Wednesday, August 31, 2011

Vote Bank Politics in India...

भारत में संविधान और कानून का राज चलेगा या वोट बैंक और भीड़तन्त्र का???

एक बार फ़िर से भारत नाम का "सॉफ़्ट स्टेट" दोराहे पर आन खड़ा हुआ है, तमिलनाडु विधानसभा ने "ऐतिहासिक एकता"(?) दिखाते हुए राजीव गाँधी के हत्यारों को फ़ाँसी देने के राष्ट्रपति के निर्णय पर पुनर्विचार करने की अपील की है।


उधर कश्मीर में अब्दुल गनी लोन और गिलानी ने धमकी दी थी कि ईद से पहले उनके "भटके हुए नौजवानों" यानी पत्थरबाज गैंग को रिहा करो वरना…!!! उमर अब्दुल्ला तो मौका ही ढूँढ रहे थे, उन्होंने एक कदम आगे बढ़ते हुए ईद का तोहफ़ा देते हुए पत्थरबाजों को उन पर दर्ज सभी पुराने मुकदमों को वापस लेकर उन्हें बाइज्जत जाने दिया, ताकि गिलानी-यासीन मलिक जैसे लोग उन्हें फ़िर "भटका" सकें…।


हुर्रियत कान्फ़्रेंस ने पहले ही धमकी दे रखी है कि यदि अफ़ज़ल गूरू (गुरु नहीं) को फ़ाँसी दी गई तो कश्मीर में खूनखराबा हो जाएगा… केन्द्र सरकार की घिग्गी बँधी हुई है और वह मौका देख रही है कि कैसे अफ़ज़ल को रिहा किया जाये या फ़ाँसी से बचाया जाए। अब तमिलनाडु की विधानसभा ने कांग्रेस को एक मौका दे दिया है, कि "माननीय" राष्ट्रपति 10-12 साल तक अफ़ज़ल की फ़ाइल पर भी बैठी रहें (पिछले 6 साल से शीला दीक्षित और चिदम्बरम बैठे रहे) और फ़िर "अफ़ज़ल तो 20 साल की सजा काट चुका है…" कहकर लिट्टे के उग्रवादियों की तरह ही अफ़ज़ल को भी फ़ाँसी से बचा लिया जाए। इशारों-इशारों में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के "माननीय" सदस्य कह रहे हैं कि हम भी "सर्वसम्मति" से ऐसा प्रस्ताव पास करेंगे कि "अफ़ज़ल गूरू" की दया याचिका पर दोबारा विचार हो, अरुंधती रॉय टाइप के "दानवाधिकार" कार्यकर्ता इस मुहिम में सक्रियता से लगे हुए भी हैं…

ऐसे में कुछ गम्भीर सवाल यह उठते है कि -

1) इस देश में "संविधान" के अनुसार शासन चलेगा या "वोट बैंक" की ताकत के अनुसार चलेगा?

2) जब सुप्रीम कोर्ट ने फ़ाँसी की सजा पर दो-दो बार मोहर लगा दी, राष्ट्रपति ने याचिका ठुकरा दी तो किसी राज्य की विधानसभा की इतनी औकात कैसे है, कि वह दोबारा इस पर विचार करने को कहे?

3) क्या भारत के तमाम राष्ट्रपति इतने "बोदे" और "सुस्त" हैं कि उन्हें किसी फ़ाइल पर दस्तखत करने में 11 साल लगते हैं, क्या हमारे गृह मंत्रालय और उसके अधिकारी इतने "निकम्मे" और "कामचोर" हैं कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद फ़ाइल आगे बढ़ाने में 5 साल लगते हैं?

4) तमिलनाडु (लिट्टे के आतंकवादी), पंजाब (भुल्लर केस) और कश्मीर (अफ़ज़ल गूरू)… इस तरह से हर राज्य अपने-अपने चुनावों और "हितलाभ" को देखते हुए आतंकवादियों को "माफ़" करने की अपील करने लगे तो क्या यह हमारे बहादुर जवानों के बलिदान और वीरता का मखौल नहीं है?

5) या तो सीधे लोकसभा में कानून बनाकर हमेशा के लिए फ़ाँसी की सजा के प्रावधान को हटा ही दिया जाए, लेकिन कानून में यदि इसे रखा गया है तो सुप्रीम कोर्ट की इज्जत करना सीखें…(हालांकि कांग्रेस के मन में न्यायालय की कितनी इज्जत है यह हम शाहबानो और भ्रष्ट जज रामास्वामी महाभियोग मामले में देख चुके हैं)…

6) अन्तिम दो सवाल युवाओं से भी है - जब आप NGOs द्वारा "मैनेज्ड" तथा मीडिया द्वारा फ़ुलाए गये अभियानों में बिना सोचे-समझे बढ़चढ़कर हिस्सा लेते हैं तो क्या अफ़ज़ल गूरू, पत्थरबाजों की रिहाई, केरल में प्रोफ़ेसर के हाथ काटने (Professor Hand Chopped in Kerala) जैसी घटनाओं पर आपका खून नहीं खौलता?

7) क्या किसी भी राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर आप तभी जागेंगे, जब "भाण्ड मीडिया" अपनी TRP की खातिर आपको उठाएगा, या स्वयं अपनी आँखें-कान खोलकर, खुद का दिमाग चलाकर, देश में चल रही देशद्रोही और देशभंजक गतिविधियों पर भी नज़र रखेंगे?

पंजाब में चुनाव होने वाले हैं इसलिए भुल्लर की फ़ाँसी वाले मामले पर अकाली-भाजपा मौन साध लें, तमिलनाडु में चुनाव होने वाले हैं इसलिए लिट्टे के उग्रवादियों पर जयललिता-करुणानिधि एक हो जाएं, कश्मीर में गिलानी धमकियाँ दे रहे हैं इसलिए अफ़ज़ल की फ़ाँसी पर कांग्रेस से लेकर वामपंथी सभी मुँह में दही जमा लें, असम में उग्रवादियों से बातचीत भी जारी है और सेना के जवान उन्हीं से लड़कर शहीद भी हो रहे हैं…। अरुणाचल से एक सांसद नेपाली नागरिक और हत्यारा होने के बावजूद कांग्रेस से सांसद बन जाता है? बांग्लादेश में सरेआम हिन्दुओं के खिलाफ़ ज़ुल्म जारी हैं, वहाँ के भिखमंगे शरणार्थी भारत पर लगातार बोझ डालते जा रहे हैं… प्रधानमंत्री उसी देश की यात्रा पर जा रहे हैं?……  ये सब क्या हो रहा है? कहाँ है कानून? संविधान का पालन कैसा हो रहा है?


हमारे नेता तो बार-बार "संविधान के शासन" की दुहाईयाँ देते रहते हैं, लेकिन यही लोग आये दिन "संवैधानिक संस्थाओं" को लतियाते भी रहते हैं… चाहे चुनाव आयुक्त के पद पर नवीन चावला की नियुक्ति हो, CVC के पद पर थॉमस की नियुक्ति हो, या फ़िर सुप्रीम कोर्ट कान पकड़कर न घसीटे तब तक कलमाडी, राजा और हसन अली को खुल्लमखुल्ला आश्रय देना हो…। क्या कांग्रेस पार्टी को इतनी भी शर्म नहीं है कि उन्हीं की पार्टी के एक युवा प्रधानमंत्री के हत्यारे "फ़ाइलों के चक्र" और "कानून के जालों" से बीस साल तक बचे रहे? और अब अफ़ज़ल गूरू को बचाने के लिए इसी "पतली गली" की खोज में अभी भी राजनीति से बाज नहीं आ रही, समझा जा सकता है कि क्या तो देश की जनता की रक्षा होगी और क्या तो हम भारत के दुश्मनों को उनके घर जाकर क्या मारेंगे?


जब तक देश का युवा वर्ग "खबरों के उस पार" देखना नहीं सीखता, और "बिके हुए चैनलों-अखबारों" के मायाजाल से बाहर नहीं आता, तब तक ऐसी खबरें-घटनाएं और तथ्य दबाए-छिपाए जाते रहेंगे… देश एक बेहद नाज़ुक राजनैतिक-आर्थिक और सामाजिक दौर से गुज़र रहा है, ऐसे में सिर्फ़ रामलीला मैदान पर "एक रोमाण्टिक आंदोलन" में भाग लेने से कुछ नहीं होगा। हमारा देश पहले से ही "सॉफ़्ट स्टेट" के रूप में बदनाम है, परन्तु अब तो यह "लिज़लिज़ा और पिलपिला" होता चला जा रहा है… नेताओं और सांसदों से यह पूछने का वक्त कभी का आ चुका है कि आखिर यह देश संविधान और कानून के अनुसार चलेगा या वोट बैंक के अनुसार?
=========

नोट :- "गुरु" शब्द बहुत पवित्र है, परन्तु अफ़ज़ल का सही नाम "गूरू" (कश्मीर में दूध बेचने वाले ग्वालों की एक जाति का उपनाम) है, अतः अफ़ज़ल को "गुरु" नहीं बल्कि उसके सही नाम से "अफ़ज़ल गूरू" कहें…

(सभी मिलकर राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट को ईमेल और पत्र भेजें कि वे लिट्टे हो या अफ़ज़ल हो, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद बार-बार पुनर्विचार न करें और भगवान के लिए "सभी" फ़ाइलों पर "हाँ या ना" कुछ भी हो, पर जल्दी से जल्दी निर्णय लें, आज के "तेज युग" में तो 11 साल में तो "पूरी पीढ़ी" बदल जाती है)

28 comments:

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

बहुत ही जानदार बात आज आपके द्धारा सबके बीच आयी है। फ़िर पढनी पढेगी। बार-बार। सबको बतानी भी है।

Rajesh Kumar said...

वोट बेंक के लिए नेता लोग क्या क्या नहीं कर सकते :(
जरा भी शर्म नहीं आती इन लोगो को?
और राष्ट्रपति तो हमारे देश में सिर्फ नाम के लिए ही होते है :(

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

जो आज बूढे हैं, वही कल जवान थे. जो आज जवान हैं, कल बूढे हो जायेंगे. बात है आत्म सम्मान की, स्वाभिमान की, चेतना की. कुछ है हमारे अन्दर. जिस देश का इतिहास ही दुरुस्त न हो, जहां लोगों के अन्दर नैतिकता का पतन हो गया हो, वहां के लोगों से क्या उम्मीद हो सकती है. पतन के गर्त में जाता हुआ देखने के सिवा कोई चारा है ही नहीं..

Ratan Singh Shekhawat said...

लानत है भारत के राजनेताओं पर जो राष्ट्रहित को भी वोटो के तराजू में तोलते है|

Shastri JC Philip said...

हर बार के समान एक सशक्त विश्लेषण !! आज सुबह ही तमिलनाडू की बात पर मैं ने फेसबुक पर टिप्पणी पोस्ट की थी.

इस तरह चलता रहेगा तो हर तरह का घिनौना अपराधी अपनी "कौम" की मदद से बचता रहेगा. अराजकता के लिये और कहीं जाने की जरूरत न होगी.

सस्नेह -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
हर महीने कम से कम एक हिन्दी पुस्तक खरीदें !
मैं और आप नहीं तो क्या विदेशी लोग हिन्दी
लेखकों को प्रोत्साहन देंगे ??

http://www.Sarathi.info

ePandit said...

राष्ट्र के समक्ष बहुत ही विकट स्थिति है, राष्ट्रवादी लोग हाशिये पर जा रहे हैं जबकि राष्ट्रविरोधी तत्वों का बोलबाला है। अल्पसंख्यकवाद अपने चरम पर है। अल्पसंख्यक होना हर अपराध का लाइसेंस है। बेगुनाह जनता को मार डालो, दानवाधिकारवादी और सेकुलर खुद ही बचाने आ जायेंगे।

बहुत ही विचारणीय और सार्थक लेख।

Rastra Premi said...

Suresh ji
Apka vishleshan vastav me satik hai . voto ke bhikhari apne Sawarth ki rotiya sekne ke liye kis had tak ja sakte hai yah apke lekh se saspat ho hi raha hai or hum sab bhartiyo ke liye vicharniy hai .
Bhundo midiya ke dvara parcharit andolno me khana - pani chodkar sadko par rate nikalte hai lekin In rastriya muddo par zibh chipak jati hai..... Per ladkhdate hai......... hath kapnte hai.......
Man hichkichata hai.... manu sap sungh gya hai...! Yah kesi vidmbna hai.
Aap ase prenaspad lekh dete rahe kya pata YUVAO ke man ki chingari Aag pakad le....!

Meenu Khare said...

hamesha ki tarah shandaar.kis address par mail kiya jaae?

सुलभ said...

इस देश की यही एक दुखती रग है.
कोई भी पार्टी "राष्ट्र सर्वोपरि, क़ानून सर्पोवारी" का अनुकरण नहीं कर रहा.

सुलभ said...

इस देश की यही एक दुखती रग है.
कोई भी पार्टी "राष्ट्र सर्वोपरि, क़ानून सर्पोवारी" का अनुकरण नहीं कर रहा.

संजय बेंगाणी said...

खून-खान खौलना छोड़ो. विज्ञापन देख कर खाते-पीते है. नहाते-धोते है. अफजल पर विज्ञापनी अभियान चलाओ फिर देखो कैसे फैसबुकिया क्रांति आती है!

जितेन्द्र सिंह : एक सच्चा भारतीय said...

आपका धन्यवाद सुरेश भाई...
मुहं पोत कर, हाथ में तिरंगा लेकर, 'अण्णा' बनकर न्यूज चैनलों के 'बिकाऊ' कैमरे के सामने 'भांड' बनकर नौटंकी करने वाले युवाओं के लिए शिक्षाप्रद संदेश भेजा है आपने, अगर उनकी 'TRP खुमारी' अब तक नहीं उतरी है तो...

'गूरु' जैसे देशद्रोहियों को 'पनाह' देना तो इन कांग्रेसी नेताओं की राजनीति का अहम् हिस्सा है जिसके सहारे ये इस 'मूर्ख' जनता के 'महान' देश में 'धरतीपकड़' बने हुए हैं..
देश तो भाई साहब 'वोट बैंक' आरक्षण, जातिवाद और धार्मिक मुद्दों पे ही 'बिकता' रहेगा.? और 'उधारी' के संविधान का 'मखौल' उड़ता रहेगा.??
जब तक 'कुम्भ्करनी' जनता नहीं जागेगी और अपने अधिकारों के साथ 'समझौता' करना नहीं छोड़ेगी..?

'अण्णा क्रांति??' के बाद (जिसमे जन-लोकपाल और जन-भावनाओं का चीर-हरण हुआ) लोग किसी 'अवतार' की उम्मीद में बैठे हैं कि 'मेरे करण-अर्जुन आयेंगे.?
भगवान् ऐसे लोगों को विशेष सद्बुद्धि दे..
वन्दे-मातरम्...
जय हिंद...जय भारत....

Sudesh Sharma said...

Suresh ji,
Vot ki rajniti me jo na ho jaye vo kam h.
Yuva shakti ne khud kabhi kuchh nahi kiya h, uska to baarud ki tarah istemal kiya jata h nirman ho ya vidhvansh.
Iske istemal ke liye ek sarthak manch ki sakht jarurat h

Desh Premi said...

aap chillate rahiye !!
ye aapka or mera farj banata hai
lekin in logo(sache rashtrabhakt) se aasha rakhna bekar hai
kyon ki jo log 1600 sal ki gulami se kuch nahi sikhe to ab kya sikhenge
han lekin kisi-n-kisi ko to bolte rahna padega
jai hind - jai hindustan !!

Abhishek Garg said...

आप अपने ब्लॉग में हमेशा ही उन मुद्दों को उठाते हैं जिनके बारे में लोग सोच भी नहीं पाते, जब से आपका ब्लॉग पढ़ना शुरू किया है हर रोज़ किसी न किसी पोस्ट का इंतज़ार रहता है. एक और शानदार पोस्ट के लिए बहुत बहुत बधाई...

Rupesh said...

behatarin lekh

Desh Premi said...

Sonia Gandhi is absconding somewhere in US for Medical Treatment in one of the Most Premium hospital for past 2 Months. She has declared her yearly income at 15 lakhs and total Assets of 2 Crores to Election commission. Its common knowledge medical expense in US for such long period of time with VVIP treatment would cost her 5 times more than her total Assets. Now if someone says they have gifted her the money.. well than too she is entitled to pay tax @ 30% is ED watching and listening !

Rajesh said...

Bahut Hi Badhiya Suresh Ji. Apne kya Kataksh kiya Netao Par. Bahut Badhiya.

ravi said...

aap ne bahot achha likha par jo apne anna ji ke baare mein likha main us se sehmat bilkul nahi hun ,ye ek shuruaat bhar haihamaare sistem mein jung lag chuka hai isko saaf karne ki ladai hai jo ki bahot achhe se hui media agar trp ke liye anna ji ko utha raha hai to ismen bura manne wali kya baat hai ? ya aap khud ko unse bada deshbhakt samajhte hain or aap ko lagta hai ki aap ko log bilkul nahi jante or media aap ke paas bilkun nahi fatkta isliye ?kripya takat ko vibhajit na karen mil kar in sab muddon par laden

ajeet said...

राज़ तो भीड़ तंत्र का ही चलेगा आप और हम कुछ नहीं कर पायेंगे क्योंकि धर्मनिरपेक्षता नाम के एड्स से भी भयानक रोग से सारे नेता पीड़ित हो चुके हैं अब कुछ नहीं हो सकता.

ajeet said...

राज़ तो भीड़ तंत्र का ही चलेगा आप और हम कुछ नहीं कर पायेंगे क्योंकि धर्मनिरपेक्षता नाम के एड्स से भी भयानक रोग से सारे नेता पीड़ित हो चुके हैं अब कुछ नहीं हो सकता.

श्रवण said...

http://anticarpsnsistam.blogspot.com/
अप के लेखनी में गहराई है जो सोच बदले का मदा रखती है .क्या कोई अदर्स एंटी करप्सन सिस्टिम हो सकता है .कल्पना करने में क्या हर्ज है .में ने भी कुछ सोच जिसे आज ही उपर लिखे ब्लाग पर डाला है .मै एक नया ब्लागर हू.मार्गदर्सन करिये गा .

हिन्दुस्तानी said...

राज तो भीड़तंत्र का ही चलेगा सुरेश जी यही तो रोना है.. संविधान इत्यादि तो केवल मोहरे हैं.. क्या कभी संविधानों पर नेताओं ने नजर डाली है .. ओर अगर डाली भी है तो उस पैरे को ही बदल दिया गया जो इनके आड़े आ रहा था..

बहुत दुखद स्थिति है..
धर्मनिरपेक्षता के साथ एक ओर शब्द जुड चुका है दलितता.,,. अन्ना जी को जूस दलित लड़की पिला रही है ये बात दसियों बार बोली गई मीडिया के सामने.. कल अन्ना जी ने एक दलित के हाथों गणेश की पूजा करवाई अपने गाँव मैं .. कल तक खुद अन्ना जी कर रहे थे...
ये हैं भीड़ तंत्र.. ...
बार वार इन चीजों को चला कर सामने लाया जाता है.. ढोल पीटा जाता है की इतने अंतर है.. ये अलग-अलग है इत्यादि केवल इसलिए की वोट तंत्र बचा रहे.. भीड़ तंत्र बचा रहे...
वैसे आपकी लेखनी के कई कायल है ओर इसमें
मैं भी हूँ
आप लिखते रहें ओर हमें ओर अन्यों को सोचने विचारने को मजबूर करते रहें...

आशा जोगळेकर said...

आपने ठीक कहा देश सॉफ्ट ही नही लिजलिजा और पिलपिला हो गया है ।

भरतसिंह बावरला said...

सुरेशभाई सबसे पहले आपको साधुवाद और भगवान आपकी लम्बी उम्र करे...।
एक कड़्वा सच है भले आप स्टडि करवां लिजिये..मेरे हिसाब से ये देश अब बद से बदतर कि हालात पर जा रहा है यकिन मानिये आप यही देश आज से 40-50 सालों बाद एक इस्लामिक कटरपंथी मुल्क बनेगा..। इसमें कोइ दोराय नही कि अपने प्रधानमंत्री जी कहते है कि इस देश में पहला अधिकार मुसलमानो क है...तो हिन्दु क्या बाहर से आये थे...? कारण यह है कि सरकार हिन्दुओं को बांट रहि है एवं आपस में तोड़ने कि कयावाद कर रही है...और अल्पसंख्य्को को महत्व दे रही है...दुसरी बात उनकि निरंतर बढ्ती आबदी....जो आज पाकिस्तान में जारी है वही हालात कुछः सालो बाद इसी देश में होगें...।

Anti Virus said...

सभी मिलकर राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट को ईमेल और पत्र भेजें कि वे लिट्टे हो या अफ़ज़ल हो, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद बार-बार पुनर्विचार न करें और भगवान के लिए "सभी" फ़ाइलों पर "हाँ या ना" कुछ भी हो, पर जल्दी से जल्दी निर्णय लें, आज के "तेज युग" में तो 11 साल में तो "पूरी पीढ़ी" बदल जाती है

राहुल पंडित said...

मेरे मन में भी इच्छा है,हास लिखू श्रृंगार लिखू
गीत लिखू मै सदा गुलाबी,कभी नहीं मै खार लिखू
पर जब दुश्मन ललकारे तो कैसे ना ललकार लिखू?
अपने देश के गद्दारों को कैसे ना गद्दार लिखू?

Anonymous said...

lekhak ek sankrin aur choti mansikta wala pratit hota hai, lekhak dharm ke naam par ki hui rajniti aur khoon kharabe ko gandago ko sahi batane ki koshish kar raha hai aur apne hi jaisi sankrin aur choti soch walo se samrathan maang raha hai...sharam karo aur soch badlo desh khud ba khud accha ho jaeyga..