Monday, July 25, 2011

Ghulam Nabi Fai, ISI Agent, Indian Intellectuals in Seminars

“सेकुलर बुद्धिजीवी गैंग” का नकाब उतरा – सन्दर्भ : गुलाम नबी फ़ई.... 

हाल ही में अमेरिका ने दो ISI एजेंटों गुलाम नबी फाई और उसके एक साथी को गिरफ्तार किया। ये दोनों पाकिस्तान से रूपये लेकर पूरे विश्व में कश्मीर मामले पर पाकिस्तान के लिए लॉबिंग और सेमिनार आयोजित करते थे। इसमें होने वाले तमाम खर्चों का आदान प्रदान हवाला के जरिये होता था। इन सेमिनारों में बोलने वाले वक्ताओ और सेलिब्रिटीज को खूब पैसे दिए जाते थे। ये एजेंट उनको भारी धनराशि देकर कश्मीर पर पाकिस्तान का पक्ष मजबूत करते थे।

अमेरिका ने उनसे पूछताछ के बाद उनके भारतीय दलालों के नाम भारत सरकार को बताए हैं। इन भारतीय "दलालों" के नाम सुनकर भारत सरकार के हाथ पांव फ़ूल गए हैं, ना तो भारत सरकार में इतनी हिम्मत है कि इन देशद्रोहियों को गिरफ्तार करे और ना ही इतनी हिम्मत है कि इन दलालों पर रोक लगाये। जो हिम्मत(?) कांग्रेस ने रामलीला मैदान में दिखाई थी, वही हिम्मत इन दलालो को गिरफ्तार करने में नहीं दिखाई जा सकती, क्योंकि ये लोग बेहद “प्रभावशाली”(?) हैं।


(चित्र में - गुलाम नबी फ़ई, अमेरिका में भारतीय दूतावास के सामने KAC के बैनर तले कश्मीर की आजादी की माँग करते हुए) 

पहले जरा आप उन तथाकथित "बुद्धिजीवियों", "सफेदपोशो" एवं "परजीवियों" के नाम जान लीजिए जो "ISI" से पैसे लेकर भारत में कश्मीर, मानवाधिकार, नक्सलवाद इत्यादि पर सेमिनारों में भाषणबाजी किया करते थे…. ये लोग पैसे के आगे इतने अंधे थे कि इन्होंने कभी यह जाँचने की कोशिश भी नहीं की, कि इन सेमिनारों को आयोजित करने वाले, इनके हवाई जहाजों के टिकट और होटलों के खर्चे उठाने वाले लोग "कौन हैं, इनके क्या मंसूबे हैं…", इन लोगों को कश्मीर पर पाकिस्तान का पक्ष लेने में भी जरा भी संकोच नहीं होता था। हो सकता है कि इन "महानुभावों" में से एक-दो, को यह पता न हो कि इन सेमिनारों में ISI का पैसा लगा है और गुलाम नबी फ़ई एक पाकिस्तानी एजेण्ट है। लेकिन ये इतने विद्वान तो हैं ना कि इन्हें यह निश्चित ही पता होगा कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है? तब भी ऐसे देशद्रोही "प्रायोजित" सेमिनारों में ये लोग लगातार कश्मीर के "पत्थर-फ़ेंकुओं" के प्रति सहानुभूति जताते रहते, कश्मीर के आतंकवाद को "भटके हुए नौजवानों" की करतूत बताते एवं बस्तर व झारखण्ड के जंगलों में एके-47 खरीदने लायक औकात रखने वाले, एवं अवैध खनन एवं ठेकेदारों से "रंगदारी" वसूलने वाले नक्सलियों को "गरीब", "सताया हुआ", "शोषित आदिवासी" बताते रहे और यह सब रुदालियाँ वे अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर गाते थे।

१- लेखक और संपादक कुलदीप नैयर :- (पाकिस्तान को लेकर हमेशा नॉस्टैल्जिक मूड में रहने वाले "महान" पत्रकार)। इन साहब को 1947 से ही लगता रहा है कि पाकिस्तान भारत का छोटा "शैतान" भाई है, जो कभी न कभी "बड़े भाई" से सुलह कर लेगा और प्यार-मोहब्बत से रहेगा…

२- स्वामी(?) अग्निवेश :- (महंगे होटलों में ठहरते हैं, हवाई जहाज में सफ़र करते हैं, कश्मीर नीति पर हमेशा भारत-विरोधी सुर अलापते हैं, नक्सलवादियों और सरकार के बीच हमेशा "दलाल" की भूमिका में दिखते हैं)

३- दिलीप पडगांवकर :- (कश्मीर समस्या के हल हेतु मनमोहन सिंह द्वारा नियुक्त विशेष समिति के अध्यक्ष)। यह साहब अपने बयान में फ़रमाते हैं कि मुझे पता नहीं था कि गुलाम नबी फ़ाई ISI का मोहरा है…। अब इन पर लानत भेजने के अलावा और क्या किया जाए? टाइम्स ऑफ़ इण्डिया जैसे "प्रतिष्ठित"(???) अखबार के सम्पादक को यह नहीं पता तो किसे पता होगा? वह भी उस स्थिति में जबकि टाइम्स अखबार में ISI, कश्मीरी आतंकवादियों और KAC (कश्मीर अमेरिकन सेण्टर) के "संदिग्ध रिश्तों" के बारे में हजारों पेज सामग्री छप चुकी है… क्या पडगाँवकर साहब अपना ही अखबार नहीं पढ़ते?

४-मीरवाइज उमर फारूक - ये तो घोषित रूप से भारत विरोधी हैं, इसलिए ये तो ऐसे सेमिनारों में रहेंगे ही, हालांकि इन्हें भारतीय पासपोर्ट पर यात्रा करने में शर्म नहीं आती।

५-राजेंद्र सच्चर :- ये सज्जन ही "सच्चर कमिटी" के चीफ है, जिन्होंने एक तरह से ये पूरा देश मुसलमानों को देने की सिफ़ारिश की है, अब पता चला कि गुलाम फ़ई के ऐसे सेमिनारों और कान्फ़्रेंसों में जा-जाकर ही इनकी यह "हालत" हुई।

६ - पत्रकार एवं "सामाजिक"(?) कार्यकर्ता गौतम नवलखा - "सो-कॉल्ड" सेकुलरिज़्म के एक और झण्डाबरदार, जिन्हें भारत का सत्ता-तंत्र और केन्द्रीय शासन पसन्द नहीं है, ये साहब अक्सर अरुंधती रॉय के साथ विभिन्न सेमिनारों में दुनिया को बताते फ़िरते हैं कि कैसे दिल्ली की सरकार कश्मीर, नागालैण्ड, मणिपुर इत्यादि जगहों पर "अत्याचार"(?) कर रही है। ये साहब चाहते हैं कि पूरा भारत माओवादियों के कब्जे में आ जाए तो "स्वर्ग" बन जाए…। कश्मीर पर कोई सेमिनार गुलाम नबी फ़ई आयोजित करें, भारत को गरियाएं और दुनिया के सामने "रोना-धोना" करें तो वहाँ नवलखा-अरुंधती की उपस्थिति अनिवार्य हो जाती है।

7- यासीन मालिक :- ISI का सेमिनार हो, पाकिस्तान का गुणगान हो, कश्मीर की बात हो और उसमें यासीन मलिक न जाए, ऐसा कैसे हो सकता है? ये साहब तो भारत सरकार की "मेहरबानी" से ठेठ दिल्ली में, फ़ाइव स्टार होटलों में पत्रकार वार्ता करके, सरकार की नाक के नीचे आकर गरिया जाते हैं और भारत सरकार सिर्फ़ हें-हें-हें-हें करके रह जाती है।

तात्पर्य यह है कि ऊपर उल्लिखित "महानुभावों" के अलावा भी ऐसे कई "चेहरे" हैं जो सरेआम भारत सरकार की विदेश नीतियों के खिलाफ़ बोलते रहते हैं। परन्तु अब जबकि अमेरिका ने इस राज़ का पर्दाफ़ाश कर दिया है तथा गिरफ़्तार करके बताया कि गुलाम नबी फ़ाई को पाकिस्तान से प्रतिवर्ष लगभग पाँच  से सात लाख डॉलर प्राप्त होते थे जिसका एक बड़ा हिस्सा अमेरिकी सांसदों को खरीदने, कश्मीर पर पाकिस्तानी "राग" अलापने और "विद्वानों"(?) की आवभगत में खर्च किया जाता था। भारत के ये तथाकथित बुद्धिजीवी और “थिंक टैंक” कहे जाने वाले महानुभाव यूरोप-अमेरिका घूमने, फ़ाइव स्टार होटलों के मजे लेने और गुलाम नबी फ़ई की आवभगत के ऐसे “आदी” हो चुके थे कि देश के इन लगभग सभी “बड़े नामों” को कश्मीर पर बोलना जरूरी लगने लगा था। इन सभी महानुभावों को "अमन की आशा" का हिस्सा बनने में मजा आता है, गाँधी की तर्ज पर शान्ति के ये पैरोकार चाहते हैं कि, "एक शहर में बम विस्फ़ोट होने पर हमें दूसरा शहर आगे कर देना चाहिए…।

ऊपर तो चन्द नाम ही गिनाए गये हैं, जबकि गुलाम नबी फ़ई के सेमिनारों, कान्फ़्रेंसों और गोष्ठियों में जाने वालों की लिस्ट दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है, कश्मीर में मानवाधिकार के उल्लंघन(?) और भारत-पाकिस्तान के बीच “शान्ति” की खोज करने वालों में हरीश खरे (प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार), रीता मनचन्दा, वेद भसीन (कश्मीर टाइम्स के प्रमुख), हरिन्दर बवेजा (हेडलाइन्स टुडे), प्रफ़ुल्ल बिदवई (वरिष्ठ पत्रकार), अंगना चटर्जी, कमल मित्रा के अलावा संदीप पाण्डेय, अखिला रमन… जैसे एक से बढ़कर एक “बुद्धिजीवी” शामिल हैं। चिंता की बात यह है कि इन्हीं में से अधिकतर बुद्धिजीवी UPA-2 की नीतियों, विदेश नीतियों, कश्मीर निर्णयों को प्रभावित करते हैं। इन्हीं में से अधिकांश बुद्धिजीवी, हमें सेकुलरिज़्म और साम्प्रदायिकता का मतलब समझाते नज़र आते हैं, इन्हीं बुद्धिजीवियों के लगुए-भगुए अक्सर हिन्दुत्व और नरेन्द्र मोदी को गरियाते मिल जाएंगे, लेकिन पिछले 10 साल में कश्मीर को “विवादित क्षेत्र” के रूप में प्रचारित करने में, भारतीय सेना के बलिदानों को नज़रअंदाज़ करके अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बार-बार सेना के “कथित दमन” को हाइलाईट करने में यह गैंग सदा आगे रही है। ये वही “गैंग” है जिसे कश्मीर के विस्थापित पंडितों से ज्यादा फ़िलीस्तीन के मुसलमानों की चिन्ता रहती है…

इनके अलावा जेएनयू एवं कश्मीर विश्वविद्यालय के कई प्रोफ़ेसर भी गुलाम नबी फ़ई द्वारा आयोजित मजमों में शामिल हो चुके हैं। अमेरिकी सरकार एवं FBI का कहना है कि गुलाम नबी के ISI सम्बन्धों पर पिछले 3 साल से निगाह रखी जा रही थी, ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अमेरिकी सरकार ने भारत सरकार से यह सूचना शेयर की थी? मान लें कि भारत सरकार को यह सूचना थी कि फ़ई पाकिस्तानी एजेण्ट है तो फ़िर सरकार ने “शासकीय सेवकों” यानी जेएनयू और अन्य विवि के प्रोफ़ेसरों को ऐसे सेमिनारों में विदेश जाने की अनुमति कैसे और क्यों दी? बुरका हसीब दत्त, वीर संघवी तथा हेंहेंहेंहेंहेंहें उर्फ़ प्रभु चावला जैसे लोग तो पहले ही नीरा राडिया केस में बेनकाब हो चुके हैं, अब गुलाम नबी फ़ई मामले में भारत के दूसरे “जैश-ए-सेकुलर पत्रकार” भी बेनकाब हो रहे हैं।

यदि देश में काम कर रहे विभिन्न संदिग्ध NGOs के साथ-साथ “स्वघोषित एवं बड़े-बड़े नामों” से सुसज्जित NGOs जैसे AID, FOIL, FOSA, IMUSA की गम्भीरता से जाँच की जाए तो भारत के ये “लश्कर-ए-बुद्धिजीवी” भी नंगे हो जाएंगे…। ये बात और है कि पद्मश्री, पद्मभूषण आदि पुरस्कारों की लाइन में यही चेहरे आगे-आगे दिखेंगे।

इसी मुद्दे पर लिखी हुई एक पुरानी पोस्ट भी अवश्य पढ़ें… http://blog.sureshchiplunkar.com/2008/08/secular-intellectuals-terrorism-nation.html
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विशेष नोट :- मुझे बार-बार गोविन्द निहलानी की फ़िल्म “द्रोहकाल” की याद आ रही है, जिन सज्जन ने नहीं देखी हो, वे अवश्य देखें।

41 comments:

संजय बेंगाणी said...

लश्कर-के-बुद्धिजीवी ज्यादा सही शब्द होगा.
शेष भगवा वाला हूँ, कुछ भी बोलुंगा उससे देश का नुकसान ही होगा #$%ं@ >:

Sanjay Mahapatra said...

सुरेशजी साधुवाद , इतना कुछ लिख देते हैं कि कुछ कहने को शब्द ही ओछे लगते हैं ! बस वाह ....

सुजीत सिंह said...

आप ने सही आकलन किया है ! कुलदीप नैयर का दैनिक जागरण में लेख पढाता हू तो मै भी आश्चर्य में पड़ जाता हू कि क्यों बार-बार पाकिस्तान से बात करते रहने का रोना रोते है | बुड्डा सठियाने से ऊपर कुछ होता होगा तो वही हुआ है कुलदीप नैयर को |

पद्म सिंह said...

बखिया उधेड़ दी है आपने तथाकथित बुद्धिजीवियों की.. आम जनता कैसे जान सकेगी इनकी काली करतूतें

विजय गुप्ता said...

पोंगा पंथियों के इस "अवतार" से ज्यादा सरकार को अपने "वजूद"की चिंता है।फई के फासाने में किराए के बुद्धजीवियों की खाल उतर गयी है।सेकुलरिज्म के इन "कालिदासों" के लिए कश्मीर "पतवार" है और " मनमोहन छाप"चुप्पी इनकी" महानता "को बढ़ा रही है।वरना "स्वामी अग्निवेश छाप" सरकारी ढपोरशंखियों को कश्मीर पर "चिंता"करने का लाइसेंस पाकिस्तान से नहीं मिलता।कांग्रेस के "कलंदरों" की टीम इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती।जानते हैं क्यों.....क्योंकि कांग्रेस में कश्मीर पर वैचारिक ऑपरेशन करके पैसा कमाने का"प्रकोष्ठ"बना ही नहीं है।

Ratan Singh Shekhawat said...

संजय जी ने इनको सही पदवी दी है लश्कर के बुद्धिजीवी

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

श्रीमान शेष नारायण सिंह जी ने भी एक पोस्ट लिखी थी और फिर वह हटा ली, उसके बाद नयी पोस्ट लिखी कि भारतीय एजेंसिंयां गाफिल हैं.
अब यह हृदय परिवर्तन कैसे हुआ? पता नहीं..

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

ओह, अब तो समझ में नहीं आता कि ऐसे लोगों पर क्या टिप्पणियां करें? अब तो गालियों का स्टॉक भी ख़त्म हो गया, पर ये सेक्युलर जमात है कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही|
बहरहाल अमरीका ने तो गिरफ्तारियां कर ली| किन्तु क्या कांग्रेस सरकार ऐसा कोई कदम उठाएगी?
मुझे तो नहीं लगता|

Vivek Rastogi said...

"गुलाम नबी फ़ाई को पाकिस्तान से प्रतिवर्ष लगभग 50,000 से 75000 डॉलर प्राप्त होते थे"

शायद आंकड़ा गलत हो पर सुरेशजी इतने डॉलर किसी भी आम आदमी के लिये वहाँ काफ़ी नहीं होते एक वर्ष के लिये, वह ज्यादा से ज्यादा मध्यमवर्गीय जिंदगी गुजार सकता है, सांसदों और सामग्रियों को खरीदने की बातें तो दूर की हैं और इतने से डॉलर में खरीदना दुरूह है।

लेकिन हाँ कुछ लोगों के नाम तो हमने भी पहली बार पढ़े हैं जो कि इस फ़ेहरिस्त में शामिल हैं।

Rajendra Kumar Singh said...

सुरेश जी आपका यह उत्कृष्ट लेख धर्मनिरपेक्ष लोंगो के मुह पर एक करार तमाचा है| दिल मसोस के रह जाता है इन देशद्रोहियों की करतूत जानकर| इन्ही सब कारणों से महात्मा गाँधी की हत्या की गयी थी पर आज तो इन गद्दारों की बड़ी लंबी फ़ौज हो गयी है|

P K Surya said...

simple hai suresh bhaiya en sabka malik ek hai congres, congres khan gres, mujhe lagta hai aj pure vishwa me sabse gandi gali 'congres' hai. congres bolte he khoon kholne lagta hai.

Man said...

वन्देमातरम सर ,
छद्दम सेकुलर बुधिजिवियो की असलियत उजागर करता लेख @धन्यवाद |धीरे धीरे इन सफ़ेद पोशो के कलंकित चेहरे दुनिया के सामने आ रहे हे |

Suresh Chiplunkar said...

विवेक भाई, यह पैसा गुलाम नबी फ़ई को "सिर्फ़ बाँटने" के लिए दिया जाता था, गुलाम नबी के स्वयं के खर्चे की व्यवस्था "अलग से" होती थी… तथा इस रकम में "बुद्धिजीवियों" के हवाई खर्च और होटल शामिल नहीं है…।
(आप ही सोचिये विवेक भाई, कोई किसी को आने-जाने का खर्च, 5 सितारा आवभगत दे और साथ में अलग से 2000 डालर का लिफ़ाफ़ा भी दे तो वह कश्मीर पर भारत विरोधी राग क्यों नहीं बोलेगा…?) हा हा हा हा हा…

दीपक बाबा said...

बहुत बहुत साधुवाद... सुरेशजी........ एक आम भारतीय के मन में जो गलत फहमियां हैं...... वो खत्म होंगी.. आपके इन लेखों से .


@स्वामी(?) अग्निवेश

क्यों नहीं कोई राष्ट्रीय दैनिक आपकी पोस्टों को छापता..........

Deora Chen Singh said...

good aap jasha loge hai tho thodi asaha rathi hai ki dahs ka kuch asha hoga. vash huma pisha karana ma dash ka jaichand logo ka hi hatha ratha hai.

सञ्जय झा said...

'lashkar-e-buddheejivee'.........wah bhau..........wah......aapke shabd-kosh ke sojanya se '.alon' ko nayab gali dene ki kami nahi hoti....


pranam.

Rajesh said...

Wah Suresh Ji, Kya Jankari Laye Ho. Dhanywad.

Nivesh said...

Aapne achi jaankari likhi hai.Aapki bhasha kaafi sadhi hui hai. Postive bhi hai.

जितेन्द्र सिंह : एक सच्चा भारतीय said...

धन्यवाद सुरेश जी आपका...
आपने सत्य और सटीक लिखा है...

कांग्रेस के सभी प्रशासनिक,राजनीतिक,संवैधानिक पदों पे बैठे तथाकथित देश को चलाने वाले और "खैरातिये" पदों पे बैठे बुद्धिजीवी (बुद्धुमान) में से
कोई दो व्यक्ति हैं जिनकी छवि साफ़-सुथरी,ईमानदार और आदर्शवादी हो.????

अगर किसी के पास जवाब हो तो अवश्य बताइयेगा क्यूंकि अब मुझे शर्म आने लगी है इन "बेशर्मो" की आलोचना करते हुए...
मैं थोड़ी सी प्रशंसा भी करना चाहता हूँ..??

हिन्दुस्तान यानी हिंदुओं का स्थान said...

मित्रों आप सभी को सावधान करना चाहता हूँ ,ये मुस्लिम लोग आपसी प्रेम और भाईचारे का नाटक कर रहे हैं ,सच्चाई ये है की जैसे ही हिन्दुस्तान में इनकी संख्या हिंदुओं से ज्यादा हो जायेगी उसी पल से ये गैर-मुसलमानों का क़त्ल करना शुरू कर देंगे , अभी भी जाग जाओ भारत सरकार, तुम्हे इनका क़त्ल करने को नहीं कह रहा हूँ लेकिन इनकी किसी भी डर और आंतक पैदा करने की गतिविधि को नज़र अंदाज़ मत करो, अरे ! जो करवाई तुम्हे इन साठ सालों में करनी चाहिए थी आंतकवादियों के विरुद्ध वो सिर्फ नरेंद्र मोदी जी ने ही की है , मैं एक गुजराती भारतीय हूँ जो विदेश में रहता है और यहाँ पर आजकल मुसलमानों के इस प्लान के खूब चर्चें हैं की हिंदुओं से संख्या अधिक होते ही उनका कत्ले-आम शुरू कर दिया जाएगा , मैं तो सभी भारतवासियों से अपील करूँगा की अगर भारतीयों को इस साजिश से बचाना है तो प्लीज़ अगले लोक सभा के चुनावों में इस कांग्रेस की नामर्द सरकार को उखाड फेंको और नरेंद्र मोदी जी को प्रधानमन्त्री बनवा दो ताकि इन मुसलामानों की साज़िश फेल हो जाए जय हिंद

हिन्दुस्तान यानी हिंदुओं का स्थान said...

हा हा हा ...............अभी-२ हिजड़े सलीम खान का एक कमेन्ट पढ़ा जिसमें उसने सबूत दिया है की स्वामी रामदेव की लोकप्रियता से उसकी फटी हुई है ,आप भी पढ़िए उसके इस कमेन्ट को -


काँग्रेसी हिन्दुओं द्वारा अत्याचार निंदनीय है। क्रिश्चियन सोनिया और सिक्ख मनमोहन जी को इनके हाथों की कठपुतली नहीं बनना चाहिए या अगर परिस्थिति इसके विपरीत है तो वह भी नहीं होना चाहिए ।

मुझे बाबा की जान ख़तरे में नज़र आ रही है । लोग काँग्रेस से नाराज़ हैं । ऐसे में अगर बाबा को किसी साथ वाले ने महाप्रयाण करा दिया तो अगली सरकार निश्चित रूप से राष्ट्रवादियों की होगी ।


तो देखा आपने ,इस देशद्रोही को स्वामी जी की जान की फ़िक्र नहीं है बल्कि इसे तो इस बात की फ़िक्र है के उस जान की हानि होने पर कहीं इस देश में देशभक्तों की सरकार ना बन जाए और भारत की जनता इनकी रखैल बनी हुई कांग्रेस पार्टी को सत्ता से हटा ना दे

हिन्दुस्तान यानी हिंदुओं का स्थान said...

हा हा हा ...............अभी-२ हिजड़े सलीम खान का एक कमेन्ट पढ़ा जिसमें उसने सबूत दिया है की स्वामी रामदेव की लोकप्रियता से उसकी फटी हुई है ,आप भी पढ़िए उसके इस कमेन्ट को -


काँग्रेसी हिन्दुओं द्वारा अत्याचार निंदनीय है। क्रिश्चियन सोनिया और सिक्ख मनमोहन जी को इनके हाथों की कठपुतली नहीं बनना चाहिए या अगर परिस्थिति इसके विपरीत है तो वह भी नहीं होना चाहिए ।

मुझे बाबा की जान ख़तरे में नज़र आ रही है । लोग काँग्रेस से नाराज़ हैं । ऐसे में अगर बाबा को किसी साथ वाले ने महाप्रयाण करा दिया तो अगली सरकार निश्चित रूप से राष्ट्रवादियों की होगी ।


तो देखा आपने ,इस देशद्रोही को स्वामी जी की जान की फ़िक्र नहीं है बल्कि इसे तो इस बात की फ़िक्र है के उस जान की हानि होने पर कहीं इस देश में देशभक्तों की सरकार ना बन जाए और भारत की जनता इनकी रखैल बनी हुई कांग्रेस पार्टी को सत्ता से हटा ना दे

SAHANIS said...

Why hindu intelletuals don't have action plan to take care of these anti nationalists.
All we need is the action plan.
First wherever they are we should have a protest.
2,. letter campain to party leaders exposing the action of these.
If govt IS SUPPORTING THEM WE NEED TO WRITE AND ACT AGAINST GOVT
iTS TIME WE NEED A NGO GRPOUP HELPING INDIA SECULARISUM.

vijender said...

suresh ji ram-ram
app k chune huy sabdh leshker-e-Budhijibi or jesh-e- secular in rashtdirohio per sahi bethte he/ ese logo ko hamesa in name se pukare/ ese log jo paise k liye desh bachne lag jaye un logo ke liye ek or sabdh he daampanthi/
suresh ji app rashtiye danik samachar , saptahik panchjanya me bhi lekh likhe/ jis se un logo me bhi jagarti fale jo internet ka istemal nahi karte he
shandar lekh ke liye koti-2 shubkamnaye

samta gupta said...

bahut hi sarthak lekh........
apke is lekh se kai secular logo k sachai pure desh k samne lane me kafi madad milegi.
aap iske lie Dhanyawaad k patra hain

Satyajeetprakash said...

इन बेवकूफों के बारे में मैंने भी एक लिखी है- और एस गुरूमूर्ति जी के एक लेख का अनुवाद किया है। ये बेवकूफ लोग देशद्रोह का काम करते रहेंगे और हमारा दुर्भाग्य है कि हम इनके द्वारा शासित होते रहेंगे।
१.http://hrudyanjali.blogspot.com/2011/07/blog-post_25.html
२ http://hrudyanjali.blogspot.com/2011/07/blog-post_6292.html

जीत भार्गव said...

गुरु, अब 'सेकुलरो' का फईवादी चेहरा सामने आ चुका है.
अगर अब भी कोई तथाकथित पत्रकार, बुद्धीजीवी, नेता या मानवाधिकारवादी (?) 'सेकुलरवाद' के नाम पे ज्यादा भौंके और हिन्दुओं को गरियाए तो समझ लेना की वो सेकुलरवादी नहीं बल्कि 'फईवादी' है.

फईवाद की अधिकृत परिभाषा: सेकुलरवाद की आड़ में हिन्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तान का एन केन प्रकारेण विरोध करना. और राष्ट्रघाती हरकते करके देश के दुश्मनों को फ़ायदा पहुंचाना. बदले में पाकिस्तान समेत भारत को दारुल-हरब बनाने को उतारू खाड़ी देशो से जमकर खैरात पाना. कभी चांस मिले तो चर्च से भी फंड का जुगाड़ बिठाना. और खुद को बड़ा सेकुलर घोषित करके सारे सवालों से ऊपर रहना. क्योंकि इस देश में ..''सेकुलर को नहीं दोष गुसाईं.'' वाली बात चरितार्थ है.

सुलभ said...

AUR KYA BATANE KEE JARURAT HAI.
SAB KUCHH AAINE KEE TARAH SAAF HAI.

KYA DESH BACHAANE KEE JIMMEDARI MUTTHI BHAR RASHTRWAADIYON KEE HAI. BAKI KIS HAISIYAT SE KHUD KO BHARTIYA BOLTE HAIN? LAANAT HAI AISE "BUDDHIJIVIYON" AUR "SEKULARON" PAR.

KAANOON AUR ADALAT KO FAURAN KARRWAAHI KARNI CHAAHIYE.

-

अवनीश सिंह said...

स्पष्टीकरण चाहे जो हों; पर इस सूची में अधिकांश लोग सेकुलर बिरादरी के घोषित चेहरे हैं, जो देश में हिन्दू और भारत विरोध का जहर फैला रहे हैं। अब फई की गिरफ्तारी से यह भी सिद्ध हो गया है कि इनके आवास, प्रवास एवं आतिथ्य का प्रबंध कौन करता था? यह प्रकरण हमें व्यक्तिगत और राष्ट्रीय चरित्र पर विचार करने को भी विवश करता है।

peeyushik said...

pata nahi es desh ka kya hoga kuch vote ke liye yehan kya kya nahi hota hai

Anonymous said...

In 1994 then US President Bill Clinton had written a warm letter to Ghulam Nabi Fai. The three-para letter, with an 'auto-signature' of President Clinton began with the unusually friendly 'dear Ghulam' greetings, sparked a major controversy in January 1994 as it suggested a change of US policy towards Kashmir.

Fai was very successful in tilting US policy and opinion towards Pakistan.

Ref: 'Dynamics of human rights in the US foreign policy By Sanjay Gupta' page 187

http://books.google.com/books?id=6-iICinb6cAC&pg=PA187&sig=WxGCTfoTX-b8ZSfAhp5AK1sHCPI&hl=en#v=onepage&q&f=false

Vaneet Nagpal said...

सुरेश चिपलूनकर जी,
नमस्कार,
आपके ब्लॉग को "सिटी जलालाबाद डाट ब्लॉगपोस्ट डाट काम"के "हिंदी ब्लॉग लिस्ट पेज" पर लिंक किया जा रहा है|

Anonymous said...

kaminay hai shalo ko pakistan mehi bhej dena chahiye pata chale unaki kitani hashiyat hai...shale...kaminey..pahele goli inko marni chahiye....

govinda said...

upar likhe budddhijivi secular hain ya sickular?

G.N.SHAW said...

बहुत ही बढ़िया सूचना ! बधाई !

Chinmay said...

अमेरिका खुद भी दूध का धुला नहीं है उसने जान बूझ कर सालों तक भारत में पाकिस्तान की कारगुज़ारियों को नज़रअंदाज़ किया अब जब खुद अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग बिगड़ रही है तो भारत और चीन जैसे एशियाई देशों से निवेशकों को आकर्षित करने के लिए यह दिखावा कर रहा है . यह महज इत्तेफ़ाक़ नही कि फ़ाई को अभी पकड़वाया गया यह केवल एक नाटक था और इस फ़ाई को आज की तारीख में जमानत भी मिल चुकी है.

संतोष त्रिवेदी said...

दुनिया में हर देश की स्व-केन्द्रित नीति रही है,अमेरिका सहित कई मुल्क यही फार्मूला अपना रहे हैं.हम केवल औरों को देखकर सोचते,बोलते और करते हैं.अमेरिका हर काम के लिए सही वक़्त ढूँढता है और दुर्भाग्य से हमारे कुछ लोग जाने-अनजाने उसका मोहरा बन जाते हैं !

Bipin Trivedi said...

is deshko rajkarnio se jyada aise pseudo-secular se bahot bada khatra hai. jo apne aap ko intelligent hone ke khwabme rachte hai aur arundhati roy ka nam sabse uper hai. aise logoko foriegn so fund milta hai ume interest hota hai aur siliye ye sab karte hai

K.R.Baraskar said...

Suresh Jee ek nivedan hai. aap apne blog par POST SHARE tabe lagaye taki aapke post ko ham adhik se adhik logo tak pahuncha Sake..

pawan rathod said...

दलाली करके जीता है - नेताओ का मूत्र पीता है |
स्वामी नहीं बुखारी है - कसाब से रिश्तेदारी है ||
२,अफजल गुरु का भाई है - छल कपट की परछाई है|||
जिस भी मंच पे जाता है - वोही पे छितर खाता है |
मूत की झाग का बुल्ला है - स्वामी नहीं यह मुल्ला है ||
३. सत्ता का दलाल है - अंदर मोटा माल है ||
बुझता हुआ चूल्हा है - हिन्दू नहीं यह मुल्ला है ||
देश को कलंक धोना होगा - नहीं तो बाद में रोना होगा ||
देश भर में शोर है - स्वामी नहीं यह चोर है ||

pawan rathod said...

दलाली करके जीता है - नेताओ का मूत्र पीता है |
स्वामी नहीं बुखारी है - कसाब से रिश्तेदारी है ||
२,अफजल गुरु का भाई है - छल कपट की परछाई है|||
जिस भी मंच पे जाता है - वोही पे छितर खाता है |
मूत की झाग का बुल्ला है - स्वामी नहीं यह मुल्ला है ||
३. सत्ता का दलाल है - अंदर मोटा माल है ||
बुझता हुआ चूल्हा है - हिन्दू नहीं यह मुल्ला है ||
देश को कलंक धोना होगा - नहीं तो बाद में रोना होगा ||
देश भर में शोर है - स्वामी नहीं यह चोर है ||