Tuesday, May 17, 2011

नोट व चिल्लर “माफ़िया” एवं बड़े नोटों को बन्द करने की मुहिम… Big Currency Notes in India, Black Money and Baba Ramdev

चित्र में दिखाये गये पाँच रुपये के नोट को देखकर चौंकिये नहीं, इस प्रकार के (और इससे भी गये-गुज़रे) पाँच के नोट मध्यप्रदेश में धड़ल्ले से चलाए जा रहे हैं। मैं जानता हूं कि कई राज्यों के मित्र (और विदेशों में रहने वाले भी) इन नोटों की भौतिक दुरावस्था देखकर इन्हें हाथ लगाना भी पसन्द नहीं करेंगे, परन्तु यहाँ ऐसे नोट चल रहे हैं…। और यह नोट भी आसानी से नहीं मिल रहे, चिल्लर मिलना तो बहुत ही मुश्किल हो चला है, निश्चित रूप से इन घटिया नोटों के चलने और जानबूझकर चिल्लर का संकट पैदा करने के पीछे एक पूरा माफ़िया सिस्टम काम कर रहा है।


इस माफ़िया और इस समस्या का जन्म भी रातोंरात नहीं हुआ है, बल्कि भारत सरकार द्वारा छोटे नोट कम संख्या में छापने एवं बड़े नोटों को प्रोत्साहन देने तथा ATM मशीनों में सिर्फ़ 100 एवं 500 के नोटों की उपलब्धता की वजह से हुआ है। उल्लेखनीय है कि विभिन्न शोधों एवं अध्ययनों के मुताबिक अब यह बात सिद्ध हो चुकी है कि भारत की 70% से अधिक जनता 2 डॉलर (अर्थात 100 रुपये) रोज से कम पर अपना गुज़र-बसर करती है। इसमें से भी एक बड़ा हिस्सा 1 डॉलर रोज की कमाई पर ही आश्रित है। मेरा दावा है कि भारत की इसी 70% जनता में से 99% लोगों ने 1000 का नोट कभी नहीं देखा होगा, हाथ में लेना तो दूर की बात है। देश की जनता के इस बड़े हिस्से का रोज़मर्रा का काम, लेन-देन, बाजार-व्यवहार अमूमन 10, 20 और 50 के नोटों पर आधारित होता है। एकदम निम्न आय वर्ग के दिहाड़ी मजदूर एवं दूरदराज के ग्रामीण इलाके के गरीब आदिवासियों इत्यादि रोज़ शाम को किराने की दुकानों से अपना दैनिक राशन खरीदते हैं, उन्होंने तो शायद 500 का नोट भी एकाध बार ही हाथ में लिया होगा।


ऐसे में सवाल उठता है कि 122 करोड़ में से 100 करोड़ से भी अधिक लोग जिन नोटों का उपयोग ही नहीं करते हैं, 1000-500 के जो नोट वे लोग कभी भी चलन में लाने की क्षमता ही नहीं रखते, तब इन नोटों की क्या आवश्यकता है? यानी जिन नोटों को भारत की सिर्फ़ 10% जनता ही “मासिक उपयोग” में लाती हो, तथा सिर्फ़ 5% जनता ही “दैनिक उपयोग” में लाती हो, उन नोटों को बनाये रखने की क्या तुक है? विगत कुछ समय से बाबा रामदेव ने स्विस बैंकों से काले धन की वापसी की माँग के साथ ही पाँच सौ एवं एक हजार के नोट बन्द किये जाने का अभियान भी चलाया है। मैं बड़े नोट बन्द करने के पूर्ण समर्थन में हूँ। कारण को, मोटे आँकड़ों में इसे मैंने ऊपर ही समझा दिया है अब इस समस्या का व्यावहारिक पक्ष भी देख लीजिये…

हम वापस आते हैं, मध्यप्रदेश में चल रहे इन पुराने नोटों एवं खुल्ले पैसों की समस्या पर… जिन व्यक्तियों का रोज़मर्रा का काम क्रेडिट/डेबिट कार्ड अथवा इंटरनेट बैंकिंग/चेक इत्यादि से होता है, वे इस समस्या की गम्भीरता को नहीं समझ सकते। छोटे व्यवसायी, किराने-परचून वाले, पंचर पकाने वाले, सब्जी ठेले वाले, मजदूर इत्यादि जैसे लाखों लोग हैं जो दैनिक कार्यों में एक-दो-पाँच-दस-बीस और पचास रुपये में अधिकतम लेन-देन करते हैं, कभीकभार कोई ग्राहक होता है जो 100 या 500 रुपये का सामान एकमुश्त खरीदता है (ध्यान रहे, यहाँ मैं छोटे कस्बों, शहरों की बात कर रहा हूँ, महानगरों की नहीं)। सबसे पहले मैं स्वयं से ही शुरु करता हूँ, सभी जानते हैं कि मेरा झेरोक्स का छोटा सा व्यवसाय है। विगत दो वर्ष से जबसे महंगाई अत्यधिक बढ़ गई है तभी से झेरोक्स का रेट हमने 1 रुपया कर दिया है। अब यदि कोई ग्राहक 3 रुपये, 6 रुपये, 12 रुपये आदि की फ़ोटोकॉपी करवाता है तो वह अक्सर 10, 50 या 100 का नोट देता है, तब स्वाभाविक ही हमें उसे 4, 6, 38 या 88 रुपये लौटाने ही हैं, अब चूंकि बाज़ार में 5 और 2 रुपये के नोटों एवं सिक्कों की भारी “कृत्रिम कमी” बना दी गई है, सो मजबूरन या तो हम ग्राहक के ऊपर के दो रुपये छोड़ दें या फ़िर कहीं से पाँच और दो रुपये की जुगाड़ करें। (स्वयं मैने पिछले 2-3 माह से 1000 रुपये का नोट नहीं देखा)

यहाँ आकर माफ़िया अपना खेल कर रहा है, हम जैसे छोटे व्यापारियों को 1,2 और 5 के सिक्के 8% से 10% के कमीशन पर खरीदना पड़ते हैं (अर्थात 100 रुपये के सिक्के लेना हो, तो हमें 110 रुपये चुकाने होंगे)। इस माफ़िया का तोड़ निकालने के लिये कई व्यापारियों ने ग्राहक के सामने चॉकलेट, टॉफ़ी, लिफ़ाफ़े, इत्यादि रखना शुरु किया, परन्तु ग्राहक को इन वस्तुओं से कोई मतलब नहीं होता, वह पूरे पैसे वापस चाहता है…। आप स्वयं कल्पना करें कि दिन भर की मजदूरी से किसी गरीब व्यक्ति को 150 रुपये मिलें, शाम को वह एक दुकान से आटा-चावल-दाल, दूसरी दुकान से सब्जी, तीसरी दुकान से कुछ और खरीदने आये, और हर दुकानदार उसे “ऊपर के” दो-तीन रुपयों की चाकलेट-टॉफ़ी दे, तो उस गरीब का खामख्वाह ही 5-7 रुपये का नुकसान हो गया ना…। एक-दो रुपये छोड़े भी नहीं जा सकते, क्योंकि यदि दुकानदार ने दिन भर में दस ग्राहकों के 2-2 रुपये भी खुल्ले पैसे न होने की वजह से छोड़ दिये तो उसका 20 रुपये रोज का नुकसान तो वैसे ही हो गया। किराने अथवा जनरल स्टोर पर तो ग्राहक को 2-4 रुपयों की कई वस्तुएं दी जा सकती हैं, जैसे माचिस इत्यादि। परन्तु ऐसे कई व्यवसाय हैं जिन्हें अपने ग्राहकों को नकद पैसा ही वापस करना होता है… सायकल का पंचर बनाने वाला यह नहीं कह सकता कि चलो एक पंचर और कर देता हूँ “राउण्ड फ़िगर” हो जायेगा।

चूंकि उज्जैन मन्दिरों की नगरी है तो यहाँ विभिन्न मंदिरों में चढ़ाने के लिये भी भक्तों को खुल्ले पैसे चाहिये होते हैं। माफ़िया यहाँ भी अपना खेल करता है, मन्दिरों के बाहर बैठे भिखारियों से खुल्ले पैसे एकत्रित किये जाते हैं, उसी चिल्लर को भक्तों को ऊँची दरों पर दिया जाता है… फ़िर दान पेटी से निकलने वाले हजारों रुपये के चिल्लर को 4-6 “बड़े-बड़े” व्यापारी मिलकर खरीद लेते हैं (ज़ाहिर है कि कोई छोटा व्यापारी 10,000 रुपये की चिल्लर मन्दिर से खरीदने की औकात नहीं रखता)… दोबारा घूम-फ़िरकर यही चिल्लर हम जैसे लोग 8-10% पर खरीदने को मजबूर हैं। चूंकि सरकार ने छोटे नोट छापना बन्द कर दिया है और रिजर्व बैंक द्वारा सिक्के पर्याप्त मात्रा में भेजे नहीं जाते, इसलिये मजबूरी में छोटे व्यापारियों को गंदे, मुड़े-तुड़े, टेप चिपके हुए, कटे-फ़टे नोटों से काम चलाना पड़ रहा है…। दिक्कत तब होती है, जब अन्य राज्यों से आने वाले मित्र-रिश्तेदार इन नोटों को देखकर नाक-भौंह सिकोड़ते हैं, तब मध्यप्रदेश शासन के साथ-साथ हमारी भी इज्जत उतर जाती है। अन्य राज्यों में यह समस्या शायद कम है, और यह बात मैं इसलिये कह सकता हूँ कि फ़रवरी-मार्च-अप्रैल में मेरा दिल्ली, हैदराबाद एवं मुम्बई जाना हुआ, वहाँ मुझे चिल्लर (खुल्ले पैसे) की कोई समस्या कहीं दिखाई नहीं दी। मुम्बई में तो हैरानी इस बात पर भी हुई कि ऑटो वाले मीटर से चल रहे हैं तथा उनके मीटर के अनुसार 16 रुपये, 43 रुपये इत्यादि किराया उन्होंने ईमानदारी से लिया और बचे हुए चार-छः-आठ रुपये बाकायदा सिक्कों में लौटाए। ज़ाहिर है कि यह समस्या मध्यप्रदेश में ही अधिक है, ऐसा क्यों है इसका पता लगाना प्रशासन का काम है। फ़िलहाल हम जैसे छोटे व्यापारी इधर-उधर से जुगाड़ करके अपना काम चला रहे हैं (धंधा तो करना ही है, ग्राहक को एकदम मना भी तो नहीं कर सकते)। ऐसा भी नहीं है कि रिज़र्व बैंक स्थानीय बैंकों को चिल्लर नहीं भेजता, परन्तु वह संख्या में इतनी कम होती है कि “रहस्यमयी” तरीके से बैंक कर्मचारियों के मित्रों/रिश्तेदारों और बड़े व्यापारियों के यहाँ पहुँच जाती है, आम जनता के हाथ तो आती ही नहीं…

अमेरिका की प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत आय लगभग 40,000 (चालीस हजार) डॉलर है और वहाँ का सबसे बड़ा सामान्य नोट 100 डॉलर का है अर्थात 400 और 1 का अनुपात (400 : 1), दूसरी तरफ़ भारत में प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत आय लगभग 30,000 रुपये है और सबसे बड़ा नोट 1000 रुपये का है यानी कि 30 और 1 का अनुपात (30 : 1)… और भारत में काले धन तथा भ्रष्टाचार के मूल में स्थित कई कारणों में से यह एक बड़ा कारण है। बड़े नोटों की सुगमता के कारण भारत में अधिकतर लेन-देन नगद में होता है और यही व्यवहार काले धन का कारण बनता है। इस विषय पर अप्रैल 2009 में एक पोस्ट लिखी थी, उसे विस्तार से यहाँ क्लिक करके पढ़िये… http://blog.sureshchiplunkar.com/2009/04/black-money-big-currency-corruption-in.html

बाबा रामदेव ने बड़े नोटों को बन्द करने के समर्थन में कई तर्क, तथ्य एवं आँकड़े पेश किये हैं। इस समस्या के हल हेतु सुझाव निम्नानुसार हैं –

1) 100 रुपये से ऊपर के सभी नोट तत्काल प्रभाव से बन्द किये जाएं। (इससे काले धन के साथ-साथ नकली नोटों की समस्या से भी निजात मिलने की संभावना है)

2) ATM मशीनों से 100 और 50 के नोट निकालने की व्यवस्था हो।

3) सरकार छोटे नोट एवं सिक्के अधिकाधिक मात्रा में मुद्रित करे।

4) जिन व्यक्तियों को बड़ी मात्रा में ट्रांजेक्शन करना हो, उन्हें PAN कार्ड क्रमांक के साथ क्रेडिट/डेबिट कार्ड, नेट बैंकिंग अथवा चेक से भुगतान अनिवार्य किया जाए (काले धन पर रोक हेतु एक और कदम)

5) सिक्कों को गलाकर अन्यत्र उपयोग में लाने वालों तथा फ़टे-पुराने नोटों को कमीशन पर चलाने वालों के साथ सख्त कार्रवाई की जाए…

जब तक यह नहीं हो जाता… तब तक बाहर के राज्यों में रहने वाले मित्र और रिश्तेदार यदि उज्जैन आने वाले हों, तो हम पहले ही उन्हें फ़ोन करके कह देते हैं कि “भाई, इधर आते वक्त 500-700 रुपये की चिल्लर लेते आना…”। मैं यह भी जानना चाहूंगा कि क्या फ़टे-पुराने नोटों व चिल्लर सिक्कों की समस्या अन्य राज्यों में भी है, या यह सिर्फ़ मध्यप्रदेश में ही है? यदि यह समस्या कमोबेश पूरे देश में ही है तो सरकार पर दबाव बनाना होगा कि वह बड़े नोटों की संख्या कम करे (या बन्द करे) तथा छोटे नोटों व सिक्कों की संख्या बढ़ाए… पाठकगण कृपया अपने-अपने क्षेत्रों व अनुभव के बारे में टिप्पणी करें…

32 comments:

मसिजीवी said...

नही जी, रेजगारी का मसला दिल्‍ली में ऐसा कतई नहीं है कि इसे समस्‍या कहा जा सके, पर यहॉं के आटो वालों से मुंबई जैसी ईमानदारी की उम्‍मीद न करें चिल्‍ला लौटाना वे शान के खिलाफ समझते हैं तथा राउंड फिगर की उनकी कल्‍पना 50 के गुणकों में ही होती है... अभी अमदाबाद से लौटा हूँ हैरानी हुई कि वहॉं के आटो-संप्रदाय में सोलह रुपए जैसी रकम भी पाई जाती है।

बड़े नोटो को प्रचलन से बाहर करने से केवल काले काम करने वालों को तकलीफ होगी... और इसीलिए ये निर्णय होना कठिन है क्‍योंकि इन्‍हीं काले काम करने वालों ने ही तो ये निर्णय लेना है अब ऐसे राजनेता खुद अपने पांव पर कुल्हाड़ी भला क्‍यों चलाएंगे

Anand G.Sharma आनंद जी.शर्मा said...

आम जनता अर्थात गरीबी की रेखा के कुछ आसपास रहने वाले लोगों को हुक्मरानों की सदिच्छा को ठीक से समझने की जरुरत है |
हुक्मरान चाहते है कि लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठे | इसके दो तरीके हैं |
पहला तो यह है कि खूब मंहगाई बढ़ा कर जीना दूभर कर दो कि लोग खुद ब खुद ऊपर चले जाएँ जैसा कि पिछले १२-१३ वर्षों में २ लाख १३ हजार किसान आजमा कर देख चुके हैं |
दूसरा तरीका यह है कि गरीबी की रेखा के आसपास रहने वाले लोगों को चाहिए कि वे लोग किसी अच्छे बैंक में सेविंग अकाउंट खुलवा लें और क्रेडिट कार्ड की सुविधा ले लें |
चिल्लर (२-५ रुपये से नीचे का माल) से धंधा करने छोटे दुकानदारों को चाहिए कि वे किसी अच्छे मल्टीनेशनल बैंक में करेंट अकाउंट खोल लें - नेट बैंकिंग की सुविधा ले लें - इन्टरनेट कनेक्शन ले लें और साथ ही साथ कार्ड स्वाइप करने वाली मशीन ले कर इन्टरनेट से जोड़ लें |
अपनी २-५ रुपयों की वस्तुओं पर बार कोडिंग करा लें |
एक बार कोड रीडर - एक कंप्यूटर और कैश रजिस्टर भी ले कर एक एयर कंडीशंड रूम में फिट करवा लें |
एक सेल्समैन को कंप्यूटर चलाना बता कर अच्छी ड्रेस पहना कर बैठा दें |
बस हो गया काम |
ग्राहक ने ३ रुपये की पेन्सिल मांगी - बार कोड रीडर से स्केन कर के बिल हाथ में थमाइये |
वो गरीबी के रेखा के आसपास रहने वाला नागरिक अपना क्रेडिट कार्ड देगा - स्वाइप कीजिये |
उसके सेविंग अकाउंट से ३ रुपये निकल कर आपके करेंट अकाउंट में आ जायेंगे |
कितना सरल है |
मुड़े तुड़े - फटे पुराने - सड़े गले ५-१० रुपये के नोटों से छुटकारा मिल जायेगा |
सब काम बिल में होगा तो ब्लैक मनी (५-१० रुपये के मुड़े तुड़े - फटे पुराने - सड़े गले नोट) से भी छुटकारा मिल जायेगा |
हुक्मरानों ने तो पिछले ६४ वर्षों से आप सब का भला ही करना चाहा है - आप लोग ही नहीं सुधरते तो कोई क्या कर लेगा |

संजय बेंगाणी said...

डिजीटल मूद्रा का प्रचलन बड़े तो पारदर्शिता भी आएगी और काला धन भी समाप्त होगा.

संजय बेंगाणी said...

धातू के सिक्के छोटी मुद्रा के रूप में व्यवहारिक है, मगर लालची लोग उन्हें गला देते है. ये लोग न तो कॉर्पोरेटर है, न सरकारी कर्मचारी है, न ही शासक है.

इस समस्या के लिए जिम्मेदार ये लोग भी गाली खाने व लतियाने लायक है.

कई जगहों पर मैने सामानांतर मुद्रा भी देखी है. यह गेरकानुनी है मगर सब मजबुरी के कारण ही होता है.

योगेन्द्र सिंह शेखावत said...

नहीं सर जी, सिर्फ मध्य प्रदेश ही नहीं है, ये पूरी की पूरी समस्या राजस्थान में भी एकदम ऐसी ही है, कमीशन पर चिल्लर देने का धंधा खूब फल-फूल रहा है लगता है जैसे छोटे स्तर पर लीगल रूप से हवाला का काम चल रहा हो |
शादी-ब्याह में 51,121,511 जैसे आंकड़ों में रुपये देने पर भी इनकी कमाई अच्छी चल रही है | कभी ऑटो में बैठना पड़ता है तो पूछ कर बैठता हूँ की खुल्ले हैं न भाई, नहीं तो उतरने के बाद में झिक-झिक शुरू हो जाती है, क्योंकि चालक लोग कई बार जानबूझकर भी पूरा नोट रखने की मंशा में खुल्ले न होने का बहाना बना देते हैं और अन्य कोई भी व्यक्ति या दूकान वाला किसी को भी हमारे यहाँ खुल्ले पैसे देता नहीं सो दिक्कत का सबब बन जाता है |

कई बार जब कोई काम पहले हो जाता है, मसलन आपका जैसे जेरोक्स निकलवा ली, बाद में पैसे देते समय पता चला चेंज नहीं है तो अन्य कोई भी दूकान वाला चेंज करने को तैयार नहीं होता, चाहे कितनी ही मिन्नत कर लो, यह एक बहुत बड़ी समस्या का रूप ले चुका है हमारे यहाँ तो और पांच के नोट यहाँ भी ऐसी ही शक्ल के चल रहे हैं |
व्यापारियों ने तो चिल्लर की भी जमाखोरी शुरू कर दी है | आकंठ तंग आ गए हैं भई इस समस्या से तो |

ऐसी जगहें जहाँ फॉर्म और पैसे नकदी जमा करने होते हैं, वहाँ पहले से खुल्ले साथ में लेकर चलते हैं वर्ना एक घंटे लाईन में खड़े होने के बाद नंबर आने पर ये सुनना पड़े की खुल्ले लेकर आओ तो फॉर्म जमा होगा तब दिमाग का दही हो जाता है | और फिर घूमते रहो खुल्ले के चक्कर में और बाद में मेनहत करके खुल्ले लेकर वापस पहुँचते हैं तो पता चलता है लंच हो गया, दफ्तर बंद हो गया, पोस्ट-ऑफिस की रजिस्ट्री 3:30 के बाद अब नहीं होगी, अब डीडी नहीं बनेगा कल आना वगैरह वगैरह, अगर फॉर्म की लास्ट डेट पर चेते तो गया आदमी काम से |

Piyush Pant said...

एक अच्छा लेख......... वास्तव मे जिस तरह की समस्या का उल्लेख आपने किया है..... उसका कुछ अंश यहाँ (उत्तराखंड मे) दिखाया जाता है..... यहाँ सिक्कों की कमी नहीं है॥ पर अपनी अधिक कमाई के फेर मे अक्सर दुकानदार खुले न होने के नाम पर कोई अन्य सामग्री आप पर थोप देते हैं... हालांकि बाद मे आपके जिद करने पर आपको उनके पास खुले पैसे मिल भी जाएंगे..... पर सीधे वो देने से बचते हैं....

सम्वेदना के स्वर said...

इधर मात्र 111 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले चंड़ीगढ में जगह जगह पर Coin Dispenser machine लगा रखी है भाई लोगों ने, दस,पचास के नोट डालों और सिक्के बाहर!

इस शहर में इन मशीनों का ओचित्य मैने यही समझा था कि इस मशीन को बनाने वाली कम्पनी से सेटिंग होगी, लगाने वालों की! क्योकि प्रतिव्यक्ति खर्च का आंकाड़ा इस शहर का सबसे अधिक बताया जाता है। (हम जैसे दाल-रोटी वालों को भी औसत में शामिल करने के बाद भी)

Ratan Singh Shekhawat said...

इस सरकार को गरीबों की चिंता नहीं है इसे तो अमीरों का ख्याल रखना है अब आपने बड़े नोट बंद करवा दिए तो बेचारे अमीर लोगों के बच्चे क्या बाजार में खरीददारी के लिए बोरियां भरकर मुद्रा ले जायेंगे ?

Agyaani said...

सुरेश जी चंडीगढ़ में ये समस्या नहीं के बराबर है लेकिन ये जरुर है की कई बार फोटोकोपी फ्री में भी करनी पड़ती है क्यूंकि ग्राहक कई बार १ कॉपी करवाकर १०० का नोट दिखा कर जेब में डाल लेता है लेकिन कम हम भी नहीं, कई बार तो मूड में होने पर हम ९९ रूपये वापिस कर के ही छोड़ते है :)

Man said...

वन्देमातरम सर ,
छोटे दुकानदारो और दिहाड़ी मजदूरों के रोजमर्रा की यही कहानी हे |राजस्थान में ये स्थिति समान नहीं हे जेसे की हमारे अजमेर डिस्ट्रिक्ट में कलकारखानो और ओद्योगिक क्षेत्र होने के कारण ,लोगो के सरकारी नोकरियो में होने के कारण रूपये दो रूपये को महत्व नहीं दिया जाता हे या तो दूकानदार छोड़ देता हे या ग्राहक यदि सों पचास का सामान लिया हो तो लेकिन मेन समश्या ओटू ,परचूनी , टायर पंक्चर , फोटो कॉपी शॉप पर आती हे |बाकी सारी जो दिक्कते आप ने बताई हे मध्य परदेश से अलग नहीं हे |

अंकुर गुप्ता said...

इधर छ.ग. में भी है.

सुलभ said...

YAHAN ULLEKHIT SAMASYAAEN MAIN UTTAR BHARAT KE 3-4 RAJYON ME DEKH RAHA HUN. AUTO WALE, DAWA DUKAAN WALE, YA BAAJAAR ke DUKAANDAAR AAM GARIB LOG KA NUKSAAN KAR HEE DETE HAIN.

WAISE GALI MOHALLE KE DUKAANDARON KO BAHUT SAMASYAAON KA SAAMNA KARNA PADTA HAI. EK TO UNKE GINIE CHUNE GRAAHAK HOTE HAIN, UNKE LIYE ROZ ROZ CHILLAR KA JUGAAR RAKHNA TAKLIF-DEH HAI.

YADI BADE NOT PRACHALAN ME KAM HON TO NISCHIT RUP SE KAALE KAROBAARIYON, RISHWAT LEN DEN KARNE WALON KO SAMASYAAN AAYEGI AUR AAM LOGON KA KUCHH HAQ MARAANE SE BACHEGA.

राज भाटिय़ा said...

आप के विचार से सहमत हे, ओर मै भी कई बार इन बातो का भोगी हुआ हुं.बहुत सुन्दर प्रस्तुति.धन्यवाद

हल्ला बोल said...

एक अच्छा लेख

Gautam Kashyap said...

आपकी सभी सूचनाएँ अत्यंत ज्ञानवर्धक होती है , साथ ही हम जैसे युवाओं को अपने आलेख से विभिन्न व्स्तुस्थितियों से अवगत कराकर उन्हे जिम्मेदार भी बना रहे हैं। हम इसके लिए आपको धन्यवाद प्रेषित करते हैं।

Kartikey Kumar said...

बिलकुल सही लिखा हैं आपने पर आप को एक बात और बता देना चाहता हूँ की आपके मध्यप्रदेश में ही नहीं अपितु उत्तरप्रदेश में भी ये काम बहुत तेजी पर हैं! यहाँ तो २-३ बार पुलिस के छापे भी पड़ चुके हैं उन लोगो के यहाँ जो सिक्के गलाते हैं! बाबा रामदेव ने सही मुद्दा उठाया हैं किसी ने सच ही कहा हैं की
क्रांति छोटी-छोटी बातो पर नहीं छोटी-छोटी बातो से होती हैं

स्वाति said...

ज्ञानवर्धक प्रस्तुति....

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

गज़ब का आलेख सुरेश भाई...सोचने को मजबूर कर दिया...
यहाँ राजस्थान में अभी तक तो ऐसी समस्या नहीं दिख रही थी किन्तु पिछले कुछ समय से यहाँ भी छोटे नोट देखने को दुर्लभ हो रहे हैं...शायद यहाँ अभी शुरुआत है...

Rajesh said...

Suresh Ji, Is Rashtra ko Sahi Siksha ki Avshyakta Hai. Har Samasya ka Samadhan hai. Agar Bhartiya Samassyo se Playan Na Kare ...TO kuch ho sakta hai.

Man said...

http://blog.sureshchiplunkar.com/2011/05/big-currency-notes-in-india-black-money.html..................welcome

Yogesh shighaniya said...

This is right.....
Aaj sabhi jagah par yahi problem he.... Sarkar apna sochati he dusroka nahi.aakhira sarkar bani kis lia janta ki help ke liye ya...apne jeb ko bharne ke liye.

Jeet Bhargava said...

सुरेशजी आप नाहक ही परेशान हो रहे हो. जब पूरे देश में राहुल जैसा खोटा और मंदबुद्धि सिक्का चल सकता है, तो भला फटे-पुराने नोटों के लिए आप एतराज करने वाले कौन होते हैं.
कलयुग है भाई. राहुल के भट्टा परसौल से लेकर तीस्ता के गुजरात तक सब खोटे सिक्के ही चलन में हैं. जय हो!

katyayan said...

khote sikke hi chal rahe hain kal agnivesh ne amarnath yatra par prashan khada kiya hai hindu ka dushman hindu hi hai kya ye chutiya haj yatra ke bare mein eisa bol sakata hai holi mat khelo pani bachao deepawali par fatakhe mat fodo systmatically hinduon ka thyoharon par hamala kuretion ke nam par muharram mein khud ko ghayal karana kya kuriti nahi hai bali pratha kya kuriti nahi hai media ko kabhi iska virodh karate nahi suna ya dekha

Man said...

http://jaishariram-man.blogspot.com/2011/05/blog-post.html

पद्म सिंह said...

दिल्ली एन सी आर में इस समस्या से निपटने का नया तरीका ईज़ाद किया गया है. लगभग सबकुछ दस के गुणक में मिलेगा... दस का सवा किलो, दस का पाव, दस का डेढ़ किलो, इस पद्धति से मंहगाई भी नहीं बढती है... मै पहले भी सौ रूपये का तेल डलवाता था... आज भी सौ का ही डलवाता हूँ... देखा!

वैसे कुछ भी हो भ्रष्टाचार को आज एक समस्या माना जाने लगा है यह सुखद है. प्रश्न उत्तर की तरफ उठा हुआ पहला कदम होता है

Prabhat Kumar Rajan said...

Pracgin Bharat Ka Itihas,
samanya Gyan Sirij Part 1 Written By Prem Sundaram. Competition Ki Tayari Ke Liye Dekhe : prabhatkumarrajan.blogspot.com

राष्ट्रीयता said...

अच्छे साहित्य का अभाव पत्र-पत्रिकाओं और आधुनिक प्रकाशनों में स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है. देश और समाज के समक्ष वर्तमान में जो चुनौतियां हैं संप्रति साहित्य में उनका आभास तक नहीं है. विखंडन और ह्रास व्यक्ति और समाज में इस सीमा तक व्याप्त है, कि हम सभी अपने व्यक्तिगत मानकों को लेकर संकुचित हो रहे हैं, सिमट रहे हैं.



प्रगतिशीलता की उलझन और पश्चिमी वैज्ञानिक/मार्केटिंग/उपभोग आधारित दृष्टिकोण के विरोधाभासों के कारण आम व्यक्ति का विवेक/वैचारिक/भावनात्मक संतुलन छिन्न-भिन्न हो रहा है. शेष कसर हमारे देश के टीवी चैनल्स और समाचार पत्रो ने पूरी कर दी है, जिनकी अनुत्तरदायित्वपूर्ण, भ्रमपूर्ण और मिथ्या प्रस्तुतियों के कारण सिद्धांत और व्यवहार के विरोधाभास और अधिक गहरा गए हैं.



आक्रमण केवल भौतिक नहीं है, वह वैचारिक और सांस्कृतिक भी है. एक ओर उसमें वैज्ञानिक तथ्यों से समर्थित वैचारिक कुतर्क हैं, तो दूसरी ओर हमारी अपनी दुर्बलताओं पर प्रहार करते प्रलोभन हैं, जो लगातार हमारी प्रतिबद्धता की परीक्षा ले रहे हैं.



http://rashtra-dharm.blogspot.com/ के रूप में यह ब्लॉग देशभक्ति के प्रचार-प्रसार का एक छोटा सा प्रयास है, जिसमें आपका सहयोग अपेक्षित है. इस ब्लॉग के टिप्पणीकार बनें और अपनी ज्ञानपूर्ण टिप्पणियों, विचारों से विचारधारा को पुष्ट करें.

rajeshnew said...

aapka prayas achchha hai. Sureshji aapko shubhkamnaye.

समीक्षा said...

एक उपाय यह भी है कि सरकार १० २० ५० १०० रुपये के सिक्के पर्याप्त मात्रा में बनाना शुरू करे अधिक कीमत होने पर कोई इन्हें गला भी नहीं सकता

प्रभाकर विश्वकर्मा said...

सुरेश जी उत्तरप्रदेश मेँ भी यह समस्या है स्वामी रामदेव जी ने बिलकुल सही समाधान सुझाया है पर सरकार माने तब तो! (प्रभाकर विश्वकर्मा)

चाष्‍टा said...

आपकी बात पढकर एक छोटा सा सुझाव मुझे आया है. यदि ATM धारक एक मुश्‍त रूपये नहीं निकाल कर 2-3 बार में ATM मशीन से रूपये निकाले तो 100 के नोट ही निकलेगें. इस तरह बैंकों पर भी दबाव रहेगा कि 100 के नोटों की खपत ज्‍यादा रहती है और वे छोटे नोट ही रखेगें. वैसे ये कारगर उपाय नहीं है. कारगर तो 1000 व 500 के नोट छापना बंद करना ही है.

सोनू said...

4) जिन व्यक्तियों को बड़ी मात्रा में ट्रांजेक्शन करना हो, उन्हें PAN कार्ड क्रमांक के साथ क्रेडिट/डेबिट कार्ड, नेट बैंकिंग अथवा चेक से भुगतान अनिवार्य किया जाए (काले धन पर रोक हेतु एक और कदम)

PAN कार्ड पहचान-पत्र का काम करता है। लेकिन परेशानी यह है कि इसको बनवाने के लिए भी पहचान-पत्र चाहिए होता है, जिसमें आपके नाम की हिज्जे सही लिखे हों। अगर किसी के पास मतदाता पहचान-पत्र, ड्राइविंग लायसेंस, या दसवीं का प्रमाणपत्र नहीं है तो फिर उपाय बचता है "राजपत्रित अधिकारी का प्रमाणपत्र"। अगर कोई भी राजपत्रित अधिकारी दस्तख़त करके दे दे कि यह फोटो फलाने की है जो फलाने का सुपुत्र है, और फलानी जगह रहता और मैं इस बंदे को इतने सालों से जानता हूँ, तो यह पहचान और पते के प्रमाण के तौर पर स्वीकार्य होता है। इसलिए लोग चार्टर्ड अकाउंटेंटों से पैन कार्ड बनवाते हैं। इनकम टैक्स ऑफिसर चार्टर्ड अकाउंटेंटो के लिए ऐसे प्रमाण-पत्रों पर बेरोकटोक हस्ताक्षर कर देते हैं।

इधर जयपुर में जब से नए एक, दो और पाँच के सिक्के आए हैं, जब वो क्रूसरेडर क्रॉस वाला सिक्का भी आया था, तब से रेज़गारी का टोटा कम हुआ है।