Friday, November 29, 2013

Shahzade Rahul Baba and Chaiwala Narendra Modi...



शहज़ादे की नींद हराम करता चायवाला...

हत्यारा, रावण”, “हिटलर, मौत का सौदागर, चाण्डाल, नरपिशाच... आप सोच रहे होंगे कि लेख की शुरुआत ऐसे शब्दों से??? लेकिन माफ कीजिए, उक्त शब्द मेरे नहीं हैं, बल्कि कांग्रेस और अन्य सभी तथाकथित सेकुलर, अनुशासित, लोकतांत्रिक(???) पार्टियों के विभिन्न नेताओं द्वारा समय-समय पर कहे गए हैं, और स्वाभाविक है कि ये सभी शब्द सिर्फ उसी व्यक्ति के लिए कहे जा रहे हैं, जिस व्यक्ति ने अकेले लड़ते हुए, सभी बाधाओं को पार करते हुए इन सेकुलर ढकोसलेबाज नेताओं की रीढ़ की हड्डी में कंपकंपी पैदा कर दी है... यानी वन एंड ओनली नरेंद्र मोदी. क्या नरेंद्र मोदी ने कभी अपने भाषणों में ऐसे शब्दों का उपयोग किया है? मुझे तो याद नहीं पड़ता. पिछले छह माह से नरेंद्र मोदी लगातार कांग्रेस पोषित मीडिया और चैनलीय कैमरेबाज नेताओं के लिए हर हफ्ते एक नया अध्याय लेकर आते हैं. सप्ताह, दो सप्ताह तक उस शब्द अथवा विषय पर बहस होती है... उसके बाद अगला अध्याय दिया जाता है ताकि ड्रामेबाज सेकुलर अपनी-अपनी खोल में बहस करते रहें, टाईम पास करते रहें...

नरेंद्र मोदी द्वारा काँग्रेसी और सेकुलरों की इस ट्यूशनकी शुरुआत हुई थी गाड़ी के नीचे आने वाले कुत्ते के पिल्ले से, उसके बाद सेकुलरिज्म का बुरका इत्यादि से होते-होते नेहरू-पटेल, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, खूनी पंजा, माँ बीमार है और शहजादे तक यह अनवरत चली आ रही है. नरेंद्र मोदी द्वारा किये गए शब्दों के चयन का मुकाबला न कर पाने की वजह से ही हताशा में ये बुद्धिमान(?) नेता नरेंद्र मोदी को उपरोक्त घटिया शब्दावली से नवाजते हैं, उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर मोदी का मुकाबला कैसे करें?? जिस तेजी से मोदी की लोकप्रियता बढ़ रही है, कांग्रेस के खिलाफ और मोदी के पक्ष में जनता के बीच अंडर-करंट फैलता जा रहा है उसने कांग्रेस सहित अन्य सभी क्षेत्रीय दलों के नेताओं के माथे पर शिकन पैदा कर दी है. आखिर इन नेताओं में नरेंद्र मोदी को लेकर इतनी बेचैनी क्यों है? जवाब सीधा सा है... सत्ता और कुर्सी हाथ से खिसकने का डर; मुस्लिम वोटों का रुझान किस तरफ होगा इस आशंका का डर; गुजरात से बराबरी न कर पाने की वजह से उनके राज्य के युवाओं में फैलने वाली हताशा का डर; उनके राज्यों से गुजरात जाकर पैसा कमाने वाले मोदी के असली ब्राण्ड एम्बेसडरों का डर; सोशल मीडिया से धीरे-धीरे रिसते हुए जमीन तक पहुँचने वाली मोदी की मार्केटिंग का डर...

एक तरफ खुद काँग्रेस के भीतर राहुल गाँधी को लेकर बेचैनी है. राहुल गाँधी के भाषणों में घटती भीड़ ने कांग्रेसियों की नींद उड़ा दी है. राहुल गाँधी की भाषण शैली, उनमें मुद्दों की समझ का अभाव और महत्त्वपूर्ण राजनैतिक घटनाक्रम के समय उनकी गुमशुदगी.. सभी कुछ कांग्रेसियों को अस्थिर करने के लिए काफी है. यह एक तथ्य है कि काँग्रेसी उसी के साथ रहते हैं, जो उन्हें सत्ता दिलवा सकता हो, या उसमें वैसी क्षमता हो. राहुल गाँधी के साथ काँग्रेसी उसी समय तक बने रहेंगे जब तक उन्हें विश्वास होगा कि नरेंद्र मोदी को हराने में यह नेता सक्षम है, और यही विश्वास अब शनैः-शनैः दरकने लगा है. दिल्ली की एक सभा में तो शीला दीक्षित को खुलेआम मंच से गुहार लगानी पड़ी कि बहनों, ठहर जाओ, दस मिनट रुक जाओ, राहुल जी को सुनते जाओ... उसके बाद राहुल गाँधी सिर्फ सात मिनट बोलकर चलते बने. दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी को सुनने के लिए बैंगलोर में दस-दस रूपए देकर साढ़े तीन लाख लोगों ने रजिस्ट्रेशन करवाया जिससे पैंतीस लाख रूपए मिले, जो नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल की मूर्ति हेतु अर्पण कर दिए. पैसा देकर भाषण सुनने का यह अमेरिकी प्रयोग भारत में सबसे पहले नरेंद्र मोदी ने आरम्भ किया है, शुरुआत हैदराबाद से हुई थी, जहाँ पांच-पांच रूपए लिए गए थे. उस समय कांग्रेसियों ने इस विचार की जमकर खिल्ली उडाई थी, लेकिन अब राहुल बाबा की सभाओं में घटती भीड़ ने उनके माथे पर बल डाल दिए हैं. इसी तरह पिछले गुजरात चुनावों में भी नरेंद्र मोदी थ्री-डी सभाओं द्वारा भाषण देते हुए मतदाताओं तक पहुँचने की जो नई अवधारणा लेकर आए थे, उसका तोड़ भी काँग्रेस के पास नहीं था. नरेंद्र मोदी में हमेशा नई तकनीक और नई सोच को लेकर जो आकर्षण रहा है उसी ने उन्हें सोशल मीडिया में अग्रणी बना दिया है. जब तक विपक्षी नेता सोशल मीडिया की ताकत को पहचान पाते या उसे भाँप सकते, उससे बहुत  पहले ही नरेंद्र मोदी उस क्षेत्र में दौड़ लगा चुके थे और अब वे बाकी लोगों से मीलों आगे निकल चुके हैं.

गुजरात में सरदार वल्लभभाई पटेल की विशाल प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा और उसका भूमिपूजन करके तो मानो नरेंद्र मोदी ने काँग्रेस के ज़ख्मों पर नमक छिडकने का काम ही कर दिया है. देश की सभी प्रमुख योजनाओं, प्रमुख संस्थानों के अलावा बड़ी-बड़ी मूर्तियों-पार्कों-हवाई अड्डों इत्यादि पर अभी तक सिर्फ एक ही विशिष्ट और पवित्र परिवारका एकाधिकार होता था. नरेंद्र मोदी ने पिछले दस साल के दौरान गुजरात में जितनी भी योजनाएँ चलाई हैं उनका नाम विवेकानंद, दीनदयाल उपाध्याय जैसे लोगों के नाम पर रखा है. बची-खुची कसर सरदार पटेल की इस विशालतम मूर्ति की घोषणा ने पूरी कर दी. काँग्रेस को यह कतई सहन नहीं हो रहा है कि पटेल की विरासत को नरेंद्र मोदी हथिया ले जाएँ, इसीलिए जो काँग्रेस अभी तक सरदार पटेल को लगभग भुला चुकी थी अचानक उसका पटेल प्रेम जागृत हो गया. साथ-साथ आडवानी ने भी नरेंद्र मोदी के साथ कदमताल करते हुए अपने ब्लॉग पर लगातार पटेल-नेहरू के संबंधों के बारे में लेख लिखते रहे और काँग्रेस को अंततः चुप ही बैठना पड़ा.

जब से नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है, तब से विपक्षियों में डर और बेचैनी और भी बढ़ गई है. हालांकि ऊपर-ऊपर वे बहादुरी जताते हैं, दंभपूर्ण बयान देते हैं, मोदी की खिल्ली उड़ाते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर वे बुरी तरह से हिले हुए हैं. एक सामान्य सी समझ है कि अच्छा राजनीतिज्ञ वही होता है, जो बदलती हुई राजनैतिक हवा को भाँपने का गुर जान जाता है. इसीलिए जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, दिनोंदिन काँग्रेस का पतन होता जा रहा है और वह गिने-चुने राज्यों में सिमटती जा रही है, वैसे-वैसे क्षेत्रीय दलों के सुर बदलने लगे हैं. उन्हें पता है कि मई २०१४ में ऐसी स्थिति बन सकती है जब उन्हें नरेंद्र मोदी के साथ सत्ता शेयर करनी पड़ सकती है. इसीलिए जयललिता, ममता बनर्जी और पटनायक जैसे पुराने खिलाड़ी फूँक-फूँक कर बयान दे रहे हैं.

जबकि काँग्रेस अपनी उसी सामन्तवादी सोच से बाहर नहीं आ रही कि ईश्वर ने सिर्फ गाँधी परिवार को ही भारत पर शासन करने के लिए भेजा है. ग्यारह साल पहले गुजरात में हुए एक दंगे को लेकर नरेंद्र मोदी को घेरने की लगातार कोशिशें हुईं. तमाम षडयंत्र रचे गए, मोहरे खड़े किये गए, NGOs के माध्यम से नकली शपथ-पत्र दायर हुए... लेकिन न तो कानूनी रूप से और न ही राजनैतिक रूप से काँग्रेस मोदी को कोई नुक्सान पहुंचा पाई. इसके बावजूद इस प्रकार की  घटिया चालबाजियाँ अब भी जारी हैं. अपने सदाबहार ओछे हथकंडे जारी रखते हुए काँग्रेस इस बार किसी पुराने जासूसी कांड को लेकर सामने आई है. दिल्ली में महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं यह पूरा देश जानता है, लेकिन काँग्रेस को गुजरात में एक महिला की जासूसी को लेकर अचानक घनघोर चिंता हो गई. इस बार भी अमित शाह को निशाना बनाकर नरेंद्र मोदी को घेरने की कोशिशें जारी हैं. मान लो राजकोट में पानी की समस्या है, तो “...मोदी प्रधानमंत्री पद के लायक नहीं हैं..., यदि सूरत में कोई सड़क खराब है, “...नरेंद्र मोदी इस्तीफ़ा दो...”, मुज़फ्फरनगर में भीषण दंगे हुए तो इसके लिए केन्द्र की काँग्रेस सरकार अथवा राज्य की सपा सरकार जिम्मेदार नहीं है, बल्कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने मुज़फ्फरनगर में ये दंगे भड़काए हैं... इस प्रकार की ऊटपटांग बयानबाजी से काँग्रेस और अन्य दल खुद की ही हँसी उडवा रहे हैं. ऐसा लगता है कि वे देश के युवाओं को मूर्ख समझते हैं. कभी-कभी तो मुझे शक होता है कि यदि किसी नेता के किचन में रखा हुआ दूध बिल्ली आकर पी जाए, तब भी वे यही कहेंगे कि इसके पीछे नरेंद्र मोदी का हाथ है....

आज से दो वर्ष पहले तक मोदी विरोधी कहते थे, भाजपा कभी भी मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करेगी... यह तो हो गया. फिर कहते थे कि सोशल मीडिया पर काबिज हिंदुत्ववादी युवाओं की टीम से कोई फर्क नहीं पड़ता..अब खुद उन्हें फर्क साफ़ दिखाई दे रहा है. यह भी कहते थे कि नरेंद्र मोदी कोई चुनौती नहीं हैं... अब खुद इनके मंत्री स्वीकार करने लगे हैं कि हाँ मोदी एक गंभीर और तगड़ी चुनौती हैं...| अर्थात पहले विरोधियों द्वारा उपेक्षा, फिर उनके द्वारा खिल्ली उड़ाना... आगे चलकर विरोधियों के दिमाग में चिंता और अब रातों की नींद में भयानक दुस्वप्न... वाकई में नरेंद्र मोदी ने बड़ा लंबा सफर तय कर लिया है.

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