Thursday, September 25, 2014

Hats Off to Patriotic Young Scientist PV Arun

देशभक्त युवा वैज्ञानिक पीवी अरुण को सलाम

जब भारत के अधिकाँश कूल ड्यूड युवा अमेरिका में अच्छी नौकरी, स्थायी वीज़ा और नागरिकता की आस लगाए रहते हैं, ऐसे समय पर केरल के इस युवा ने एक नई मिसाल कायम की है. अमेरिका की प्रतिष्ठित स्पेस एजेंसी NASA को भी इस युवा के जज्बे को देखते हुए अपने नियम शिथिल करने पड़े. जी हाँ, बात हो रही है, केरल के पीवी अरुण की.

भोपाल की NIIT संस्थान MANIT से बीटेक की डिग्री लेने के बाद, अरुण ने छात्रवृत्ति द्वारा अमेरिका की नंबर एक यूनिवर्सिटी मैसाचुएट्स इंजीनियरिंग से अपनी पी.एचडी. पूरी की. उनकी अपार प्रतिभा और बुद्धि को देखते हुए NASA के अधिकारियों ने अरुण को स्थाई नौकरी, मोटी तनख्वाह और आवास आदि की पेशकश की. परन्तु जैसा कि नासाका नियम है, वहाँ पर स्थायी नौकरी हेतु व्यक्ति को अपनी वर्तमान नागरिकता छोड़कर अमेरिका की नागरिकता लेना जरूरी है, यह पता चलते ही पीवी अरुण ने नासा के सामने यह शर्त रख दी कि वे अपनी भारतीय नागरिकता नहीं छोड़ेंगे, यदि नासा को मंजूर हो तो ठीक वर्ना वे पी.एचडी. के बाद का अपना शोध भारत में ही करेंगे. बहरहाल, प्रतिभाशाली वैज्ञानिक को नासा खोना नहीं चाहती थी, इसलिए इतिहास में पहली बार नासा ने राष्ट्रपति की विशेष अनुमति से अपने नियमों में ढील दी और अरुण को NASA में शोध एवं उसकी मर्जी होने तक नौकरी जारी रखने की अनुमति दी है.
अब पीवी अरुण नासा के रिमोट सेंसिंग द्वारा ब्रह्माण्ड में अलौकिक जीवन की खोज नामक नए शोध कार्यक्रम का हिस्सा होंगे. यहाँ पर पीवी अरुण को स्वयं का एक अलग वर्क स्टेशन प्रदान किया जाएगा, तथा उनके काम में कोई भी अधिकारी हस्तक्षेप नहीं कर सकेगा. अखबारों से बात करते हुए अरुण ने बताया कि उन्हें बचपन से ही कंप्यूटर साईंस में रूचि थी. भोपाल की MANIT से पास-आउट होने के बाद उन्होंने इन्फोसिस, IBM जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों की आकर्षक पॅकेज वाली नौकरी ठुकरा दी थी. उनका सपना अंतरिक्ष विज्ञान में कुछ विशेष करने का था. ऐसे में उनके परिवार ने भी उनका पूरा साथ दिया और उन्हें आगे की पढ़ाई हेतु अमेरिका की MIT में डॉक्टरेट के लिए भेजा. अरुण आगे बताते हैं कि उन्हें कृत्रिम बुद्धि जैसे नए क्षेत्र में अनुसंधान करने की तीव्र इच्छा थी, वे आईटी कंपनियों के बंधे-बँधाए मार्ग और बोरिंग नौकरी पर चलना नहीं चाहते थे.

पीवी अरुण का उत्साह सभी परिजनों तथा शिक्षकों ने बढ़ाया. इसके अलावा अरुण के आदर्श डॉ अब्दुल कलाम ने भी उसकी हौसला-अफज़ाई की. एमटेक करने के दौरान पूर्व इसरो अध्यक्ष वैज्ञानिक डॉ अब्दुल कलाम से अक्सर उसने अपने कई प्रोजेक्ट्स पर चर्चा की. इस प्रतिभाशाली युवा का कहना है कि विज्ञान सरलतम होना चाहिए, ताकि सामान्य व्यक्ति भी इसमें रस ले सके. जब मैं नासामें ख़ासा अनुभव हासिल कर लूँगा, तब भारत वापस लौटकर इसरो में काम करना पसंद करूँगा. अरुण के अनुसार जिस प्रकार सबसे कम खर्च में भारत ने मंगल यान सफलतापूर्वक लॉन्च किया है, स्पष्ट है कि अगले सात-आठ वर्ष में भारत का ISRO विश्व विज्ञान शक्ति का एक केन्द्र होगा.
पीवी अरुण की इस देशभक्ति को नासा ने स्वीकार किया और उसके साथ निर्धारित अवधि का अनुबंध किया और यह सुविधा भी दी कि वे जब चाहें तब भारत लौट सकते हैं. जानी-मानी कम्प्यूटर वैज्ञानिक डॉ बारबरा लिस्कोव ने अरुण की इस भावना के बारे गृहमंत्री राजनाथ सिंह को बताया तो उन्होंने तत्काल इसकी सूचना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दी. मोदी ने अरुण को दस मिनट भेंट करने हेतु समय देकर प्रधानमंत्री निवास पर आमंत्रित किया, लेकिन यह मुलाक़ात आधे घंटे से भी अधिक चली. नरेंद्र मोदी ने पीवी अरुण को उनके उज्जवल भविष्य हेतु शुभकामनाएँ प्रदान कीं और कहा कि ISRO के दरवाजे उनके लिए सदैव खुले हुए हैं...

ऐसे देशभक्त को मेरा सलाम... 

Wednesday, September 24, 2014

Fate of Sanskrit and Sanskrit University

देवभाषा  संस्कृत  के पतन का कारण और नौकरशाही का रवैया...


संस्कृत को देवभाषा कहा जाता है. और इसे यह दर्जा यूँ ही किसी के कहने भर से नहीं मिल गया है, बल्कि भारतीय संस्कृति, आध्यात्म, वास्तुकला से लेकर तमाम धार्मिक आख्यान संस्कृत में रचे-लिखे और गत कई शताब्दियों से पढ़े गए हैं, मनन किए गए हैं. आज़ादी के समय से ही संस्कृत को पीछे धकेलकर अंग्रेजी को बढ़ाने की साज़िश प्रगतिशीलता और सेकुलरिज़्म के नाम पर होती आई है. कुतर्कियों का तर्क है कि यह भाषा ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देती है तथा यह सिर्फ आर्यों की भाषा है. ये बात और है कि संस्कृत भाषा में उपलब्ध ज्ञान को चीन से आए हुए विद्वानों ने भी पहचाना और जर्मनी के मैक्समुलर ने भी. इसीलिए तत्कालीन नालन्दा और तक्षशिला के विराट पुस्तकालयों से संस्कृत भाषा के कई महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ चीनी यात्री घोड़ों पर लादकर चीन ले गए और उनका मंदारिन भाषा में अनुवाद किया. अधिक दूर जाने जरूरत नहीं है, 1940 तक जर्मनी सहित कई यूरोपीय देशों के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में एक संस्कृत विभाग अवश्य होता था, आज भी कई विश्वविद्यालयों में है. कथित प्रगतिशीलों के कुतर्क को भोथरा करने के लिए एक तथ्य ही पर्याप्त है कि जब भारत के संविधान की रचना हो रही थे, उस समय सिर्फ दो लोगों ने संस्कृत को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता देने का प्रस्ताव रखा था, और वे थे डॉ भीमराव अम्बेडकर तथा ताजुद्दीन अहमद, हालाँकि बाद में इस प्रस्ताव को नेहरू जी ने अज्ञात कारणों से खारिज करवा दिया था.

संक्षेप में की गई इस प्रस्तावना का अर्थ सिर्फ इतना है कि जिस भाषा का लोहा समूचा विश्व आज भी मानता है, उसी देवभाषा संस्कृत को बर्बाद करने और उसकी शिक्षा को उच्च स्थान दिलाने के लिए हमारी सरकारें कितनी गंभीर हैं यह इसी बात से स्पष्ट है कि भारत देश में संस्कृत भाषा के उत्थान एवं शिक्षण हेतु स्थापित केन्द्रीय अभिकरण एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार से सीधे सम्बद्ध, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान (वेबसाईटwww.sanskrit.nic.in) की स्थिति आज अत्यन्त दयनीय एवं करुणापूर्ण है.


हिन्दी की एक लोकोक्ति "आगे नाथ न पीछे पगहा" यहाँ पूर्णतः चरितार्थ हो रही है | विश्व के सबसे बडे संस्कृत विश्वविद्यालय के रूप में प्रतिष्ठित, इस विश्वविद्यालय में न ही कोई स्थायी कुलपति है, और न ही समग्र रूप से स्थायी प्राध्यापक हैं|  इसके बावजूद इस संस्थान के छात्र छात्रायें बडी ही विनम्रता, सरलता, धीरता, के साथ कोई आपत्ति उठाये बिना यहाँ अध्ययन कर रहे हैं| क्या भारत में संस्कृत भाषा का एक भी योग्य विद्वान नहीं है,  जिसे इस राष्ट्रीय स्तर के संस्कृत संस्थान का कुलपति बनाया जा सके? जब संस्कृत की ऐसी प्रमुख संस्था का ये हाल है, तो सोचिये संस्कृत की अन्य छोटी छोटी संस्थाओं की क्या हालत होगी?



इस सन्दर्भ में मुझे एक बात यह समझ नहीं आती, कि संस्कृत के बडे बडे प्रकाण्ड पण्डित इस विषय में मौन क्यों हैं ? क्या राष्ट्रपति पुरस्कार, बादरायण पुरस्कार, कालिदास पुरस्कार, व्यास पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, इत्यादि पुरस्कारों को प्राप्त करने के बाद इन प्रकाण्ड पण्डितों का संस्कृत के प्रति कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता? ये विद्वान अपनी आवाज़ बुलंद क्यों नहीं करते? 



प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा हिन्दी को बढ़ावा देने तथा भारतीय संस्कृति के प्रति उनके रुझान को देखते हुए आशा बंधी थी, कि शायद इस मामले में कुछ विशिष्ट प्रगति हो, लेकिन वर्तमान सरकार भी आडम्बर में व्यस्त है| संस्कृत भाषा के विकास का दिखावा करने के लिए वह लाखों रुपयों के भव्य आयोजन कर सकती है, संस्कृत सप्ताह तो मना सकती है, नालन्दा और तक्षशिला को पुनर्जीवित करने के नाम पर करोड़ों रूपए अनुदान तत्काल दिया जा सकता हैपरन्तु  संस्कृत के अध्यापकों को देने के लिए इस सरकार के पास रुपयों का नितान्त अभाव है
ऐसा कैसे? क्या नौकरशाही अभी भी इतनी मजबूत है कि वह अपनी मनमर्जी चला सके?

राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के अलावा अन्य संस्कृत विश्वविद्यालयों की भी लगभग यही स्थिति है. इस सूची में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठसम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय आदि. संस्कृत के अधिकांश संस्थानों में ऐसे-ऐसे लोग काबिज हैं, जिनका संस्कृत से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है. जिस समय श्री राधावल्लभ त्रिपाठी यहाँ कुलपति थे तब यह संस्थान नई ऊँचाई को छू रहा था, किन्तु अब धीरे-धीरे दुरावस्था की तरफ बढ़ रहा है. संस्कृत जगत के सभी दिग्गज मूक होकर संस्कृत के पतन का तमाशा देख रहे है। नाम न छापने की शर्त पर एक तदर्थ शिक्षक कहते हैंराष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में विगत सात वर्षो से अपनी सेवाएँ देने के बाद भी यदि हमे अपने भविष्य को लेकर चिंतित होना पड़ेगा तो में यही कहूँगा कि संस्कृत पढने और संस्कृत संस्थानों में पढ़ाने का कोई लाभ नहीं है... अपील करता हूँ सभी संस्कृत के विद्यार्थियों से की वे संस्कृत पढना छोड कर कोई और विषय पढ़ें.. ऐसे तमाम शिक्षकों का कोई रखवाला नही है। कई शिक्षक दस-दस साल से संस्थान में कार्यरत हैं और सेवा दे रहे हैं, परन्तु महीने का तदर्थ टेम्पररी कॉन्ट्रेक्ट देकर व मनमाने इंटरव्यू ले लेकर नियुक्तियाँ होती है. सत्र प्रारंभ होने के दो-दो माह तक शिक्षक की नियुक्तियां नहीं,  कर्मचारियों का भविष्य अधर में है। इसके अलावा एक नया तुगलकी फरमान जारी किया है की केवल सेवानिवृत्त रिटायर्ड लोगों की नियुक्ति ही की जाए, क्योंकि शायद सेवानिवृत्त शिक्षक अपनी पुनर्नियुक्ति को बोनस ही मानता है और प्रबंधन अथवा प्रशासन के खिलाफ कोई शिकायत नहीं करता. लेकिन उन युवा शिक्षकों अथवा अधेड़ आयु के कर्मचारियों का क्या, जिनके सामने अभी पूरा जीवन पड़ा है?

एक और मजेदार बात... सारी दुनिया कंप्यूटर युग में है. कई शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि संस्कृत भाषा कंप्यूटर प्रोग्रामिंग तथा एप्लीकेशंस के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. लेकिन यहाँ आलम यह है कि संस्कृत विषयों के साथ हमेशा से ही पढाये जा रहे कंप्यूटर विषय जिसकी आधुनिक तकनीकी युग में सभी छात्रों के लिए नितांत आवश्यकता है, संस्कृत संरक्षण व सह-शैक्षणिक गतिविधियों में कंप्यूटर शिक्षकों तथा कर्मचारियों का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है,  NAAC तथा UGC की निरीक्षण समिति ने भी जहाँ आधुनिक विषयों में कंप्यूटर को सर्वाधिक महत्वपूर्ण बताया था वहीं विद्वान रजिस्ट्रार महोदय द्वारा कंप्यूटर विषय को पूर्णतः समाप्त करके संस्कृत क्षेत्र को नुकसान पहुंचाने का अदभुत षडयंत्र किया है।

एक विडंबना देखिये कि जहाँ एक तरफ हम संस्कृत को बचाने और बढ़ाने के लिए झगड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरान के दिल्ली स्थित सांस्कृतिक केन्द्र के बाहर ईरान की तरफ से संस्कृत में बैनर लगाया जाता है... 


मानव संसाधन विकास मन्त्रालयभारत सरकार के अधीन राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान (मानित विश्वविद्यालय) जिसकी कुलाध्यक्ष (प्रेसिडेंट) मानव संसाधन विकास मंत्री माननीय श्रीमती स्मृति जुबिन ईरानी हैं विश्व में संस्कृत शिक्षण का सर्वाधिक बड़ा विश्वविद्यालय है भारत में इसके 10 परिसर हैं तथा अनेकों आदर्श संस्कृत महाविद्यालय इस विश्वविद्यालय के अंतर्गत चलते हैंवर्तमान में यह सरकार की अनदेखी व दुर्नीतियों के कारण अनेकों परेशानियों से जूझ रहा है.

इस विश्वविद्यालय की चंद प्रमुख समस्याएँ संक्षेप में निम्नलिखित हैं -

1. विश्व के सबसे बड़े संस्कृत विश्वविद्यालय के रूप में प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जो कि NAAC एवं UGC से ‘A’ श्रेणी प्राप्त है में समग्र रूप से स्थाई प्राध्यापकों की भारी कमी हैऔर तो और लगभग एक वर्ष से स्थाई कुलपति की नियुक्ति भी नहीं हुई है|

2. कुलपति की अनुपस्थिति में संस्थान के फैसले रजिस्ट्रार के द्वारा लिए जा रहे हैं जबकि वर्तमान रजिस्ट्रार (कुलसचिव) का संस्कृत जगत से दूर दूर तक कभी कोई सम्बन्ध नहीं रहा हैयह इसी तरह है की कोई पराया आदमी आकर किसी के घर के फैसले करने लगे|

3. संस्कृत के संरक्षण एवं प्रचार हेतु पहले से ही चल रहे कई प्रोजेक्ट तथा अनुसन्धान कार्य बिना किसी कारण के अचानक ही बंद करा दिए गये हैं जिससे संस्कृत संरक्षण कार्यों की क्षति हुई है व इनसे जुड़े कितने ही कर्मचारियों की नौकरियां ख़त्म हो गयी हैं |

4. प्रबल व प्रामाणिक साक्षात्कारों में एक से अधिक बार उत्तीर्ण हो कर एवं यू.जी.सी. की सम्पूर्ण योग्यताओं के साथ आठ से बारह वर्षों से संस्थान को अपनी उत्कृष्ट सेवाएँ दे रहे विभिन्न विषयों के संविदागत व अतिथि अध्यापकों की इस बार मात्र तीन महीने की ही नियुक्ति दी गई जो पूर्व में 11 महीने की दी जाती थीइसके साथ ही विगत कई वर्षों से ये शिक्षक अपने-अपने विषयों का अध्यापन एवं स्वकार्योंउत्तरदायित्वों का समुचित ढंग से निर्वहन कर रहे हैं । जिसकी पुष्टि प्रत्येक परिसर के उत्कृष्ट परीक्षा परिणामों से की जा सकती है।

5. 8 से 12 वर्षों का अनुभव रखने वाले इन अध्यापको का सत्र के मध्य में पुनः साक्षात्कार लिया जाएगा जिससे उनका भविष्य इतने वर्षों की उत्कृष्ट सेवा देने के बाद भी आशंकित है व घोर मानसिक तनाव झेल रहे हैं|

6. सत्र प्रारंभ होने के 2-2 महीनो बाद तक शिक्षकों की नियुक्ति न होने के कारण पढ़ाई का नुकसान झेल चुके छात्रों को फिर से पढ़ाई का नुकसान झेलना पड़ेगा क्योंकि शिक्षकों का महीनों का अनुबंध सत्र के बीच ही ख़त्म हो जाएगा|

7. रजिस्ट्रार (कुलसचिव) का यह आदेश अत्यंत हास्यास्पद और गंभीर था की संविदागत शिक्षक पदों पर सेवानिवृत्त लोगों की ही नियुक्ति की जाएज़ाहिर है कि यह बेरोजगारी को बढ़ावा देने वाला कदम है|

8. अनुबंध पर लगे शिक्षको में वेतन को लेकर भी भारी विसंगतियाँ हैंसमान योग्यताकार्य एवं समय होते हुए भी व पूर्व में जो सभी कर्मचारी समान वेतन पा रहे थे अब उनमें से कुछ को बहुत कम व कुछ को अधिक वेतन दिया जा रहा हैजहाँ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी हर क्षेत्र में तकनीकी शिक्षा के प्रबल हिमायती हैं वहीँ यहाँ तकनीकी कर्मचारियों के साथ पूर्णतः सौतेला व्यवहार किया जा रहा है|

देश के लाखों संस्कृत प्रेमियों तथा इस क्षेत्र से जुड़े विद्वानों की यह उम्मीद बेमानी नहीं है कि अब स्वयं माननीय मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी इस तरफ विशेष ध्यान देंगी, ताकि संस्कृत भाषा के साथ जैसा बर्ताव और जैसी उसकी अवस्था की जा रही है, उस पर न सिर्फ रोक लगे, बल्कि संस्कृत शिक्षण का प्राचीन वैभव पुनः स्थापित किया जा सके.

नोट :- सबसे अंत में सबसे विशेष –
इस विश्वविद्यालय के कुलसचिव के बारे में खास बात

डॉ. बिनोद कुमार सिंह कुलसचिव राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान नई दिल्ली - ये साहब 1992 से 1998 तक बंगलौर में सरकारी सेवा में रहे... इसी बीच 1995 में इन्होंने भोपाल के रवीन्द्र महाविद्यालय से नियमित छात्र के रूप में एलएलबी की परीक्षा पास की, तथा 1995 में ही राजस्थान के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय से पीएच.डी. (सामाजिक विज्ञान) की उपाधि प्राप्त की. स्थायी कुलपति के अभाव में संस्कृत से जुड़े मामलों पर सारे अधिकार गैर-संस्कृत वाले सज्जन के पास... आखिर क्यों? दूसरी बात यह कि ऐसा पता चला है कि सिंह साहब की डिग्रीयों के फर्जी होने का मामला भी अदालत में लम्बित है... बताया जाता है कि विश्वविद्यालय का लगभग समूचा स्टाफ इनकी कार्यशैली से नाराज चल रहा है. बहरहाल, यदि व्यक्तिवाद को थोड़ी देर दरकिनार भी कर दें, तब भी संस्कृत भाषा के साथ जैसा सौतेला व्यवहार फिलहाल चल रहा है, उसमें तत्काल प्रभाव से सुधार की आवश्यकता है...

Tuesday, September 23, 2014

Islamization and Conversion in Karnataka Police Station

पुलिस थाने के अंदर खुलेआम इस्लाम का प्रचार...


शुरू में एक सच्ची घटना जान लीजिए, ताकि आप आसानी से समाझ सकें कि “सेकुलरिज़्म” किस तरह से इस देश को तोड़ने और देशद्रोहियो की मदद कर रहा है. कुछ दिनों पहले की ही घटना है उत्तरप्रदेश के वाराणसी शहर से भगाकर लाई गई एक लड़की के बारे में उसके माता-पिता को जानकारी मिली कि वह कर्नाटक के मंगलोर शहर में है. यह जानकारी भी उन्हें तब मिली, जब उसे भगाकर लाने वाले अली मोहम्मद नामक आदमी ने उनसे फिरौती माँगना शुरू किया. लड़की के परिवार ने उसका पता लगाया और कर्नाटक के पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट लिखवाई. कर्नाटक पुलिस ने लड़की को बरामद किया और थाने में लाकर सभी के सामने उसे पुनः हिन्दू धर्म में शामिल करवाया. लेकिन जैसा कि हमेशा से होता आया है, तथाकथित सेकुलर मीडिया ने अपनी घृणित हताशा और मंदबुद्धि के चलते इस बात पर हंगामा खड़ा कर दिया कि पुलिस के संरक्षण में “सेकुलरिज़्म खतरे में है” (ठीक उसी प्रकार जैसे मस्जिदों से अक्सर नारा दिया जाता है, इस्लाम खतरे में है). इस सेकुलर मीडिया ने अपना दबाव इतना अधिक बढ़ाया कि सरकार को इस मामले में चार पुलिसकर्मियों को निलंबित करना पड़ा. ये तो सिर्फ एक घटना है, ऐसी कई घटनाएँ हो चुकी हैं, जहाँ पुलिस का मनोबल तोड़ने की सोची-समझी चालें चली जा रही हैं.

अब एक नया मामला सामने आया है, जिसमें पुलिस के जवानों का ही इस्लामीकरण शुरू किया जा रहा है. कर्नाटक में नवनिर्वाचित कांग्रेस सरकार की नाक के नीचे, धर्म परिवर्तन की कोशिशें खुलेआम शुरू हो चुकी हैं. ऐसी ही एक असंवैधानिक घटना को कर्नाटक के एक स्थानीय अखबार ने “लाईव” कैमरों पर पकड़ा. इस्लामिक गतिविधियों का बड़ा केन्द्र बन चुके कर्णाटक के मैंगलोर शहर में एक संगठित जेहादी गिरोह ने समाज, व्यवस्था और विशेषकर पुलिस सिस्टम को प्रदूषित करने का अभियान चलाया हुआ है, ताकि खाड़ी से मिलने वाले पैसों के जरिये भारत में भी उनकी देशद्रोही गतिविधियाँ चलती रहें.


प्रस्तुत चित्र उसी मीडिया वेबसाइट से लिए गए हैं. चित्र में दिखाई दे रहा शख्स है मोहम्मद ईशाक, जो स्वयं को हिन्दू धर्म से इस्लाम में धर्म परिवर्तित कहता है और अपना पूर्व नाम गिरीश बताता है. ये व्यक्ति अपनी मीठी-मीठी बातों से न सिर्फ सामाजिक संगठनों में बल्कि कुछ हिन्दू संगठनों में भी अपनी घुसपैठ बना चुका है. हिंदुओं के भोलेपन और उदारता का फायदा उठाते हुए, इसे जहाँ भी मौका मिलता है, ये कुरान बाँटने लगता है और धर्म प्रचार शुरू कर देता है. इशाक मोहम्मद “स्ट्रीट-दावाह” नामक संस्था की मैंगलोर शाखा का प्रमुख है. स्ट्रीट-दावाह नामक संस्था, सड़क पर आते-जाते राहगीरों को कुरआन बाँटने का कार्य करती है तथा सड़कों पर ही रहने वाले गरीबों और बच्चों को इस्लाम का ज्ञान देती है. पिछले कुछ माह में मोहम्मद ईशाक ने कर्नाटक के सैकड़ों थानों में दिनदहाड़े जाकर सभी के सामने इस्लाम का प्रचार किया, थाने में ऑन-ड्यूटी पुलिस अधिकारियों को कुरान और हदीस बाँटी. लेकिन हमारे तथाकथित सेकुलर मीडिया ने इस पर चूं भी नहीं की. अक्सर श्रीराम सेना और बजरंग दल को गरियाने वाले, रोटी और टोपी जैसे फालतू मुद्दों पर दिन-रात छाती पीटने वालों तथा संघ को कोसने वाले मीडिया में बैठे कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों को इसमें कोई आपत्ति नज़र नहीं आई.

तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और केरल के कई थानों में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी धर्म-परिवर्तित हो चुके हैं. हिन्दू जनजागृति समिति ने सबूतों के साथ ऐसे पुलिसकर्मियों की शिकायत की तो उन्हीं के कार्यकर्ताओं को फर्जी धाराओं में फंसाकर अंदर कर दिया गया. कथित मुख्यधारा का मीडिया लगातार ऐसे मुद्दों को छिपा जाता है, सोशल मीडिया पर गाहे-बगाहे ऐसे मुद्दों बाकायदा तस्वीरों सहित दिखाए जाते हैं. कर्नाटक सरकार को पुलिस थानों में ऐसे खुलेआम जारी धर्म प्रचार और कुरआन बाँटने की जाँच करनी चाहिए, तथा जो पुलिसकर्मी इसमें सहयोगी हैं उन्हें बर्खास्त किया जाना चाहिए.


सन्दर्भ :- http://www.covertwires.com/index.php/articles/the-islamization-of-karnataka-police-and-silence-of-vigilant-media#sthash.KLzrWb8l.12p8Wqc6.dpuf

Wednesday, September 10, 2014

Pizza

पिज्जा... 


पत्नी ने कहा - आज धोने के लिए ज्यादा कपड़े मत निकालना…

- क्यों?? उसने कहा..

- अपनी काम वाली बाई दो दिन नहीं आएगी…

- क्यों??

- गणपति के लिए अपने नाती से मिलने बेटी के यहाँ जा रही है, बोली थी…

- ठीक है, अधिक कपड़े नहीं निकालता…

- और हाँ!!! गणपति के लिए पाँच सौ रूपए दे दूँ उसे? त्यौहार का बोनस..

- क्यों? अभी दिवाली आ ही रही है, तब दे देंगे…

- अरे नहीं बाबा!! गरीब है बेचारी, बेटी-नाती के यहाँ जा रही है, तो उसे भी अच्छा लगेगा… और इस महँगाई के दौर में उसकी पगार से त्यौहार कैसे मनाएगी बेचारी!!

- तुम भी ना… जरूरत से ज्यादा ही भावुक हो जाती हो…

- अरे नहीं… चिंता मत करो… मैं आज का पिज्जा खाने का कार्यक्रम रद्द कर देती हूँ… खामख्वाह पाँच सौ रूपए उड़ जाएँगे, बासी पाव के उन आठ टुकड़ों के पीछे…

- वा, वा… क्या कहने!! हमारे मुँह से पिज्जा छीनकर बाई की थाली में??



तीन दिन बाद… पोंछा लगाती हुई कामवाली बाई से पति ने पूछा...

- क्या बाई?, कैसी रही छुट्टी?

- बहुत बढ़िया हुई साहब… दीदी ने पाँच सौ रूपए दिए थे ना.. त्यौहार का बोनस..

- तो जा आई बेटी के यहाँ…मिल ली अपने नाती से…?

- हाँ साब… मजा आया, दो दिन में ५०० रूपए खर्च कर दिए…

- अच्छा!! मतलब क्या किया ५०० रूपए का??

- नाती के लिए १५० रूपए का शर्ट, ४० रूपए की गुड़िया, बेटी को ५० रूपए के पेढे लिए, ५० रूपए के पेढे मंदिर में प्रसाद चढ़ाया, ६० रूपए किराए के लग गए.. २५ रूपए की चूड़ियाँ बेटी के लिए और जमाई के लिए ५० रूपए का बेल्ट लिया अच्छा सा… बचे हुए ७५ रूपए नाती को दे दिए कॉपी-पेन्सिल खरीदने के लिए… झाड़ू-पोंछा करते हुए पूरा हिसाब उसकी ज़बान पर रटा हुआ था…

- ५०० रूपए में इतना कुछ??? वह आश्चर्य से मन ही मन विचार करने लगा...

उसकी आँखों के सामने आठ टुकड़े किया हुआ बड़ा सा पिज्ज़ा घूमने लगा, एक-एक टुकड़ा उसके दिमाग में हथौड़ा मारने लगा… अपने एक पिज्जा के खर्च की तुलना वह कामवाली बाई के त्यौहारी खर्च से करने लगा… पहला टुकड़ा बच्चे की ड्रेस का, दूसरा टुकड़ा पेढे का, तीसरा टुकड़ा मंदिर का प्रसाद, चौथा किराए का, पाँचवाँ गुड़िया का, छठवां टुकड़ा चूडियों का, सातवाँ जमाई के बेल्ट का और आठवाँ टुकड़ा बच्चे की कॉपी-पेन्सिल का..

आज तक उसने हमेशा पिज्जा की एक ही बाजू देखी थी, कभी पलटाकर नहीं देखा था कि पिज्जा पीछे से कैसा दिखता है… लेकिन आज कामवाली बाई ने उसे पिज्जा की दूसरी बाजू दिखा दी थी… पिज्जा के आठ टुकड़े उसे जीवन का अर्थ समझा गए थे… “जीवन के लिए खर्च” या “खर्च के लिए जीवन” का नवीन अर्थ एक झटके में उसे समझ आ गया…