Thursday, December 31, 2015

Kejriwal and Rajinder Kumar Corruption Case

उल्टा चोर कोतवाल को डांटे... 

भारत में चोरों को लेकर तीन कहावतें मशहूर हैं, पहली “चोरी और सीनाजोरी”, अर्थात चोरी करने के बावजूद न सिर्फ बेख़ौफ़ रहना बल्कि दबंगई दिखाना... दूसरी कहावत है “चोर मचाए शोर” अर्थात जब चोर सार्वजनिक रूप से चोरी करता हुआ पकड़ा जाए तो वह भीड़ का ध्यान बँटाने के लिए शोर मचाने लगे, ताकि उसकी चोरी की तरफ कम लोगों का ध्यान जाए... और तीसरी कहावत है “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे” यानी जो व्यक्ति चोर हो, वह अपनी चोरी छिपाने के लिए पकड़ने वाले कोतवाल को ही डाँटने लगे... हाल ही में भारतीय राजनीति में ऐसी ही दो प्रमुख घटनाएँ घटित हुईं जहाँ उक्त कहावतें साक्षात चरितार्थ होती दिखाई दीं. पहली घटना है नेशनल हेराल्ड अखबार का मामला और दूसरी घटना है केजरीवाल के प्रमुख सचिव राजेन्दर कुमार के दफ्तर पर सीबीआई का छापा.

इन दोनों ही मामलों में देश ने तमाम तरह की नौटंकियाँ, धरने, प्रदर्शन और बयानबाजी देखी-सुनी और पढ़ी. सामान्य तौर पर आम जनता चैनलों पर अंग्रेजी में जारी बकबक को देखती नहीं है, देखती है तो गहराई से समझती नहीं है. इसलिए वास्तव में जनता को पता ही नहीं है कि नेशनल हेरल्ड मामला क्या है और राजिंदर कुमार पर छापों की वास्तविक वजह क्या है? जनता की इसी अज्ञानता का फायदा उठाकर काँग्रेस (यानी सोनिया-राहुल की जोड़ी) ने “पीड़ित-शोषित” कार्ड खेलने की कोशिश की तथा संसद को बंधक बना लिया. वहीं दूसरी तरफ दिल्ली के युगपुरुष केजरीवाल ने भी इस “पीड़ित-शोषित” गेम (जिसके वे शुरू से ही माहिर रहे हैं) को और विस्तार देते हुए अरुण जेटली को इसमें लपेट लिया, ताकि जनता के मन में उनके “क्रांतिकारी” होने का भ्रम बना रहे. दोनों मामलों के तथ्य एक के बाद एक सामने रखकर देखना ही उचित होगा कि काँग्रेस द्वारा लोकतंत्र को बंधक बनाने, न्यायपालिका के निर्णय पर राजनैतिक रोटियाँ सेंकने का जो खेल खेला गया वह कितना खोखला है. चूँकि काँग्रेस तो अब अपने अस्तित्त्व की लड़ाई लड़ रही है, चवालीस सांसदों के होते हुए भी उसमें अभी तक जिम्मेदार विपक्ष का कोई गुण नहीं आया है इसलिए काँग्रेस-सोनिया और नेशनल हेरल्ड की बात बाद में करेंगे... पहले हम देखते हैं कि “ट्वीटोपाध्याय, क्रान्तिकारीभूषण, स्वराज-प्रतिपादक, झाड़ूधारी, IIT-दीक्षित, सिनेमा रिव्यू लेखक, सलीम उर्फ योगेन्द्रमारक, 49 दिवसीय भगोड़े, निर्भया बलात्कारी प्रेमी, अर्थात युगपुरुष श्रीश्रीश्री अरविन्द केजरीवाल के मामले को...

जिस दिन सीबीआई ने दिल्ली में राजिंदर कुमार के दफ्तर पर छापा मारा, उस दिन केजरीवाल को कतई अंदाजा नहीं था कि कभी ऐसा भी हो सकता है. परन्तु सीबीआई अपने पूरे कानूनी दस्तावेजों के साथ आई और उसने “आप” सरकार के प्रमुख सचिव राजिंदर कुमार के यहाँ छापा मारा. ऐसा नहीं है कि उस दिन अकेले राजिंदर कुमार के दफ्तर पर छापा पड़ा हो, बल्कि सीबीआई 2002 से लेकर 2012 तक के बीच दिल्ली में हुए कई घोटालों की जाँच पहले से कर रही थी, इसलिए उस दिन नौ और बड़े अफसरों के यहाँ छापा मारा गया. परन्तु ईमानदारी की कसमें खाने वाले, भ्रष्टाचार निर्मूलन के वादे करने वाले राजा हरिश्चंद्र के अंतिम अवतार उर्फ अरविन्द केजरीवाल से यह सहन नहीं हुआ. उन्होंने बिना सीबीआई से कोई बातचीत किए, बिना अदालती कागज़ देखे, मामले की पड़ताल किए बिना ही सुबह दस बजे से ताबड़तोड़ ट्वीट के गोले दागने शुरू कर दिए. केजरीवाल क्रोध में इतने अंधे हो गए कि उन्होंने मुख्यमंत्री पद की गरिमा को किनारे रखते हुए दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुने हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “कायर” और “मनोरोगी” तक कह डाला (यही वह केजरीवाल थे, जो कुछ दिनों पहले भाजपा को “असहिष्णुता” के मुद्दे पर लेक्चर दे रहे थे). किसी को समझ नहीं आया कि आखिर केजरीवाल के इतना बिलबिलाने की वजह क्या थी. असल में सीबीआई के इस छापे ने केजरीवाल की “कथित ईमानदार” वाली छवि (जो उन्होंने अन्ना हजारे के साथ पहले साँठगाँठ करके, फिर उन्हीं की पीठ में छुरा घोंपकर बड़ी मुश्किल से रची है) को बुरी तरह तार-तार कर दिया. आगे बढ़ने से पहले हमें यह देखना होगा कि आखिर राजिंदर कुमार कौन हैं, और क्या चीज़ हैं? 


जनता को जितना पता है, वह यह है कि राजिंदर कुमार 1989 बैच के IAS अधिकारी हैं, सरकार में विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं. लेकिन CBI छापों से पहले यह बात कम लोग जानते थे कि राजिंदर कुमार IIT खडगपुर से पढ़े हुए हैं और केजरीवाल के खास दोस्तों में से एक हैं. लेकिन केजरीवाल के बिलबिलाने की एकमात्र वजह मित्रता नहीं, बल्कि उनकी “गढी हुई छवि” के ध्वस्त होने की चिंता है. बहरहाल, सीबीआई ने जो छापा मारा वह राजिंदर कुमार द्वारा 2007 से 2014 के बीच उनके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों को लेकर था. इस कालावधि के दौरान पहले पाँच ठेकों में साढ़े नौ करोड़ के भ्रष्टाचार की शिकायत सीबीआई को मिली थी. इन ठेकों में दिल्ली जल बोर्ड का 2.46 करोड़ का वह ठेका भी शामिल है, जिसे राजिंदर कुमार ने पहले शासकीय सार्वजनिक कम्पनी ICSIL कंपनी को दिया, लेकिन उस कम्पनी ने “रहस्यमयी” तरीके से यह ठेका फरवरी 2014 में एन्डेवर सिस्टम्स नामक कंपनी को दे दिया. यह वही समय था, जब केजरीवाल अपनी 49 दिनों की सरकार से भागने की तैयारी में थे और राजिंदर कुमार उनके सचिव थे. यह एन्डेवर सिस्टम्स नाम की कम्पनी 2006 में बनाई गई जिसके चार निदेशक थे योगेन्द्र दहिया, विकास कुमार, संदीप कुमार और दिनेश गुप्ता. आगे चलकर दहिया और विकास कुमार ने इस्तीफ़ा दे दिया और कम्पनी संदीप कुमार और दिनेश गुप्ता के पास 80% - 20% की भागीदारी में बनी रही. लेकिन इस भ्रष्टाचार की परतें उस समय खुलनी शुरू हुईं, जब दिल्ली संवाद आयोग के सदस्य एक अफसर आशीष जोशी ने दिल्ली पुलिस की भ्रष्टाचार निवारण शाखा में लिखित आवेदन दिया. दिल्ली पुलिस ने मामले की गंभीरता और उलझन को देखते हुए यह आवेदन सीबीआई को सौंप दिया. आशीष जोशी वही अधिकारी हैं जिन्हें दिल्ली सरकार ने काम के दौरान गुटखा खाने के “भयानकतम आरोप” के तहत निकाल बाहर किया था. जबकि उन्हें निकालने की असल वजह यह थी कि आशीष जोशी, दिल्ली संवाद आयोग के उपाध्यक्ष आशीष खेतान की मनमानी और ऊटपटांग निर्णयों के सामने झुकने को तैयार नहीं थे और इसे लेकर खेतान से एक बार उनकी तीखी झड़प भी हुई थी. चूँकि आशीष खेतान, केजरीवाल के खासुलखास हैं इसलिए ईमानदार अफसर आशीष जोशी को हटाने के लिए “गुटखे” का बहाना खोजा गया. सीबीआई ने मामले की तहकीकात की और आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी के आरोपों पर राजिंदर कुमार, संदीप कुमार व दिनेश गुप्ता पर मामला दर्ज कर लिया. सीबीआई द्वारा दर्ज रिपोर्ट में ICSIL के एमडी एके दुग्गल, जीके नंदा और आरएस कौशिक के नाम भी शामिल हैं.

जाँच आगे बढ़ी तो पता चला कि ICSIL ने अपनी साख के चलते कई सरकारी ठेके हासिल किए, लेकिन रहस्यमयी तरीके से उसने ये सारे ठेके सिर्फ और सिर्फ एंडेवर सिस्टम्स को ट्रांसफर कर दिए. सूत्रों के अनुसार जब राजिंदर कुमार दिल्ली सरकार में सचिव थे, तब उन्होंने ही इस कम्पनी एंडेवर सिस्टम्स को ज़ोरशोर से बड़ी रूचि लेकर आगे बढ़ाया. इसी को आधार बनाकर सीबीआई ने एंडेवर सिस्टम्स और राजिंदर कुमार के आपसी रिश्तों और रूचि को लेकर जाँच शुरू की और पाया कि जब राजिंदर कुमार स्कूली शिक्षा विभाग में सचिव रहे तब भी उन्होंने पाँच ठेके एन्डेवर सिस्टम्स कम्पनी को दिलवाए थे. जिसमें 2009 में बिना कोई टेंडर निकाले डाटा मैनेजमेंट सिस्टम का चालीस लाख का एक ठेका, फिर 2010 में स्वास्थ्य सचिव रहते हुए ICSIL के माध्यम से 2.43 करोड़ का एक ठेका, 2012 में टैक्स कमिश्नर के पद पर रहते हुए सॉफ्टवेयर विकास का 3.66 करोड़ का एक ठेका तथा 2013 में इसी कम्पनी को 45 लाख का एक और ठेका दिलवाने में राजिंदर कुमार की खासी रूचि रही. “खले रहस्य” की बात यह कि जब-जब और जहाँ-जहाँ राजिंदर कुमार पद पर रहे, उन सभी विभागों से एंडेवर सिस्टम्स को ही ठेके मिल जाते थे. राजिंदर कुमार के खिलाफ लगातार दबी ज़ुबान से शिकायतें मिलती रहती थीं, परन्तु केजरीवाल का वरदान उन पर होने के कारण कोई खुलकर कुछ नहीं बोलता था. 2009 से 2014 के बीच ऊर्जा, रियल एस्टेट, कोचिंग, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट इत्यादि के नाम पर धीरे-धीरे कई कम्पनियाँ खड़ी की गईं. इन सभी कंपनियों के मालिकों का पता एक जैसा था और इन कंपनियों के निदेशक भी एक जैसे ही थे, और जाँच में पाया गया कि अधिकाँश निदेशकों के नाते-रिश्ते राजिंदर कुमार के साथ जुड़े हुए थे. तो ऐसे “उम्दा कारीगर” यानी राजेंदर कुमार, अरविन्द केजरीवाल के खास चहेते अफसर थे.


ऐसे “कर्मठ”(??) अफसर के साथ ईमानदारी की प्रतिमूर्ति बने बैठे केजरीवाल का मधुर सम्बन्ध इतना अधिक मधुर था कि विश्वव्यापी भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाली अन्तर्राष्ट्रीय संस्था “ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल” ने जब केजरीवाल को बाकायदा लिखित में यह बताया कि राजेंदर कुमार एक दागी अफसर हैं और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं, तो केजरीवाल ने राजिंदर कुमार को हटाना तो दूर, इस पत्र का कोई जवाब तक नहीं दिया. और जब ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने इस पत्र की प्रति उप-राज्यपाल नजीब जंग को भेजकर उनसे कार्रवाई की माँग की तो केजरीवाल ने इसे अपने अधिकारों में हस्तक्षेप बता दिया. कहने का तात्पर्य यह है कि केजरीवाल द्वारा प्रधानमंत्री के प्रति “कायर-मनोरोगी” जैसे शब्द उपयोग करना इसी बौखलाहट का नतीजा है कि मेरे परम मित्र को सीबीआई ने हाथ कैसे लगाया? जबकि राजिंदर कुमार की (कु)ख्याति रही है कि वे जिस विभाग में भी पदस्थ हुए, वहीं उन्होंने नए विवादों को जन्म दिया. फिर चाहे VAT कमिश्नर के रूप में उनके तुगलकी आदेश हों, अथवा ऊर्ज सचिव के रूप में निजी विद्युत कंपनियों को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर वित्तीय संस्थानों से ऋण हासिल करने की सलाह देना हो... अथवा ऊर्जा मंत्री सत्येन्द्र जैन से मिलीभगत करके तत्कालीन ऊर्जा सचिव शकुंतला गैम्लिन को धमकाने का मामला हो... सभी जगह राजिंदर कुमार की टांग फँसी हुई दिखाई देती है, लेकिन केजरीवाल ऐसे अधिकारी को बेगुनाह साबित करने के लिए कभी सीबीआई, कभी अरुण जेटली तो कभी प्रधानमंत्री को कोसने में लगे हुए हैं, जबकि सीबीआई ने न्यायालय की अनुमति से छापा मारा था. होना तो यह चाहिए था कि केजरीवाल खुद आगे बढ़कर यह कहते कि चूँकि मैंने अपनी “क्रान्ति” भ्रष्टाचार के खिलाफ ही की है, इसलिए मैं जाँच में पूर्ण सहयोग करूँगा. लेकिन ऐसा कहते ही केजरीवाल खुद अपने ही चक्रव्यूह में घिर जाते कि जब छह माह पहले ही उन्हें बताया जा चुका था कि राजिंदर कुमार के खिलाफ पिछले कई मामलों में जाँच हो रही है तथा “ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल” भी उन्हें चेतावनी दे चुका है फिर भी उन्होंने ऐसे अफसर को अपना प्रमुख सचिव क्यों नियुक्त किया? अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि केजरीवाल अपनी छवि के मोह में ऐसे फँसे हुए हैं कि वे खुद को ऐसे “मिडास” समझने लगे हैं कि वे जिस व्यक्ति को छू दें, वह ईमानदार माना जाएगा. और बिना किसी सबूत के सिर्फ प्रेस कांफ्रेंस में जिस पर आरोप मढ़ देंगे वह दोषी माना जाएगा. दिल्ली विधानसभा चुनावों से पहले शीला दीक्षित के खिलाफ 370 पृष्ठों का सबूत होने का दावा केजरीवाल ने किया था, परन्तु अभी तक शीला के खिलाफ कोई मुकदमा दायर होना तो दूर, दिल्ली सरकार ने उन्हें क्लीन चिट तक दे दी है.  

असल में केजरीवाल की दूसरी चिंता सिर पर खड़े पंजाब चुनाव भी हैं. चूँकि केजरीवाल की महत्त्वाकांक्षा सिर्फ दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने की नहीं है, उनके लक्ष्य ऊँचे हैं. इसीलिए उन्होंने दिल्ली में खुद के पास कोई विभाग नहीं रखा है, वे देश के अकेले मुख्यमंत्री हैं जिनके पास कोई काम नहीं है, सिवाय दूसरों के फटे में टांग अडाने के. चूँकि कोई काम नहीं है, इसलिए वे कभी गुजरात जाकर भ्रष्टाचार खोजते हैं तो कभी बनारस जाकर चुनाव लड़ते हैं तो कभी फिल्मों के रिव्यू लिखते रहते हैं. यहाँ तक कि बिहार जाकर लालू जैसे “घोषित एवं साक्षात भ्रष्टाचार” से गले मिलने में भी केजरीवाल को कतई शर्म महसूस नहीं होती, परन्तु केजरीवाल के पास नौटंकी करने, चिल्लाचोट करने, तमाशा और हंगामा करने का तथा मीडिया का ध्यान आकर्षित करने जो “गुण” मौजूद है, उसके कारण हमेशा वे खुद को पीड़ित-शोषित और ईमानदारी के एकमात्र जीवित मसीहा के रूप में पेश करते आए हैं. परन्तु उन्होंने सोचा भी नहीं था कि ऐन उनकी नाक के नीचे बैठे मुख्य सचिव पर सीबीआई हाथ डाल देगी. सूत्रों के अनुसार सीबीआई को राजिंदर कुमार के दफ्तर से “आआपा” सरकार के दो अन्य मंत्रियों के खिलाफ भी कुछ तगड़े सबूत हाथ लगे हैं, और इसी बात ने अरविन्द केजरीवाल को अंदर तक हिला दिया है और इस कारण उस दिन वे अंट-शंट ट्वीट करने लगे. पंजाब के चुनावों में केजरीवाल के पास “खुद के हस्ताक्षरित” ईमानदारी सर्टिफिकेट के अलावा और कोई सकारात्मक बात नहीं है. चूँकि पंजाब की जनता अकालियों के भ्रष्टाचार, भाजपा के निकम्मेपन और नशीले पदार्थों के रूप में फैले सामाजिक कोढ़ से बुरी तरह त्रस्त हो चुकी है. इसलिए वहाँ आम आदमी पार्टी के बहुत उजले अवसर हैं. ऐसे में केजरीवाल यह जानते हैं कि दिल्ली में सीबीआई का यह छापा, राजिंदर कुमार की भ्रष्ट छवि तथा नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभद्र भाषा उन्हें ख़ासा नुक्सान पहुँचा सकती है. इसीलिए मामले को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए उन्होंने सदा की तरह हंगामे, आरोपों और प्रेस कांफ्रेंस को अपना हथियार बनाया है. यह कितना काम करेगा, अभी से कहना मुश्किल है, परन्तु वे जानते हैं कि पंजाब के आगामी विधानसभा चुनावों में यदि एक शक्ति के रूप में उभरना है तो उन्हें जल्दी से जल्दी इस प्रकरण में अपने हाथ साफ़ करने होंगे. इसलिए देशवासी आगामी कुछ माह तक नित नई नौटंकियाँ झेलने को अभिशप्त है.  

खैर यह तो हुई “चोर मचाए शोर” एपिसोड की पहली कथा... अब देखेंगे इसी सीरीज की दूसरी कथा अर्थात “उल्टा चोर, कोतवाल को डांटे” टाईप नेशनल हेरल्ड और सोनिया-राहुल गाँधी का मामला. जो कि इस लेख के अगले भाग में जारी रहेगी... तब तक, जय झाड़ू, जय चन्दा, जय (बे)ईमानदारी...

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