Thursday, December 8, 2011

Javed Akhtar Why this Kolaveri Kolaveri Di

जावेद अख्तर साहब, इतना “श्रेष्ठताबोध” ठीक नहीं… - व्हाय दिस कोलावेरी डी??

रजनीकान्त के दामाद धनुष और उनकी बेटी ऐश्वर्या द्वारा निर्मित फ़िल्म “3” के लिए एक गीत फ़िल्माया जाएगा, जिसके बोल हैं “व्हाय दिस कोलावरी कोलावरी कोलावरी डी”, इस गीत की रिकॉर्डिंग के समय बनाए गये वीडियो ने ही पूरी दुनिया में धूम मचा रखी है। इस गीत को गाया है स्वयं “धनुष” ने, जबकि संगीत तैयार किया है, अनिरुद्ध रविचन्द्रन ने।

तमिल और अंग्रेजी शब्दों से मिलेजुले इस “तमिलिश” गीत की लोकप्रियता का आलम यह है, कि अपुष्ट सूत्रों के अनुसार 4 मिनट के इस वीडियो क्लिप को यू-ट्यूब पर जारी होने के मात्र 15 दिनों के अन्दर 1 करोड़ से अधिक युवाओं ने इसे देख लिया है, लगभग इतने ही डाउनलोड हो चुके हैं, चार भाषाओं में अभी तक इसका रीमिक्स बन चुका है तथा लगभग सभी मोबाइल कम्पनियों ने इसे कॉलर तथा रिंगटोन ट्यून बनाने हेतु अनुबन्ध कर लिया है। स्वयं धनुष का कहना है कि उन्हें भी अंदाज़ा नहीं था कि मौज-मस्ती में बनाए गये इस वीडियो तथा इस गीत को युवा पीढ़ी इतना पसन्द करेगी…

पहले आप इस गीत का आनन्द लीजिये, फ़िर जावेद अख्तर साहब के बारे में बात करेंगे… यदि आज और अभी तक, आपने इस गीत को एक बार भी न सुना हो, तो मान लीजिये कि आप बूढ़े हो चुके हैं…



सुना आपने…!!! भले ही आपको इसके तमिल शब्द समझ में न आए हों, परन्तु इसकी धुन और लय थिरकने को बाध्य करती है… शायद इसीलिए यह गीत आज की तारीख में युवाओं की धड़कन बन गया…।

अब आते हैं, जावेद साहब की “हरकत” पर…। जावेद साहब हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री के एक स्तम्भ हैं, उन्होंने कई-कई बेहतरीन गीत लिखे हैं। खैर… जैसी कि हमारे मीडिया की परम्परा है इस गीत के सुपर-डुपर-टुपर हिट होने के बाद जावेद साहब इस पर प्रतिक्रिया चाही गई (आप पूछेंगे जावेद साहब से क्यों, गुलज़ार से क्यों नहीं? पर मैंने कहा ना, कि यह एक “परम्परा” है…)। जावेद साहब ठहरे “महान” गीतकार, और एक उम्दा शायर जाँनिसार अख्तर के सुपुत्र, यानी फ़िल्म इंडस्ट्री में एक ऊँचे सिंहासन पर विराजमान… तो इस गीत की “कटु” आलोचना करते हुए जावेद अख्तर फ़रमाते हैं, कि “इस गीत में न तो धुन अच्छी है, इसके शब्द तो संवेदनाओं का अपमान हैं, यह एक बेहद साधारण गीत है…” एक अंग्रेजी कहावत दोहराते हुए जावेद अख्तर कहते हैं कि “जनता भले ही सम्राट के कपड़ों की वाहवाही कर रही है, लेकिन हकीकत यह है कि सम्राट नंगा है…”।

यानी जो गाना रातोंरात करोड़ों युवा दिलों की धड़कन बन गया है, लाखों की पसन्द बन गया है, उसे जावेद साहब एकदम निकृष्ट और नंगा कह रहे हैं। यह निश्चित रूप से उनके अन्दर पैठा हुआ “श्रेष्ठताबोध” ही है, जो “अपने सामने” हर किसी को ऐरा-गैरा समझने की भूल करता है।

जावेद साहब, आप एक महान गीतकार हैं। मैं भी आपके लिखे कई गीत पसन्द करता हूँ, आपने “एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा…” एवं “पंछी, नदिया, पवन के झोंके…” जैसे सैकड़ों मधुर गीत लिखे हैं, परन्तु दूसरे के गीतों के प्रति स्वयं का इतना श्रेष्ठताबोध रखना अच्छी बात नहीं है। धनुष (रजनीकांत के दामाद) और श्रुति हासन (कमल हासन की पुत्री) जैसे कुछ युवा, जो कि दो बड़े-बड़े बरगदों (रजनीकांत और कमल हासन) की छाया तले पनपने की कोशिश में लगे हैं, सफ़ल भी हो रहे हैं… उनके द्वारा रचित इस अदभुत गीत की ऐसी कटु आलोचना करना अच्छी बात नहीं है।

जावेद साहब, आप मुझे एक बात बताईये, कि इस गीत में आलोचना करने लायक आपको क्या लगा? गीत “तमिलिश” (तमिल+इंग्लिश) में है, तमिल में कोलावरी डी का अर्थ होता है, “घातक गुस्सा”, गीत में प्रेमिका ने प्रेमी का दिल तोड़ा है और प्रेमी उससे पूछ रहा है, “व्हाय दिस कोलावरी डी…” यानी आखिर इतना घातक गुस्सा क्यों? गीत में आगे चेन्नै के स्थानीय तमिल Frases का उपयोग किया है, जैसे – गीत के प्रारम्भ में वह इसे “फ़्लॉप सांग” कहते हैं, स्थानीय बोलचाल में “Soup Boys” का प्रयोग उन लड़कों के लिए किया जाता है, जिन्हें लड़कियों ने प्रेम में धोखा दिया, जबकि “Holy Cow” शब्द का प्रयोग भी इससे मिलते-जुलते भावार्थ के लिए ही है…।

अब बताईये जावेद साहब!!! क्या इस गीत के शब्द अश्लील हैं? क्या इस गीत का फ़िल्मांकन (जो कि अभी हुआ ही नहीं है) अश्लील है? क्या इस गीत की रिकॉर्डिंग के प्रोमो में कोई नंगी-पुंगी लड़कियाँ दिखाई गई हैं? आखिर ऐसी कौन सी बात है जिसने आपको ऐसी आलोचना करने पर मजबूर कर दिया? मैंने तो कभी भी आपको, समलैंगिकता, लिव-इन-रिलेशनशिप तथा मुन्नी-शीला जैसे गीतों की इतनी कटु आलोचना करते तो नहीं सुना? फ़िर कोलावरी डी ने आपका क्या बिगाड़ दिया?  जब आपकी पुत्री जोया अख्तर ने “जिंदगी ना मिलेगी दोबारा…” जैसी बकवास फ़िल्म बनाई और उसमें स्पेन के “न्यूड बीच” (नग्न लोगों के लिये आरक्षित समुद्र तट) तथा “टमाटर उत्सव” को बड़े ही भव्य और “खुलेपन”(?) के साथ पेश किया, तब तो आपने उसकी आलोचना नहीं की? आपकी इस फ़िल्म से “प्रेरणा”(?) लेकर अब भारत के कुछ शहरों में “नवधनाढ्य रईस औलादें” अपने-अपने क्लबों में इस “टमाटर उत्सव” को मनाने लगी हैं, जहाँ टनों से टमाटर की होली खेली जाती है, जबकि भारत की 60% से अधिक जनता 20 रुपये रोज पर गुज़ारा कर रही है… क्या आपने इस “कुकर्मी और दुष्ट” टाइप की फ़िज़ूलखर्ची की कभी आलोचना की है?

जावेद साहब, आप स्वयं दक्षिण स्थित एआर रहमान के साथ कई फ़िल्में कर चुके हैं, फ़िर भी आप युवाओं की “टेस्ट” अभी तक नहीं समझ पाए? वह इसीलिए क्योंकि आपका “श्रेष्ठताबोध” आपको ऐसा करने से रोकता है। समय के साथ बदलिये और युवाओं के साथ चलिये (कम से कम तब तक तो चलिये, जब तक वे कोई अश्लीलता या बदतमीजी नहीं फ़ैलाते, अश्लीलता का विरोध तो मैं भी करता हूँ)। मैं जानता हूँ, कि आपकी दबी हुई दिली इच्छा तो गुलज़ार की आलोचना करने की भी होती होगी, परन्तु जावेद साहब… थोड़ा सा गुलज़ार साहब से सीखिए, कि कैसे उन्होंने अपने-आप को समय के साथ बदला है…। “मोरा गोरा अंग लई ले…”, “हमने देखी है उन आँखों की खुशबू…”, “इस मोड़ से जाते हैं…” जैसे कवित्तपूर्ण गीत लिखने वाले गुलज़ार ने बदलते समय के साथ, युवाओं के लिए “चल छैंया-छैंया…”, “बीड़ी जलई ले जिगर से…” और “कजरारे-कजरारे…” जैसे गीत लिखे, जो अटपटे शब्दों में होने के बावजूद सभी सुपरहिट भी हुए। परन्तु उनका कद आपके मुकाबले इतना बड़ा है कि आप चाहकर भी गुलज़ार की आलोचना नहीं कर सकते।

संक्षेप में कहने का तात्पर्य जावेद साहब यही है कि, आप अपना काम कीजिये ना? क्यों खामख्वाह अपनी मिट्टी पलीद करवाने पर तुले हैं? आपके द्वारा कोलावरी डी की इस आलोचना ने आपके युवा प्रशंसकों को भी नाराज़ कर दिया है। आपकी इस आलोचना को कोलावरी डी के संगीतकार अनिरुद्ध ने बड़े ही सौम्य और विनम्र अंदाज़ में लिया है, अनिरुद्ध कहते हैं कि, “जावेद साहब बड़े कलाकार हैं और आलोचना के बहाने ही सही कम से कम मेरे जैसे युवा और अदने संगीतकार का गीत उनके कानों तक तो पहुँचा…”। अब इस युवा संगीतकार को आप क्या कहेंगे जावेद साहब?
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चलते-चलते:- जावेद साहब, एक बात और… युवाओं की शक्ति और नई तकनीक को समझने में नाकामयाब तथा समय से पहले ही बूढ़े हो चुके कुछ “मामू” टाइप के लोग, अब फ़ेसबुक और गूगल पर प्रतिबन्ध के बारे में भी सोच रहे हैं… हैरत की बात है ना!!!

35 comments:

Naved said...

aadat se majboor jo hain...

उम्दा सोच said...

जावेद साहब...व्हाय दिस कोलावरी कोलावरी कोलावरी डी ???

सागर नाहर said...

सुरेश भाई,
आपके यह कहने पर कि जिन्होने यह नहीं सुना उन्हे यह मान लेना चाहिए कि वे बूढ़े हो चुके हैं; मैने इस गीत को सुनने की कोशिश की लेकिन
54 सैक्ण्ड सुनने के बाद गीत को बंद कर देना पड़ा। ठीक है युवाओं को यह गीत पसन्द आया लेकिन ऐसा तो नहीं कि यह बहुत ही बढ़िया गीत हो।
अगर सिर्फ इसी गीत को सुनने से युवा कहलाया जा सकता है तो भई हम बूढ़े ही सही।
यह टिप्पणी सिर्फ आपके .. "बूढ़े" कहने पर लिखी है बाकी किसी की भावनाओं को आहत करने का कोई इरादा नहीं है।
बाकी रही बात जावेद साहब की तो आप उनकी बातों को इतना सीरीयसली लेते हैं!!!!!

जितेन्द्र सिंह : राष्ट्रवादी भारतीय... said...

जब युवा पसंद करने पे आता है तो अल्ताफ राजा जैसे 'स्टार' बन जाते हैं...
जावेद अख्तर 'सठियाए' हुए हैं... च्यवनप्राश खाने वाले यौवन का उत्साह और मिजाज क्या जाने.??
अब कोलावेरी डी का रिमिक्स मैंने कल ही सुना सोनू निगम के पुत्र की आवाज में... वास्तव में मनोरंजक है... आज के युवाओं की पसंद 'बुढऊ' को क्या पता.??

कुछ भी हो सुरेश जी आपका 'चलते-चलते' ज्यादा मजेदार है... कुटिल चप्पल अब मामू भी हो गया... हा हा हा हा...

वन्दे मातरम्...
जय हिंद... जय भारत...

Suresh Chiplunkar said...

सागर भाई,
आप एक संगीत रसिक हैं, आपकी असहमति सर-आँखों पर…
"बूढ़े" शब्द की उपमा का प्रयोग इसलिये किया क्योंकि आजकल यह गाना चारों तरफ़ वायरस की तरह बज रहा है और यदि अभी भी किसी ने नहीं सुना, इसका मतलब यह है कि उस व्यक्ति का युवाओं से संवाद एवं सम्पर्क टूट चुका है… मेरा बस इतना मंतव्य था…। :) :)

पहली बार सुनने पर मुझे भी यह गाना इतना आकर्षक नहीं लगा, परन्तु दो-तीन बार सुनने के बाद मुझे महसूस हुआ कि "कोई तो बात है यार इसमें…"।

सागर भाई, आपके मुकाबले बूढ़ा तो मैं हूँ, परन्तु जब मेरी दुकान पर फ़ोटोकॉपी करवाने आईं दो लड़कियों (शायद 17-20 वर्ष की होंगी) ने मेरे कम्प्यूटर पर इसे चलते देखा तो बहुत खुश हो गईं, और कहा… "अंकल…" आप भी कोलावेरी डी सुनते हैं? अब बताईये…

उस कन्या के ऐसे कमेण्ट का मतलब यही था कि कोलावेरी डी गीत उस Age Group को दीवाना बना रखा है और जब मेरी आयु वर्ग का व्यक्ति उनके सामने इस गीत की तारीफ़ करता या गुनगुनाता है तो एक "संवाद" स्थापित हो जाता है…

बहरहाल, सागर भाई… आपको पसन्द भले न आया हो, मुझे तो बहुत पसन्द आया… :)

सागर नाहर said...

:) :)

जितेन्द्र सिंह : राष्ट्रवादी भारतीय... said...

वैसे एक बात सच बताना सुरेश भाई...
हिंदुत्व और राष्ट्रवाद छोड़, आपने ये गानों के प्रोमोशन की तरफ 'यु टर्न' क्यों लिया...
कुछ आमदनी भी हुई या यूँ ही कोलावेरी डी की 'बेगारी' कर रहे हो..??
नकारात्मक मत समझना... गलती के लिए क्षमा...
वन्दे मातरम्...
जय हिंद... जय भारत...

Suresh Chiplunkar said...

@ जितेन्द्र सिंह जी - बस ऐसे ही, Taste change करने के लिए अलग विषय पर लिख लिया… :) :)

(जब शिवाजी मनोरंजन करते थे, उस समय तलवार नहीं लहराते थे…)

जितेन्द्र सिंह : राष्ट्रवादी भारतीय... said...

हा हा हा हा हा ...
बहुत खूब भाई जी...
जवाब... लाजवाब.!!!!!!!!!

वन्दे मातरम्...
जय हिंद... जय भारत...

Anonymous said...

suresh bhai phai par aayiye sale ne man liya ki wah ISI ka agent hai. idhar chidamaram sahab ka bhi number hai. is congress ki to kolaveri di

Anonymous said...

Please visit this link

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/12/111208_mecca_compensation_tb.shtml

rajesh sehrawat said...

सुरेश जी , हाँ बूढ़े ही हो गये हैं

Mahendra Gupta said...

Jai Hind! Sir,
Mai Aapki Bhawana ko Bahut achchhi tarah samajh raha hu sir . Aapne jo bhi likha bahut achchha aur satik lika hai. Mai To apke Maryaadit Jawab ka kayal hu. Jitendra ji aur Sagar Sahab lekh ke sath uski Bhawana ko bhi Dekhate to aise sawal nahi karte.
Too Good!

सुलभ said...

उम्दा सोच वाले सौरभ जी की टिप्पणी दोहराता हूँ -

जावेद साहब...व्हाय दिस कोलावरी कोलावरी कोलावरी डी ???

महेन्द्र मोदी said...

ये गाना इस बूढ़े ने भी इससे पहले नहीं सुना. अपने आपको बूढा मानने में कोई एतराज़ भी नहीं है, होगा भी कैसे? सरकार ने रिटायर कुछ सोच समझकर ही किया होगा न? मगर जहां तक जावेद साहब के श्रेष्ठताबोध का सवाल है, ये उनका कुसूर हरगिज़ नहीं है. हम लोग ही इसके लिए ज़िम्मेदार हैं. ऐसे लोग जब कुछ भी आयं बांय शांय बोल देते हैं तो हम और आप जैसे लोग वाह वाह कर उठते हैं. जब यही क्रम चलता रहता है तो ऐसे विद्वान खुद अपनी ही नज़रों में बहुत बड़े बन जाते हैं और हर विषय पर टिप्पणी देना अपना अधिकार समझ लेते हैं और वाह वाह को आपका कर्तव्य. वो मान कर चलते हैं... जो कुछ भी उनके मुंह से निकलेगा वो इतिहास का एक हिस्सा बन जाएगा और आप और मुझ जैसे लोग उनके सामने और बौने हो जायेंगे.
हमें उनके ऊंचे कद में कोई शक नहीं है मगर जब जब भी उनके मुंह सी ऐसी कोई बात निकले जिस पर वाह वाह नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी आलोचना करनी चाहिए तो बेहिचक हम आलोचना करने से भी पीछे न हटें.
आपने वही किया है सुरेश जी, आप साधुवाद के पात्र हैं.

संजय @ मो सम कौन ? said...

पसंद अपनी अपनी, ख्याल अपना अपना।

Jeet Bhargava said...

सुरेशजी,
मैं दावे के साथ कहता हूँ कि अगर किसी मुस्लिम कलाकार ने यह गाना लिखा/गाया होता तो जावेद की राय ठीक इससे अलग होती।
अब तो फिल्म इंडस्ट्री के लोग अब जानने लग गए है कि जावेद की हर बात/मुद्दे मे 'इस्लाम' घुस जाता है।
खुद जावेद अख्तर ने ॐ शांति ॐ मे 'दर्दे डिस्को...किस किसको...साइन फ्रांसिस्को..'जैसा बेहूदा गाना लिखा है। उसके बारे मे वह चुप हो जाएगा। जाहीर है जावेद अख्तर जैसा दोगला कलाकार कोई नही होगा।
उन्होने यूपी/बिहार से आनेवाले कई प्रतिभाशाली लेखको की रचनाओ को 'खरीद' कर उस पर अपने नाम का चस्पा लगाकर...करोड़ो की कमाई की है।
कई बार तो उनकी चोरी पकड़ी भी गई है। और इसी के बारे मे उनकी पोल खोलता एक लेख कुछ दिन पहले अपने ब्लॉग पे डाला था..जिसका लिंक ये है:
http://secular-drama.blogspot.com/2011/09/blog-post.html

Rahul Singh said...

लोग ही हैं, जो विशेषज्ञों की राय को गलत साबित करते हैं.

Yogesh Saroya said...

vo aukat to batayega hi na ... jalan jo ho rahi h e...

संजय बेंगाणी said...

हट के चीज पसन्द आती है. जरूरी नहीं कि वह उत्तम हो. यही कोलबारी के साथ है. गीत बस यूँ ही तुक्का टाइप है. मुझे पसन्द नहीं आया. मुझे आलोचना का अधिकार है. मगर तिरस्कार नहीं कर सकता. जिन्हें मजा आया, वे सुनें. गाना अश्लील भी नहीं है. हर कोई गुलजार नहीं हो सकता. :)

दीपक बाबा said...

:)

:)

Yo Boys I Am Sing Song...

Soup Song..

Flop Song..

Why This Kolaveri Kolaveri Kolaveri Di

Why This Kolaveri Kolaveri Kolaveri Di

Rythm Correct
Why This Kolaveri Kolaveri Kolaveri Di
Maintain Please
Why This Kolaveri ..............................Aaa Di
Distance-La Moonu Moonu. Moonu Colour Whiteu.
White-U Background Night-U Night-U, Night-U Colour-U Black-U...
Why This Kolaveri Kolaveri Kolaveri Di
Why This Kolaveri Kolaveri Kolaveri Di
White Skin-U Girl-U Girl-U, Girl-U Heart-U Black-U,
Eyes-U Eyes-U Meet-U Meet-U, My Future-U Dark-U
Why This Kolaveri Kolaveri Kolaveri Di
Why This Kolaveri Kolaveri Kolaveri Di
Mama Notes Edhuthuko, Appadiye Kaiyla Snacks Edhuthuko,
Pa Pa Pa Ppaan- Pa Pa Pa Ppaan- Pa Pa Pa Ppaan Pa Pa Ppan
Sariyaa Vaasi...
Super Mama Ready.. Oneee Twooo Three Four..
Whaa Wat-A Change Over Mama.
Ok Mama Now Tune Change-U.
Kaila Glassu..
Only English...
Handula Glass-U, Glass-La Scotch-U Eyes-U Full-Aa Tear-U
Empty Life-U Girl-U Come-U Life-U Reverse Gear-U
Lovvu Lovvu Oh My Lovvu, You Showed Me Bouv-U
Cow-U Cow-U Holy Cow-U, I Want You Hear Now-U
God-U I Am Dying Now-U, She Is Happy How-U
This-U Song-U For Soup Boys-U,
We Don't Have Choice-U
Why This Kolaveri Kolaveri Kolaveri Di
Why This Kolaveri Kolaveri Kolaveri Di
Why This Kolaveri Kolaveri Kolaveri Di
Why This Kolaveri Kolaveri Kolaveri Di

सागर नाहर said...

जीत भार्गव जी की टिप्पणी से एकदम सहमत!

परमजीत सिँह बाली said...

राजनीति करने वालों के लिये ये गाना सही है;)

I and god said...

चलते-चलते:- समय से पहले ही बूढ़े हो चुके कुछ “मामू” टाइप के लोग, अब फ़ेसबुक और गूगल पर प्रतिबन्ध के बारे में भी सोच रहे हैं… हैरत की बात है ना!!!

सुरेश जी यह कोई मामू टाईप लोगों की बात नहीं हैं . कपिल ने यह कह कर आपके हमारे लिखने पर रोक लगाने की बात की है , जो वो कर भी सकते हैं . जैसे चीन में फस-बुक आप नहीं खुल सकते .

aativas said...

सब लोगोंको एक चीज पसंद होनीही चाहिये, नही तो या तो वो बुढे है,(... गद्दार है) .. यह विचारधारा मुझे चिंताजनक लगती है! जावेद साबसे आपके बाकी मतभेद हो सकते है - लेकिन एक गीत पर उनकी टिप्पणी के लिये इतना एतराज क्यो? जैसे की वह कोई समाज के हित का मामला हो...

Neeraj नीरज نیرج said...

मन्ने तो ये लेख 'रिमिक्स राष्ट्रवादी' टाइप का लागै है। ;)
ये है असली राष्ट्रवादी गाना.. इसे सुनिए http://www.youtube.com/watch?v=uIhQm6gcUCw

:))ha ha

Bharat Arya said...

Actually there is no any Muslim artist in compiling this song, otherwise Miya Javed would not have irritation this much. Also it is not going to be filmed on any Muslim actor; so is this colitis.

चन्द्र प्रकाश दुबे said...

यह जावेद अख्तर की कोलावारी डी के सफलता से उपजा हुआ एक इर्ष्या मात्र है. क्योंकि उसने गीतों के लिखने और सफल होने का खुद को स्व घोषित झंडाबरदार समझ लिया है. ये उसकी किसी और की लोकप्रियता को पचा न पाने से उपजा भौंडा भंडास है.
सुरेश जी कृपया अपनी उर्जा सार्थक बातों में लगाएं.
" और भी गम है ज़माने में मुहब्बत के सिवा."

Sumant Vidwans (सुमंत विद्वांस) said...

मैं इस बात से सहमत नहीं कि जिन्होंने ये गीत नहीं सुना है, वे बूढ़े हो चुके हैं (या उनका युवा पीढ़ी से संपर्क टूट चुका है). इस गीत के 'बारे में' सुनने के बाद मैंने इस गीत को सुनना चाहा, लेकिन कुछ देर बाद ही इसे बंद कर दिया क्योंकि मुझे एकरसता/नीरसता महसूस होने लगी. ये सही है कि तमिल शब्दों को समझना मेरे बस की बात नहीं, लेकिन संगीत में भी ऐसा कुछ अभूतपूर्व या असाधारण नहीं है, जिसके कारण इसे कोई अदभुत गीत माना जाए. मेरे विचार से यह एक सामान्य सा गीत है, लेकिन केवल प्रचार और कमाल हासन/रजनीकांत जैसे सुपर स्टार्स व उनकी संतानों का नाम जुड़ा होने के कारण इसे इतनी प्रसिद्धि मिल गई है.

जावेद अख्तर ने इस गीत के बारे में जो कहा (और यह मुझे आपके इसी लेख से पता चला है) मैं उससे सहमत हूँ.

Anonymous said...

इतना अच्छा भी नहीं है यह गाना... रजनीकांत का दामाद सिंगर है इसलिए साउथ इंडियन दोस्तों ने सुना दिया पर मुझे तो पसंद नहीं आया.

प्रतिभा सक्सेना said...

इसमें में लोक-रंजन की इतनी सामर्थ्य है -क्यों ?इसका कारण जानने की कोशिश करने के बजाय
अति लोकप्रिय गीत को बेवजह धिक्कारना स्वस्थ मानसिकता का लक्षण नहीं है !

Anonymous said...

सुरेशजी माना आपको जावेद अख्तर पसंद नहीं पर उन्होंने कुछ गलत तो नहीं कहा और सभी लोगों को विचार प्रकट करने का अधिकार तो है ही... वैसे जावेद अख्तर ने बाद में एक आलोचक को कहा भी 'What kind of logic is this even if all my songs are trash, meaningless, unbearable how does that make this Kolaveri D good.' और मैं (पहली बार) जावेद अख्तर की इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ. रही बात लोकप्रियता की तो रा-वन जैसी फिल्मे भी बहुत लोकप्रिय हैं... यूट्यूब पर 78 लाख लोग इस बन्दर को भी देख ही चुके हैं (http://www.youtube.com/watch?v=6DBuk91phkI) तो इसका मतलब ये थोड़ी है की हम इनकी लोकप्रियता का कारण खोजने लगें... कुछ चीजों की सफलता के पीछे कोई कारण नहीं होता... जैसे कई 'सेलेब्रिटीज' का सेलेब्रिटी होना ही उनके सेलेब्रिटी होने का कारण होता है, वैसे ही यह गीत रिलीज से पहले ही इन्टरनेट पर छा गया. धनुष ने खुद कहा है कि उन्हें गीत की इतनी सफलता की उम्मीद नहीं थी और उन्होंने इस गीत पर कोई खास मेहनत भी नहीं की (http://ibnlive.in.com/news/i-wrote-kolaveri-in-6-minutes-dhanush/205737-62-128.html) यह गीत अन्य गीतों कि तरह ही एक सामान्य सा गीत था. और जावेद अख्तर ने कुछ ऐसा नहीं कहा जो अस्वीकार्य हो, बल्कि मैं तो कहूँगा प्रजा के साथ राजा को भी पता है कि वो नंगा है पर कोई कुछ नहीं बोल रहा... बस कुछ भाण्ड (टाइम्स ऑफ इण्डिया और हमारे टीवी चैनल) तारीफ़ के पुल बांधे जा रहे हैं. उन्हें देख कर आप वाल्टेयर की वो बात ना भूलें... "I disapprove of what you say, but I will defend your right to say it"

dschauhan said...

यह जावेद अख्तर की कोलावारी डी के सफलता से उपजा हुआ एक इर्ष्या मात्र है.जावेद साहब...व्हाय दिस कोलावरी कोलावरी कोलावरी डी ???

Aseem Trivedi said...

हम एक टीम के साथ नेशनल टूर पर हैं. 5-6 Feb को उज्जैन मे हूं. वहां ब्लागर्स के साथ एक मीटिंग करूंगा. हम इंटरनेट सेंसरशिप के खिलाफ एक आन्दोलन कर रहे हैं. क्या आपसे मुलाकात हो पाएगी? मेरा मोबाइल नं 09336505530 है.

I and god said...

असीम साहब,
आपके उज्जैन टूर के लिए शुभ कामनाएं क्योंकि वह प्रजातंत्र बचाने के लिए है .

आप कभी दिल्ली आयें तो जरूर दर्शन दें .

आपका
अशोक गुप्ता
98108 90743