Tuesday, January 15, 2013

Conspiracy Against Mumbai Police - Sujata Patil Poem Case

मुंबई पुलिस का मनोबल चूर-चूर करने की योजना...


११ अगस्त को आज़ाद मैदान में हुई "सुनियोजित हिंसा" के विरोध में मुंबई पुलिस की महिला उपनिरीक्षक सुजाता पाटिल द्वारा, पुलिस विभाग की एक पत्रिका में प्रकाशित एक कविता के खिलाफ "समाजसेवियों"(?) के एक समूह और "महेश भट्ट जैसे" सेकुलरों(?) ने हाईकोर्ट में जाने का फैसला किया है.

इन "समाजसेवियों"(?) का कहना है कि एक पुलिस अधिकारी को इस तरह की भाषा का उपयोग नहीं करना चाहिए. एक एडवोकेट एजाज़ नकवी ने इस कविता की तुलना ओवैसी के भाषण से की है और पुलिस कमिश्नर से सुजाता पाटिल को बर्खास्त करने की मांग की है.




इस कविता को पढ़कर आप स्वयं समझ गए होंगे कि आज़ाद मैदान की घटना के बाद पुलिस फ़ोर्स के मनोबल में कितनी गिरावट हुई है और पुलिसकर्मी अपने हाथ बंधे होने की वजह से कितने गुस्से और निराशा में हैं.

उल्लेखनीय है कि ११ अगस्त को आज़ाद मैदान में मुल्लों के हिंसक प्रदर्शन के दौरान कई पुलिसकर्मी घायल किये गए, कुछ महिला कांस्टेबलों के साथ छेड़छाड़ और बदसलूकी की गई, शहीद स्मारक को तोडा-मरोड़ा गया. पुलिस के पास पर्याप्त बल था, हथियार थे, डंडे थे... सब कुछ था लेकिन मुल्लों की उस पागल भीड़ पर काबू पाने के आदेश नहीं थे. पुलिस वाले पिटते रहे, अधिकारी चुप्पी साधे रहे और कांग्रेस की सरकार मुस्लिम वोटों की फसल पर नज़र रखे हुए थी.

जैसा कि सभी जानते हैं इसी घटना के एक आरोपी को पकड़ने के लिए जब मुम्बई पुलिस बिहार से एक मुल्ले को उठा लाई थी, तो नीतीश ने हंगामा खड़ा कर दिया था, क्योंकि बात वहां भी वही थी... यानी "मुस्लिम वोट". पुलिस बल कितना हताश और आक्रोश से भरा हुआ है इसका सबूत इस बात से भी मिल जाता है कि जब राज ठाकरे ने आज़ाद मैदान की इस सुनियोजित हिंसा के खिलाफ जोरदार रैली निकाली थी, तब शिवाजी पार्क मैदान में एक कांस्टेबल ने खुलेआम मंच पर आकर राज ठाकरे को इसके लिए धन्यवाद ज्ञापन करते हुए, गुलाब का फूल भेंट किया था...

इन "तथाकथित समाजसेवियों" का असली मकसद पुलिस का मनोबल एकदम चूर-चूर करना ही है. महेश भट्ट जैसे "ठरकी और पोर्न" बूढ़े, जिसका एकमात्र एजेंडा सिर्फ हिन्दुओं का विरोध करना ही है, वह अक्सर ऐसी मुहिम में सक्रीय रूप से पाया जाता है. यानी अब इनके अनुसार कोई महिला पुलिस अपनी "अन्तर्विभागीय पत्रिका" में अपनी मनमर्जी से कोई कविता भी नहीं लिख सकती, जबकि यही कथित समाजसेवी और मानवाधिकारवादी आए दिन "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" का झंडा लिए घूमते रहते हैं.

कविता में आपने नोट किया होगा कि इसकी मूल पंक्ति है "हम न समझे थे बात इतनी सी..." यह पंक्तियाँ जैकी श्रोफ और अमरीश पुरी अभिनीत फिल्म "गर्दिश" के गीत की पंक्तियाँ हैं. उस फिल्म में एक ईमानदार पुलिस कांस्टेबल के मन की व्यथा, उसके साथ हुए अन्याय के बारे में बताया गया है. स्वाभाविक है कि सुजाता पाटिल के मन में भी आज़ाद मैदान की "सुनियोजित हिंसा" और बदसलूकी के खिलाफ गुस्सा, घृणा, हताशा के मिले-जुले भाव बने हुए हैं. इसलिए उनकी कलम से ऐसी मार्मिक कविता निकली है, जिसे पढ़कर तथाकथित सेकुलर, नकली समाजसेवी और फर्जी मानवाधिकारवादी जले-भुने बैठे हैं. जबकि यही मानवाधिकारवादी और समाजसेवी, उस समय मुंह में दही जमाकर बैठ जाते हैं, जब माओवादीएक पुलिसवाले के शव के पेट में उच्च शक्ति वाला बम लगा देते हैं... लानत है ऐसे समाजसेवियों पर. साथ ही हजार लानत है महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार पर जो "सेकुलरिज्म" के नाम पर मुस्लिम वोटरों को खुश करने के लिये आज़ाद मैदान हिंसा के तमाम आरोपियों में से इक्का-दुक्का को ही पकड़ने का दिखावा कर रही है., जबकि उस हिंसा के ढेर सारे वीडियो फुटेज उपलब्ध हैं, जिनसे उन तमाम उत्पाती मुल्लों को धर-दबोचा जा सकता है.


इन कथित समाजसेवियों को सुजाता पाटिल द्वारा आज़ाद मैदान के दंगाइयों के लिए “देशद्रोही” और “सांप” शब्दों पर आपत्ति है, साथ ही महेश भट्ट को यह भी आपत्ति है कि पाटिल ने अपनी कविता में “गोलियों की होली” शब्द का उपयोग करके हिंसात्मक मनोवृत्ति का परिचय दिया है.

शायद ये समाजसेवी चाहते होंगे कि गृहमंत्री शिंदे की तरह इन “जुमेबाज” दंगाइयों को “श्री हाफ़िज़ सईद” कहा जाए? या फिर परम ज्ञानी भविष्यवक्ता दिग्विजय सिंह की तरह “ओसामा जी” कहा जाए, या फिर शायद ये लोग तीस्ता सीतलवाड़ जैसे पैसा खाऊ NGOवादियों की तरह पुलिस के सिपाहियों के मुंह से, “माननीय सोहराबुद्दीन” कहलवाना चाहते हों... कांग्रेस और मानवाधिकारवादियों की ऐसी ही छिछोरी राजनीति, हम बाटला हाउस के शहीद श्री मोहनचंद्र के बारे में भी देख चुके हैं.

यह बात तो सर्वमान्य है कि माफिया हो या पुलिस, दोनों का काम उसी स्थिति में आसानी से चलता है, जब उनका “जलवा” (दबदबा) बरकरार रहे, और वर्तमान परिस्थिति में दुर्भाग्य से माफिया-गुंडों-दंगाइयों-असामाजिक तत्वों और दो कौड़ी के नेताओं का ही “दबदबा” समाज में कायम है, पुलिस के डंडे की धौंस तो लगभग समाप्त होती जा रही है. इसके पीछे का कारण यही “श्री हाफ़िज़ सईद” और “ओसामा जी” कहने की घटिया मानसिकता तथा मानवाधिकार के नाम पर रोटी सेंकने और बोटी खाने वाले संदिग्ध संगठन हैं... जबकि देश की इस विकट परिस्थिति में हमें सेना-अर्धसैनिक बल तथा पुलिस के निचले स्तर के सिपाही और इन्स्पेक्टर इत्यादि का मनोबल और धैर्य बढाने की जरूरत है, वर्ना ये बल सुजाता पाटिल और राज ठाकरे को फूल भेंट करने वाले कांस्टेबल की तरह अन्दर ही अन्दर घुटते रहेंगे और हताश होंगे, जो कि देश और समाज के लिए बहुत घातक होगा. 

इन कथित समाजसेवियों के खिलाफ एक सशक्त मुहीम चलाने की आवश्यकता है, साथ ही सुजाता पाटिल का मनोबल बढाने के लिए उसका साथ देने की जरूरत है. इन्स्पेक्टर सुजाता पाटिल तुम्हें सलाम... कि जो तुमने अपने दिल की बात खुल कर रखी.. हम तुम्हारे साथ हैं.

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सन्दर्भ :-  http://timesofindia.indiatimes.com/city/mumbai/Activists-to-move-high-court-over-cops-riot-poem/articleshow/18012301.cms 

13 comments:

Ankit Sirwaliya said...

इन्स्पेक्टर सुजाता पाटिल तुम्हें सलाम... कि जो तुमने अपने दिल की बात खुल कर रखी.. हम तुम्हारे साथ हैं.

संजय बेंगाणी said...

"अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" का झंडा लिए घूमते लोगो के लिए दुसरों की आजादी कोई मायने नहीं रखती.

उम्दा सोच said...

भाऊ राष्ट्रवाद के खिलाफ हेडली के लौंडे का बाप नहीं बोलेगा तो कौन बोलेगा ? अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता इनकी सुविधा और दूसरो की दुविधा इस लिए है क्युकी आई एस आई के ये रखैल जो है । शहीदे आज़म भगत सिंह याद आते है क्युकी भय बिन होए ना प्रीत , देश के भीतर रह रहे देश के दुश्मनों को खोज खोज कर तडपा तडपा कर बीच चौराहे मारने की ज़रुरत है , देश की एकता और अखंडता के विरुद्ध दोषी को मानवीय अधिकारों से वंचित करते हुए यातनागार में ताउम्र खातिरदारी देनी चाहिए दो एक का वो हश्र करो की देश द्रोहियों की रूह तक कॉप जाए ।

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

प्रभावशाली ,
जारी रहें।

शुभकामना !!!

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कौशलेन्द्र said...

टिप्पणी लिखी और इण्टर करते ही डिलीट हो गयी। पुनः प्रयास करता हूँ।
पहली बात तो यह कि 11 अगस्त की घटना के लिये ज़िम्मेदार लोगों को मैं दंगाई स्वीकार करने के लिये बिल्कुल तैयार नहीं हूँ। जो कृत्य हुआ वह राष्ट्र के लिये, राष्ट्र के रक्षकों के लिये, शहीदों के लिये और हर भारतीय के लिये अपमानजनक था। शहीदों की प्रतिमाओं को, अमर जवान ज्योति को खण्डित करना, राष्ट्र की सम्पत्ति को नष्ट करना, निर्दोष नागरिकों को आघात पहुँचाना ...ये सारे कृत्य किसी दंगाई के नहीं राष्ट्रद्रोही के होते हैं। उस दिन जो हुआ वह भारत की सम्प्रभुता के विरुद्ध जंग का खुला ऐलान था। पुलिस को उसके कर्तव्य में बाधा डालने वाले लोग, पुलिस को सही आदेश न देने वाले लोग भी उस देशद्रोह के कृत्य में सहभागी हैं। इस्पेक्टर सुजाता पाटिल की भावनायें देशप्रेम से ओतप्रोत हैं। यह नहीं भूलना चाहिये कि एक शासकीय कर्मचारी के साथ-साथ सुजाता एक सम्प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र की ज़िम्मेदार और जागरूक नागरिक भी हैं। अपनी किसी साथी महिला पुलिस के साथ राष्ट्रद्रोहियों के द्वारा की जाने वाली अश्लील हरकतों को देखकर भी स्वाभिमान का न जागना सुजाता का अपराध होता। उनका स्वाभिमान जागा ...उनकी राष्ट्र भक्ति जागी .....उनका शहीदों के प्रति सम्मान जागा ....उस सबकी परिणति थी उनकी कविता। उनकी कविता में अभिव्यक्त भाव एक ज़िम्मेदार और देशभक्त नागरिक के भाव हैं। गद्दारों के विरुद्ध लिखी गयी पाटिल जी की कविता का मैं समर्थन करता हूँ, और उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट करता हूँ। जो लोग उनके विरुद्ध न्यायालय में कोई वाद प्रस्तुत करना चाहते हैं वे देशभक्त नहीं हो सकते ...गद्दार हो सकते हैं। उनके कृत्य किसी स्वार्थ से लबरेज हैं। हम कड़े शब्दों में ऐसे लोगों के कृत्यों की भर्त्सना करते हैं। आज़ाद चौक में तोड़्फोड़ करने वाले ही राष्ट्रद्रोही नहीं थे बल्कि आज जो लोग सुजाता के विरुद्ध वाद ले जाना चाह्ते हैं उनके कृत्य भी किसी भी दृष्टि से राष्ट्रद्रोह से कम नहीं हैं। हम सुजाता की भावनाओं का सम्मान करते हैं और हर स्थिति में उनके साथ हैं।

abhay said...

i am with you .......

भारतीय नागरिक said...

हम सब सुजाता के साथ हैं.

Anonymous said...

Bahut sahi likha apne. midia me dhum machane vali ghatnaon ke pichhe kangres ya kisi british lobby ka hath jyada lagta hai. Azad maidan vali ghatna ke samay loksabha me koyla ghotale se dhyan hatane ke liye hi yah rally ki gayi lagti hai; aur unhi dino pune bomb blast bhi hue. yah sab koyla ghotale se dhyan hatane ke liye hi hue. dilli ka gang rape aur uske bad kramashah mombatti chhap congressi NGO ka andolan, HM Shinde ka vivadaspad bayan, pulis kanstable ki mout par ulti sidhi bayanbaji is tarah lambi khinchi gayi jaise dilli aur any jagahon par kabhi is tarah ke rape hue hi nahi. fir is bar hi aisa kyun? iske pichhe Gujarat ka chunav aur uski media me hone vali sambhavit charcha tatha 'reservation in promotion bill' ka loksabha me pesh hone se utha vyapak jan asantosh, in ko bagal dene ka hi irada saf lagta hai. yadi media me gujarat ke chunav ka media me vidvano dvara panel charcha me vishleshan hota to Narendra Modi ki RashtrVyapak chhabi taiyar ho gayi hoti, jo congress ke liye 2014 me gale ki haddi jaisi musibat ban gai hoti. vafadar kutte jaisa chartered media aur supari NGOs ne apni bhumikaen puri imandari se nibhai aur ye dono mudde public ki najron me ane hi nahi diye. hai na kutilta ki behtarin misal?

aryan said...

हम सुजाता की भावनाओं का सम्मान करते हैं और हर स्थिति में उनके साथ हैं।

sujeet singh said...

हम सुजाता की भावनाओं का सम्मान करते हैं और हर स्थिति में उनके साथ हैं।

विजय गुप्ता said...

भट्टों की "भट्टी" जलानी पड़ेंगी....पुलिस का मनोबल नहीं "हिंन्दुस्तान के पुरूषार्थ का एबॉर्शन कराने की नापाक कोशिश हैं"।.सुजाता के सोच के मरने से पहले "उसी मैदान" में "आजाद चन्द्रशेखरों" को इसका "हिसाब बराबर" करने की कसम खानी पड़ेगी।सुजाता के बारे में जानकारी देने के लिए भाईसाहब का शुक्रिया...

दिवस said...

निश्चित ही हम भी सुजाता पाटिल के साथ हैं। प्रशासन से मैं स्वयं व्यक्तिगत रूप से कोई शिकायत नहीं रखता। एक पुलिस वाला/वाली करे भी क्या? सुजाता आप्तिल ने अपनी आवाज़ को बुलंद किया। उन्होंने एक सिपाही का दर्द हमारे सामने रखा।
रही बात समाजसेवियों(?) की, तो वे भला क्या करेंगे? समाजसेवा के रूप में अपना करियर शुरू करने वाले सफ़ेद गांधी टोपी पहने एक समाजसेवी(?) ने तो भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की ज़रूरत को भी गलत बताया है। मतलब हमे पाकिस्तान की दर्न्दगी स्वीकार कर नपुंसकता की ओर बढ़ने की सीख समाजसेवी ही दे रहे हैं।

Sandip Makode said...

shabbas sujataji ..... hum aapke saath hai ......