Monday, June 17, 2013

Few Important posts from Facebook (For record)

कुछ  फेसबुक पोस्ट्स (रिकार्ड की खातिर)... 


17.06.2013 
 
पहले मायावती... फिर कुमारस्वामी... फिर नवीन पटनायक... अब नीतीश कुमार...

संभवतः देश में सिर्फ भाजपा ही ऐसी पार्टी है जिसने जोंक पालने... और पीठ में छुरा खाने... में मास्टरी हासिल कर रखी हो...

रही-सही कसर कुछ "आस्तीन" वाले भी पूरी कर देते हैं, सो कभी येद्दियुरप्पा, कभी कल्याण सिंह, कभी मदनलाल खुराना तो कभी उमा भारती को ही निपटा देते हैं...

सत्ता के लिए सिद्धांतों और विचारधारा के साथ समझौता करने पर ऐसा ही होता है...
चाहे सत्ता में आने के लिए और पचास साल लग जाएँ, लेकिन अकेले चलो... अपने सिद्धांतों पर मजबूत बने रहो... विचारधारा से समझौता मत करो... सामने वाले को झुकाने की ताकत हासिल करने के बाद ही गठबंधन करो... तभी उद्धार होगा... वर्ना ऐसे ही डस लिए जाते रहोगे...

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काश यह सन्देश "गरिष्ठ" नेताओं तक पहुँचे... 


15.06.2013 
 
अभी भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है... आज की तारीख में नरेंद्र मोदी सिर्फ एक राज्य के मुख्यमंत्री हैं... ना तो वे संसद का चुनाव लड़े हैं, ना ही कभी उत्तरप्रदेश से कोई चुनाव लड़े हैं... ना ही बिहार से...

फिर भी... फिर भी... फिर भी...

१) सिर्फ "आशंका" के चलते जद(यू) गठबंधन तोड़ने पर उतारू हो गया है...
२) नरेश अग्रवाल ने कह दिया कि यूपी में मोदी को कोई नहीं जानता...
३) जयराम रमेश ने "भस्मासुर" की उपाधि दे डाली...
४) आतंकवादी इशरत जहाँ एनकाउंटर की जाँच में रहस्यमयी तरीके से तेजी आ गई है...

तात्पर्य यह कि संक्षेप में हिन्दी में बोलें तो "नरेंद्र मोदी के नाम से सभी को घबराहट होने लगी है"...
और खड़ी बोली में कहा जाए तो... "बुरी तरह फटने लगी है"...

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जय हो... जय हो...


13.06.2013 
 

जिस तरह भारत के इतिहास में अब तक सिर्फ एक ही दंगा (गुजरात २००२) हुआ है, उसी प्रकार भारत के इतिहास में अब तक सिर्फ दो पुलिस मुठभेड़ हुई हैं... पहली "संत" सोहराबुद्दीन की और दूसरी "सिस्टर" इशरत जहाँ की...

गुजरात दंगों पर तो पर्याप्त जोर-आजमाईश के बावजूद SIT को मोदी के खिलाफ कुछ मिला नहीं... इसलिए अब मैं चाहता हूँ कि नरेंद्र मोदी को कम से कम इशरत जहाँ मुठभेड़ कांड में तो गिरफ्तार कर ही लिया जाए...

चलो गिरफ्तार ना सही... सीबीआई चार्जशीट ही दाखिल कर दे और फिर मोदी एक भव्य जुलूस के साथ सीबीआई के दफ्तर बयान देने पहुंचें... और ऐसा हर महीने हो... २०१४ के आम चुनाव आने तक.

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12.06.2013 

 
"तीसरा मोर्चा"... "थर्ड फ्रंट"... "फेडरल मोर्चा"... जैसे शब्द फिर से हवा में उछाले जा रहे हैं...
यह शब्द देश की जनता के लिए इतने डरावने हैं कि १९९६-१९९९ के बीच इस तीसरे मोर्चे नामक "कुकर्म" ने ही काँग्रेस को देश से पूरी तरह उखड़ने से बचा लिया था...

उन दिनों जब बच्चे "देश का प्रधानमंत्री" पर निबंध लिखना शुरू करते थे, तो निबंध खत्म होते-होते प्रधानमंत्री ही बदल जाता था... इसलिए सेकुलरवाद के भौंडे और अवसरवादी नारे की आड़ में चल रहे "काँग्रेसी खेल" को जितनी जल्दी समझ जाएँ उतना अच्छा... वर्ना तीसरे मोर्चे की गर्दन पर सवार होकर यही काँग्रेस २०१४ में "गैर-मोदीवाद की गिरोहबाजी" का नग्न प्रदर्शन करेगी.

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नोट :- "तीसरे मोर्चे" (यदि गलती से बन गया तो), को वोट देने पर पाप की मात्रा, लगभग उतनी ही होगी, जितनी काँग्रेस को वोट देने पर होती है... 


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