Monday, May 9, 2011

शर्मनाक बयान, दुविधाग्रस्त भाजपा एवं “वोट बैंक की ताकत” के मायने… North Indian Vote Bank, Raj Thakrey, Raj Purohit

कुछ दिनों पहले मुम्बई की गलियों में पानी-पुरी का ठेला लगाने वाले द्वारा लोटे में पेशाब करने एवं उसी लोटे से ग्राहकों को पानी पिलाने सम्बन्धी पोस्ट लिखी थी, जिसमें मुम्बई की एक जागरूक एवं बहादुर लड़की अंकिता राणे द्वारा की गई “नागरिक पत्रकार” की भूमिका का उल्लेख किया गया था, अंकिता ने उस पानीपुरी वाले को लोटे में पेशाब करते हुए वीडियो में पकड़ा था… (Ankita Rane Mumbai Pani-puri Case)। अंकिता राणे की इस कार्रवाई ने जहाँ एक ओर मुम्बई महानगरपालिका के सफ़ाई एवं स्वास्थ्य अधिकारियों को जनता के कटघरे में खड़ा कर दिया था, वहीं दूसरी तरफ़ राज ठाकरे जैसे नेताओं को उनके “पसन्दीदा”(?) मुद्दे अर्थात “उत्तर भारतीयों को खदेड़ो” पर फ़िर से तलवार भांजने का मौका भी दे दिया था।

अब जबकि राज ठाकरे ने ठेले-गुमटियाँ लगाने वाले उत्तर भारतीयों को “साफ़-सफ़ाई” के नाम पर खदेड़ना शुरु किया तो भला मुम्बई के भाजपा अध्यक्ष राज पुरोहित इस “खेल” में कैसे पीछे रहते? राज ठाकरे को “मात” देने और उत्तर भारतीयों को खुश करने की गरज से एक राष्ट्रीय पार्टी के नेता राज पुरोहित ने अपनी “राजनीति चमकाने” के लालच में एक ऐसा बयान दे डाला, जो उनके गले की फ़ाँस बन गया…


जिस लड़की अंकिता राणे की वजह से सड़कों पर लगने वाले ठेलों की साफ़सफ़ाई व्यवस्था की ओर जनता का ध्यान आकर्षित हुआ, लोगों ने उस लड़की की दाद दी, महानगरपालिका ने उसे ईनाम दिया… उस लड़की की तारीफ़ करना तो दूर रहा, राज पुरोहित साहब ने “वोट बैंक” की तरफ़दारी करने की भद्दी कोशिश करते हुए उस 17 वर्षीय कन्या के चरित्र पर ही छींटे उड़ाना शुरु कर दिया…। मुम्बई के आजाद मैदान में उत्तर भारतीय फ़ेरीवालों की एक आमसभा में “अपनी बुद्धि का प्रदर्शन करते” हुए भाजपा नेता पुरोहित ने कहा – “कोई भी लड़की, किसी आदमी को पेशाब करते हुए देख नहीं सकती… रेडलाइट एरिया की “बाईयाँ” भी पुरुष को पेशाब करते हुए नहीं देख सकती… लेकिन इस लड़की ने न सिर्फ़ इस पानीपुरी वाले को पेशाब करते हुए लगातार देखा, बल्कि उसका वीडियो भी बना डाला, इससे पता चलता है कि लड़की कितने “गिरे हुए चरित्र” की है…यह लड़की पूरी तरह से बेशर्म है…, और यह घटना फ़ेरीवालों एवं उत्तर भारतीयों के खिलाफ़ षडयंत्र है…”


इस मूर्खतापूर्ण एवं बेहद घटिया बयान के बाद मुम्बई के महिला संगठनों ने राज पुरोहित के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया। विभिन्न रहवासी संघ के जागरुक नागरिकों ने भाजपा के इस नेता को गिरफ़्तार करने की माँग भी कर डाली। मौका हाथ आया था, सो लगे हाथों राज ठाकरे ने भी पुरोहित पर जोरदार शाब्दिक हमला कर डाला…। जब मामला बहुत बिगड़ गया और शायद भाजपा के वरिष्ठ नेताओं द्वारा राज पुरोहित को “शुद्ध हिन्दी में समझाइश” दी गई होगी, तब स्थानीय चैनल पर बोलते हुए पुरोहित ने वही कहा जो अक्सर जूते खाने के बाद नेता कहते आये हैं यानी, “मेरे बयान का मतलब किसी को ठेस पहुँचाना नहीं था, मेरे बयान को तोड़मरोड़ कर पेश किया गया है, मैं अंकिता राणे से लिखित में माफ़ी माँगने को तैयार हूँ… आदि-आदि-आदि…"। फ़िलहाल तो अंकिता राणे ने राज पुरोहित के खिलाफ़ 1 करोड़ का मानहानि का दावा पेश कर दिया है एवं कई स्वतंत्र युवा संगठनों ने माँग की है कि राज पुरोहित को उसी पेशाब वाले लोटे से पानीपुरी खिलाई जाये…
(चित्र : विरोध प्रदर्शन के दौरान अंकिता राणे -बीच में)

मुम्बई में “अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने” में भाजपा हमेशा से अग्रणी रही है, पहले तो वह शिवसेना की पिछलग्गू बनी रही, कभी भी “राष्ट्रीय पार्टी” नहीं दिखाई दी, जब-तब बाल ठाकरे के धमकाने पर राजनैतिक समझौते किये। अब जबकि शिवसेना कमजोर पड़ती जा रही है और राज ठाकरे ज़मीनी स्तर पर मजबूत हो रहे हैं तो उन्हें “अपने पाले” में लाने और राज्य में पकड़ मजबूत बनाने की बजाय, उटपटांग बयानबाजी करके उससे मुकाबला करने के मंसूबे बना रहे हैं…। जबकि अन्त-पन्त होगा यही कि “खून, खून को पुकारेगा…” और भविष्य में शिवसेना-मनसे का विलय हो जाएगा, तब भाजपा न घर की रहेगी न घाट की। कुछ समय पहले राज ठाकरे को, मुम्बई भाजपा ने अपने दफ़्तर में आमंत्रित किया था और चाय पार्टी दी थी। इनके बीच कोई खिचड़ी पकती, इससे पहले ही बाल ठाकरे ने “सामना” में भाजपा को गठबंधन धर्म की याद दिलाते हुए शिवसेना स्टाइल में लिख मारा कि “एक के नाम का मंगलसूत्र गले में हो तो दूसरे से चूमाचाटी नहीं चलेगी…”, और भाजपा वापस दुम दबाकर चुप बैठ गई। फ़िर यह पानीपुरी वाला मामला सामने आया, तो भाजपा को लगा कि राज ठाकरे उत्तर भारतीय फ़ेरीवालों की ठुकाई कर रहे हैं… चलो इस वोट बैंक को लपक लिया जाए… परन्तु यहाँ भी राज पुरोहित के मुखारविंद से निकले बोलों ने उसका खेल बिगाड़ दिया।

खैर इस प्रकरण ने एक बात साफ़ कर दी है कि यदि कोई समूह अपना मजबूत “वोट बैंक” बनाता है तो उसे खुश करने और उनके वोट लेने के लिये नेता नामक प्रजाति “कुछ भी” करने, "किसी भी हद तक गिरने" को तैयार रहती है। मुम्बई में उत्तर भारतीयों का खासा बड़ा वोट बैंक है और उसे खुश करने के चक्कर में एक मासूम लड़की के चरित्र पर शंका तक ज़ाहिर कर दी गई, यदि मुम्बई के नागरिक और महिला संगठन जागरुक नहीं होते और वक्त पर आवाज़ न उठाते, तो उस बहादुर लड़की को बेहद मानसिक संताप झेलना पड़ता…।

61 comments:

महाशक्ति said...

सुरेश जी यह इतना बड़ा मुद्दा नही था‍ कि इस पर आपकी कलम चलनी चाहिये थी, उस चाट वाले का काम गलत था किन्‍तु इस विडियो के बाद जिस प्रकार मनसे का आक्रमण उत्तर भारतीयो पर हुये क्‍या वे सही थे? क्‍या महाराष्ट्रियन ही बहुत साफ पंसदगी है? क्षेत्रवाद और जातिवाद की राजनीति करने वालो को लताड़ा जाना चाहिये।

इस लड़की ने बढि़या काम किया किन्‍तु ऐसे कथानको को ऐसे सार्वजनिक करना ठीक नही था इससे तो काफी बेगुनाह लोग भी फंस गये। रही बात यह काम कोई महाराष्ट्रियन भी महाराष्‍ट्र मे ही कहीं न कही कर रहा होगा।

Suresh Chiplunkar said...

प्रमेन्द्र भाई,
महाराष्ट्रीयन / गैर महाराष्ट्रीयन अथवा सफ़ाई पसन्द होना या न होना, वाला मुद्दा अलग बात है…
यहाँ मुद्दा यह है कि मुम्बई भाजपा अध्यक्ष जैसे पद पर बैठे व्यक्ति को इतनी ओछी बातें करना चाहिये? तथा राज ठाकरे को मात देने के लिये स्वयं भी क्षेत्रवाद की राजनीति में बयानबाजी करना चाहिये? खासकर तब, जबकि भाजपा खुद को राष्ट्रीय पार्टी कहती है…।

S C Mudgal said...

AISE NETA KA SIRF ISTEEFA HI IS GHAW KO BHAR SAKTA HAI JO UNKE STATEMENT SE LAGA HAI,

S C Mudgal said...

sharmnaak bayan aur isteefa hi ekmaatra malham is statement per.

महाशक्ति said...

जब आप राष्‍ट्रीय स्‍तर के दल है तो आप किसी महानगर स्‍तर के कार्यकर्ता व नेता को पार्टी की राष्‍ट्रीय छवि से नही जोड़ सकते है। यह उस व्‍यक्ति की व्‍यक्तिगत विचार हो सकते है और ऐसे बायान के लिये भारतीय दंड सहिता की धारा 499 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज करवाना चाहिये।
भाजपा दूध की धुली नही है किन्‍तु आपकी किसी भी कार्यकर्ता के बायान को पार्टी के बायान नही कहा जा सकता है।

यह बात इसलिये गम्‍भीर रूप लिया क्‍योकि इसका सम्‍बन्‍ध उत्तर भारतीय से था यदि यह चाट वाला उत्तर भारतीय न होता तो न मनसे कोई कार्यवाही करती और नही भाजपा नगर अध्‍यक्ष को ऐसे बायान देने पड़ते।

Suresh Chiplunkar said...

प्रमेन्द्र भाई, सारा खेल सिर्फ़ और सिर्फ़ वोट बैंक से जुड़ा है…।

संजय निरुपम और कृपाशंकर जैसे नेताओं के रहते भाजपा को मुम्बई में कभी भी उत्तर भारतीय वोटरों के वोट नहीं मिल पाते हैं। अतः वोटों की खातिर, इस मुद्दे पर फ़ेरीवालों का सम्मेलन आयोजित करना और उसमें इस प्रकार के निचले स्तर की बात कहना भाजपा नेता को शोभा नहीं देता…। पुरोहित जी कोई "मामूली कार्यकर्ता" नहीं हैं, मुम्बई भाजपा का अध्यक्ष अपने-आप में एक हस्ती होता है।

जहाँ तक केस की बात है वह तो दर्ज किया जा चुका है तथा भाजपा इन "महोदय" का इस्तीफ़ा लेने में जितनी देर करेगी, उतना पछताएगी। उत्तर-दक्षिण सब धरा रह जाएगा, महिलाओं के वोट मिलने मुश्किल हो जाएंगे…

vijay jha said...

सुरेश जी, लेकिन सत्य तो यही है, की इस लड़की की विडियो के कारन हीं राज ठाकरे द्वारा मुंबई में आज उत्तर भारतीय पिटा जा रहा है ! यदि आक्रोश में किसी नेता ने लड़की के बारे में कोई अशब्द कह दिया तो, इसमें इतनी उबाल खाने की क्या जरूरत है ? क्या किसी एक लड़की की अश्मिता एक समाज की अश्मिता से ऊपर है ?

सागर नाहर said...

प्रेमेन्द्र जी के कमेन्ट से आश्चर्य हुआ। क्या महाराष्ट्रियन बहुत ही साफ पसंदगी है? इस प्रश्न की उम्मीद कम से कम प्रेमेन्द्रजी से तो नहीं की जा सकती, और इस पोस्ट से इस प्रश्न से कोई लेना भी नहीं था।
राज पुरोहित ने अंकिता के लिए जो अनर्गल प्रलाप किया वह उनके घर में बैठ कर नहीं बल्कि एक रैली को संबोधित करते समय किया था यानि वे उस समय बतौर भाजपा के नगर अध्यक्ष की हैसियत से बोल रहे थे। यहाँ ये नहीं कहा जा सकता कि ये उनके व्यक्तिगत विचार थे।

सागर नाहर said...

अप राज ठाकरे से नहीं निबट सकते इसका मतलब ये नहीं है कि राज पुरोहित की गलतियों के लिए आँखें मूंद ली जाए।

सागर नाहर said...

॒@vijay jha
उत्तर भारतीय पिट रहे हैं इसमें अंकिता की क्या गलती? क्या उसे पानी पूरी वाले के कामों को उजागर नहीं करना चाहिए था। ये तो वह बात हो गई कि आप धोबी से ना जीत सके तो गधे के कान खींचों।

Suresh Chiplunkar said...

@ विजय झा - "…क्या किसी एक लड़की की अश्मिता एक समाज की अश्मिता से ऊपर है?…"

पुरोहित का यह बयान "एक लड़की" पर नहीं बल्कि प्रकारान्तर से सभी जागरुक महिलाओं पर है और निश्चित ही घटिया मानसिकता वाला है…। जनसंख्या के पचास प्रतिशत की इज्जत, किसी एक समाज से बड़ी ही होगी ना… :)

Suresh Chiplunkar said...

गलती राज ठाकरे और राज पुरोहित की है… अंकिता की नहीं…

ePandit said...

इस प्रकरण से एक बात साफ हो गयी नेता नामक जीव का कोई ईमान-धर्म नहीं होता।

Ratan Singh Shekhawat said...

राजपुरोहित का यह बयान निंदनीय व बचकाना है यदि भाजपा में थोड़ी ही नैतिकता है तो इस व्यक्ति को पार्टी के बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए | इस तरह के नेताओं ने ही भाजपा का बेड़ा गर्क किया है | इस नेता को उचित सजा मिलनी चाहिए |

सुलभ said...

राजनीति और राजनीति प्रदर्शन दोनों घटिया हो चुके है. जाने किस किस गली में घूम जाए. और किसे कब बदनाम कर जाए.

एम सिंह said...

ऐसे नेता तो ............

. oyal said...

suresh ji, upar se aapne kuch bhi likha ho parantu andar se kahin na kahin aapake bhi kattar maharashtrian hone ki boo aa rahi ahi. Comments par jitne reply aapne is mudde par de diye utne to bade se bade mudde par bhi nahin dekha. Post ke virodh me comments ko Itna personaly lene ki kya jaroorat thi. Vaise bhi aapse is tarah ke post ki ummid nahi thi. Kya itne din se isee tarah ki khoj me lage hue the. Koi thes pahunchi ho to kshama kare. Vaise main aapaka bahut bada prashanshak hoon. K.goyal

अहमक पंडित said...

अबे काठ के उल्लुओं सुरेश जी के मूल मुद्दे की अनदेखी करके कुछ भी उल जलूल लिखे जा रहे हो मूल बात समझने की चेष्टा ही नहीं कर रहे हो की भाजपा के नेता कांग्रेसियों के भी बाप बनने का प्रयास कर रहे हैं वोट बटोरने की खातिर. इनमे भी उतने ही जूते लगाए जाएँ जितने कांग्रेसियों में लगाने की हम लोगों ने अगले चुनाव का लिए कर रखी है.

अहमक पंडित said...

और एक बात और यह पोस्ट आप लोगों को हलकी क्यों लग रही है और इसमें क्षेत्रवाद की बात कहाँ से आ गयी सरेश भाई तो उज्जैन के हैं ना की महाराष्ट्र के भले ही वे जात से महाराष्ट्रियन हो.

भारत स्वाभिमान - 4 जून दिल्ली said...

ये पोस्ट मे नमक और मिर्च कम है ! लेकिन यह पोस्ट मुल्लों के लिए टेस्टी है

Nageshwar said...

मैं काफी समय से आपके ब्लॉग पर आता रहा हूँ और भले मैं आपके विचारों और आपकी विचारधारा से सहमत नहीं हूँ, पर आपके लेखों से इतना ज़रूर कह सकता हूँ की भले आप हिंदुत्व का राग अलापे पर गहराई में आपकी मानसिकता क्षेत्रवाद और जातिवाद से पूर्ण रूप से ग्रस्त हैं! जहाँ आप कश्मीर में अलगाववाद के विरुद्ध पूर्वोत्तर में अलगाववाद और धर्म परिवर्तन के विरुद्ध राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का झंडा उठाते हैं वहीँ दलित को आरक्षण आपसे सहन नहीं होता! अखंड भारत की बात आप करते हैं पर भारत के अन्य कोनो से जीवन यापन हेतु महानगरों, विशेषकर बॉम्बे (जान-बूझकर मुंबई नहीं लिख रहा हूँ) अन्य भारतीयों पर नौकरी रोजगारी छीनने का आरोप लगा कर उनके साथ किये गए हिंसक घटनाओं को भले ही आप सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करते हो परन्तु इतना अवश्य हैं की आप इनका मौन रूप से समर्थन तो करते ही हैं! आप कहते हैं की राज ठाकरे की मंशा (गैर-मराठियों को बॉम्बे या महाराष्ट्र आने से रोका जाये) ठीक हैं पर तरीका गलत हैं! ऐसा कैसे हो सकता हैं की मंशा ठीक हैं और तरीका गलत? अगर तरीका गलत हैं तो मंशा ही गलत हैं! दलितों को आरक्षण दिए जाने का विरोध और ब्राह्मणों की तथाकथित "दुर्दशा" की आप बात करते हैं तो आपका जातिवाद से पूर्ण पाखंडी सोच स्वयं उजागर हो जाती हैं! आजकल मंत्रालयों में, न्यायपालिका में, प्रशासन में, राजनीति में, मीडिया में ब्राहमणों का बोलबाला हैं पर यह आपको नहीं दिखता? कुछेक गरीब ब्राह्मणों का विडियो दिखा कर आप साबित करते हैं की आज दलित नहीं ब्रह्मण ही असली दलित हैं! गरीब तो आपको हर जाति में मिल जायेंगे, पर आप ब्राह्मणों की ही बात करते हैं? क्या यहीं हैं आपका हिंदुत्व जिसका बिगुल आप अपने ब्लॉग पर बजाते हैं?

जहाँ तक आपके फासीवादी हिंदुत्व के पाखण्ड की बात हैं तो कुछेक बात का ज़िक्र कर दूं!

१. आर.एस.एस की विचारधार हिंदुत्व की न होकर केवल ब्राह्मणवादी विचारधारा हैं!
२. आर.एस.एस वाले हिंदुत्व की बात इसीलिए करते हैं क्योंकि ब्राह्मणों द्वारा बनायीं गयी इस संस्था को ब्राह्मणों के खोते हुए वर्चस्व को बचाना था!
३. जनसंघ, भाजपा के नेता इत्यादि भी ब्राह्मणवाद से ग्रस्त थे! अन्य जातियों के लोग इनसे आगे आये यह इनको पसंद नहीं! अटल बिहारी बाजपाई जो सबसे बड़ा बे-शर्म ब्राह्मणवादी व्यक्ति था, उसने तहलका काण्ड में ब्रजेश मिश्र को केवल इस लिए बचाया क्योंकि वह ब्राह्मण था!

जितने जल्दी आपके पाठक आपकी दोगली, पाखंडपूर्ण मानसिकता को समझ जायें उतना ही अच्छा हैं!

इस टिपण्णी को छापे या न छापे, अपने विचार व्यक्त करने के लिए धन्यवाद!

RAJAN said...

बहुत ही निंदनीय बयान.

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि अंकिता राणे पर कीचड़ उछाला जा रहा है, इसके लिए जो भी नेता दोषी है उसे सजा मिलनी चाहिए.

एक बात जरुर कहना चाहूँगा कि - ये पिसाब वाली गन्दी हरकत यदि किसी मराठी मानुष ने की होती तो क्या मानसे, राज ठाकरे और उनके सुसंस्कृत supporters, उसके साथ भी वही सलूक करता जो उसने उत्तर भारतीय चाट वाले के साथ की ?

मेरे कहने का तात्पर्य ये कदापि नहीं है कि उत्तर भारतीय चाट वाले कि पिटाई नहीं होनी चाहिए थी पर उसके साथ-साथ हजारों बेगुनाह उत्तर भारतीय भी तथाकथित सुसंस्कृत मराठी मानुष की गुंडा गर्दी का शिकार बने ये कहाँ का न्याय है?

मानसे और मराठी मानुष की गन्दी राजनीति का खेल इस हद तक बढ़ चुका है कि - किसी भी सार्वजनिक स्थान पे तथाकथित सुसंस्कृत मराठी मानुष एक निर्दोष उत्तर भारतीय का अपमान किसी भी समय कैसे भी कर सकता है. भलाई इसी मैं है कि अपमान का घूंट पि कर चुप रह जाओ नहीं तो तथाकथित सुसंस्कृत मराठी मानुष (मानसे) से अपनी धुनाई करवा लो !!!!!

मेरी ऐसी धारणा है कि कितना भी पक्का हिंदूवादी हो पहले वो मराठी, बिहारी, बंगाली .... आदि है.. हिन्दू तो वो अंत में है ! ऐसी मानशिकता से हम हुन्दुत्व की लड़ाई कैसे लड़ेंगे ?

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

मेरी ऐसी व्यक्तिगत धारणा है कि इस आलेख से आपको बचना चाहिए था, इस आलेख से कईयों के मन में गलत धारणा बैठ सकती है की आप पहले मराठी हैं फिर हिन्दू.

Abhishek said...

यहाँ बात मराठी या गैर मराठी की नहीं है. किसी का अंध सर्मथन करना या खिलाफत करना गलत है. बीजेपी के वरिष्ठ नेता का यह बयां केवल ओछी सोच का नतीजा है. अंकिता ने एक अच्छा कम किया था इसमे कोई दोराय नहीं है और उस अच्छे काम का गलत फायदा राज ठाकरे ने उठाया. इस लेख में केवल अंकिता का समर्थन किया गया है नाकि राज ठाकरे का, जो किसी भी हालत में गलत नहीं है. और एक बात मुझे आज तक समझ नहीं आया मुझे मराठियों का समर्थन करना चाहिए या यूपी/बिहारियों का. मेरे पापा यूपी से है और मॉम नागपुर से और जब भी यूपी/बिहारी और मराठियों की बात होती है मुझे बड़ा दुःख होता है भाई ही भाई से लड़ रहा है.

Manish Bhukar said...

bahut achchha Nageshwar bhai me hindutav ko pasand karta hu lekin brahamanwad ko nahi

Arun Suren said...

we have so called "hindu's political parties and "hindu" politicians are nothing but hoax and mirage for bharatvarsh and hindus...this time is not better than muslim terror for 600 years and british atrosity for 200 years, two wild dogs are fighting for terretories and ego,. at same time italian pussy cat gets all bebefits....
Jay Shri Ram..
Jay Bharat

kumarbiswakarma said...

सुरेश जी प्रणाम ,

मैं बिच में आप का कोई लेख नहीं पढ़ पाया , काफी वक़्त के बाद आज नेट पे बैठा ! सारे नेता एक जैसे ही है चाहे भ्रष्ट भाजपा हो , चाहे कमीने कांग्रेस हो , चाहे मुर्ख मनसे हो सब एक थाली के है ! अच्छे लोगो के लिए एक कहावत है - हम पंछी एक डाल के , लेकिन इन कमीने नेताओं के लिए कहना पड़ेगा " हम कुत्ते एक गली के ".......... इन के बारे में पढ़ कर अब तो मन घृणा से भर जाता है !

MAHESH said...

aaj bharat brahmin aur rajpooto logo ke karan bachi hai na ki anya logo ka iska profit lena chaiye sare log ghar main bethe the yaha tak dalito ka masiha dr . baba saheb bhi

duniya aur bharat main sabse pehla deshbhakt chanakya jo brahmin tha jiska apman hua to bharat ki history badal gayi , chandra shekar azad , swami dayanand , jagad guru shankaracharya , ramkrishna paramhansh , aur ram prasad bismil aur naam ginaunga na to poora page bhar jayega aur aaj log hindutva ki baat kar rahr hai acha hai par rajpoot aur brahmin aur sikh ye hi logo ne maihnat ki baki log malayi kha rahe hai aur brahmin ko gali dete hai par murkho ko isi baat se pata chal jana cahiye ki aaj bhi brahmin apni yogta se naukri pata hai na bheekh main mile hue arakshan se bheekh main padhi (study) aur naukri bina talent ke jindgi bheekhmango ko mubarak ho

Anonymous said...

सुरेश जी की बातों का गलत अर्थ लगाया जा रहा है. सुरेश जी हिंदुत्व के समर्थक और हिंदुत्व मतलब भारत की सभी भाषाएँ , सभी प्रान्त.
एक बात समझ में नहीं आती. उत्तर भारतीय महाराष्ट्र में ही नहीं गुजरात में भी काफी बड़ी संख्या में होंगे, पर आज तक ये नहीं सुना कि गुजराती लोगों ने उत्तर भारतीयों को गुजरात आने से रोका हो या उनको गुजरात में मारा पिटा हो या उनको गुजराती भाषा सख्ती से अपनाने के लिए बोला हो.
ऐसा क्यों ?
मेरे प्रश्न का ये मतलब ना समझा जाये कि में गुजरात में भी उत्तर भारतीयों का अपमान चाहता हूँ. आखिर गुजरात और महाराष्ट्र में जो राज्य एक दुसरे से लगे हुवे हैं , उत्तर भारतीयों से इतना बड़ा फर्क कैसे हो रहा है. आखिर इस फर्क की जड़ क्या है.

उम्दा सोच said...

हे सुधि नेतागण शर्म शर्म !!!

निर्झर'नीर said...

" Nageshwar "

ji
If u don,t like suresh chiplunkar's thoughts then u need to raise your mental level

Mahendra Gupta said...

Nageshwar ji aap ka kahana ek had tak sahi hia. Ki Bramhino Ne Jati wad ka mahol bana ka is desh ka bahut nuksan kiya hai. Lekin yah Bhi sochiye Bahut se brahmano ne iska virodh bhi kiya hai aur bahut se sudhar unke dwara hi kiya gaya. main brahman nahi hu. lekin jo sach hai vahi kahana chata hu. Hindu dharm hamesha sudhar ko apanata hai. Hum abno ko sahi kar saketa hain. Aur wo sudhar rahen hain. Lekin hamare ghar me kami hai to dusare ghar ke log kaise sudhar sakete hain. We (dusere dharm ke log) hamara bhala kyo sochenge. Jab bhi hoga Hindu hi hindu ke baare me sochega. Hindu dusaro ke bare me bhi socheta hai jaisa aap sochate hain. Ye soch achhi lagati hai. yahi hindu dharm ki mahanta hai ki wah dusare dharm ke logo ke bare me (gar dharm ka hote huwe bhi) sochati hai aur sochane deti hai. ab aap ye bataye dusere dharm ke log kitne hain jo hindu ko Hindu rahate huve unka sath deta hain. Kisi kanvent school me jao to ve kahate hain tum kristian ban jao to tumahara fees sab maf ho jayega. We aise hindu ko hindu rahate kyo nahi karte.

ROHIT said...

अंकिता राणे अपनी जगह बिल्कुल सही है.
पुरोहित का बयान अक्षम्य है.
और अब बात करु राज ठाकरे की.
वो तो इंसान कहलाने के लायक नही है.
बस इतना कहूंगा कि अगर राज ठाकरे की तरह कोई नेता यूपी आदि मे इस तरह का जहर घोलता और कहता कि यूपी मे अन्य राज्यो के लोग नही आ सकते.
तो सबसे पहले यूपी की जनता ही उसको जूते मारती .और उसका राजनीतिक भविष्य चौपट कर देती.
लेकिन मुंबई के लोगो ने ऐसा नही किया उन्होने उस राज ठाकरे को बढ़ावा दिया और 13 सीटो पर जिता दिया . और उसको ये संदेश दिया कि वो सही राजनीति कर रहा है. जब कि
उत्तर भारतीय लोग ज्यादा समझदार थे और वो समझ चुके थे कि राज ठाकरे सत्ता के लालच मे ऐसी गंदी राजनीति कर रहा है.
अन्यथा वो भी उत्तर भारत मे रह रहे मराठियो पर हमला कर सकते थे.
लेकिन उन्होने ऐसा नही किया क्यो कि उनके अंदर ऐसी भावना थी कि यूपी ,बिहारी मराठी बंगाली पंजाबी गुजराती सब एक ही है इनमे कोई फर्क नही है. जैसे किसी एक पिता के क ई पुत्र जो सगे भाई होते है. अलग अलग स्वभाव रखते है कोई गणेश जी का भक्त होता है तो कोई शंकर जी का तो कोई काली माता का.
किसी को पनीर पसंद होता है तो किसी को दाल चावल और किसी को डोसा आदि.
कोई गरम स्वभाव का होता है तो कोई शांत स्वभाव का.
कोई कुर्ता पैजामा पहनता है तो कोई पैँट शर्ट और कोई धोती कुर्ता.
लेकिन उन सबका रिश्ता तो खून का होता है. उसमे कोई भेद नही होता.
वैसे ही भारत के सभी लोग अलग अलग खानपान व पहनावा होते हुये भी सगे भाई है.और उनके बीच मे भी सगे भाईयो जितना प्यार है.
और हम सब हिँदु है.

यही भावना मुंबई की जनता को भी मन मे लाकर हिँदुत्व को खोखला करने वाले राज ठाकरे को जूतो से मारना चाहिये.
जिससे हिँदुत्व और मजबूत हो.
और आने वाले चुनावो मे इस जयचंद्र राज ठाकरे को वोटो के लिये तरसा देना चाहिये.

Anonymous said...

siv sena pahle south indian ke naam per rajneti karati thi. jab siv sena ke tukade hogay to raj( mistary in up /bihar) ne apni rajniti chamkane ke liye north indian ko target kiya..inlogo ko marathi manush se koi matlab nahi hai..ye to sirf apna vote dekhate hai.
raj/bal ki income ke source kya hai? kissi ko pata hai..gundon ki party hain.

Prem Yadav said...

Raj Purohit Ko BJP Bahar Ka Rasta Dikhaye. Ankita Ne Bahut Achha KAm Kiya. Main Bihar KA Rahne Wala Hoon. Bihar Ki Ladkiyan Itni Bahadur Nahi Hoti. Bihar Wale Apne YAhan Mahilaon Ko Daba KAr Rakhte Hain.

Indra said...

हिन्दू समाज को जागरूक करने की बहुत सारी बातें आप के लेखन से पता चलती हैं , लेकिन अब आप के लिए आत्ममंथन का समय आ गया है.
नीचे लिखी कुछ बातों पर गौर करें |
१. हिंदुत्व एक संकीर्ण विचारधारा है ( आज के समय के हिसाब से इसमें बहुत अधिक सुधार की आवश्यकता है ) जो कि संघ ने स्वामी दयानंद सरस्वती , स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविन्द घोष के धार्मिक और आध्यात्मिक विचारों को सावरकर के उन्मादी प्रतिपादन से जोड़कर बनाई है | ये कुछ इस प्रकार है जैसे कि हमारा संविधान पुराना पड़ गया है और उसे बदले जाने की जरुरत है |

२.यहाँ पर हिंदुत्व की तुलना भारतीय संविधान से अवश्य कर रहा हूँ पर संविधान अपने तमाम दुर्गुणों के बावजूद प्रत्यक्ष रूप में फासीवाद को प्रोत्साहन नहीं देता लेकिन हिंदुत्व की विचारधारा वरुण गाँधी जैसे लोगों को election campaigning करने की खुली छूट देती है | कांग्रेस कितनी भी गिरी पार्टी हो पर वो भी ऐसा कुछ प्रत्यक्ष रूप में करने और उसका श्रेय लेने से बचती है जैसे दिग्विजय सिंह की अनर्गल बयानबाज़ी को कांग्रेस के बड़े नेता उनके निजी विचार बता कर कन्नी काट जाते हैं पर भाजपा वाले तो फासीवादी बातों पर श्रेय लेने के लिए लाइन लगाने से नहीं चूकते. |

3. भाजपा और संघ विशेषकर भाजपा के प्रति आप का पूर्वाग्रह स्पष्ट रूप से झलकता है |

४ . जिन समस्याओं के बारे में आप नहीं समझते उनके बारे में कम से कम कोई पूर्वाग्रह तो नहीं रखना चाहिए जैसे दलित और पिछड़े वर्गों को आरक्षण और क्षेत्रीय मानसिकता और राजनीती, लेकिन व्यापक हिन्दू समाज की समस्याएं ये नहीं हैं और न ही धर्म परिवर्तन और सांप्रदायिक तुष्टिकरण को ही इतनी बड़ी समस्या माना जा सकता है ये तो सिर्फ Quantitative Problems हैं न कि Qualitative Problems पर जो हैं हिन्दुत्ववादी कभी उस पर लिखने की सोचते ही नहीं हैं जैसे हिन्दू समाज में वैज्ञानिक दर्शन का पिछले १५०० वर्षों में लोप हो जाना , लोकतान्त्रिक मूल्यों में हिन्दू समाज कम समझ, हिन्दू समाज का आधुनिक शिक्षा और सामाजिक मूल्यों को न समझ पाना , वैश्विक सन्दर्भ में हिन्दू समाज के मूल्यों से दुनिया को परिचित न करा पाना इत्यादि हैं...............

५. ध्यान दीजिये हमें भारत को एक आधुनिक लोकतान्त्रिक देश के रूप में ढालना है न कि असभ्य और जंगलीपण के प्रतीक के रूप में | ...........जारी.....

Nageshwar said...

प्रथम में मेरी टिप्पणी छापने के लिए धन्यवाद | अब मैं आपके कुछ प्रशंसकों की टिप्पणी का उत्तर देना चाहूंगा | प्रथम में महेश द्वारा उद्वित किये गए कुछ वाक्य (क्योंकि उनके वाक्य पढ़ कर लगा वह कुछ कहना चाहते थे भले ही उसमे नाम-मात्र का विचारांश हो |) महेश बोलते हैं की ब्राह्मण अपनी योग्यता के बल पर नौकरी पाता हैं | यह विचार सर्वथा गलत हैं और जातिवाद से प्रेरित | ब्राह्मणों में भाई-भतीजावाद, जातिवाद और अपनी ही जाति वालों को फायदा दिलाना और प्रोहत्साहन देना अन्य जातियों की तुलना में सबसे ज्यादा हैं | इन लोगों ने तो अपनी जात के सबसे निठ्ठले, अकुशल, मूर्ख सदस्यों को भी फायदा दिलाया | ब्राह्मणों ने केवल अपने फायदे के लिए न केवल चापलूसी, जी-हुजूरी और फायदे पाने के लिए अन्य निकृष्ट कर्म करने से भी पीछे ही नहीं रहे बल्कि समय आने पर अन्य जातियों की पीठ पर छुरा भी भोंका! प्रयाग हो या वाराणसी या अन्य हिन्दू तीर्थस्थल, पण्डे-पुरोहित तो गरीब से गरीब व्यक्ति का कर्मकांड के बहाने खून चूसने (धन लूटने) से भी नहीं चूकते | हसन अली के मुद्दे पर अमलेंदु पाण्डेय (एक और ब्राह्मण) पर चिपलूनकर जी की कलम खामोश हैं, यह वह ब्राह्मण हैं जिसने हसन अली को नकली पासपोर्ट बनाने में मदद की | क्योंकि उन्हें फासीवादी हिंदुत्व विचारधारा को पोषित करने के लिए हसन अली (एक मुसलमान) को निशाना बनाना ज्यादा फायदा का हैं | ब्राह्मणवादी आर. एस. एस. वाले शिवाजी का अफज़ल खान की लड़ाई को हिन्दू-मुस्लिम द्विंद के रूप में प्रस्तुत करते हैं पर यह जान-बूझकर नहीं बोलते की अफज़ल खान की तरफ से कृषणजी भास्कर कुलकर्णी (एक ब्राह्मण) ने शिवाजी पर वार किया और उन्हें ज़ख़्मी किया | यह तो छोड़िये, शिवाजी को हिंदुत्व का गौरव प्रतीक बताने वाले ब्राह्मणों ने शिवाजी की ताजपोशी भी नहीं की | पर यह सब ब्राह्मण लोग अन्य हिन्दुओं को नहीं बताएँगे | अब देखिये, जब बुद्ध, महावीर ने धार्मिक रीतिरिवाजों के विरुद्ध आवाज़ उठाई तो बुद्ध एवं महावीर के मार्ग पर चलने वालों को अलग कर दिया गया | कुटिल ब्राह्मणों ने बुद्ध का उपहास बनाने के लिए "बुद्धू" अपशब्द का निर्माण किया | जब बौद्ध धर्म का वर्चस्व बाधा तो बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित कर दिया गया | अगर ब्राह्मणों ने हिन्दू धर्म में सुधार के कार्यकर्म चलाये तो वह केवल हिन्दू धर्म में उनके घटते वर्चस्व को बचने हेतु ही था |

चिपलूनकर साहब और उनके प्रशंसक बड़े जोर-शोर से कश्मीर में धारा ३७० हटाने की मांग करते हैं कहते हैं की अन्य भारतियों को कश्मीर में ज़मीन जायदाद खरीदने की आजादी होनी चाहिए पर जब बात महाराष्ट्र की आती हैं तो बाल/राज ठाकरे के गुंडों द्वारा गरीब और निचले तबके के अन्य भारतीयों पर की गयी ज्यादतियां पर वह चुप्पी साध लेते हैं और कहते हैं ठाकरे की मंशा ठीक हैं | क्या यह हैं आपके तथाकथित राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का सच? राष्ट्रवाद और हिंदुत्व जैसे भावनात्मक मुद्दों को लेकर जनता को गुमराह करके समाज में अपना प्रभाव और वर्चस्व बढाने की कुटिल मंशा हैं क्योंकि अगर तार्किक धरातल पर जब बात होती हैं तो अपनी कहीं बात अक्सर अ-तार्किक लगाने लगती हैं | इसिलए राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की भावनाओ को भड़काते रहिये और अपना फायदा सोचते रहिये |

अपने विचार प्रस्तुत करने का अवसर देने के लिए धन्यवाद |

Suresh Chiplunkar said...

@ नागेश्वर जी -

1) आपने अपना प्रोफ़ाइल भी सार्वजनिक नहीं किया है और न ही मुझे यह पता है कि आप वाकई "नागेश्वर" ही हैं या कोई और।

2) हालांकि आपके आरोपों का जवाब देना आवश्यक नहीं है, फ़िर भी मुझे यहाँ स्पष्टीकरण देना जरूरी लगा। आरोपों का जवाब देना इसलिये आवश्यक नहीं है क्योंकि जिस तरह आप मुझे हिन्दुत्व के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त बता रहे हैं, ठीक वैसे ही बाकी की चार उंगलियाँ आपकी तरफ़ भी हैं और टिप्पणियों से साफ़ जाहिर है कि आप स्वयं भी "ब्राह्मण विरोध" की मानसिकता से ग्रस्त हैं।

3) मैंने आपकी आईडी का ज़िक्र इसलिये किया, क्योंकि मुझे यही पता नहीं है कि आप दलित हैं या छद्म नामधारी मुस्लिम हैं या मिशनरी के प्रवक्ता हैं… चूंकि आप मेरे नाम में "कर" देखकर और मेरा प्रोफ़ाइल देखकर, कूदकर अपने नतीजों पर पहुँचे हैं, उसी तरह मुझे भी पता होना चाहिए था कि आप "असल में हैं कौन?"। परिचय एवं पहचान स्पष्ट होने पर जवाब देने में आसानी होती है… खैर, आप बेनामी ही रहना चाहते हैं तो मैं कुछ नहीं कर सकता…

अब आते हैं मुद्दे पर -
1) आपने दो-चार "गद्दार" ब्राह्मणों के उदाहरण देकर सभी को एक साथ, एक ही रंग से पोतने की कोशिश की है, इससे साबित होता है कि भारतीय संस्कृति, इतिहास एवं ज्ञानकोष में ब्राह्मणों का क्या योगदान रहा है, इससे या तो आप सर्वथा अंजान हैं या फ़िर "ब्राह्मण विरोधी मानसिकता" के कारण समझना नहीं चाहते…

2) मेरा लेख भाजपा के नेता पुरोहित की आलोचना और उस लड़की की जागरुकता के सन्दर्भ में था, जिसे आपने खामख्वाह "जातिवादी" एवं "क्षेत्रवादी" रंग दे दिया।

3) आपका आरोप है कि हिन्दुत्ववादी विचारधारा सिर्फ़ "ब्राह्मणवादी" है… क्या आप स्पष्ट करेंगे कि -

अ) मिशनरी द्वारा जारी धर्मान्तरण एवं जेहादियों के दुष्कृत्यों को सामने लाने तथा कांग्रेस जैसे घटियातम पार्टी के "सेकुलर कारनामों" को जनता के सामने लाना ब्राह्मणवादी कृत्य कैसे हुआ?

ब) क्या मिशनरी और जेहादियों का दुष्प्रभाव सिर्फ़ ब्राह्मणों पर ही पड़ने वाला है, बाकियों पर नहीं?

स) कांग्रेस को बदनाम और नेस्तनाबूद करने की मंशा ब्राह्मणवादी कैसे हो गई, क्या कांग्रेस के शीर्ष पदों में ब्राह्मण नहीं हैं? या भाजपा के शीर्ष पदों पर दलित-पिछड़े नहीं हैं?

द) क्या आप संघ के वर्ग एवं प्रशिक्षण शिविरों में कभी गए हैं? यदि गए होंगे तो क्या आपने वहाँ यह नहीं देखा कि सभी स्वयंसेवक जात-पात भूलकर एक ही टाटपट्टी पर साथ बैठकर पूड़ी-सब्जी खाते हैं एवं सभी साथियों को आपस में "जी" कहकर सम्बोधित करते हैं?

बहरहाल, यदि पूर्वज ब्राह्मणों के ऐतिहासिक-पौराणिक योगदान एवं वर्तमान में निम्न-मध्यम वर्ग के ब्राह्मणों की सामाजिक-आर्थिक दुरावस्था पर चर्चा करूंगा तो टिप्पणी अधिक बड़ी हो जाएगी और मेरे पास भी समय की कमी है इसलिये फ़िलहाल यहीं विराम… आपके जवाब (जवाबों) के बाद अगली टिप्पणी दूंगा… नमस्कार

Prem Yadav said...

Nageshwar Ji Jis Prakar Brahman Men Ekta Ki BAt Karte Hain. Kya Ushi Prakar Ki Ekta Apke Samaj Me Hai. Yah Sahi HAi Ki Hindu Dharm Menin Sudha Ki JArurarat Hai. RSS KAr Raha Hai. Main Bhi RSS Mein Hun. Yahan Brahmandwad Nahi Hai. Apwad HAr JAgah Hoten Hian. Chiplunkar Ji Achha Kam KAr Rahe Hain, Are Kam se ka Bana Nahi Sakte to Bigare Bhi Nahi. Nageshwar Ji Ki Bhasa Se Lagta Nahi Ki O Hindu Hain.

Prabhat Kr. Rajan said...

Chiplunkar Ji Utar Chadhaw Ate Rahte Hian. Nam BAdalkar Log Comments KAr Rahe HAin. Apka Blog Bahu Popular Ho Raha Hai. Dekhan Ek Din Apka Blog Deshdrohion par Kahar Dhayega.

Anil Kr. Srivastwa said...

Suresh Ji Blog Ke MAdhyam Se Main Tamam Logo Se Agrah Karta Hoon Jo Log Garbar Kar Rahe Hain. Unke Bare Mein Sari JAnkari Internet Ke MAdhyam Se Prasarit Karen. Jaise Kis Afsar Ke Riswat Ki MAng ke Karan KAm Nahi Ho RAha HAi. Kis Larke Ke Pita Ne Dahej Ki Mang RAkhi. MAin Kya Kahna Chata Hun. App Sabhi Samajh RAhe Hain.
App Mail Kare : jusvm2011@gmail.com

Mahendra Gupta said...

Namste Chiplunkar ji,
Aap Bahut Bara Kam kar rahe hai.
Mere jaise bahut se log aap ke sath hain. aur rahenge.
Nageshwar jaise log to the point baat nahi karte. we idher - udhar ka bat jor kar keval bat ko lamba karte hain. To the point baat karne ki unki samajha hi nahi hai.
Kewal dosaro ko bargalate hain.
Mere sawal ka bhi unohone jswab nahi diya.

I need your help. How can I type in hindi on your blog while making a comment? Please guide me. Due to this problem I am unable to express my thougths.
I think u have my e-mail address.

SUMANT said...

सारे टिप्पणी कर्ता में एक नागेश्वर जी भी हैं जिनकी प्रतिक्रिया बिल्कुल ही पच्चर ठोकने जैसा है. ये संभत: राजस्थान के हैं और मैंने पहले भी इनका कई ब्लॉग पढ़ा है. इनका प्रिय विषय आर०एस०एस० एवं ब्राम्हण विरोध है. इसलिए मैंने पच्चर शब्द का उपयोग किया है, जिसका मूल विषय से कोई लेना-देना नहीं है. शेष सभी महानुवों की प्रतिक्रिया कहीं न कहीं क्षेत्रीयता से ही प्रभावित है. चिपलूनकर जी के मनोभाव को समझाने का किसी ने भी प्रयास नहीं किया. अत: मेरा निवेदन है कि गंभीरता से राष्ट्रीय भाव के साथ विचार कर पुन: प्रतिक्रिया दें जिससे हमारे जैसे अनेकों पाठकों को ठीक मार्गदर्शन प्राप्त हो सके.
धन्यवाद.

निशाचर said...

सुरेश जी,
मुद्दा कुछ पैसों के लिए नागरिक समाज के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ का है. वह पानी - पूरी वाला मराठी भी हो सकता था और निश्चय ही उस "पापी" पानी -पूरी वाले के ग्राहकों में उत्तर भारतीय भी होंगे. अर्थात इसे प्रांतवाद से जोड़ना ही गलत है. यह संवेदनहीन होते समाज की निकृष्ट और घिनौनी हरकत है.

सुरेश जी, नागेश्वर के उठाये हुए प्रश्न महत्वपूर्ण हैं, मंशा चाहे जो भी रही हो. आपसे आग्रह है कि हिन्दू धर्म में व्याप्त जाति व्यवस्था और इससे जुड़े मामलों पर भी अपनी लेखनी चलायें ताकि इस विषय में आपके नजरिये के बारे में कोई भ्रान्ति न रह जाये.

मैं स्वयं भी छद्मनाम से ही लिखता हूँ परन्तु इस विषय में मेरी धारणा है कि "विचार महत्वपूर्ण होते हैं, व्यक्ति नहीं." आशा है कि आप मेरे छद्म नाम में "हेतु" नहीं तलाशेंगे.

दिवाकर मणि said...

आलेख और उस पर अबतक आई टिप्पणियों को ध्यान से एक-एक कर पढ़ा (रोमन लिपि में लिखी हुई टिप्पणियों में से अधिकांश से किनारा करते हुए...कारण कि अपने राम को हिंदी की दुनिया में रोमन कभी नहीं भाया)। अस्तु, मैं बिहारी हूँ और सुरेश जी महाराष्ट्रीय मूल के मध्यप्रदेशीय हैं, और जब से सुरेश जी को पढ़ना शुरु किया है, उसके आधार पर इतना कह सकता हूं कि सुरेश जी कभी क्षेत्रीयतावादी मानसिकता से ग्रस्त नहीं हो सकते (जैसा कि अपने टिप्पणियों के माध्यम से कई सारे पाठकों ने आरोप लगाया है)। इनके आलेख के मर्म को समझे बिना ही कतिपय लोग क्षेत्रीयतावादी बहस में पड़ गये हैं, जो मेरे विचार से इस आलेख के मूल कथ्य की हत्या करने जैसा है। नेता चाहे कहीं के भी हों, न्यूनातिन्यूनों को छोड़ दें तो सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं, और एक ही तरह की विभाजनकारी राजनीति के पुरोधा बने हुए हैं। अगर राज ठाकरे मराठी कार्ड खेलता है तो राज पुरोहित एक दूसरा कार्ड खेलने में लगे हुए हैं। होना तो यह चाहिए था कि राज पुरोहित जी "पानीपूरी वाली घटना" पर राज ठाकरे की घृणित प्रतिक्रिया का कठोर विरोध करते हुए राज्य की कांग्रेसी सरकार और मनपा को उनकी गरीब विरोधी मानसिकता के लिए लताड़ते हुए अविलंब हर सार्वजनिक स्थलों पर सुविधाओं के निर्माण की बात करते।

Nageshwar said...

चिपलूनकर जी, टिपण्णी छपने के लिए धन्यवाद. आपने मेरे "आई. डी." के बारे में पूछा हैं! साहब क्या नागेश्वर नाम ही काफी नहीं? रही बात मेरी असली पहचान की, तो मैं जाति से ब्राह्मण भी हो सकता हूँ, दलित भी, मुसलमान भी और ईसाई भी और कोई भी जो आप समझना चाहते हैं. आपने संदेह व्यक्त किया हैं की मैं या तो दलित हो सकता हूँ, छद्म-नामधारी मुसलमान अथवा मिशनरी ईसाई. इसीलिए क्योंकि मैंने ब्राह्मण जाति की आलोचना की हैं आप मुझे कम से कम उच्च जाति का हिन्दू नहीं मानते हैं और इसीलिए आप मुझे दलित, मुसलमान अथवा इसाई मानते हैं. मैं आपसे पूछना चाहता हूँ की जो आपके दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं और जिसे आप जानते नहीं हैं क्या आप उसे दलित/मुसलमान/ईसाई श्रेणी में डाल देंगे? क्या आप वाकई सोचते हैं की उच्च जाति के हिन्दू वर्ण व्यवस्था के खिलाफ नहीं बोल सकते? क्या उच्च जाति के हिन्दू यह नहीं देख सकते की वर्ण व्यवस्था के कारण हम कहीं न कहीं पक्षपाती पूर्ण रवैय्या अपनाते हैं? आप वर्ण व्यवस्था के खिलाफ केवल बोलकर इस समस्या से नहीं लड़ सकते. क्या आपने कभी जानने की कोशिश करी की क्यों दलितों का ज़्यादातर वर्ग गरीब हैं? क्या यह हिन्दू वर्ण व्यवस्था और उससे उपजी भेदभाव नीति के कारण तो ऐसा नहीं? आप हिन्दू एकता की बात करते हैं पर उन दलितों को आरक्षण दिए जाने के नाम पर भड़क उठते हैं? घर में अगर कोई सदस्य परिस्थितियों के चलते सहारे की ज़रुरत हैं तो क्या बुरा हैं? क्या उसको उनके हाल पर छोड़ दे? इन सबसे से तो जाति-विद्वेष भावना ही प्रकट होती हैं. हम दलितों का इस्तेमाल अपने हिंदुत्व के लिए करे, उनसे अपेक्षा करे की हिंदुत्व की जंग मैं वो आपके साथ हो और समय आने पर अपना बलिदान भी दे पर जब उच्च जातियों से अपेक्षा की जाति हैं की वह थोड़ा बलिदान करे तो "आरक्षण की बैसाखी" और "भिखमंगो" इत्यादि कहकर इसका विरोध किया जाता हैं.

जो आप मेरी "ब्राह्मण-विरोधी" मानसिकता कहते हैं, वह केवल आपके एक प्रशंसक महेश को उसी की भाषा में करार जवाब था. श्रीमान कह रहे हैं की ब्राह्मण अपनी योग्यता और महनत से नौकरी पाता हैं. ऐसा भीषण जातिवादी कथन आपको और आपके प्रशंसको को नागवार नहीं लगता? क्या योग्यता, बुद्धि, सुसंकृति केवल ब्राह्मणों की बपौती हैं? बाकी हिन्दू क्या अनपढ़, अशिक्षित एवं अयोग्य हैं? कृपया करके कभी आराम से इस बारे में सोचे और अपने विचार प्रकट करें. आपके अन्य प्रश्नों के उत्तर भी देता हूँ. (क्रमश:)

Nageshwar said...

१. जैसा की मैंने ऊपर उल्लेख किया हैं, ब्राह्मणों की आलोचना का अभिप्राय आपके एक प्रशंसक महोदय को उनकी भाषा में उत्तर देना था. निश्चय ही भारत में जो काव्य-ग्रन्थ, पोथे, मीमांसाएँ, टीका टिप्पणियां, शोध ग्रन्थ लिखे गए वह ब्राहमणों द्वारा रचित थे क्योंकि वर्ण व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मणों को ही शिक्षा का अधिकार प्राप्त था. भले शुरूआती दौर में ब्राह्मण वर्ग का उद्देश्य समाज के आँख, कान, नाक का रहा हो, पर भौतिकतावाद का प्रलोभन और विलासिता ने इस वर्ग को भटका दिया. रीति-रिवाज़ में उलझ कर यह वर्ग मूल विचारधारा से विमुख हो गया. जिस धन और सम्पति का संचय उनके लिए निषेध था वह उसीके लालच में जा फंसे. राजाओं, महाराजों और बादशाहों के गुणगान एवं कसीदे पढ़े (भले झूठे क्यों न हो) और केवल इन्होने अपने फायदे ही देखे और इसी प्रवृति से यह आजतक नहीं निकल पाए.

२. मैंने ठाकरे-पुरोहित को जातिवादी रंग नहीं दिया. मेरे कहने का अभिप्राय यह हैं आपने जिस तरह पुरोहित के बयान (जो की निंदनीय हैं) की निंदा की और बॉम्बे में रह रहे उत्तर भारतीयों को "वोट बैंक" करार दिया, उसी भावना से आप राज ठाकरे की निंदा करने में असमर्थ रहे? राज ठाकरे के गुंडों ने गरीब और महनत से अपनी जीविका चलने, अपने परिवार का पेट पालने वाले (जिसमे उसके बीवी-बच्चे और बुज़ुर्ग माँ बाप भी होंगे) वाले उत्तर भारतियों पर हमले किये क्यों? क्या वाकई वह उत्तर भारतीय जो महनत और ईमानदारी से रात दिन एक करके अपने परिवार और बूढ़े माँ बाप की सेवा कर रहा हैं इस बर्ताव के लायक हैं? क्यों राज ठाकरे एंड कंपनी गुजरात एवं अन्य भारत के कोनो से आये हुए अमीर व्यवसाइयों के खिलाफ बोलते हैं? क्या यह लोग मराठी लोगो का हक नहीं छें रहे हैं? क्यों आपको लगता हैं की उत्तर भारतीय बॉम्बे आकर मराठी लोगो का हक छीन रहे हैं? क्या उत्तर भारतियों ने पानी-पूरी, चाट की रेहड़ी स्टाल लगा कर मराठी बंधुओं वही व्यापर करने से रोका हैं? क्या यही बात उत्तर भारत में रह रहे मराठी बंधुओं और बहनों पर भी लागू होती हैं? मुझे यकीन हैं की साल दर साल यहीं गरीब उत्तर भारतीय गणपति के त्यौहार पर चंदा भी देते होंगे तो इनके महाराष्ट्र में अपनी जीविकापार्जन आने हेतु विरोध क्यों? इन्ही सब बातों को लेकर मुझे आपके लेख में क्षेत्र-वादिता दिखाई दी.

३. आर.एस.एस. केवल ब्राह्मणवाद के संरक्षण और पोषण हेतु बनी हैं इस पर कोई दो-राय नहीं. आर.एस.एस की विचारधारा में हिन्दू धर्म-कांडों, विधि-विधानों वर्ण-व्यवस्था के प्रति अगाध श्रद्धा की अपेक्षा की जाति हैं. हिन्दू धार्मिक रीति रिवाज़ बिना पंडित के पूर्ण नहीं माने जाते और न ही इसपर कोई सार्थक बहस होती हैं. आर.एस.एस. के मुखपत्र पाञ्चजन्य को उठाकर देख लीजिये. क्या आज तक आर.एस.एस में दलित वर्ग का सदस्य सरसंघचालक बना हैं? केवल साथ में भोजन कर लेने भर से वर्ण और जात की दीवारें गिर नहीं जाती. आर.एस.एस. में काफी बुज़ुर्ग लोग हैं जो दबे भाव से ही सही, सती-प्रथा के पक्ष में हैं.

अ. जहाँ तक मिशनरियों एवं मुसलमानों द्वारा धर्मांतरण की बात हैं, प्रलोभन तो हर कोई धर्म देता हैं. अगर किसी व्यक्ति को इसाई अथवा इस्लाम में रूचि दिखाती हैं तो यह उसका अपना निजी निर्णय हैं की वह हिन्दू रहे, मुसलमान रहे, इस्सी रहे या फिर नास्तिक रहे. क्या आप हिन्दू धर्म ग्रहण करने वाले मुसलमान, ईसाई इत्यादि के धर्मांतरण को भी घटिया मानते हैं, क्या इसकी तीव्र आलोचना करते हैं? सभी धर्म बस केवल अंक-गणित का खेल खेल रहे हैं.

ब. धर्म का दुष्प्रभाव तो हर किसी पर हैं, इसमें इस्लाम और ईसाई धर्म भी उतने ही ज़िम्मेदार हैं जितना की अन्य धर्म.

स. कांग्रेस से आपका रिश्ता केवल एक राजनैतिक स्तर पर हैं. यह बात सही हैं की कांग्रेस भाजपा और संघ के मुकाबले अल्पसंख्यकों के प्रति थोड़ी नरम हैं (और उसी पर आपको उसके विरोध में हो) पर वह भी एक ब्राह्मणवादी राजनैतिक पार्टी हैं और कुछ नहीं.

आपके जवाब के इंतज़ार में.

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

@नागेश्वर जी, आपके लम्बे लम्बे टिप्पणी पढ़ कर एक प्रश्न जरुर पूछना चाहता हूँ. आपने कहा है कि "ब्राहमण भौतिकतावाद का प्रलोभन और विलासिता ने इस वर्ग को भटका दिया. रीति-रिवाज़ में उलझ कर यह वर्ग मूल विचारधारा से विमुख हो गया. जिस धन और सम्पति का संचय उनके लिए निषेध था वह उसीके लालच में जा फंसे. राजाओं, महाराजों और बादशाहों के गुणगान एवं कसीदे पढ़े (भले झूठे क्यों न हो) और केवल इन्होने अपने फायदे ही देखे और इसी प्रवृति से यह आजतक नहीं निकल पाए.".

मेरा प्रश्न ये है कि - क्या क्षत्रिय, या दलित भौतिकतावाद और लालच में नहीं फसा है? यदि ऐसा नहीं तो मायावती जी आम जन के पैसे को अपनी विशालकाय मूर्ति में नहीं बर्बाद करते. और आम दलित सब जानते हुए मायावती जी का गुणगान करती है.

मेरा ऐसा मानना है ब्राहमण के साथ-साथ अन्य जातियां भी दल दल में फसी है ...और इसके दोषी सभी जातियां है, हाँ ब्रह्मण और क्षत्रिय थोड़े ज्यादा दोषी जरुर हैं.

निशाचर said...

राकेश सिंह जी,
एक शराबी की संतान भी अगर शराब पीने लग जाये तो इसके लिए दोषी संतान है या पिता ??
ब्राह्मण स्वयं को समाज का देव और पितृ कहलवाता है तो समाज का निर्देशन करने की जिम्मेदारी भी उसी की है. जब वह स्वयं अन्याय, शोषण और धर्मच्युति का पुतला बन जाता है तो अन्य जातियों के अनुसरण का दोष भी क्या ब्राह्मण पर नहीं है????

Abhishek said...

@निशाचर
किस ज़माने की बात कर रहे हो भाई. जरा बताना तो आज कल कितने लोग ब्रह्मण को देव कहते है और किस किस जगह ब्रह्मण खुद को देव कहलवाने के लिए दूसरी जातियों पर दबाव डालता है.800 साल मुसलमानों की गुलामी और फिर 200 अंग्रेजो की गुलामी की है हिंदुस्तान ने बोले तो हजार साल इंडिया के अधिकतर इलाको में हिन्दुओ का शासन नहीं था. मतलब लगभग लास्ट हजार साल से ब्राह्मणों के हाँथ में कुछ नहीं है फिर भी आप लोगो ब्राह्मणों को दोष दे रहे है. समझ नहीं आता है किस ज़माने की बात हो रही है.

निशाचर said...

अभिषेक जी,

दुर्भाग्य से यह इक्कीसवीं सदी की ही बात है. अगर आप इससे अनभिज्ञ हैं तो निश्चय ही आपकी जीवनचर्या बहुत ही संकीर्ण (शहरी उच्चमध्यम वर्गीय) दायरे में सीमित है. कृपया उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश के कस्बों- गांवों में निकल जाइये, आपको कदम- कदम पर इसी सत्य का आभास होगा. आज अगर कोई ब्राह्मण को देव नहीं मानता तो उसके पीछे भी उन ब्राह्मणों के कुकर्म ही हैं जो सिर्फ जन्म से ब्राह्मण हैं, कर्म चांडालों सरीखे ही हैं.



निश्चय ही भारत ८०० सालों तक मुसलमानों का और ४०० सालों तक अंग्रेजों का गुलाम रहा. परन्तु क्यों?? हिन्दू समाज का पचास प्रतिशत महिलाएं थीं. शेष पचास प्रतिशत में तीस प्रतिशत बच्चे-बूढ़े, बीमार- अपाहिज. बचे हुए बीस प्रतिशत स्वस्थ पुरुषों पर समाज की रक्षा की जिम्मेदारी थी. लेकिन समाज तो जातियों में बँटा हुआ था. सिर्फ दो-तीन प्रतिशत क्षत्रिय पुरुषों पर पूरे समाज की रक्षा का भार डालना क्या आत्महत्या करना नहीं था ? इस व्यवस्था को किसने बनाया ?? अगर जाति-व्यवस्था को जन्मगत न बनाया होता तो क्या भारत गुलाम बनता ?



भाई साहब, इस सच्चाई से आप आज भी हर रोज रूबरू होते हैं. हिंदी या अंग्रेजी कोई भी अखबार उठाईये. वैवाहिक विज्ञापन के सभी पन्ने जातिगत विज्ञापनों से भरे होते हैं. इन विज्ञापनों में विवाहार्थी वर-वधु सोलहवीं सदी के नहीं होते, वे आज के आधुनिक युवा हैं. परन्तु क्या कभी किसी ब्राह्मण, क्षत्रिय वर-वधु का विज्ञापन ऐसा देखा है जिसमें जतिवर्जना के बजाय सिर्फ योग्यता और संस्कारों को महत्व दिया गया हो ? क्या किसी विज्ञापन में जाति की बजाये केवल "हिन्दू वधु चाहिए" या "हिन्दू वर चाहिए" लिखा देखा है? और यह आज के ज़माने की ही बात है....

Anonymous said...

नोट : किसी तकनिकी कारण से मेरे ID से टिप्पणी नहीं जारी है इसलिए मैं (राकेश सिंह ) ये बेनामी के नाम से टिप्पणी डाल रहा हूँ .

@निशाचर जी, मेरी टिप्पणी मैं ये तो मैंने लिखा ही है कि - "मेरा ऐसा मानना है ब्राहमण के साथ-साथ अन्य जातियां भी दल दल में फसी है ...और इसके दोषी सभी जातियां है, हाँ ब्रह्मण और क्षत्रिय थोड़े ज्यादा दोषी जरुर हैं.".

कोई भी जाती पथ भ्रष्ट हो जाए और इसके लिए सारा दोष ब्रह्मण पे दे ये तो सही नहीं है.

और जहाँ तक "एक शराबी की संतान भी अगर शराब पीने लग जाये तो इसके लिए दोषी संतान है या पिता ??" इसका सीधा उत्तर है पिता और पुत्र दोनों का. क्या आप ऐसा मानते हैं कि पुत्र यदि सरब पिने लग जाए तो दोषी सिर्फ और सिर्फ पिता है ? मैंने तो कई ऐसे लोग देखे हैं जिसके पिता सरब पिटे हैं पर पुत्र सरब को हाथ नहीं लगता.

मेरे कथन का तात्पर्य ये है कि निस्संदेह आज का ब्रह्मण समाज का मार्गदर्शन नहीं कर रहा है और इसमें दोष ब्रह्मण का थोडा ज्यादा है. पर समाज को पथ भ्रष्ट करने में बाकी जातियां कोई ज्यादा पीछे नहीं हैं. आज-कल तो तथाकथित दलित ब्राहमण कि एक भी नहीं सुनता, दलित साहित्य का बड़ा आधार ही ब्रह्मण को गाली भर देना है. दलित मुख्यमंत्री भी हैं, फिर भी दलित का वास्तविक उद्धार नहीं हो रहा है

Suresh Chiplunkar said...

@ नागेश्वर जी - देर से जवाब देने के लिए क्षमा चाहता हूँ…
आपने कहा कि मेरी ID या पहचान जरूरी क्यों है?
जिस प्रकार आप मेरे बारे में यह जानते हैं कि मैं मराठी हूँ, मैं हिन्दुत्ववादी हूँ, उसी प्रकार मुझे भी यह जानना चाहिए कि आप कौन हैं, ताकि जैसे आपने मेरे प्रति पूर्वाग्रह पाल रखे हैं, मैं भी आपका नाम-पता-व्यवसाय जानकर आपके प्रति अपनी सोच बना सकूं…। उदाहरण के लिये मान लीजिये कि आप हकीकत में नागेश्वर नहीं बल्कि शकील या मैथ्यूज़ हैं, तो आपकी सोच भी वैसी ही होगी, पृष्ठभूमि भी वैसी होगी, संस्कार भी वैसे होंगे, शिक्षा-दीक्षा भी… निश्चित ही आपके पूर्वाग्रह भी उसी प्रकार होंगे… जैसे आप कुरान या बाइबल की आलोचना सहन नहीं कर सकेंगे…। किसी भी बहस में यह महत्वपूर्ण होता है कि बहस करने वालों की पृष्ठभूमि क्या है, उसी के अनुसार मुद्दे तय होते हैं, तर्क-वितर्क किये जाते हैं…। आप परदे के पीछे रहें और मेरे बारे में सब कुछ जानकर पहले से धारणा बनाकर कमेण्ट करें, ऐसा कैसे चलेगा? खैर आप नहीं चाहते तो कोई बात नहीं…
अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर…
जारी………

Suresh Chiplunkar said...

क्रमशः… आगे जारी -
मुझे लगता है कि जहाँ आप ब्राह्मणों की स्थिति 1940-50 और 2011 में एक समान माने बैठे हैं, शायद उसी प्रकार दलितों की स्थिति भी 1940 और 2011 की एक समान माने बैठे हैं… नागेश्वर जी ज़माना बहुत बदल चुका है, धीरे-धीरे ही सही… (कल ही मेरे एक भतीजे ने एक दलित लड़की को पसन्द किया है और परिवार की तरफ़ से कोई आपत्ति नहीं है, दोनों साथ-साथ काम कर रहे हैं, साथ-साथ खाते पीते हैं… क्या यह बदलाव नहीं है?) क्या ब्राह्मण वक्त के अनुसार बदले नहीं हैं?
और आप जिन ब्राह्मणों को "महाशक्तिशाली" और "सुपरमैन" टाइप का बता रहे हैं, जरा 2011 की स्थिति में आकर सोचिये, तथ्य और आँकड़े देखिये कि ब्राह्मणों की वर्तमान हालत क्या है।
1) आज की तारीख में कितने राज्यों के मुख्यमंत्री ब्राह्मण हैं?
2) आज संसद में ब्राह्मणों का प्रतिशत कितना है?
3) 1940 में ब्राह्मणों की जनसंख्या कितनी थी और अब दलितों-ब्राह्मणों की जनसंख्या का अनुपात कितना है?
4) आरक्षण को 60 साल हो गये, दलितों को उसका फ़ायदा मिला है, यदि नहीं मिला है तो उसके जिम्मेदार ब्राह्मण नहीं, बल्कि दलित नेता हैं…
5) इसी आरक्षण ने ब्राह्मणों का उसी अनुपात में नुकसान भी किया है… आप माने या ना मानें परन्तु निम्न-मध्यम वर्ग का ब्राह्मण अब पिछले कई वर्षों से सरकारी नौकरी से बाहर हो चुका है… और अब तो उसे "दलित एक्ट" के कानून के भय तले जीना पड़ता है, पता नहीं कब "दलित उत्पीड़न" के नाम पर अन्दर हो जाये…

जारी………

Suresh Chiplunkar said...

हालांकि इस अन्तहीन और अनिर्णायक बहस में मैं पड़ना नहीं चाहता था, फ़िर भी…
आपने कहा कि संघ में कोई दलित सरसंघचालक क्यों नहीं बना?
क्या "दलित प्रेम" तभी ज़ाहिर होता है जब उसे किसी उच्च पद पर बैठा दिया जाए? केआर नारायणन के राष्ट्रपति बन जाने या मायावती के मुख्यमंत्री बन जाने से क्या दलितों का कोई महान उत्थान हो गया है? हालांकि संघ ने कई दलित नेता संघ से भाजपा में ट्रांसफ़र किये हैं…

आपने कहा कि मैं जातिवाद पर अपनी कलम क्यों नहीं चलाता?
कल आप कहेंगे कि मैं महिलाओं की स्थिति पर क्यों नहीं लिखता, परसों आप कहेंगे कि सड़कों पर होने वाली दुर्घटनाओं पर क्यों नहीं विचार प्रकट करता? ऐसा कैसे होगा…

खैर… अब समय की कमी के कारण फ़िलहाल यहीं रुकता हूँ… आगे फ़िर बाद में देखेंगे…
न तो मैं आपको संघ-ब्राह्मण विरोध की मानसिकता से बाहर निकाल सकता हूँ, न ही आप मुझे हिन्दुत्व पर लेखन से विमुख कर सकते हैं…। इस बहस का कोई अन्त नहीं है… फ़िर भी महाराष्ट्र, तमिलनाडु इत्यादि राज्यों में चल रहे कटु ब्राह्मण विरोधी आंदोलनों एवं विचारों पर अध्ययन करेंगे तो आप निश्चित ही पाएंगे कि आज की तारीख में ब्राह्मण (आर्थिक रूप से और सामाजिक रूप से भी) बहुत-बहुत कमजोर हो चुका है, और क्रमशः कमजोर ही होता जायेगा…।

यदि आपको ऐसा लगता है कि मिशनरी और जेहादियों का खतरा "वास्तविक" नहीं है, तो मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता…

यदि आपको लगता है कि ब्राह्मणों ने "समाज सुधार" में रत्ती भर भी योगदान नहीं दिया है, तो इसमें भी मैं कुछ नहीं कर सकता…

नमस्कार…

सागर नाहर said...

गोया सूत न कपास जुलाहों में लठम लट्ठ

Mahender said...

सारे भाजपाई नेताओ को नंगा नाचना चाहिए फिर जो जो इनकी विडियो बनाएगा वो बुरा बन जायेगा और चरित्र हीन भी...........
जय हिंद
जय क्रांति

सागर नाहर said...

इसे कहते हैं गोया सूत न कपास और जुलाहों में लट्ठम- लट्ठ

Anonymous said...

नागेश्वर जी की ३ न. के प्रश्न का उत्तर :
आर. एस. एस के स्वयंसेवक हिंदुत्व के बारे में विचार करते हैं, जाति पंथ के बारे में नहीं.
आर.एस.एस की शाखाओं में , वर्गों में जाति, प्रान्त, भाषा आदि का भेद भाव नहीं होता.
रही बात किसी दलित को सरसंघचालक का पद देने की, तो महाशय सरसंघचालक का पद निवृत हुवे सरसंघचालक के आदेशानुसार ही मिलता है.
जब संघ की शुरुवात हुई तो आलोचकों ने यह कहना शुरू किया कि सरसंघचालक का पद सिर्फ महाराष्टियन को ही मिलेगा. जब माननीय रज्जू भैया जी सरसंघचालक बने तो आलोचकों ने महाराष्ट्रियन को छोड़ सिर्फ उच्ची जाति के लोग ही सरसंघचालक बन सकते हैं ऐसी बातें बनानी शुरू कर दी.
सिख पंथ से भी कई स्वयंसेवक हैं, फिर सिख पंथ को भी सरसंघचालक पद मिलना चाहिए. फिर ये बात हर प्रान्त और हर भाषा से उठेगी. तो क्या सरसंघचालक का पद भी भाषा, प्रान्त, पंथ , जाति के लिए आरक्षित रखना होगा ?
आर.एस .एस ऐसी दकियानूसी बातों को नजर अंदाज़ करता हुवा सिर्फ देश, समाज और धर्म की उन्नति करते हुवे अपना कार्य कर रहा है.
नागेश्वर जी से मेरा आग्रह है कि शाखाओं, वर्ग या शिबिर में जाकर अपनी आखों से देखे कि वहां पर सभी स्वयंसेवक कैसे रहते हैं. हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फारसी क्या.
और हाँ , नागेश्वर जी कभी दलित स्वयंसेवक (संघ बंधू मुझे माफ़ करे , क्योंकि संघ में किसी भी जाति का उल्लेख नहीं किया जाता) से सरसंघचालक के पद के बारे में बात करे , उन्हें वही जवाब मिलेगा जो मैंने दिया.
आरक्षण, सती प्रथा आदि बातें सभी स्वयंसेवको के मन में कही न कही कुछ न कुछ मात्र में अलग अलग होगी पर ये उनके व्यक्तिगत मत हैं.
सार्वजानिक रूप से या शाखों में कार्यकर्त्ता वही कहता है जो संघ के विचार हैं, अपने व्यक्तिगत मत को नहीं प्रकट करता.

अ. प्रश्न का उत्तर : हर कोई धर्म प्रलोभन नहीं देता, अगर हिन्दू धर्म प्रलोभन दे सकता तो धर्मान्तरण का मुद्दा ही नहीं होता.
और जो ईसाई या मुस्लिम हिन्दू हो रहे हैं वो धर्मान्तरण नहीं , घर वापसी है, वे सब कुछ समय पहले हिन्दू ही थे.

Anonymous said...

कभी कभार सुरेश जी को गाँव की याद आ जाती है इसलिए लिख डालते है चाहे वो भाजपा के विरोध मे ही क्यूँ न हो ! :)

कुछ ज्यादा तो नहीं ?