Sunday, April 21, 2013

AAP Party exposing itself - Its not like Raja Harishchandra



धीरे-धीरे “आप” (AAP) बेनकाब हो रहे हैं...

पिछले कुछ दिनों में केजरीवाल की “आप” पार्टी ने तीन निर्णय ऐसे लिए हैं, जिसके कारण जहाँ एक ओर इस पार्टी के नए-नवेले समर्थकों में भारी दुविधा फ़ैली है, वहीं दूसरी तरफ जो लोग शुरू से ही इस पार्टी के कर्ताधर्ताओं के इरादों पर संदेह जताते आ रहे हैं, उनका शक और भी पुष्ट हुआ है. इस पर बात करने से पहले संक्षिप्त में इनकी पृष्ठभूमि देख लेते हैं...

गत वर्ष जिस समय अन्ना हजारे के कन्धों का सहारा लेकर वामपंथी और सोशलिस्ट NGO वालों की “गैंग” अपनी दुकानदारी जमाने की कोशिश कर रही थी, उस समय देश के युवाओं को कल्पना भी नहीं होगी कि वे जिस स्वतःस्फूर्त पद्धति से इस आंदोलन में भाग ले रहे हैं, वह अंततः कुछ लोगों की राजनैतिक महत्वाकांक्षा की भेंट चढ़ जाएगा. हालांकि राष्ट्रवादी समूहों जैसे संघ-विहिप इत्यादि सहित प्रत्येक राष्ट्रवादी व्यक्ति ने इस आंदोलन का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन किया था, लेकिन केजरीवाल-सिसोदिया की जोड़ी के इरादे शुरू से ही नेक नहीं थे, उन्होंने अन्ना की पीठ में छुरा घोंपने (या कहें कि अन्ना के कंधे पर सीढ़ी रखकर अपनी राजनीति चमकाने) का फैसला पहले ही कर लिया था.

राष्ट्रवादी समूहों जैसे संघ-भाजपा को इस “गैंग” पर शक तो उसी दिन हो गया था, जिस दिन इन्होंने “साम्प्रदायिकता” और “संघ की शाखाओं जैसा चित्र” कहते हुए, अन्ना हजारे के मंच से भारत माता का चित्र हटवा दिया था. उसी दिन से यह लगने लगा था कि NGOवादियों की यह गैंग आगे चलकर परदे के पीछे काँग्रेस की मददगार “सुपारी किलर” बनेगी, और विदेशों से बेशुमार चंदा हासिल करने के लिए नरेंद्र मोदी को जमकर कोसने का काम भी किया जाएगा. राष्ट्रवादियों के यह दोनों शक धीरे-धीरे सही साबित होते जा रहे हैं. टाइम्स नाऊ के एक सर्वे के अनुसार दिल्ली विधानसभा में काँग्रेस-भाजपा के बीच चुनावों का अंतर अधिकतम ३% वोटों के अंतर से तय होता रहा है. शीला दीक्षित लगातार तीन बार चुनाव जीत चुकी हैं, परन्तु दिल्ली के वर्तमान हालातों को देखते हुए उनका चौथी बार सत्ता में आना बहुत मुश्किल लग रहा है. ऐसे में मददगार “सुपारी किलर” के रूप में सामने आई “आप” पार्टी. एक अनुमान के अनुसार “आप” को लगभग ६ से १० प्रतिशत वोट हासिल हो सकते हैं, जिसमें से ६०% काँग्रेस से नाराज़ लोगों के व ४०% भाजपा से नाराज़ मतदाताओं के होंगे. लेकिन यह ६-१० प्रतिशत वोटों का अंतर शीला को जितवाने तथा भाजपा को हराने के लिए पर्याप्त है.


अब हम आते हैं उन तीन निर्णयों पर, जिनके बारे में मैंने पहले कहा. जब केजरीवाल ने “आप” पार्टी का गठन किया था, उसी दिन से उन्होंने खुद को इस धरती पर “राजा हरिश्चंद्र” का एकमात्र जीवित अवतार घोषित करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है. प्रत्येक प्रेस कांफ्रेंस में “केजरीवाल गैंग” यही घोषित करती है कि “इस देश में सभी राजनैतिक पार्टियाँ बेईमान हैं, भ्रष्ट हैं, चंदाखोर हैं... आदि-आदि”, ले-देकर इस देश में सिर्फ एक ही ईमानदार पार्टी बची है जो कि “आप” पार्टी है (ये बात और है कि केजरीवाल ने अभी तक अंजली दमानिया, प्रशांत भूषण और मयंक गाँधी पर लगे हुए आरोपों के बारे में कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी अथवा जाँच भी नहीं करवाई है... इसी प्रकार जिस दिल्ली शहर में अपनी पोस्टिंग के लिए केन्द्रीय राजस्व अधिकारी करोड़ों रूपए की घूस नेताओं को देते हैं, उसी दिल्ली में बड़े ही रहस्यमयी तरीके से उनकी पत्नीश्री पिछले कई साल से पदस्थ हैं, इस पर भी उनके श्रीमुख से कभी कुछ सुना नहीं गया). बहरहाल, “आप” पार्टी का ताज़ा-ताज़ा एक निर्णय यह है कि दिल्ली नगरनिगम के चुनावों में काँग्रेस और भाजपा जिन “अच्छे” उम्मीदवारों को टिकिट नहीं देगी, उसे “आप” पार्टी टिकिट देगी... सुनने में अजीब सा लगा ना!!! जी हाँ, जिस प्रकार काँग्रेस पार्टी में जाते ही शिवसेना के संजय निरुपम और छगन भुजबल “अचानक” सेकुलर हो जाते हैं, उसी प्रकार काँग्रेस-भाजपा का जो कार्यकर्ता टिकट प्राप्त नहीं कर सकेगा, उसे केजरीवाल अपना “पवित्र जल” छिड़ककर “हरिश्चंद्र” बना देंगे. जैसे ही वह उम्मीदवार “आप” पार्टी से खड़ा होगा, वह “ईमानदार”, “बेदाग़” और “सच्चरित्र” साबित हो जाएगा. “आप” से टिकट हासिल करने के बाद वह उम्मीदवार ना तो अवैध रूप से चंदा लेगा और ना ही चुनाव आयोग द्वारा तय की गई सीमा से अधिक पैसा चुनाव में खर्च करेगा, जबकि वही उम्मीदवार यदि भाजपा-काँग्रेस से टिकट हासिल कर लेता, तो वह “महाभ्रष्ट” और “चंदाखोर” कहलाता... यह हुआ “आप” पार्टी के राजा हरिश्चंद्र यानी केजरीवाल द्वारा स्थापित चुनावी नैतिकता के अद्वितीय मानदंड.  


अब आते हैं इस पार्टी के पाखंडी चरित्र के दूसरे निर्णय पर... PTI द्वारा प्रसारित व कई अखबारों एवं वेबसाईटों पर प्रकाशित समाचार के अनुसार “आप” ने निर्णय लिया है कि अरुणाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों में “आप” का गठबंधन शरद पवार की NCP से होगा और दो अन्य पार्टियाँ साथ मिलकर चुनाव लडेंगे. निश्चित रूप से आप फिर हैरत में पड़ गए होंगे कि NCP से गठबंधन?? यानी जिस अजित पवार पर सिंचाई घोटाले में पैसा खाने के आरोप लगाए, जिस अंजली दमानिया ने गडकरी और NCP के नेताओं को भूमाफिया तक बता दिया, जिस पार्टी को महाभ्रष्ट बताते हुए सबसे पहले अपनी “राजनीतिक दूकान” का शटर ऊँचा किया था, आज उसी पार्टी से अरुणाचल प्रदेश में गठबंधन??? कहीं ऐसा तो नहीं कि महाराष्ट्र में तो NCP महाभ्रष्ट हो, लेकिन अरुणाचल प्रदेश की NCP ‘ईमानदार” हो? या ऐसा भी हो सकता है कि केजरीवाल साहब ने अपना “पवित्र जल” छिड़ककर अरुणाचल की NCP को बेदाग़ बना दिया हो... संक्षेप में तात्पर्य यह है कि यह पार्टी अपनी शुरुआत से ही पाखण्ड और फरेब में गले-गले तक धँसी हुई है. इनके पाखण्ड का एक और नमूना यह है कि - RTI से प्राप्त जानकारी के अनुसार आम जनता से बिजली का बिल नहीं भरने का आंदोलन करवाने वाले “हरिश्चंद्र पार्टी” के सभी प्रमुख नेताओं ने अपने-अपने बंगलों के बिजली बिल लगातार जमा किए हैं.


अब इस “आप” पार्टी के “असली चेहरे” की नकाब उतारने वाला तीसरा निर्णय भी देख लेते हैं. “आप” पार्टी के कर्ता-धर्ता व “एकमात्र पोस्टर बाय” अरविन्द केजरीवाल ने कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में “सोशल डेमोक्रटिक पार्टी ऑफ इंडिया” (SDPI) के लिए प्रचार करने का निर्णय लिया है.  पाठकों को याद होगा कि जब अन्ना हजारे को समर्थन देने के लिए उमा भारती उनके मंच पर पहुँची थीं, उस समय केजरीवाल के कार्यकर्ताओं ने उन्हें यह कहते हुए मंच से धकियाकर नीचे उतार दिया था, कि “भगवा” राजनीति करने वालों के लिए इस मंच पर कोई स्थान नहीं है. संघ-भाजपा व “भगवा-वादियों” (तथा अब नरेंद्र मोदी) को कोसना व गरियाना केजरीवाल गैंग का पुराना शगल रहा है.  


अब कर्नाटक चुनावों में SDPI को समर्थन व उसका प्रचार का वादा करके केजरीवाल स्वयं ही बेनकाब हो गए हैं. उल्लेखनीय है कि SDPI, पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) जैसे चरमपंथी संगठन का ही एक राजनैतिक अंग है, जो सामान्यतः मुस्लिम हितों के लिए ही अपनी आवाज़ उठाता रहा है. PFI कई हिंसा और धार्मिक राजनीति के कई किस्से केरल-कर्नाटक में आम हैं. इसी की एक और राजनैतिक बाँह है SDPI, जिसके अध्यक्ष हैं ई. अबू बकर, जो कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के संस्थापक सदस्य एवं केरल में “सिमी” के राज्य अध्यक्ष रह चुके हैं. केजरीवाल का पाखण्ड यह है कि इन्हें नरेन्द्र मोदी या उमा भारती तो “साम्प्रदायिक” लगते है, क्योंकि ये हिन्दू हितों की बात करते हैं, जबकि “राजा हरिश्चंद्र” के लिए SDPI के अबू-बकर “धर्मनिरपेक्ष” हैं, क्योंकि वे इस्लामी हितों की बात करते हैं. लानत है ऐसी घटिया राजनीति पर, क्या इसी ढोंगी बर्ताव के लिए देश के युवाओं ने केजरीवाल को समर्थन दिया है? मजे की बात यह है कि अन्ना आंदोलन के समय SDPI ने कहा था कि मुसलमानों को इस आंदोलन में भाग नहीं लेना चाहिए, क्योंकि यह गैर-इस्लामिक है. तात्पर्य यह है कि, राजनीति को साफ़-सुथरा बनाने की हवा-हवाई बातें करना तो बहुत आसान है, स्वघोषित “ईमानदार” बनना भी बेहद आसान है, लेकिन जब वास्तविक राजनीति की बात आती है तो “आप” को बेनकाब होते देर नहीं लगती...

कजरिया बाबू...!!! “हिन्दू-विरोध” पर तो इस देश में शबनम हाशमी और तीस्ता सीतलवाड जैसे अनेक लोगों की रोजी-रोटी चल ही रही है, “आप” की भी चल ही जाएगी, लेकिन इसके लिए युवाओं को “जनलोकपाल” के नाम पर बरगलाने की क्या जरूरत है? स्वयं बिजली का बिल भरकर दूसरों को बिल न भरने के लिए भड़काने की क्या जरूरत है? सीधे-सीधे मान लो ना कि “आप” भी दूसरी पार्टियों से अलग तो बिलकुल नहीं है, बल्कि SDPI जैसी संदिग्ध या महाराष्ट्र को लूट खाने वाली NCP जैसी महाभ्रष्ट पार्टी का साथ देकर आप तो बड़ी जल्दी बेनकाब होने की कगार पर आ गए...

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