Friday, August 12, 2011

Radha Kumar, Kashmir Interlocutors, Dilip Padgaonkar

यह “सीनाजोरी” किसकी शह पर? – सन्दर्भ राधा कुमार (कश्मीर वार्ताकार)……

अभी कुछ दिनों पहले ही अमेरिका ने पाकिस्तान के एक ISI एजेण्ट गुलाम नबी फ़ई को बेनकाब किया था, जो कि पाकिस्तान से पैसा लेकर विश्व भर के अनेक केन्द्रों पर “कश्मीर की आज़ादी” विषय पर सेमिनार, कान्फ़्रेंस इत्यादि आयोजित करता था जिसमें भारत के “तथाकथित सेकुलर बुद्धिजीवी” बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे और अरुंधती रॉय जैसों के जाल में फ़ँसकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की किरकिरी करवाते रहते हैं… बदले में गुलाम नबी से मोटी रकम भी हासिल करते हैं। (यहाँ पढ़ें… Ghulam Nabi Fai, Indian Secular Intellectuals)

जैसा कि सभी को पता है भारत सरकार ने कश्मीर की समस्या के “सर्वमान्य”(?) हल निकालने हेतु चार “बुद्धिजीवी विशेषज्ञों”(?) की टीम बनाई है जिन्हें “कश्मीर के वार्ताकार” (Interlocuters) कहा जा रहा है। इस पैनल के अध्यक्ष हैं टाइम्स अखबार के पूर्व सम्पादक दिलीप पडगाँवकर। यह पैनल कश्मीर के विभिन्न गुटों से चर्चा करके कश्मीर समस्या के समाधान हेतु सरकार को फ़ार्मूला सुझाएगा। इसी पैनल की एक अन्य सदस्या हैं प्रोफ़ेसर राधा कुमार…। मोहतरमा Delhi Policy Group नामक एक “एलीट समूह” की ट्रस्टी हैं और इन्होंने JNU से Ph.D. की है (JNU का नाम आ गया तो अब ज़ाहिर है कि इन्हें बुद्धिजीवी मानना ही पड़ेगा)। कश्मीर के इन बुद्धिजीवी वार्ताकारों के मुखिया पडगांवकर साहब पहले ही गुलाम नबी फ़ई के सेमिनारों में भाग लेने की पुष्टि कर चुके हैं…

अब खबर आई है कि यह मोहतरमा, राधा कुमार भी ब्रुसेल्स में आयोजित ऐसे ही “भारत विरोधी” सेमिनार में भाग ले चुकी हैं। यूरोपियन संसद के सदस्य जेम्स एलीस और ब्रुसेल्स में “कश्मीर सेण्टर” चलाने वाले अब्दुल मजीद त्राम्बू द्वारा एक कॉन्फ़्रेंस आयोजित की गई थी जिसमें राधा कुमार ने भी भाषण दिया था। अब्दुल मजीद त्राम्बू ISI के मोहरे हैं और इनके संदेहास्पद आर्थिक लेनदेन पर अमेरिका एवं अन्य देशों की खुफ़िया एजेंसियाँ शक ज़ाहिर कर चुकी हैं। 

ताज़ा विवाद और उसमें की गई “सीनाजोरी” का मामला तब शुरु हुआ जब सूचना के अधिकार के तहत एक कार्यकर्ता ने जानकारी माँगी कि कश्मीर के वार्ताकारों की टीम का सदस्य बनने के बाद प्रोफ़ेसर राधा कुमार द्वारा की गईं विदेश यात्राओं का ब्यौरा दिया जाए, ऐसा ही ब्यौरा अन्य वार्ताकारों का भी माँगा गया। बाकी के सदस्यों ने अपनी-अपनी विदेश यात्राओं का ब्यौरा गृह मंत्रालय को सौंप दिया, जिसे सम्बन्धित सूचना माँगने वाले को दे दिया गया। परन्तु प्रोफ़ेसर राधा कुमार बिफ़र गईं और अड़ गईं कि वे अपनी विदेश यात्राओं के बारे में कोई जानकारी नहीं देंगी।

उल्लेखनीय है कि कश्मीर के इन “अदभुत” वार्ताकारों को केन्द्र सरकार की तरफ़ से पिछले 11 माह से प्रतिमाह डेढ़ लाख रुपये + अन्य सभी सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं (ज़ाहिर है कि हमारे खून-पसीने के टैक्स की कमाई में से)। सूचना के अधिकार कानून के अन्तर्गत, सरकार से किसी भी प्रकार का भत्ता अथवा सुविधाएं प्राप्त करने वाला व्यक्ति इस कानून के तहत सूचनाएं देने को बाध्य है (बशर्ते वह राष्ट्रीय सुरक्षा, अंतरिक्ष और सेना से सम्बन्धित न हो)। गृह मंत्रालय ने भी राधा कुमार जी से अनुरोध किया कि वे अपनी विदेश यात्राओं का ब्यौरा पेश करें, परन्तु राधा कुमार का जवाब है कि “वे विदेश में किसी भी सेमिनार में अपनी उपस्थिति के बारे में नहीं बताएंगी…” उन्होंने आगे कहा कि – “मैं इस मुद्दे पर किसी से कोई बात नहीं करने वाली, मेरा सीधा संवाद सिर्फ़ गृहमंत्री और मंत्रालय के उच्चाधिकारियों से होता है, जो कि पूर्णतः गोपनीय है… मैं सिर्फ़ उन्हीं के प्रति जवाबदेह हूँ, एवं इस पर सवाल करने का किसी को हक नहीं है…”।

अपने इस अड़ियल रुख और सीनाजोरी को आगे बढ़ाते हुए (यानी लगभग अहसान जताते हुए) उन्होंने घोषणा कर दी है कि “भविष्य में वे सरकार से किसी भी कार्य हेतु एक पैसा भी नहीं लेंगी…”। कश्मीर के एक अन्य वार्ताकार एमएम अंसारी ने आरटीआई जानकारी हेतु अपने सभी कागजात समय पर मंत्रालय को सौंप दिये। ब्रुसेल्स सेमिनार विवाद के बहाने श्री अंसारी ने दोनों महानुभावों पर निशाना साधते हुए कहा कि “यदि मैं राधा कुमार की जगह होता तो इस्तीफ़ा दे देता…”। इस बीच गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि प्रोफ़ेसर राधा कुमार ने इस्तीफ़ा नहीं दिया है और ऐसा करने पर वह स्वीकार भी नहीं किया जाएगा। मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि वार्ताकारों ने कश्मीर के सभी गुटों से चर्चा के दौर पूरे कर लिये हैं एवं वे अपनी अन्तिम रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं। अब आप स्वयं ही समझ सकते हैं कि गुलाम नबी फ़ई से पैसा लेकर विदेशों में कश्मीर की आज़ादी पर भाषण देते घूमने वाले इन वार्ताकारों की “रिपोर्ट” में क्या कहा जाएगा, और कैसे-कैसे सुझाव दिए जाएंगे।

फ़िलहाल सबसे चिंताजनक बात यह है कि सूचना के अधिकार को सरेआम अंगूठा दिखाने वाली राधा कुमार किसकी शह पर सीनाजोरी कर रही हैं? अभी कुछ दिनों पहले ही यह खबर आई थी कि “पवित्र परिवार”(?) भी नियम-कानूनों को धता बताते हुए अपनी विदेश यात्राओं का ब्यौरा लोकसभा सचिवालय को नहीं देता…(यहाँ पढ़ें… Sonia Gandhi's Foreign Trips) अब सरकार से डेढ़ से दो लाख रुपया डकारने के बावजूद, गुलाम नबी फ़ई के सेमिनारों में जाकर डॉलर बटोरने वाले “सो कॉल्ड बुद्धिजीवी” भी नियम-कानून को नहीं मानेंगे तो कैसे काम चलेगा?

12 comments:

संजय बेंगाणी said...

यह तो थोड़े बड़े पत्रकार है, तिरंगा लेकर जम्मू में आंदोलन करने वाले लोगों को छोटभैये पत्रकार ही दंगाई कहते थे. आप समझ सकते है जेएनयु में कैसा जहर प्रवाहित होता है. तो दोष इनका नहीं डिएनए में ही है. क्या कर लोगे? न भारत की जनता बदलेगी, न ये धूर्त.

Anonymous said...

The very fact that this woman is not ready to disclose her foreign travel details are the proof that she could be involved in some deep conspiracy against India. If she's already been confirmed to attend and support Gulam Nabi Fai's conferences, she should be investigated and her ties with Pakistan and the ISI should be checked in detail.

And about that comment where she says she won't take any money from the government for what she does... Don't be too happy about it. She hasn't said that she won't be taking money from anyone for the work she does.

She must be being paid by someone else... Who is that person?

राजन said...

कुछ नहीं हो सकता इस देश का.
शीर्षक देखकर मुझे लगा आप ऐसे ही एक अन्य बुद्धिजीवी (माने जाने वाले) पडगाँवकर के अफजल गुरू के बारे में हाल ही में दिये गये बयान के बारे में लिखने वाले है.पता नहीं कहाँ से छाँट छाँटकर वार्ताकार नियुक्त कर दिये है.

Lakshay said...

Maza aa gaya................ Radha kumari ji pranaam

दिवाकर मणि said...

ज.ने.वि. केवल इन्हीं गद्दार मानसिकता वालों/वालियों की बपौती नहीं है, यहां राष्ट्रवादियों की फसल भी कुछेक सालों से तैयार होने लगी हैं. हां स्थापना से लेकर अबतक इन्हीं की जमात का ही कब्जा रहा है. वैसे भी जिस विश्वविद्यालय का नाम ही महान "राष्ट्रवादी (??)" के नाम पर वहां की फसलों से अपेक्षाएं भी क्या की जा सकती हैं... और ऐसे गद्दार अधिकांशतः JNU के एक ही स्कूल SSS (सामाजिक विज्ञान संस्थान) में ही बहुतायत में पाए जाते हैं.

Anonymous said...

DEAR SIR,

I AM ON FACE BOOK ,

YOUR POST RECIEVED REGULAR ,

1 WANT TO RESHARE ALL YOU POST TO MY FREINDS ,

HOW IT POSSIBLE

PL. SUGGEST .

shri said...

पिछली 5-6 पोस्टों पर एक बात ही याद आती है -

सतसैया के दोहे ज्यों नाविक के तीर।
देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर।'

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

ham kabhi nahi sudharenge.. aur bahut der ho chuki hai.. iski parinati kya hogi bas uska intzaar hai..

सुलभ said...

इन बड़े बड़े बुद्धिजीवियों, पत्रकारों जो सिर्फ सत्ता के गलियारों और विदेश दौरों में उठाना बैठना पसंद करते हैं और तो और पैसे के लिए किसी से भी(देश के दुश्मनों से) गलबहियां कर ले... ये क्या ख़ाक न्याय की बात करेंगे.
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चलिए एक नजर देखिये प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी द्वारा बनाए गए "राष्ट्रीय सलाहकार परिषद्" में कैसे कैसे लोग हैं -

Communal & Sectarian Violence Bill, 2010 Advisory Group
Constituted by National Advisory Council Working Group
Time Frame: August 1, 2010 – January 31, 2011

Advisory Group Members

Abusaleh Shariff
Asgar Ali Engineer
Gagan Sethi
H.S Phoolka
John Dayal
Justice Hosbet Suresh
Kamal Faruqui
Manzoor Alam
Maulana Niaz Farooqui
Ram Puniyani
Rooprekha Verma
Samar Singh
Saumya Uma
Shabnam Hashmi (upto 9 December 2010)
Sister Mary Scaria
Sukhdeo Thorat
Syed Shahabuddin
Uma Chakravarty
Upendra Baxi

Aruna Roy, NAC Working Group Member
Professor Jadhav, NAC Working Group Member
Anu Aga, NAC Working Group Member

Joint Conveners of Advisory Group

Farah Naqvi, Convener, NAC Working Group
Harsh Mander, Member, NAC Working Group


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Prabhat Kr. Rajan(Ranchi) said...

कांग्रेस की डगर पे चमचों दिखाओ चल के

यह देश है तुम्हारा खा जाओ इसको तल के

भाई हो या भतीजा तुम सबका ध्यान रखना

कुल सात पीढियों का तुम इन्तजाम रखना

स्विस बैंक की तिजोरी तुम खूब रखना भर के

कांग्रेस की डगर पे चमचों दिखाओ चल के

यह देश है तुम्हारा खा जाओ इसको तल के

- prabhatkumarrajan@gmail.com, Mob.-08987506944

Anonymous said...

दरअसल नेहरू ने खुद की आत्मकथा में एक जगह लिखा था कि उनके दादा अर्थात मोतीलाल के पिता गंगा धर थे, ठीक वैसा ही जवाहर की बहन कृष्णा ने भी एक जगह लिखा है कि उनके दादाजी मुगल सल्तनत (बहादुरशाह जफ़र के समय) में नगर कोतवाल थे. अब इतिहासकारों ने खोजबीन की तो पाया कि बहादुरशाह जफ़र के समय कोई भी हिन्दू इतनी महत्वपूर्ण ओहदे पर नहीं था..और खोजबीन पर पता चला कि उस वक्त के दो नायब कोतवाल हिन्दू थे नाम थे भाऊ सिंह और काशीनाथ, जो कि लाहौरी गेट दिल्ली में तैनात थे, लेकिन किसी गंगा धर नाम के व्यक्ति का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला (मेहदी हुसैन की पुस्तक : बहादुरशाह जफ़र और १८५७ का गदर, १९८७ की आवृत्ति), रिकॉर्ड मिलता भी कैसे, क्योंकि गंगा धर नाम तो बाद में अंग्रेजों के कहर से डर कर बदला गया था, असली नाम तो था "गयासुद्दीन गाजी" । जब अंग्रेजों ने दिल्ली को लगभग जीत लिया था,तब मुगलों और मुसलमानों के दोबारा विद्रोह के डर से उन्होंने दिल्ली के सारे हिन्दुओं और मुसलमानों को शहर से बाहर करके तम्बुओं में ठहरा दिया था (जैसे कि आज कश्मीरी पंडित रह रहे हैं), अंग्रेज वह गलती नहीं दोहराना चाहते थे, जो हिन्दू राजाओं (पृथ्वीराज चौहान ने) ने मुसलमान आक्रांताओं को जीवित छोडकर की थी, इसलिये उन्होंने चुन-चुन कर मुसलमानों को मारना शुरु किया, लेकिन कुछ मुसलमान दिल्ली से भागकर पास के इलाकों मे चले गये थे । उसी समय यह परिवार भी आगरा की तरफ़ कूच कर गया...हमने यह कैसे जाना ? नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि आगरा जाते समय उनके दादा गंगा धर को अंग्रेजों ने रोक कर पूछताछ की थी, लेकिन तब गंगा धर ने उनसे कहा था कि वे मुसलमान नहीं हैं, बल्कि कश्मीरी पंडित हैं और अंग्रेजों ने उन्हें आगरा जाने दिया... बाकी तो इतिहास है ही । यह "धर" उपनाम कश्मीरी पंडितों में आमतौर पाया जाता है, और इसी का अपभ्रंश होते-होते और धर्मान्तरण होते-होते यह "दर" या "डार" हो गया जो कि कश्मीर के अविभाजित हिस्से में आमतौर पाया जाने वाला नाम है । लेकिन मोतीलाल ने नेहरू नाम चुना ताकि यह पूरी तरह से हिन्दू सा लगे । इतने पीछे से शुरुआत करने का मकसद सिर्फ़ यही है कि हमें पता चले कि "खानदानी" लोग क्या होते हैं

Krishan Pahal said...

शायद यह हमारा दुर्भाग्य है की हम इनकी इस हरकत पर कई मुक़दमा नहीं चला सकते. यह स्पष्ट देशद्रोह है. इसका निश्चित रूप से विरोध ही नहीं यह सब वोट बैंक राजनीती है. कांग्रेस देश को तोड़ने पर तुली है बाकी सब ऐसी में बैठे है आँख मूँद कर. अरुंधती रॉय प्रधान मंत्री की नाक के नीचे बैठ कर वोह सब कर गए और उसका कुछ नहीं बिगड़ा. कमाल है.