Wednesday, September 10, 2014

Pizza

पिज्जा... 


पत्नी ने कहा - आज धोने के लिए ज्यादा कपड़े मत निकालना…

- क्यों?? उसने कहा..

- अपनी काम वाली बाई दो दिन नहीं आएगी…

- क्यों??

- गणपति के लिए अपने नाती से मिलने बेटी के यहाँ जा रही है, बोली थी…

- ठीक है, अधिक कपड़े नहीं निकालता…

- और हाँ!!! गणपति के लिए पाँच सौ रूपए दे दूँ उसे? त्यौहार का बोनस..

- क्यों? अभी दिवाली आ ही रही है, तब दे देंगे…

- अरे नहीं बाबा!! गरीब है बेचारी, बेटी-नाती के यहाँ जा रही है, तो उसे भी अच्छा लगेगा… और इस महँगाई के दौर में उसकी पगार से त्यौहार कैसे मनाएगी बेचारी!!

- तुम भी ना… जरूरत से ज्यादा ही भावुक हो जाती हो…

- अरे नहीं… चिंता मत करो… मैं आज का पिज्जा खाने का कार्यक्रम रद्द कर देती हूँ… खामख्वाह पाँच सौ रूपए उड़ जाएँगे, बासी पाव के उन आठ टुकड़ों के पीछे…

- वा, वा… क्या कहने!! हमारे मुँह से पिज्जा छीनकर बाई की थाली में??



तीन दिन बाद… पोंछा लगाती हुई कामवाली बाई से पति ने पूछा...

- क्या बाई?, कैसी रही छुट्टी?

- बहुत बढ़िया हुई साहब… दीदी ने पाँच सौ रूपए दिए थे ना.. त्यौहार का बोनस..

- तो जा आई बेटी के यहाँ…मिल ली अपने नाती से…?

- हाँ साब… मजा आया, दो दिन में ५०० रूपए खर्च कर दिए…

- अच्छा!! मतलब क्या किया ५०० रूपए का??

- नाती के लिए १५० रूपए का शर्ट, ४० रूपए की गुड़िया, बेटी को ५० रूपए के पेढे लिए, ५० रूपए के पेढे मंदिर में प्रसाद चढ़ाया, ६० रूपए किराए के लग गए.. २५ रूपए की चूड़ियाँ बेटी के लिए और जमाई के लिए ५० रूपए का बेल्ट लिया अच्छा सा… बचे हुए ७५ रूपए नाती को दे दिए कॉपी-पेन्सिल खरीदने के लिए… झाड़ू-पोंछा करते हुए पूरा हिसाब उसकी ज़बान पर रटा हुआ था…

- ५०० रूपए में इतना कुछ??? वह आश्चर्य से मन ही मन विचार करने लगा...

उसकी आँखों के सामने आठ टुकड़े किया हुआ बड़ा सा पिज्ज़ा घूमने लगा, एक-एक टुकड़ा उसके दिमाग में हथौड़ा मारने लगा… अपने एक पिज्जा के खर्च की तुलना वह कामवाली बाई के त्यौहारी खर्च से करने लगा… पहला टुकड़ा बच्चे की ड्रेस का, दूसरा टुकड़ा पेढे का, तीसरा टुकड़ा मंदिर का प्रसाद, चौथा किराए का, पाँचवाँ गुड़िया का, छठवां टुकड़ा चूडियों का, सातवाँ जमाई के बेल्ट का और आठवाँ टुकड़ा बच्चे की कॉपी-पेन्सिल का..

आज तक उसने हमेशा पिज्जा की एक ही बाजू देखी थी, कभी पलटाकर नहीं देखा था कि पिज्जा पीछे से कैसा दिखता है… लेकिन आज कामवाली बाई ने उसे पिज्जा की दूसरी बाजू दिखा दी थी… पिज्जा के आठ टुकड़े उसे जीवन का अर्थ समझा गए थे… “जीवन के लिए खर्च” या “खर्च के लिए जीवन” का नवीन अर्थ एक झटके में उसे समझ आ गया…

17 comments:

vikas kanu said...

shandar hamko bhi samagh aa gaya age khayal rahega

संजय बेंगाणी said...

सही बात है.

Vinod Singh Vini said...

Badhiya kataksh hai bhaiji

Balkrishan Bansal said...

हृदयस्पर्शी!

ankur said...

Uccha vichar hai suresh ji

jeetu said...

बहुत बढिया लेख।
वर्तमान पीढ़ी के लिए अच्छा सबक जो पैसों की महत्ता को नही समझती।

S K Bhardwaj said...

अति सुन्दर और पिज्जा की ऐसी तैसी करने वाली ! सचमुच दिल को छू गया ! धन्यवाद सुरेश जी !

Janakisharan said...

दिल को छू गया आपका लेख...

जगदीश त्रिपाठी said...

हृदय स्पर्शी। प्रेरक।

Anonymous said...

Great work

smt. Ajit Gupta said...

यह सच है कि आज किसी भी रेस्‍ट्रा में खाने पर दो जनो का 1500 रू के लगभग बिल आता है, इसे एक गरीीब की नजर से देखा जाए तो उसका महिने भर का खर्चा है। इसलिए एक तरफ वो दुनिया है जो एक दिन में लाखों खर्च कर देती है और दूसरी तरफ वे लोग हैं जो लाखों कभी देख ही नहीं पाते। इसलिए यदि हम ऐसे लोगों को जो अपनी सेवा करते हैं, कभी-कभी अपने खर्चे में से बचाकर कुछ देते हैं तो उनके लिए बहुत बड़ी सहायता होती है।

raju paswan said...

Very touchable..... Moving.
I like it.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

शानदार बोधकथा। इसे शेयर करता हूँ।

P.N. Subramanian said...

सुरेश जी आपने ही बता दिया एक पिज़्ज़े से बाई का त्यौहार मन गया -अब समय आ गया है कि देश को पिज़्ज़ा, पाश्ता, बर्जर, टेको चाइनीस आदि से पिंड छुड़वाने का

डॉ. मोनिका शर्मा said...

जीवन के लिए खर्च” या “खर्च के लिए जीवन”.... हम भी हमेशा हिसाब लगाते हैं और इन आठ टुकड़ों पर खर्च नहीं करते

डॉ. मोनिका शर्मा said...

जीवन के लिए खर्च” या “खर्च के लिए जीवन”.... हम भी हमेशा हिसाब लगाते हैं और इन आठ टुकड़ों पर खर्च नहीं करते

स्वाति said...

bahut hi prerak...........