Sunday, September 25, 2011

2G Spectrum Scam details, Manmohan Singh, Dayanidhi Maran (Part 1)

प्रधानमंत्री जी, आप इतने भोले-मासूम और ईमानदार नहीं हैं, जितना प्रचारित करते हैं… (सन्दर्भ :- मारन और राजा की पत्रावलियाँ)
(भाग - 1)

(प्रिय पाठकों :- सावधानीपूर्वक ध्यान लगाकर पढ़िये कि किस तरह मारन और राजा ने 2जी का घोटाला किया, जिसकी पूर्ण जानकारी प्रधानमंत्री, वाणिज्य मंत्री और वित्तमंत्री को थी… लेख अधिक लम्बा है इसलिए इसे दो भागों में बाँट रहा हूँ ताकि पाठक अधिक ध्यान से पढ़ सकें और मामला समझ सकें…)


2जी लाइसेंस देने की प्रक्रिया की शुरुआत से लेकर अन्त तक दयानिधि मारन ने जितनी भी अनियमितताएं और मनमानी कीं उसमें प्रधानमंत्री की पूर्ण सहमति, जानकारी और मदद शामिल है, ऐसे में प्रधानमंत्री स्वयं को बेकसूर और अनजान बताते हैं तो यह बात गले उतरने वाली नहीं है।

अथ 2G कथा भाग-1 प्रारम्भम…

हमारे अब तक के सबसे "ईमानदार" कहे जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अक्सर भ्रष्टाचार का मामला उजागर होने के बाद या तो साफ़-साफ़ अपना पल्ला झाड़कर अलग हो जाते हैं, अथवा उनके "पालतू भाण्ड" टाइप के अखबार और पत्रिकाएं, उन्हें "ईमानदार" होने का तमगा तड़ातड़ बाँटने लगते हैं। प्रधानमंत्री स्वयं भी खुद को भ्रष्टाचार के ऐसे "टुटपूंजिये" मामलों से बहुत ऊपर समझते हैं, वे अपने-आप को "अलिप्त" और "पवित्र" बताने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते…। उनका "सीजर की पत्नी" वाला चर्चित बयान तो अब एक मखौल सा लगता है, खासकर उस स्थिति में जबकि लोकतन्त्र में जिम्मेदारी "कप्तान" की होती है। जिस प्रकार रेल दुर्घटना के लिए रेल मंत्री या कोई वरिष्ठ अधिकारी ही अपने निकम्मेपन के लिए कोसा जाता है। उसी प्रकार जब पूरे देश में चौतरफ़ा लूट चल रही हो, नित नये मामले सामने आ रहे हों, ऐसे में "सीजर की पत्नी" निर्लिप्त नहीं रह सकती न ही उसे बेगुनाह माना जा सकता है। मनमोहन सिंह को अपनी जिम्मेदारी निभानी ही चाहिए, परन्तु ऐसा नहीं हो रहा। यदि डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी और सुप्रीम कोर्ट सतत सक्रिय न रहें और निगरानी न बनाए रखते, तो 2G वाला मामला भी बोफ़ोर्स और हसन अली जैसा हश्र पाता…

और अब तो जैसे-जैसे नए-नए सबूत सामने आ रहे हैं, उससे साफ़ नज़र आ रहा है कि प्रधानमंत्री जी इतने "भोले, मासूम और ईमानदार" भी नहीं हैं जितने वे दिखने की कोशिश करते हैं। दूरसंचार मंत्री रहते दयानिधि मारन ने अपने कार्यकाल में जो गुलगपाड़े किये उनकी पूरी जानकारी मनमोहन सिंह को थी, इसी प्रकार ए राजा (जो कि शुरु से कह रहा है कि उसने जो भी किया चिदम्बरम और मनमोहन सिंह की पूर्ण जानकारी में किया) से सम्बन्धित दस्तावेज और अफ़सरों की फ़ाइल नोटिंग दर्शाती है कि मनमोहन सिंह न सिर्फ़ सब जानते थे, बल्कि उन्होंने अपनी तरफ़ से इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया (हालांकि मामला उजागर होने के बाद भी वे कौन सा तीर मार रहे हैं?)। 2जी घोटाला (2G Spectrum Scam) उजागर होने के बावजूद प्रधानमंत्री द्वारा ए. राजा की पीठ सरेआम थपथपाते इस देश के लोगों ने टीवी पर देखा है…।


इस बात के पर्याप्त तथ्य और सबूत हैं कि ए राजा के मामले के उलट, जहाँ कि प्रधानमंत्री और राजा के बीच पत्र व्यवहार हुए और फ़िर भी राजा ने प्रधानमंत्री की सत्ता को अंगूठा दिखाते हुए 2G स्पेक्ट्रम मनमाने तरीके से बेच डाले… दयानिधि मारन के मामले में तो स्वयं प्रधानमंत्री ने इस आर्थिक अनियमितता में मारन का साथ दिया, बल्कि स्पेक्ट्रम खरीद प्रक्रिया में मैक्सिस को लाने और उसके पक्ष में माहौल खड़ा करने के लिये नियमों की तोड़मरोड़ की, कृत्रिम तरीके से स्पेक्ट्रम की दरें कम रखी गईं, फ़िर मैक्सिस कम्पनी को लाइसेंस मिल जाने तक प्रक्रिया को जानबूझकर विकृत किया गया। बिन्दु-दर-बिन्दु देखिए ताकि आपको आसानी से समझ में आए, देश को चूना कैसे लगाया जाता है…


1)    दयानिधि मारन ने डिशनेट कम्पनी के सात लाइसेंस आवेदनों की प्रक्रिया रोके रखी –
दयानिधि मारन ने डिशनेट कम्पनी द्वारा प्रस्तुत लाइसेंस आवेदनों पर ढाई साल तक कोई प्रक्रिया ही नहीं शुरु की, कम्पनी से विभिन्न प्रकार के प्रश्न पूछ-पूछ कर फ़ाइल अटकाये रखी, यह बात शिवराज समिति की रिपोर्ट में भी शामिल है। मारन ने शिवशंकरन को इतना परेशान किया कि उसने कम्पनी में अपना हिस्सा बेच डाला।

2)    मैक्सिस कम्पनी को आगे लाने हेतु विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाई –
मैक्सिस कम्पनी को लाइसेंस पाने की दौड़ में आगे लाने हेतु दयानिधि मारन ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ा दिया, यह कार्रवाई कैबिनेट की बैठक में 3 नवम्बर 2005 के प्रस्ताव एवं नोटिफ़िकेशन के अनुसार की गई जिसमें प्रधानमंत्री स्वयं शामिल थे और उनकी भी इसमें सहमति थी।

3)    मैक्सिस के लिये UAS लाइसेंस गाइडलाइन को बदला गया –
मारन ने मैक्सिस कम्पनी को फ़ायदा पहुँचाने के लिये लाइसेंस शर्तों की गाइडलाइन में भी मनमाना फ़ेरबदल कर दिया। मारन ने नई गाइडलाइन जारी करते हुए यह शर्त रखी कि 14 दिसम्बर 2005 को भी 2001 के स्पेक्ट्रम भाव मान्य किये जाएंगे (जबकि इस प्रकार लाइसेंस की शर्तों को उसी समय बदला जा सकता है कि धारा 11(1) के तहत TRAI से पूर्व अनुमति ले ली जाए)। दयानिधि मारन ने इन शर्तों की बदली सिर्फ़ एक सरकारी विज्ञापन देकर कर डाली। इस बात को पूरी कैबिनेट एवं प्रधानमंत्री जानते थे।

इस कवायद का सबसे अधिक और एकमात्र फ़ायदा मैक्सिस कम्पनी को मिला, जिसने दिसम्बर 2006 में ही 14 नवीन सर्कलों में UAS लाइसेंस प्राप्त किये थे।

4)    मैक्सिस कम्पनी ने शिवशंकरन को डिशनेट कम्पनी से खरीद लिया था, और इस बात का उल्लेख और सबूत सीबीआई के कई दस्तावेजों में है, जिसे सुप्रीम कोर्ट में पेश किया जा चुका है।

5)    11 जनवरी 2006 को जैसे ही मैक्सिस कम्पनी ने डिशनेट को खरीद लिया, मारन ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा जिसमें मंत्रियों के समूह के गठन की मांग की गई ताकि एयरसेल को अतिरिक्त स्पेक्ट्रम आवंटित किया जा सके। मारन को पता चल गया था कि वह कम्पनी को लाइसेंस दे सकते हैं, लेकिन उन्हें स्पेक्ट्रम नहीं मिलेगा। दयानिधि मारन को पक्का पता था कि स्पेक्ट्रम उस समय सेना के पास था, तकनीकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय का प्रभार होने के कारण दयानिधि मारन लाइसेंस के आवेदनों को ढाई वर्ष तक लटका कर रखे रहे, लेकिन जैसे ही मैक्सिस कम्पनी ने डिशनेट को खरीद लिया तो सिर्फ़ दो सप्ताह के अन्दर ही लाइसेंस जारी कर दिये गये। साफ़ है कि इस बारे में प्रधानमंत्री सब कुछ जानते थे, क्योंकि सभी पत्र व्यवहार प्रधानमंत्री को सम्बोधित करके ही लिखे गए हैं।

6)    मारन ने मैक्सिस कम्पनी को “A” कैटेगरी सर्कल में चार अतिरिक्त लाइसेंस लेने हेतु प्रोत्साहित किया। मारन ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा उसके अगले दिन ही यानी 12 जनवरी 2006 को मैक्सिस (डिशनेट) ने “ए” कैटेगरी के सर्कलों के लिए 4 आवेदन डाल दिये, जबकि उस समय कम्पनी के सात आवेदन पहले से ही लम्बित थे। इस प्रकार कुल मिलाकर मैक्सिस कम्पनी के 11 लाइसेंस आवेदन हो गये।

7)    1 फ़रवरी 2006 को दयानिधि मारन स्वयं प्रधानमंत्री से व्यक्तिगत रूप से मिले, ताकि मंत्री समूह में उनके एजेण्डे पर जल्दी चर्चा हो।

8)    प्रधानमंत्री ने मंत्री समूह को चर्चा हेतु सन्दर्भ शर्तों (Terms of Reference) की घोषणा की तथा उन्हें स्पेक्ट्रम की दरों पर पुनर्विचार करने की घोषणा की –

11 जनवरी 2006 के पत्र एवं 1 फ़रवरी 2006 की व्यक्तिगत मुलाकात के बाद 23 फ़रवरी 2006 को प्रधानमंत्री ने स्पेक्ट्रम की दरों को तय करने के लिए मंत्री समूह के गठन की घोषणा की, जो कि कुल छः भाग में थी। इस ToR की शर्त 3(e) में इस बात का उल्लेख किया गया है कि, “मंत्री समूह स्पेक्ट्रम की दरों सम्बन्धी नीति की जाँच करे एवं एक स्पेक्ट्रम आवंटन फ़ण्ड का गठन किया जाए। मंत्री समूह से स्पेक्ट्रम बेचने, उस फ़ण्ड के संचालन एवं इस प्रक्रिया में लगने वाले संसाधनों की गाइडलाइन तय करने के भी निर्देश दिये। इस प्रकार यह सभी ToR दयानिधि मारन की इच्छाओं के विपरीत जा रही थीं, क्योंकि दयानिधि पहले ही 14 दिसम्बर 2005 को UAS लाइसेंस की गाइडलाइनों की घोषणा कर चुके थे (जो कि गैरकानूनी थी)। मारन चाहते थे कि UAS लाइसेंस को सन 2001 की दरों पर (यानी 22 सर्कलों के लिये सिर्फ़ 1658 करोड़) बेच दिया जाए।


9)    अपना खेल बिगड़ता देखकर मारन ने प्रधानमंत्री को तत्काल एक पत्र लिख मारा जिसमें उनसे ToR (Terms of References) की शर्तों के बारे में तथा ToR के नये ड्राफ़्ट के बारे में सवाल किये। प्रधानमंत्री और अपने बीच हुई बैठक में तय की गई बातों और ToR की शर्तों में अन्तर आता देखकर मारन ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर पूछा कि – “माननीय प्रधानमंत्री जी, आपने मुझे आश्वासन दिया था कि ToR की शर्तें ठीक वही रहेंगी जो हमारे बीच हुई बैठक में तय की गई थीं, परन्तु मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ है कि जो मंत्री समूह इस पर गठित किया गया है वह अन्य कई विस्तारित शर्तों पर भी विचार करेगा। मेरे अनुसार सामान्यतः यह कार्य इसी मंत्रालय द्वारा ही किया जाता है…”। आगे दयानिधि मारन सीधे-सीधे प्रधानमंत्री को निर्देश देते लगते हैं, “कृपया सभी सम्बद्ध मंत्रियों एवं पक्षों को यह निर्देशित करें कि जो ToR “हमने” तय की थीं (जो कि साथ में संलग्न हैं) उन्हीं को नए सिरे से नवीनीकृत करें…”। दयानिधि मारन ने जो ToR तैयार की, उसमें सिर्फ़ चार भाग थे, जबकि मूल ToR में छः भाग थे, इसमें दयानिधि मारन ने नई ToR भी जोड़ दी, “डिजिटल क्षेत्रीय प्रसारण हेतु स्पेक्ट्रम की अतिरिक्त जगह खाली रखना…”। असल में यह शर्त और इस प्रकार का ToR बनाना दूरसंचार मंत्रालय का कार्यक्षेत्र ही नहीं है एवं यह शर्त सीधे-सीधे कलानिधि मारन के “सन टीवी” को फ़ायदा पहुँचाने हेतु थी। परन्तु इस ToR की मनमानी शर्तों और नई शर्त जोड़ने पर प्रधानमंत्री ने कोई आपत्ति नहीं उठाई, जो सन टीवी को सीधे फ़ायदा पहुँचाती थी। अन्ततः सभी ToR प्रधानमंत्री की अनुमति से ही जारी की गईं, प्रधानमंत्री इस बारे में सब कुछ जानते थे कि दयानिधि मारन “क्या गुल खिलाने” जा रहे हैं।

10)      विदेशी निवेश बोर्ड (FIPB) द्वारा मैक्सिस कम्पनी की 74% भागीदारी को हरी झण्डी दी -
मार्च-अप्रैल 2006 में मैक्सिस कम्पनी में 74% सीधे विदेशी निवेश की अनुमति को FIPB द्वारा हरी झण्डी दे दी गई। इसका साफ़ मतलब यह है कि न सिर्फ़ वाणिज्य मंत्री इस 74% विदेशी निवेश के बारे में जानते थे, बल्कि गृह मंत्रालय भी इस बारे में जानता था, क्योंकि उनकी अनुमति के बगैर ऐसा हो नहीं सकता था। ज़ाहिर है कि इस प्रकार की संवेदनशील और महत्वपूर्ण जानकारी प्रधानमंत्री सहित कैबिनेट के कई मंत्रियों को पता चल गई थी। प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा इस तथ्य की कभी भी पड़ताल अथवा सवाल करने की कोशिश नहीं की गई कि मैक्सिस कम्पनी 99% विदेशी निवेश की कम्पनी थी, 74% विदेशी निवेश तो सिर्फ़ एक धोखा था क्योंकि बचे हुए 26% निवेश में सिर्फ़ “नाम के लिए” अपोलो कम्पनी के रेड्डी का नाम था। यह जानकारी समूची प्रशासनिक मशीनरी, मंत्रालय एवं सुरक्षा सम्बन्धी हलकों को थी, परन्तु प्रधानमंत्री ने इस गम्भीर खामी की ओर उंगली तक नहीं उठाई, क्यों?


11) अप्रैल से नवम्बर 2006 तक कोई कदम नहीं उठाया –
दयानिधि मारन चाहते तो 14 दिसम्बर 2005 की UAS लाइसेंस गाइडलाइन के आधार पर आसानी से मैक्सिस कम्पनी के सभी 14 लाइसेंस आवेदनों को मंजूरी दे सकते थे, परन्तु उन्होंने ऐसा जानबूझकर नहीं किया, क्योंकि ToR की शर्तों में “स्पेक्ट्रम की दरों का पुनरीक्षण होगा” भी शामिल थी। FIPB की विदेशी निवेश मंजूरी के बाद भी दयानिधि मारन ने लाइसेंस आवेदनों को रोक कर रखा। साफ़ बात है कि इन 8 महीनों में प्रधानमंत्री कार्यालय पर जमकर दबाव बनाया गया जो कि हमें नवम्बर 2006 के बाद हुई तमाम घटनाओं में साफ़ नज़र आता है।

12)      दयानिधि मारन ने ToR की शर्तों का नया ड्राफ़्ट पेश किया –
16 नवम्बर 2006 को दयानिधि मारन ने अवसर का लाभ उठाते हुए मंत्री समूह के समक्ष एक नया ToR शर्तों का ड्राफ़्ट पेश किया, जिसमें स्पेक्ट्रम की कीमतों के पुनरीक्षण वाली शर्त हटाकर क्षेत्रीय डिजिटल प्रसारण वाली शर्त जोड़ दी। इस प्रकार यह ToR वापस पुनः उसी स्थिति में पहुँच गई जहाँ वह 28 फ़रवरी 2006 को थी। ज़ाहिर है कि ToR की इन नई शर्तों और नये ड्राफ़्ट की जानकारी प्रधानमंत्री को थी, क्योंकि ToR की यह शर्तें प्रधानमंत्री की अनुमति के बिना बदली ही नहीं जा सकती थीं।  

13) इस बीच दयानिधि मारन ने अचानक जल्दबाजी दिखाते हुए 21 नवम्बर 2006 को मैक्सिस कम्पनी के लिये सात Letter of Intent (LoI) जारी कर दिये, क्योंकि मारन को पता था कि ToR की नई शर्तें जो कि 16 नवम्बर 2006 को नये ड्राफ़्ट में प्रधानमंत्री और मंत्री समूह को पेश की गई हैं, वह मंजूर हो ही जाएंगी। मैक्सिस कम्पनी के बारे में यह सूचना प्रेस और आम जनता को हो गई थी, परन्तु प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं किया।

14) दयानिधि मारन ने 29 नवम्बर 2006 को (यानी ठीक आठ दिन बाद ही) मैक्सिस कम्पनी को बचे हुए सात लाइसेंस आवेदनों पर LoI जारी कर दिया।

15) 5 दिसम्बर 2006 को मारन ने मैक्सिस को सन 2001 के भाव में सात लाइसेंस भी जारी कर दिये, क्योंकि मारन अच्छी तरह जानते थे कि मंत्री समूह अब ToR की नई शर्तों पर विचार अथवा स्पेक्ट्रम की दरों का पुनरीक्षण करने वाला नहीं है। मारन को स्वयं के बनाये हुए फ़रवरी और नवम्बर 2006 में पेश किये गये दोनों ड्राफ़्टों को ही मंजूरी मिलने का पूरा विश्वास पहले से ही था, और ऐसा प्रधानमंत्री के ठोस आश्वासन के बिना नहीं हो सकता था।

बहरहाल, इतने घोटालों, महंगाई, आतंकवाद और भ्रष्टाचार के बावजूद पिछले 7 साल में हमारे माननीय प्रधानमंत्री सिर्फ़ एक बार "आहत"(?) हुए हैं और उन्होंने अपने इस्तीफ़े की पेशकश की है… याद है कब? नहीं याद होगा… मैं याद दिलाता हूँ… "सीजर की पत्नी" ने कहा था कि "यदि अमेरिका के साथ भारत का परमाणु समझौता पास नहीं होता तो मैं इस्तीफ़ा दे देता…"। अब आप स्वयं ही समझ सकते हैं कि उन्हें किसकी चिंता ज्यादा है?
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(भाग -2 में जारी रहेगा…जिसमें RTI के तहत प्राप्त कुछ फ़ाइलों की नोटिंग एवं तथ्य हैं… तब तक मनन कीजिये…)

26 comments:

Anonymous said...

काफी शोध के बाद सदा की तरह मिहनत से लिखा गया आलेख. यह दो टुक कहने की ज़रूरत है कि अगर यूपीए सरकार बेईमान और लुटेरी है तो निश्चित ही इसके सरदार मनोहन सिंह भी बे-ईमान और भ्रष्टाचारी हैं....साधुवाद सुरेश जी.
पंकज झा.

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

सुरेश जी,
ये पत्र झूठा होगा, हमारे सब नेता तो दूध के धूले हुए है, ज्यादातर पाक-साफ़ है, महान है, आप क्यों नाहक ही इन पर आरोप लगाते हो,
वाह रे हमारे देश का कानून जो अंग्रेजों की नकल मात्र है, कुछ भी आरोप लगाने से कुछ नहीं होता है साबित करना होता है तब कही जाकर आरोपी से मुजरिम हो पाता है इसी क्रम में 25-30 साल निकल जाते है और कुछ नहीं बिगडता है किसी नेता ने आज तक कानून द्धारा बनायी सजा पूरी की हो नाम बता देना, आपका आभार रहेगा।

JAI HIND said...

भाई सुरेश जी वन्दे भारत,
भाई इसमे हमारे प्रधानमंत्री जी की कोई गलती नही है
वो तो कुछ भी नही जानते है सायद आप नही जानते कुछ दिन पहले अखबार म्र न्युज आई की प्रधानमंत्री जी ने अपनी आँखें दान कर दी है यह खबर तो सबने पढी लेकिन प्रधानमंत्री जी ने अपनी कुर्सी, जुबान, दिमाग,दिल आदी भी दान कर दिये है यह खबर गलती से नही छपी थी ओर यह दान किस किस को दिया ये हम सब को पता है अब सुरेश जी आप ही बताइये जिस आदमी के पास कुर्सी, जुबान, दिमाग,दिल,आँखें नही हो वो बेचारा कर भी क्या सकता है

sant2099 said...

मैने आप का लेख पढा ,बहुत ही दिल‌ और समय लगा कर लिखा गया लेख.
सन्तोष वर्मा

sant2099 said...

मैने इसे भास्कर.काम पर पोस्ट भी किया है क्यो कि मुझे लगा कि ये बाते उन सब लोगो को भी जानना चाहिये जो नही जानते है.
सन्तोष वर्मा

Anonymous said...

सुरेश जी,
इतने विस्तार से पहले इस बारे में नहीं पढने को मिला.धन्यवाद.ये पूरा घोटाला बिना प्रधानमंत्री की भागीदारी के संभव ही नहीं है.और केवल ये ही नहीं कांगो बेसिन परियोजना में रिलायंस को अनुचित लाभ पहुँचाने में भी प्रधानमंत्री की भूमिका उजागर हो चुकी है.

Man said...

वन्देमातरम सर .,
बहुत ही मेहनत और शोध से लिखा हुवा मनमोहन के विराट रूप का दर्शन कराता लेख | सोनिया ने जिसे यु.पि.ऐ १ में भोला समझ के गद्दी पर बिठाया था वो मनमोहन चालाकी और घाघपने में सभी का बाप निकला @अन्ना आन्दोलन के समय इसके घाघपने दर्शन कर लिए थे लोगो ने ,किस तरह अपनी गद्दी पर नजरे जमाये कांग्रेस के युवराज और उसकी टीम को बेरंग रख दिया था |मनमोहन एक तरह से ""शरीफ गुंड"" हे ,इसे पता हे की किस तरह से ईमानदारी को ढाल बना के अपने विद्रोहियों और अपने ही दगेबाजो के खिलाफ काम में ली जाती हे |और किस तरह अपने सर पर लटकी सोनिया जेसी आफत की पोटली को पंचर किया जाता हे |किस प्रकार इमानदार बाबु की इमानदारी ही सहयोगी चोरो की ढाल बनती हे ये भी मोहन जी से सीखना चाहिए |इस इन्वेस्टिगेशन में सुब्रमन्यम स्वामी की मेहनत और सुप्रीम कोर्ट का डंडा तो काम कर ही रहा हे लेकिन बाबूजी के खिलाफ मीडिया में जो हवा बन रही हे उसमे कंही ना कही कांग्रेसियों की बड़ी माँ यानि तायजी का हाथ हे |

Jeet Bhargava said...

बंधू, पी एम ही नही, माता एंतानियों सोनिया ही इस पूरे कांड की जननी है। जिससे देश को एक सौ छहत्तर लाख करोड़ का चूना लग गया। इतनी बड़ी रकम कितना भी बड़ा राजा अकेले नही खा सकता। इसका 60% सोनिया के पास गया है।
देखते रहिए..... एक-एक करके सोनिया रूपी महल के सारे खंभे गिर रहे हैं..राजा, कानीमोई, मारन, चिद्दू..इसके बाद हंसराज भारद्वाज, मन्नू और आखिर मे सोनिया।
हो सकता है इससे पहले कोर्ट को तंग या बाधित किया जाए!! या कॉंग्रेस देश मे कोई बहुत बड़ा हादसा करा दे।

Man said...

http://jaishariram-man.blogspot.com/2011/09/blog-post_23.html

सौरभ आत्रेय said...

हम तो आरम्भ से ही कहते आ रहे हैं कि बिना प्रधानमंत्री और सोनिया की जानकारी के बिना यह नहीं हो सकता था. यह प्रधानमंत्री सबसे बेईमान और भ्रष्ट है. मुझे हमेशा दुःख के साथ आश्चर्य होता है जब कोंग्रेस और सरकार को भ्रष्टाचार के लिए कोसने वाले राष्ट्रवादी लोग भी मनमोहन को ईमानदार बताना नहीं भूलते हैं. यह कैसा छलावा है कि सभी लोग एक सबसे भ्रष्ट सरकार के मुखिया को ईमानदार बताना नहीं भूलते. यहाँ तक कि रामदेव जैसे लोग भी अपने मंचों से मनमोहन को ईमानदार घोषित करते रहे हैं. मन बड़ा ही आहत होता है कि कम से कम देश के भले के बारे में सोचने वालों को ऐसी नादानी नहीं करनी चाहिये. सोनिया और अमेरिका के इस पालतू की इमानदारी बताने वालो ने कभी कोई इसकी ईमानदारी का प्रमाण तो दिया नहीं बस हमेशा भोंक-भोंक कर प्रचार करते रहे हैं. जिन लोगो का ह्रदय और बुद्धि विदेशियों को संतुष्ट करने और देश के विरुद्ध लगता है वो माननीय तो कभी हो ही नहीं सकते.

जितेन्द्र सिंह : राष्ट्रवादी भारतीय... said...

बेहद मेहनत से तैयार एक सत्य और सटीक लेख... आपकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है सुरेश भाई.. हार्दिक धन्यवाद...
भेड़ की खाल में भेड़ियों और रंगे हुए सियारों की पोल खुल चुकी है... पहले राजनेता 'नैतिकता' के आधार पर इस्तीफ़ा दे देते थे.. लेकिन जब ईमान ही नहीं तो नैतिकता कहाँ से आएगी.. देश की राजनीति का सबसे काला 'दौर' चल रहा है.. घोर कलयुग के संकेत हैं.. 'बेशर्म' नाम का शब्द कांग्रेस ने अपने माथे पर लिख लिया है.. और ढीठता से कह रहे हैं- "उखाड़ लो क्या उखाड़ोगे.. 2014 तक का लाइसेंस है तुम्हे लूटने का." सारे देश में लूट मची है.. पेट्रोल के अंतर्राष्ट्रीय भाव अस्सी डॉलर से कम हैं फिर भी लुटेरे बढ़ाये ही जा रहे हैं.. और जनता गरीब, निरीह, बेचारी चुपचाप झेल रही है.. कोई आह नहीं, कोई पुकार नहीं.. जैसे कोई 'मानसिक गुलाम' सब सहता है.. जाने क्या होगा मेरे भारत का.??

कहीं दूर अँधेरे में एक दीपक दिखता है और सारे 'घाघ सिक-यु-लायर्स' उसे बुझाना चाहते हैं लेकिन उसे तो रौशनी बिखेरने से मतलब है..
शायद 2014 में वही 'दीपक' इस काली खान्ग्रेस के घुप्प अँधेरे का सर्वनाश करे...
वन्दे मातरम्...
जय हिंद... जय भारत...

kumar Nirmal Prasad said...

isme koi saq nahi ki upar se niche tak sub mile hai aur isme sonia madam ka bhi haath hai

Anonymous said...

नीरा राडिया टेप में ज़िक्र आता है राहुल गाधीं इस बात पर मारन से नाराज़ हो गया था क्योकि मारन ने एक डिनर पार्टी में (जिसमे राहुल गाधीं भी था)अपने और राहुल की पार्ट्नर-शिप वाली कम्पनी के बारे में उस डिनर पार्टी में कुछ कह दिया था।

स्वामी ने चिदमबरमं की सीबीआई जांच के लिये जो याचिका लगायी है उसमें अंत में नीरा राडिया टेप की कापी भी लगाई है जिसमें राजा-राडिया वार्तालाप में राजा कहता है कि चिदम्बरम नें इस खेल में खूब पैसे खायें हैं।

संजय बेंगाणी said...

प्रधानमंत्री भोला व मासुम बिलकुल नहीं होना चाहिए. वह शेर सा बहादुर व लोमड़ी जैसा चालाक होना चाहिए साथ ही केवल देश के प्रति ईमानदार होना चाहिए. मनमोहन इसमें से कुछ भी नहीं है.

katyayan said...

its only media who doesnot know that sonia rahul robert vadra are the real beneficiary of all this loot as v all know cash for vote took place to save congress goverment and money was given by sonia only but cbi and court will not take any action for obvious reasons

प्रतीक said...

रामदेव जी ने भी कह दिया है कि प्रधान जी की भूमिका की भी जांच होनी चाहिये.
खबर एक - तुष्टिकरण की नीति के चलते गोपालगढ़ में जिले के एस पी और डी एम के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज. अब कौन अधिकारी दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई करेगा, जबकि साम्प्रदायिक हिंसा अधिनियम के प्रावधानों के चलते हिन्दू ही इसका शिकार बनेगा.
दूसरी खबर - राजबाला, जिनके ऊपर पुलिस ने लाठियां तोड़ दीं, खत्म हो गयीं, क्या अब पुलिस के डीसीपी, सीपी और उस जिले के डीएम के ऊपर हत्या का मुकदमा दर्ज होगा.
हिन्दू अपने ही देश में गुलामों का जीवन व्यतीत करने पर मजबूर होंगे जिनमें पिछड़े, दलित और सवर्ण सभी शामिल होंगे.

Rajesh said...

Suresh Ji, Ati Uttam. Bina Prime Minister Aur Sonia Gandhi ki Jankari ke ye karya nahi ho sakta hai. Dhanywad Aapne ye jankari di.

Desh Premi said...

lage raho suresh bhai ....

Anonymous said...

मानसिक लकवाग्रस्त लोगों की तन्द्रा न जाने कब टूटेगी.

Anonymous said...

behtarin lekh

सुलभ said...

ये पी.एम. तो पक्का .......... निकला.
और यह बताने की जरुरत नहीं है कि हमारे भोले(?) पी.एम. के ऊपर किसका दबाव चलता है.

Mukul Harne said...

jaise hi congress ya UPA Government ki pol khulne vali koi baat nikalti hai to us samay sare bhand ,rupiyo ki piche bhagne vale ,soniya ke piche kutto ki tarah puch hilane aur laar tapkane vale news channelo ko orissa,UP ki baadh dikhne lagti hai Delhi police ka crime dikhne lagta hai koi channel asli baat nai batata aapki post padke haqikat malum hui............ hamesha ki tarah

Mahendra Gupta said...

Vande Mataram sir
Too Good. Sir
Aap jaise logo ki desh ko jaroorat hai.
Jai Hind.

Anonymous said...

सुरेश भाई,
शायद कुछ गडबड है.ये मेरी टिप्पणी बेनामी कैसे हो गई मैंने तो नाम से की थी.man जी के ठीक उपर वाली छठे नंबर की टिप्पणी मेरी है.कमेंट भी सब्सक्राइब किये थे लेकिन वो भी नहीं मिल रहे.आज तक कोई टिप्पणी बेनामी नहीं की और न करुँगा.और वैसे भी मेरे कमेंट में ऐसा कुछ नहीं है जिसके लिए मुँह छिपाना पडे.वैसे इतना जरुरी तो नहीं था लेकिन मेरा मन नहीं मान रहा था इसलिए कहना पडा.

राजन said...

ये क्या हो रहा है सुरेश भाई?आपके एंड पर ही कोई समस्या है.मैं चाहता हूँ कि आप सफाई दें.और यदि कोई परेशानी ठीक नहीं हो पा रही है तो कम से कम टिप्पणी के अंत में मेरा नाम तो डाल दिया करें.
राजन

SANJEEV RANA said...

अब तो मंत्री और संत्री खुद अपने आपको बचाने में लगे हैं ऐसे में देश के बारे में कौन सोचेगा?
और रही बात प्रधानमंत्री की तो मनमोहन सिंह सायद वर्तमान में अंतरास्ट्रीय स्तर पे सबसे ज्यादा पढ़े लिखे प्रधानमंत्री हैं मगर किसी के हाथों की कठपुतली मात्र बनकर रह गए हैं और अपनी बेईजत्ती करा रहे हैं