Monday, August 15, 2011

Anna Hajare, NGOs, Janlokpal and Congress

क्या NGOs, प्रधानमंत्री और न्यायपालिका से ऊँचे और साफ़-सुथरे हैं?......

16 अगस्त से "टीम अण्णा"(?) दिल्ली में जनलोकपाल के लिए आंदोलन करने वाली है। इस महत्वपूर्ण घटना से पहले ही एक ऐसी बात सामने आई है जो इस टीम के "पाखण्डी" चेहरे को उजागर करने के लिए काफ़ी है। सिविल सोसायटी के सदस्य लगातार प्रधानमंत्री और उच्च स्तर की न्यायपालिका को भी जनलोकपाल के दायरे में लाने की माँग कर रहे हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि यह सोसायटी NGO's (गैर सरकारी संगठन) को जनलोकपाल की जाँच के दायरे से बाहर रखना चाहती है।

यह बात उस समय उभरकर सामने आई, जब बुधवार (10 अगस्त) शाम को सरकारी लोकपाल बिल पर विचार करने वाली संसद की स्थाई समिति के सामने सिविल सोसायटी के सदस्य अपने विचार एवं दृष्टिकोण रखने को पेश हुए। इस मीटिंग में उपस्थित विश्वस्त सूत्रों के अनुसार प्रशान्त भूषण ने स्थायी समिति में सुझाव(?) दिया कि लोकपाल के दायरे से सभी NGOs को बाहर रखा जाए। जब समिति के सदस्यों ने इस पर आपत्ति जताई और कहा कि "सभी NGOs आसमान से उतरे हुए फ़रिश्ते नहीं होते, बल्कि बड़ी संख्या में NGOs लुटेरे और ठग भी हैं…" तब हड़बड़ाये हुए भूषण ने प्रस्ताव रखा कि "लोकपाल के दायरे में सिर्फ़ वही NGOs आयें जिन्हें केन्द्र या राज्य सरकार से कोई आर्थिक मदद मिलती है…" (यानी क्या सिविल सोसायटी मानती है कि प्रायवेट दानदाताओं से पैसा लेने वाले NGOs, प्रधानमंत्री से बड़े और पवित्र हैं?)

प्रशान्त भूषण ने आगे कहा कि जो NGOs राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से पैसा लेते हैं और बिना सरकारी मदद के चलते हैं उन्हें लोकपाल के दायरे में लाने की आवश्यकता नहीं है। उनका कहना है कि यदि कोई NGO मित्रों एवं शुभचिंतकों से प्राप्त धनराशि का गलत इस्तेमाल या घोटाला करता है तो उसके खिलाफ़ न्यायालयीन प्रक्रिया है, लोकपाल को इसकी जाँच नहीं करना चाहिए। है ना मजेदार दोहरा मापदण्ड? भूषण साहब के अनुसार प्रधानमंत्री या सुप्रीम कोर्ट का जज घपला करे तो वह जाँच योग्य है लेकिन लाखों रुपये का चन्दा प्राप्त करने वाले NGOs की जाँच लोकपाल नहीं करेगा? जबकि अब तो यह स्थापित तथ्य है कि भारत में काम कर रहे लाखों NGOs ऐसे हैं जो विदेशों से लाखों रुपए प्राप्त करते हैं, कुछ NGOs देश विरोधी गतिविधियाँ चलाते हैं, कुछ NGOs बड़े बाँधों का विरोध करके खामख्वाह अराजकता फ़ैलाते हैं, कुछ NGOs "साम्प्रदायिकता" के विरोध और धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देने के नाम पर "व्यक्ति विशेष या राज्य विशेष" के खिलाफ़ झूठे हलफ़नामे दायर करते रहते हैं, कई NGOs ऐसे हैं जो सीधे वेटिकन और इटली से डॉलरों में चन्दा प्राप्त करके आदिवासी व पिछड़े इलाकों में "धर्मान्तरण" में जुटे हैं, कुछ NGOs "मानवाधिकार" के नाम पर चन्दा प्राप्त करते हैं और उसे कश्मीर के अलगाववादियों के समर्थन में हवा बनाने के लिए फ़ूंक देते हैंजबकि कई NGOs ऐसे हैं जो सिर्फ़ "आर्थिक धोखाधड़ी" करते हैं, जैसे कि पर्यावरण, जल संवर्धन, बाल मजदूरी, एड्स इत्यादि विषयों पर करोड़ों रुपए चट कर जाते हैं लेकिन काम सिर्फ़ "कागजों" पर ही करते हैं। आये दिन ऐसे कई NGOs सुप्रीम कोर्ट की लताड़ खाते रहते हैं, ऐसे "फ़र्जी", "नकली" और "धोखेबाज" NGOs को लोकपाल के दायरे में क्यों नहीं लाना चाहिए? इसका जवाब तो भूषण पिता-पुत्र, अग्निवेश, संदीप पाण्डेय, तीस्ता सीतलवाड जैसी "विभूतियाँ" ही ठीक प्रकार से दे पाएंगी।

टीम अण्णा में शामिल एवं जनलोकपाल बिल का सक्रिय समर्थन करने वाले सभी महानुभावों को एक शपथ-पत्र दायर करके जनता को बताना चाहिए कि वे लोग कितने-कितने NGOs में शामिल हैं?, किसी NGOs के डायरेक्टर हैं या नहीं? विदेशों से उन NGOs को अब तक कितना पैसा प्राप्त हुआ है? यदि सिविल सोसायटी के सदस्यों का कोई NGO काफ़ी पहले से चल रहा है तो उसे केन्द्र या राज्य सरकार ने कितनी मदद दी है, चाहे जमीन के रूप में हो या चन्दे के रूप में? इन ईमानदार महानुभावों ने अपने-अपने NGO स्थापित करते समय, उसकी कार्य रिपोर्ट पेश करते समय सरकारी बाबुओं को कितनी रिश्वत दी, इसका खुलासा भी वे करें? फ़ोर्ड फ़ाउण्डेशन के कर्ताधर्ता अण्णा के आंदोलन में इतने सक्रिय क्यों हैं? अमेरिका के राजनयिक को अण्णा के आंदोलन के समर्थन में बयान देने की दिलचस्पी और जल्दबाजी क्यों है? ऐसे कई प्रश्नों के उत्तर जनता चाहेगी… ताकि सिविल सोसायटी "साफ़-सुथरी" दिखाई दे।

संयोग देखिए, कि हजारे साहब के "इंडिया अगेन्स्ट करप्शन आंदोलन" को दान और चन्दा देने वालों में बड़े ही हाई-प्रोफ़ाइल किस्म के दानदाता शामिल हैं, जिसमें प्रमुख हैं लेहमैन ब्रदर्स, भारती वालमार्ट, कई प्रायवेट कम्पनियाँ एवं उनके CEO तथा कुछ निजी बैंक भी। मुझे नहीं पता कि लेहमैन ब्रदर्स अथवा फ़ोर्ड फ़ाउण्डेशन की "ईमानदारी" और नैतिकता का स्तर क्या है? परन्तु इतना तो तय है कि इस आंदोलन को मिलने वाले समर्थन के पीछे एक बहुत बड़ी NGO लॉबी काम कर रही है।

एक-दो दिन पहले ही अग्निवेश ने बयान दे मारा कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने के मुद्दे पर सिविल सोसायटी का रुख लचीला रहेगा। ऐसा लगता है कि बाबा रामदेव से "अछूत" सा व्यवहार करने और मंच से "अखण्ड भारत के चित्र वाली भारत माता" का चित्र हटाने वाले  अण्णा हजारे के चारों तरफ़ जो हिन्दुत्व विरोधी "चौकड़ी" बैठी है वह ऐन मौके पर कोई न कोई "टेढ़ा-मेढ़ा गुल" अवश्य खिलाएगी बाबा रामदेव के आंदोलन को कमजोर करके, भगवा रंग से नफ़रत करके, NGOs की फ़ौज के हितों की रक्षा करने वालों का चेहरा भी जल्दी ही सामने आएगाबाबा रामदेव के मंच का उपयोग करके अपना चेहरा चमकाने, फ़िर बाबा रामदेव को भगवाधारी कहकर दुत्कारने वालों तथा गाँधीटोपीधारी "सो कॉल्ड सेकुलरिज़्म" भी समय आने पर बेनकाब हो जाएगा। NGOs की गैंग ने, सत्ताकेन्द्र पर स्थित जिस अदृश्य शक्ति के साथ मिलकर, बाबा रामदेव को आंदोलन को फ़ेल किया है समय आने पर उनके कच्चे चिठ्ठे भी अपने-आप जनता के सामने खुल जाएंगे…। (यहाँ देखिये… Won't Share Stage with Baba Ramdev..)

अण्णा ने अपने अनशन (भाग-1) में तो रामदेव बाबा और उमा भारती से दूरी बनाए रखी ही थी, बदली हुई परिस्थितियों में रामदेव बाबा को दिल्ली से खदेड़ने के बाद भी अण्णा ने अपने अनशन (पार्ट-2) में भी सेकुलर सलाहकारों की वजह से बाबा रामदेव को बड़ी सफ़ाई से अपने मंच से दूर रखा है, ऐसा विद्वेष रखने के बावजूद वे चाहते हैं कि उनका साथ दिया जाए? जबकि वास्तविकता तो यही है कि अण्णा के आंदोलन का बेस तो बाबा रामदेव ने ही तैयार किया है…।

जो लोग इस मुगालते में हैं कि जनता अण्णा के साथ है वे अपना मुगालता दूर कर लें… जनता भ्रष्ट तंत्र से निराश है, जनता वर्तमान व्यवस्था से नाराज़ है, इसलिए वह अंधों में काने राजा के पीछे चल पड़ी है, परन्तु इस काने राजा के चारों तरफ़ जो मण्डली है, वह सभी को साथ लेकर चलने में विश्वास नहीं रखती, इसलिए एक बड़ा वर्ग बेमन से इनका साथ दे रहा है, जबकि एक और बड़ा वर्ग इनसे स्पष्ट दूरी बनाये हुए है। संदेश साफ़ है कि, NGO पोषित एवं इलेक्ट्रानिक/प्रिण्ट मीडिया द्वारा हवा भरकर फ़ुलाया गया यह आंदोलन, तब तक सफ़ल होने की कोई उम्मीद नहीं है जब तक इसमें हिन्दुत्व द्वेषी और भगवा विरोधी तत्व हावी रहेंगे। हमें भी देखना है कि बाबा रामदेव को रामलीला मैदान से खदेड़ने के बाद, सतत उनके खिलाफ़ निगेटिव कुप्रचार करने वाला, जबकि अण्णा के नाम के कसीदे काढ़ने वाला, भाण्ड किस्म का मीडिया टीम अण्णा को कितनी ऊपर ले जाता है…

अण्णा के आंदोलन का समर्थन करने वाले इसके अंजाम या अन्तिम परिणति के बारे में कोई बात नहीं करते। क्या जैसा जनलोकपाल अण्णा चाहते हैं वैसा बन जाने पर हमें कांग्रेस नामक खुजली से निजात मिल जाएगी? यदि मिल भी जाएगी तो उसके विकल्प के रूप में कौन सी राजनैतिक पार्टी है? जब अण्णा समर्थक खुल्लमखुल्ला भाजपा और हिन्दुत्व विरोधी हैं तो क्या वे चाहते हैं कि जनलोकपाल तो बने, लेकिन कांग्रेस भी बनी रहे, भाजपा न आने पाए? क्या जनलोकपाल स्विस बैंक से पैसा वापस ला सकेगा? बहरहाल, तेल देखिये और तेल की धार देखिये… आगे-आगे क्या होता है… मुझे तो बार-बार पीपली लाइव के नत्था मानिकपुरी की याद आ रही है…

36 comments:

प्रतुल said...

मुझे यह समझ नहीं आता कि बड़े काम आखिर किये कैसे जाएँ?....
माना आपके पास कोई बड़ा व्यवसाय नहीं, नौकरी नहीं... जिसके धन का प्रयोग आप किसी मिशन में क्र सकें..
.आपकी वाणी में दम है... आपको एक बड़े वर्ग से जुड़ने की जरूरत है उसके लिए धन चाहिये... आप अपने पाठकों से दान देने का आग्रह करते हैं... मेरे पास अकूत काली दौलत है.. मैंने काफी दौलत आपको दान दी... आपने बिना जाने उसे स्वीकारा.. उसका उपभोग किया...तब क्या आपको भी जनलोकपाल की जांच के दायरे में लाना चाहिये...?
'धनराशि' दान बन जाने के बाद जनकल्याण कार्यों के लिए व्यय की जाती है तो 'काली' नहीं रह जाती... मेरा ऐसा मानना है. बस पारदर्शिता अपनी तरफ से बरती जानी चाहिये.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

baba ko ab ek raajnitik dal ka gathan kar lena chahiye. bina uske bharat ki naiya paar nahi lagegi..

प्रतुल said...

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आप फिलहाल अपनी प्रभावी वाणी से दोनों ग्रुप्स को जोड़ने का कार्य करें.... आप सभी में 'स्याह' दाग आसानी से तलाश लेते हैं...प्रथम दृष्टया ... अग्निवेश जी , अरविन्द जी, अन्ना जी, किरण जी, रामदेव जी, बालकृष्ण जी ...... सभी के कार्यों के मूल में राष्ट्र-धर्म दिखायी देता है...
आदरणीय सुरेश जी, आपकी समीक्षाओं का सत्ता-पक्ष दुरूपयोग कर सकता है... मुझे लगता है... आपकी 'भावना' न देखकर आपके दिए साक्ष्यों का केवल दुरूपयोग ही होगा.

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AMIT MISHRA said...

पहले तो मैं आपको बता दूं कि मैं स्पष्ट दूरी बनाये रखने वाली भीड़ में हूं। सभी के सभी एनजीओछाप अपना-अपना स्वार्थ अन्ना के कंधे पर बंदूक रखकर साध रहे हैं। और रहा सवाल अन्ना को मिलने वाले समर्थन का तो आपने लेख के अन्तिम में साफ कर दिया सभी इस भ्रष्ट तंत्र से ऊब गए हैं सभी बदलाव चाहते हैं। लाचार विपक्ष कभी हावी नहीं हो पाया, बाबा को करीने से सरकार ने किनारे लगाया। अब इन भेड़ियों से देश कि जनता उम्मीद पाले बैठी हैं। अंधी कहीं की।

युगल मेहरा said...

बहुत ही सोचनीय है जो देश की जनता को समझ में आ रहा है या नहीं आ रहा है.....पता नहीं |
बहुत ही अच्छी पोस्ट लोगों के मन की बात आपने राखी है... मैंने फेसबुक पर आपकी पोस्ट के कई अंश शेयर किये हैं |

आपका बहुत बहुत धन्यवाद

Dev said...

ek dum patey ki baat

हिन्दू मेरा परिचय said...

bahut badiya suresh ji...

anna aur anna ki gadhi topi ko aapne to sahi sehchana ...warna duniya to anna anna ga rahi hai...

हृदयेश कुमार गुप्ता said...

जहाँ तक NGO वाली बात है तो मुझे लगता है कि सभी अपराधियों, कंपनियों पर देखरेख करना सरकार का काम है, इन NGO कि जाँच सरकार आराम से करके इनके भ्रष्टाचार को सामने ला सकती है. लोकपाल है सरकार के कामो कि जाँच के लिए. फिर आप ये भी कहेंगे कोई चोरी करे, क़त्ल करे तो यह भी लोकपाल के दायरे मे आना चाहिए. शायद आपको लोकपाल के बारे मे और ज्यादा जानने कि जरुरत है.

मुझे लगता है बाबा रामदेव के साथ बहुत से लोग सिर्फ इसलिए जुड़े थे कि वह अगले चुनाव मे जीतकर विधायक सांसद बनेंगे पर अन्ना के आने से इस पर पानी फिर गया इसलिए वो लोग अन्ना से शपथ पत्र मांग रहे हैं. क्या बाबा रामदेव ने भी शपथ पत्र दिया था? मुझे लगता है बाबा और अन्ना दोनों ही बहुत महान कार्य कर रहे हैं और हमें उनका साथ देना चाहिए. बाबा रामदेव का आन्दोलन कुचल जाने के कारण अब हमें अन्ना से बहुत आशा है इसलिए आइये भ्रष्टाचार को मिटने मे उनका साथ देते हैं.

हृदयेश कुमार गुप्ता said...

आप कहते हैं कि "क्या जैसा जनलोकपाल अण्णा चाहते हैं वैसा बन जाने पर हमें कांग्रेस नामक “खुजली” से निजात मिल जाएगी? यदि मिल भी जाएगी तो उसके विकल्प के रूप में कौन सी राजनैतिक पार्टी है?"
मतलब साफ है कि आपको इससे कोई मतलब नहीं कि भ्रष्टाचार मिटे या नहीं, आपको सिर्फ इससे मतलब है कि कौन सी राजनैतिक पार्टी(?भाजपा) पर जनता को इससे कोई मतलब नहीं कि कौन सि राजनैतिक पार्टी आये. मतलब सिर्फ इससे है कि भ्रष्टाचार मिटे, काला धन आये, समृद्ध भारत बने - यह काम चाहे कांग्रेस करे या भाजपा या कोई और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

क्या आप मेरे दोनों comment प्रकाशित करेंगे

संजय बेंगाणी said...

बाबा को सरकार ठिकाने लगाने में सफल रही. अब "केसों' के मकड़जाल बाबा को योगासन करवाएगा. मगर अन्ना को फसा नहीं पा रही है. चतूर लोगों ने ऐसा व्यक्ति तलाश लिया है जो फक्कड़ है. अब इसका सरकार क्या उखाड़ लेगी? लोगों को नेता चाहिए. कोई सही का संत होता तो भगवाधारी के पिछे भी जनता हो लेती.

Nikhil Singh said...

bhrashtachar ke virodh main jo bhi ho hum uske saath hain,bhale hi vo anna ho ya ramdev ya koi aur
maine hamesha aapke blogs ki taarif ki hai lekin iski ninda karta hu kyoki yah nishpaksh nahi hai
vaise bhi kisi ne kaha hai ki"ek din hum vahi ban jate hain jisse hum ghrina karte hain" aap nishchit hi ab sacche hindu nahi rahe kyuki aapke lekho main ab hindu dharm ki asstha kam aur dusre dharmo ki kadwahat jyada dikhai deti hai.
kripaya sochiyega mere comments par apni vyast zindgi se do kshan nikaal kar

Anonymous said...

कभी कभी बकवास चीजों को पढना भी अच्छा लगता है |तिलमिलाते रहिये हमारी शुभकामनाएं आपके साथ है

aparchit said...

sureshji aap khana chathay hai BJP Ayaygi to sab theek ho jayga?
aap reporter hai apko nutral hona chaiya

umesh said...

aadrniya bhai suresh ji
aapse prarthna hai ki agnivesh jaison ka samarthan na karte hue bhi hame anna ka saath to dena hi chahiye

Suresh Chiplunkar said...

यह बात तो मैं लेख लिखने के पहले मिनट से ही जानता था कि टीम अण्णा(?) के विरोध में लिखने पर आलोचना का सामना करना ही पड़ेगा… सो सभी बन्धुओं की टिप्पणियों का स्वागत है ही (बेनामी का भी)। यही तो लोकतन्त्र है, कोई जरुरी नहीं कि हमेशा की तरह सभी पाठक मेरे इस लेख से सहमत हों, या सकारात्मक टिप्पणी दें…
दरअसल जनता ने अण्णा से अत्यधिक उम्मीदें बाँध ली हैं, जो कि दुधारी तलवार की तरह है, यह खतरनाक भी हो सकता है।

Anonymous said...

सुरेश जी, आपका कहना बिलकुल ठीक है, अन्ना के साथ रहने वाले लोग विश्वशनीयता के काबिल नहीं , पर अन्ना इनके बिना भी अपना काम नहीं कर सकते. अन्ना को बाबा रामदेव को साथ लेकर चलना चाहिए था पर वो अपना अलग झंडा लेकर चल पड़े हैं. उन्हें ये नहीं पता की जो लोग आज उनके साथ हैं, कल वो अपना काम निकल जाने पर अलग हो जायेंगे.रामदेव जी के साथ ऐसा व्यव्हार अत्यंत दुखद है.

Shivnarayan R. Varma said...

Jai Sriram...

Suresh Chiplunkar said...

मजे की बात तो यह है कि अप्रैल में जब मैंने दो भागों में भगवा Vs गाँधी टोपी नाम से अण्णा टीम के विरोध में लेख लिखे थे तब उसे जबरदस्त सकारात्मक रिस्पांस मिला था… बाबा रामदेव को खदेड़ दिये जाने के बाद सिर्फ़ दो-तीन माह बाद अब लोगों ने अण्णा से उ...म्मीदें बाँध ली हैं… जिन मित्रों ने मेरे वे दो लेख नहीं पढ़े हों उन्हें लिंक दे रहा हूँ… पढ़िये और बताईये कि मेरे आज के लेख में और अप्रैल के इन लेखों में ज्यादा अन्तर न होने के बावजूद, प्रतिक्रियाओं में इतना अन्तर क्यों है?

1) http://blog.sureshchiplunk​ar.com/2011/04/jan-lokpal-​bill-national-advisory.htm​l

2) http://blog.sureshchiplunk​ar.com/2011/04/anna-hazare​-jan-lokpal-bill-secularis​m.html

उधर मुम्बई-दुबई में अण्णा की गिरफ़्तारी की तारीख पर करोड़ों का सट्टा लग चुका है, सट्टा लगाने वाले आसमान से नहीं उतरे हैं और न ही भिखारी हैं, मध्यमवर्गीय लोग ही हैं जो अण्णा के सुर में सुर मिलाकर भ्रष्टाचार को कोस रहे हैं…। क्या कोई विरोधाभास या पाखण्ड नज़र नहीं आता किसी को?

सम्वेदना के स्वर said...

एक ही रंग को देखने से बचॉ सुरेश भाई! मुद्दा बड़ा है और देश इस मुद्दे पर अन्ना के पीछे खड़ा है। अन्ना की आज की प्रेस कांफेंस के बाद हमें तो अन्ना पर कोई शक नहीं है। इस लेख से घोर असहमत!
बाबा रामदेव का अपना योगदान है इस अभियान में, लेकिन इतिहास को किसी योजनाबद्ध तरीके से नहीं लिखा जा सकता।

सुलभ said...

तेल देखिये और तेल की धार देखिये.
-
जब हम नगर-पालिका चुनाव में वोट देते हैं तो हित अपने स्थानीय क्षेत्र का देख कर दें. विधान सभा में अपने शहर. यहाँ तक तो ठीक है.
लेकिन जब प्रधान मंत्री चुनाव हो, लोक सभा में अपने देश का हित देख कर दें कि प्रतिनिधि कितने ईमानदार हैं या सिर्फ पार्टी आला कमान के चमचे फर्माबरदार हैं.
जात पात मजहब रंग के फेर में पड़ेंगे तो भ्रष्टाचार की जीत होगी ही. यही वर्षों से हो रहा है.

हम सुधरेंगे देश सुधरेगा.
आजादी के वर्षगाँठ पर संकल्प तो लेने ही होंगे.

Mahendra - Indore said...

Sureshjee please do not create any such topic at this stage unless & until country get worst affected. Govt exactly wants this to divide opposition & rule smoothly

Rajesh said...

Suresh Ji Anna ke Andolan ko bhi ye khangresi poora nahi hone denge. Aur unke andolan se kuch hone wala bhi nahi hai.

Anonymous said...

मीडिया मेहरबान
तो अन्ना पहलवान
ये सारा खेल मीडिया का किया धरा है.
जो जबरदस्ती लोगो पर अन्ना को थोपे दे रहा है.

Shastri JC Philip said...

सारे के सारे एनजीओ भी लोकपाल बिल के दायरे में जरूर आने चाहिये. इस देश में कानून या कानून के परे कोई भी नहीं होना चाहिये

-- सस्नेह, शास्त्री

Anonymous said...

दुहरी मानसिकता रखना आसन नहीं होता बधाई

हाँ बाबा रामदेव के पास बहुत पैसा है जय हो

anshu hindu said...

सही बात है अन्ना अब अन्ना नहीं बल्कि पिपली का नथा मणिपुरी हो गया बेबस लाचार

ROHIT said...

आदरणीय सुरेश जी
100 % सहमत
आपने बिल्कुल मेरे मन के विचारो को प्रस्तुत कर दिया.
बहुत दिन बाद नेट पे आना हुआ.
अन्ना की नौटंकी पर तो बात करने का मन नही था.
लेकिन जब देखा यहाँ कुछ लोग बाबा रामदेव के पीछे पड़ गये है.
तो चुप कैसे रहूँ?
संजय बेँगाणी जी कह रहे है कि कोई सच्चा संत होता तो भगवा के साथ भी जनता हो लेती.
संजय जी शायद आपको पता नही है
बाबा रामदेव सच्चे संत है इसीलिये उनके साथ अपार जनसमूह रहता है .वो भी इस भांड मीडिया की भोपूगिरी के वगैर.
जरा यू टयूब पे 27 फरवरी 2011 की उनकी रामलीला मैदान की रैली देख लीजियेगा.
और जनसमूह देख लीजियेगा.
और वहाँ आपको ये अन्ना चन्ना टीम भी दिखायी पड़ेगी अपना चेहरा चमकाते हुये.
और आज जरा इन अन्ना महाशय की हिम्मत देखो .
कहते है बाबा रामदेव को अपने मंच पर बैठने नही देँगे.
और भी बहुत कुछ कहा.
लेकिन धन्य है सन्यासी रामदेव जी.
उन्होने इस घमंडी और जलन से भरे हुये अन्ना को कुछ भी पलट कर नही कहा बल्कि इनको अपना समर्थन देते रहे.खैर होय वहि जो राम रचि राखा
इस देश को अब एक नयी राजनैतिक पार्टी ही बचा सकती है.
और अगले लोकसभा चुनाव तक वो नयी पार्टी अपने विशाल संगठन के साथ तैयार हो जायेगी.
और उस नयी पार्टी को दबाने के लिये ही अन्ना चन्ना को बड़े पैमाने पे खड़ा किया जा रहा है.
और इसके पीछे कौन है ? और किस मकसद से है?
ये पूरी कहानी दानदाताओ का नाम सामने आने के बाद शीशे की तरह साफ हो गयी है.अमेरिकी कंपनी लैहमन ब्रदर्स जो मंदी मे पूरी तरह दीवालिया हो गयी थी. और भी कई विदेशी कंपनिया जो भारत के काले धन पर टिकी हुयी है.
अब बाबा रामदेव को सावधान हो जाना चाहिये.
उन्होने जिन विदेशी कंपनियो और कालेधन के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है.
उन्ही कंपनियो और कालेधन से पोषित विदेशियो ने बाबा की टक्कर मे अन्ना नाम के मोहरे को लोकपाल का झुनझुना थमाकर खड़ा कर दिया है. और एक बहुत बड़ा मुद्दा जिस पर भारत का भविष्य टिका है. कालाधन और व्यवस्था परिवरतन.
उससे लोगो का ध्यान हटा दिया गया है.
और मै ये बात शर्तिया कह सकता हूँ कि अन्ना पार्टी इसी तरह लोकपाल की आड़ मे मीडिया के सहारे जनसमर्थन हासिल करके अगले लोकसभा चुनाव मे अपने बंदे उतारेगी.
और बाबा रामदेव की पार्टी के वोट काटेगी.
क्यो कि विदेशी कंपनियो और भारत के कालेधन पर टिके विदेशी लोगो का एक ही मकसद है कि बाबा रामदेव का भारत की राजनीति मे प्रवेश न हो पाये.
बहुत भयंकर चाल चली है इन लोगो ने.

ROHIT said...

और एक फर्क देखिये
जब बाबा रामदेव ने अनशन किया था तो कांग्रेस तो टूट पड़ी ही थी .
साथ मे मीडिया भी टूट पड़ा था.
और तो और अपने ब्लागर भी लगातार एक महिने तक बाबा पर टूट पड़े.
और अब देखो कैसे पलक पावड़े बिछाये जा रहे है.
मीडिया को देखो कैसे दिन रात अन्ना अन्ना गुणगान मे लगा है.
दिल्ली पुलिस का व्यवहार देखो.
कांग्रेस का व्यवहार देखो.
और अपने ब्लागर बंधुओ को भी देखो.
कितने प्यार से अन्ना अन्ना चिल्ला रहे है.
वाकई मे बहुत कठिन डगर है बाबा रामदेव की सनातन धर्म की पताका को इस देश मे फहराने की.

Kuldeep Tyagi said...

रामदेव या अन्ना!
प्रश्न ये है की रामदेव और अन्ना दोनों ही एक अच्छे उदेश्य के लिए आन्दोलन कर रहे है! लेकिन दोनों की ही राहे एक दुसरे जे जुदा या अलग क्यों है! जन्हा सुरु मे बाबा रामदेव ने अन्ना का साथ दिया वन्ही अन्ना ने पहले ही दिन से बाबा के आन्दोलन से दूरी बना ली! क्योंकि उनके मंच पर कुछ सांप्रदायिक लोग पहुँच गए! जबकि बाबा के मंच पर ऐसे भी लोग थे जो एक अच्छे उदेश्य के लिए इकट्ठा हुए थे! और स्वतंत्र भारत मे सभी को अपनी राय देना का हक है चाहे वो धार्मिक हो या राजनातिक हो! आप किसी भी व्यक्ति की बहिस्कार इसलिए नहीं कर सकते की वो धार्मिक है या राजनातिक है! एक ही विषय पर एक ही संगठन के लोगो की बातें या उनके विचार अलग हो सकते है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है की संगठन को समाप्त ही कर दिया जाये.

अब बात करते है असली मुद्दों की, की रामदेव या अन्ना के आन्दोलन मे सबसे ज्यादा असरदार आन्दोलन किसका है!

१. रामदेव बात करते है काले धन पर, भ्रस्टाचार पर, स्वदेशी पर, स्व-रोजगार पर. जबकि अन्ना बात करते है सिर्फ भ्रस्टाचार पर.
क्या भ्रस्टाचार को समाप्त करने से ये सभी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी, नहीं होंगी क्योंकि सिर्फ भ्रस्टाचार हटाने से गरीबी दूर नहीं होगी.

२. रामदेव ने अपनी बात जो की आन्दोलन से जुडी हुई है देश के उस कोने तक पहुंचाई है जन्हा देश की आत्मा बस्ती है यानि की गाँव तक, जबकि अन्ना के आन्दोलन से जुड़ा हुआ है सिर्फ और सिर्फ सहरी व्यक्ति जो सिर्फ कभी-कभी इस भ्रस्ट तंत्र की चपेट मे आता है, जबकि ग्रामीण व्यक्ति हर रोज भ्रस्टाचार से आमना -सामना करता है.
क्या भ्रस्टाचार को समाप्त करने से गाँवो का विकास हो सकता है! नहीं होगा क्योंकि इतने घोटाले करके जो पैसा विदेशो मे भेज दिया अगर वो देश मे आये तो कुछ हो सकता है!

३. अन्ना सिर्फ बात करते है भ्रस्टाचार पर रोक की लेकिन जो पैसा भ्रस्टाचार करके विदेशो मे भेज दिया क्या वो देश का नहीं है! क्या उस पर हम जैसे करोडो कर देने वालो का कोई हक नहीं है! रामदेव इसी पैसे की वापस लाकर इससे विकास करने की बात करते है और यही एक गलत बात है जो वो करते है क्योंकि सरकार ये नहीं चाहती की वो पैसा वापस आये.
क्या विकास कोई बुरी बात है क्या ये अच्छा नहीं होगा की हमारे देश मे कोई गरीब नहीं होगा! कोई व्यक्ति रात की भूखा नहीं सोयेगा! हमारे देश के नन्हे बच्चो को मजदूरी नहीं करनी पड़ेगी.

४. किसी भी आन्दोलन को किसी धार्मिक संगठन के समर्थन दे देने से ये साबित नहीं हो सकता की वो आन्दोलन समाप्त हो जायेगा! हमारी आत्मा हमारे संस्कारो मे बस्ती है और अगर हम अपने संस्कारो को अच्छे से निर्वाह करे तो इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की कोण समर्थन दे रहा है और कोण नहीं!
अन्ना अपने मंच से हिन्दू धार्मिक लोगो को भगा देते है भारत माता का चित्र हटा देते है और अपने मंच पर स्वागत करते है देश के विभाजन करने की बात करने वालो को, स्वागत करते है मओवादियो का समर्थन करने वालो का, समर्थन करते है एक धर्म विशेस को गलियां देने वाले लोगो को, अगर अन्ना को अपने आन्दोलन के लिए किसी की जरुरत ही नहीं थी खासकर हिंदूवादी सोच वालो के लिए तो फिर क्यों उन्होंने उन अधर्मियों की मंच पर जगह दी जो सिर्फ देश को बटने के कार्य करते है.

जबकि रामदेव ने सभी का आह्वान किया अपने आन्दोलन मे, सभी को सामिल किया किसी से जाती या धर्म नहीं पुछा गया, सिर्फ सहयोग माँगा गया उस आन्दोलन मे जो असलियत मे भारत की तस्वीर बदल देगा, बना देगा फिर से भारत को सोने की चिड़िया!

मे व्यक्तिगत तौर पर न बाबा का समर्थक हूँ न अन्ना का विरोधी! लेकिन अगर बात मुद्दों की की जाये तो बाबा रामदेव के आन्दोलन मे वो आग थी जिससे सरकार को खुद एहसास हुआ की ये आग उसे जला देगी! इसीलिए ४-४ मंत्री पहले अगवानी करते है फिर लाखो लोगो को रात को पिटवाते है! ये सिर्फ यही कहता है की सरकार को अगर डर है तो सिर्फ रामदेव के आन्दोलन से. अन्ना के आन्दोलन से कुछ फर्क नहीं पड़ता जिसके उद्हरण आप लोग देख ही चुके है संसद मे पेश सरकार की विधेयक और सरकार की मानसिकता आप देख चुके है आप की किस तरह से बाबा की परेशान किया जा रहा है हर रोज एक नया आरोप लगा दिया जाता है. अगर आप सोचते है की बाबा के पास इतनी दौलत है तो मे यही कहूँगा की बाबा ने इतनी इच्छा-शक्ति तो दिखाई की उन्होंने अपनी सम्पति को उजागर किया! क्या सरकार मे बैठे भ्रस्ट लोगो मे इतनी इच्छा-सकती है!

मेरी दुआ है की बाबा और अन्ना जी एक मंच पर आये और इस भ्रस्ट तंत्र और इस भ्रस्ट सरकार से लोगो को निजात दिलाये. मे इस आन्दोलन मे बाबा और अन्ना के साथ हूँ.

जय हिंद.

Kuldeep Tyagi said...

रामदेव या अन्ना!
प्रश्न ये है की रामदेव और अन्ना दोनों ही एक अच्छे उदेश्य के लिए आन्दोलन कर रहे है! लेकिन दोनों की ही राहे एक दुसरे जे जुदा या अलग क्यों है! जन्हा सुरु मे बाबा रामदेव ने अन्ना का साथ दिया वन्ही अन्ना ने पहले ही दिन से बाबा के आन्दोलन से दूरी बना ली! क्योंकि उनके मंच पर कुछ सांप्रदायिक लोग पहुँच गए! जबकि बाबा के मंच पर ऐसे भी लोग थे जो एक अच्छे उदेश्य के लिए इकट्ठा हुए थे! और स्वतंत्र भारत मे सभी को अपनी राय देना का हक है चाहे वो धार्मिक हो या राजनातिक हो! आप किसी भी व्यक्ति की बहिस्कार इसलिए नहीं कर सकते की वो धार्मिक है या राजनातिक है! एक ही विषय पर एक ही संगठन के लोगो की बातें या उनके विचार अलग हो सकते है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है की संगठन को समाप्त ही कर दिया जाये.

अब बात करते है असली मुद्दों की, की रामदेव या अन्ना के आन्दोलन मे सबसे ज्यादा असरदार आन्दोलन किसका है!

१. रामदेव बात करते है काले धन पर, भ्रस्टाचार पर, स्वदेशी पर, स्व-रोजगार पर. जबकि अन्ना बात करते है सिर्फ भ्रस्टाचार पर.
क्या भ्रस्टाचार को समाप्त करने से ये सभी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी, नहीं होंगी क्योंकि सिर्फ भ्रस्टाचार हटाने से गरीबी दूर नहीं होगी.

२. रामदेव ने अपनी बात जो की आन्दोलन से जुडी हुई है देश के उस कोने तक पहुंचाई है जन्हा देश की आत्मा बस्ती है यानि की गाँव तक, जबकि अन्ना के आन्दोलन से जुड़ा हुआ है सिर्फ और सिर्फ सहरी व्यक्ति जो सिर्फ कभी-कभी इस भ्रस्ट तंत्र की चपेट मे आता है, जबकि ग्रामीण व्यक्ति हर रोज भ्रस्टाचार से आमना -सामना करता है.
क्या भ्रस्टाचार को समाप्त करने से गाँवो का विकास हो सकता है! नहीं होगा क्योंकि इतने घोटाले करके जो पैसा विदेशो मे भेज दिया अगर वो देश मे आये तो कुछ हो सकता है!

३. अन्ना सिर्फ बात करते है भ्रस्टाचार पर रोक की लेकिन जो पैसा भ्रस्टाचार करके विदेशो मे भेज दिया क्या वो देश का नहीं है! क्या उस पर हम जैसे करोडो कर देने वालो का कोई हक नहीं है! रामदेव इसी पैसे की वापस लाकर इससे विकास करने की बात करते है और यही एक गलत बात है जो वो करते है क्योंकि सरकार ये नहीं चाहती की वो पैसा वापस आये.
क्या विकास कोई बुरी बात है क्या ये अच्छा नहीं होगा की हमारे देश मे कोई गरीब नहीं होगा! कोई व्यक्ति रात की भूखा नहीं सोयेगा! हमारे देश के नन्हे बच्चो को मजदूरी नहीं करनी पड़ेगी.

४. किसी भी आन्दोलन को किसी धार्मिक संगठन के समर्थन दे देने से ये साबित नहीं हो सकता की वो आन्दोलन समाप्त हो जायेगा! हमारी आत्मा हमारे संस्कारो मे बस्ती है और अगर हम अपने संस्कारो को अच्छे से निर्वाह करे तो इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की कोण समर्थन दे रहा है और कोण नहीं!
अन्ना अपने मंच से हिन्दू धार्मिक लोगो को भगा देते है भारत माता का चित्र हटा देते है और अपने मंच पर स्वागत करते है देश के विभाजन करने की बात करने वालो को, स्वागत करते है मओवादियो का समर्थन करने वालो का, समर्थन करते है एक धर्म विशेस को गलियां देने वाले लोगो को, अगर अन्ना को अपने आन्दोलन के लिए किसी की जरुरत ही नहीं थी खासकर हिंदूवादी सोच वालो के लिए तो फिर क्यों उन्होंने उन अधर्मियों की मंच पर जगह दी जो सिर्फ देश को बटने के कार्य करते है.

जबकि रामदेव ने सभी का आह्वान किया अपने आन्दोलन मे, सभी को सामिल किया किसी से जाती या धर्म नहीं पुछा गया, सिर्फ सहयोग माँगा गया उस आन्दोलन मे जो असलियत मे भारत की तस्वीर बदल देगा, बना देगा फिर से भारत को सोने की चिड़िया!

मे व्यक्तिगत तौर पर न बाबा का समर्थक हूँ न अन्ना का विरोधी! लेकिन अगर बात मुद्दों की की जाये तो बाबा रामदेव के आन्दोलन मे वो आग थी जिससे सरकार को खुद एहसास हुआ की ये आग उसे जला देगी! इसीलिए ४-४ मंत्री पहले अगवानी करते है फिर लाखो लोगो को रात को पिटवाते है! ये सिर्फ यही कहता है की सरकार को अगर डर है तो सिर्फ रामदेव के आन्दोलन से. अन्ना के आन्दोलन से कुछ फर्क नहीं पड़ता जिसके उद्हरण आप लोग देख ही चुके है संसद मे पेश सरकार की विधेयक और सरकार की मानसिकता आप देख चुके है आप की किस तरह से बाबा की परेशान किया जा रहा है हर रोज एक नया आरोप लगा दिया जाता है. अगर आप सोचते है की बाबा के पास इतनी दौलत है तो मे यही कहूँगा की बाबा ने इतनी इच्छा-शक्ति तो दिखाई की उन्होंने अपनी सम्पति को उजागर किया! क्या सरकार मे बैठे भ्रस्ट लोगो मे इतनी इच्छा-सकती है!

मेरी दुआ है की बाबा और अन्ना जी एक मंच पर आये और इस भ्रस्ट तंत्र और इस भ्रस्ट सरकार से लोगो को निजात दिलाये. मे इस आन्दोलन मे बाबा और अन्ना के साथ हूँ.

जय हिंद.

shri said...

यह पहली बार नहीं है कि भ्रष्टाचार पर इतना हल्ला मचा है। भ्रष्टाचार आलोचकों का मनपसन्द मुद्दा हुआ करता है। यह फैशन सा बन गया है कि समस्याओं की जड़ में भ्रष्टाचार बता दो, तो विवाद संक्षिप्त हो जाता है। जैसे किसी व्यक्ति को बुखार हो और हम कहें कि ‘बुखार’ की बीमारी है, तो यह गलत होगा। बुखार तो एक लक्षण, जो किसी बीमारी को इंगित करता है। यह मलेरिया, टाइफॉइड या अन्य बीमारी के कारण हो सकता है। आप बुखार की गोली से केवल लक्षण का इलाज कर मरीज को राहत दे सकते हैं, बीमारी खत्म नहीं होगी।
लेकिन भ्रष्टाचार पर इतनी चर्चा हो रही है और मूल बात पर हम नहीं जा रहे हैं। या जाना नहीं चाहते, क्योंकि तब हम सभी लपेटे में आते हैं। फिर आलोचना का मजा छिनने का खतरा भी है। मूल समस्या सामाजिक मूल्यों की है। भारत में धन और पद का मूल्य इस क़दर बढ़ गया है कि प्रत्येक व्यक्ति इन मूल्यों पर खरा उतरना चाहता है। धन ही नहीं, धन के दिखावे का मूल्य भी बढ़ गया है।
आप जानते हैं कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है और भारतीय व्यक्ति तो वैसे भी सामूहिकता में अधिक विश्वास करता है। इसी भीड़ की भावना को हम लोकतंत्र भी कह देते हैं और बुराई को छिपा लेते हैं। यही हाल पैसे का है। किसी भी तरह से आये, पैसे को हमने अधिक मान दे रखा है। उस पैसे के दिखावे के रूप में हमने मकान, सोना, गाड़ी, विवाह व अन्य समारोहों में खर्च आदि को मान्यता दे रखी है। आपका ज्ञान या कला अब महत्वपूर्ण नहीं है। किसी को आपके ज्ञान या कला में दिलचस्पी नहीं है। आपके पास धन कितना है, यह मायने रखता है। और जब समाज के अधिकांश लोग ऐसा करने लगें, तो आप अपने आपको कितना रोकेंगे? तर्क-कुतर्क देकर भी आप धन और पद अर्जित करना चाहेंगे। हमारे मोहल्ले में रहने वाले प्रोफेसर, लेखक या कवि या चित्रकार को हम कहाँ सम्मान दे रहे हैं। ऐसे में हमारे प्रतिभावान बच्चे क्यों चित्रकार, अध्यापक या लेखक बनना चाहेंगे, जिन्हें किसी भी समारोह में मुख्य अतिथि नहीं बनाया जाता। मैं भ्रष्ट लोगों पर दया करता हूँ, क्योंकि भारत की इन प्रतिभाओं को व्यवस्था ने भ्रष्टाचार की खाई में धकेल दिया है। हम इनसे संन्यासी बने रहने की अपेक्षा करते हैं और मेनकाओं को इनके चारों ओर नचा रहे हैं। प्रत्येक मनुष्य इतना शक्तिशाली नहीं हो सकता कि वातावरण को झुठला दे।
भ्रष्टाचार से आम आदमी अब परेशान नहीं है। वह सड़कों पर नहीं उतर रहा है। मीडिया, अखबार और तथाकथित बुद्धिजीवी ही चिल्ला रहे हैं कि देश में इतना भ्रष्टाचार है। आम आदमी ने भ्रष्टाचार को अपने भाग्य का हिस्सा उसी तरह मान लिया है, जिस प्रकार सल्तनत, मुग़लिया या अंग्रेजी राज के शोषण को। इसीलिए आजादी की व्यापक लड़ाई हमारे यहाँ नहीं लड़ी गयी थी और 'लगभग मुफ्त में सत्ता का हस्तान्तरण' हो गया था। आम आदमी ने मान लिया है कि यहाँ सब भ्रष्ट हैं।
और अंत में मैं बाबा या अन्ना के खिलाफ बिल्कुल नहीं हूँ, बस मैं उन्हें अवतार नहीं मान पा रहा हूँ। दूसरी तरफ मैं उन निठल्ले बुद्धिजीवियों का भी समर्थक नहीं हूँ जो कहते हों कि हमें तो पहले से ही पता था कि कुछ होना जाना नहीं है। इसीलिए तो वे घर में बैठे थे। सच पूछिए तो ऐसे लोग ही असली समस्या के गर्भ में हैं। मेरा आग्रह तो यह है कि हम बाहर निकलें और जिम्मेदारी के साथ निकलें। केवल आलोचना के सहारे बैठे ना रहें। अपने बूते पर जब तक हम प्रयास नहीं करेंगे, भ्रष्टाचार देश की व्यवस्था को दीमक की तरह चाटता रहेगा। जब चुनाव आयेंगे, तो हम सभी जातियों और क्षेत्रों के हिसाब से वोट देने वाले हैं। तब हम फिर करुणानिधि की जगह जयललिता को लाकर बता देंगे। एक भ्रष्ट की जगह दूसरा भ्रष्ट। परिवर्तन कर पाने का एक झूठा दम्भ भरेंगे। विद्वान कहेंगे कि यह लोकतंत्र की जीत है कि जनता परिवर्तन कर लेती है। लेकिन क्या इसे लोकतंत्र की जीत कहना ठीक है? तो विकल्प भी कहाँ हैं? बाबा या अन्ना विकल्प नहीं है?
विकल्प तो राजनैतिक ही होंगे। अब करना यही है कि राजनैतिक दलों को लोकनैतिक दल बनाना है, उन पर जनहित और विकास की सही नीतियाँ बनाने का दबाव डालना है। इन दलों के भीतर लोकतंत्र पनपे, इसका माहौल बनाना है। जागरूक नागरिक तैयार करने है, जो आर्थिक मुद्दों को भी समझ सकें और जिम्मेदारी ओढ़ने की हिम्मत रखते हों। ऐसे नागरिक जो अवतारों की बजाय स्वयं में विश्वास रखते हों।

shash said...

suresh ji aapka vishleshan ekdam satik aur vishay ke mool tak jata hai. aap apne ko thoda apne avishavsiy sutron se door rakhen.
abhi aisa lagta hai hai ki looteron mein aapas mein koi sauda ho gaya hai. kripaya apne blog ko aur teekha aur satyatmak banaye rakhen. aapki aur desh seva mein ek swatantra manushya.
saprem

Desh Premi said...

तेल देखिये और तेल की धार देखिये…

Jeet Bhargava said...

देश के गद्दार इमाम बुखारी ने 'वन्देमातरम' और 'भारत माता की जय' के नारे पे एतराज जताते हुए मुसलमानों को 'अन्नादोलन' से दूर रहने कि हिदायत दी तो अरविन्द केजरीवाल इमाम के घर मुजरा करने चले गए.
संघ ने सामने से समर्थन की चिट्टी भेजी फिर भी अन्ना टीम शुक्रगुजार नहीं है, ऊपर से संघ से संबंधो को 'गाली' मानकर दूरी रखने की कोशिश करती रहती है.
आप सोच सकते हैं.. इस देश के सत्ताधारियो और मीडिया ही नहीं, अरविंदो/अग्निवेशो की नजर में भी हिन्दू जन की क्या औकात है?? वह सिर्फ इस्तेमाल ही होता रहा है.

इस आन्दोलन के हश्र का अंदाजा तो आप लगा ही सकते हैं.

Bidyut Kumar said...

अन्नाजी का यह जो आन्दोलन चला था और वो जो भीड़ नज़र आ रहा था उसमे ३०% NGOs के लोग थे जो खुद को साफ़ सुथरा दर्शाने के लिए इस आन्दोलन में सामिल हुए थे.

Bidyut Kumar said...

अन्नाजी का यह जो आन्दोलन चला था और वो जो भीड़ नज़र आ रहा था उसमे ३०% NGOs के लोग थे जो खुद को साफ़ सुथरा दर्शाने के लिए इस आन्दोलन में सामिल हुए थे.