Sunday, August 28, 2011

Anna Hazare, Janlokpal Bill and Indian Parliament


आज़ादी की दूसरी लड़ाई(?) खत्म हुई, क्या दूसरी समस्याओं को देख लें?…   


चलिये… अन्ततः आज़ादी की दूसरी लड़ाई(?) बगैर किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गई। जिस प्रकार से यह दूसरी आज़ादी हमें मिली है, यदि इन्हीं शर्तों पर मिलनी थी तो काफ़ी पहले ही मिल जानी थी, परन्तु इसके लिए मीडिया और आम जनता को 13 दिन का इन्तज़ार करवाया गया। परदे के पीछे जो भी डीलिंग हुई हो (यह तो बाद में पता चलेगा) परन्तु फ़िलहाल जनता के सामने जो दूसरी आज़ादी परोसी गई है, उसमें युद्धरत दो पक्ष थे, पहला सिविल सोसायटी और दूसरा केन्द्र की यूपीए सरकार, दोनों पक्ष संतुष्ट हैं।

पहला पक्ष यानी सिविल सोसायटी जिसमें एक से बढ़कर एक युवा लोग थे, परन्तु उन्होंने अनशन करवाने के लिए 74 वर्षीय (अनशन एक्सपर्ट) एक सीधे-सरल बूढ़े को चुना ताकि सहानुभूति तेजी से बटोरी जा सके (इसमें वे कामयाब भी रहे)। वहीं दूसरे पक्ष यानी सरकार ने शुरुआती गलतियों (जैसे अण्णा को गिरफ़्तार करने और उन पर प्रवक्ता रूपी सरकारी अल्सेशियनों को छोड़ने) के बाद, बड़ी सफ़ाई से इस आंदोलन को पहले थकाया और फ़िर पूरी संसद को अण्णा के सामने खड़ा कर दिया।

 जब तक सत्ता प्रतिष्ठान अपने-अपने मोहरों को सही इस्तेमाल करके अपने राजनैतिक विरोधियों को खत्म करने अथवा अपनी छवि चमकाने के लिए उनका सीमित और सही उपयोग करता है तब तो स्थितियाँ उसके नियन्त्रण में होती हैं, लेकिन यही मोहरे जब प्राणवान हो जाएं तो मुश्किल भी खड़ी करते हैं…। ठीक यही कुछ सिविल सोसायटी और मीडिया प्रायोजित इस आंदोलन में हुआ। हालांकि सिविल सोसायटी को बाबा रामदेव की राजनैतिक काट के रूप में सरकार ने ही (भिंडरावाले की तरह) पाल-पोसकर बड़ा किया था, परन्तु जैसी की मुझे पहले से ही आशंका थी सिविल सोसायटी अपनी सीमाओं को लाँघते हुए सरकार पर ही अपनी शर्तें थोपने लगी और संसद को झुकाने-दबाने की मुद्रा में आ गई…। इसके बाद तो सरकार भी अपनी वाली पर आ गई एवं उसने सिविल सोसायटी को थका-थकाकर खत्म करने की योजना बनाई।

लगभग यही कुछ मीडिया के मामले में भी हुआ, शुरु में मीडिया को निर्देश थे कि अण्णा की हुंकार को खूब बढ़ा-चढ़ाकर जनता के सामने पेश किया जाए, मीडिया ने वैसा ही किया। फ़िर जब युवा वर्ग और आम जनता इस आज़ादी की दूसरी लड़ाई में भावनात्मक रूप से शामिल होने लगी तो मीडिया भी अपनी धंधेबाजी पर उतर आया। मीडिया को मालूम था कि TRP और विज्ञापन बटोरने का ऐसा शानदार ईवेण्ट दोबारा शायद जल्दी ना मिले। इसलिए इस आंदोलन को ओवर-हाइप किया गया और TRP के खेल में रामलीला मैदान पर ओबी वैन मेला लगाया गया। उधर सरकार परदे के पीछे इस जुगाड़ में लगी रही कि सिविल सोसायटी किसी तरह मान जाए, परन्तु वैसा हो न सका। रही-सही कसर भीड़ में शामिल राष्ट्रवादी तत्वों ने लगातार वन्देमातरम के नारे लगा-लगाकर पूरी कर दी जिसके कारण कुछ "सेकुलर नाराज़गी" के स्वर भी उभरे… अर्थात समझौता या "राजनैतिक स्टण्ट" रचने की जो साजिश थी, वह वन्देमातरम के नारों, RSS के खुले समर्थन की वजह से दबाव में आ गई। 
 
समय बीतता जा रहा था, धीरे-धीरे बातें सरकार और टीम अण्णा के हाथों से बाहर जाने लगी थीं। सरकार को भी अपना चेहरा बचाना था और टीम अण्णा भी जिस ऊँचे पेड़ पर चढ़ गई थी, वहाँ से उसे भी स-सम्मान उतरना ही था। मीडिया भी आखिर एक ही इवेण्ट को कब तक चबाता, वह भी थक गया था। आखिरकार अन्तिम रास्ता संसद से होकर ही निकला, टीम संसद ने टीम अण्णा को इतनी सफ़ाई से पटकनी दी कि उफ़्फ़ करना तो दूर, टीम अण्णा लोकतन्त्र की जीत के नारे लगाते-लगाते ठण्डी पड़ गई। आईये पहले हम बिन्दुवार देख लें कि टीम अण्णा द्वारा विज्ञापित आखिर यह जीत(?) कितनी बड़ी और किस प्रकार की है, फ़िर आगे बात करेंगे
 
  पहली मांग थी : सरकार अपना कमजोर बिल वापस ले
- सरकार ने बिल तो वापस नहीं ही लिया, उलटा चार नये बिल और मढ़ दिये स्थायी समिति के माथे…

दूसरी मांग थी :  सरकार लोकपाल बिल के दायरे में प्रधान मंत्री को लाये
- सरकार ने आज ऐसा कोई वायदा तक नहीं किया। प्रधानमंत्री ने अपना पल्ला झाड़ते हुए कह दिया कि मैं तो चाहता हूँ कि प्रधानमंत्री दायरे में आएं, लेकिन मेरे कुछ मंत्री नहीं चाहते… (ये मंत्री इसलिए ऐसा नहीं चाहते क्योंकि जब कल को पवित्र परिवार के सदस्य प्रधानमंत्री बनें और कोई उल्टा-सीधा व्यक्ति लोकपाल बन गया तो उन पर कोई आँच न आने पाए)। फ़िलहाल टीम अन्ना को थमाए गये लॉलीपॉप में (यानी समझौते के पत्र  में) इसका कोई जिक्र तक नहीं है।

तीसरी मांग थी : लोकपाल के दायरे में सांसद भी हों
- “लॉलीपॉप में सरकार ने इस सम्बन्ध में भी कोई बात नहीं कही है।

चौथी मांग थी : तीस अगस्त तक बिल संसद में पास हो (क्योंकि 1 सितम्बर से रामलीला मैदान दूसरे आंदोलन के लिए बुक है)
- तीस अगस्त तो छोड़िये, सरकार ने जनलोकपाल बिल पास करने के लिए कोई समय सीमा तक नहीं बताई है कि वह बिल कब तक पास करवाएगी।

पाँचवीं मांग थी : लोकपाल की नियुक्ति कमेटी में सरकारी हस्तक्षेप न्यूनतम हो
- देश को थमाए गये झुनझुने में सरकार ने इस बारे में कोई वादा नहीं किया है।

छठवीं मांग (जो अन्त में जोड़ी गई) :- जनलोकपाल बिल पर संसद में चर्चा, नियम 184 (वोटिंग) के तहत कराई जाए
- चर्चा 184 के तहत नहीं हुई, ना तो वोटिंग हुई

उपरोक्त के अतिरिक्त तीन अन्य वह मांगें जिनका जिक्र सरकार ने टीम अन्ना को आज दिए गए समझौते के पत्र में किया है वह हैं

(1) सिटिज़न चार्टर लागू करना, (2) निचले तबके के सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाना, (3) राज्यों में लोकायुक्तों कि नियुक्ति करना

प्रणब मुखर्जी द्वारा संसद में स्पष्ट कहा गया है कि इन तीनों मांगों के सन्दर्भ में सदन के सदस्यों की भावनाओं से अवगत कराते हुए लोकपाल बिल में संविधान की सीमाओं के अंदर इन तीन मांगों को शामिल करने पर विचार हेतु  आप (यानी लोकसभा अध्यक्ष) इसे स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजें। अब आप बताएं कि  कौन जीता..? लोकतन्त्र की कैसी जीत हुई...? और टीम अण्णा या टीम संसद में से किसकी जीत हुई...?

सारे झमेले के बाद अब जबकि जनता की भावनाएं उफ़ान पर हैं तो जनता के विश्वास को लोकतन्त्र की विजय, टीम अण्णा और जनता के संघर्ष के शातिर नारों की आड़ में छुपाया जा रहा है.... जबकि आंदोलन की हकीकत और सफ़लता ये है कि

1) टीम अण्णा NGOs को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने में सफ़ल हुई है, अब इस पर कोई बात नहीं कर रहा।

2) शीला दीक्षित पर जो फ़न्दा लोकसभा में कसने जा रहा था, वह न सिर्फ़ ढीला पड़ गया, बल्कि उनके सुपुत्र ने सरकार और टीम अण्णा के बीच मध्यस्थ बनकर अपनी इमेज चमका ली। उधर अग्निवेश, जिसे इंडिया टीवी ने एक्सपोज़ कर दिया, उसे भी दलाली और जासूसी के "उचित भाव" के अनुसार माल मिला ही होगा।

3) अण्णा की जो लार्जर दैन लाइफ़ इमेज बना दी गई है उसे भविष्य में किसी खास दुश्मन के खिलाफ़ उपयोग किया जा सकता है।

4) बाबा रामदेव के आंदोलन को ठण्डा कर दिया गया है, अब आप कालेधन को वापस लाने की बात भूल जाईये। (टीम अण्णा ने तो आंदोलन समाप्ति पर "आदर्श राजनेता" विलासराव देशमुख तक को धन्यवाद ज्ञापित कर दिया, जबकि इस आंदोलन के मुख्य सूत्रधार बाबा रामदेव का नाम तक नहीं लिया)
  
बहरहाल अब अन्त में एक जोक सुनिये मनमोहन सिंह ने ओबामा से कहा कि अगले वर्ष हम अपने चन्द्रयान में 100 भारतीयों को चाँद पर भेजने वाले हैं। ओबामा ने कहा, ऐसा कैसे हो सकता है? चन्द्रयान मे तो ज्यादा से ज्यादा 2-4 व्यक्ति ही आ सकते हैं। तब मनमोहन सिंह ने कहा कि चाहे हमें रॉकेट की छत पर बैठाकर भी भेजना पड़े तब भी भेजेंगे। ओबामा ने कहा कि ऐसी भी क्या जिद है, तब मनमोहन सिंह ने कहा कि उस चन्द्रयान में 25 दलित, 25 OBC, 20 आदिवासी, 10 अल्पसंख्यक, 5 विकलांग और 15 सवर्ण अंतरिक्ष यात्री भेजना हमारी मजबूरी है…। जी हाँ, सही समझे आप, जनलोकपाल का भी यही होना है…

लालू यादव, शरद यादव के लोकसभा में दिये गये भाषणों और संसद के बाहर विभिन्न दलित संगठनों द्वारा जनलोकपाल के विरोध में बहुजन लोकपाल बिल पेश करने के बाद मुझे पूरा विश्वास हो चला है कि अव्वल तो जनलोकपाल बनेगा नहीं और यदि बन भी गया तो संसद से बाहर आते-आते उसका चूँ-चूँ का मुरब्बा बन चुका होगा… ज़ाहिर है कि सरकार भी यही चाहेगी कि, जैसे अभी 5 तरह के लोकपाल बिल संसद की स्थायी समिति को भेजे गये हैं ऐसे ही और 15 बिल भी आ जाएं, ताकि विचार करने का भरपूर समय लिया जा सके।

फ़िर भी भीषण सकारात्मक सोच रखते हुए, चलो मान भी लिया जाए कि एक बेहद मजबूत लोकपाल बन गया, तब उच्चतम न्यायालय के रिटायर्ड जज केजी बालाकृष्णन और बूटा सिंह जैसे महानुभावों का क्या कीजियेगा, जिन्होंने अपने भ्रष्टाचार पर परदा डालने के लिए मैं दलित हूँ, इसलिये मुझे फ़ँसाया जा रहा है… की रट लगाई…। या फ़िर मोहम्मद अज़हरुद्दीन जैसों का क्या कीजिएगा जो सट्टेबाजी के आरोपों पर कहते पाये गये हैं कि मैं मुस्लिम हूँ, इसलिए मुझे फ़ँसाया जा रहा है…तात्पर्य यह है कि जब तक मनुष्य की नीयत नहीं बदलती, तब तक जनलोकपाल का बाप भी कुछ नहीं कर सकता। जहाँ तक नीयत का सवाल है, भारत के मध्यम और उच्च-मध्यम वर्ग को तकलीफ़ सिर्फ़ रिश्वत देने में है, रिश्वत लेने में कभी कोई समस्या नहीं रही…। 

खैर, फ़िलहाल देश के सामने साम्प्रदायिक हिंसा रोकथाम बिल, 2G घोटाले में चिदम्बरम की भूमिका, महंगाई, नक्सलवाद, अफ़ज़ल गुरु की फ़ाँसी, कश्मीर जैसे कई-कई गम्भीर मुद्दे पड़े हैं (पिछले 15 दिनों से देश में एक ही समस्या थी), हमें अब उन पर भी फ़ोकस करना है।

देश का युवा वर्ग और भेड़चाली जनता, मीडिया द्वारा आयोजित आंदोलन में भाग लेने जैसी भावना की रोमाण्टिक खुमारी में है, इसलिए उनके दिमाग पर अधिक हथौड़े नहीं चलाऊँगा… उन्हें झुनझुना हिलाने दीजिये… 

वन्देमातरम।

42 comments:

Varun Kumar Jaiswal said...

अन्ना हजारे का उपयोग अब नरेन्द्र भाई मोदी और नितीश जी के खिलाफ किया जायेगा और ये क्योंकि ये दोनों के दुर्गों को ढहाए बिना २०१४ में युवराज को पूर्ण बहुमत के साथ नहीं लादा जा सकता आगे - आगे देखिये बस कुछ ही दिनों की बात है | बाबा रामदेव और बाकि संतों को तो डरा ही चुके हैं ||

HKL said...

Anna ka anshan sawal khade kar gaya jinaka jawab bada dukhdayi hai. Baba Ramdev se ummeed hai, unki dusari padyatra vyapak jan samarthan juta le aur 2014 me koi karishama ho jaye. Vartman sarkar ne sirf nirash hi nahi kiya hai desh ko aur bholi bhali janata ko bahut bada dhokha bhi diya hai. Is sarkar ko saja jaroor milana chahiye.

HKL said...

Vartman sarkar ne desh aur bholi bhali janata ko dhokha diya hai. Inko isaki saja jaroor milana chahiye.

ayurvedic solutions said...

सही कहा है सुरेश भाई
और इस सारे घटनाक्रम में भाजपा को जानबूझ कर दरकिनार किया गया
भाजपा शुरू से ही लगभग पूरे जन लोकपाल बिल को मानती रही है
टीम अन्ना ने पहले दिन से भाजपा से दूरी बनाये रखी
और मीडिया द्वारा यही प्रचारित किया गया कि भाजपा पूरे मन से साथ नहीं
सुषमा स्वराज द्वारा कुछ दिन पहले संसद में दिया गया वक्तव्य और कल दिया गया
वक्तव्य भाजपा की स्थिति बहुत स्पष्ट करता है परन्तु फिर भी भाजपा को असमंजस में बताया गया
मीडिया राज परिवार का कितना वफादार है इसकी एक बानगी देखिये
कल जब सुषमा बोल रही थी तो जब राहुल की बखिया उधेड़ने लगी तो अचानक
पहले जी टी वी, स्टार और फिर सबसे तेज आज तक और फिर ibn 7 ने सुषमा की जगह अन्ना को दिखाना
शुरू कर दिया
जब भोंदू युवराज वाला एपिसोड खत्म हो गया तो फिर सुषमा को प्रकट कर दिया
बाद में एक और राजकुमार बोले
पहले तो उसने सुषमा जी की प्रशंसा की कि बहुत प्रभाव शाली भाषण दिया है
फिर तुरंत उसी भाषण को साधारण भी बता दिया
और सारा दिन भांड मीडिया नीचे स्ट्रिप देता रहा
सुषमा का भाषण साधारण था --- संदीप दीक्षित
किसी ने ये नहीं कहा कि उसी भाषण को इसी गधे ने प्रभाव शाली भी बोला
अब जो लोग बाद में टी वी खोला होगा यही समझेगा कि
सुषमा ने सही नहीं बोला होगा
पता नहीं संघ और भाजपा को कब अक्ल आयेगी कि वो एक सही न्यूज़ चैनल देश को दे
ताकि लोग भ्रमित न हों

संजय राणा (क्रान्ति विचारक) said...

सुरेश जी सही समय पर सही जगह पर चोट मारी है आपने नंगा कर दिया है इन सिविलाईजेशन वालों को पर खैर कितना घातक होगा ये लोकपाल विधेयक आने वाला समय ही बताएगा अब तो ....भ्रष्टाचार कम हो या ना हो परंतु इस देश को विदेशी कंपनियों और मिशनरियों के हाथो बेचने का रास्ता साफ़ होता दिख रहा है ....बंदे मातरम

Shastri JC Philip said...

प्रिय सुरेश, हमेशा की तरह इस बार भी एक बहुत ही सटीक विश्लेषण प्रस्तुत किया है तुम ने.

"तात्पर्य यह है कि जब तक मनुष्य की “नीयत” नहीं बदलती, तब तक जनलोकपाल का “बाप” भी कुछ नहीं कर सकता। जहाँ तक “नीयत” का सवाल है, भारत के मध्यम और उच्च-मध्यम वर्ग को तकलीफ़ सिर्फ़ रिश्वत “देने” में है, रिश्वत “लेने” में कभी कोई समस्या नहीं रही…। "

जब तक देश में नैतिकता की हवा न बहने लगे तब तक अपराधी तत्व देश को चलाते रहेंगे.

सस्नेह -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
हर महीने कम से कम एक हिन्दी पुस्तक खरीदें !
मैं और आप नहीं तो क्या विदेशी लोग हिन्दी
लेखकों को प्रोत्साहन देंगे ??

http://www.Sarathi.info

ePandit said...

सरकार की शुरु से कोशिश रही है कि इस बिल को ठंडे बस्ते में डालकर नख-दन्त विहीन बना दिया जाय ताकि खुद तो सुरक्षित रहें और अगले चुनावों में जनता को कहें देखो जी हमने इतने सालों से लटका लोकपाल बना दिया।

हैरानी की बात है कि सांसदों को लोकपाल के दायरे में लाये बिना तथा बिल को पास कराने की कोई समय सीमा दिये बिना टीम अन्ना कैसे मान गयी? वाकयी दरअसल अब टीम अन्ना भी थकने लगी थी और सोच रही थी कि किसी तरह समझौता होकर निपटें। सरकार भी अपना पिंड छुड़ाने के चक्कर में थी। इस पूरे खेल में जीत सरकार की हुयी, बिना कोई ठोस वादा किये वो झुनझुना पकड़ा कर निकल गयी।

anusoni said...

आज फिर १९४७ दोहराया गया हे ,सचे देश भक्तो की आवज़ दबा दी गयी हे और उम्मीद हे अगले २०-२५ सालो तक कोई नया इतना बड़ा आन्दोलन नहीं खड़ा हो सकता और रही बात बाबा रामदेव की तो सरकार को जो करना था उनके साथ कर लिया ................................................................................... सुरेश जी आप से शिकायत हे आप हमेशा समस्या ही बताते हे और लोगो को व्यवस्था के खिलाफ खड़ा करने जेसा जोश जो दे देते हे पर कोई समाधान नहीं बताते अगर आप कोई रास्ता बताये तो जयादा हितकर होगा

bhuvnesh sharma said...

बाबा रामदेव ने जो लालाजी की दुकान लगा रखी है उससे आप कैसे उम्‍मीद कर सकते हैं कि वो व्‍यवस्‍था परिवर्तन करेंगे... मेरे खुद के जिले में जितने भी रजिस्‍टर्ड 420 हैं वे सब रामदेव गैंग में शामिल थे... जब आप सत्‍ता हाथ में लेने की बात करेंगे तो ऐसे ही लोग आपके साथ आयेंगे... और आप भी सब जगह नजर मार के देख सकते हैं कि किस प्रकार के लोग रामदेव से जुड़े हैं... लोग आसानी से अन्‍ना की सिविल सोसायटी और एनजीओ पर उंगली उठा रहे हैं... पर रामदेव एंड कंपनी बिलकुल दूध से धुली होने का वे दावा कर सकते हैं... कल को यदि अंबानी या टाटा सत्‍तालोलुप हो जाएं तो आप उन पर भी उंगली उठेगी पर रामदेव पर उंगली उठते ही कुछ लोगों को मिर्ची लगती है... धन के ढेर पर बैठा व्‍यक्ति और शक्तिशाली होना चा‍हता है ऐसे में सत्‍ता उसे अपनी ओर लुभाती है...रामदेव ने यही किया... अन्‍ना ग्रासरूट स्‍तर पर गांव में भी सामाजिक कार्य कर चुके हैं... रामदेव को किसी प्रकार के सामाजिक काम का कोई अनुभव नहीं... और रही बात बीजेपी की तो वहां चोरों की इतनी भीड़ हो गई कि पैर रखने की जगह नहीं बची तो बाकी के रामदेव के साथ जुड़ गये...

Suresh Chiplunkar said...

@ anusoni - समाधान तो स्पष्ट रूप से बताता ही हूँ भाई… कि कांग्रेसियों के झाँसे में न आएं, हिन्दुओं की एकजुटता बढ़ाएं, हिन्दुओं की राजनैतिक चेतना जगाएं… और क्या समाधान चाहिए? :) :) रास्ता एक ही है, हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व की मजबूती, कांग्रेस का पूरे देश से सफ़ाया करना… इसके बाद की समस्याएं अपने-आप सुलझती चली जाएंगी।

अब आप ये न कहियेगा कि मैं जो रास्ता या समाधान सुझाता हूँ, वह बहुत लम्बा और समय खाने वाला है। :) :) आप जैसे युवाओं के सामने तो अभी बहुत काम पड़ा है… उठिये और लग जाईये…

Manish Dixit said...

Mai'n aur Mere aas paas ke log bhi Anna Hazaare ko support kar rahe hain... Aur logo mein Congress ke prati Nafrat bhi hai... Yeh ladaayi Corruption ke khilaaf hi sahi.. Aur maana ki jeet corrupt congress ki hi huyi hai... lekin logo mein awareness to aayi hi hai.. Aaj nahi to kal hum Corruption free Hindustan ki umeed to kar hi sakte hain.. Ek Sapna hi sahi.. koi to mila jagaane ke liye...
Aap se sirf ek hi aasha hai.. ki Aap apni writing mein Anna Hazare aur Baba Ram Dev ji ko ek munch pe lekar aaye.. Inke peechhe ki bheed Congress ko satta se bahar karne ke liye kafi hai.. Mai'n Dil se iss Corrupt Congress ke khilaaf hoon.
Hindustan ki badkismati yehi rahi hai.. ki wo hamesha chhote chhote tukaron mein hi ladta raha hai. Plz aisa na hone de.
Thanx.

Dev said...

koti koti pranaam is adbhoot satya ke liye... man mai chhupi baato ko safai ke sath ek dum perfectly describe kia hain..

main ramlila maidan ka ankho dekha haal janta hu. aapki last line yuva varg ke lie ek dum satik or perfect thi..

Jeet Bhargava said...

भारत के सेकुलर और जेहादी -मिशनरी हमेशा कोशिश करते हैं कि से देश में हर घटना और चीज को हिन्दू-विरोधी और सेकुलर बना दिया जाए. वह हमेशा चाहते हैं कि किसी तरह इस देश का भला न हो पाए, और अगर हो भी जाए तो क्रेडिट हिन्दूजन या संगठनो को बिलकुल ना मिले. इसी क्रम में अन्नादोलन भी अछूता नहीं रहा.

संतोष हेगड़े ने इस बार अनशन से पहले ही 'असहयोग' आन्दोलन शुरू कर दिया था। वही अनशन के खत्म होने के करीब चार दिन पहले से ही अग्निवेश ने अपना सुर बदलते हुए अन्ना को भला बुरा कहा था और अन्ना से पल्ला झाड लिया था।
अन्ना को संघ ने शुरू से ही अपना समर्थन दे दिया था। लेकिन अन्ना टीम लगातार बयान देकर खुद को 'अछूत' संघ से बेवास्ता बताते नही थक रही थी। इसी तरह बाबा रामदेव को भी टीम अन्ना अपमानजनक तरीके से दूर रखी थी, फिर भी बाबा ने अन्ना को साथ दिया। वही दारुल उलूम ने पाँच दिन बाद समर्थन दिया। बुखारी ने आंदोलन के खिलाफ फतवा ही निकाल दिया था और उसे मनाने के लिए अरविंद केजरीवाल रातो-रात बुखारी के हरम मे पहुँच गए थे।
बार-बार खुद को सामाजिक एक्टिविस्ट साबित करने वाले (खासकर भाजपा और संघ के खिलाफ) शबाना आजमी, जावेद अख्तर, और तीस्ता जावेद इस बार सिरे से गायब थे। तो आमिर खान को 12 दिन बाद अन्ना याद आए। महान सेकुलर जेहादी हर्ष मंदार और अरुणा राय ने तो अन्ना के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया था।
इस सेकुलरो के जयचंदी बर्ताव और संघ के पूरे सहयोग के बावजूद अन्नादोलन का श्रेय और लाभ सेकुलर जमात के हाथ मे चला जाये तो कोई अचरज नही। इस देश मे यही होता रहा है। तमाम बलिदानो के बावजूद हिंदुओं के मात और गद्दारो को 'माल' मिलता रहा है। और एन वक्त पर देश और समाज के लिए पिछवाड़ा दिखाकर गद्दारी करने वाले जेहादी और सेकूलर जमाती श्रेय और सत्ता का सुख भोगते हैं। नेहरू-पटेल-सावरकर के युग मे भी यही हुआ था और आज भी।

Ratan Singh Shekhawat said...

सटीक विश्लेषण|

हमें तो उन कांग्रेसी विचारधारा वाले ब्लोगर्स पर तरस आ रहा है जो अन्ना के पिछले आंदोलन में उन्हें गाँधी बनाने पर तुले थे ,बल्कि लिख रहे थे कि बाबा रामदेव को अन्ना के नेतृत्व में आंदोलन करना चाहिए और अब वे अन्ना के खिलाफ एक के बाद एक लेख लिख रहे है!!

मिहिरभोज said...

यूं लगता है जैसे हमें युवराज को प्रधानमंत्री बनाने तक जिंदा रखा जा रहा है.........हमेशा की तरह ढक्कन खोलने वाली.....

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

अगर मीडिया ने इसे प्रायोजित न किया होता तो यह चलता ही नहीं.
विश्वबन्धु गुप्ता जी ने तेल के खेल पर और स्विस बैंक के खाताधारकों के नाम खोले थे, किस महा मीडिया कर्मी की हिम्मत हुई इन खाता धारकों के बारे में उनकी पार्टी से जबावतलबी करने की.
रामदेव जी की रैली को कितना कवर किया था मीडिया ने. स्पष्ट है कि कहां से नियन्त्रण हो रहा है.
रामदेव जी को बार बार भगोड़ा, कायर सिद्ध करने की कोशिश जारी है. लेकिन वह लगे हुये हैं चुपचाप और यह मानकर चलिये कि यदि २०१४ में रामदेव जी को समर्थन नहीं मिला तो देश गर्त में चला जायेगा, निश्चित...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

दूसरी बात कि अन्ना के आन्दोलन में स्थानीय लोगों में कुछ घूसखोर, दलाल, ऐसे व्यापारी जो कालाबाजारियों को बढ़ावा देते हैं, सभी गांधी टोपी लगाये घूम रहे थे, क्या इनका हृदय परिवर्तन हो गया है, नहीं... सब मौका परस्त हैं... देखिये आगे क्या हो..

Raj said...

u r right,civil socity me kuchh ese gujarat ke dusman hy jese medha patkar jo sardar sarovar dam ke khif thi aaj vo dekhy narmada ka pani kaha ja raha hy or agur gujarat ke khilaf iska istimal kiya gaya to iska muhtod jawab gujrat dega

Raj said...

or ek baat jo isme dikhi ki jab bharat mata ka foto kese ne kaha RSS ki copy hy to usko hata diya,jab bola vandematram nahi bolna muslim logo ko to ye us mulaa ko manane gaye lakin agur vandematram ki story dekhy to pata chulega is ne bharat ka bangal se batawara hote hu e bachaya tha pur vo kisi ne nahi bola ek mulaa jiso pak pasand hy usko manane gaye ye vo gulat tha

Anonymous said...

सुरेश जी,
सुरेश जी,
मॅ पिछले काफ़ी समय से आपके लेख पढ़ता रहा हूँ जो मुझे ऐक स्वतंत्र हिंदू हित चिंतक के लगते थे जिसे देश से निष्पक्ष लगाव है जो किसी पार्टी विशेष का नही है बल्कि उसका पक्ष रखता है जो हिंदू हित देश हित मे हो मगर आपका ये लेख पढ़ कर मुझे घोर निराशा हुई है आपका ये लेख बताता है की आप किसी पार्टी विशेष के सपोर्टर है सिविल सोसायटी व अन्ना हज़ारे के बारे मे आपके ये कॉमेंट देश के उन करोड़ो लोगों का मज़ाक है जो मूर्ख नही है हम सभी को पता है की अभी जनलोकपाल बिल मे कितना समय लग सकता है या इसका अंतिम रिज़ल्ट क्या हो सकता है ऐसी बाते लिखते हुए आप जैसे लेखक को शर्म आनी चाहिएजो भ्रष्टाचार से परेशान व त्रस्त देश के युवा वर्ग और देशवासीयो को जो बजाए सिर्फ़ कलम घिसने व ज़बानी जमाखर्च के भूखा प्यासा धूप मे दिन भर अहिंसात्मक तरीके से देश मे अच्छे परिवर्तन मे लिए कुछ कोशिश तो कर रहा है आप कहते है की जब तक मनुष्य की “नीयत” नहीं बदलती, तब तक जनलोकपाल का “बाप” भी कुछ नहीं कर सकता तो फिर देश के बाकी क़ानूनो को भी हटा दे क्योंकि जब तक मनुष्य की नीयत नही बदलेगी तब तक तो कुछ हो नही सकता मॅ ये नही कहता की किसी की आलोचना करना ग़लत है या जनलोकपाल बिल या सिविल सोसायटी के मेंबर सभी सही है मगर कुछ अच्छी बातें भी होती है उनका ज़िक्र तो होना चाहिए देश मे इतना तूफान मचा इस को लेकर करोड़ों लोग पढ़े लिखे एडूकेटेड ऐकमत हुए की इसमे कुछ अच्छी बातें है वो लागू होनी चाहिए मगर आपको दाल मे काला की भी बजाए पूरी दाल काली नज़र आ रही है कोई अच्छाई या अच्छी बात आप को जनलोकपाल बिल या इस पूरे इश्यू मे नज़र नही आ रही असल मे मुझे ऐसा लगता है आप को सिविल सोसायटी के रूप मे नयी राजनैतिक पार्टी खड़ी होने का दर सता रहा हो ऐसा आपके लेख मे दिखता है बहुत हैरत की बात है आपने इसे राजनीति बनाम टीम अन्ना बना दिया है देश भ्रष्टाचार परिवर्तन पर ऐक भी सकारात्मक बात आप को नही लगी बल्कि राजनीति ही राजनीति आप को नज़र आ रही है बीजेपी भी कोई भी राजनैतिक लाभ नही उठा सकी शायद इसी की भाड़ास आपके राजनातिक भावना से प्रेरित इस अलेख मे निकली है

Manoj Pandey said...

Aapka lekh wakai, kabile tariph hai. Appne realy Anna ke anshan ki kalai khol ke rakh di hai. Aur, jaha tak mera experience hai, ye Congress ki chal hai logo or so-called Yuva pidhi ko gumrah karne ki.

Man said...

वन्देमातरम सर ,
हमेशा की तरह ज्वलंत एंव विचारणीय लेख ,ऐसे कुछ यक्ष प्रश्न जो इस आन्दोलन के आगे पीछे मूह बाये ही खड़े रह गए ,भांड मीडिया के गवियो ढोलियो की के नाद में उन्हें कोई नहीं सुन सका |बाबा रामदेव पर जर्मन शेफर्ड छोड़ने के बाद टीम अन्ना का भी यही हाल होना था ,लेकिन देश के सभी पक्षों के अंध समर्थन से इनका बबूल के पेड़ से ससम्मान उतारा हो सका |अभी तो जन्लोक्पाल खेर अभी तो दूर से दिख रही बाबा जी की गुफा ही हे ,अंदर जाने पर पता चलेगा की बाबा कंहा धूणी ताप रहा हे |नशेडी ,गंजेड़ी ,स्मेक्ची ,भंगेड़ी ,दारू के चड्स ,तस्कर भरसटाचारी ,रिश्वत खोर ,मिलावटी ., भी टोपी लगा के बोले "मी अन्ना ""|

जितेन्द्र सिंह : एक सच्चा भारतीय said...

आपका धन्यवाद सुरेश भाई..
बहुत प्रशंसनीय लेख आया है आपकी तरफ से एक लम्बे इंतजार के बाद.. आखिर गुबार थम ही गया..
जन लोकपाल** 'शर्तें लागू'
संसद में बहस में कांग्रेस ने अपनी राजनीति, रणनीति, कूटनीति और 'कुत्तानीति' से जन लोकपाल पर सवाल खड़े किये...
वो इस तरह व्यवहार कर रहे हैं जैसे बलि से पहले बकरा करता है...
अब 'बकरा' कभी कहीं 'कसाई' को बुलाता है..??
भाजपा ने मौके की नजाकत समझकर समर्थन किया है लेकिन ** Conditions Apply के साथ...
प्रधान-मंत्री, न्यायपालिका, सिटिज़न चार्टर या फिर लोअर ब्यूरोक्रेसी सब जगह 'शर्तें लागू'...??
उसका साथ देते हुए कांग्रेस भी सहमत हुई पर 'शर्तें लागू'...??
वाम दल ने पूरा समर्थन किया, लेकिन बेचारे 'अस्तित्व' की खोज में हैं??

'अन्ना' ब्रांड बन गए और 'दिखता है तो बिकता है' की तर्ज़ पर सबने 'माल' कमाया.??
और निष्कर्ष निकला वही- 'ढाक के ढाई पात'
जनता एक बार फिर 'ठगी' ही गई है.??
इस 'नूरा-कुश्ती' की जो सकारात्मक बाते सामने आई, वो हैं-
अग्निवेश का चेहरा खुल के उजागर हो गया..?
आम-जन और युवाओं की नज़रों में 'रौल विन्ची का यंगिस्तान' समाप्त.?
'अन्दर की बात' कुछ भी हो लेकिन कांग्रेस सारे देश में 'विलेन' बन चुकी है और वो है भी जिसका परिणाम जल्द ही विधानसभा चुनावों में दिख जाएगा..

वन्दे मातरम्...
जय हिंद.. जय भारत...

Akhand Bharat said...

Suresh Bhai,

Aapke vishleshan se sehmat hote hue ye kehna jaruri hai ki Congress & its pseudo-secularists have successfully managed to come out of pressure which was created by Anna-movement. As commented in one of the responses above, "Aap se sirf ek hi aasha hai.. ki Aap apni writing mein Anna Hazare aur Baba Ram Dev ji ko ek munch pe lekar aaye.. Inke peechhe ki bheed Congress ko satta se bahar karne ke liye kafi hai.. Mai'n Dil se iss Corrupt Congress ke khilaaf hoon.
Hindustan ki badkismati yehi rahi hai.. ki wo hamesha chhote chhote tukaron mein hi ladta raha hai. Plz aisa na hone de."
VANDE MATARAM.

Sudhir Jonwal said...

Dear Chiplunker Sahib,

Being so an Indian I like that from Anna's movement. There is awareness rised in general public & this shame for the all politician that a youth is behind the person of 74 where is the generation gape in family a lot, but still people debating with there attitude. But I still not agree with you on this issue.Just look the positive side of the movement. Only politician tried to make the movement spoil. You said a little toy is given, but didn't seen giving a little toy created a great bother for them. All the way they are sweting.

manoj sharma said...

per ek baat hai ki sarkaar aur sarkaar main peechle ya agle dumchalle nahi chahte ki aissa koi bil pass ho nahi to aaj ya kal ya parso matlab kabhi na kabhi to peechle ya agle dumchalle isliye kaha ki sarkar to do muh wala saanp hai....

एम सिंह said...

सुरेश जी, प्रणाम. मैंने आज सुबह ही आपका ब्‍लॉग पढ़ा. इसके कुछ घंटे बाद दोपहर में एक और ब्‍लॉग पढ़ा, जिसका लिंक नीचे दिया है. आप इसे देखें. दोनों में कंटेंट काफी समान है. लगभग 90 प्रतिशत एक जैसा है. कृपया बताएं कि यह लिखा किसने है, आपने या फिर नीचे दिए गए ब्‍लॉग के मालिक ने?

रिप्‍लाई का इंतजार करूंगा.


http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/kharee-kharee/entry/%E0%A4%B0-%E0%A4%A4-%E0%A4%95-%E0%A4%A6-%E0%A4%A8-%E0%A4%95-%E0%A4%B8-%E0%A4%95%E0%A4%B9-%E0%A4%A6

Abhishek Garg said...

सुरेश जी, अभी कुछ ही दिनों से आपका ब्लॉग पढना शुरू किया है, हर बार की तरह इस बार भी आपके ब्लॉग ने उस सच्चाई को लिखा है जो शायद लोग ये भावनात्मक जनता समझ नहीं पायी.

prashant said...

BAHUT ACHA LAKH HAI, REJNETAO KA KAM TO APNE LIYE ROTIYA SAKNA HAI. CHAHE WO AAG KISI KI CHITA SE LI GAI HO, KUL MILA K ANNA KA JIWAN JAYDA JARURI THA ABHI TO ANNA KI ANDHI HAI AGE TUFAN BHI AYEGA, ANNA NE JO SAFAI KA BIDA UTHAYA HAI TO AJ LAKHO LOG SATH DE RAHE HAI. AUR JO NAHI DE RAHE HAI UNHE YE SOCHNA CHAHIYE KI HUM APNI AGE KI PIDHIYO K LIYE KYA KAR RAHE HAI ....WAISE BHI BURAI KA AKHIR ANT HOTA HAI.

SWISS BANK ME JISNE BHI KALA DHAN CHUPAYA HAI USE YE SOCHNA CHAHIYE KI WO BHAGYA LAXMI TO HAI MAGER BHOG LAXMI NAHI. ....MARNE K BAD SAB KUCH YAHI RAH JATA HAI. JO BHI KARO YE SOCH KAR KARO KI UPER BHI 1 ADALAT HAI JO HAI WO YAHI CHUKANA HAI, NAHI CHUKA PAYE TO WAPAS YAHI ANA HAI.

mulaira said...

ji ek news channel hain jispar hame bharosa hain wo rastravadi hain par uski pahuch bahut kam hain wo videocon d2h ch. 322 sudarshan news .

Alok Nandan said...

http://tewaronline.com/?p=2331
सुरेश जी आपकी कई बातों से सहमत हूं....इस साइट पर अन्ना आंदोलन से संबंधित मैने भी कुछ लिखा है....इस आंदोलन पर आपके सारे विश्लेषण मैं पढ़ रहा हूं....आपका ट्रैक सही लग रहा है. एक नजर इस साइट पर भी जरूर डालें.
धन्यवाद

शंकर फुलारा said...

@ सुरेश जी , बहुत ही स्पष्ट विश्लेषण प्रस्तुत किया | धन्यवाद |

@ bhuvnesh sharma & Anonymous ......
इस समय भी भारत में एक आन्दोलन चल रहा है भारत के स्वाभिमान के लिए;"भारत स्वाभिमान आदोलन"। मुझे तो लगता है कि सम्पूर्ण बुराईयों के विरुद्ध ऐसा जन आन्दोलन आदि शंकराचार्य के बाद शायद; अब ही हो रहा है। "व्यक्ति निर्माण से राष्ट्रनिर्माण"की भावना पर बीच में स्वामी विवेकानंद और स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ ही महर्षि अरविन्द और स्वामी श्रद्धानंद ने द्वारा भी आन्दोलन चला पर इतनी जन व्यापकता नहीं पा सका।

लेकिन; इस सबसे व्यापक जनाधार वाले आन्दोलन के शत्रु भी कम नहीं । आखिर विरोध करने में कोई बुराई नहीं छोड़ी स्वामी रामदेव जी ने, बिना शत्रुओं की परवाह किये अपने उद्देश्य की पूर्ति में बढ़ते रहे हैं। यही कारण है कि सदस्यों और अनुयायियों की संख्या बेशक करोड़ों में है पर शत्रुओं की संख्या भी कम नहीं है। १.राजनैतिक शत्रु ( लगभग सभी पार्टियाँ और उनके नेता और कार्यकर्त्ता ),२.शैक्षिक माफिया, क्योंकि स्वामीजी शिक्षा मुफ्त-अंग्रेजी बाध्यता मुक्त करने की बात कहते हैं,३. लगभग सभी सरकारें और उनके भ्रष्ट कर्मचारी,४. बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और उनके द्वारा पालित-पोषित; जिनमे टी.वी.न्यूज (अन्य भी) चैनल और,५. अंग्रेजी दवा कम्पनियां सभी प्रकार की (स्वदेशी-विदेशी),६. वो स्वदेशी उत्पाद बनाने वाली कम्पनियां भी दुश्मन हैं जो केवल ठगने के लिए अपने धंधे को जमाये बैठी थी,७. वो विदेशी ४००० से अधिक कम्पनियां जो आज भारत में विभिन्न प्रकार के जीरो तकनीक के सामान के द्वारा यहाँ कई प्रकार से लूट रहीं हैं जैसे कोला पिलाओ बीमार बनाओ-दवाएं खिलवाओ-कमजोरी के नाम से टॉनिक पिलवाओ,एक चक्र बना दिया,८. वो नशा व्यापारी; शराब माफिया,गुटका माफिया,बीडी-सिगरेट माफिया और भी हैं,९. भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारी,व्यापारी,पत्रकार और सभी पेशेवर भ्रष्ट;यहाँ तककि; एक छोटा सा दुकानदार भी अगर बुरा है तो दुश्मन बना बैठा है,१०. विदेशी बैंक और , चिकित्सा माफिया। ये कुछ मुख्य-मुख्य दुश्मनों को मैंने गिनवाया अगर इन की व्याख्या की जाये और इन पर आश्रित भ्रष्टों को पहचाना जाये तो संख्या कई करोड़ हो जाएगी।

उपरोक्त मानसिकता वाले, विदेशी और भ्रष्ट लोग तो इस आन्दोलन के शत्रु हैं ही; जाने-अनजाने हमारे धर्म संस्कृति को मानने वाले लोग भी इसके शत्रु बने बैठे हैं। जिन्हें पाखंडी कहना चाहिए ऐसे लोग, जो अपनी दुकान चला रहे हैं ऐसे लोग,इस तरह के दुश्मन तो हमें दिखाई ही नहीं देते। सीधी टक्कर जिन दुश्मनों से है उनसे तो सीधे लड़ा जा सकता है लेकिन "पीठ में छुरा घोंपने"वालों से कैसे बचा जाये इसका उपाय सोचना होगा।

जो भारत को अपनी माता के रूप में देखता है, वास्तव में देशभक्त है, जिसके शारीर में शुद्ध भारतीय खून है, जो अपने को ऋषियों का वंशज समझता है, उसका हौसला इन दुश्मनों को देख कर कम नहीं होता। वह और जोश से उठता है चलो कुछ और दुश्मनों की पहचान हुयी। adhik padhna hai aur javab dena hai to ise pura padhen| tensionpoint.blogspot.com
हौसला बढ़ता है हमारा;दुश्मनों की तादात देखकर,

Anonymous said...

lekh achha h likhte raho duniya ke samne sach aana chahiye.

Anonymous said...

आपके द्वारा दिया गया जोक का उदाहरण आपकी ऊंची जाति का दंभी होने का एहसास कराता है...इसे स्पष्ट कीजिए....

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

मेरे जैसे लोग अभी तक यही समझने की माथा-पच्छी में उलझे हैं कि आखिर कांग्रेसी सरकार ने ऐसा क्या कर दिया कि टीम अन्ना इसे अपनी जीत मान बैठी है?

सुरेश जी आपके विश्लेषण से ये गुत्थी सुलझाने में सहायता मिलेगी.

बहरहाल ... टीम अना और उनके हजारों-लाखों समर्थकों को लगे हाथों मेरी तरफ से भी बधाई... अन्ना जी ने अनसन तोड़ दिया इसी पे खुश हो लीजिये, जन लोकपाल का फिर बाद मैं देख लेंगे...

Anonymous said...

@आदरणीय भुवनेश जी, आप ही अपनी दुकान खोल लीजिये, क्या पता चल जाये. बाबा रामदेव तो आपके कथनानुसार चुके ही हैं..

Rajesh said...

Bahut Badhiya Suresh Ji. Kya Post Likhi hai. Jo
apne likha hai sab satya hai. Excellent. Dhanywad.

varun yadav said...

सुरेश जी,

प्रणाम

बहुत अच्छा लेख है, हर बात बिलकुल सत्य लिखी है आपने, हालाँकि एक बात मैं जरुर बोलना चाहूँगा. आप एक ऐसी कौम को जगाने का प्रयास कर रहे है जो हद से ज्यादा निर्जीव और स्वार्थी हो चुकी है. वैसे पहले भी थी, जिसके दम पर अंग्रेजो ने हम पर शासन किया. आप कितना भी क्यों न समझाए या आइना दिखाएँ पर ये लोग ढूंढते सिर्फ अपना मतलब हैं. सब कुछ साफ दिख रहा है की कांग्रेस क्या कर रही है. इस हिसाब से तो भारत से कांग्रेस का सफाया हो जाना चाहिए, पर ऐसा होगा नहीं क्योंकि हमको भी अपनी तिजोरी भरनी है.
शुक्र है इस घिनोनी राजनीती और स्वार्थता में आप जैसे कुछ लोग हैं , जो हिंदू समाज और देश के बारे में भी सोचते हैं, नहीं तो बस दौड़ते जाओ अन्धों की दौड में, कुछ देखना पाप है.
मेरी तरफ से आपको अनेको शुभकामनाये इस आशा के साथ की आपकी बात हर हिन्दुस्तानी तक पहुचे, और सिर्फ दिमाग तक नहीं बल्कि ह्रदय तक, जिससे करोडो कुत्सित हिंदुओं के मन में भी आत्मसम्मान जगे और हम भी गर्व से बोल सके की हम हिंदू हैं, हम भारतीय हैं.

जय हिंद......

Anonymous said...

आदरणीय सुरेश जी , मैंने आपके पिछले कई लेखो में बाबा रामदेव के आन्दोलन की असफलता की टीस महसूस की है. बाबा रामदेव के विचारो से व्यक्तिगत रूप से सहमत होने के बावजूद उनके आन्दोलन की सफलता पर संदेह था. क्यंकि मै मानता हूँ की उनका आन्दोलन जल्दबाजी में लिया गया निर्णय था. पहले उनके आन्दोलन पर भगवा छाप थी जिसके कारण दलित, मुस्लिम उनके आन्दोलन से दूर थे. अन्ना टीम ने पहला कम यह किया की अपने आन्दोलन को भगवा होने से बचाया , इसलिए उन्होंने बीजेपी का खुल्लमखुल्ला समर्थन नहीं लिया. अन्ना टीम ने मीडिया मैनेजमेंट बेहतर ढंग से किया. जहा रामदेवबाबा को हर सवालो का खुद जवाब देते थे वही अन्ना टीम ने आन्ना जी को इससे बचाए रखा था. मीडिया का रोल भी इसमें महत्वपूर्ण था. जहा मीडिया को भगवा रंग से allergy है वही अन्ना टीम के पास मीडिया के पसंदीदा चेहरे थे.

D. Jetly said...

Your interpretation of the events is very close to reality

chankya said...

The great Indian government & even greater Congress party -

Rahul Baba: "We cannot stop 100% terrorist attacks."

Diggi Raja: "At least we are better than Pakistan… Why don’t you look what is happening there?"

P Chidambaram: "We didn’t have the intelligence… but it cannot be said intelligence failure… It is happening everywhere in the world."

Subodhkant Sahay: "We knew that something like this could happen after Osama was killed" (after enjoying catwalk of models when entire country was mourning)

श्री अन्ना हजारे जी जब तक देश की आत्मा को साथ नहीं लोगे तब तक आपकी सफलता संदेह के घेरे में रहेगी. जो दुसाहस एक बहुत बड़े जनसमर्थन (आप से तो बहुत बड़ा था) के होते महात्मा गाँधी और जय प्रकाश नारायण भी नहीं कर पाए वो आप कर रहे है. आपने अपने आन्दोलन से नक्सलियो के चेह्तो को वैचारिक विस्तार दिया है जिस की गूंज कल हमने बीजापुर में १० हिन्दुस्थानियो के शहीद होने में सुनी. आपने देश के नौजवानों को दिल्ली की सडको पर कानून तोड़ते हुए को मना नहीं किया, आपने अपने आन्दोलन में राष्ट्रवादियो को आने को तो मना किया परन्तु शराबियो को आने को नहीं रोका. क्या गाँधी की फोटो लगाने वाले गाँधी की "शराब नीति" से अनिभीज्ञये है.

Mahender said...

अन्ना टीम स्वयं लोकपाल से क्यों भाग रही है.??

रामलीला
मैदान में कल हुई प्रेस कांफ्रेंस में अरविन्द केजरीवाल और प्रशांत भूषण
ने साफ़ और स्पष्ट जवाब देते हुए लोकपाल बिल के दायरे में NGO को भी शामिल
किये जाने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है. विशेषकर जो NGO सरकार से
पैसा नहीं लेते हैं उनको किसी भी कीमत में शामिल नहीं करने का एलान भी
किया. ग्राम प्रधान से लेकर देश के प्रधान तक सभी को लोकपाल बिल के दायरे
में लाने की जबरदस्ती और जिद्द पर अड़ी अन्ना टीम NGO को इस दायरे में लाने
के खिलाफ शायद इसलिए है, क्योंकि अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया,किरण
बेदी, संदीप पाण्डेय ,अखिल गोगोई और खुद अन्ना हजारे भी केवल NGO ही चलाते
हैं. अग्निवेश भी 3-4 NGO चलाने का ही धंधा करता है. और इन सबके NGO को देश
कि जनता की गरीबी के नाम पर करोड़ो रुपये का चंदा विदेशों से ही मिलता
है.इन दिनों पूरे देश को ईमानदारी और पारदर्शिता का पाठ पढ़ा रही ये टीम अब
लोकपाल बिल के दायरे में खुद आने से क्यों डर/भाग रही है.
भाई वाह...!!! क्या गज़ब की ईमानदारी है...!!!
इन दिनों अन्ना टीम की भक्ति में डूबी भीड़ के पास इस सवाल का कोई जवाब है क्या.....?????
जहां
तक सवाल है सरकार से सहायता प्राप्त और नहीं प्राप्त NGO का तो मई बताना
चाहूंगा कि.... भारत सरकार के Ministry of Home Affairs के Foreigners
Division की FCRA Wing के दस्तावेजों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2008-09 तक
देश में कार्यरत ऐसे NGO's की संख्या 20088 थी, जिन्हें विदेशी सहायता
प्राप्त करने की अनुमति भारत सरकार द्वारा प्रदान की जा चुकी थी.इन्हीं
दस्तावेजों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2006-07, 2007-08, 2008-09 के दौरान इन
NGO's को विदेशी सहायता के रुप में 31473.56 करोड़ रुपये प्राप्त हुये.
इसके अतिरिक्त देश में लगभग 33 लाख NGO's कार्यरत है.इनमें से अधिकांश NGO
भ्रष्ट राजनेताओं, भ्रष्ट नौकरशाहों, भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों, भ्रष्ट
सरकारी कर्मचारियों के परिजनों,परिचितों और उनके दलालों के है. केन्द्र
सरकार के विभिन्न विभागों के अतिरिक्त देश के सभी राज्यों की सरकारों
द्वारा जन कल्याण हेतु इन NGO's को आर्थिक मदद दी जाती है.एक अनुमान के
अनुसार इन NGO's को प्रतिवर्ष न्यूनतम लगभग 50,000.00 करोड़ रुपये देशी
विदेशी सहायता के रुप में प्राप्त होते हैं. इसका सीधा मतलब यह है की पिछले
एक दशक में इन NGO's को 5-6 लाख करोड़ की आर्थिक मदद मिली. ताज्जुब की बात
यह है की इतनी बड़ी रकम कब.? कहा.? कैसे.? और किस पर.? खर्च कर दी गई.
इसकी कोई जानकारी उस जनता को नहीं दी जाती जिसके कल्याण के लिये, जिसके
उत्थान के लिये विदेशी संस्थानों और देश की सरकारों द्वारा इन NGO's को
आर्थिक मदद दी जाती है.
इसका विवरण केवल भ्रष्ट NGO संचालकों, भ्रष्ट
नेताओ, भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों, भ्रष्ट बाबुओं, की जेबों तक सिमट कर रह
जाता है. भौतिक रूप से इस रकम का इस्तेमाल कहीं नज़र नहीं आता. NGO's को
मिलने वाली इतनी बड़ी सहायता राशि की प्राप्ति एवं उसके उपयोग की प्रक्रिया
बिल्कुल भी पारदर्शी नही है. देश के गरीबों, मजबूरों, मजदूरों, शोषितों,
दलितों, अनाथ बच्चो के उत्थान के नाम पर विदेशी संस्थानों और देश में
केन्द्र एवं राज्य सरकारों के विभिन्न सरकारी विभागों से जनता की गाढ़ी
कमाई के दसियों हज़ार करोड़ रुपये प्रतिवर्ष लूट लेने वाले NGO's की कोई
जवाबदेही तय नहीं है. उनके द्वारा जनता के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई के
भयंकर दुरुपयोग की चौकसी एवं जांच पड़ताल तथा उन्हें कठोर दंड दिए जाने का
कोई विशेष प्रावधान नहीं है. लोकपाल बिल कमेटी में शामिल सिविल सोसायटी के
उन सदस्यों ने जो खुद को सबसे बड़ा ईमानदार कहते हैं और जो स्वयम तथा उनके
साथ देशभर में india against corruption की मुहिम चलाने वाले उनके अधिकांश
साथी सहयोगी NGO's भी चलाते है लेकिन उन्होंने आजतक जनता के नाम पर जनता की
गाढ़ी कमाई के दसियों हज़ार करोड़ रुपये प्रतिवर्ष लूट लेने वाले NGO's के
खिलाफ आश्चार्यजनक रूप से एक शब्द नहीं बोला है, NGO's को लोकपाल बिल के
दायरे में लाने की बात तक नहीं की है. इसलिए यह आवश्यक है की NGO's को
विदेशी संस्थानों और देश में केन्द्र एवं राज्य सरकारों के विभिन्न सरकारी
विभागों से मिलने वाली आर्थिक सहायता को प्रस्तावित लोकपाल बिल के दायरे
में लाया जाए. (कृपया इस पोस्ट को जितने ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकते हों
उतने ज्यादा लोगों तक पहुंचाइये