Wednesday, March 25, 2015

How to Recognize Secular Vs Communal Rape

सेक्युलर बलात्कार बनाम साम्प्रदायिक बलात्कार

मित्रों भारत में आजकल रेप का फैशन चल रहा है. अखबार-चैनल-सोशल मीडिया सभी पर रेप छाया हुआ है. जिस दिन रेप की खबर नहीं होती, लगता है कि दिन सूना हो गया. इसलिए जब प्रगतिशील महिलाएँ बोर होने लगती हैं तब सात-आठ साल से लिव-इन में रखैल की तरह खुशी-खुशी रहने के बाद अचानक उन्हें याद आता है कि, अरे!! ये तो रेप हो गया. सो सेकुलर बौद्धिक तरक्की करते हुए आधुनिक भारत में ऐसी ख़बरें भी सुनाई दे जाती हैं. अब तो बुद्धिजीवियों के पसंदीदा चैनल BBC ने भी दुनिया को समझा दिया है कि भारत के सारे मर्द रेपिस्ट होते हैं. तालियाँ बजाते हुए सभी प्रगतिशीलों ने BBC की इस राय का समर्थन भी किया और मुकेश नामक हीरो की फिल्म भारत में दिखाने की पुरज़ोर माँग रखी. बहरहाल, वह झमेला अलग है, मैं तो आपको इस लेख में रेप के एक बिलकुल नए दृष्टिकोण के बारे में बताने जा रहा हूँ. वह है सेकुलर रेप और साम्प्रदायिक रेप... हैरान हो गए ना!!! जी हाँ... भारत में अधिकाँश रेप इन्हीं दो प्रकारों का होता है...

आईये हम समझते हैं कि सेकुलर रेपऔर साम्प्रदायिक रेप में क्या अंतर होता है... पहले इस ब्लॉक डायग्राम को ध्यान से देख लीजिए. यही सेकुलर रेप का पूरा सार है, जिसे मैं शुद्ध हिन्दी में आपको समझाने की कोशिश करूँगा.




चलिए शुरू करते हैं... - जब भी देश में कहीं बलात्कार होता है तो “आदर्श लिबरल” या कहें कि प्रगतिशील सेकुलर बुद्धिजीवी सबसे पहले यह देखता है कि बलात्कार भाजपा शासित राज्य में हुआ है या गैर-भाजपा सरकारों के राज्य में. यदि भाजपा शासित राज्यों में बलात्कार हुआ है तब तो प्रगतिशीलों की बाँछें खिल जाती हैं. क्योंकि इस “कम्युनल रेप” के द्वारा यह सिद्ध करने का मौका मिलता है कि भाजपा शासित राज्यों में क़ानून-व्यवस्था नहीं है, महिलाओं की हालत बहुत खराब है. यदि बलात्कार किसी सेकुलर राज्य में हुआ हो, तो यहाँ फिर इसके दो भाग होते हैं, पहले भाग में यह देखा जाता है कि रेप पीड़ित लड़की हिन्दू है या गैर-हिन्दू. यदि लड़की हिन्दू हुई और आरोपी कोई सेकुलर किस्म का शांतिदूत हुआ तो मामला खत्म, कोई प्रगतिशील अथवा महिला संगठन उसके पक्ष में आवाज़ नहीं उठाएगा, यह होता है “सेकुलर रेप”. यदि वह लड़की गैर हिन्दू हुई तो यह देखा जाता है कि वह दलित है या अल्पसंख्यक और आरोपित कौन है. यदि आरोपी पुनः सेकुलर व्यक्ति निकला तो भूल जाईये कि कोई रेप हुआ था. लेकिन यदि रेपिस्ट कोई हिन्दू हुआ, तो ना सिर्फ उसका नाम जोर-जोर से चैनलों पर लिया जाएगा, बल्कि यह सिद्ध करने की पूरी कोशिश होगी कि किस तरह हिन्दू संस्कृति में बलात्कार जायज़ होता था, हिन्दू मर्द स्वभावगत बलात्कारी होते हैं आदि. 

यदि बलात्कार गैर-भाजपा शासित राज्य में हुआ है और आरोपी सेकुलर अथवा मुस्लिम है, तो लड़की पर ही आरोप मढ़ा जाएगा और उसे बदचलन साबित करने की कोशिश होगी, और यदि बलात्कार करने वाला हिन्दू है तो गरियाने के लिए भारतीय संस्कृति तो है ही. इसी प्रकार यदि बलात्कार भाजपा शासित राज्य में हुआ हो, आरोपी भी हिन्दू हो तो समूची भारतीय संस्कृति को बदकार साबित करना होता है, उस घटना को अल्पसंख्यकों पर भारी अत्याचार कहकर चित्रित किया जाता है तथा तमाम चैनलों पर कम से कम दस दिन बहस चलाई जाती है, यह होता है “कम्युनल रेप”. कहते हैं कि औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन होती है, यही स्थिति सेकुलर-कम्युनल बलात्कार के बारे में भी है. सवाल उठता है कि बलात्कार जैसे घृणित अपराध को धार्मिक रंग और राजनैतिक ट्विस्ट कैसे दिया जाता है, और यह मानसिकता शुरू कैसे होती है. यह इन दो प्रगतिशील महिलाओं के ट्वीट्स पढ़कर समझ में आ जाता है. 

पहला ट्वीट है आदर्श लिबरल (Adarsh Liberal) प्रगतिशील मालिनी पार्थसारथी का, जिसमें हिन्दू महिलाओं की मंगलसूत्र परम्परा को वे पाखण्ड और पुरुष सत्तात्मक प्रतीकात्मकता बताती हैं... जबकि दूसरे ट्वीट में मुस्लिम महिलाओं के बुर्के को वे हिन्दू पुरुषों के डर से अपनाई गई "परंपरा" बता रही हैं. 



दूसरा ट्वीट भी एक और प्रगतिशील महिला कविता कृष्णन जी का है. बेहद आधुनिक विचारों वाली महिला हैं, बहुत सारे NGOs चलाती हैं और आए दिन टीवी चैनलों पर महिला अधिकारों पर जमकर चिल्लाती हैं. फिलहाल वे टाईम्स नाऊ के अर्नब गोस्वामी से नाराज़ चल रही हैं, क्योंकि अर्नब ने सरेआम इनकी वैचारिक कंगाली को बेनकाब कर दिया था, और इन्हें देशद्रोही कहा). बहरहाल, देखिये ट्वीट में मोहतरमा कितनी गिरी हुई हरकत कर रही हैं. इसमें एक तरफ वे कहती हैं कि मुम्बई के गैंगरेप को "धार्मिक रंग" देने की कोशिश हो रही है फिर घोषणा करती हैं कि "Rape has no Religion". परन्तु अपने ही एक और ट्वीट में प्रगतिशीलता का बुर्का फाड़ते हुए "कंधमाल में हिन्दू दलित लड़की और संघ परिवार" का नाम ले लेती हैं... तात्पर्य यह है कि सेकुलर-प्रगतिशील मानसिकता के कारण ही भारत में बलात्कार के दो प्रकार हैं - सेकुलर रेप और कम्युनल रेप. 



अब अंत में संक्षेप में आपको एक-दो उदाहरण देकर समझाता हूँ कि सेक्युलर रेप क्या होता है और कम्युनल रेप कैसा होता है. पहला उदाहरण है पश्चिम बंगाल में एक नन के साथ लूट और बलात्कार का मामला. आपने देखा होगा कि किस तरह न सिर्फ आरोपियों के नाम छिपाए गए, बल्कि नन के उस संदिग्ध बलात्कार के कई झोलझाल किस्म के तथ्यों की ठीक से जाँच भी नहीं हुई. लेकिन ना सिर्फ इसे अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया गया, बल्कि यहाँ कोलकाता और दिल्ली में मोमबत्ती मार्च भी आयोजित हो गए.. यानी रेप हुआ कोलकाता में, आरोपी पाए गए अवैध बांग्लादेशी... लेकिन छाती कूटी जा रही है भाजपा के नाम पर... यह है “साम्प्रदायिक बलात्कार”. वहीं उसी बंगाल में रामकृष्ण मिशन की दो साध्वियों के साथ भी बलात्कार हुआ, क्या आपको पता चला?? किसी चैनल पर आपने किसी हिन्दू संगठन की कोई आवाज़ सुनी? क्या कोई मोमबत्ती मार्च निकला? नहीं... क्योंकि यह एक सेकुलर रेप है. इसमें हिन्दू साध्वी के साथ हुए बलात्कार को पूरी तरह निरस्त करने का प्रगतिशील फैशन है. इसी प्रकार जब बीबीसी की फिल्म मेकर लेस्ली उड़विन भारत के तिहाड़ में घुसकर फिल्म बना लेती है तो ना सिर्फ पीडिता का, बल्कि उसके माता-पिता का और आरोपी मुकेश का नाम सरेआम उजागर कर दिया जाता है. पहचान उजागर कर दी जाती है, क्योंकि ये सांप्रदायिक लोग हैं, लेकिन जिस नाबालिग(???) आरोपी ने निर्भया की आँतें बाहर निकाली थीं और जो क़ानून के पतली गली एवं सेकुलर मानवाधिकार गिरोह की वजह से फिलहाल चित्रकारी और मौज-मजे कर रहा है, उस “मोहम्मद अफरोज” का नाम जानबूझकर छिपा लिया जाता है, उसके माँ-बाप का चेहरा नहीं दिखाया जाता... यह “सेकुलर रेप” का ही एक प्रकार है.... 


तो मित्रों, अधिक न लिखते हुए भी आप समझ ही गए होंगे कि "सेकुलर रेप" क्या होता है और "कम्युनल रेप" कैसा होता है... तो अगली बार से ख़बरों पर ध्यान बनाए रखिए, मोमबत्ती गैंग की हरकतों और महिला अत्याचार के नाम पर सहानुभूति (यानी विदेशों से मोटा चन्दा) हासिल करने वालों पर भी निगाह बनाए रखियेगा... फिर आप इस खेल को और भी गहरे समझ सकेंगे... 

जय जय... 

Tuesday, March 24, 2015

How to Recognize Adarsh Liberal

"आदर्श लिबरल" (यानी छद्म प्रगतिशील) की पहचान... 

‪#‎AdarshLiberal‬

इस हैशटैग के साथ अंग्रेजी भाषा में लगातार "आदर्श लिबरल" की जमकर बखिया उधेड़ी जा रही है. बजाने का यह काम हिन्दी में हम पहले से ही "छद्म प्रगतिशील" (छद्म सेकुलर) कहकर करते आ रहे हैं. फिर भी संक्षेप में थोड़ा और परिचय दे दूँ. "आदर्श लिबरल" वह व्यक्ति होता है जो रात को सोते समय RSS को गाली देकर सोता है, सुबह उठकर "हिंदुत्व" को गाली देने के बाद ही मुँह धोता है और दोपहर में मोदी को कोसने के बाद ही उसका खाना पचता है. Adarsh Liberal के परिवार में कम से कम एक व्यक्ति "गे" या "लेस्बियन" होता है, और एक कम से कम व्यक्ति "भगवान एवं भारतीय संस्कारों को नकारते हुए नास्तिक" कहलाना पसंद करता है...


एक Adarsh Liberal की "दिमागी संरचना" कुछ इस प्रकार होती है... (केजरीवाल की खोपड़ी खोलोगे तो "लगभग-लगभग" ऐसी ही निकलेगी). 




इस संक्षिप्त प्रस्तावना से अब Adarsh Liberal "प्रजाति" का बेसिक स्वरूप तो आप समझ ही गए होंगे. चूँकि समय की कमी है, इसलिए एक और छोटा उदाहरण देकर अंत करता हूँ...

यदि RSS कहे कि "सूअर का गू" बेहद बुरी चीज़ है, तो Adarsh Liberal रोमिला थापर से लेकर बिपन चंद्रा के नकली इतिहास का रेफरेंस देकर यह सिद्ध करने की पुरज़ोर कोशिश करेगा कि सूअर का गू बेहद पौष्टिक होता है. शरीर के किसी हिस्से में मोमबत्ती खोंसे हुए कुछ अति-उत्साही Adarsh Liberal तो सूअर का गू खाकर यह सिद्ध देंगे कि संघ झूठा है... और निश्चित ही इसके पीछे उसका कोई साम्प्रदायिक एजेंडा है. होली पर पानी बचाओ और बकरीद पर चुप्पी साध लो... तथा PETA के विज्ञापन करो लेकिन गौमांस का समर्थन करो... Adarsh Liberal की खास पहचान हैं...अर्थात Adarsh Liberal = देश जाए भाड़ में - "एजेंडा" ऊँचा रहे हमारा...



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"छद्म प्रगतिशील" की कथाएँ अनंत हैं... इसलिए मोह संवरण नहीं कर पा रहा... तो एक और संक्षिप्त सा परिचय..

- शशिकपूर को दादासाहब फाल्के पुरस्कार मिला...
Adarsh Liberal कहेगा :- जरा पता लगाओ कि शशिकपूर का RSS कनेक्शन क्या है?

Sunday, March 22, 2015

Temporary Ram Mandir Earns 300 Crores


अस्थायी राम मंदिर से उत्तरप्रदेश सरकार ने 300 करोड़ कमाए...


जब एक आधे-अधूरे मंदिर, फटे हुए टेंट में बैठे हुए रामलला, सैकड़ों सुरक्षाकर्मियों की बंदूकों के बावजूद तीन सौ करोड़ रूपए कमा लिए तो जब एक भव्य-विशाल-सुन्दर राम मंदिर बनेगा तो यूपी सरकार के खजाने में कितने हजार करोड़ रूपए प्रतिवर्ष आएँगे?? फैजाबाद-अयोध्या के आसपास सौ किमी की अर्थव्यवस्था में देश भर से आए राम श्रद्धालुओं के कारण कितना जबरदस्त उछाल आएगा... इसके सामने ताजमहल जैसे "मनहूस मकबरे" से होने वाली कमाई पासंग भर भी नहीं ठहरेगी...

संक्षेप में तात्पर्य यह है कि यदि उत्तरप्रदेश के लोग यूपी का आर्थिक उत्थान देखना चाहते हैं तो जात-पाँत-धर्म को पीछे छोड़कर भव्य राम मंदिर के लिए मार्ग प्रशस्त करने का दबाव सरकारों पर बनाएँ... इसी में सभी का फायदा है... यदि इतनी सीधी सी बात समझ में नहीं आती तो फिर चुपचाप बैठे कुढ़ते रहिएगा कि अगले दस वर्ष बाद सरदार पटेल की उस विराट मूर्ति से गुजरात कैसे और कितनी कमाई करेगा... "धार्मिक पर्यटन" कोई मामूली बात नहीं है, होटल, सड़कें, भोजनालय, हार-फूल-प्रसाद, गाईड सहित दर्जनों काम-धंधे जुड़े होते हैं...

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सेकुलर-प्रगतिशील-वामपंथी मूर्खों की बातों में आकर पहले ही राम मंदिर निर्माण में काफी देर हो चुकी है. अब आगे उत्तरप्रदेश वालों की मर्जी...

शुभ संध्या मित्रों...

Hindu New Year Vikram Samvat Calculations

विक्रम संवत्सर की बधाईयों के पीछे के अनथक प्रयास...

(अतिथि ब्लॉगर की श्रृंखला में पेश है विक्रम संवत पर श्रीकृष्ण जुगनू जी का तथ्यात्मक आलेख) 

विक्रमीय संवत्‍सर की बधाइयां देते-लेते पूरा दिन हो गया...। भारत कालगणनाओं की दृष्टि से बहुत आगे रहा है। यहां गणित को बहुत रुचि के साथ पढ़ा और पढ़ाया जाता था। यहां खास बात पर्व और उत्‍सवों के आयोजन की थी और उसके लिए अवसरों को तय करना बड़ा ही कठिन था। कई संस्‍कृतियां अपने-अपने ढंग को लेकर आई कई संस्‍कृतियां यहां रची-बसी, मगर सबको यहां की रवायतों के साथ तालमेल करना ही था। कुछ तो प्रयास और कुछ सहजता से यह कार्य हुआ।

गणितज्ञों ने बहुत परिश्रम किया... इस परिश्रम काे साश्‍चर्य स्‍वीकारा था अलबीरुनी ने जो भारत में 30 अप्रैल 1030 से लेकर 30 सितंबर 1030 तक रहा, रेनाद ने उसके कार्य का फ्रांसिसी अनुवाद 'फ्रेगमां अरेबीज ए परसां' के नाम से किया। इसे प्रथमतया यूं अनूदित किया गया - 

सामान्‍यताया लोग श्रीहर्ष के, विक्रमादित्‍य के, शक के, वल्‍लभ के तथा गुप्‍तों के संवत का प्रयोग करते हैं। वल्‍लभ, जिसका नाम एक संवत के साथ भी संबद्ध है, अ‍नहिलवाड के दक्षिण में लगभग 30 योजनों की दूरी पर स्थित वलभी नामक स्‍थान का शासक था, यह संवत शक संवत से 241 साल बाद का है, शक संवत की तिथि में से छह का घन अर्थात् 216 तथा पांच का वर्ग 25 घटाने पर वल्‍लभी संवत की प्राप्ति होती है.. गुप्‍तों का संवत उनकी सत्‍ता जाने के बाद आरंभ हुआ... जो कि शक के 241 वें साल से आरंभ होता है। ब्रह्मगुप्‍त की खंडखाद्यक (कन्‍दरवातक) की सारणियां इसी संवत में रखी जाती है, इस कृति को हम अरकंद के नाम से जानते हैं। इस प्रकार मज्‍दर्जिद के संवत के 400 वें साल में रखने पर हम स्‍वयं को श्री हर्ष संवत के 1488वें वर्ष में, विक्रमादित्‍य संवत के 1088वें वर्ष में, शक संवत के 953 वें वर्ष में, वल्‍लभी संवत तथा गुप्‍तों के संवत के 712वें वर्ष में पाते हैं...। मित्रों को यह जानकर हैरानी होगी कि नवंबर, 1887 ईस्‍वी में जॉन फैथफुल फ्लीट को यह अनुवाद नहीं रुचा और उसने प्रो. सचाऊ आदि के अनुवाद व मूलपाठ को जमा किया : 




'' व लि धालिक अरडू अन् हा व इला तवारीख श्रीह्रिश व बिगरमादित व शक व बिलब व कूबित व अम्‍मा तारीख बल्‍ब...।''

यह विषय बहुत जटिल था, है और रहेगा, इस पर फ्लीट ने अपने जमाने में करीब दो सौ पन्‍ने लिखे हैं जिनका प्रकाशन 'कोर्पस इंस्‍क्रीप्‍शनम इंडिकेरम' के तीसरे भाग में हुआ हैं। उसकी गणित और गणनाओं को निर्धारित करने के लिए भारतीयों ने अपना पराक्रम दिखाया। उस जमाने के मशहूर भारतीय गणितज्ञ और पंचांगकारों ने कमरतोड़, कल्‍पनातीत प्रयास किया। इनमें भगवानलाल इंद्रजी, शंकर बालकृष्‍ण दीक्षित जैसे अपूर्व प्रतिभा के धनी विद्वान भी शामिल थे। भारत के सभी गौरवशाली ग्रंथों और अन्‍यान्‍य प्रमाणों, संदर्भों को भी सामने रखा गया था। जे. फरर्गुसन जैसों के निर्णयों को भी कसौटी पर कसा गया... बहुत अच्‍छा हुआ कि मंदसौर नगर से यशोधर्मन का लेख मिल गया जिसके लिए 533-34 ईस्‍वी की तिथि मिली।

समस्‍या यहीं पर खत्‍म नहीं हुई... लंबी गणनाएं हुईं। अनेकानेक शिलालेखों के आधार पर गणनाओं के लिए कई कागज रंगे गए, तब केलुलेटर कहां थे और यह स्‍वीकारा गया कि ईस्‍वी सन् 58 से प्रारंभ होने वाला विक्रम संवत है किंतु सामान्‍यतया 57 ईस्‍वी से प्रारंभ हुआ माना जाता है। यह पश्चिमी भारत की उत्‍पत्ति का संवत कहा गया जिसे उज्‍जैन के शासक विक्रम या विक्रमादित्‍य के शासनकाल के प्रारंभ से माना जाता है। फरगुसन का विचार था कि यह छठीं सदी में आविष्‍कृत हुआ लेकिन इसका ऐतिहासिक प्रारंभ बिंदु ईस्‍वी सन 544 था, तथा इसको पीछे की ति‍थि से संबद्ध किया गया किंतु मन्‍दसौर लेख से प्रमाणित होता है कि यह इस समय के पूर्व मालव नाम के अंतर्गत अ‍स्तित्‍वमान था। मध्‍यभारत में यह 9वीं सदी ईस्‍वी तक ज्ञात था और 11वीं शताब्‍दी ईस्‍वी में विक्रम के नाम के साथ संबद्ध रूप में इस संवत का एक प्राचीन दृष्‍टांत खोजा गया।
है न जंजाली जटिलताओं के बीच एक रोचक खोज के निर्धारण का प्रयास जो डेढ़ सदी पहले हुआ... मगर आज हमारे पास कई नए प्रमाण मौजूद हैं, उज्‍जैन स्थित विक्रमादित्‍य शोधपीठ के खोजे गए प्रमाण भी कम नहीं। कई प्रकाशन हुए हैं, उसके निदेशक डॉ. भगवतीलालजी राजपुरोहित तो 'विक्रमार्क' शोधपत्रिका संपादन कर रहे हैं। और तो और, अश्‍विनी रिसर्च सेंटर, माहीदपुर के चेयरमेन डॉ. आर. सी. ठाकुर ने विक्रमादित्‍य के सिक्‍के और छापें भी खोज निकाली हैं। ये प्रमाण गणना मूलक एक संवत के प्रवर्तक के लिए तो है ही, संवत के अस्तित्‍व में आने के कारणों को भी पु‍ष्‍ट करेंगे। काम एक दिमाग के सोच से ज्‍यादा है, कई लोग लगे हैं... मगर, हमारे लिए तो यह उचित होगा कि हम कालीमिर्च, नीम की कोपल, मिश्री का सेवन करें और परस्‍पर बधाइयों का आदान प्रदान करें। 
जय-जय।

Thursday, March 19, 2015

Intolerance of Pesudo Seculars and Neo-Liberals

फेसबुक असहिष्णु नहीं है, रिपोर्ट करने वाले "वैचारिक कंगाल" असहिष्णु हैं... 

कल दिनाँक 18 मार्च 2015 को मैंने फेसबुक पर एक पोस्ट डाली, जिसमें Economic Times के कार्टूनिस्ट आर. प्रसाद का एक कार्टून मैंने अपनी वाल पर शेयर किया. उस बेहद आपत्तिजनक कार्टून में हनुमान जी को क्रॉस पर लटके हुए दिखाया गया. इस कथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी टाईप के कार्टूनिस्ट ने हरियाणा में चर्च पर हुए हमले के विरोध में यह घटिया कार्टून बनाया और इसे Economic Times ने प्रकाशित किया.



18 मार्च की सुबह-सुबह फेसबुक द्वारा मुझे सूचित किया गया कि आपके यह पोस्ट "आपत्तिजनक" है, इसलिए नियमों के तहत इसे हटाया जाता है. इतना ही नहीं, फेसबुक ने मुझे अगले चौबीस घंटे के लिए लॉग-इन करने से भी प्रतिबंधित कर दिया. यदि उस पोस्ट में कुछ भी आपत्तिजनक था, तो वह हनुमान जी का गलत चित्रण, जिसके कारण मेरी भावनाएँ आहत हुई थीं. ET का यही कार्टून अन्य कई अंग्रेजी, तमिल एवं मराठी फेसबुक उपयोगकर्ताओं ने भी शेयर किया. ट्विटर ने भी मूल कार्टून अथवा कार्टूनिस्ट को ब्लॉक नहीं किया गया और ना ही पोस्ट हटाई गई. कार्टूनिस्ट ने ट्विटर पर भी हनुमान भक्तों की जमकर गालियाँ खाईं, लेकिन जैसा कि होता आया है कान्वेंट के अर्ध-शिक्षित बुद्धिजीवी नंबर एक के बेशर्म और ढीठ होते हैं, आर प्रसाद ने वह कार्टून नहीं हटाया. ज़ाहिर है कि कार्टून बेहद आपत्तिजनक है ही, लेकिन फेसबुक ने प्रतिबंधित किसे किया?? मुझे... इसका सीधा अर्थ यही है कि जिस किसी "प्रगतिशील बुद्धिजीवी गिरोह" ने फेसबुक पर मेरी पोस्ट को लेकर रिपोर्ट किया, वह मेरे शब्दों को लेकर किया. मेरे शब्दों के कारण ही इन वामियों-आपियों-सेकुलरों को इतनी भीषण मिर्ची लगी कि वे मुझसे बदला भंजाने के लिए इतने निचले स्तर तक गिर गए. ऐसा क्या था मेरे शब्दों में?? जरा देखिये... इसमें क्या आपत्तिजनक है कोई बताएगा मुझे??




चित्र से स्पष्ट है कि इस पोस्ट की शुरुआती चार पंक्तियाँ कथित प्रगतिशीलों एवं बुद्धि बेचकर आजीविका कमाने वाले बुद्धिजीवियों को "असमिया मिर्च" लगाने के लिए पर्याप्त थीं. क्योंकि इन पंक्तियों में मैंने इस "गिरोह" को शार्ली हेब्दो मामले से सम्बन्धित "बदरंग सेकुलर आईना" दिखा दिया. मई 2014 के बाद से ही, अर्थात जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं.. यह "गिरोह" बुरी तरह खार खाए बैठा है. इसे आज भी विश्वास नहीं हो रहा है कि मोदी प्रधानमंत्री बन चुके हैं और कम से कम पूरे पाँच साल बने रहेंगे. इसीलिए मोदी के खिलाफ जो घृणा इन्होंने पिछले बारह साल तक अपने मन में भर रखी हैं, गाहे-बगाहे उसकी उल्टियाँ फेसबुक-ट्विटर पर करते रहते हैं. वैचारिक जंग में बुरी तरह मात खा चुका यह प्रगतिशील गिरोह, हिन्दूवादियों से बहस में घबराता है. राष्ट्रवादियों को ब्लॉक करके बुर्के में छिप जाना इनका शगल बन चुका है. ओम थानवी जैसे लोग जो खुद को पत्रकार कहते हैं, उन्हें तो फेसबुक पर "ब्लॉकाधीश" की उपाधि हासिल है. संक्षेप में तात्पर्य यह है कि दूसरों को "उदारता", "लोकतंत्र", "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" आदि के उपदेश देने वाले वामपंथी-सेकुलर-प्रगतिशील वैचारिक पाखण्डी इतने ज्यादा घबराए हुए और तानाशाही मानसिकता के हैं, कि अपने खिलाफ चार शब्द भी नहीं सुन सकते.

मैं पिछले आठ साल से सोशल मीडिया पर हूँ. ब्लॉगिंग के जमाने में भी हमारे वैचारिक संघर्ष होते रहते थे, असहिष्णु तो वामपंथी पहले से ही थे, लेकिन उन दिनों यह गिरोह इतने निचले स्तर तक नहीं गिरता था. ज़ाहिर है कि इस गिरोह में कुछ नए-नवेले "आपिये किस्म के" लोग भी शामिल हो गए हैं.

बहरहाल... इंटरनेट एक ऐसा माध्यम है कि आप यहाँ किसी को रोक नहीं सकते. उसके विचारों के प्रवाह को बाधित नहीं कर सकते. यहाँ सब कुछ मुक्त है. जिस "गिरोह" ने मेरे फेसबुक प्रोफाईल की इस पोस्ट को रिपोर्ट किया है वह मूर्ख है. मैंने दोनों स्क्रीनशॉट लेकर इसे ब्लॉग पर डाल दिया... कुछ अन्य वेबसाईट्स पर भी डालूँगा... तो मुझे सिर्फ कुछ देर के लिए रोककर अंततः बेवकूफ कौन सिद्ध हुआ?? :) :)

Sunday, March 8, 2015

Ban on Beef - The Other Side of Coin

गौहत्या प्रतिबन्ध : धर्म, राजनीती और वोट बैंक से अलग दृष्टिकोण...

(कुछ दिन पहले गौहत्या बंदी के पक्ष में श्री आनंद कुमार जी का लेख ब्लॉग पर लिया था. आज इस समस्या का दूसरा पक्ष भी प्रस्तुत है. बेहद तर्कसंगत पद्धति से जमीनी हकीकत को एक गौपालक के नज़रिए से समझाया गया है. आशा करता हूँ कि सभी मित्र पूरे लेख को ध्यान से पढ़ेंगे, गौहत्या बंदी जैसे मुद्दे को सिर्फ भावनात्मक नज़रिए की बजाय व्यावहारिक एवं वर्तमान परिस्थितियों के सन्दर्भ में समझने का प्रयास करेंगे, ताकि एक समुचित चर्चा हो, दोनों पहलुओं का विस्तृत अध्ययन हो और सरकार तथा गौपालक मिलकर इसका समाधान खोजें). पेश है गौहत्या बंदी कानून का दूसरा पहलू... अपनी राय अवश्य दें एवं शेयर करके सम्बन्धित नेताओं-अधिकारियों तक पहुँचाने की कोशिश करेंगे)... अनाद्य प्रकाश त्रिपाठी जी (https://www.facebook.com/AnadyaPrakashTripathi) का यह लेख निश्चित ही विचारणीय है...

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गाँव के जितने किसानो के गायों को बछड़ा होता है वो दूध दुहने के बाद बछड़े को गाँव के बाहर छोड़ देते हैं. उत्तर प्रदेश देवरिया जिला गाँव सिरजम में मेरे गाँव के बाहर के दो एकड़ खेत में मटर बोया गया था, इन लावारिस बछड़ो ने पूरा सत्यानाश कर दिया, भाई इसका क्या हल है, मुझ जैसे सैकड़ो किसानो को इन लावारिस बछड़ो के आतंक से मुक्ति दिलाने का कोई तो मार्गदर्शन करे? महाराष्ट्र में गौहत्या बंद होने पर जश्न मनाने वालो में से है कोई बताने वाला, मेरे इस समस्या का हल.......

प्रथम बार जब मैंने फेसबुक पर आवारा पशुओं (लोगो द्वारा छोड़े गए बिना दूध देने वाले जानवर ) के द्वारा होने वाले फसल बर्बादी का मुद्दा उठाया, तो मुझे जबाब दिया गया की गौशालो से संपर्क करो। मै अपनी सोच पुनः आप लोगो के साथ शेयर करना चाहूँगा. "वाह भैया, दुनिया अपने बछड़े मेरे खेतो में छोड़ जाये और मैं गौशाला- खोजता फिरूं?" इतना उत्तम तरीका सुझाने के लिए धन्यवाद, मास्टर डिग्री धारक मेरे दिमाग में भूसा भरा था जो इतना भी नहीं समझ सकता की आवारा बछड़ो को गौशाला में भेजो, अरे भाई साहब अब यह राय दे दिए हो तो उत्तर प्रदेश में स्थित कुछ गौशालाओं के नाम पता भी बता दीजिये, ये भी बता दीजिये के उनके पास अभी और कितने बिना दूध देने वाले बछड़ो के रखने की कैपिसिटी है. हाँ, साथ में ये भी बता देते की बछड़ो को मेरे गाँव से गौशाला भेजने का लेबर चार्ज और ट्रांसपोर्टेशन चार्ज का बंदोबस्त कौन सा गौशाला दे रहा है। वास्तव में ये संवाद हमारी मूर्खता को परिलक्षित कर रहा है कि आज भी हम उचित और ब्यवहारिक मुद्दो नजरअंदाज करते हुए भावनाओ और वोट बैंक के लिए कैसे काम करते है, हँसी आती है उन लोगो द्वारा गाय पालने के फायदे सुन कर जिनको गाय के गोबर की गंध से ही उलटी आने लगती है.

सरकार द्वारा लिए गए इस फैसले के कई दूरगामी परिणाम सामने आएँगे... 

(१) आवारा पशुओं (लोगो द्वारा छोड़े गए बिना दूध देने वाले जानवर ) के द्वारा होने वाले फसल बर्बादी का मुद्दा भी एक गंभीर प्रश्न है

(२) सीमा पर (बंगाल और पाकिस्तान) पशु तस्करी बहुत बढ़ जाएगी

(३) अप्रत्यक्ष  रूप से हम बंगाल और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में मदद के जिम्मेदार होंगे

(४) जो जॉब और आमदनी अभी भारतीयों और भारत सरकार को हो रही है उसको खुले हस्त से हम बंगाल और पाकिस्तान को दे देंगे

(५)पशु तस्करी के माध्यम से पुलिस और कस्टम के अधिकारियों को भ्रस्टाचार करने का खुला न्योता

(६) अब तक इतने कत्लखानो के सञ्चालन के बाद भी बाद भी गायों और शहरों की सडको पर आवारा पशुओं (लोगो द्वारा छोड़े गए बिना दूध देने वाले जानवर ) द्वारा फैलाई जाने वाली गन्दगी और झुण्ड द्वारा किया जाने वाला अतिक्रमण.

(७) और हाँ, एक बात तो बताना भूल गया, जो लोग मांसभक्षी है, जब उनके मुँह से माँस छिन जायेगा तो वो सब्जी खाएंगे, अब सब्जियों की पैदावार बढ़ने के लिए अलग से जमीनें तो पैदा होने वाली नहीं है, सो "डिमांड एंड सप्लाई" के साधारण अर्थशास्त्र से सब्जियों के दाम दोगुने होने की पूर्ण संभावना है, जो हर भारतबासी चाहे उसका संप्रदाय जो भी हो के जेब पर भरी पड़ने वाला है.


राजनीती में वोट बैंक के लिए नब्य भारत के सृजन में लोगो को अपने पैर पे कुल्हाड़ी मारते हुए देख और उससे होने वाले जख्म के दर्द से अनजान लोगो को उल्लास मानते हुए देख के मन में पीड़ा हो रही है। धर्म अपनी जगह है आस्था अपनी जगह है. लेकिन धर्म के नाम पर अपने भविष्य को बिगड़ना किसी भी लिहाज़ से समझदारी भरा कदम नहीं हो सकता है।

फेसबुक पे संदीप बसला जी दूध के अर्थशास्त्र को भारतीय बिजली कंपनियो के अर्थ शास्त्र से तुलना करते हुए बहुत अच्छे से इस समस्या के आर्थिक पहलू को उजागर करते है. संदीप जे कहते है :
"दूध का अर्थ शास्त्र को ऐसे समझो: नाकारा बिजली अधिकारी, नेताओं का तुष्टिकरण, पुलिस की कमी, और बेईमान जनता की वजह से अब आप जो बिजली के पैसे चुका रहे हो उसमे उस चोरी हुई बिजली का मूल्य भी शामिल है जबकि वो बिजली आपने उपभोग नहीं की उसका दंड भुगत रहे हम सब दूसरों पर खर्च हुई बिजली के मूल्य का - यही है बिजली का अर्थ शास्त्र.

ठीक इसी तरह से अब जब दूध देने वाले पशु तो दूध उतना ही देंगे पर दूध ना देने वाले पशु को भी चारा तो चाहिए ही उसकी लागत कहाँ से आएगी ? जो दूध बेचा जा रहा उसी से. तो जो दूध 40 rs लीटर है वो 100 rs मिलेगा. और रहने के लिए जगह ? सच्चाई ये है कि रहने के लिए जिन्दा लोगों के लिए नहीं है, पशुधन कहाँ रहेगा ? सिर्फ भावनाओं से काम नहीं चलता। देश पर बहुत भारी पड़ेगा ये फैसला।" अगर भावनाओ से ऊपर उठकर विचार करें तो इस तथ्य से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता है, कि इस निर्णय से लोगो को लाभ तो कुछ भी नहीं होगा लेकिन हर ब्यक्ति को इसकी कीमत जरूर चुकानी पड़ेगी.

कहने का तात्पर्य ये है की जब तक किसी भी योजना का व्यावहारिक लाभ और सामाजिक समरसता सुनिश्चित नहीं किया जायेगा तब तक वह सिर्फ विद्वानों के लिए वादविवाद का विषय भर रहेगा. फेसबुक पर नितिन त्रिपाठी जी कहते है कि "सोशल मीडिया पर चाहे जो कोई जो कुछ कहे, कटु सत्य है कोई किसान बैल या बछड़े को नहीं पालता, सरकार गौशाला के लिए ऋण दे यह भी समाधान नहीं क्योंकि गौशाला के नाम पर तो सबसे ज्यादा फ्रॉड होता है| वित्तीय फ्रॉड की चर्चा किये बगैर केवल कार्य पद्धति में ही जाऊं तो मैंने लगभग सौ गौशालाएं देखीं और ज्यादातर में बैल या बछड़े नहीं दिखाई दिए. इतना ही नहीं गाय भी केवल वही ही दिखाई दीं जो दुध देती हैं. बात बिल्कुल साफ़ है, कोई भी मॉडल जब तक वित्तीय तरीके से लाभ दायक नहीं होगा तब तक उसे कोई भी किसान या व्यवसाई नहीं अपनाएगा. कृषि मेले में गौ मूत्र का खेती में उपयोग आदि की खूब चर्चा की जाती है| पर इन सबका प्रैक्टिकल इम्प्लीमेंटेशन दिखाई नहीं देता असल जिंदगी में बैल आधारित खेती भी असंभव है प्रैक्टिकली आधुनिक युग में, अगर सम्भव भी है तो प्रैक्टिकल में कहीं दिखती नहीं. इन सब परिस्थितियों में मुझे नहीं लगता की किसान या व्यवसाई को मजबूर किया जाना चाहिए बैल पालन हेतु.



नितिन जी का ये तथ्य हमे सोचने पे मज़बूर कर रहा है की क्या समर्थ और उन्नत भारत की कल्पना के साथ हम सही दिशा में चल रहे है या भावनाओ में बह कर राजनीतिक लाभ के लिए पिचले ६५ साल से जो कोंग्रेस कराती आई है, हम भी वही कर रहे है. देश के विकास और जन कल्याण की योजनाओं को टाक पर रख कर कांग्रेस एक समुदाय विशेष को लाभ पहुचाने का काम कर रही थी. नयी सरकार दुसरे समुदाय की भावनाओ से खेल रही है, महाराष्ट्र सरकार के इस निर्णय से मुझे किसी भी समुदाय या ऐसा कहें कि भारत के किसी भी ब्यक्ति को कोई लाभ होते हुए नहीं दिख रहा है. हाँ दूरगामी दुष्परिणाम सब को भोगना होगा.

जब किसानी पारम्परिक तौर तरीको से की जाती थी तब गौ पालन इतना खर्चीला नहीं होता था आप के ज्ञानवर्धन के लिए कुछ तथ्य : आज कम्बाइन हार्वेस्टर जमाना है, जब ये नहीं था, तब गेहूँ और धान की कटाई हाथो से होती थी. फसल से गेहू और धान निकलने के बाद जो बाई-प्रोडक्ट बचता था वो भूसा होता था, मुफ्त में मिल जाता था गेहू और धान की मड़ाई के साथ साथ.. अब कम्बाइन हार्वेस्ट से गेहूँ और धान की बालियां ऊपर ऊपर चुन लिया जाता है, कोई भूसा नहीं मिलता है, शेष खेत में आग लगा के उसे पुनः जुताई योग्य बनाया जाता है. अब भूसा चाहिए वो भूसा वाला हार्वेस्टर ले के उसी खेत की पुनः मड़ाई करे, प्रोसेस कॉस्ट दोगुना, और भूसा का खर्च ६-१० रुपये प्रति किलो।

एक गाय (दूध दे या न दे ) प्रति दिन ५-८ किलो भूसा खायेगी, मतलब ८० रुपये रोज, महीने के २४००। बाकि दाना पानी अलग से. इस खिलाने-पिलाने के दौरान लगाने वाला मानव संसाधन का महत्व हीं नहीं है. अब आप खुद अंदाज़ा लगाओ की एक दूध न देने वाली गाय को पालने का खर्च कितना है ? गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर करने वाला किसान जो अपना पेट पालने में असमर्थ है वो इनका क्या करेगा ? और हाँ... डेरी इंडस्ट्री वालो से कोई उम्मीद ही ना रखो, आत्मा काँप उठेगी आप की अगर एक बार भारत के किसी डेयरी में जा के देख लो, कि दूध न देने वाली गाय का ये लोग कैसे पालन पोषण करते है? और मर जाने पर क्या करते है? किसी ने सुझाव दिया कि राजीव दीक्षित जी ने बताया है की गाय दूध ने देते हुए भी लाखो का फायदा करा सकती है!!!!!! बताया गया है कि ८० लाख तक की आमदनी हो सकती है. मैंने कहा जी भैया ४०० क्विंटल गोबर हर महीने उत्पादन होता है मेरे यहाँ... पूरा का पूरा गाँव वाले फ्री में उठा के ले जाते है, जरा पता तो बता दीजिये उस इंडस्ट्री का, जो इस गोबर का व्यावसायिक उपयोग कर सके? हवा में बातें बनाना अलग बात है और धरातल पर कर्तब्य करना और बात. हाँ जिस दिन ऐसे इंडस्ट्री भारत के कोने-कोने में होगी, चाहे कोई कानून हो या न हो, कत्लखानो को गायें नहीं मिलेंगी कटाने के लिए, वो वैसे ही बंद हो जाएँगी।

किसी ने सुझाव दिया, आप गोबर गैस प्लांट क्यों नहीं लगा लेते? आइये आपको गोबर गैस प्लांट की व्यावहारिक हकीकत से रूबरू करते है. गोबर गैस प्लांट एलपीजी सिलेंडर जैसा नहीं होता। पहले गोबर गैस प्लांट के निर्माण के लिए लगभग २ लाख की पूंजी चाहिए। फिर उसमे गोबर डालना और हर १५ दिन बाद उसमे से सड़ चुके गोबर को बाहर निकालने के लिए पर्याप्त मानव संसाधन जुटाना मुस्किल है, भारत में कोई भी ऐसे काम को करने के लिए तैयार नहीं है, अगर कोई मिल भी गया तो काम १५-२० हज़ार रुपए महीने से काम ना लेगा। अब आते है गैस पर, गोबर गैस का व्यावसायिक उपयोग न के बराबर है, घरेलू उपयोग खाना बनाना और प्रकाश की व्यवस्था तक ही सीमित है. खाना बनाने के लिए एलपीजी ५०० प्रति सिलिंडर में मिलेगी, महीने भर के लिए पूर्ण है. प्रकाश के लिए LED लाइट कही ज्यादा सुभिधाजनक सस्ता और उपयोगी है. अब आप सोच के बताइये कि गोबर गैस सयंत्र बना कर, उसमे इतना निवेश कर के मै कितनी बुद्धिमानी का परिचय दूंगा ? जब तक गैस के बारे व्यावसायिक उपयोग के लिए हर गाँव में प्लांट नहीं लगेंगे, और जब तक इस गैस को बॉटलिंग कर के एलपीजी के बराबर का व्यावहारिक दर्ज़ा नहीं मिलता, ये सारी बातें बस कोरी कल्पना मात्र रह जाएँगी।

इस क़ानून का सबसे निर्मम पक्ष ये है कि गाँव में जब लोग बछड़ो और दूध न देने वाली गयो को बहार जा के छोड़ देते है तो वो गाये किसानो की फसल बर्बाद कराती है. किसान अपनी फसल रक्षा के लिए बड़े पैमाने पर कीटनाशको का इस्तेमाल करते हैं, ये कीटनाशक खाकर गायें तड़प तड़प कर मरती है. शहरों की स्थिति और भी खतरनाक है, लोग गायों को खाना पानी भी नहीं देते. सुबह दूध दुहने के बाद गाय के बच्चे को बांध लेते है और गाय को सड़को पर छोड़ आते हैं. प्लास्टिक कचरा और विषैले पदार्थो को खा कर वह गाय शाम के पुनः दूध देने आ जाती है, बाद में इसका जो दुष्परिणाम होता है वह यह कि इन गायों को कैंसर और Gastrointestine की बीमारियाँ हो जाती है और ये गाएँ तिल-तिल कर मरने के लिए मज़बूर हो जाती है.

समाधान यही है कि हम अपनी भावनाओ में बहने से बाहर निकलें हिन्दू धर्म में हर जीव को समान सत्ता माना गया है, मुर्गिया और बकरिया कटे तो कटे, और गाय कटे तो वो हमारी माता। दोनों के जीवात्मा में फर्क क्या है? कोई है हिन्दू तत्व दर्शन की व्याख्या के साथ इस रहस्य को समझने या समझाने वाला? हिन्दू धर्म तो ये भी कहता है जीव कभी नहीं मरता, उसका तो बस चोला बदल जाता है. फिर ये स्यापा रोना क्यों? ईश्वर ने सृष्टि बनाई तो पालक विष्णु और संहारक महेश (शंकर) दोनों को बनाया। सृष्टि को संतुलित बनाये रखने में पालक और संहारक दोनों का योगदान है, ऐसा तो नहीं की हम विष्णु को माने और शंकर की पूजा छोड़ दे. हर कोई गाय को अपनी माता मानना चाहता है, लेकिन कोई नहीं चाहता की एक बिना दूध देने वाले गाय को पालने की जिम्मेदारी उसके ऊपर डाल दी जाये। पैसा लगता है ना गाय के पोषण में और दूध भी नहीं मिलेगा। फिर इस स्वार्थ के रिश्ते को माता कह के बदनाम क्यों किया जा रहा है।

आप जिस धर्म को मानते हो, उस धर्म के भगवान के खातिर इस मुद्दे में धर्म को मत घुसेडिये, गाय को पालना हो पालिए, खाना हो खाइए, आप की अंतरआत्मा आप को जो भी करने को कहे करिए लेकिन बीच में धर्म को मत लाईये. कभी भारत कृषि प्रधान देश होता था गोवंश भारतीय अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग था. समाज धर्म के आधार पर चलता था, इसी लिए गाय को भी उच्च धार्मिक दर्जा प्राप्त था, आज समाज बदल रहा है, अर्थव्यवस्था का संचालन स्रोत बदल रहा है. हम एक ऐसे समय से गुजर रहे है जो संक्रांति काल है, हम अपने सोच में अभी इतने परिपक्व नहीं हो पाए है की धर्म और अर्थ के सोच को समानांतर बिना एक दुसरे को बाधित किये सोच सके. ऐसे परिस्थिति में एक बैकल्पिक रास्ते की जरूरत है जहाँ धर्म और अर्थ को निर्बाध गति से बिना किसी की भावनाओ को ठेस पहुचाये गति प्रदान कर सके. अर्थ या धर्म दोनों में किसी की भी अति किसी अवस्था में समाज के लिए आदर्श परिस्थिति नहीं उत्पन्न कर सकती. ये एक गंभीर विषय है, अर्थ को प्रधान मान के या धर्मान्ध हो अगर हम कोई निर्णय लेते है तो आने वाला भविष्य उसके दुष्परिणाम को भोगेगा, और जीवन भर हमे कोसेगा कि सही समय में हम ने सही फैसला नहीं लिया. इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए हमे सभी पहलुओं और वैकल्पिक रास्तो पर विचार करना चाहिए.


मेरा मानना है कि जो भी गौ पालक है उनको एनिमल हसबेंडरी की एडवांस टेक्नोलॉजी के बारे में जागृत किया जाये, उनके सामने आने वाली हर समस्या के निदान के लिए आर्थिक और सामाजिक माहौल मुहैया कराया जाये, अपनी माता (गाय ) के पालन पोषण में उनको खुद सक्षम बनाने पर बल दिया जाये. फेसबुक पर ही स्वाति गुप्ता जी कहती हैं कि "विदेशों मे काउ-फार्मिंग (गोपालन) होती है, जिसमें दो तीन लोग मिलकर दो हज़ार गाएँ मैनेज करते है । इन गायों का खाना भी अच्छा होता है और दूध भी अच्छा देती है । इधर उधर भी नहीं फिरती". सोचने वाली बात ये है कि हम वो टेक्नोलॉजी भारत में क्यों नहीं ला रहे है? गौपालकों को गौशाला के नाम पर सब्सिडी के वकालत करने वाले लोग इस दिशा में क्यों नहीं सोचते कि ये सब्सिडी काउ फार्मिंग (गोपालन) टेक्नोलोजी में लगे और हम उन्नत तरीके से गौपालन करे.

अगर वास्तविक रूप से इस समस्या के समाधान के लिए अगर किसी चीज के जरूरत है तो वो यह है कि उन्नत टेक्नोलॉजी और सरकारी सामाजिक सहयोग से एक इण्डस्ट्रियल विकास की, जिससे गैस, पावर, मिल्क प्रोडक्ट और बहुत से चीजों का व्यावसायिक इस्तेमाल हो सकता है। जब तक ये व्यवस्था गाँव गाँव में नहीं कर दी जाती तब तक समस्या जस की तस बनी रहेगी. पहले गौ आधारित इण्डस्ट्रियल विकास करना होगा, फिर एक-एक गोपालक को कच्चा मॉल सप्लाई के लिए इस चेन से जोड़ना होगा

इस मुद्दे पे अतुल दुबे जी कहते है के "भाई लोग जो गाय दूध नहीं देती उनकी रक्षा हो सकती है, जिसके लिए आप को दान देने की भी जरूरत नहीं / गौ मूत्र और गोबर से बहुत सारे समान ( मंजन से मच्छर मार अगरबत्ती तक) बनते है अगर हम ईस्तेमाल करे तो गौ रक्षा हो सकती है. बस जरूरत है लोगो तक इसकी अच्छाई पहुँचाई जाए". मै अतुल जी के इस सोच से काफी हद तक सहमत हूँ, पर मुख्य समस्या वही है जो चूहों के एक मीटिंग में चूहों के सरदार के सामने थी, बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन? आप गोपालक से ये उम्मीद नहीं कर सकते की गोबर और मूत्र का व्यावसायिक उपयोग के लिए संसाधन पूंजी निवेश और बने सामानों की मार्केटिंग खुद करे. ये अन्याय होगा. हाँ एक और सच्चाई यह है कि मै अब तक अपने संपर्क में किसी को नहीं जानता जो मंजन में गोमूत्र और गोबर से बना प्रोडक्ट प्रयोग करते हो, और मच्छर मार में आलआउट और मार्टिन छोड़ कर कुछ दूसरा प्रयोग करते हो. बात कड़वी हो सकती है लेकिन सच्चाई से हम मुह नहीं मोड़ सकते. व्यापारी को जब तक शुद्ध मुनाफा नहीं होगा, वो ऐसी कोई भी इंडस्ट्री लगाने वाला नहीं. तो बात वहीं आ कर रुक जाती है, ऐसी योजना का विकास कैसे किया जा सके, कि गौसेवक गाय के मूत्र और गोबर को उन कंपनियों तक पंहुचा सके जो इसका व्यावसायिक उपयोग कर सके... और साथ में इतनी कमाई भी पा सके कि उनकी लागत मूल्य निकल सके? बिना दूध देने वाले एक गाय को पालने में लगने वाला मासिक खर्च ४-५ हज़ार पड़ता है, वास्तविक धरातल पर रहते हुए अगर बात करें तो क्या हम ऐसे इंडस्ट्री का विकास कर सकते हैं, जो गाय का गोबर और मूत्र के बदले गोपालक को प्रति माह ५-६ हज़ार रूपये दे सकती है ? वर्त्तमान में तो ये असंभव ही प्रतीत हो रहा है.


साथ में जो लोग बीफ (गौ मांस) के उद्योग से जुड़े हैं, उनको भी स्लाटर हाउस की एडवांस टेक्नोलॉजी के बारे में जागृत किया जाये और उनको इस उद्योग से अधिकतम मुनाफा कैसे बनाये इस बात की सीख दी जाये. इस मामले में राजकीय हस्तक्षेप करने की बजाय पालक और संहारक को अपना संतुलन बनाने के लिए स्वंत्रता प्रदान की जाये। क्योंकी पालक है, तो ही संहारक है, संहारक अपने उद्योग के फायदे के लिए पालक को ज्यादा गोबंश उत्पादन के लिए प्रेरित करे, इसी प्रकार पालक स्वय निश्चित करे की उसके हित में क्या है, ये समन्वय ही सृष्टि को अब तक चला रहा था और इसमें हस्तक्षेप सृष्टि श्रृंखला में परिवर्तन लाएगा जिसके दुष्परिणाम भयानक हो सकते है.

जैसा कि सब जानते है की मदिरा-गुटखा-बीड़ी-सिगरेट खतरनाक और नुकसानदेह है, सिवाय नुकसान के इन से कोई फायदा नहीं है, फिर भी सरकार इनके फैक्ट्री को बंद नहीं कराती है, बस जागरूकता अभियान चलती है. क्यों? ऐसे ही कत्लखाने बंद करना समस्या उपाय नहीं है, समुचित और सही उपाय तो तब होगा जब इन कत्लखाने के मालिको को कोई गौवंश बेचने वाला ही नहीं मिलेगा, जब गोपालकों को गौवंश का सही और फायदेमंद उपयोग (बायोगैस, जैविक फ़र्टिलाइज़र, आदि ) करने का टेक्नोलॉजी किफायती मूल्य पर उपलब्ध होगा तो वो इन्हे बेचेंगे क्यों? हमारा दुर्भाग्य ये है कि हमारी सरकारे मूल समस्या का इलाज ना कर के बस भावनाओ के साथ खेलना जानती है. वोट बैंक का सवाल है न. अगर आज बायोगैस, जैविक फ़र्टिलाइज़र, आदि टेक्नोलॉजी और इंस्ट्रूमेंट गौ-पालकों को मिल जाये, तो मै दावे साथ कह सकता हूँ कि ये कत्लखाने अपने-आप बंद हो जायेंगे. आज जो समस्या गौपालकों के सामने है, कल को इन स्लाटर हाउस मालिको के सामने भी वही समस्या होगी। उम्मीद करता हूँ कि सरकार जनभावनाओं से खेलने के जगह गौपालकों के लिए कुछ ठोस बंदोबस्त करने की दिशा में कदम उठायेगी...


Thursday, March 5, 2015

Open Invitation for Guest Blogging on My blog

अतिथि ब्लॉगर बनें... 

नमस्कार मित्रों...

जैसा कि आप जानते ही हैं कि व्यस्तता के कारण मेरा ब्लॉग लेखन लगभग बन्द सा ही है. मुश्किल से महीने में दो-तीन लेख लिख पाता हूँ, कभीकभार फेसबुक की छोटी-छोटी पोस्ट को ब्लॉग पर पोस्ट कर देता हूँ ताकि ब्लॉग "जीवित" रहे...| विगत एक माह में मैंने Anand Rajadhyaksha जी, Anand Kumar जी तथा भाई Gaurav Sharma जी की चुनिंदा बेहद उम्दा फेसबुक पोस्ट्स को (उनकी अनुमति से) अपने ब्लॉग पर कॉपी-पेस्ट किया.

आश्चर्यजनक रूप से इसके बाद मुझे ई-मेल पर बहुत ही उत्साहवर्धक फीड-बैक मिला है. बहुत से पुराने मित्रों, ऐसे मित्रों जो फेसबुक पर नहीं हैं, तथा वे लोग जो विस्तृत एवं गंभीर लेख पढ़ने के इच्छुक हैं उन सभी ने लिखा है कि हम भी लिखना चाहते हैं, और "हिन्दी में" कुछ अच्छा पढ़ना चाहते हैं.. क्या आप अपने ब्लॉग पर उसे स्थान देंगे?? आज होली के अवसर पर मैं अपने सभी मित्रों से आव्हान एवं अनुरोध करता हूँ कि "यदि वे चाहें तो" अपने लेख मुझे भेज सकते हैं. उनके नाम, उनकी फेसबुक लिंक आदि के साथ पूर्ण क्रेडिट देते हुए मैं उसे अपने ब्लॉग पर स्थान दे सकता हूँ.

इसके दो-तीन लाभ हैं :- १) जिन मित्रों का अभी तक खुद का ब्लॉग नहीं है, लेकिन फेसबुक पर भी वे लंबी-लंबी पोस्ट्स लिखते हैं, उन्हें मेरे ब्लॉग पर एक स्थायी ठिकाना मिल सकता है (फेसबुक पोस्ट की आयु अधिक नहीं होती). २) मेरे ब्लॉग की "साँसें" भी चलती रहेंगी... ३) जो लोग फेसबुक पर नहीं हैं, वे भी यहाँ की उम्दा पोस्ट्स से वंचित नहीं रहेंगे...

इसके अलावा ऐसा भी होता है कि अक्सर कई लोग जोश-जोश में अपना ब्लॉग तो बना लेते हैं, लेकिन नियमित लिख नहीं पाते, उन्हें भी मेरे ब्लॉग के रूप में एक प्लेटफार्म मिलेगा, जहाँ उन्हें अधिक पाठक मिल सकते हैं...

ज़ाहिर है कि भले ही ब्लॉग मेरा हो, लेखक के रूप में उनका नाम, आभार एवं कोई लिंक (यदि हो तो) दी ही जाएगी, एवं मेरी फेसबुक वाल से उस लेख को प्रचारित किया जाएगा ताकि अधिकाधिक लोगों तक वह पहुँचे...

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जो भी इच्छुक मित्र हों वे अपने लेख ujjaincyber@gmail.com पर अपने लेख भेज सकते हैं.

(इसमें एक बिंदु और जोड़ना चाहूँगा, कि कई मित्र मुझे कुछ सूचनाएँ भेजते हैं, शासकीय सेवा में होने के कारण वे अपना नाम ज़ाहिर नहीं करते, मैं भी उनकी गोपनीयता का पूरा सम्मान करता आया हूँ. यदि वे भी अपने विभाग से संबंधित कोई विस्फोटक लेख भेजना चाहें तो भेज सकते हैं, ज़ाहिर है कि सुरक्षा की खातिर, उस लेख में उनका नाम नहीं दिया जाएगा).

सभी मित्रों को होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ... ऐसे पावन अवसर पर इस नई पहल पर आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा...

Wednesday, March 4, 2015

Ban on Beef : Save Water and Cow

"बीफ" प्रतिबन्ध का समर्थन करें - गाय और पानी दोनों बचाएँ... 

(Anand kumar जी द्वारा लिखित एक तार्किक एवं तथ्यात्मक लेख.)
उनकी फेसबुक नोट से साभार लिया गया...

जब हम छोटे थे तो घर में चापाकल हुआ करता था, अब ये सिर्फ सरकारी ही देखने मेंआता है | जब घर में एक नया चापाकल लगवाने की बात हुई तो दादाजी सारे पुर्जे ख़रीदने निकले | करीब सात सौ रुपये का चापाकल था, और उसके साथ लगनी थी लम्बी सी पाइप |मिस्त्री ने 20 – 25 फ़ीट की पाइप के लिए कहा था, दादाजी ने ख़रीदा 40 फुट का पाइप | हम लोग रिक्शे से लौटने लगे तो दादाजी से पूछे बिना नहीं रहा गया, हमने सवाल दागा,क्या हमारे घर दो नए चापाकल लगेंगे | दादाजी ने समझाया, कुछ साल में पानी और नीचे चला जायेगा तब हमें दोबारा बोरिंग न करवानी पड़े इसलिए इतना लम्बा पाइप ख़रीदा है |

Water Table समझने लायक नहीं थे उस ज़माने में, लेकिन आज जब उसी इलाके में चापाकल लगाया जाता है तो करीब 100 फ़ीट का पाइप तो चाहिए ही चाहिए | वैसे तो वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट कहती है की भारत में पानी शायद 2020 तक ख़त्म हो जाए, लेकिन ये अतिशयोक्ति है, हाँ कमी होगी इसमें कोई शक़ नहीं है|

जहाँ हमारी आबादी तेज़ी से बढ़ रही है वहीँ ज़मीन के नीचे और सतह पर, दोनों जगह पानी घट रहा है | अगर आज ध्यान नहीं दिया गया तो थोड़े ही दिनों में ये एक विकराल समस्या होगी | पाकिस्तानी या चीनी आतंकी उठने लोगों को नहीं मार पायेंगे जितना पानी की कमी मार डालेगी |



एक समस्या हमारे खान पान का बदलना भी है

कुछ ही समय पहले हमने कई कलाकारों को देखा जो होली के त्यौहार पर तेज़ हमले कर रहे थे | सब सिखाने आ गए की हम लोग होली पर कितना पानी बर्बाद कर देते हैं | ये लोग ALS challenge में होने वाले पानी की बर्बादी पर भी भाषण देते थे | अच्छी बात है की आपका ध्यान पानी की बर्बादी पर गया, लेकिन “कहीं न कहीं, कहीं न कहीं” आप गलत तरीके से समस्या के निवारण की सोच रहे हैं बन्धु ! हमारे खान पान का बदलता तरीका इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार है |

एक किलो BEEF के लिए करीब 15400 लीटर पानी लगता है, अगर आलू उपजाना हो तो करीब 50 किलो आलू उपजा सकते हैं इतने पानी से | दुसरे शब्दों में कहा जाए तो एक दावत जिसमे पांच लोगों को BEEF परोस दिया गया हो, उस दावत के बदले आप जिन्दगी भर होली खेल सकते हैं | एक गाय को अपने जीवन काल में करीब दो मिलियन लीटर पानी की जरूरत होती है, जब जानवरों को मीट के लिए पाल पोस रहे हों तो हिसाब लगा लीजिये की कितना खर्चीला है ये |

1 किलो के लिए खर्च होने वाला पानी :
BEEF : 15400 लीटर
मटन : 6400 लीटर
चिकन : 4300 लीटर
चावल : 1400 लीटर
आलू : 290 लीटर

(इसके अलावा BEEF में कहीं ज्यादा कार्बन खर्च हो जाता है, भविष्य में इस से एनर्जी resources पर भी असर पड़ेगा, कार्बन फुटप्रिंट जुमला शायद सुना हो !)



खेती में पानी का बेतरतीब इस्तेमाल

दुसरे कई विकासशील देशों की तरह (खास तौर पर जहाँ पानी की कमी है, जैसे चीन), भारत में सतह से नीचे के पानी पर कानूनी बंदिशें कम हैं, लगभग ना के बराबर | कोई भी पानी निकाल सकता है, बोरिंग करने या कुआं खुदवाने पर कोई रोक टोक नहीं होती | इनके लिए सरकार को कोई टैक्स भी नहीं देना होता इसलिए पानी बचाने या उसके दोबारा इस्तेमाल की कोई कोशिश भी नहीं की जाती | सतह के नीचे से पानी निकाल कर सबसे ज्यादा खेती के लिए खर्च किया जाता है, मुफ्त बिजली और सब्सिडी वाले पम्पिंग सेट की वजह से कई इलाकों का वाटर टेबल लगातार नीचे जा रहा है | लेकिन किसान काफ़ी ताकतवर वोटिंग ब्लाक हैं इसलिए कोई सरकार उन्हें नाराज़ नहीं करना चाहती | थोड़े ही दिनों में पानी सतह से इतना नीचे जा चुका होगा की आफत किसान के लिए भी होगी और खेती ना करने वालों के लिए भी |



तो अब करें क्या ?

1.      खाने के बेहतर विकल्प इस्तेमाल करें
जैसा की देख चुके हैं की BEEF के मुकाबले मटन और चिकन काफी कम पानी इस्तेमाल करता है | सीधा शाकाहारी तो आप होंगे नहीं, कम से कम BEEF के बदले मुर्गा खाना तो शुरू कर ही सकते हैं | सही खान पान शुरू करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ज्यादातर पानी भोजन के उत्पादन में ही ख़र्च होता है | टीवी पर अपने खाने में पनीर के बदले टोफू, BEEF के बदले चिकन, और चावल खाने की सलाह देने वाला खानसामा देश सेवा ही कर रहा है, चाहे आप मानें या न मानें |

2.      कम पानी खर्च करने वाले बीज
देश भर में कृषि अनुसन्धान केंद्र हैं, ऐसे बीज बनाये जा सकते हैं जिनमे पानी का खर्च कम से कम हो | यहाँ ज्यादातर सरकारी मदद की जरूरत होगी, इसके अलावा कृषि प्रयोगशालाओं में मिट्टी की जांच करके सबसे बेहतरीन फ़सल का चुनाव किया जा सकता है| इसके लिए किसानों को प्रोत्साहित करना पड़ेगा |

3.      सिंचाई के बेहतर तरीके
यहाँ भी सरकारी मदद की जरूरत होगी, लोगों को स्प्रिंकलर जैसे बेहतर सिंचाई के तरीके अगर सिखाये जाएँ तो खेती में खर्च होने वाला पानी काफी हद तक बचाया जा सकता है | चावल की खेती में अगर उन्नत तरीकों से सिंचाई की जाए तो पानी दो तिहाई तक बचाया जा सकता है |

4.      बारिश के पानी का संरक्षण
राजस्थान या फिर गुजरात के इलाकों में देखें तो पारंपरिक तरीकों से वर्षा का जल बचाया जाता रहा है | तालाब खुदवाना पूरे भारत में पुण्य का काम माना जाता है | अगर बारिश का हिसाब देखें तो हर भारतीय के लिए करीब चार मिलियन लीटर पानी बरसता है, मतलब जरूरत से करीब दस गुना ज्यादा ! अगर इसे बचाने पर ध्यान दिया जाए तो समस्या काफी हद तक सुलझ सकती है |

5.      Desalination के बेहतर तरीकों का इस्तेमाल
खारे पानी के शुद्धिकरण की सारी तकनीकों का इस्तेमाल करना शुरू करना होगा | कई इलाके जहाँ सतह के नीचे से आने वाला पानी पीने योग्य नहीं होता वहां पानी साफ़ करने के बेहतर तरीकों का इस्तेमाल शुरू करना होगा | ये ज्यादातर आदिवासी और पिछड़े इलाके हैं जहाँ ज्यादा काम करने की जरूरत पड़ेगी |



स्थाई, टिकाऊ पानी के लिए खान पान

कई बार sustainability की कक्षाओं में लोग भयावह ग्राफ और नंबर लेकर आते हैं | जब जल संरक्षण पर ऐसी वर्कशॉप में जाना होता है तो हमें बड़ा मज़ा आता है | हिन्दुओं ने इसके लिए एक बड़ा ही आसान तरीका निकाला था सदियों पहले | उन्होंने गाय को धर्म से जोड़ दिया, अब चाहे आप लाख मेहनत कर लें, हिन्दू आसानी से BEEF खाने के लिए तैयार नहीं होता, इस तरह लाखों लीटर पानी अपने आप ही बच जाता है | इतनी बड़ी आबादी में अगर लोग BEEF खाते तो क्या होता इसका अंदाजा लगाना है तो किस राज्य में कितने इसाई हैं उसका एक ग्राफ नीचे है एक नज़र देख लीजिये |

आहार बदलें कैसे ?

आहार बदलने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करने की जरूरत है | कानून अगर गौ हत्या के खिलाफ़ होगा तो BEEF मिलना ऐसे ही कम हो जायेगा ! मुश्किल से चोरी छिपे मिलने वाली चीज़ महंगी भी होगी, तो उसकी खरीदारी अपने आप कम हो जाएगी| थोड़ा सा जोर लगाकर अगर संजीव कपूर जैसे नामी कुक से अगर बढ़िया शाकाहारी, या टोफू या चिकन के आइटम कुछ दिन टीवी पर बनवाए जाएँ तो उस से भी प्रचार होगा ऐसे खाने का | अमरीकी सरकार भी लोगों को शाकाहारी बनाने के लिए बड़ी मेहनत करती है | 

मेरे ख़याल से तो अब समय आ गया है की हमारी सरकार भी कानून और मार्केटिंग को मिला के लोगों के आहार की आदतें बदले |

अब आप सोच रहे होंगे की ये पानी बचाने, खेती और मांस पर हमने ये बोरिंग सा लेख क्यों लिख डाला ? अब मेरा कारण तो लेख के अंतिम पैराग्राफ में होता है ! तो साहब ऐसा है की होली आ रही है और कोई न कोई “बुद्धिजीवी” हमें पानी बचाने की सलाह तो देगा ही | वैसे कई बुद्धिजीवी महाराष्ट्र सरकार के गौहत्या पर प्रतिबन्ध पर भी शोर मचा रहे हैं | कितना पानी बचेगा इस से ये उनकी बुद्धि में शायद इस लेख से चला जाए !

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