Tuesday, January 24, 2012

Five Years in Hindi Blogging - An Overview


ब्लॉगिंग एवं इंटरनेट लेखन के पाँच वर्ष पूर्ण : कुछ हिसाब-किताब एवं एक ब्रेक का वक्त…

आगामी 26 जनवरी 2012 को मेरे इंटरनेट लेखन के पाँच वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। इस अवसर पर मैं आप सभी शुभचिंतकों, पाठकों, मित्रों एवं सहयोगियों का हार्दिक धन्यवाद ज्ञापन करना चाहता हूँ कि आप सभी के प्रेम एवं विश्वास के चलते मैं आज यहाँ तक पहुँच सका। 26 जनवरी 2007 को ब्लॉगिंग आरम्भ करते समय सोचा नहीं था कि इस मुकाम तक पहुँचूंगा, क्योंकि आज से 5 वर्ष पहले तक इंटरनेट की ताकत का अंदाज़ा नहीं था, सिर्फ़ मौज-मजे, नई तकनीक सीखने एवं मन की बात खुलकर कहने के एक माध्यम को आजमाने का ही एक भाव मन में था, परन्तु धीरे-धीरे विगत पाँच वर्ष में कैसे यह मेरा जुनून बन गया, मुझे पता ही नहीं चला।

ब्लॉगिंग की सालगिरह के इस अवसर मैं पिछले एक-डेढ़ वर्ष में जिन सहयोगियों ने इस ब्लॉग एवं मेरे लेखन को जारी रखने में मदद की मैं उनका विशेष आभार व्यक्त करना चाहता हूँ। भारतीय संस्कृति में माना जाता है कि दान देने के बाद नाम की इच्छा नहीं रखनी चाहिए, इसलिए मैं यहाँ किसी का नाम तो नहीं लूंगा, परन्तु आभार व्यक्त करना मेरा कर्तव्य है…। सबसे पहला एवं महत्वपूर्ण आभार मैं अपने दो मित्रों का करना चाहूँगा, इनमें से एक मित्र ने मुझे लैपटॉप प्रदान किया है, जबकि दूसरे मित्र ने 12 माह तक सतत प्रतिमाह 3000 रुपये के चेक दिये…। मित्रों एवं पाठकों को याद होगा कि लगभग दो वर्ष पहले मैंने अपने ब्लॉग पर पे-पाल का कोड एवं SBI बैंक अकाउण्ट नम्बर लगाकर, इस ब्लॉग को सुचारु रूप से चलाने हेतु डोनेशन की अपील की थी। मुझे आपको यह बताते हुए हर्ष है कि इसके जवाब में कई पाठकों ने दो वर्ष की अवधि में छोटी-छोटी सहयोग राशियाँ भी भेजीं, जिनका कुल योग लगभग 50,000 रुपये हुआ (इसमें तीन मित्रों ने 5000 रुपये की राशि भेजी है, जबकि बाकी के 35,000 रुपये अन्य योगदान रहा)। इस प्रकार कुल मिलाकर दो वर्ष की अवधि में मुझे डोनेशन (आप इसे सहयोग राशि भी कह सकते हैं) के रूप में एक लैपटॉप एवं 86,000 रुपये प्राप्त हुए। इसके अलावा मेरे जैसे गैर-तकनीकी व्यक्ति को ब्लॉग संचालन में लगने वाली तकनीकी सलाह देने वाले कई-कई शुभचिंतक भी रहे… मैं इस हेतु आप सभी का दिल से आभारी हूँ। महत्वपूर्ण यह रहा कि यह सब कुछ आपसी सहयोग से ही हुआ, किसी राजनैतिक पार्टी या संस्था से कोई चन्दा नहीं लेना पड़ा…

इन 86,000 रुपए में से लगभग 40,000 रुपए पिछले एक-डेढ़ वर्ष के दौरान एक-दो हिन्दी टाइपिस्ट (तथा अनुवादकों) को आउटसोर्स करने में खर्च हुए (लगभग मासिक 3000 रुपये)। बाकी के 46,000 रुपए में से लगभग 32,000 रुपये कुछ पुस्तकें खरीदने, कुछ पैसा ब्लॉगिंग सम्बन्धी यात्राओं-सेमिनार, कुछ पैसा विभिन्न पत्रिकाएं खरीदने, तथा कुछ एक अस्थायी इंटरनेट कनेक्शन इत्यादि में खर्च हुआ है। यानी कि इस Donation में से लगभग 14,000 रुपये अभी भी मेरे पास बचे हुए हैं।

मित्रों को यह भी याद होगा कि एक राष्ट्रवादी विचारों वाली न्यूज़ वेबसाइट बनाने का एक प्रोजेक्ट भी मैंने प्रस्तुत किया था जिसमें 500 लोगों द्वारा प्रतिवर्ष 1200 रुपये सहयोग देने सम्बन्धी विचार दिया था, इस विचार के समर्थन में लगभग 100 मित्रों की ओर से हाँ भी हो गई थी, तथा संख्या लगातार बढ़ रही थी… परन्तु मेरी व्यस्तता (या नाकारेपन) की वजह से वह प्रोजेक्ट सिरे न चढ़ सका। फ़िर भी यह एक बड़ी बात थी कि जिस जमाने में लोग अपने सगे भाई तक को 1000 रुपये देने में आनाकानी करते हों, वहाँ सिर्फ़ मेरे कहने पर, एक विचारधारा को विस्तार देने के लिए 100-150 लोग 1200 रुपये प्रतिवर्ष देने को तैयार हो गये हैं। ये बात अलग है कि मैंने इन मित्रों की सहमति को होल्ड पर रखा और उनसे कहा है कि जब भी ऐसा कोई प्रोजेक्ट धरातल पर उतरेगा, तभी उनसे यह सहयोग राशि ली जाएगी…। क्योंकि यदि मैं यह राशि उनसे मंगवा भी लेता, तो इस 1 लाख रुपए का मैं करता भी क्या?

भले ही देने वाला मुझ पर विश्वास करके उसका हिसाब न ले, परन्तु नैतिकता यह कहती है कि हिन्दुत्व के नाम पर मुझे जो भी सहयोग राशि मिली है, उसका उपयोग सिर्फ़ उसी कार्य के लिए होना चाहिए, व्यक्तिगत उपयोग नहीं। जब इस सहयोग राशि में से मैंने 14,000 रुपये अभी बचाकर रखे हैं तो स्वाभाविक है कि ऐसी किसी योजना के संभावित 1-2 लाख रुपये लेकर मैं क्या करता, जो योजना अभी धरातल पर है ही नहीं?

संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि मेरी निष्ठा और मेरे लेखन कर्म को देखते हुए मित्रों-पाठकों ने आपसी सहयोग से मुझे जो धनराशि भेजी, उसके कारण मैं 2010-2011 के दो साल तक ब्लॉगिंग एवं लेखन की गाड़ी खींच सका…वरना यह रईसी शौक मेरे बस के बाहर हो चला था। मेरे आलोचकों के लिए, डेढ़ साल में सिर्फ़ 86,000 रुपये…!!! कहकर इसकी खिल्ली उड़ाना आसान है, परन्तु वे यह ध्यान में रखें कि यह राशि किसी पार्टी, समूह अथवा संस्था ने नहीं दी है, बल्कि व्यक्तियों ने अपनी खून-पसीने की कमाई में से एक पवित्र उद्देश्य के लिए दी है, और मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात है।

खैर… एक ब्लॉग चलाने हेतु जितना पैसा, सहयोग एवं समर्थन आवश्यक है, वह मिलता गया और मैं एक जुनून के तहत लिखता गया। पिछले वर्ष मेरे ब्लॉग के लगभग 1200 सब्स्क्राइबर्स थे, जिनकी संख्या बढ़कर अब लगभग 2000 तक हो गई है, इसी प्रकार पिछले एक वर्ष में (जबसे मैंने फ़ेसबुक पर सक्रियता बढ़ाई) फ़ेसबुक पर भी 5000 मित्र एवं 2000 सब्स्क्राइबर हो गये हैं, जिनकी वजह से मैं "विचारधारा" को काफ़ी लोगों तक पहुँचाने में सफ़ल रहा। बहरहाल… ये तो हुई आभार प्रदर्शन एवं हिसाब-किताब की बात… अब आते हैं मूल मुद्दे पर…

पाठकों ने नोट किया होगा कि पिछले एक वर्ष में मेरे लेखों की संख्या में कमी आई है (2010 में 116 लेख एवं 2011 में सिर्फ़ 90), हालांकि इसका एक कारण फ़ेसबुक पर सक्रियता बढ़ाना तो है ही, परन्तु दूसरा कारण व्यवसाय में बढ़ी हुई व्यस्तता भी है। पाँच वर्षों की जुनूनी ब्लॉगिंग के चलते मेरा ध्यान मेरे मूल व्यवसाय से थोड़ा छिटक गया था, जिसकी वजह से गलाकाट प्रतियोगिता के इस दौर में मैं वहाँ पिछड़ गया। हालांकि इस क्षेत्र (अर्थात पैसा कमाने) में मैं शुरु से ही फ़िसड्डी साबित हुआ हूँ, परन्तु महंगाई के बढ़ते दौर ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अब मुझे ब्लॉगिंग/फ़ेसबुक/लेखन इत्यादि को दरकिनार करके अपने मूल व्यवसाय की ओर ध्यान देना जरुरी है। राष्ट्रवादी ब्लॉगिंग के पाँच साल, 600 से अधिक लेख, 2000 सब्स्क्राइबर और कुछ शिष्य तैयार करने के बाद, अब इस जुनून को सीमित करने का समय आ गया है…। सीमित शब्द का उपयोग इसलिए, कि मेरी अन्तरात्मा और संस्कार मुझे लेखन कार्य पूरी तरह से बन्द करने नहीं देंगे… ज़ाहिर है कि सन्यास या टंकी पर चढ़कर आत्महत्या जैसी कोई बात तो नहीं है, लेकिन हाँ प्राथमिकताएं बदलना जरुरी हो गया है…। कुछ पारिवारिक कार्य, कुछ व्यावसायिक प्रतिबद्धताएं एवं विस्तारीकरण बहुत दिनों से टल रहा है, जिसे अब और नहीं टाला जा सकता, ब्लॉगिंग और लेखन के अलावा भी एक और दुनिया है, जिसमें हम रहते हैं… 
(मेरे कुछ चाहने वाले इस निर्णय की "टाइमिंग" पर भी सवाल उठा सकते हैं, लेकिन कभी न कभी तो यह होना ही था, बल्कि पिछले डेढ़-दो साल अधिक चल गया)…

अब इस स्थिति से निपटने के लिए मेरे पास तीन विकल्प हैं

1) कि मैं ब्लॉगिंग पूरी तरह छोड़ दूं (जो कि सम्भव नहीं है)

2) कि मैं अपना व्यवसाय बन्द करके पूर्णकालिक ब्लॉगर बन जाऊँ… (लेकिन तब मैं अपने परिवार को क्या खिलाऊंगा? क्योंकि अभी हिन्दी ब्लॉगिंग उस स्तर पर नहीं पहुँची है, कि कोई इंसान सिर्फ़ ब्लॉगिंग करके कमाई कर सके।)

3) कि विगत पाँच वर्षों में मित्रों व लेखकों का जो विशाल नेटवर्क तैयार हो गया है, उसमें से 15-20 श्रेष्ठ, विश्वसनीय एवं राष्ट्रवाद हेतु पूर्णतः समर्पित लोगों की एक टीम बनाकर मेरे ब्लॉग को एक कम्युनिटी ब्लॉग (अथवा न्यूज़ वेबसाइट) का स्वरूप दे दिया जाए… जिसमें मेरी भूमिका सिर्फ़ Supervision एवं Coordination की हो…

4) इसी वेबसाइट में मेरी ब्लॉगिंग (लेखन) को बेहद सीमित कर दिया जाए (अर्थात सिर्फ़ हफ़्ते-पखवाड़े में मैं एक लेख लिखूं)…


खैर…व्यक्तिगत बातों को यहाँ लिखने का कोई औचित्य नहीं है। सिर्फ़ इतना कहना चाहूँगा कि, ब्लॉगिंग करते-करते कहीं ऐसा हो, कि बुढ़ापे में किसी अस्पताल से मुझे इसलिए बाहर फ़िंकवा दिया जाए, कि मैं इलाज के लिए 8-10 लाख रुपए जुटा सका…। भले ही सुनने में यह मजाक की बात लगे, लेकिन यदि मैं ऐसे ही व्यवसाय की तरफ़ ध्यान न देकर, सिर्फ़ और सिर्फ़ लिखता रहा तो, इस सम्भावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता। तात्पर्य… दोनों कार्य एक साथ चलना दिनोंदिन मुश्किल होता जा रहा है…। गत पाँच वर्ष में जिस निष्ठा, समर्पण और मेहनत से राष्ट्रवादी ब्लॉगिंग की है, उसी मेहनत से अगले पाँच वर्ष व्यवसाय को देने की इच्छा है, ताकि जब मैं वापस पूर्ण सक्रियता के साथ लौटूं तो मुझे सहयोग राशि लेने की भी जरुरत न महसूस हो… 

बहरहाल… बात को और लम्बा न खींचते हुए, उन सभी सहयोगकर्ताओं का पुनः आभार जिन्होंने गत डेढ़ वर्ष तक इस ब्लॉग को जारी रखने में मदद की, तथा पिछले पाँच वर्ष तक लगातार मेरा लेखन पढ़ने एवं सराहने हेतु आप सभी पाठकों का पुनः एक बार आभार व्यक्त करता हूँ…। बीच-बीच में कभीकभार आपसे मिलने आया करूंगा… यहीं इसी स्थान पर…
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नोट :- 
1) मित्रों द्वारा भेजी गई सहयोग राशि में से बचे हुए 14,000 रुपये के यथोचित उपयोग के बारे में भी विचार जारी है… अतः मित्रों से अनुरोध है कि फ़िलहाल अब वे कोई राशि न भेजें…

2) जिस टीम के गठन की बात मैंने ऊपर कही है, उसका मूल खाका तो लगभग वही है जो मैंने पिछले वर्ष बयान किया था। यदि यह टीम कोई संस्थागत स्वरूप ग्रहण करती है, तो बचे हुए 14,000 रुपये उस संस्था को दे दिए जाएंगे, इस सम्बन्ध में विस्तार से अगले किसी लेख में…

Thursday, January 19, 2012

Cardinal George Alencherry, Indian Constitution and Vatican


अलेंचेरी की कार्डिनल के रूप में नियुक्ति और कुछ तकनीकी सवाल… (एक माइक्रो पोस्ट)

केरल के मूल निवासी 66 वर्षीय आर्चबिशप जॉर्ज एलेंचेरी को गत सप्ताह पोप ने कार्डिनल की पदवी प्रदान की। वेटिकन में की गई घोषणा के अनुसार सोलहवें पोप बेनेडिक्ट ने 22 नए कार्डिनलों की नियुक्ति की है। रोम (इटली) में 18 फ़रवरी को होने वाले एक कार्यक्रम में एलेंचेरी को कार्डिनल के रूप में आधिकारिक शपथ दिलाई जाएगी।

जॉर्ज एलेंचेरी, कार्डिनल नियुक्त होने वाले ग्यारहवें भारतीय हैं। वर्तमान में भारत में पहले से ही दो और कार्डिनल कार्यरत हैं, जिनका नाम है रांची के आर्चबिशप टेलीस्पोर टोप्पो एवं मुम्बई के आर्चबिशप ओसवाल्ड ग्रेसियस। हालांकि भारत के ईसाईयों के लिये यह एक गौरव का क्षण हो सकता है, परन्तु इस नियुक्ति (और इससे पहले भी) ने कुछ तकनीकी सवाल भी खड़े कर दिये हैं।


जैसा कि सभी जानते हैं, वेटिकन अपने आप में एक स्वतन्त्र राष्ट्र है, जिसके राष्ट्र प्रमुख पोप होते हैं। इस दृष्टि से पोप सिर्फ़ एक धर्मगुरु नहीं हैं, बल्कि उनका दर्जा एक राष्ट्र प्रमुख के बराबर है, जैसे अमेरिका या भारत के राष्ट्रपति। अब सवाल उठता है कि पोप का चुनाव कौन करता है? जवाब है दुनिया भर में फ़ैले हुए कार्डिनल्स…। अर्थात पोप को चुनने की प्रक्रिया में कार्डिनल जॉर्ज एलेंचेरी भी अपना वोट डालेंगे। यह कैसे सम्भव है? एक तकनीकी सवाल उभरता है कि कि, क्या भारत का कोई मूल नागरिक किसी अन्य देश के राष्ट्र प्रमुख के चुनाव में वोटिंग कर सकता है? इसके पहले भी भारत के कार्डिनलों ने पोप के चुनाव में वोट डाले हैं परन्तु इस सम्बन्ध में कानून के जानकार क्या कहते हैं यह जानना दिलचस्प होगा कि भारत के संविधान के अनुसार यह कैसे हो सकता है? यदि पोप सिर्फ़ धर्मगुरु होते तो शायद माना भी जा सकता था, लेकिन पोप एक सार्वभौम देश के राष्ट्रपति हैं, उनकी अपनी मुद्रा और सेना भी है…

क्या सलमान रुशदी भारत में वोटिंग के अधिकारी हैं? क्या चीन का कोई नागरिक भारत के चुनावों में वोट डाल सकता है? यदि नहीं, तो फ़िर कार्डिनल एलेंचेरी किस हैसियत से वेटिकन में जाकर वोटिंग करेंगे?
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नोट :- जिस प्रकार किसी सेल्समैन को 100% टारगेट प्राप्त करने पर ईनाम मिलता है, उसी प्रकार आर्चबिशप एलेंचेरी को कार्डिनल पद का ईनाम इसलिए मिला है, क्योंकि उन्होंने पिछले दो दशकों में कन्याकुमारी एवं नागरकोविल इलाके में धर्म परिवर्तन में भारी बढ़ोतरी की है। ज्ञात रहे कि एलेंचेरी महोदय वही सज्जन हैं जिन्होंने कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानन्द स्मारक नहीं बनने देने के लिए जी-तोड़ प्रयास(?) किये थे, इसी प्रकार रामसेतु को तोड़कर सेतुसमुद्रम योजना को सिरे चढ़ाने के लिए करुणानिधि के साथ मिलकर एलेंचेरी महोदय ने बहुत मेहनत(?) की। हालांकि डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी के प्रयासों तथा हिन्दू संगठनों के कड़े विरोध के कारण वह दोनों ही दुष्कृत्य में सफ़ल नहीं हो सके।

http://in.christiantoday.com/articles/archbishop-george-alencherry-elevated-to-cardinal/6941.htm

Tuesday, January 10, 2012

Fake Indian Currency Notes and Finance Ministry of India



नकली नोटों पर सिर्फ़ चिंता जताई, वित्तमंत्री जी…? कुछ ठोस काम भी करके दिखाईये ना!!!

हाल ही में देवास (मप्र) में बैंक नोट प्रेस की नवीन इकाई के उदघाटन के अवसर पर वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि "हमें नकली नोटों की समस्या से सख्ती से निपटना जरूरी है…"। सुनने में यह बड़ा अच्छा लगता है, कि देश के वित्तमंत्री बहुत चिंतित हैं, लेकिन जमीनी हकीकत क्या है आईये इस बारे में भी थोड़ा जान लें…

अक्टूबर 2010 में ही केन्द्र सरकार के सामने यह तथ्य स्पष्ट हो चुका था कि भारतीय करंसी छापने के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला हजारों मीट्रिक टन कागज़ दोषपूर्ण पाया गया था। उस समय कहा गया था कि सरकार इस नुकसान का आकलन कर रही है, कि नोट छपाई के इन कागजों हेतु बनाए गये सुरक्षा मानकों में चूक क्यों हुई, कहाँ हुई? नकली नोटों की छपाई में भी उच्च स्तर पर कोई न कोई घोटाला अवश्य चल रहा है, इस बात की उस समय पुष्टि हो गई थी, जब ब्रिटिश कम्पनी De La Rue ने स्वीकार कर लिया कि भारत के 100, 500 और 1000 के नोट छापने के कागज़ उसकी लेबोरेटरी में सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरे। रिजर्व बैंक को लिखे अपने पत्र में ब्रिटिश कम्पनी ने माना कि आंतरिक जाँच में पाया गया कि भारत को दोषपूर्ण कागज़ सप्लाय हुआ है। उल्लेखनीय है कि यह कम्पनी 2005 से ही भारत की बैंक नोट प्रेसों को कागज सप्लाय कर रही है।


जब कम्पनी ने मान लिया कि 31 सुरक्षा मानकों में से 4 बिन्दुओं में सुरक्षा चूक हुई है, इसकी पुष्टि होशंगाबाद की लेबोरेटरी में भी हो गई, लेकिन तब तक 1370 मीट्रिक टन कागज रद्दी के रूप में भारत की विभिन्न नोट प्रेस में पहुँच चुका था, इसके अलावा 735 मीट्रिक टन नोट पेपर विभिन्न गोदामों एवं ट्रांसपोर्टेशन में पड़ा रहा, जबकि लगभग 500 मीट्रिक टन कागज De La Rue कम्पनी में ही रखा रह गया। इसके बाद वित्त मंत्रालय के अफ़सरों की नींद खुली और उन्होंने भविष्य के सौदे हेतु डे ला रू कम्पनी को ब्लैक लिस्टेड कर दिया। नकली नोटों की भरमार और इस कागज के गलत हाथों में पड़ने के खतरे की गम्भीरता को समझते हुए वित्त मंत्रालय ने एक करंसी निदेशालय का गठन कर दिया।

वित्त मंत्रालय के इस निदेशालय ने एक Inter-Departmental नोट में स्वीकार किया कि De La Rue कम्पनी के दोषयुक्त एवं घटिया कागज के कारण अर्थव्यवस्था पर गम्भीर सुरक्षा खतरा खड़ा हो गया है, क्योंकि 19 जुलाई 2010 से पहले इस कम्पनी द्वार सप्लाई किए गये कागजों की पूर्ण जाँच की जानी चाहिए। वित्त मंत्रालय ने पूरे विस्तार से गृह मंत्रालय को लिखा कि इस सम्बन्ध में क्या-क्या किया जाना चाहिए और जो खराब नोट पेपर आ गया है उसका क्या किया जाए तथा इस सम्बन्ध में डे-ला-रु कम्पनी से कानूनी रूप से मुआवज़ा कैसे हासिल किया जाए, परन्तु वह फ़ाइल गृह मंत्रालय में धूल खाती रही।


मजे की बात तो यह कि जब इस मुद्दे पर वित्त मंत्रालय ने कानून मंत्रालय से सलाह ली तो 5 जुलाई 2011 को उन्हें यह जानकर झटका लगा कि डे-ला-रू कम्पनी और भारतीय मुद्रा प्राधिकरण के बीच जो समझौता(?) हुआ है, उसमें ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं है कि यदि नोट के कागज़ सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरे तो सौदा रद्द कर दिया जाएगा। एटॉर्नी जनरल एजी वाहनवती ने इंडियन एक्सप्रेस को दिये गये एक इंटरव्यू में कहा कि, मुझे आश्चर्य है कि जैसे ही नोट पेपर के दोषपूर्ण होने की जानकारी हुई, इसके बाद भी डे-ला-रू कम्पनी से और कागज मंगवाए ही क्यों गये?

यानी इसका अर्थ यह हुआ कि जो 1370 मीट्रिक टन नोट छापने का कागज भारत में रद्दी की तरह पड़ा है वह डूबत खाते में चला गया, न ही उस ब्रिटिश कम्पनी को कोई सजा होगी और न ही उससे कोई मुआवजा वसूला जाएगा। इस कागज का आयात करने में लाखों डालर की जो विदेशी मुद्रा चुकाई गई, वह हमारे-आपके आयकर के पैसों से…। भारत में तो मामला वित्त, गृह और कानून मंत्रालय में उलझा और लटका ही रहा, उधर कम से कम डे-ला-रू कम्पनी ने अपनी गलती को स्वीकारते हुए कम्पनी के चीफ़ एक्जीक्यूटिव ऑफ़िसर, करंसी डिवीजन के निदेशक एवं डायरेक्टर सेल्स से इस्तीफ़ा ले लिया है, तथा इन कागजों के निर्माण में लगे कर्मचारियों पर भी जाँच बैठा दी है।

सभी जानते हैं कि नकली नोट भारत के बाजारों में खपाने में पाकिस्तान का हाथ है, लेकिन फ़िर भी हम पाकिस्तान को मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन का दर्जा देकर उससे व्यापार बढ़ाने में लगे हुए हैं। सुरक्षा एजेंसियों ने वाघा बॉर्डर, समझौता एक्सप्रेस और थार एक्सप्रेस के जरिये नकली नोटों के कई बण्डल पकड़े हैं, इसके अलावा नेपाल-भारत सीमा पर गोरखपुर, रक्सौल के रास्ते तथा बांग्लादेश-असम की सीमा से नकली नोट बड़े आराम से भारतीय अर्थव्यवस्था में खपाए जा रहे हैं। स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि अब तो उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के कुछ बैंकों की चेस्ट (तिजोरी) में भी नकली नोट पाए गये हैं, जिसमें बैंककर्मियों की मिलीभगत से इनकार नहीं किया जा सकता…

फ़िलहाल हम सिर्फ़ पिछले 10-12 दिनों में ही पकड़ाए नकली नोटों की घटनाओं को देख लें तो समझ में आ जाएगा कि स्थिति कितनी गम्भीर है…

Jan 9 2012

झारखण्ड में एक स्कूल शिक्षक (बब्लू शेख) के यहाँ से पुलिस ने 9600 रुपये के नकली नोट बरामद किये। यह शिक्षक देवतल्ला का रहने वाला है, लेकिन पुलिस जाँच में पता चला है कि यह बांग्लादेश का निवासी है और झारखण्ड में संविदा शिक्षक बनकर काम करता था, फ़िलहाल बबलू शेख फ़रार है।
http://www.indianexpress.com/news/Rs-9-600-in-fake-notes-seized-from-J-khand-teacher-s-house/897515/

Jan 7th 2012


NIA की जाँच शाखा ने 7 जनवरी 2012 को एक गैंग का पर्दाफ़ाश करके 11 लोगों को गिरफ़्तार किया। इसके सरगना मोरगन हुसैन (पश्चिम बंगाल मालदा का निवासी) से 27,000 रुपये के नकली नोट बरामद हुए। पुलिस धुलाई में हुसैन ने स्वीकार किया कि उसे यह नोट बांग्लादेश की सीमा से मिलते थे जिन्हें वह पश्चिम बंग के सीमावर्ती गाँवों में खपा देता था।
http://www.hindustantimes.com/India-news/Hyderabad/NIA-busts-major-counterfeit-currency-racket-with-Pak-links/Article1-792860.aspx


Jan 2 2012


गुजरात के पंचमहाल जिले में पुलिस के SOG विशेष बल ने, एक शख्स मोहम्मद रफ़ीकुल इस्लाम को गिरफ़्तार करके उससे डेढ़ लाख रुपये की नकली भारतीय मुद्रा बरामद की। ये भी पश्चिम बंग के मालदा का ही रहने वाला है, एवं इसे गोधरा के एक शख्स से ये नोट मिलते थे, जो कि अभी फ़रार है।
http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2012-01-02/vadodara/30581292_1_currency-notes-fake-currency-state-anti-terrorist-squad


Dec 29 2011


सीमा सुरक्षा बल ने शिलांग (मेघालय) में भारत-बांग्लादेश सीमा स्थित पुरखासिया गाँव से मोहम्मद शमीम अहमद को भारतीय नकली नोटों की एक बड़ी खेप के साथ पकड़ा है, शमीम, बांग्लादेश के शेरपुर का निवासी है।
http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2011-12-29/guwahati/30569256_1_fake-indian-currency-currency-notes-bsf-troops


Dec 29 2011


आणन्द की स्पेशल ब्रांच ने सूरत में छापा मारकर नेपाल निवासी निखिल कुमार मास्टर को गिरफ़्तार किया और उससे एक लाख रुपये से अधिक के नकली नोट बरामद किये। पूछताछ जारी है…
http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2011-12-29/vadodara/30568259_1_currency-notes-fake-currency-racket

अब आप सोचिये कि जब पिछले 10-12 दिनों में ही देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी मात्रा में नकली नोट बरामद हो रहे हैं, तो अहसानफ़रामोश बांग्लादेशियों ने पिछले 8-10 साल में भारतीय अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान पहुँचाया होगा। ज़ाहिर है कि इन भिखमंगे बांग्लादेशियों के पास ये नकली नोट कहाँ से आते हैं, सभी जानते हैं, लेकिन करते कुछ भी नहीं…

सबसे पहला सवाल तो यही उठता है कि क्या 64 साल बाद भी हम इतने गये-गुज़रे हैं कि नोट का मजबूत सुरक्षा प्रणाली वाला कागज हम भारत में पर्याप्त मात्रा में निर्माण नहीं कर सकते? क्यों हमें बाहर के देशों से इतनी महत्वपूर्ण वस्तु का आयात करना पड़ता है? तेलगी के स्टाम्प पेपर घोटाले में भी यह बात सामने आई थी कि सबसे बड़ा खेल प्रिण्टिंग प्रेस के स्तर पर ही खेला जाता था, ऐसे में डे-ला-रू कम्पनी के ऐसे डिफ़ेक्टिव कागज पाकिस्तान के हाथ भी तो लग सकते हैं, जो उनसे नकली नोटों की छपाई करके भारत में ठेल दे? घटनाओं को देखने पर लगता है कि ऐसा ही हुआ है। क्योंकि हाल ही में पकड़ाए गये नकली नोट इतनी सफ़ाई से बनाए गये हैं, कि बैंककर्मी और CID वाले भी धोखा खा जाते हैं…। जब नकली नोटों की पहचान बैंककर्मी और विशेषज्ञ ही आसानी से नहीं कर पा रहे हैं तो आम आदमी की क्या औकात, जो कभी-कभार ही 500 या 1000 का नोट हाथ में पकड़ता है?

दो सवाल और भी हैं… 
1) मिसाइल और उपग्रह तकनीक और स्वदेशी निर्माण होने का दावा करने वाला भारत नोटों के कागज़ आखिर बाहर से क्यों मँगवाता है, यह समझ से परे है…।

2) नकली नोटों के सरगनाओं के पकड़े जाने पर उन्हें "आर्थिक आतंकवादी" मानकर सीधे मौत की सजा का प्रावधान क्यों नहीं किया जाता?

खैर… रही बात विभिन्न सरकारों और मंत्रियों की, तो वे नकली नोटों की समस्या पर चिंता जताने…, कड़ी कार्रवाई करेंगे, जैसी बन्दर घुड़की देने…, का अपना सनातन काम कर ही रहे हैं…।

Friday, January 6, 2012

Vote Bank Politics, Supreme Court of India and Masjid Reconstructed

वोट बैंक राजनीति के सामने, सुप्रीम कोर्ट के आदेश की क्या औकात…?

31 जुलाई 2009 को सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के पश्चात जस्टिस दलबीर भण्डारी एवं जस्टिस मुकुन्दकम शर्मा ने अपने आदेश में कोलकाता के नज़दीक डायमण्ड हार्बर की एक अदालत के परिसर में स्थित एक मस्जिद को हटाने के आदेश दिये थे। सुप्रीम कोर्ट में आए कागज़ातों के अनुसार यह मस्जिद अवैध पाई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को लगभग 2 वर्ष बीत चुके, और एक निश्चित समय सीमा में  मस्जिद को हटाने के निर्देश दिये गये थे। आज की तारीख में डायमण्ड हार्बर स्थित उसी क्रिमिनल कोर्ट के परिसर में उसी स्थान पर पुनः एक मस्जिद का निर्माण किया जा रहा है…। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियाँ उड़ाते हुए डायमण्ड हार्बर के SDO ने इसके निर्माण की अनुमति दे दी है। इस मामले में दक्षिण 24 परगना जिले के मन्दिर बाजार स्थित राइच मोहल्ले के एक मुस्लिम नेता का हाथ बताया जा रहा है। 

सूत्रों के अनुसार राइच मोहल्ले के इन मुस्लिम नेताओं का क्षेत्र के SDO पर इतना दबाव है कि वे अपनी मनमर्जी के टेण्डर पास करवाकर सिर्फ़ मुस्लिम व्यवसाईयों को ही टेण्डर लेने देते हैं (बिहार के रेत खनन माफ़िया की तरह एक गैंग बनाकर)। राइच मोहल्ला के कुछ मुस्लिमों ने डायमण्ड हार्बर स्थित हाजी बिल्डिंग पारा के तीर्थ कुटीर में चलाये जा रहे गोपालजी ट्रस्ट की भूमि पर भी अतिक्रमण कर लिया है, लेकिन SDO के ऑफ़िस में इस हिन्दू संगठन की कोई सुनवाई नहीं हो रही…। राजनैतिक दबाव इसलिए काम नहीं कर सकता, क्योंकि वामपंथी एवं तृणमूल कांग्रेस, दोनों ही मुस्लिम वोटरों को नाराज़ करना नहीं चाहते


पश्चिम बंगाल स्थित संस्था हिन्दू सम्हति के कार्यकर्ताओं ने मस्जिद तोड़े जाने तथा उसके पुनः निर्मित किये जाने के वीडियो फ़ुटेज एकत्रित किए हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा ढहाई गई अवैध मस्जिद के स्थान पर ही दूसरी मस्जिद के निर्माण की गतिविधियाँ साफ़ देखी जा सकती हैं। स्थानीय अपुष्ट सूत्रों के अनुसार इस कार्य की अनुमति प्राप्त करने के लिए 10 लाख रुपये की रिश्वत, उच्चाधिकारियों को दी गई है…

(डायमण्ड हार्बर से हिन्दू सम्हति के श्री राज खन्ना की रिपोर्ट पर आधारित…
http://southbengalherald.blogspot.com/2011/12/illegal-mosque-construction-within.html 

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चलते-चलते एक निगाह इस खबर पर भी…:-
पश्चिम बंग से ही सटे हुए बांग्लादेश के सिलहट में एक स्कूल के वार्षिकोत्सव के दौरान हिन्दू बच्चों एवं उनके पालकों को जानबूझकर गौमांस परोसा गया। भोजन का बहिष्कार करने एवं विरोध प्रदर्शन के बाद स्कूल प्रबन्धन ने मामला रफ़ा-दफ़ा कर दिया। उल्लेखनीय है कि इस अग्रगामी गर्ल्स स्कूल की स्थापना, ख्यात समाजसेविका देवी चौधरानी ने की थी, परन्तु बांग्लादेश हो या पाकिस्तान, अल्पसंख्यक हिन्दुओं को नीचा दिखाने तथा उनका धार्मिक अपमान करने का कोई मौका गँवाया नहीं जाता