Wednesday, August 10, 2011

Bradford and Moradabad Hindu-Muslim Riots


इंग्लैण्ड में पूर्वी लन्दन, ब्रेडफ़ोर्ड एवं बर्मिंघम शहरों के मुस्लिम बहुल इलाकों में कुछ दिनों पहले अचानक रात को  पोस्टर जगह-जगह खम्भों पर लगे मिले… साथ में कुछ पर्चे भी मिले हैं जिसमें मुस्लिम बहुल इलाकों को "शरीयत कण्ट्रोल्ड झोन" बताते हुए वहाँ से गुज़रने वालों को चेताया गया है, कि यहाँ से गुज़रने अथवा इस इलाके में आने वाले लोग संगीत न बजाएं, जोर-जोर से गाना न गाएं, सिगरेट-शराब न पिएं, महिलाएं अपना सिर ढँककर निकलें… आदि-आदि। कुछ गोरी महिलाओं पर हल्के-फ़ुल्के हमले भी किए गये हैं… हालांकि पुलिस ने इन पोस्टरों को तुरन्त निकलवा दिया है, फ़िर भी आसपास के अंग्रेज रहवासियों ने सुरक्षा सम्बन्धी चितांए व्यक्त की हैं एवं ऐसे क्षेत्रों के आसपास स्थित चर्च के पादरियों ने सावधान रहने की चेतावनी जारी कर दी है…।

स्थानीय निवासियों ने दबी ज़बान में आरोप लगाए हैं कि पिछले दो दिनों से लन्दन में जारी दंगों में "नीग्रो एवं काले" उग्र युवकों की आड़ में नकाब पहनकर मुस्लिम युवक भी इन दंगों, आगज़नी और लूटपाट में सक्रिय हैं…। सच्चाई का खुलासा लन्दन पुलिस द्वारा गिरफ़्तार किये गये 300 से दंगाईयों से पूछताछ के बाद ही हो सकेगा, परन्तु "शरीया जोन" के पोस्टर देखकर ईसाईयों में भी असंतोष और आक्रोश फ़ैल चुका है।

भारत में ऐसे "मिनी पाकिस्तान" और "शरीयत नियंत्रित इलाके" हर शहर, हर महानगर में बहुतायत में पाए जाते हैं, जहाँ पर पुलिस और प्रशासन का कोई जोर नहीं चलता। कल ही मुरादाबाद में, कांवड़ यात्रियों के गुजरने को लेकर भीषण दंगा हुआ है। "सेकुलर सरकारी भाषा" में कहा जाए तो एक "समुदाय" द्वारा, "क्षेत्र विशेष" से कांवड़ यात्रियों को "एक धार्मिक स्थल" के सामने से निकलने से मना करने पर विवाद की स्थिति बनी और दंगा शुरु हुआ। देखना है कि क्षेत्र के माननीय(?) सांसद मोहम्मद अजहरुद्दीन क्या कदम उठाते हैं, तथा "गुजरात-फ़ोबिया" से ग्रस्त मानसिक विकलांग मीडिया इसे कितना कवरेज देता है (कुछ माह पहले बरेली में हुए भीषण दंगों को तो मीडिया ने "बखूबी"(?) दफ़न कर दिया था)

हमारे "तथाकथित सेकुलर" मित्र, क्या इन दो प्रश्नों का जवाब देंगे कि -

1) जब तक मुस्लिम किसी आबादी के 30% से कम होते हैं तब तक वे उस देश-राज्य के कानून  को मानते हैं, पालन करते हैं… परन्तु जैसे-जैसे इलाके की मुस्लिम आबादी 50% से ऊपर होने लगती है, उन्हें "शरीयत कानून का नियंत्रण", "दारुल-इस्लाम" इत्यादि क्यों याद आने लगते हैं?

2) जब-जब जिस-जिस इलाके, क्षेत्र, मोहल्ले-तहसील-जिले-संभाग-राज्य-देश में मुस्लिम बहुसंख्यक हो जाते हैं, वहाँ पर अल्पसंख्यक (चाहे ईसाई हों या हिन्दू) असुरक्षित क्यों हो जाते हैं?

इन मामूली और आसान सवालों के जवाब "सेकुलरों" को पता तो हैं, लेकिन बोलने में ज़बान लड़खड़ाती है, लिखने में हाथ काँपते हैं, और सारा का सारा "सेकुलरिज़्म", न जाने कहाँ-कहाँ से बहने लगता है… 

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स्रोत :- http://www.worthynews.com/10743-posters-declare-sharia-zone-in-east-london 

http://www.hindustantimes.com/13-injured-in-Moradabad-communal-clash/Article1-731579.aspx 
 

21 comments:

संजय बेंगाणी said...

पर उपदेश कुशल बहुतेरे... जब खुद ने भुगता तो अमेरीका, ब्रिटेन चीन को भी जेहादी मानसिकता का असली खतरा समझ में आने लगा. हाँ, हमारी बात और है. हम पूरानी संस्कृति है. यहाँ गंगा-जमना संस्कृति बहती है. गाँधी-बुद्ध की भूमि है. हम न समझे न समझेंगे. न ही समझना चाहते है.

G.N.SHAW said...

सार्थक पोस्ट

Kuldeep Tyagi said...

sanjay ji muradabaad jaisi halat aaj pure desh ki hai, lekin ye jo apne aapko secular kehte hai ye tabhi tak chup rehte hai jab tak hinduo ko dabaya jata hai jaise hi inke bhaiyo ko koi kuch bolta bhi hai to inke pet mai dard suru ho jata hai. jarurat hai ekjut hokar in secularvadiyo ke khilaf khada hone ki.

दीपक बाबा said...

जब सर पर जबरदस्ती टोपी पहना दी जायेगी तभी समझेंगे.

अज्ञात भ्रमणकर्ता said...

गुजरात-फ़ोबिया" से ग्रस्त मानसिक विकलांग मीडिया

Man said...

वन्देमातरम सर
सर पोस्ट पढी ये साले हरामी टायर पंचर छाप पता नहीं क्या क्या कंहा कंहा कुछ भी करेंगे @इनकी मामी और भाभी विधवा अमेरिका करने वाला था लेकिन भारत की सहायता बगेर वो भी कुछ नहीं कर सकता हे @#@

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

जल्द ही होगा, इस देश का सत्यानाश।

PADMSINGH said...

मुरादाबाद मे दंगे हो रहे थे और मीडिया मे एक भी खबर नहीं आई थी.... ये बिकाऊ मीडिया ही है जो हिन्दू का नाम आते ही धर्म के ठेकेदार, बजरंग दल के गुंडे, और संघ के आतंकी जैसे शब्दों से छाती पीट पीट कर स्यापा करने लग जाती है... सबसे पहले हर हिन्दू को चाहिए कि वह असहयोग शुरू करे,,, जहां तक संभव हो इनसे किसी तरह की बिजनेस डील न करे,,, अपनी ज़मीनें हिंदुओं को ही दे अन्यथा वो दिन दूर नहीं जब रहा सहा हिन्दू या तो क्रिस्तान या फिर म्लेक्ष बन कर रह जाएगा

प्रतुल वशिष्ठ said...

in sawalon ke jawaab 'sekular' mitron ke paas hain lekin murdaa zameer me aawaaj nahin.

I and god said...

झगडा मुल्लिम और गोरों का है , और भारतीय मीडिया में इसे भारतीयों और गोरों के झगडे के रूप में दिखाया जा रहा है

Anonymous said...

सुरेश जी, मीडिया का इसमे कोई दोष नहीं है, आज मीडिया का काम सामाजिक मुदो को उठाना नहीं बल्कि अपना वयवसाय चलाना है, यह कहना गलत है क़ी "गुजरात-फ़ोबिया" से ग्रस्त मानसिक विकलांग"" आखिर अधिकतर मीडिया समूह पर हिन्दू विद्वानों का वर्चस्व होने के बावजूद हिन्दू समुदाय क़ी समस्याओ को न्याय नहीं मिल पाता. दूसरी बात हमारी व्यवस्था में मीडिया भी स्वतंत्र नहीं है उसके ऊपर भी सरकारी व राजनैतिक दबाव रहता है. कोई सरकार से दुश्मनी क्यों ले, मेडिया प्रायः हर मुदे उठाना चाहती है किन्तु अज्ञात दबाव के कारण चुप हो जाती है... उदाहरन के लिए रूपये के प्रतीक का घोटाला को leejeye मीडिया Zee News ने इस मामले को उठाने क़ी कोशिश क़ी परन्तु दबा दिया गया..जैसा इस वेबसाइट को देखने से लगता है---लिंक www.saveindianrupeesymbol.org

prasoon bajpai said...

Apka article bahut gaihri soch wala he. hame es baat per vichar karna chahiya. Prasoon Bajpai

Anonymous said...

accha lekh, aap jaari rakhen, hindu jaag raha hai

Rajesh said...

Suresh Ji, Bahut Hi Badiya likha hai. Aap dusto ko ese hi Sabak sikhaya karo. Dhanywad

Anonymous said...

london me goro aur kalo me ladai chal rahi hai aur pet me dard chilu.. ke ho raha hai...

Anonymous said...

अभी कहाँ सुरेश जी ,नवरात्रि तक देखियेगा ,विसर्जन के समय इस "शरिया जोन" का कमाल जब मुस्लिम-बहुल इलाकों से प्रतिमाओं को ले जाने पर यह छतों से पथराव करेंगे .. और सिकुलर भांड मीडिया उसे भी हम हिंदुओं का दोष बताएगी कि आखिर हमें उस रास्ते से प्रतिमाओं को ले जाने की जरुरत क्या थी ..अभी मैं एक "प्रो-जिहादी" मानसिकता से भरे व्यक्ति का लेख पढ़ रहा था जो "टू-सर्किल्स" में निकला .. उसमे देखिये साहब फैज़ल फरीद मुरादाबाद को लेकर क्या कह रहे हैं - The violence began after an incident on Sunday. Kanwariyas vitiated the atmosphere by insisting to take out procession from Kathghar area dominated by Muslims on Sunday. In the past the Kanwariyas had never taken that root. The matter was subsided with the intervention of community elders. However, after the Hindus held a meeting on Tuesday, violence was unleashed in an organised manner. After the meeting, Hindu youths rushed to the road and started stone pelting on minority establishments including mosques ... : - आशीष

कणाद said...

नार्वे के एक युवक ने जो जन्म से इसाई, धारणा से दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी, वैचारिक रूप से आधुनिक विचार रखने वाला तथा पठन-पाठन प्रिय तो निश्चय ही रहा है क्या कारण है कि उन लोगों को जो उसके देश, धर्म व नस्ल के थे, को मार डालता है यह कहते हुए कि वे आधुनिक जनतंत्र में बेमेल गुटबंदियों से बनी सरकारों के प्रतिनिधि हैं जो उसके देश की सभ्यता व संस्कृति को भ्रष्ट करने वाले इस्लामी गुटों का समर्थन व उनको बढ़ावा दे रहे हैं। क्या वहाँ की स्थितियाँ भारत से भी अधिक विकट हैं जहां के मूल लोगों को आज भी धार्मिक कर जजिया चुकाना पड़ता है जो देव स्थान या सरकारी न्यासों के माध्यम से सरकार वसूल कर मदरसों, चर्चों, हज जैसी यात्राओं पर सरकारी अनुदान देने में काम लेती है तथा किसी भी खानकाह या गिरजे की आमदनी के स्रोत या हिसाब तक नहीं अंकेक्षित कराती, लेना तो दूर की बात है। हजारों करोड़ का जजिया खास कर मुसलमानों को सौंपने वाली सरकार पारसियों, सिखों, बौद्धों, जैनों, जिनको सरकार अल्पसंख्यक मानती है या वैष्णव, शैव, शाक्त, आर्य समाज, बिश्नोई, कबीर पंथी, दादू पंथी, स्वामी नारायण या अन्य संप्रदाय जिन्हें भिन्न पंथ होने पर भी अल्पसंख्यक नहीं माना गया, के अनुयाइयों से जितने कर ले रही है क्या किंचिद भी धार्मिक सुविधा प्रदान कर रही है? जब धर्म को व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान मानता है तो सरकारों का एक धर्म विशेष के लिए अलग से धन खर्चना क्या नार्वे में भी आरंभ हो गया है? जिस धर्म को मानने वालों की संख्या में 60 वर्षों में वृद्धि हुई है वे किस तरह अल्पसंख्यक की रक्षा के संविधान प्रदत्त अधिकार के अंतर्गत माने जा रहे हैं। यह अधिकार तो उन समुदायों के लिए दिए गए थे जिनके अस्तित्व को अधिकार न दिए जाने पर खतरा था। पंथ के अतिरिक्त अनेक आधार उसमें दिए गए हैं। भारत के भिन्न समाजों में शादी संबंधी भिन्न आधार थे तथा अधिकांशतः आज भी मौजूद हैं। उनकी अवहेलना कर आधुनिकता व एकरूपता के नाम पर हिंदू विवाह व उत्तराधिकार नियम बनाए गए लेकिन मुस्लिमों के लिए व्यक्तिगत कानून का दायरा बनाकर उन्हें भारतीय नव आधुनिकता से दूर रखा गया। क्या नार्वे में आई है ऐसी स्थिति ? प्राचीन काल से चली आ रही जवान विधवा की देवर से विवाह करने की परंपरा से हुई हजारों जोड़ों की शादी आज भी कानूनन वैध नहीं है हां लिविंग रिलेशन व उससे उत्पन्न संतान आधुनिक भारत में वैध हैं क्या इससे अधिक सांस्कृतिक अपमान हुए हैं नार्वे में? यहाँ भारत में आज भी मुरादाबाद से लेकर मुम्बई में जो हो रहा है उसे देख कर तो लगता है कि मुसलमानों को जकात तो सरकार को देनी चाहिए जो तथाकथित अल्लाह या अलइलाह या अललाह नहीं तो रसूलललाह या खलीफा से अधिक नियामतें दे रही है ताकि जजिया को सार्थकता मिले। नार्वे या लंदन या कहीं भी ऐसा हो तो बताएं। हम तो सब हथियार देवी-देवताओं को सौंप कर वीणा-वादिनी सरस्वती की उपासना कर रहे हैं जो हमें सब तरह की विद्याएं दे रही है और हम परिवार पाल रहे हैं किसी घटना को पान चबाने से अधिक का समय-ध्यान नहीं देते। आधुनिक नव धनिक सैक्यूलर इंडियन DKBOSSDKBOSSDKBOSSDK

Raj said...

थोडा रुको ये लन्दन का नाम और कानून भी बदल देगे और सीरिया कानून लगा देगे

surya said...

ये सब हिंदुओं की गलती है, जब तक उन्हें उन्ही की भाषा मैं जवाब देना नहीं सीखेंगे नब तक अपने ही देश में दर डॉ कर जीते रहेंगे, अब तो जागो हिंदुओं अब तो जागो

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

gulami ki taraf badhti ek sanskriti.. apne hi desh me ab ye hone laga hai ki ye ilaka "alp" ka hai isliye idhar se n niklo...

Bhavin said...

kyo k Muslim ek pishachi samudaay hai, use dharma nahi kaha ja sakta........

aur apna ghilauna pan woh kabhi bhi dikha sakta hai