Tuesday, September 13, 2011

Muthoot Finance, Anti-Hindu Circular, Ban on Bindi-Tilak


सिन्दूर-बिंदी पर प्रतिबन्ध, अब कॉन्वेंट स्कूलों से निकलकर कारपोरेट तक पहुँचा…

जिनके बच्चे “सेंट” वाले कॉन्वेटों में पढ़ते हैं, वे जानते होंगे कि स्कूल के यूनिफ़ॉर्म के अलावा भी इन बच्चों पर कितनी तरह के प्रतिबन्ध होते हैं, जैसे कि “पवित्र”(?) कॉन्वेंट में पढ़ने वाला लड़का अपने माथे पर तिलक लगाकर नहीं आ सकता, लड़कियाँ बिन्दी-चूड़ी पहनना तो दूर, त्यौहारों पर मेहंदी भी लगाकर नहीं आ सकतीं। स्कूलों में बच्चों द्वारा अंग्रेजी में बात करना तो अनिवार्य है ही, बच्चों के माँ-बाप की अंग्रेजी भी जाँची जाती है… कुल मिलाकर तात्पर्य यह है कि “सहनशील” (यानी दब्बू और डरपोक) हिन्दुओं के बच्चों को “स्कूल के अनुशासन, नियमों एवं ड्रेसकोड” का हवाला देकर उनकी “जड़ों” से दूर करने और उन्हें “भूरे मानसिक गुलाम बनाने” के प्रयास ठेठ निचले स्तर से ही प्रारम्भ हो जाते हैं। भारतीय संस्कृति और खासकर हिन्दुओं पर लगाए जा रहे इन “तालिबानी” प्रतिबन्धों को अक्सर हिन्दुओं द्वारा “स्कूल के अनुशासन और नियम” के नाम पर सह लिया जाता है। अव्वल तो कोई विरोध नहीं करता, क्योंकि एक सीमा तक मूर्ख और सेकुलर दिखने की चाहत वाली किस्म के हिन्दू इसके पक्ष में तर्क गढ़ने में माहिर हैं (उल्लेखनीय है कि ये वही लतखोर हिन्दू हैं, जिन्हें सरस्वती वन्दना भी साम्प्रदायिक लगती है और “सेकुलरिज़्म” की खातिर ये उसका भी त्याग कर सकते हैं)। यदि कोई इसका विरोध करता है तो या तो उसके बच्चे को स्कूल में परेशान किया जाता है, अथवा उसे स्कूल से ही चलता कर दिया जाता है।

वर्षों से चली आ रही इस हिन्दुओं की इस “सहनशीलता”(??) का फ़ायदा उठाकर इस “हिन्दू को गरियाओ, भारतीय संस्कृति को लतियाओ टाइप, सेकुलर-वामपंथी-कांग्रेसी अभियान” का अगला चरण अब कारपोरेट कम्पनी तक जा पहुँचा है। एक कम्पनी है “मुथूट फ़ाइनेंस एण्ड गोल्ड लोन कम्पनी” जिसकी शाखाएं अब पूरे भारत के वर्ग-2 श्रेणी के शहरों तक जा पहुँची हैं। यह कम्पनी सोना गिरवी रखकर उस कीमत का 80% पैसा कर्ज़ देती है (प्रकारांतर से कहें तो गरीबों और मध्यम वर्ग का खून चूसने वाली “साहूकारी” कम्पनी है)। इस कम्पनी का मुख्यालय केरल में है, जो कि पिछले 10 वर्षों में इस्लामी आतंकवादियों का स्वर्ग एवं एवेंजेलिस्ट ईसाईयों का गढ़ राज्य बन चुका है। हाल ही में इस कम्पनी के मुख्यालय से यहाँ काम करने वाले कर्मचारियों हेतु “ड्रेसकोड के नियम” जारी किये गये हैं (देखें चित्र में)।


(बड़ा देखने के लिए चित्र पर क्लिक करें) 

कम्पनी सचिव शाइनी थॉमस के हस्ताक्षर से जारी इस सर्कुलर में पुरुष एवं स्त्री कर्मचारियों के ड्रेसकोड सम्बन्धी स्पष्ट दिशानिर्देश दिए गये हैं, जिसके अनुसार पुरुष कर्मचारी साफ़सुथरे कपड़े, पैण्ट-शर्ट पहनकर आएंगे, बाल ठीक से बने हों एवं क्लीन-शेव्ड रहेंगे… यहाँ तक तो सब ठीक है क्योंकि यह सामान्य दिशानिर्देश हैं जो लगभग हर कम्पनी में लागू होते हैं। परन्तु आगे कम्पनी कहती है कि पुरुष कर्मचारी घड़ी, चेन और सगाई(शादी) की अंगूठी के अलावा कुछ नहीं पहन सकते… पुरुष कर्मचारियों के शरीर पर किसी प्रकार का “धार्मिक अथवा सांस्कृतिक चिन्ह”, अर्थात चन्दन का तिलक (जो कि दक्षिणी राज्यों में आम बात है), कलाई पर बँधा हुआ मन्दिर का पवित्र कलावा अथवा रक्षाबन्धन के अगले दिन राखी, इत्यादि नहीं होना चाहिए। कम्पनी का कहना है कि यह “कारपोरेट एटीकेट”(?) और “कारपोरेट कल्चर”(?) के तहत जरूरी है, ताकि ग्राहकों पर अच्छा असर पड़े (अच्छा असर यानी सेकुलर असर)।

लगभग इसी प्रकार के “तालिबानी” निर्देश महिला कर्मचारियों हेतु भी हैं, जिसमें उनसे साड़ी-सलवार कमीज में आने को कहा गया है, महिला कर्मचारी भी सिर्फ़ घड़ी, रिंग और चेन पहन सकती हैं (मंगलसूत्र अथवा कान की बाली नहीं)… इस निर्देश में भी आगे स्पष्ट कहा गया है कि महिलाएं ऑफ़िस में “बिन्दी अथवा सिन्दूर” नहीं लगा सकतीं।

अब कुछ असुविधाजनक सवाल “100 ग्राम अतिरिक्त बुद्धि” वाले बुद्धिजीवियों तथा “सेकुलरिज़्म के तलवे चाटने वाले” हिन्दुओं से–

1) जब अमेरिका जैसे धुर ईसाई देश में भी हिन्दू कर्मचारी राखी पहनकर अथवा तिलक लगाकर दफ़्तर आ सकते हैं तो केरल में क्यों नहीं?

2) कम्पनी के इन दिशानिर्देशों में स्पष्ट रूप से “तिलक”, “बिन्दी” और “सिन्दूर” का ही उल्लेख क्यों किया गया है? “गले में क्रास”, “बकरा दाढ़ी” और “जालीदार सफ़ेद टोपी” का उल्लेख क्यों नहीं किया गया?

3) सर्कुलर में “वेडिंग रिंग” पहनने की अनुमति है, जो कि मूलतः ईसाई संस्कृति से भारत में अब आम हो चुका रिवाज है, जबकि माथे पर चन्दन का त्रिपुण्ड लगाने की अनुमति नहीं है, क्योंकि यह विशुद्ध भारतीय संस्कृति की पद्धति है।

ज़ाहिर है कि कम्पनी के मैनेजमेण्ट की “नीयत” (जो कि सेकुलर यानी मैली है) में खोट है, कम्पनी का सर्कुलर मुस्लिम महिलाओं को बुरका या हिजाब पहनने से नहीं रोकता, क्योंकि हाल ही में सिर्फ़ “मोहम्मद” शब्द का उल्लेख करने भर से एक ईसाई प्रोफ़ेसर अपना हाथ कटवा चुका है। परन्तु जहाँ तक हिन्दुओं की बात है, इनके मुँह पर थूका भी जा सकता है, क्योंकि ये “सहनशील”(?) और “सेकुलर”(?) होते हैं। ज़ाहिर है कि दोष हिन्दुओं (के Genes) में ही है। जब अपना सिक्का ही खोटा हो तो कांग्रेस और वामपंथियों को भी क्या दोष दें वे तो अपने-अपने आकाओं (रोम या चीन) की मानसिकता और निर्देशों पर चलते हैं।

“सो कॉल्ड” सेकुलर हिन्दुओं से एक सवाल यह भी है कि यदि कोई “हिन्दू स्कूल” अपने स्कूल में यह यूनिफ़ॉर्म लागू कर दे कि प्रत्येक बच्चा (चाहे वह किसी भी धर्म का हो) चोटी रखकर, धोती पहनकर व तिलक लगाकर ही स्कूल आएगा, तो क्या इन सेकुलरों को दस्त नहीं लग जाएंगे?

 इसी तरह बात-बात पर संघ और भाजपा का मुँह देखने और इन्हें कोसने वाले हिन्दुओं को भी अपने गिरेबान में झाँककर देखना चाहिए कि क्या कॉन्वेंट स्कूलों में उनका बेटा तिलक या बेटी बिन्दी लगाकर जाए और स्कूल प्रबन्धन मना करे तो उनमें स्कूल प्रबन्धन का विरोध करने की हिम्मत है? क्या अभी तक मुथूट फ़ायनेंस कम्पनी में काम कर रहे किसी हिन्दू कर्मचारी ने इस सर्कुलर का विरोध किया है? मुथूट फ़ायनेंस कम्पनी के इन दिशानिर्देशों के खिलाफ़ किसी हिन्दू संगठन ने कोई कदम उठाया? कोई विरोध किया? अभी तक तो नहीं…।

कुछ और नहीं तो, सलीम खान नाम के 10वीं के छात्र से ही कुछ सीख लेते, जिसने स्कूल यूनिफ़ॉर्म में अपनी दाढ़ी यह कहकर कटवाने से मना कर दिया था कि यह उसके धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है। सलीम खान अपनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक ले गया और वहाँ उसने जीत हासिल की (यहाँ देखें http://muslimmedianetwork.com/mmn/?p=4575) । सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि सलीम को अपनी धार्मिक रीतिरिवाजों के पालन का पूरा अधिकार है इसलिए वह स्कूल में दाढ़ी बढ़ाकर आ सकता है। स्कूल प्रबन्धन उसे यूनिफ़ॉर्म के नाम पर क्लीन शेव्ड होने को बाध्य नहीं कर सकता।

तात्पर्य यह है कि विरोध नहीं किया गया तो इस प्रकार की “सेकुलर” गतिविधियाँ और नापाक हरकतें तो आये-दिन भारत में बढ़ना ही हैं, इसे रोका जा सकता है। इसे रोकने के तीन रास्ते हैं –

1)    पहला तरीका तो तालिबानियों वाला है, जिस प्रकार केरल में मोहम्मद का नाम लेने भर से ईसाई प्रोफ़ेसर का हाथ काट दिया गया, उसी प्रकार हिन्दू धर्म एवं देवी-देवताओं का अपमान करने वाले को स्वतः ही कठोर दण्ड दिया जाए। परन्तु यह रास्ता हिन्दुओं को रास नहीं आ सकता, क्योंकि हिन्दू स्वभावतः “बर्बर” हो ही नहीं सकते…

2)    दूसरा तरीका सलीम खान वाला है, यानी हिन्दू धर्म-संस्कृति पर हमला करने वालों अथवा “खामख्वाह का सेकुलरिज़्म ठूंसने वालों” को अदालत में घसीटा जाए और संवैधानिक तरीके से जीत हासिल की जाए। परन्तु “सेकुलरिज़्म” के कीटाणु इतने गहरे धँसे हुए हैं कि यह रास्ता अपनाने में भी हिन्दुओं को झिझक(?) महसूस होती है…

3)    तीसरा रास्ता है “बहिष्कार”, मुथूट फ़ायनेंस कम्पनी या किसी कॉन्वेंट स्कूल द्वारा जबरन अपने नियम थोपने के विरुद्ध उनका बहिष्कार करना चाहिए। इनकी जगह पर कोई दूसरा विकल्प खोजा जाए जैसे मणप्पुरम गोल्ड लोन कम्पनी अथवा कॉन्वेंट की बजाय कोई अन्य स्कूल…। इसमें दिक्कत यह है कि हिन्दू इतने लालची, मूर्ख और कई टुकड़ों में बँटे हुए हैं कि वे प्रभावशाली तरीके से ऐसी बातों का, ऐसी कम्पनियों का, ऐसे स्कूलों का बहिष्कार तक नहीं कर सकते…

एक बात और…… कम्पनी कहती है कि बिन्दी-तिलक और सिन्दूर से उसके ग्राहकों पर “गलत प्रभाव”(?) पड़ सकता है, लेकिन इसी कम्पनी को चन्दन का त्रिपुण्ड लगाकर उनकी ब्रांच में सोना गिरवी रखने आये हिन्दू ग्राहकों से कोई तकलीफ़ नहीं है…। बाकी तो आप समझदार हैं ही…

========
नोट :- मेरा फ़र्ज़ है कि मैं इस प्रकार की घटनाओं और तथ्यों को जनता के समक्ष रखूं, जिसे जागना हो जागे, नहीं जागना हो तो सोता रहे…। कश्मीर-नगालैण्ड में भी तो धीरे-धीरे हिन्दू अल्पसंख्यक हो गये हैं या होने वाले हैं, तो मैंने क्या उखाड़ लिया?, अब पश्चिम बंगाल-केरल और असम में भी हो जाएंगे तो आप क्या उखाड़ लेंगे?
=========

45 comments:

shilpa mehta said...

सुरेश जी - दिवस जी की यह पोस्ट पढ़ें - शोकिंग न्यूज़ - यदि यह सच है - तो भयानक है .... http://www.diwasgaur.com/2011/09/blog-post_09.html#comments

संजय बेंगाणी said...

जब दब्बू और डरपोक को सहनशील कहा जाता है तब लगता है बौद्धिक बदमाशी है. इससे अधिक कुछ नहीं. हमें स्वीकार कर लेना चाहिए कि हम दब्बू है और अपनी कमजोरी को सहनशीलता का नाम देते हैं, वरना जब बीवी बच्चों को लतियातें है तब यह सहनशीलता कहाँ जाती है?

Ashish Singh said...

ये सही है की हिंदुओ नामक प्राणी मे ही सेकुलरिस्म नामक बीमारी पायी जाती है । ये सेकुलर गधे ...सेकुयलर के नाम पे अपना सब कुछ बर्बाद करने को तयार है पर इन्हे मिलता क्या है तो सायद जवाब होगा जो चोर है उन्हे पैसा और जो गधे है उन्हे लात।

rahul said...

सरस्वती शिशुमंदिर जैसे विद्यालय आज भारतीय संस्कृति के प्रसार में जिस तरह से जी जान से लगे हुए हैं उसकी तारीफ कर पाना संभव नहीं......परन्तु आज घर्मनिरपेक्षता के दिखावे में लोग इनका भी विरोध कर रहे हैं......मिशनरी विद्यालयों में बस एक बात अच्छी है और वो है अंग्रेजी का ज्ञान....परन्तु अंग्रेजी भाषा में तों किसी और विधि से भी महारत हासिल की जा सकती है....फिर क्यों हम अपमान और घ्रणा भाव सहते हुए इन कुत्सित मानसिकता वाले विद्यालयों में जाते रहते हैं.....सबसे बुरी बात तों किसी भी विद्यालय का धर्म आधारित होना है......विद्यालय का धर्म से क्या सम्बन्ध?......

मुथूट फिनांस जैसी घृणित कम्पनीयों का बहिस्कार ही उचित कदम होगा.......होना तों ये चाहिए कि अब हिन्दुओ को भी अपने द्वारा संचालित कंपनियों में कड़ाई से ऐसे नियम लागू करने चाहिए जो दूसरे धर्मों की कट्टरता को सबक सिखा सकें और उन्हें उनकी गलती महसूस करा सकें.......

Pranay Munshi said...

अरे सुरेशजी आप लगे रहिये, आप नहीं जानते आपके कारण कितना जागरण आ गया है ...
मैं जानता हूँ आप हताश नहीं है, आप तो हम लोगो को जगाने के लिए कटाक्ष कर रहे है .

Suresh Chiplunkar said...

आदरणीय शिल्पा जी,
दिवस गौर की वह पोस्ट एवं खबर एकदम सही है… तरुण गोगोई ने असम की जमीन बांग्लादेश को ऐसे दे दी है, मानो उसके बाप की जमीन हो…

Suresh Chiplunkar said...

प्रणय जी आपने सही कहा…

"जनजागरण" (हिन्दुओं के लिए झिंझोड़ना शब्द सही है) के लिए यह जरूरी है कि सभी तरह से कोशिश की जाए…

1) "सेकुलर खतरों" की सूचना उन तक पहुँचाई जाए…

2) उन्हें दूसरे पक्ष की तैयारियों, चालबाजियों एवं शातिराना हथकण्डों के बारे में बताया जाए

3) उन पर कटाक्ष और लानत भेजी जाए…

मैं सभी रास्ते अपनाता हूँ…

जीत भार्गव said...

सुरेशजी, एक बात साफ कर देता हूँ की मुथुत फायनान्स एक एम जॉर्ज कंपनी है। यानी इसका मालिक खुद एक ईसाई है। जो हिंदुओं के साथ धंधा कराते हुये इतना आगे बढ़ा -पनपा है। चाहे ईसाई हो या मुस्लिम कलाकार , व्यापारी या नेता जब बौना होता है तब हिंदुओं के साथ मिलजुलकर, भाई चारा रखकर अपना कद बढ़ाता है। एक बार ताकत हासिल करने पर अपनी औकात पे आ जाता है। शाहरुख, आमिर, जावेद अख्तर इसका उदाहरण है। ये सब हिंदुओं के कंधे पर चढ़कर आगे बढ़े हैं। और अब उन्हे इस्लाम याद आया है.
इसलिए ये कोई सेकुलर प्रयास नही बल्कि सेकुलरवाद के नाम पर विशुद्ध ईसाइयत की काली करतूत है।
क्या अंबानी, बिड़ला या सिंघानिया जैसे हिन्दू उद्योगपतियों मे इतनी हिम्मत है कि अपनी कंपनियो मे काम करनेवाले ईसाइयो को 'हिन्दू' प्रतीक धारण करने का आदेश दे??
दूसरी बात, हमे लोगो को बताना होगा कि मुथुत की प्रतिद्वंदी कंपनियो मनकपुरम गोल्ड और कारवी फायनान्स का विकल्प चुने।
देखा जाये तो मुथुत पिछली दो-तीन पीढ़ियो से इस कारोबार मे है, लेकिन पिछले 8-9 साल मे जब से ईसाई सोनिया का राज आया है, तब से यह बहुत तेजी से आगे बढ़ा है। यह एक 'राज' की बात है।
एक और बात हिन्दी फिल्मों के हिन्दू नायक अक्षय कुमार मुथुत के लिए विज्ञापन कराते हैं। इस लेख की एक प्रति उनके पास भी जानी चाहिए.

kanu..... said...

suresh ji secularism ke naam par jo desh me ho raha hai wo dekhkar lagta hai jaldi hi asa din aaega jab desh me hindu kahne ko log kam hi bach jaenge.purushon ki choti tilak tak theek tha par aurton ke sindoor par aakar rukna in companiyon ki kutsit mansikta ko darshata hai.bahut accha lekh likha hai aapne...

P.N. Subramanian said...

इसका विरोध होना चाहिए. विडम्बना देखिये, उसी केरल के ईसाई औरतें बिंदी धारण करती हैं. पुरुष भी चन्दन का अथवा भभूत का टीका धारण करते हैं.

Man said...

ड्रेस कोड़े के बहाने हिन्दू प्रतीक चिन्हों के प्रती भी एक तरह से साम्प्रदायिक होवा फेलाने की कोशीश ,तीसरा उपाय सब से बढ़िया हे और मोका पड़ने पर उपर बताये दोनों उपाय भी काम में लेने से परहेज नहीं करना चाहिए जिस प्रकार उड़ीसा में लिए गए थे |यही हाल रहा तो सेकुलर हिन्दू मारे शर्म के कभी अपने बाप को भी बाप नहीं कह पाएंगे ,गिरने की हद हो गयी |जेसे की आप ने कहा ये इस देश में रह कर भी हिन्दू गाय हे कायर हे डरपोक हे ,सेकुलरता का सांड आसानी से इनके निकट आ जाता हे |

Vijyan said...

दो काम करो.
१. बहुत सारे हिंदू मिडिया-हाउस बनाओ.
२. कॉर्पोरेट जगत में हिंदुओं का वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास करो.
हिंदू कोर्पोरेट के पैसों से हिंदू मिडिया मज़बूत बनाओ.
फिर धीरे धीरे गुरुकुलों की स्थापना शुरू करो;
मंदिरों से ज्यादा गुरुकुलों पर ध्यान दिया जाए.

जय गौ माता !

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

सुरेश जी,
शायद ये हिन्दू कभी ना सुधरेंगे, इन्ही का तलवा चाटेंगे।

अज्ञात भ्रमणकर्ता said...

हम क्या कर सकते है 2020 से पहले कुछ नहीं जब तक भारत का एक बार और बटवारा नहीं हो जाता जब हमारे पास कश्मीर, केरल और वो राज्य नहीं रहेंगे जो बांग्लादेश के पास है

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

हिन्दू की आंख नहीं खुलने वाली . जो अच्छे हिन्दुओं के विद्यालय हैं वहां फीस कम ली जाती है और हर माह उसके स्थान पर डोनेशन ली जाती है. व्यापार बना लेते हैं हम हर चीज को. जब हिन्दू की बात करो तभी उसमें अगड़ा-पिछड़ा-दलित को घुसा दिया जाता है.
हिन्दू बचेगा तभी तो सब बचेंगे अन्यथा और ही बचे रह जायेंगे.

संजय राणा (क्रान्ति विचारक) said...

सुरेश जी इन सेकुलर कीड़ों ने तो अन्दर तक जख्म पहुंचाए हैं पर क्या करें , हम हिन्दू इक्कठे होने का नाम ही नहीं लेते ! जाने कब अक्कल आएगी !
जागो हिन्दू भाइयो वर्ना वो दिन दूर नहीं जिस दिन हिन्दी हिन्दू के लिए तरसेगी !

जितेन्द्र सिंह : राष्ट्रवादी भारतीय... said...

अपने 'सनातन देवताओं' को छोड़कर 'कब्रों' पर सर पटकने वाले मानसिक गुलाम 'आशीर्वाद' (स्वार्थ-सिद्धि) के लिए 'सुपर सोफ्ट' हो जाते हैं... जिसका फायदा 'वोट बैंक' लूटने वाले 'सिक-यु-लायर्स' तुष्टिकरण करके उठाते हैं.. यही कारण है कि कथित लालची मूर्ख और टुकडो में बनते 'सुपर सोफ्ट' हिन्दू सिर्फ 'पिलपिले' रह गए हैं..
भगवान इनको सद्बुद्धि दे...
वन्दे मातरम्...
जय हिंद..जय भारत...

Anonymous said...

badiya lekh. rahul ji se sahmat. apke farz se vakif hoo. kabhi pichhe nahi hatenge. har tarha se apke sath hoon. media house ki sambhavnao par vichar-vimarsh arambh kar dena chahiye.

AMIT MISHRA said...

सुरेश जी सेकुलरिज्म का गन्दा वायरस हमारे खून में बहुत गहरी पैठ बना चुका है। उसके लिए हमारी थोथी मानसिकता आहार का काम करती है (जिसके तहत हम सिर्फ सुन और देख कर विश्वास कर लेते हैं।) हम सच्चाई नहीं जानना चाहते उदाहरण के तौर पर आप अन्ना के आंदोलन को ही ले लीजिए। मीडिया ने हवा भरकर फुला दिया तो शर्मा जी निकल गुप्ता जी के साथ चौराहे पर मोमबत्ती जलाने। हद होती है मूर्खता की। यहां तो हिन्दूओं ने सभी पराकाष्ठाओं को तार-तार कर दिया है। हिन्दू पश्चिम से इतना आकर्षित हैं कि उसके लिए अपनी सभ्यता संस्कृति तो क्या खून के रिश्तों को हाशिए पर खड़ा कर दे। आप पर मुझे गर्व था, है और रहेगा।

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

आदरणीय भाई सुरेश जी, मुझे लग ही रहा था कि यह वायरस कॉन्वेंट से निकल कर, कॉर्पोरेट सेक्टर तक आएगा|
दरअसल मैं चौथी कक्षा तक कॉन्वेंट में पढ़ चूका हूँ| बहुत कुछ देखा वहाँ| जब मेरे पिता को इनकी असलियत पता चली तो मुझे उस स्कूल से निकलवा कर किसी अच्छी स्कूल में भारती करवाया|

जहां तक सवाल है कॉर्पोरेट का, तो अभी यहाँ काम कर रहा हूँ| मुझे लगता है, धीरे धीरे सभी कम्पनियों में ऐसे तालिबानी क़ानून लागू कर दिए जाएंगे|

आपने सही कहा है कि हिन्दुओं के लिए जनजागरण के स्थान पर झिंझोड़ना शब्द प्रयुक्त किया जा न चाहिए|
आपको मेरी पोस्ट पसंद आए, यह जानकर बहुत ख़ुशी हुई|
आदरणीय शिल्पा दीदी का आभार जो उन्होंने मेरी पोस्ट आप तक पहुंचाई|

आशीष श्रीवास्तव said...

मेरा वोट आईडीया नंबर तीन को साथ मे आईडीया नंबर दो भी (समय ज्यादा लगेगा इसलीये तीन जरूरी है।)

ePandit said...

इसाइयत हर तरीके से हिन्दुत्व को कुचलने का प्रयास कर रही है। इस बारे में आप लोगों को जागरुक करने का बहुत ही बढ़िया काम कर रहे हैं, कम से कम कुछ लोग तो समझेंगे।

लोग पता नहीं क्यों अपने बच्चों को कॉन्वेंट में भेजने की जिद पाले हैं, क्या दूसरे अच्छे स्कूल नहीं। अंग्रेजी की ही मजबूरी है तब भी दूसरे अच्छे अंग्रेजी स्कूलों की कोई कमी नहीं।

lalit said...

As Chipulkarji has said Hindus are now minorities in Kashmir and next target is West Bengal and Kerala. What is that we can do, if we need money to start a media company as one of our friends said than money should pour in from hindu billionaires . But that seems unlikely. So blogs and all is relevant but the march of Islamisation and Christianisation require more concrete steps. What could that be, this is the larger issue. Also how do we light the hindu conciousness among the hindus, which does not mean being anti-muslim or anti-christian.

MAHESH said...

sabse pahli baat to jab tak hum log apne sanskriti aur riti rivajo ka palan karenge to yahi riti rivaj humari raksha karenge ye jaroori hai ki har inssan apne bete aur beti bhai bhan ko apni mahan sanskriti se rubru karaye aur unhe palan karne ko bataya jaye ,,,,,,,,,,, jai shri ram

Shiv said...

सहनशीलता का घंटा बजाने वालों को कंटाप देना है.

इस ग्रुप में कहाँ-कहाँ का पैसा लगा हुआ है यह इनको भी पता नहीं होगा. ग्रुप के क्रिमिनल रेकार्ड्स अलग हैं ही. अगले दो वर्षों में बहुत सारे लोगों को डुबाएगी ये कंपनी.

Anonymous said...

lekh ke liye sadhuwad

Anonymous said...

If bindi-tilak is not allowed in those companies and schools then why do they allow cross pendent in the chain? Is that not relegious. I have seen many Hindu's wearing it just as fashion without understading Christain agenda bahind it.

bhaskarkende said...

The family who owns this company is clearly anti Hindu as they are trustees of the Church who is very much anti Hindu. You can see their family details in short on wikipedia...
http://en.wikipedia.org/wiki/Muthoot_Family

Meenu Khare said...

किसी को कुछ समझाने की जरूरत नही सुरेश जी.डार्विन का सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट का सिद्धांत कहता है कि जो कमजोर (गधा) होगा अपने आप मिट जाएगा. हिंदू कुछ दिनों में एक विलुप्तप्राय जन्तु होगा.इस सच को कोई बदल नही सकता. जय सेकुलरिज्म .

Mukesh Kumar said...

अरे सुरेशजी आप लगे रहिये, आप नहीं जानते आपके कारण कितना जागरण आ गया है ...
मैं जानता हूँ आप हताश नहीं है, आप तो हम लोगो को जगाने के लिए कटाक्ष कर रहे है

संजय @ मो सम कौन ? said...

बहिष्कार वाला फ़ार्मूला आज के युग में सबसे कारगर है।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

मुझे तो इसमें सबसे बड़ा दोष हमारे धर्म-गुरुओं का दिखाई देता है जिनके पीछे करोड़ों हिन्दू हैं. मैंने आज तक किसी हिन्दू धर्म गुरु को यह कहते नहीं सुना कि चेतो, अपने आप को बचाओ. जो तुम्हारे हितों की रक्षा करे, उसको ही सत्ता दो. जबकि इसके उलट मुस्लिम नेता और धर्मगुरु सब बेहद चतुराई से उसी को वोट देने हेतु प्रोत्साहित करते हैं जो उनके हितों की रक्षा करता है.

Anonymous said...

Bahut se madhur geet gaaye gaye hain, Bahut kaumee nagame sunaaye gaye hain !
Nahin jaagate ye meri kaum wale, ye kya shai pila kar sulaaye gaye hain !!

vinurawat said...

क्या इस मामले में जन हित याचिका द्न्ही दाखिल कि जा सकती है

Raj said...

ek achhi jankari or iska virodh hindu to nahi karigy jo usme nokri karty hy,agur ispe koi update hoto jurur publish kariyega

Rajesh said...

Wah Suresh Ji, Kya Gajab ki post likhi hai. Padhkar dil kush ho gaya. Lekin In Hinduo ko kaun samjhaye. Aabhar

Anonymous said...

at least Hindu can bycot this company or like minded people also keep away and bring it to the public .

abhishek said...

suresh ji nice article. but, my previous comments to your earlier article have been deleted from the post. Can you explain? We should always be ready for others healthy opinion also. If there is no scope for improvement,we cannot progress much.

Anyway, my best wishes to you and you can keep up the good work.

Anonymous said...

Suresh ji ram-ram
Muthoot Finance 21st century ka taliban he/ jab sangh parivar ke log hindu sanskriti ki raksha k liye velteenday ka virodh karte he to secular jibanu,dampanthi,vampanthi,media me bethe Hindu bhand un per taliban ka level chipka dete he parantu jab minority community us se bhi jayda samaj ko batne bala,deshdirohi kaam kare to secular nali k kide chup rahte he

rahe bhi kyo na Hindo samaj ki jagrukta ka unko pata he/
muthoot finance ka vahiskar kiya jay ,jayda se jayda logoo tak is lekh ko bheja jay aur hindoo sangatano ko saat lekar dharna pardarsan kiya jay

Vijender

Anonymous said...

vishwa hindu parishad kyon chup bethi hai

Anonymous said...

Hello Sir,

I read your awesome posts on regular basis but never do any comment but This Post makes me keen to comment.Great stuff.Such people really must go to hell Those who wants to spoil our culture.Keep posting...you are doing great work..Wishing you all the best.

Anonymous said...

see population of hinduwaadi is not less still we can unite to fight against these forces........bolo kaha get-together karni hai

Siddhartha said...

Hi,

Upar se neeche tak padha pura article.
Main bachpan se hi convent school me hi padha hun, wo bahut hi accha tha aur hai.
Mujhe Rashtriya Gaan aur Rashtriya Geet me antar bhi pata hai aur wo yaad bhi hain aaj tak.
Mujhe school me hone wali har prayer yaad hai aur har ek deshbhakti geet yaad hai jo ham subah gaya karte the.
Aage badhne k liye aaj knowledge k jitni zarurat hai utni hi english k bhi. Hamere kisi bhi government school me padhne wala baccha kitni acchi english bol pata hai as compared to a convent student wo sabko pata hai..
Yahan isliye likh raha hun kyuki muhe inme diffrence pata hai kyuki maine ye sab dekha hai.
Convent school me hi padha hun lekin ghar k sanskar bhi hote hain jo maa-baap dete hain..
Duniya me har cheez milti hai,, sirf aapke parents and family is the best teacher who can teach u what is good for u and what is not.
School me prayer bhi hoti hai aur JANA GANA MAN bhi..
Blame naa karke khud par kaam kiya jaye to jyada accha hota hai.
MAIN POINT-- Govt should open such schools were they should teach good and proper english so that students should not feel challenged when they face interviews in english.
Schols providing good knowledge, knowledge about our culture and all religions andus se bhi jyada FAMILIES should be aware and should give proper knowledgr about their culture and religion to their children in a proper manner.
If we know who we are and what are our roots then only we can think of our country and our MOTHER INDIA.

Thanks,
Siddhartha Bhatnagar

madhusudangarh reporter said...

kal hi pak me 4 indian dr. Ko sare aam maar diya gaya par sarkar ne is ghatna ka virodh nahin kiya australia me kai indian student mare gaye august me england me indian sikhon ko pareshan kiya gaya sarkar tab bhi chup rahi jab ye sarkar insanon ki raksha nahin kar pai to hum kaise ummeed karen ki ye hamare sanskriti ki raksha karegi

karan said...

is desh se jaatiwad samapt karo phir dekho ?

ANAND