Friday, June 28, 2013

Devi Mother Mary and Vishnu Saibaba



देवी(?) मदर मेरी और विष्णु(?) साईं – यह विकृति कहाँ ले जाएगी?


कुछ वर्ष पूर्व की बात है, पंजाब में सिख समुदाय गुस्से से उबल रहा था. सिखों और पंजाब-हरियाणा में एक प्रमुख पंथ(?) बन चुके डेरा सच्चा सौदा के समर्थकों के बीच खूनी संघर्ष चला. इस संघर्ष के पीछे का कारण था डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम-रहीम सिंहकी वेषभूषा... डेरा सच्चा सौदा प्रमुख रामरहीम सिंह ने एक पोस्टर में जैसी वेषभूषा पहन रखी थी और दाढ़ी-पगड़ी सहित जो हावभाव बनाए थे, वह सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह से बिलकुल मिलते-जुलते थे. उस पोस्टर से ऐसा आभास होता था मानो रामरहीम सिंह कोई पवित्र गुरु हैं, और सिखों को भी उनका सम्मान करना चाहिए. भला सिखों को यह कैसे बर्दाश्त हो सकता था, नतीजा यह हुआ कि दोनों पंथों के लोग आपस में जमकर लड़ पड़े.

लेख के आरम्भ में यह उदाहरण देने की जरूरत इसलिए आवश्यक था, ताकि धर्म और उससे जुड़े प्रतीकों के बारे में उस धर्म (या पंथ) के समर्थकों, भक्तों की भावनाओं को समझा जा सके. गत कुछ वर्षों में हिन्दू धर्म के भगवानों, देवियों और धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों पर बौद्धिक किस्म के आतंकवादी हमले अचानक बढ़ गए हैं. यह ट्रेंड देखने में आया है कि किसी खास पंथ को लोकप्रिय बनाने अथवा दूसरे धर्मों के लोगों को अपने पंथ में शामिल करने (अर्थात धर्मांतरण करने) की फूहड़ होड़ में अक्सर हिन्दू धर्म को ही सबसे पहले निशाना बनाया जाता रहा है. हाल ही में एक लेख में मैंने दक्षिण भारत (जहाँ चर्च और वेटिकन से जुड़ी संस्थाएं बहुत मजबूत हो चुकी हैं) के कुछ इलाकों में हिन्दू धर्म और उसकी संस्कृति से जुड़े प्रतीकों और आराध्य देवताओं को विकृत करने के कई मामलों का ज़िक्र किया था. इसमें यीशु को एक हिन्दू संत की वेषभूषा में, ठीक उसी प्रकार आशीर्वाद की मुद्रा बनाए हुए एक पोस्टर एवं इस चित्र के चारों तरफ सूर्य नमस्कार की विभिन्न मुद्राओं को दर्शाया गया (मानो सूर्य नमस्कार और जीसस नमस्कार समकक्ष ही हों). इसी प्रकार भरतनाट्यम प्रस्तुती के गीतों में यीशु के वंदना गीत, चर्च को यीशु मंदिर कहना, मदर मैरी को साड़ी-बिंदी सहित देवी के रूप में प्रस्तुत करना तथा कुछ चर्चों के बाहर दीप स्तंभ का निर्माण करना... जैसी कई शरारतें”(?) शामिल हैं. ज़ाहिर है कि ऐसा करने से भोले-भाले हिन्दू ग्रामीण और आदिवासियों को मूर्ख बनाकर आसानी से उनका भावनात्मक शोषण किया जा सकता है और उन्हें ईसाई धर्म में शामिल होने के लिए प्रेरित किया जाता है.


हाल ही में ऐसे दो और मामले सामने आए हैं, जिसमें भारत की सनातन संस्कृति और हिन्दू धर्म के प्रतीकों को विकृत किया गया है. पहला मामला है झारखंड का, जहाँ धर्मांतरण की मिशनरीगतिविधियाँ उफान पर हैं. झारखंड के सरना आदिवासी जिस देवी की पूजा करते हैं, उसे वे माँ सरना देवी कहते हैं. सरना आदिवासी महिलाएँ भी उसी देवी की वेशभूषा का पालन करते हुए शुभ अवसरों पर लाल रंग की बार्डर वाली सफ़ेद साड़ी पहनती हैं. हाल ही में धुर्वा विकासखंड के सिंहपुर गाँव में एक चर्च ने मदर मैरी की एक मूर्ति स्थापित की, जिसमें मदर मैरी को ठीक उसी प्रकार की साड़ी में दिखाया गया है तथा जिस प्रकार से आदिवासी महिलाएँ काम करते समय अपने बच्चे को एक झोली में लटकाकर रखती हैं, उसी प्रकार मदर मैरी के कंधे पर एक झोली है, जिसमें यीशु दिखाए गए हैं. इस मूर्ति का अनावरण कार्डिनल टेलेस्पोर टोप्पो ने किया. आदिवासी देवी के हावभाव वाली इस मूर्ति के मामले पर पिछले कई दिनों से रांची सहित अन्य ग्रामीण इलाकों में प्रदर्शन हो चुके हैं. सरना आदिवासियों के धर्मगुरु बंधन तिग्गा ने आरोप लगाया है कि हालांकि सफ़ेद साड़ी कोई भी पहन सकता है, परन्तु मदर मैरी को जानबूझकर लाल बार्डर वाली साड़ी पहनाकर प्रदर्शित करना निश्चित रूप से सरना आदिवासियों को धर्मांतरण के जाल में फँसाने की कुत्सित चाल है. मदर मैरी एक विदेशी महिला है, उसे इस प्रकार आदिवासी वेशभूषा और हावभाव में प्रदर्शित करने से साफ़ हो जाता है कि चर्च की नीयत खराब है...इस मूर्ति को देखने से अनपढ़ और भोले आदिवासी भ्रमित हो सकते हैं... यदि ऐसी ही हरकतें जारी रहीं, तो आज से सौ साल बाद आदिवासी समुदाय यही समझेगा कि मदर मैरी झारखंड की ही कोई देवी थीं...

धर्मगुरु बंधन तिग्गा आगे कहते हैं कि झारखंड में लालच देकर अथवा हिन्दू देवताओं के नाम से भ्रमित करके कई आदिवासियों को धर्मान्तरित किया जा चुका है. हालांकि चर्च का दावा होता है कि इन धर्मान्तरित आदिवासियों के साथ समानता का व्यवहार किया जाएगा, परन्तु अब यह सर्वमान्य तथ्य है कि गोरों द्वारा शासित वेटिकन के कैथोलिक ईसाई खुद को शुद्ध ईसाई मानते हैं, जबकि अन्य धर्मों से धर्मान्तरित होकर आए हुए व्यक्तियों को निम्न कोटि का ईसाई मानते हैं. इनमें आपस में जमकर भेदभाव तो होता ही है, अपितु इनके चर्च भी अलग-अलग हैं.


इसी से मिलता-जुलता दूसरा मामला है शिर्डी के सांईबाबा को भगवान विष्णु के गेटअप में प्रदर्शित करने का.... उल्लेखनीय है कि फिल्म अमर-अकबर’एंथोनी से पहले शिर्डी के सांईबाबा को बहुत कम लोग जानते थे, परन्तु इसे मार्केटिंग पद्धति की सफलता कहें या हिन्दू धर्म के अनुयायियों की तथाकथित सहिष्णुता(?) कहें... देखते ही देखते पिछले बीस वर्ष में शिर्डी वाले साईंबाबा, भारत का एक प्रमुख धर्मस्थल बन चुका है, जहाँ ना सिर्फ करोड़ों रूपए का चढावा आता है बल्कि सिर्फ कुछ दशक पहले जन्म लिए हुए एक फ़कीर (जिसने ना तो कोई चमत्कार किया है और ना ही हिन्दू धर्म के वेद-पुराणों में इस नाम का कोई उल्लेख है) को अब भगवान राम और कृष्ण के साथ जोड़कर ओम साईं-राम, ओम साईं-कृष्ण जैसे उदघोष भी किए जाने लगे हैं. अर्थात भारतीय संस्कृति की पुरातन परम्परा के अनुसार सीता-राम और राधे-कृष्णजैसे उदघोष इस संदिग्ध फ़कीर के सामने पुराने पड़ गए हैं. यानी एक जमाने में रावण भी सीता को राम से अलग करने में असफल रहा, लेकिन आधुनिक धर्मगुरु(?) शिर्डी के सांईबाबा ने सीताराम को सांई-राम से विस्थापित करने में सफलता हासिल कर ली? अब इसके एक कदम आगे बढकर, ये साईं भक्त ईश्वर के अवतारों से सीधे आदि देवताओं पर ही आ गए हैं...

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार सिर्फ तीन ही देवता आदि-देवता हैं, ब्रह्मा-विष्णु-महेश. बाकी के अन्य देवता या तो इन्हीं का अवतार हैं अथवा इन्हीं से उत्पन्न हुए हैं. साईं की ताज़ा तस्वीर में साईबाबा को सीधे विष्णु के रूप में चित्रित कर दिया गया है, अर्थात शेषनाग पर बैठे हुए. हो सकता है कि कल को किसी साईं भक्त का दिमाग और आगे चले तो वह लक्ष्मी जी को साईबाबा के पैर दबाते हुए भी चित्रित कर दे... किसी साईं भक्त के दिमाग में घुसे तो वह श्रीकृष्ण के स्थान पर साईं के हाथ में सुदर्शन चक्र थमा दे... जब कोई विरोध करने वाला ना हो तथा संस्कृति और धर्म की मामूली सी समझ भी ना हो, तो ऐसे हादसे अक्सर होते रहते हैं. साईबाबा के भक्त उन्हें गुरु कह सकते हैं, अवतार कह सकते हैं (हालांकि अवतार की परिभाषा में वे फिट नहीं बैठते), पथप्रदर्शक कह सकते हैं... लेकिन साईं को महिमामंडित करने के लिए राम-कृष्ण और अब विष्णु का भौंडा उपयोग करना सही नहीं है. फिर मिशनरी और चर्च द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम और साईं भक्तों द्वारा फैलाई जा रही विकृति में क्या अंतर रह जाएगा? 

सवाल सिर्फ यही है कि क्या हिन्दू धर्म को लचीला और सहिष्णु मानने की कोई सीमा होनी चाहिए या नहीं? क्या कोई भी व्यक्ति या संस्था, कभी भी उठकर, किसी भी हिन्दू देवता का अपमान कर सकते हैं? मैं यह नहीं कहता कि जिस प्रकार सुदूर डेनमार्क में बने एक कार्टून पर यहाँ भारत में लोग आगज़नी-पथराव करने लगते हैं, वैसी ही प्रतिक्रिया हिंदुओं को भी देनी चाहिए, लेकिन इस तथाकथित सहिष्णुता पर कहीं ना कहीं तो लगाम लगानी ही होगी... आवाज़ उठानी ही होगी.. 
 

2 comments:

Anonymous said...

i agreed with u ,, आज कल साईं भक्त साईंबाबा कोही भगवान मान चुके हैं दरासल साईं बाबा एक पवित्र आत्मा है , और एक संत है .. केलिन लोगोने साईं बाबाको भगवान के साथ जोड़ दिया .. साईं भक्त संत और भगवान के बीच का फरक नहीं समाज पाते है. साईं बाबा एक संत है ... संत भगवान के करीब होते है पर भगवान नहीं .........श्री राम जय राम जय जय राम

Vivekanand said...

जब चाँद मियां का किसी वेद शास्त्र में वर्णन नहीं हैं तो क'साईं को भगवान का अवतार किस आधार पर बताया जा रहा है
जागो हिन्दुओ पाखंड की पूजा बंद करो