा है कि अगले पाँच वर्ष में कुछ ऐसा बदलाव आ सकता है जो इनके पिछले साठ वर्षों के झूठ, दुष्प्रचार और इतिहास को विकृत करने के षड्यंत्र की पोल खोलकर रख देगा. एक बार भारतीय जनमानस को उसके वैभवशाली इतिहास एवं संस्कृति की जानकारी हो गई तो वह हनुमान की तरह उठ खड़ा होगा. यही बात प्रगतिशील बुद्धिजीवी नहीं चाहते. सेक्यूलरिज़्म के नाम पर अभी तक अकबर को महान और राणा प्रताप को भगोड़ा कहा जाता रहा है, तात्या टोपे अथवा चाफेकर जैसे वीरों की तो बात ही छोडिये, छत्रपति शिवाजी महाराज को भी जानबूझकर पुस्तकों में वह स्थान नहीं दिया गया, स्वतन्त्र भारत में जिसके वे हकदार हैं. यह पराजित मानसिकता और गुलामगिरी के पाठ्यक्रमों को बदलने की कवायद शुरू करने के कारण ही स्मृति ईरानी और दीनानाथ बत्रा दोनों ही वामपंथी बुद्धिजीवियों के निशाने पर रहे हैं.

अंग्रेज लेखिका वेन्डी डोनिगर द्वारा हिन्दू धर्म की दुराग्रही आलोचना हो, बीबीसी की संवाददाता लेस्ली उडविन द्वारा निर्भया के बलात्कारी मुकेश सिंह का चेहरा-नाम सार्वजनिक किया जाना, लेकिन चालबाजी के साथ “कथित” नाबालिग, लेकिन दुर्दांत आरोपी मोहम्मद अफरोज का नाम और उसके परिवार की पहचान छिपाते हुए पूरी डाक्यूमेंट्री का प्रदर्शन कुछ इस प्रकार करना कि सभी भारतीय मर्द बलात्कारी दिखाई दें... फिर चर्चों पर “कथित हमले” या नन के साथ कथित बलात्कार की मीडियाई चीख-पुकार हों... देखने में भले ही यह सब कड़ियाँ अलग-अलग दिखाई दे रही हों, परन्तु वास्तव में यह सब एक ही छतरी के नीचे से संचालित हो रही हैं. सनद रहे कि मैंने “कथित हमले” शब्द का उपयोग इसलिए किया क्योंकि ना तो इन हमलों(?) में कोई घायल हुआ, ना ही इन हमलों(?) में चर्च का कोई कर्मचारी अथवा पादरी मारा गया, मीडिया द्वारा बहुप्रचारित धार्मिक रंग देने के इन प्रयासों में किसी किसी हिन्दू संगठन द्वारा किसी बिशप पर कोई प्राणघातक हमला नहीं हुआ... जबकि उधर केन्या में एक मुस्लिम आतंकवादी संगठन ने एक कॉलेज में बाकायदा धर्म पूछ-पूछकर सौ से अधिक ईसाई युवकों को गोलियों से भून दिया, परन्तु वेटिकन को उस तरफ झाँकने की भी फुर्सत नहीं मिली. ज़ाहिर है कि जिससे “माल” मिल रहा है और जहाँ “माल” कमाया जा रहा है, उसी के अनुसार ख़बरें बनाई, गढी और प्लांट की जाएँगी.

जिस समय नरेंद्र मोदी सरकार ने कश्मीर में PDP के साथ मिलकर सरकार बनाने का फैसला किया था, वह बहुत सोच-समझकर ली गई “कैलकुलेटेड रिस्क” थी. सरकार बनने के पहले दिन से ही मोदी विरोधी प्रोपोगेंडा चलाने वालों ने मुफ्ती-मोदी के इस मिलन की खिल्ली उड़ाना शुरू कर दी थी. यह एक स्वाभाविक सी बात थी, क्योंकि घाटी में पहली बार कोई ऐसी सरकार बनी है, जिसमें भाजपा-संघ की सीधी हिस्सेदारी है. भला यह बात दिल्ली में बैठे बुद्धिजीवियों को कैसे हजम होती? जिसे अंग्रेजी में “टीथिंग पेन्स” (बच्चों को दाँत निकलने वाला दर्द) कहते हैं, फिलहाल वैसा ही वैसा ही कश्मीर की सरकार के साथ भी हो रहा है और यह प्रत्येक सरकार के साथ होता है. पिछली दो अब्दुल्ला-काँग्रेस सरकारों ने मसर्रत आलम के खिलाफ कभी कोई मजबूत केस नहीं बनाया. ज़ाहिर है कि कोर्ट के आदेशों के बाद उसे छोड़ना पड़ा. मसर्रत की रिहाई मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार करने वालों के लिए अंधे के हाथ बटेर जैसी लगी. तमाम चैनलों-अखबारों में मोदी-मुफ्ती सरकार के इस निर्णय की छीछालेदार हुई, आलोचनाएं की गईं, लेकिन किसी भी बुद्धिजीवी ने यह नहीं पूछा कि पिछली सरकारों ने मसर्रत के खिलाफ कमज़ोर धाराएं क्यों लगाईं कि वह न्यायालय द्वारा बरी कर दिया जाए? और फिर जैसा कि होना था, वही हुआ. मसर्रत ने जेल से रिहा होते ही अपने रंग दिखाने शुरू किए. मोदी-मुफ्ती सरकार भी उसे ढील देती रही, झाँसा देती रही कि उस पर कोई कार्रवाई नहीं होगी, उसे गलतियाँ करने के लिए पूरा मौका दिया गया. इससे मसर्रत _अति-आत्मविश्वास” और “अति-उत्साह” में आ गया तथा उसने एक रैली में न सिर्फ भारत विरोधी नारे लगाए, बल्कि पाकिस्तान के झण्डे भी लहराए... एक बार पुनः मोदी विरोधियों को “कोहराम” मचाने का मौका मिल गया. मसर्रत को गिरफ्तार करो, गिरफ्तार करो की चीख-पुकार होने लगी. मोदी-मुफ्ती सरकार इसी मौके की तलाश में थी, उसने मसर्रत को गिरफ्तार कर लिया. अब दिल्ली के बुद्धिजीवियों में चारों तरफ सन्नाटा है, उन्हें समझ नहीं आ रहा कि जब खुद ही गिरफ्तारी की माँग की थी तो अब विरोध कैसे करें? फिर सदाबहार दिग्गी राजा सामने आए और सरकार से पूछा कि “मसर्रत साहब”(?) को किन धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया है? यदि उस समय रिहा होते ही मसर्रत को गिरफ्तार कर लेते तो उसे सहानुभूति भी मिल सकती थी, ज़ाहिर है कि अब मसर्रत को लंबे समय तक जेल में रखने की पूरी व्यवस्था की जाएगी. बहरहाल, अब जम्मू-कश्मीर में भाजपा की टांग प्रत्येक निर्णय में फँसी हुई है, जो सेकुलरों को रास नहीं आ रहा. कश्मीरी पंडितों के मामले पर भी गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है, इसीलिए यासीन मालिक और अग्निवेश जैसे लोग बेचैन हैं. पाखण्ड की इन्तहा यह है कि जिन लोगों ने इस्लाम के नाम पर पंडितों को वहाँ से बेदखल किया, हत्याओं की अगुआई की अब वही लोग पंडितों की अलग कालोनी बसाने का विरोध कर रहे हैं, भाई-चारे के झूठे नारे लगा रहे हैं... क्या यह “अच्छे दिन” नहीं हैं? परन्तु मोदी सरकार विरोधी दुष्प्रचारियों की “Paid” सेना को यह मंजूर नहीं, अब कुछ दिनों बाद वह कोई नया मुद्दा खोजेंगे.

उधर उत्तरप्रदेश और बिहार में भी “राजनैतिक तंदूर” गरम होना शुरू हो गया है, इसीलिए आज़म खान की सेकुलर कारगुजारियों की भी शुरुआत हो चुकी है. इसके अलावा नए-नए समधी बने मुलायम-लालू की जोड़ी ने समूचे जनता परिवार को हाईजैक करके खुद का कब्ज़ा लगभग स्थापित कर लिया है. समाजवादियों के इस झगड़ालू और “पीठ में खंजर घोंपने की प्रवृत्ति” से भरपूर जमावड़े को समाजवादी जैसा कुछ नाम भी मिल गया है. इधर 59 दिन गुमनामी बाबा बने रहने के बाद अचानक “राजकुमार” की वापसी हुई है जिसे “दुष्प्रचारी बुद्धिजीवी गिरोह” ने बुद्ध की वापसी जैसी हास्यास्पद तुलना तक कर डाली है. साठ वर्ष तक सत्ता में रहने और जमाई राजा द्वारा DLF के साथ मिलकर जमीन हड़पने वाले फाईव स्टार किसानों की पार्टी काँग्रेस को अब अचानक किसानों की चिंता सताने लगी है. चूँकि भूमि अधिग्रहण बिल के मुद्दे पर मोदी सरकार राज्यसभा में अल्पमत में घिरी हुई है इसलिए फिलहाल वह फूँक-फूँककर कदम रख रही है, और विरोधी इसे कमज़ोरी और हार कहकर खुश हो रहे हैं. ज़ाहिर है कि मोदी की सफल विदेश यात्राओं तथा घरेलू विकास के मुद्दों पर बढ़ती लोकप्रियता के बीच भूमि अधिग्रहण का यही एक मुद्दा रह गया है जो यूपी-बिहार में काँग्रेस और क्षेत्रीय दलों की खोई हुई जमीन वापस लौटा सकता है. मीडिया, मिशनरी और NGOs “गिरोह” की मिलीभगत से किसानों के फायदे वाले इस क़ानून को लेकर जमकर झूठ बोला जा रहा है. जब नितिन गड़करी ने सोनिया गाँधी को भूमि अधिग्रहण बिल पर सार्वजनिक बहस की चुनौती दी तो दुष्प्रचारी गिरोह ने उसे नज़रअंदाज कर दिया, लेकिन जैसे ही बैंकाक से “आत्मचिंतन”(??) करके लौटे बाबा ने संसद में अपना (दस साल में शायद दूसरा या तीसरा) भाषण दिया तो सभी “दरबारी”, जय हो महाराज, जय हो महाराज करने लगे. कुल मिलाकर बात यह है कि अभी मोदी सरकार को एक वर्ष भी नहीं हुआ है, लेकिन विभिन्न गुटों में बेचैनी बढ़ती जा रही है. मोदी सरकार सुभाषचंद्र बोस के रहस्यों को उजागर करने जैसे कई महत्त्वपूर्ण “राजनैतिक” मुद्दों पर चुपचाप काम कर रही है और इसके नतीजे जल्दी ही देखने को मिलेंगे. 


हाल ही में गुजरात सरकार ने फोर्ड फाउन्डेशन और तीस्ता सीतलवाड की मिलीभगत एवं झूठ व दुष्प्रचार फैलाने के मामले में आधिकारिक रूप से फोर्ड फाउन्डेशन से जवाब-तलब किया है. जबकि इधर केन्द्र सरकार ने “ग्रीनपीस” नामक जाने-माने अन्तर्राष्ट्रीय NGO के हिसाब-किताब की जाँच हेतु कार्रवाई आरम्भ की है. ज़ाहिर है कि सेकुलर-प्रगतिशील खेमे में खलबली है, क्योंकि इन दोनों ही परजीवियों का पेट NGOs को मिले चन्दे से ही चलता है. हाल ही में एक शोध किया गया जिसमें UPA-2 सरकार के कार्यकाल के दौरान भारत सरकार के FCRA (विदेशी मुद्रा विनियमन क़ानून) के माध्यम से विदेशी धन प्राप्त करने वाली संस्थाओं की जानकारी निकाली गई. समूचे भारत में सिर्फ बाईस हजार संस्थाओं ने FC-6 फॉर्म के माध्यम से संस्था को मिली रकम का ब्यौरा दिया है. जबकि इनके अलावा कम से कम दो लाख संस्थाएँ और भी ऐसी हैं जिन्होंने अपनी संस्था का पंजीकरण “समाजसेवा” के नाम पर करवा रखा है और इसमें धार्मिक कोण को गायब कर दिया है. यदि हम इन सिर्फ बाईस हजार संस्थाओं के आँकड़े भी ध्यान से देखें तो पाते हैं कि 5200 संस्थाएँ ऐसी हैं जिन्होंने घोषित रूप से अपने कॉलम में “ईसाई धर्म प्रचार” लिखा हुआ है, अर्थात विदेशी मुद्रा प्राप्त करने वाली कुल संस्थाओं में से कुल लगभग बीस-बाईस प्रतिशत सिर्फ “ईसाई” संस्थाएँ हैं. ऐसा क्यों है? क्या भारत में ईसाई धर्म प्रचार करने का मार्केट इतना जबरदस्त है? सिर्फ दिल्ली में लगभग 200 संस्थाएं हैं जिन्हें लगभग छः सौ करोड़ रूपए से अधिक का विदेशी “दान”(??) प्राप्त हुआ है. सवाल उठता है कि क्या वास्तव में इतना सारा धन सिर्फ धर्म प्रचार में लगता है? सामान्य समझ का कोई भी व्यक्ति कह देगा कि नहीं, यह पैसा निश्चित रूप से विभिन्न चैनलों के माध्यम से शहरी मीडिया एवं प्रचार संस्थानों, ग्रामीण क्षेत्रों में दुष्प्रचार फैलाने तथा स्कूलों-अस्पतालों की आड़ में अपना उल्लू सीधा करने में काम आता है. यह इसी बात से सिद्ध होता है कि जैसे ही फोर्ड फाउन्डेशन से सरकार ने जवाबतलबी की, तो यहाँ भारत में कई कथित पत्रकारों के पेट में मरोड़ उठने लगे. कोर्ट के निर्देशों के अनुसार फोर्ड फाउन्डेशन अथवा गुजरात दंगों के समय सुप्रीम कोर्ट में लगातार झूठ बोलने वाली तथा दंगापीड़ितों का पैसा खा जाने वाली तीस्ता सीतलवाड के बैंक खातों और लेन-देन की जाँच से भला किसी को क्या तकलीफ हो सकती है? इसी प्रकार जब “ग्रीन-पीस” नामक भारी-भरकम NGO से जवाब माँगे गए, तब भी एक पत्रकारों की विशिष्ट लॉबी ने यह दुष्प्रचार किया कि सरकार बदले की कार्रवाई कर रही है. फोर्ड फाउन्डेशन ने सन 2006 में 104 संस्थाओं को 41 करोड़ रूपए, 2007 में 128 संस्थाओं को 75 करोड़ रूपए गरीबी मिटाने के नाम पर “दान”(?) दिए... इस प्रकार UPA-2 के शासनकाल में 2006-2012 के छः वर्षों में फोर्ड फाउन्डेशन ने लगभग पाँच सौ करोड़ रूपए भारत की सैकड़ों समाजसेवी संस्थाओं को चन्दा दिया. सवाल घूम-फिरकर वही आता है कि क्या वाकई उक्त संस्थाएँ समाजसेवा कर रही हैं? क्या फोर्ड फाउन्डेशन इतना बड़ा समाजसेवी है कि वह अपने दिए हुए धन का उपयोग, सदुपयोग, दुरुपयोग आदि के बारे में पूछताछ नहीं करता? यदि नहीं करता, तो भारत के नियम-कानूनों के अनुसार इस विशाल फंडिंग की जाँच की शुरुआत करते ही भारत सरकार के खिलाफ अचानक यह दुष्प्रचार क्यों आरम्भ हो जाता है? और बुद्धिजीवियों से असली सवाल यह है कि अपने देश की सरकार पर भरोसा करने की बजाय, विदेशी संस्थाओं से यह कैसा प्रेम और गठबंधन है?

प्रधानमंत्री सड़कों की बात करते हैं तो “कथित रूप से दस लाख के सूट” का झूठा मुद्दा उछल जाता है, प्रधानमंत्री बिजली उत्पादन और परमाणु समझौतों की बात करते हैं तो अचानक किसी नामालूम सी साध्वी के किसी दूरदराज इलाके में दिए गए बयानों को हेडलाईन बनाकर चार दिनों तक चबाया जाता है... मानव संसाधन मंत्री शिक्षा और पाठ्यक्रम में सुधार की बात करें तो उन्हें संसद में ही अपमानित कर दिया जाए... जनरल वीके सिंह हिम्मत दिखाकर युद्धग्रस्त यमन से पाँच हजार भारतीयों को निकाल लाएँ तो उनकी तारीफ़ करना तो दूर उनकी पाकिस्तानी दूतावास संबंधी ट्वीट को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाया जाता है. अब समय आ गया है कि सरकार NGOs, मिशनरी संस्थाओं, मीडिया में घुसे बैठे चंद स्वार्थी तत्त्वों और शैक्षणिक संस्थाओं में पनाह लिए हुए बुद्धिजीवियों के इस नापाक गठबंधन के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई करे.

Sunday, April 26, 2015

What is the Mystery of Oregon Sriyantra

अमेरिका के ओरेगॉन का रहस्यमयी श्रीयंत्र


इडाहो एयर नेशनल गार्ड का पायलट बिल मिलर 10 अगस्त 1990 को अपनी नियमित प्रशिक्षण उड़ान पर था. अचानक उसने ओरेगॉन प्रांत की एक सूखी हुई झील की रेत पर कोई विचित्र आकृति देखी. यह आकृति लगभग चौथाई मील लंबी-चौड़ी और सतह में लगभग तीन इंच गहरे धंसी हुई थी. बिल मिलर चौंका, क्योंकि लगभग तीस मिनट पहले ही उसने इस मार्ग से उड़ान भरी थी तब उसे ऐसी कोई आकृति नहीं दिखाई दी थी. उसके अलावा कई अन्य पायलट भी इसी मार्ग से लगातार उड़ान भरते थे, उन्होंने भी कभी इस विशाल आकृति के निर्माण की प्रक्रिया अथवा इसे बनाने वालों को कभी नहीं देखा था. आकृति का आकार इतना बड़ा था, कि ऐसा संभव ही नहीं कि पायलटों की निगाह से चूक जाए.

 


(9000 फुट की ऊँचाई से दिखाई देती है ऐसी आकृति) 

सेना में लेफ्टिनेंट पद पर कार्यरत बिल मिलर ने तत्काल इसकी रिपोर्ट अपने उच्चाधिकारियों को दी, कि ओरेगॉन प्रांत की सिटी ऑफ बर्न्स से सत्तर मील दूर सूखी हुई झील की चट्टानों पर कोई रहस्यमयी आकृति दिखाई दे रही है. मिलर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि यह आकृति अपने आकार और लकीरों की बनावट से किसी मशीन की आकृति प्रतीत होती है. इस खबर को लगभग तीस दिनों तक आम जनता से छिपाकर रखा गया, कि कहीं उस स्थान पर भीडभाड ना हो जाए. लेकिन फिर भी 12 सितम्बर 1990 को प्रेस को इसके बारे में पता चल ही गया. सबसे पहले बोईस टीवी स्टेशन ने इसकी ब्रेकिंग न्यूज़ दर्शकों को दी. जैसे ही लोगों ने उस आकृति को देखा तो तत्काल ही समझ गए कि यह हिन्दू धर्म का पवित्र चिन्ह “श्रीयंत्र” है. परन्तु किसी के पास इस बात का जवाब नहीं था कि हिन्दू आध्यात्मिक यन्त्र की विशाल आकृति ओरेगॉन के उस वीरान स्थल पर कैसे और क्यों आई? 

(श्रीयंत्र आकृति की एकदम सटीक लोकेशन इस प्रकार है) 

14 सितम्बर को अमेरिका असोसिएटेड प्रेस तथा ओरेगॉन की बैण्ड बुलेटिन ने भी प्रमुखता से दिखाया और इस पर चर्चाएं होने लगीं. समाचार पत्रों ने शहर के विख्यात वास्तुविदों एवं इंजीनियरों से संपर्क किया तो उन्होंने भी इस आकृति पर जबरदस्त आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि इतनी बड़ी आकृति को बनाने के लिए यदि जमीन का सिर्फ सर्वे भर किया जाए तब भी कम से कम एक लाख डॉलर का खर्च आएगा. श्रीयंत्र की बेहद जटिल संरचना और उसकी कठिन डिजाइन को देखते हुए जब इसे सादे कागज़ पर बनाना ही मुश्किल होता है तो सूखी झील में आधे मील की लम्बाई-चौड़ाई में जमीन पर इस डिजाइन को बनाना तो बेहद ही मुश्किल और लंबा काम है, यह विशाल आकृति रातोंरात नहीं बनाई जा सकती. इस व्यावहारिक निष्कर्ष से अंदाजा लगाया गया कि निश्चित ही यह मनुष्य की कृति नहीं है.

तमाम माथापच्ची के बाद यह निष्कर्ष इसलिए भी निकाला गया, क्योंकि जितनी विशाल यह आकृति थी, और इसकी रचना एवं निश्चित पंक्तियों की लम्बाई-चौड़ाई को देखते हुए इसे जमीन पर खड़े रहकर बनाना संभव ही नहीं था. बल्कि यह आकृति को जमीन पर खड़े होकर पूरी देखी भी नहीं जा सकती थी, इसे पूरा देखने के लिए सैकड़ों फुट की ऊँचाई चाहिए थी. अंततः तमाम विद्वान, प्रोफ़ेसर, आस्तिक-नास्तिक, अन्य धर्मों के प्रतिनिधि इस बात पर सहमत हुए कि निश्चित ही यह आकृति किसी रहस्यमयी घटना का नतीजा है. फिर भी वैज्ञानिकों की शंका दूर नहीं हुई तो UFO पर रिसर्च करने वाले दो वैज्ञानिक डोन न्यूमन और एलेन डेकर ने 15 सितम्बर को इस आकृति वाले स्थान का दौरा किया और अपनी रिपोर्ट में लिखा कि इस आकृति के आसपास उन्हें किसी मशीन अथवा टायरों के निशान आदि दिखाई नहीं दिए, बल्कि उनकी खुद की बड़ी स्टेशन वैगन के पहियों के निशान उन चट्टानों और रेत पर तुरंत आ गए थे.

ओरेगॉन विश्वविद्यालय के डॉक्टर जेम्स देदरोफ़ ने इस अदभुत घटना पर UFO तथा परावैज्ञानिक शक्तियों से सम्बन्धित एक रिसर्च पेपर भी लिखा जो “ए सिम्बल ऑन द ओरेगॉन डेज़र्ट” के नाम से 1991 में प्रकाशित हुआ. अपने रिसर्च पेपर में वे लिखते हैं कि अमेरिकी सरकार अंत तक अपने नागरिकों को इस दैवीय घटना के बारे कोई ठोस जानकारी नहीं दे सकी, क्योंकि किसी को नहीं पता था कि श्रीयंत्र की वह विशाल आकृति वहाँ बनी कैसे? कई नास्तिकतावादी इस कहानी को झूठा और श्रीयंत्र की आकृति को मानव द्वारा बनाया हुआ सिद्ध करने की कोशिश करने वहाँ जुटे. लेकिन अपने तमाम संसाधनों, ट्रैक्टर, हल, रस्सी, मीटर, नापने के लिए बड़े-बड़े स्केल आदि के बावजूद उस श्रीयंत्र की आकृति से आधी आकृति भी ठीक से और सीधी नहीं बना सके. 


आज भी वह आकृति रहस्य ही बनी हुई है... वैज्ञानिक उस पर अपनी रिसर्च जारी रखे हुए हैं.

Sunday, April 19, 2015

What is Rest in Peace (RIP)

ये "रिप-रिप-रिप-रिप" क्या है? 


आजकल देखने में आया है कि किसी मृतात्मा के प्रति RIP लिखने का "फैशन" चल पड़ा है. ऐसा इसलिए हुआ है, क्योंकि कान्वेंटी दुष्प्रचार तथा विदेशियों की नकल के कारण हमारे युवाओं को धर्म की मूल अवधारणाएँ, या तो पता ही नहीं हैं, अथवा विकृत हो चुकी हैं...

RIP शब्द का अर्थ होता है "Rest in Peace" (शान्ति से आराम करो). यह शब्द उनके लिए उपयोग किया जाता है जिन्हें कब्र में दफनाया गया हो. क्योंकि ईसाई अथवा मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार जब कभी "जजमेंट डे" अथवा "क़यामत का दिन" आएगा, उस दिन कब्र में पड़े ये सभी मुर्दे पुनर्जीवित हो जाएँगे... अतः उनके लिए कहा गया है, कि उस क़यामत के दिन के इंतज़ार में "शान्ति से आराम करो".


लेकिन हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है. हिन्दू शरीर को जला दिया जाता है, अतः उसके "Rest in Peace" का सवाल ही नहीं उठता. हिन्दू धर्म के अनुसार मनुष्य की मृत्यु होते ही आत्मा निकलकर किसी दूसरे नए जीव/काया/शरीर/नवजात में प्रवेश कर जाती है... उस आत्मा को अगली यात्रा हेतु गति प्रदान करने के लिए ही श्राद्धकर्म की परंपरा निर्वहन एवं शान्तिपाठ आयोजित किए जाते हैं. अतः किसी हिन्दू मृतात्मा हेतु "विनम्र श्रद्धांजलि", "श्रद्धांजलि", "आत्मा को सदगति प्रदान करें" जैसे वाक्य विन्यास लिखे जाने चाहिए. जबकि किसी मुस्लिम अथवा ईसाई मित्र के परिजनों की मृत्यु पर उनके लिए RIP लिखा जा सकता है...

होता यह है कि श्रद्धांजलि देते समय भी "शॉर्टकट(?) अपनाने की आदत से हममें से कई मित्र हिन्दू मृत्यु पर भी "RIP" ठोंक आते हैं... यह विशुद्ध "अज्ञान और जल्दबाजी" है, इसके अलावा कुछ नहीं... अतः कोशिश करें कि भविष्य में यह गलती ना हो एवं हम लोग "दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि" प्रदान करें... ना कि उसे RIP (apart) करें. मूल बात यह है कि चूँकि अंग्रेजी शब्द SOUL का हिन्दी अनुवाद "आत्मा" नहीं हो सकता, इसलिए स्वाभाविक रूप से "RIP और श्रद्धांजलि" दोनों का अर्थ भी पूर्णरूप से भिन्न है.


धार्मिक अज्ञान एवं संस्कार-परम्पराओं के प्रति उपेक्षा की यही पराकाष्ठा, अक्सर हमें ईद अथवा क्रिसमस पर देखने को मिलती है, जब अपने किसी ईसाई मित्र अथवा मुस्लिम मित्र को बधाईयाँ एवं शुभकामनाएँ देना तो तार्किक एवं व्यावहारिक रूप से समझ में आता है, लेकिन "दो हिन्दू मित्र" आपस में एक-दूसरे को ईद की शुभकामनाएँ अथवा "दो हिन्दू मित्रानियाँ" आपस में क्रिसमस केक बाँटती फिरती रहें... अथवा क्रिसमस ट्री सजाने एक-दूसरे के घर जाएँ, तो समझिए कि निश्चित ही कोई गंभीर "बौद्धिक-सांस्कारिक गडबड़ी" है...

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"हिन्दू श्मशान एवं शवयात्रा" पर बहुत समय पहले तीन भागों में लेख लिखे थे... यदि वाकई समझना चाहते हों तो इन लेखों को भी पढ़ें...

http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/05/less-wood-hindu-cremation-environment.html

http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/05/less-wood-hindu-cremation-environment_06.html

http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/05/less-wood-hindu-cremation-environment_07.html


Wednesday, April 1, 2015

Bharti Singh - The Chinese Bamboo

बच्चे नहीं, बल्कि प्रतिभा परीक्षण का हमारा "सिस्टम" खराब है... 

(प्रस्तुत पोस्ट भाई Ajit Singh - https://www.facebook.com/SinghCorpt की फेसबुक वाल से साभार ली गई है. अजीत सिंह एक मस्तमौला लेखक हैं जो दिल से लिखते हैं तथा अपनी लेखनी में हिन्दी शब्दों की शुद्धता अथवा व्याकरण आदि की कतई परवाह नहीं करते. अजीत सिंह, माहपुर में "मुसहर" बच्चों के लिए अपने NGO "उदयन" के तहत एक स्कूल भी चलाते हैं... मैं अजीत सिंह जी की इस पोस्ट को बिना किसी सुधार के जस का तस रहने देना चाहता हूँ, ताकि अन्य पाठक भी देखें-समझे-जानें कि लिखने के लिए भाषा की नहीं "दिल" की जरूरत होती है, हिन्दी-अंग्रेजी की खिचड़ी, देशज शब्दों के उपयोग के सहारे भी कोई शानदार लेख लिख सकता है, उसके लिए किसी को लेखक होना जरूरी नहीं है, बस आँखें-कान खुले हों और मन में तड़प हो). 
पूरा पढ़िए और एक सच्चाई से रू-ब-रू होने का आनंद लीजिए... 


सावधान, आपके आसपास ज़मीन में चाईनीज बाँस गड़े हुए हैं. 
दोस्तों........अपने लेख कई बार मैं एक कहानी सुना के शुरू करता हूँ जो ज़्यादातर काल्पनिक होती है ....आज फिर एक कहानी सुना रहा हूँ ,,,,,पर ये काल्पनिक नहीं है. यह एक सच्ची घटना है .........काफी पुरानी बात है ...एक लड़की थी ........बचपन में एकदम सामान्य ........सामान्य से घर में जन्मी थी .अक्सर बीमार रहती थी .....बचपन में पैर जल गए ...महीनों बिस्तर में पड़ी रही ....dull सी personality थी ......स्कूल जाने लगी ......पढने में शुरू से ही dull थी ....बाकी activities में भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी .........सो ऐसे बच्चों को स्कूल में भी कोई विशेष प्रोत्साहन नहीं मिलता ..........वो अक्सर back benchers बन के रह जाते हैं ...स्कूल के गुमनाम चेहरे ........तो साहब उसके जीवन में शुरू से ही एक सिलसिला शुरू हो गया ....fail होने का ......हर टेस्ट में fail .....क्लास टेस्ट में ...fail ....unit टेस्ट में fail ....half yearly ....fail ...annual exam ...fail ....अब CBSE बोर्ड की कोई policy है शायद की पांचवीं तक किसी को fail नहीं करना है ...उसे अगली क्लास में promote कर देना है ...... सो वो fail होते होते 6th में पहुँच गयी ........अब साहब fail होना तो उसका जैसे trade mark हो गया था सो वो 6th में भी fail हो गयी ......

इस बीच ऐसा भी नहीं था की घर वालों ने कोई कोशिश नहीं की ...पर तमाम कोशिशों का कोई रिजल्ट नहीं निकला ....और ये भी नहीं की स्कूल वालों का कोई दुराग्रह था क्योंकि स्कूल तो उसका हर 2 या 3 साल में बदल जाता था ....खैर जब 6th में भी फेल हो गयी तो इस बार promotion नहीं हुआ ...उसी क्लास में रोक दी गयी ......घर वालों ने हाथ पाँव जोड़ के किसी तरह अगली क्लास में promote कराया .......और इसी तरह वो लुढ़कते पुढ़कते .......consistently and persistently ....हर एक टेस्ट में fail होती हुआती 10th में पहुँच गयी .......अब CBSE बोर्ड के exam में कौन सी सिफारिश चलनी थी सो वहां भी उसने असफलता का झंडा गाड़ दिया .....यानी 10th में भी फेल.......... 

अब आप ये बताइये की क्या किया जा सकता है ..........एक बच्चा जो लगातार 10 साल तक रोजाना fail हुआ उसका क्या किया जा सकता है .....कभी सोच के देखा है ????????? 10th fail लड़की का क्या future होता है ....आइये मैं बताता हूँ...
१) वो 11th में admission नहीं ले सकती .इसलिए BA का भी कोई चांस नहीं ......
२) वो सारी जिंदगी 10th fail कहलाएगी .
३) उसे कोई सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी .....चपरासी की भी नहीं .....अब तो फ़ौज में भी भर्ती नहीं हो सकती ...वहां भी 10th पास मांगते हैं .....
४) उसकी शादी किसी अच्छे, पढ़े लिखे well settled लड़के से नहीं होगी .... अजी 10th फ़ैल लड़की से कौन शादी करना चाहता है आजकल .....
५) कहने का मतलब उसका future ख़तम ......

आइये अब ये देखते हैं की ऐसे बच्चे ,जो की पढ़ाई में dull होते हैं उनके साथ क्या होता है समाज में ........रोज़ रोज़ का तिरस्कार .....teachers की रोज़ रोज़ की डांट फटकार ...कई बार तो मार पीट .....हर रोज़ हर subject में failure का ठप्पा ......ऊपर से घर में डांट .... उन्हें पूरी तरह नकारा ...निकम्मा ...कामचोर ....नालायक ....मान लिया जाता है ........सहपाठियों द्वारा तिरस्कार ,दुत्कार ....ऐसे बच्चों से अक्सर तेज़ तर्रार बच्चे कोई मेल मिलाप नहीं रखते .......और वो और ज्यादा dull होते चले जाते हैं .......उन्हें एक ऐसे सिस्टम ने failure ...नकारा घोषित किया है जो की एक फूल प्रूफ सिस्टम माना जाता है ........जो हर साल लाखों करोड़ों बच्चों का मूल्यांकन करता है ...सैकड़ों साल पुराना एक जांचा परखा सिस्टम है .......अब आप यूँ समझ लीजिये की जौहरियों की एक संस्था जो हर साल लाखों पत्थरों का मूल्यांकन करती है ,उसने एक पत्थर का 10 साल मूल्यांकन कर के उसे पत्थर घोषित कर दिया और बाकियों को हीरा तो ऐसी संस्था के ऊपर शक भी कैसे किया जा सकता है .......तो साहब अब आप कल्पना कीजिये की उस लड़की का क्या हुआ होगा .... ज्यादातर लोग यही कहेंगे की शादी कर के बच्चे पाल रही होगी ........ 

तो सुनिए साहब ....जिस दिन उस लड़की को certified नाकारा यानि failure ....... घोषित किया गया ,उसके ठीक 10 साल बाद वो लड़की राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में ....हिन्दुस्तान की नामचीन और महान हस्तियों की तालियों की गडगडाहट के बीच , अपने क्षेत्र में सर्वोत्कृष्ट सेवाओं और उपलब्धियों के लिए ...देश का सबसे बड़ा पुरस्कार ,खुद महामहिम राष्ट्रपति जी के हाथों से प्राप्त कर रही थी .......उस लड़की का नाम है भारती सिंह ......और उसे मैं इसलिए जानता हूँ क्योंकि वो मेरी सगी छोटी बहन है ..........और मैंने उसे प्रतिदिन ......असफलता से आगे निकल कर सफलता की बुलंदियों तक पहुँचते देखा है .......भारती ने 1996 में भारत का sports का सर्वोच्च पुरस्कार ..."अर्जुन पुरस्कार" प्राप्त किया और वो अपने करियर में विश्व के सबसे महान weightlifters में गिनी गयीं ...और उन्होंने world championship और Asian games में कई पदक जीते ......Olympics में उन दिनों Women Weightlifting नहीं थी ....नहीं तो वहां भी मेडल जीतती .उन्होंने हाल ही में CISF से ASSISTANT COMMANDANT के पद से Voluntary Retirement लिया है ...अगर वो अपनी पूरी नौकरी करती तो शायद DIG या IG बन के retire होतीं ......अब सोचने वाली बात ये है की आखिर गड़बड़ कहाँ हुई इस कहानी में ...और भारती सिंह की लाइफ में turning point कहाँ से आया . 


गौर से देखने पर पता लगता है की वो जीवन में कभी भी एक dull या failure बच्चा नहीं थी ...दरअसल हमारा सिस्टम उसको गलत पैमाने से नाप रहा था .........अब साहब अगर आपको Quadratic Equation ...और Trignometry नहीं आती तो आप fail .......अगर आप लिखने में Spelling Mistake करते हैं तो आप fail .....सूर्य ग्रहण कैसे लगता है ... ये आपने रटा नहीं है तो आप fail .......फिर आपमें चाहे जितनी भी प्रतिभा है ....चाहे आप किसी अन्य field में विश्व की महानतम हस्ती बनने की क्षमता रखते हों ..........पर चूंकि आपको quadratic equation नहीं आती इसलिए आप फेल ...और आपका future ख़तम .......हमारे education system ने तो आपको fail यानी नकारा घोषित कर दिया है .......अब आप ऐसा करो सब्जी की रेड़ी लगा लो सड़क पे.. 


(चित्र में बाँए से तीसरी भारती सिंह... अर्जुन सिंह एवं राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा के साथ)

कायदे से होना तो ये चाहिए कि सिस्टम उस बच्चे का मूल्यांकन करे और यह बताये की बेशक इस बच्चे को Trignometry नहीं आती ..और ये Shakespeare के नाटकों पर निबंध नहीं लिख सकता ...पर इसमें ... xyz field में अपार क्षमता है लिहाजा इसे 10th में पास किया जाता है और आगे पढने की इजाज़त दी जाती है ...इसे आगे इस इस field में पढाई करनी चाहिए ...... अब मुझे आप ये बताइये की भारती सिंह के केस में ...भारती सिंह fail हुई या भारती सिंह का मूल्यांकन करने में हमारा education system fail हुआ ..... दरअसल भारती सिंह तो एक विलक्षण प्रतिभा की धनी थीं ...पर उस प्रतिभा को पहचानने में हमारे अकादमिक महारथी और हमारा अकादमिक सिस्टम fail हो गए और खामखाह 10 साल तक उस बेचारी बच्ची को परेशान करते रहे ...उसे दुत्कारते रहे ..........अब ये तो उसकी हिम्मत थी की उसने हार नहीं मानी और तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी संघर्ष करती रही और एक दिन दुनिया के शीर्ष पर विराजमान हुई .......पर न जाने ऐसी कितनी भारती सिंह होंगी इस दुनिया में जिसे ये सिस्टम अपने पैरों तले कुचल देता है.

यहाँ एक बात मैं और साफ़ कर देना चाहता हूँ की अपने Professional Career में भारती ने सिर्फ sports में ही excell नहीं किया बल्कि हर field में टॉप किया ..........कॉलेज से BA किया 2nd division ...बढ़िया अंग्रेजी बोलती है .........फिर CISF में सब इंस्पेक्टर के पद पर ज्वाइन किया और promotion ले कर Assistant Commandant तक पहुंची .......300 से 500 मर्दों की कंपनी को सफलता पूर्वक कमांड किया .....लखनऊ .जोधपुर और दिल्ली के International Airports की security की incharge रही और इस दौरान लीडरशिप की मिसाल पेश की ....अपने करियर के दौरान उन्होंने कुछ ऐसे cases solve किये जहाँ उनकी intelligence को देख के उनके senior officers दंग रह गए, CISF की ट्रेनिंग की passing out parade में बेस्ट कैडेट घोषित हुई और परेड को command किया .......1 किलोमीटर लम्बे मैदान में हजारों Dignitries की भीड़ के सामने 1500 officers को command देना कोई हंसी खेल नहीं होता ....अच्छे अच्छों की टांगें कांपने लगती हैं ......जब वो retirement लेने लगी तो उनके एक senior ऑफिसर ने कहा था की आप गलती कर रही हैं ...अगर आप पूरी नौकरी करेंगी तो IG बन के retire होंगी .........विचारणीय विषय ये है की हमारे education system ने शुरू में ऐसी विलक्षण प्रतिभा को पहचानने में चूक कैसे कर दी ........क्या ये सिस्टम ऐसी ही हज़ारों लाखों प्रतिभाएं हर साल नष्ट कर रहा है ......मैं अक्सर ये प्रश्न अपने व्याख्यानों में उठता हूँ ........तो कुछ लोग इसका ये जवाब देते हैं की आप जिस सिस्टम की इतनी आलोचना कर रहे हैं वही सिस्टम विश्व स्तरीय प्रतिभाएं पैदा भी तो कर रहा है ....तो इसका जवाब ये है मेरे दोस्त ...की खराब से खराब सिस्टम भी कुछ results तो देता ही है ....100 किलो सरसों में 35 किलो तेल निकलना ही चाहिए ........अब अगर एक कोल्हू 20 किलो निकालता है तो आप उसे 20 किलो के लिए शाबाशी देंगे या उससे उस 15 किलो का हिसाब मांगेंगे जो waste हो गया.


यहाँ मैं ये बता दूं की इस success स्टोरी में उनके parents का क्या role रहा ....पहले तो उन्होंने उसे किसी तरह (व्याख्या करने की ज़रुरत नहीं है ) 10th पास कराया .अब चूंकि उसका maths और science से पिंड छूट गया इसलिए आगे पढ़ाई में कोई समस्या नहीं हुई .दुसरे जब उसे इतने सालों तक नाकारा घोषित किया जाता था तब उसके parents रोजाना ground में ये सिद्ध करते थे की देखो ...you are the best ...तुम तो यहाँ दौड़ में लड़कों को भी हरा देती हो ...you are the best ......तुम तो एक दिन world champion बनोगी ........और वो रोज़ इसी तरह जीतती रही ...रोज़ शाम को उसके लिए तालियाँ बजती थीं ......शाम को वो दिन भर का अपमान और तिरस्कार भूल जाती थी .........और इसी तरह धीरे धीरे ..एक दिन वो सचमुच world champion बन गयी ...... ज़रा कल्पना करें ...अगर उसके parents भी स्कूल वालों की तरह उसे नाकारा मान लेते तो ??

Moral of the Story

1 ) अगर आपका बच्चा आज पढने में कमजोर है तो ,निराश न हों .......वो कल का Thomas Alva Edison हो सकता है .

2 ) सब बच्चों को 9 नंबर का जूता पहना के मत दौड़ाओ ...........भाई मेरे सबके पाँव छोटे बड़े होते हैं .......आखिर एक ही question paper और एक ही syllabus से सारे देश के बच्चों का मूल्यांकन कैसे किया जा सकता है .......
3 ) 20 किस्म का बीज एक साथ खेत में डाल दोगे ...तो ध्यान रखो सबका जमाव एक साथ नहीं होगा .........मूंग तीसरे दिन जम जाएगी ,आम १५ दिन बाद निकलेगा ,सूरन ( जिमीकंद, yam ) दो महीने बाद जमेगा और chinese bamboo ...... 2 साल बाद निकलेगा ... इसलिए आपको कोई हक़ नहीं की आप उस बेचारे Chinese Bamboo को निकम्मा ,नाकारा या failure घोषित करें ......क्योकि आपको पता होना चाहिए की Chinese Bamboo बेशक शुरू में थोडा ज्यादा टाइम लेता है Germination में ,पर जिस दिन वो जमीन तोड़ के ऊपर आ जाता है तो सिर्फ 7 हफ्ते में 40 फुट लम्बा हो जाता है ........
सावधान : कृपया ध्यान दीजिये .....आपके इर्द गिर्द ज़मीन में ,आपके घर में , स्कूल में या समाज में .........कुछ Chinese Bamboo गड़े हो सकते हैं ....कृपया उन्हें अपने पैरों तले न कुचलें .......क्योंकि एक दिन वो जमीन तोड़ के बहार आने वाले हैं... 

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