Monday, August 1, 2011

Heena Rabbani, Indian Media and Foreign Diplomacy

हिना रब्बानी की भारत यात्रा – भारतीय मीडिया और “सेकुलर” राजनीति को नंगा करती एक घटना…

26 जुलाई को पाकिस्तान की नई-नवेली विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार, भारत की आधिकारिक यात्रा पर नई दिल्ली आईं। पाकिस्तान ने एक युवा और अनुभवहीन स्त्री को पता नहीं क्या “सोच-समझकर” या न जाने कौन सी योजना के तहत विदेशमंत्री बनाया यह तो वे ही जानें… लेकिन हिना रब्बानी (http://en.wikipedia.org/wiki/Hina_Rabbani_Khar Hina Rabbani Khar) की इस यात्रा से, 60 वर्ष पुराने लोकतांत्रिक शासनकाल में पल्लवित हुए भारतीय मीडिया और कांग्रेस-पोषित “सेकुलर” राजनीति का बदबूदार चेहरा अवश्य खुलकर सामने आ गया…।


हालांकि विगत चन्द वर्षों में भारतीय मीडिया ने “गिरावट” के अपने नित नये ऐतिहासिक तलों को छूना शुरु कर दिया है, और काफ़ी लोग कथित न्यूज़ चैनलों(?) को देखना बन्द कर चुके हैं। लगातार भारत के “भाण्ड” मीडिया के रवैये को लेकर खबरें आती रहती हैं, परन्तु मीडिया “परिपक्व” होना तो दूर, बल्कि धीरे-धीरे छिछोरा और एक सीमा तक देशद्रोही भी होता जा रहा है… हिना रब्बानी की भारत यात्रा के दौरान भी ऐसा ही हुआ। पहले हम सरकार के “भूकम्पकारी रुख” के बारे में जान लें, क्योंकि वह जनता के प्रति अधिक जवाबदेह है, मीडिया का क्या है, वे तो “धंधा करने” बैठे हैं…


जिस दिन हिना रब्बानी भारत की यात्रा पर दिल्ली पधारीं, उन्होंने उसी दिन कश्मीर के सभी अलगाववादी हुर्रियत (http://en.wikipedia.org/wiki/All_Parties_Hurriyat_Conference) नेताओं जैसे, सैयद अली शाह गिलानी, मीरवायज़ उमर फ़ारुक, अब्दुल गनी बट, आगा सईद बडगामी और बिलाल लोन से मुलाकात की। किस जगह? पाकिस्तान के दूतावास में…। सामान्य सी “प्रोटोकॉल” और कूटनीतिक समझ रखने वाला निचले स्तर का अफ़सर भी समझ सकता है कि इसके गहरे निहितार्थ क्या हैं। प्रोटोकॉल के अनुसार पाकिस्तान के विदेश मंत्री को अपनी “आधिकारिक” भारत यात्रा पर सबसे पहले विदेश मंत्रालय के उच्चाधिकारियों, विदेश मंत्री या किसी राज्य के मुख्यमंत्री से ही मुलाकात करना चाहिए… (व्यक्तिगत यात्रा हो तो वे किसी से भी मिल सकते हैं), लेकिन ऐसा नहीं हुआ, भारत सरकार की “औकात” सरेआम उछालने के मकसद से हिना रब्बानी ने जानबूझकर हुर्रियत नेताओं से पाकिस्तान के दूतावास में मुलाकात की, जबकि यदि उन्हें कश्मीर की वाकई इतनी ही चिंता थी तो उन्हें उमर अब्दुल्ला से मिलना चाहिए था, अगले दिन एसएम कृष्णा से आधिकारिक चर्चा होनी ही थी, फ़िर सैयद अली शाह गिलानी जैसे नेताओं से मिलने की क्या तुक है?

इसमें सबसे खतरनाक बात यह है कि हुर्रियत के इन सभी नेताओं में से अधिकतर “सरकार की निगाह” में “नज़रबन्द” हैं, तो फ़िर ये लोग श्रीनगर से दिल्ली कैसे पहुँचे? क्या सरकार इस बारे में जानती थी कि ये लोग क्यों और किससे मिलने आ रहे हैं? यदि जानती थी तब तो यह बेहद गम्भीर बात है क्योंकि इससे साबित होता है कि “प्रशासनिक मशीनरी” में ऐसे तत्व खुलेआम घुस आए हैं जो कश्मीर को पाकिस्तान के सामने पेश करने के लिये मरे जा रहे हैं, और यदि सरकार इस बारे में कुछ भी नहीं जानती थी, तब तो यह जम्मू-कश्मीर और केन्द्र सरकार की सरासर नाकामी और निकम्मापन है कि “नज़रबन्द” नेता दिल्ली पहुँच जाएं और पाकिस्तान के विदेश मंत्री से मुलाकात भी कर लें…। क्या यह देश की सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं है कि सुरक्षा एजेंसियों को पता लगे बिना अलगाववादी नेता आराम से दिल्ली आते हैं और सरेआम सरकार को तमाचा जड़कर चले गये? भारत सरकार और आम जनता के प्रतिनिधि विदेश मंत्री या उमर अब्दुल्ला हैं या हुर्रियत वाले? और फ़िर भी सरकार सिर्फ़ हें-हें-हें-हें-हें करते बैठी रही? ऐसा क्यों… एक सवाल एसएम कृष्णा जी से पूछने को जी चाहता है, कि क्या भारत के विदेशमंत्री की इतनी “हिम्मत” है कि वह पेइचिंग में सरकारी मेहमान बनकर वहीं पर “दलाई लामा” से मुलाकात कर ले?

अब हम आते हैं भारत के “परिपक्व” मीडिया के रवैये पर, जो कि इस बात की दुहाई देते नहीं थकता कि वह “कितना महान” है… हमारे “भाण्ड मीडिया” और तथाकथित “बड़े पत्रकारों” में से किसी ने भी इस गम्भीर मुद्दे को उठाने या उस पर कोई स्टोरी चलाने की कोशिश नहीं की, सारे के सारे एंकर और “टट्टू” हिना रब्बानी का चेहरा, पर्स और सैण्डल देखते रहे। किसी ने भी सरकार से यह नहीं पूछा कि आखिर हिना रब्बानी, हुर्रियत के नेताओं से मिलीं, तो कैसे मिलीं? किसने अनुमति दी? जब पिछले सप्ताह ही हमें अमेरिका ने बताया है कि ISI के एजेण्ट गुलाम नबी फ़ई (Ghulam Nabi Fai) द्वारा “पाले-पोसे बुद्धिजीवियों की जमात” में हुर्रियत के नेता भी शामिल हैं तब इन्हें हिना रब्बानी से मिलने की अनुमति क्यों दी गई?

उल्लेखनीय है कि 26 जुलाई को ही भारत के जांबाज़ सपूतों और वीरों द्वारा दिलवाई गई कारगिल विजय (Kargil Victory) की बारहवीं वर्षगाँठ भी थी, लेकिन धरती के लालों, हमारे सैनिकों के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने के लिये सरकार ने ऐन उसी दिन हिना रब्बानी के सामने पलक पाँवड़े बिछा रखे थे। सो कॉल्ड “तेज” और “जागरूक” मीडिया के किसी चैनल ने (इक्का-दुक्का को छोड़कर) “कारगिल विजय दिवस” पर कोई विशेष कार्यक्रम नहीं चलाया, क्योंकि मीडिया को दो बच्चों की माँ, हिना रब्बानी की खूबसूरती का बखान करने से ही फ़ुरसत नहीं थी। किसी ने भी यह नहीं सोचा कि एक “दुश्मन देश” की विदेशमंत्री, जिसके कारण हमने अपने कई अमूल्य जवान खोए हैं, उसे अधिक कवरेज मिलना चाहिए या बहादुर सैनिकों के बलिदान को… परन्तु मीडिया में बैठे “परजीवियों” को हमेशा से, “ड्यूटी” की बजाय “ब्यूटी” अधिक महत्वपूर्ण लगती रही है…। प्रमुख मुद्दों को छोड़कर मीडिया, राखी सावन्त, पूनम पाण्डे, मल्लिका शेरावत या ऐश्वर्या के बच्चे में ही उलझा रहता है। देश के लिए बलिदान करने वाले सैनिकों तथा “पाकिस्तानी मानस” में गहरे पैठी हुई भारत विरोधी मानसिकता को दरकिनार करते हुए हमेशा से हमारा मीडिया “अमन की आशा (http://www.amankiasha.com/) जैसे फ़ालतू विचार” को ही प्रमुखता देता रहा है।

चूंकि कारगिल की विजय भाजपा के शासनकाल में मिली थी, इसलिए केन्द्र की कांग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री या किसी अन्य मंत्री को कारगिल जाकर सैनिकों के बीच उनका मनोबल बढ़ाने अथवा श्रद्धांजलि अर्पित करने का समय नहीं मिला। 26 जुलाई को सरकार के PIB (http://www.amankiasha.com/) की तरफ़ से अखबारों को कुल 16 प्रेस विज्ञप्तियाँ जारी की गईं, परन्तु किसी में भी “कारगिल विजय” का कोई उल्लेख नहीं था, कि कहीं “खूबसूरती” नाराज़ न हो जाए… और चूंकि कारगिल की विजय अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में मिली थी, तो स्वाभाविक है कि हुर्रियत नेताओं की “लल्लो-चप्पो” करने वाली यूपीए सरकार, सैनिकों को श्रद्धांजलि या जीत का जश्न कैसे मनाती? उलटा उसने पाकिस्तान की विदेश मंत्री की यात्रा हेतु वही दिनांक चुनी, क्या एक-दो दिन बाद की दिनांक तय नहीं की जा सकती थी?

तात्पर्य यह है कि भारत के सत्ता संस्थान तथा मीडिया में ऐसे तत्व बहुतायत में भरा गये हैं, जिन्हें अब “देश की एकता और अखण्डता” नामक अवधारणा में कोई विश्वास नहीं है। सत्ता के करीब और “प्रियकर” यह “खास-तत्व”, अरुंधती को आज़ादी(?) देंगे, हुर्रियत को आज़ादी देंगे, कोबाद घांदी तथा बिनायक सेन के साथ नरमी से पेश आएंगे, नगालैण्ड और मणिपुर के उग्रवादियों से चर्चाएं करेंगे… सभी अलगाववादियों के सामने “लाल कालीन” बिछाएंगे… उनके सामने “सत्ता की ताकत” और “राष्ट्र का स्वाभिमान” कभी नहीं दिखाएंगे। परन्तु जैसे ही बाबा रामदेव या अण्णा हजारे कोई उचित माँग करेंगे, तो ये लोग तत्काल “सत्ता का नंगा नाच” दिखाने लगेंगे।

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28 comments:

Anonymous said...

देखने वाली बात है कि जिन युवाओँ को जागरुक होना चाहिये वे भी मात्र ठहाका लगाने वाली टिप्पणियाँ करते नजर आते हैँ

Man said...

वन्देमातरम सर ,
सेकुलर बुधिजिवियो सॉरी ""परजीवियो ""और सेकुलरो और सरकारी कावड उठाऊ भांड मिडिया को ""माँ जाया ""करता आलेख @

संजय बेंगाणी said...

अपने को तो यही बात पसन्द आई कि सारे के सारे एंकर हिना रब्बानी का चेहरा, पर्स और सैण्डल देखते रहे. और पाकिस्तान अब भिन्ना रहा है. सारा किया धरा पानी में गया. सुन्दरता के लट्टूपन ने एजेंडा धो दिया.

Desh Premi said...

Hame sirf or Sirf is Desh Par raj karna h,
yanha koi marta h to mare hame dessh ki ijjat abru ki parwah nahi h, hame to bas hamare khud ke khajane bharne h,Hum h Khangresi hamara to dashko se yahi kam raha h ?
Thanks TO Sureshji Who Take this serious issue in front of Indians
Jai Hind !

Rajesh said...

Wah Suresh Ji Kya Post Likhi hai. Excellent. In Hinduo ko kuan samjheaga. Ab bhi ye nahi jage to Ye Rastra bhi hamare hath se chala jayega. Kyoki hum 6 state mein alapshankyak ho chuke hai. Ish Khangresh sata ko palatna hoga. Dhanywad.

Raj said...

jab chhako ka raj desh pe ho,or ramlila medan pe sote hue logo ke uper chore se humla karsakty hy wo home minister or gov se kya ummeda ki ja sakti hy,bharat hamesa shanti dut raha hy or log marty rahy hy ab ye image badlen hogi,pak lato ka bhut hy bato se nahi mannewala,gov me koi cruel neta hona chahiye jo inko sabk sikha sake

Deepesh said...

सुरेश जी जिसे आप विदेश कूटनीति कह रहे है वह दुर्भाग्य से विदेश कुटवाई नीति है । इतिहास एसे प्रसंगो से भरा पड़ा है जहाँ हमारी विदेशनीति को शर्मनाक स्तर पर असफल होते और पिटते देखा जा सकता है ओर इसमें कांग्रेस और भाजपा सरकारें दोनो ही बराबर रूप से दोषी है । IC814 हाईजैक प्रसंग और आगरा शिखर सम्मेलन वर्ष 2001 तो सभी को याद होंगे । और जिन्हे आप पत्रकार कह रहे है वे टी.वी. पर ऐंकरींग करने वाले स्टलिश (फेकु) एक्टर लोग है जिनका पत्रकारिता से दूर दूर तक का कोई वास्ता नही है

दीपक बाबा said...

मीडिया के लोग भी जुल्फों की छाँव में खुद राहत महसूस कर रहे होंगे उनको क्या पड़ी है जो वो जाकर इतनी छानबीन करें.

जितेन्द्र सिंह : एक सच्चा भारतीय said...

नमस्कार सुरेश जी...
आपका शानदार लेख खान्ग्रेस के लोकद्रोही व देशद्रोही कठपुतलियों और बिकाऊ टट्टुओं के मुहं पे तमाचा है...जिन्होंने देश को गर्त में फेंक दिया है अपने स्वार्थों के लिए...पिछले तीन साल में हमारा भारत कूटनीतिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से तीस साल पीछे चला गया है..?
जिसकी जिम्मेदार केवल कांग्रेस है??

और जो सर्वोत्तम आपने लिखा वो है-

"एक सवाल एसएम कृष्णा जी से पूछने को जी चाहता है, कि क्या भारत के विदेशमंत्री की इतनी “हिम्मत” है कि वह पेइचिंग में सरकारी मेहमान बनकर वहीं पर “दलाई लामा” से मुलाकात कर ले?"

वन्दे मातरम्......
जय हिंद...जय भारत...

ePandit said...

हिना रब्बानी को देखकर मुझे पुराने जमाने की विषकन्यायें याद आती हैं। पुराने राजा भी दुश्मन देश में इसी तरह विषकन्यायें भेजा करते थे।

Anonymous said...

Center fresh dialogue
"एक सवाल एसएम कृष्णा जी से पूछने को जी चाहता है, कि क्या भारत के विदेशमंत्री की इतनी “हिम्मत” है कि वह पेइचिंग में सरकारी मेहमान बनकर वहीं पर “दलाई लामा” से मुलाकात कर ले?"

eSwami said...

मैं संजय से सहमत हूं!
हीना रब्बानी का आना जितनी गौण घटना बनाया जा सकता था उतना गौण बनाया गया.
उसकी अनुभवहीनता और ग्लैमर अपील के जितने मजे ट्विट्टर पर लिये गये वह अपने आप में भारतीयों की के परिपक्व होते सेंस ओफ़ ह्यूमर का प्रमाण था.
और मीडिया का अजेंडा चाहे जो रहा हो उसे समझ कर भी जनता ने अपनी प्रतिक्रिया का अपना अजेंडा पुश किया ये सबसे अच्छी बात है.
भारत की जनता मीडिया वालों को इग्नोर कर अपनी राय कायम करना सीख जाए तो और क्या चाहिए.

Anonymous said...

सुरेश जी काश आपकी यह पोस्ट हम पाठकोँ के चन्दे से ही सही देश के सभी समाचारपत्रोँ के मुख्यपृष्ठ पर एक ही दिन एक साथ छप पाती, क्या भारत के किसी पत्रकार मेँ इन सवालोँ को प्रधानमंत्री या विदेशमंत्री से पूछने की हिम्मत है? सुरेश जी दिल जीत लिया आपने इस पोस्ट से, अब हम लोगोँ को चन्दे से अपनी एक निष्पक्ष मासिक पत्रिका निकालनी चाहिये जो पूरी तरह पाठकोँ की आजीवन सदस्यता शुल्क पर निकले, कुछ अच्छे लोगोँ से सहयोग लेकर आप अपनी एक पत्रिका निकालिये Ps50236@gmail.com मोबाइल 09559908060

टी.सी. चन्दर T.C. Chander said...

यही इस देश की औकात है!

Kajal Kumar said...

मीडिया की चुहलबाज़ी के चलते हिना कश्मीर राग अलापना ही भूल गई ?

Anonymous said...

"एक सवाल एसएम कृष्णा जी से पूछने को जी चाहता है, कि क्या भारत के विदेशमंत्री की इतनी “हिम्मत” है कि वह पेइचिंग में सरकारी मेहमान बनकर वहीं पर “दलाई लामा” से मुलाकात कर ले?"
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अपने को तो यही बात पसन्द आई कि सारे के सारे एंकर हिना रब्बानी का चेहरा, पर्स और सैण्डल देखते रहे. और पाकिस्तान अब भिन्ना रहा है. सारा किया धरा पानी में गया. सुन्दरता के लट्टूपन ने एजेंडा धो दिया.
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सुरेश जी काश आपकी यह पोस्ट हम पाठकोँ के चन्दे से ही सही देश के सभी समाचारपत्रोँ के मुख्यपृष्ठ पर एक ही दिन एक साथ छप पाती, क्या भारत के किसी पत्रकार मेँ इन सवालोँ को प्रधानमंत्री या विदेशमंत्री से पूछने की हिम्मत है? सुरेश जी दिल जीत लिया आपने इस पोस्ट से, अब हम लोगोँ को चन्दे से अपनी एक निष्पक्ष मासिक पत्रिका निकालनी चाहिये जो पूरी तरह पाठकोँ की आजीवन सदस्यता शुल्क पर निकले, कुछ अच्छे लोगोँ से सहयोग लेकर आप अपनी एक पत्रिका निकालिये
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आप जिसे विदेश कूटनीति कह रहे है वह दुर्भाग्य से विदेश कुटवाई नीति है । और जिन्हे आप पत्रकार कह रहे है वे टी.वी. पर ऐंकरींग करने वाले स्टलिश (फेकु) एक्टर लोग है जिनका पत्रकारिता से दूर दूर तक का कोई वास्ता नही है
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agree with above comments

:( :(

सञ्जय झा said...

bhau..

yahan......e-swamiji se sahmat ho lete hain........yse irada namrashi
se sahmat hone ka tha..............

pranam.

Anonymous said...

wo musalmaan kahan gaye jinki auraton ko praya mard drkhe to haram hai. yehan to uske pursh se lekar chehre tk ki charcha ho rahi hai khuleaam. khud hafiz

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

जब कांग्रेस के इस देश को एक कायदे का विदेश मंत्री ही नहीं मिल पा रहा है तो कूटनीति क्या खाक होगी।

आपका आलेख इन भांडो के लिए एक तमाचा है।

Mahender said...

बहुत दुःख होता है ये सब पढकर.....
ऐसे मै गुरुदत्त साहब का एक गाना याद आ रहा है
'जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहा है?'

P K Surya said...

हिना रब्बानी को देखकर मुझे पुराने जमाने की विषकन्यायें याद आती हैं। पुराने राजा भी दुश्मन देश में इसी तरह विषकन्यायें भेजा करते थे।

kya sahi kaha hai bhai sahab lekin ye vishkanya 2 -4 congresiyon ko vish de dalti to maza aa jata par yah to pure desh k congresiyon or unke chamcho midia ko murkh bana k chali gai,, or hum sochte he rah gayen, or war ho gaya,,,,,

Anil Pendse अनिल पेंडसे said...

हमेशा की तरह एक और पर्दाफाश वाला लेख| इसी प्रकार जन सामान्य को जाग्रत करते रहें , शुभकामनायें!!!

सतीश पंचम said...

धारदार लेख, एकदम राप्चिक।

बालकिशन अटले said...

सुरेश जी आपका लेख बहुत ही दमदार है सच है हिना के खूबसूरत चेहरे के पीछे पाकिस्तान का खूनी चेहरा भी छिपा है जिसे हमारी मीडिया नही देख पाई अति उत्तम लेख लिखा है कृपया मेरा ब्लाग भी पढ़ने का कष्ट करे तो मेरा भी मनोबल बढ़े

RTyagi said...

ये सब तो हमारे कांग्रेस एवं मीडिया की परंपरा रही है, पहले नेहरूजी, इंदिराजी, राजीवजी , और अब प्रियंका , राहुल ...के लाइफ स्टाइल ड्रेस आदि को ..मीडिया इतनी प्रमुखता देता है ...जैसे की देश में और कोई ज्वलंत मुद्दे है ही नहीं, येही सब अब पाकिस्तानी नेता भी दोहरा रहे हैं..

वासी भी पाकिस्तान से पहले पुराणी पढ़ी के नेताओं की जमात ... आगरा ताज महल , चार मीनार , हज़रात निजामुद्दीन , या अजमेर शरीफ आती थी .. अब नयी पीढ़ी के तेज़ तर्रार एवं सुन्दर नेता आ रहे हैं

...पाकिस्तान की कूटनीत तो पहले ही जग जाहिर है ... "Bomb नीति, आतंकवाद नीति" उसी की प्रगति को हिना ने हुर्रियत नेताओं के साथ डिस्कस किया होगा..

बाकी तो भगवान भरोसे है है न..

नमस्कार

जितेन्द्र सिंह : एक सच्चा भारतीय said...

ऐसी- 'हिना रब्बानियाँ...दिलबर मस्तानियाँ'
पाकिस्तान को इस्लाम के नाम पर चंदा दिलवाने में बड़ा सहयोग करती हैं...दुनिया बेवकूफ भी चेहरा देखके बनती है...और सही कहा गया है-
"जो दिखता है वो बिकता है."
हिना को देखके उसके ग्लैमर पे मीडिया और कांग्रेसी नेता बिक गए...सुन्दर चेहरे के पीछे छिपी खूनी शक्ल और जहरीले मकसद किसी को नहीं दिखे..
भगवान, सद्बुद्धि दे सबको....
जय हिंद...जय भारत...

ankur raisoni said...

vande mataram

Sudhi said...

http://bharathakhandha.blogspot.in/2013/01/alert-india-razaakars-are-still-here.html