Friday, April 15, 2011

पेशाब वाले लोटे से पानी-पुरी, शवगृह के बर्फ़ से ठण्डा नीबू पानी… Road Side Unhygienic Food, Mumbai-Delhi Pani Puri, Vada-Paav

शीर्षक देखकर चौंकिये नहीं, और न ही अश्लील और भद्दा समझिये… यह एक ऐसी घृणित हकीकत है। इस लेख को पढ़कर और वीडियो देखकर, आप न सिर्फ़ वितृष्णा और जुगुप्सा से भर उठेंगे, बल्कि भारत के सार्वजनिक स्थानों पर लगने वाले फ़ुटकर ठेलों, खोमचों एवं रेहड़ियों पर दिन-रात बिकने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी मानकों को गाली दिये बिना नहीं रहेंगे…

महानगरों की भागदौड़ भरी दिनचर्या में रोजाना दिल्ली-मुम्बई जैसे शहरों में लाखों-करोडों लोग दिन में कभी न कभी, किसी न किसी बहाने सड़कों पर स्थित खोमचे-रेहड़ी-ठेले में खाते-पीते ही हैं… कई बार ऐसा मजबूरीवश होता है, कभीकभार अनजाने में, तो कभी जानबूझकर ज़बान का “स्वाद बदलने” की खातिर किया जाता है। अक्सर इन ठेले वालों के ग्राहक युवा वर्ग, मेहनतकश मजदूर, टूरिंग जॉब करने वाले निम्न-मध्यमवर्गीय लोग होते हैं। मैंने और आप ने, सभी ने, कभी न कभी इन ठेलों पर मिलने वाले व्यंजनों को खाया ही है…

ठाणे के नौपाडा में रहने वाली अंकिता राणे एक युवा जागरूक नागरिक हैं। हाल ही में उन्होंने अपने घर की खिड़की से वीडियो शूटिंग करके, सामने लगने वाले पानी-पताशे के ठेले वाले को न सिर्फ़ बेनकाब किया, बल्कि उसे पुलिस में देकर अपना नागरिक कर्तव्य भी निभाया। 59 वर्षीय राजदेव लखन चौहान, भास्कर कॉलोनी ठाणे, में नियमित रूप से पानी-पताशे का ठेला लगाता है (था), जिसे 13 अप्रैल को पुलिस ने उसी बर्तन में पेशाब करने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया, जिस बर्तन से वह ग्राहकों को पानी पिलाता था।

19 वर्षीया अंकिता राणे बताती हैं कि “उनके घर के सामने रोज वह व्यक्ति अपना ठेला लगाता था, वह अपनी खिड़की से उसे देखा करती थी। पहले भी मैं अपने दोस्तों को आगाह कर चुकी थी कि, यहाँ पर कुछ भी न खाओ…”, क्योंकि यह व्यक्ति ठेले पर साफ़-सफ़ाई तो बिलकुल नहीं रखता, बल्कि कान-नाक खुजाते हुए, उसी हाथ से वह ग्राहकों को पानी-पुरी खिलाता था, परन्तु मेरे दोस्त मेरी इन बातों को हँसी में उड़ा देते थे। परीक्षाएं खत्म होने के बाद फ़ुर्सत में मैंने उस ठेले वाले पर निगाह रखना शुरु किया। मैं यह देखकर हैरान हुई और घृणा से भर उठी कि जिस लोटे से वह पानी-पताशे का मसाला बनाता था और जिस लोटे से कभीकभार ग्राहक पानी भी पी लिया करते थे, वह उसी लोटे में पेशाब भी करता है। जब यह बात मैंने अपने मित्रों, परिवारवालों एवं बिल्डिंग निवासियों को बताई तो किसी ने भी इस पर विश्वास नहीं किया, तब मैंने इसकी यह घृणित हरकत कैमरे में कैद करने का फ़ैसला किया।


वीडियो को देखने के बाद ही स्थानीय निवासियों ने पहले तो उस पानीपुरी ठेले वाले की "चकाचक धुलाई" की और फ़िर उसे पुलिस थाने ले गये, जहाँ उसके खिलाफ़ केस दर्ज किया गया। ठेले वाले चौहान की सफ़ाई भी बड़ी “मासूमियत”(?) भरी थी, जिसका कोई जवाब न तो पुलिस के पास था और न ही महानगरपालिका के अधिकारियों के पास, उसने कहा, “यहाँ आसपास आधा किमी तक एक भी सार्वजनिक मूत्रालय नहीं है, मैं अपने ठेले को लावारिस छोड़कर इतनी दूर बार-बार पेशाब करने कैसे जा सकता हूँ…। चूंकि यह कालोनी साफ़-सफ़ाई में अव्वल है और यहाँ की गलियों में भी लगातार भीड़ की आवाजाही बनी रहती है, तो मैं पेशाब कहाँ करूँ?”… थाना प्रभारी हेमन्त सावन्त ने भी इस बात की पुष्टि की, कि इस इलाके में आसपास कोई भी सार्वजनिक मूत्रालय नहीं है, पहले एक-दो थे भी, लेकिन वह भी अतिक्रमण और बिल्डरों के अंधे लालच में स्वाहा हो गये…

प्रस्तुत है यह वीडियो, जिसमें यह ठेलेवाला बड़ी सफ़ाई से अपनी “कलाकारी” दिखा रहा है… वीडियो में शुरुआती कुछ सेकण्ड की शूटिंग पेड़ के पत्तों में दब गई है, परन्तु बाद में सब कुछ स्पष्ट है…




इस वीडियो की डायरेक्ट लिंक यह है…
http://www.youtube.com/watch?v=7EYHcDHQbU8

पुलिस के सामने समस्या यह थी कि आखिर उस ठेले वाले को किस धारा के तहत केस बनाया जाए, फ़िलहाल उन्होंने मुम्बई पुलिस एक्ट के “सार्वजनिक स्थल पर पेशाब करने” के तहत 1200 रुपये जुर्माना और चेतावनी लगाकर छोड़ दिया है। जिस तरह दिल्ली के लाखों कामकाजी लोग सस्ते छोले-भटूरे पर गुज़ारा करते हैं, उसी तरह मुम्बई में भी लोग अपना पेट भरने के लिये वड़ा-पाव और पाव-भाजी पर निर्भर रहते हैं, परन्तु यह घटना सामने आने के बाद कहना मुश्किल है कि लोग अब क्या करेंगे? स्थानीय निवासियों में इस बात को लेकर भारी नाराज़गी है कि महानगरपालिकाएं उनसे भारीभरकम टैक्स तो ले रही हैं, बल्कि सरकारी कर्मचारी इन ठेले-रेहड़ी-खोमचे वालों से भी दैनिक वैध-अवैध वसूली भी करते रहते हैं, लेकिन जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने की इन्हें पूरी छूट है, न तो सरकार और न ही पुलिस, इन ठेलों पर साफ़-सफ़ाई के स्तर के बारे में कभी कोई जाँच ही करते हैं…।

ठाणे महानगरपालिका के डिप्टी कमिश्नर बीजी पवार कहते हैं कि “निश्चित रूप से यह घटना चौंकाने वाली है, हम इस ठेले वाले का मामला पुलिस के साथ ही स्वास्थ्य विभाग के कानूनों के मुताबिक भी देखेंगे एवं उसे उचित सजा दिलाई जाएगी… साथ ही अंकिता राणे की जागरुकता का सम्मान करते हुए नगरपालिका उसे नगद पुरस्कार से भी सम्मानित करेगी…”। मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी इस सम्बन्ध में टिप्पणी हेतु उपलब्ध नहीं हो सके… न ही कमिश्नर इस बात का कोई जवाब दे सके कि इलाके में आसपास कोई सार्वजनिक मूत्रालय क्यों नहीं है?  सरकारी लेतलाली का आलम यह है कि न तो इन ठेलों को "फ़ूड लाइसेंस" लेने की आवश्यकता है, न ही वैध बिजली-नल कनेक्शन… और इस घिनौनी हरकत पर सिर्फ़ 1200 रुपये का जुर्माना(?), इतनी तो इसकी आधे दिन की कमाई है… क्या कहा? विश्वास नहीं होता? मेरे घर के पास ही एक पानीपुरी वाला रहता है, सिर्फ़ शाम को 5 बजे से रात 11 बजे तक ठेला लगाता है, उसने मात्र 6 साल के अन्दर अपना मकान बनाया और एक ऑटो भी खरीद लिया है…


बहरहाल, ऐसी घटना कहीं भी, किसी भी राज्य में, किसी भी शहर में घट सकती है, घटती रहती होंगी, परन्तु हम भारतवासी चूंकि स्वास्थ्य मानकों को लेकर बहुत अधिक गम्भीर नहीं हैं इसलिये हम साफ़-सफ़ाई और “हाईजीन” को उपेक्षित कर देते हैं, जो कि सही नहीं है। ऐसा भी नहीं कि इस प्रकार की घिनौनी हरकतें सिर्फ़ सड़कों पर स्थित ठेलों-खोमचों में ही होती हैं… यदि आप मैक्डोनाल्ड और पिज्जा हट के किचन में भी झाँककर देखें, निगाह रखें तो वहाँ भी आपको नाक पोंछते शेफ़ और सड़ा हुआ मैदा-आलू, यहाँ-वहाँ घूमते चूहे इत्यादि मिल ही जाएंगे…

दो वर्ष पहले भी मैंने इसी से मिलती-जुलती एक पोस्ट लिखी थी, जिसमें बताया था कि सड़क किनारे मिलने वाले नीबू पानी में शवगृह में उपयोग किये जाने वाले बर्फ़ का ठण्डा पानी मिलाया जाता है, क्योंकि बर्फ़ फ़ैक्ट्रियों से मिलने वाला बर्फ़ महंगा पड़ता है, जबकि सरकारी अस्पतालों के पोस्टमार्टम गृह एवं शवगृह में आधे से अधिक पिघल चुके बर्फ़ की सिल्लियों को खरीदने के लिये इन खोमचेवालों की भीड़ देखी गई जो सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से, शवों के नीचे रखे बर्फ़ को सस्ते दामों पर खरीद लेते हैं और उस बर्फ़ को नींबू पानी, बर्फ़ के गोले, मछली, मटन ठंडा रखने और फ़्रेश जूस(?) आदि में मिलाया जाता है… पूरा लेख इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ें…

http://blog.sureshchiplunkar.com/2009/03/cold-drinks-ice-road-side-vendors-in.html

पुराने जमाने के लोग “घर के खाने” पर ही जोर देते थे, बल्कि कई परिवारों में तो बाहर से आए हुए व्यक्ति के जूते-चप्पल घर से बाहर रखने, बाहर से आने पर हाथ-पाँव-मुँह धोने, “सिर्फ़ और सिर्फ़” रसोईघर में ही भोजन करने, बिस्तर-सोफ़े इत्यादि पर बैठकर न खाने जैसे कठोर नियम पालते थे, आज भी कई घरों में यह नियम पाले जाते हैं… ज़ाहिर है कि “घर का भोजन” तो घर का ही होता है। फ़िर भी यदि मजबूरीवश आपको कहीं बाहर खाना ही पड़ जाये तो कम से कम एक निगाह ठेले-खोमचे के आसपास के माहौल, साफ़सफ़ाई एवं बनाने वाले की “शारीरिक दशा-महादशा” पर तो डाल ही लें…। चलिये उस अनपढ़ ठेले वाले को छोड़िये, कितने पढ़े-लिखे लोग हैं जो पेशाब करने के बाद अच्छे से हाथ धोते हैं? कितने संभ्रान्त लोग हैं जो यहाँ-वहाँ थूकते रहते हैं? कितने लोग “मौका देखकर” यहाँ-वहाँ पेशाब कर ही देते हैं?

और आप चाहे लाख सावधानियाँ बरत लें, फ़िर भी जो होना है वह तो होकर ही रहेगा… किस्मत खराब हो तो ऊँट पर बैठे आदमी को भी कुत्ता काट लेता है कभी-कभी…

खबर का स्रोत :- Mumbai Mirror

39 comments:

Deepesh said...

यह तो ठेले वाला था, मैने तो सुना है कि कई बडे़ होटल वाले भी झूठन को दुबारा परोस देते है ।

संजय बेंगाणी said...

सरकार जिम्मेदार...अधिकारी जिम्मेदार... मगर जिसका यह फर्ज है कि पैसे ले रहा है तो बदले में स्वच्छ वस्तु दे उसका क्या? यह बड़ा इंडस्ट्रियलिस्ट नहीं है मगर अपराध धोखेबाज इंडस्ट्रियलिस्ट से कम नहीं इसका.

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

सच में बड़ी शर्मनाक घटना है| आपने सही कहा कि ऐसा केवल ठेले वाले नहीं बड़े बड़े होटल वाले भी करते हैं|
जयपुर में सुभाष चौक नामक एक स्थान है जहाँ का मांस बड़ा प्रसिद्द है| एक बार किसी काम से मेरा वहां जाना हुआ एक मित्र के साथ| मै बाहर ही एक मीट शॉप के बाहर उसकी प्रतीक्षा कर रहा था| मैंने देखा एक कसाई जानवर की चर्बी को चाक़ू से कूट कूट कर उसका कीमा बना रहा है| वहां बदबू से हाल बेहाल था| मुझे ऐसी जगह जाना पसंद नहीं है क्यों की मै मांसाहार से घृणा करता हूँ| किन्तु जब मैंने देखा की मांस तो अलग बात है यह चर्बी से क्या कर रहा है? पूछने पर उसने बताया कि इससे हम घी बनाते हैं| सुनकर बड़ा धक्का लगा| मैंने पूछा यह घी कौन खरीदता है? तो उसने बताया कि आपने कभी मैकडोनाल्ड या पिज्जा हट में खाना खाया हो तो वे लोग हमसे ही घी खरीदते हैं| तब मैंने पूछा कि क्या लोग यह जानते हैं तो उसने बताया कि जब लोग जानबूझ कर मैकडोनाल्ड में मिलने वाला गौमांस से बना बर्गर खा लेते हैं तो इस घी से उन्हें क्या फर्क पड़ेगा?
कहना तो उसका सही था किन्तु जो लोग शाकाहारी हैं उनका क्या? पर सोचने पर दिमाग में बात आई कि जब शाकाहारी लोग यह जानते हैं कि रहन एक ही रसोई में वेज और नॉनवेज दोनों पकाया जा रहा है, उन्हें उससे कोई समस्या नहीं है तो इस घी से भी शायद उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा| किन्तु है तो यह धोखेबाजी ही|

राज भाटिय़ा said...

आप की एक एक बात से सहमत हुं, ठेले ही नही बडे बडे होटल वाले भी ऎसा करते हे, मैने जिन्दगी मे बहुत ही कम खाया हे किसी होटल से या ठेले से खाना,वो भी मजबुरी वंस, वर्ना तो मै घर का बना ही खाता हुं,लेकिन लोग होटल मे खाना अपनी शान समझते हे,जब भी भारत आया दोस्त ओर रिश्ते दार मंहगे से मंहगे होटल मे ले कर गये, ओर हम बेमन से चले जाते थे, अब भी लोगो की आंखे ना खुले तो क्या करे?

Shah Nawaz said...

बहुत ही बेशर्मी और घिन्नता की बात है और इसके लिए हम लोग भी ज़िम्मेदार हैं, जो बिना देखे ही कहीं भी कहीं खाने के लिए तैयार हो जाते हैं.

honesty project democracy said...

सुरेश जी निश्चय ही ये ठेला वाला लोगों के विश्वास का हत्यारा है ठीक उसी तरह जैसे आज राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के पदों पर बैठे लोग इस देश के आम लोगों के विश्वास के हत्यारे हैं..इसलिए इस ठेले वाले को तो 1200 रुपया जुरमाना के साथ छोड़ दिया गया लेकिन मुंबई के मुनिसिपल कमिश्नर तथा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के पद पर बैठे लोगों को इसके लिए सार्वजनिक रूप से 1200 जूते मारे जाने चाहिये तब जाकर ऐसा विश्वासघात बंद होगा समाज से....

dipti said...

अंकिता राणे की जागरुकता का सम्मान करते है.

Arvind Mishra said...

बहुत घृणित ...ये स्व मूत्र का इस्तेमाल कहीं पानी पूरी के पानी में डालने के लिए तो नहीं करता था या फिर सोच की सुलभ व्यवस्था न होने पर बिजिनेस टाईम पर इस घोर आपत्तिजनक तरीके से निपटान करता था ?

उम्दा सोच said...

अंकिता राणे की जागरुकता के हम ऋणी है !

आपकी हर पोस्ट जनजागरण एवं सामाजिक सरोकार से परिपूर्ण रहती है ! आपकी देशभक्ति तथा सार्थक प्रयासों को साधुवाद !

दिवाकर मणि said...

आपका आलेख इधर-उधर, यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ मुँह मारने वालों के लिए शायद सबक बने। ;)

शिवम् मिश्रा said...

अंकिता राणे को इस पहल पर सलाम ! आपका आभार !

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

इसमें कोई शक नहीं कि ठेले वाले ने घृणित अपराध किया है और उसे सजा मिलनी चाहिए... पर ठेलेवाले के साथ साथ नगर पालिका अधिकारी को भी उचित दंड दिया जाना चाहिए....

इस तरह के खबरों पे आम प्रतिक्रिया यही है की ठेले वाले का खाना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है. आम धारणा यही बनती है की डिब्बा बंद और वेस्टर्न फ़ूड ही स्वास्थ्य के लिए उचित है. मतलब धीरे-धीरे दिमाग में यही उतरता जा रहा है की भारतीय खाना बहार मत खाओ .. बहार खाना है तो पिज्जा - बर्गर आदि ही खाओ.

याद किजिये कैप्टेन कुक ब्रांड आटे का प्रचार - आटा पिसने वाला व्यक्ती अपनी उँगलियों से मुह से तम्बाकू निकालता है और उसी गन्दी उगली से आपको आटा देता है. लाखों करोड़ों लोग उस प्रचार के प्रभाव में आटा पिसाना छोड़ कर कैप्टेन कुक आटा खाने लगे और अब तो शहरों में तो ८०% जनता पेकेट वाला आटा ही खाता है...

प्रश्न ये उठता है की क्या सारे ठेला वाले या आटा पिसने वाले जैसे लोग गंदे और कैप्टेन कुक, पिज्जा - बर्गर सब साफ़ सफाई वाले? क्या कोका-कोला, पेप्सी में पेस्तिसईद और केडबरी में कीड़े नहीं मिले थे?

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

यह तो अधम है. पापी है. इसका तर्क ठीक है, जिसके लिये पालिका और सरकार दोनों जिम्मेदार हैं, लेकिन यह और इन्तजाम कर सकता था, एक डिब्बा और रख सकता था मूत्र विसर्जन के लिये...

Anonymous said...

आपने फ़ूड लाइसेंस की बात कही. क्या फ़ूड लाइसेंस लेने से सब ठीक हो जायेगा. बिलकुल नहीं.
सरकारी अधिकारी रिश्वत लेकर फ़ूड लाइसेंस , फायर ब्रिगेड नो ओब्जेकशन लाइसेंस, इलेक्ट्रिसिटी नो ओब्जेकशन लाइसेंस, शॉप लाइसेंस इत्यादि दे देते हैं.
ये सरकारी अधिकारी बिना रिश्वत के तो लाइसेंस देते नहीं है और रिश्वत मिलने के बात ये नहीं देखते कि सामने वाला वाकई इस लाइसेंस का हक़ रखता है या नहीं.
कहने का मतलब है कि सिर्फ रिश्वत लेकर हर प्रकार का लाइसेंस मिल जाता है उसके बाद सम्बन्धी व्यक्ति क्या करता है क्या नहीं इससे सरकारी अधिकारीयों को कोई फर्क नहीं पड़ता.

त्यागी said...

आंखे खोलने वाला तथ्य है. परन्तु सुरेश जी आप भी कहाँ फंस गए, गरीब के पेट पे लात मारने वाले तो और भी बहुत है. इस गंदकी से शारीर मर सकता है. परन्तु युद्ध तो आत्मा बेचने, देश बेचने वालो और पूरी की पूरी नसल का डी.एन.ऐ. बदलने वालो से है. इस काम (स्टिंग) को तो और भी लोग कर सकते है, परन्तु आप तो जैसलमेर सेक्टर पर भारत की पेहेरेदारी कर रहे थे , तिब्बत सेक्टर पर कोई और खड़ा है. अपना डंडा सही दिशा में और धारदार रखो.
क्यूंकि क्रांति अभी बाकी है और देश और हिन्दू अन्धकार में.
सत्य उजागर करने के लिए साधुवाद.
आपका प्रिय
त्यागी
www.parshuram27.blogspot.com

IRA Pandey Dubey said...

is lekh ko pad kar mere rogate khade ho gaye he bhagwan hum ko ye kaha le ja rahe hai ?

क्रांतिकारी हिन्दोस्तानी देशभक्त said...

ना जाने कब हम इस बाहार की शानो शोकत से बाज आयेंगे ये तो एक ठेले वाले को राने जी ने देख लिया परन्तु जो होटलों के अंदर बैठ कर ऐसे कृत्य करते हैं उनको कौन देख पाता है, शायद कोई नहीं इसीलिए हम बड़े चाव से चटकारे लगाते हुए रेस्टोरेंट से बाहार निकलते हैं और इन चटकारों का बदला डॉक्टर के पास ऑपरेशन करवाकर चुकाना पड़ता है , मैं तो कहना चाहूँगा जितना हो सके घर का खाना खाओ वरना घर से काले चने भून कर साथ पोटली में दाल कर मेरी तरह साथ ले जाओ जहाँ कहीं भूख लगे तो वो चने निकाल कर खा लो और साथ पानी की बोतल ले जाना मत भूलिएगा !
www.krantikarideshsevak.blogspot.com

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

अंकिता राणे ने जागरूकता दिखाई और मुंबई मिरर की गैरजिम्मेदार पत्रकारिता ने इसे ऐसे प्रस्तुत करा कि महाराष्ट्रनवनिर्माण सेना ने एक बार फिर सभी खोमचे वालों को तांडव दिखाया।
आयुर्वेद के अनुसार नौ पशुओं का मूत्र(गौ मूत्र विशेष तौर पर) औषधीय गुणों से युक्त होता है, स्वमूत्र के भी औषधीय गुण छिपे नहीं हैं और फिर यदि मल्टीनेशनल कंपनियां अपने उत्पादों में इसका प्रयोग स्वादवर्धन के लिये कर रही हों तो किसे पता वो तो अमिताभ बच्चन से लेकर सचिन तेंडुलकर से एडवर्टाइज करवा कर सब दोष ढंक लेते हैं
म.न.से. का तांडव सभी गरीबों को मूत्रविसर्जन ही नहीं करने दे रहा।

lokendra singh rajput said...

ऐसे लोगों के साथ ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए कि वह दुनिया के लिए नजीर बन जाए।

Ashish Shrivastava said...

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...
इसमें कोई शक नहीं कि ठेले वाले ने घृणित अपराध किया है और उसे सजा मिलनी चाहिए... पर ठेलेवाले के साथ साथ नगर पालिका अधिकारी को भी उचित दंड दिया जाना चाहिए....

इस तरह के खबरों पे आम प्रतिक्रिया यही है की ठेले वाले का खाना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है. आम धारणा यही बनती है की डिब्बा बंद और वेस्टर्न फ़ूड ही स्वास्थ्य के लिए उचित है. मतलब धीरे-धीरे दिमाग में यही उतरता जा रहा है की भारतीय खाना बहार मत खाओ .. बहार खाना है तो पिज्जा - बर्गर आदि ही खाओ.

याद किजिये कैप्टेन कुक ब्रांड आटे का प्रचार - आटा पिसने वाला व्यक्ती अपनी उँगलियों से मुह से तम्बाकू निकालता है और उसी गन्दी उगली से आपको आटा देता है. लाखों करोड़ों लोग उस प्रचार के प्रभाव में आटा पिसाना छोड़ कर कैप्टेन कुक आटा खाने लगे और अब तो शहरों में तो ८०% जनता पेकेट वाला आटा ही खाता है...

प्रश्न ये उठता है की क्या सारे ठेला वाले या आटा पिसने वाले जैसे लोग गंदे और कैप्टेन कुक, पिज्जा - बर्गर सब साफ़ सफाई वाले? क्या कोका-कोला, पेप्सी में पेस्तिसईद और केडबरी में कीड़े नहीं मिले थे?

Anand G.Sharma आनंद जी.शर्मा said...

विश्व के किसी भी अन्य देश में इतने प्रकार के स्वादिष्ट - अनूठे - मनमोहक खाद्यान्न नहीं है - जितने कि भारत में हैं |

इसका एकमात्र कारण है भारतीय मानस का प्रयोगधर्मा होना |

भारतीय अपने व्यापार के चहुंमुखी विकास के लिए निरंतर नूतन प्रयोग करते रहता है |

भारतीय जब शैशवावस्था अथवा बाल्यावस्था में होता है तब माता पिता के साथ बाजार में घूमते हुए कोई मनपसंद वस्तु को लेने के लिए भूलुंठित हो जाने का सफल प्रयोग करता है |

तब से ले कर आजीवन कुछ न कुछ प्रयोग करता ही रहता है |

यदि निजी सौभाग्य एवं सामान्य जन के दुर्भाग्यवश कोई भारतीय राजनीति में प्रवेश कर जाता है तो वह राजकोष के धन का अपने स्वर्गस्थ (स्विट्ज़रलैंड स्वर्ग सद्रश्य ही है) बैंक खाते में स्थान्तरित करने का सफल प्रयोग करता है |

यदि कोई भारतीय मीडिया में प्रविष्ट हो जाता है तो वह श्यामपत्राचार (ब्लैकमेलिंग) एवं सत्ताधीशों के चरणोदक सेवन के समन्वय का अद्भुत एवं विस्मयकारी आदर्श स्थापित करता है |

स्वमूत्र सेवन के अनेकानेक लाभ - स्वानुभूत प्रयोगों के पश्चात् साधिकार लेखन द्वारा जन सामान्य को अवगत कराने के लिए अनेक लेख उपलब्ध हैं |

यदि कोई पानी पूरी विक्रेता शिवाम्बु (स्वमूत्र) के प्रयोग से पानी पूरी को अधिक स्वादिस्ट बना कर अपनी ग्राहक संख्या में अभिवृद्धि के साथ साथ ग्राहकों की "परमूत्र" चिकित्सा द्वारा अनेक रोगों के निवारण का प्रयोग कर रहा हो - तो ऐसे सेवाभावी वैज्ञानिक के प्रयोग को क्रियान्वित होने के पहले ही नष्ट कर देना एवं उसके उपरांत उसका पृष्ठपूजन कर दण्डित करना - घोर निंदनीय अपराध है |

कदाचित अन्य खाद्यान्न में भी इस प्रकार के नूतन प्रयोग अब तक प्रकाशित नहीं हो सके हैं |

सुस्वादु पानी पूरी नामक खाद्यान्न की अपेक्षा रखने वाले अब एक वैज्ञानिक के चमत्कारी प्रयोग के परिणामों से वंचित रह गए |

किसी अविष्कारक के अविष्कार को पेटेंट कराने के पहले ही नष्ट कर देना अच्छी बात नहीं है |

मैं ऐसे समाजविरोधी कृत्यों का विरोध करता हूँ |

संजय बेंगाणी said...

जहाँ-तहाँ मुँह मारने वालों....

क्षमा करें मैं बाहर का खाना नाम मात्र का ही खाता हूँ, मगर जो खाते है उनकी मजबूरी समझता हूँ. यह आपत्तिजनक शब्द है.

दिवाकर मणि said...

@संजय बेंगाणी जी, कृपया मेरी टिप्पणी एवं उसमें आगत शब्दों, पदांशों को अभिधेयार्थ में न लेकर व्यञ्जनार्थ में लें।

Sachi said...

जब मैं विद्यार्थी था, तो पास के एक छोले कुल्चे वाले पर अक्सर नज़र रखता था, कि वह पानी कहाँ से लाता है। एक दिन सुबह सुबह मुझे स्टेशन जाना था, तब मैंने देखा कि वह पास के पेशाबखाने से टपकने वाला पानी भरता है। साथ ही, सबको बताया कि वह पानी कहाँ से भड़ता है। उस दिन के बाद से जैसा कि आपने सलाह दिया है मैं अपनी भूख बर्दाश्त कर लेता था, या किसी वैसी महंगी जगह खा लेता था जहां मुझे ताज़े पानी का स्त्रोत दिखता था, लेकिन सड़क छाप जगह पर मैंने कुछ भी खाना छोड़ दिया।

राज भाटिय़ा said...

हमे तो ऎसी बातो का बहुत पहले से पता हे, इसी लिये हम कभी भी बाहर का खाना, चाट, गोलगप्पे नही खाते, चाहे कितनी भी बडी दुकान क्यो ना हो, सब मे हेरा फ़ेरी होती हे,धन्यवाद

वन्दना अवस्थी दुबे said...

क्या कहूं?

सुजीत सिंह said...

अगर ठेले वाले के नजरिया से सोचा जाय तो क्या गलत किया ? हाँ गलत किया कि उसने लोटे को बीना धोए ही पानी पिने के लिए रख दिया | जब किउसे धोकर रखना चाहिए था |
सबसे बड़ी गलती तो वहाँ के मुनिसिपलिटी की है जो तमाम तरह के टैक्स लेती है मगर मूत्रालय या प्याऊ कि व्यवस्था नहीं करवाती है | सोचिये हम जैसे लोग अगर उस जैसे पास इलाके से गुजरते है और जोर से प्यास या लघुसंका लग गयी तो क्या करेंगे ? कितना दुखी होगा मन, और गलिया देते प्यास से तडपते हुए या दबाए हुए गंतव्य कि ओर चलते जायेंगे |
उसकी गलती कि सजा तो मुनिसिपलिटी के जिम्मेदार अधिकारी को देना चाहिए | जहाँ पर आधे किलोमीटर तक कोई भी मूत्रालय नहीं है, वह पर रह चलते लोग कैसे लघुशंका करेंगे ? क्या सिर्फ ठेले वाले को सजा देने से ये घटना रुक जायेगी ?
कभी नहीं रुकेगी , जब तक प्रशासन उचित व्यवस्था न कराये | आर ये व्यवस्था प्रशासन कराई होती तो उसे ( ठेके वाले को) ऐसा करने की आवश्यकता थी ?
सिर्फ मैं ये कहना चाहता हूँ कि सिर्फ ठेले वाले को कोशने से कुछ नहीं होने वाला है | प्रशासन को उचित व्यवस्था करने के लिए आक्रोशित होना चाहिए |

अच्छी जागरूकता दिए है आप ने, कम से कम याद रहेगा तो खोमचे की ओर देखते ही आप की विडियो याद आजायेगी|

!! जय श्री राम !!

Tarkeshwar Giri said...

Bap re ..............

Man said...

वन्देमातरम सर ,
ये बहुत ही निंदनीय कृत्य हे ,यंहा वंहा खड़े हो के कुतो की जेसे पेशाब करने वाले आदमी को पेशाब करने की जगह केवल वो लोटा ही मिला ?,पता नहीं कितने लोगो का उसने धर्म भर्स्ट किया होगा ?

P K Surya said...

chalo ab ye bhi baki tha waise mere ek clint jo kee bikanerwala mai manager the unhone bataya tha kuchh bhi ho jaye mai to apne yahan ka sweets nahi kha sakta,, samajh mai to aya tha pr kare to kya kare chhote dukan se le kar bade bade dukano mai yahi hal hai har jagah pe milawat hai or sarkari karmachari yadi jati bhi hai dekhne to bus apna pocket bhar k aa jati hai report galt to ushki dee jati hai jo enka muh rupyo se nahi bharta,, bade city mai to paneer bhi nahi kha sakte non veg to dur kee bat hai govt ko malum hai kee sarkari dairy mai bhi milawat hai pr karte kahan kuchh hai,, har jagah Dhan ka rajya hai.. kamine panti kee to sari seema nasht ho rahi hai 2012 me duniya nashat ho ya na ho loga ka soch samajh to nast ho he jayega.. jai hind

हिमांशु गुप्ता said...

माफ कीजिये . मै आपके इस लेख का लिंक आपसे बिना आज्ञा लिए अपने फेसबुक अकाउंट में दे रहा हूँ.

ज्यादा से ज्यादा लोगों को रेहडी वालों की इस तरह की कार गुजारी का पता लगना चाहिए

पद्म सिंह said...

उफ़ !
मुझे लोग बड़े पक्के मन वाला मानते है... लेकिन इस कृत्य को देख कर तो मै अंदर तक सिहर गया... वो लोग कैसा महसूस करते होंगे जो उससे रोज़ चाट खाने आते रहे होंगे....
यह निश्चित ही जघन्य अपराध है...

E-Guru Rajeev said...

एक पत्ता लगा दो यार, भू-लुण्ठित नहीं होना चाहता.
जरा जल्दी करो नहीं तो यहाँ-वहाँ मुँह मारना बंद कर दूंगा.
मैं भी प्रायः बाहर का खा आता हूँ.
वैसे ऐसे गंदे संस्कार तो मेरे नहीं हैं, पर मित्रों की संगत....
अब आप के इस चक्षु-खोलक आलेख को पढ़ कर अपने संस्कारों को पुनः आचरण में लाने को प्रतिबद्ध हूँ.
धन्यवाद ऐसे आलेख के लिए.

ePandit said...

ठेले वाले का बहाना सरासर झूठ है, पहली बात तो आदमी यहाँ-वहाँ ही निपट लेते हैं, दरअसल वो अपने बिजनेस के पीक आवर्स पर ठेला छोड़ कर जाना नहीं चाहता था।

अगर उसकी इतनी ही मजबूरी थी तो कोई अलग डिब्बा वगैरह इस काम के लिये रख लेता। ऐसे आदमी को जितनी सजा दी जाय वह कम है, यह तो लोगों के विश्वास के साथ धोखाधड़ी है। प्रशासन का इसे गम्भीरता से न लेना और भी निराशाजनक है।

और हाँ जो लोग इसे स्वमूत्र चिकित्सा कह रहे हैं उन्हें जानना चाहिये कि स्वमूत्र चिकित्सा में अपना मूत्र खुद पिया जाता है किसी और को नहीं पिलाया जाता। क्या अब वे लोग खुद इस ठेले वाले से कुछ खाना चाहेंगे?

RAHUL SINGH said...

अंकिता राणे को इस पहल पर सलाम !

चाष्‍टा said...

अरे भाई बड़ी बड़ी होटलों पर लिखा नहीं होता कि हाथ कृपया थाली में नहीं धोये क्‍योंकि जो सब्‍जी की छुठन बचती है उसे वापस अन्‍य ग्राहकों को दी जा सके.
- यदि तेल, आटे आदि में कोई कीड़े, मच्‍छर, चुहें आदि गिर जायें या थोड़ी बहुत सड़न हो तो भी उसका उपयोग कर लेते है.
- मावे, दूध आदि में मिलावट तो सबको पता है ही. अखाद्य रंगों का प्रयोग, शक्‍कर की बजाय सेकरिन आदि का प्रयोग.
- उसी तेल का उपयोग बार बार किया जाता है. जैसे गियर बॉक्‍स का तेल जब तक गाढ़ा व काला न हो जाये, बदला नहीं जाता है.
- खाद्य सामग्री सस्‍ती, निम्‍न स्‍तर की भी ली जा सकती है. रूपये जो कमाने है. लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य से क्‍या लेना देना?
भईया अपने स्‍वास्‍थ्‍य का ख्‍याल नहीं रखना हो या डॉक्‍टरों के ज्‍यादा चक्‍कर काटने होतो सोच लेना.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आमजन को इस मामले में अतिरिक्त जागरूक होना पड़ेगा और सावधानी बरतनी पड़ेगी। दुनिया में अधम लोगों की कमी नहीं है। अपनी रोजी रोटी के साथ ऐसा घ्रुणित काम करने वाला अपनी सही जगह- जेल में नहीं पहुँचा तो यह हमारे प्रशासनिक तंत्र की विफलता है।

Kalpana said...

Oh my god....ye sab kya bakbaas hai

radhika choudhary said...

अंकिता तुमने अक दम सही कहा है ऐसा मेने भी बहुत ठेले वाले और बड़े बड़े होटलों में ऐसा होते देखा है पर मुझे एक बात असी लगी की तुम ने ऐसे लोगो के खिलाफ आवाज उठाई पर मेने ऐसा बहुत जगह देखा पर मेने कभी उस पर कभी धियान नहीं दिया जादा से जादा वहा जाना ही शोड दिया पर अब में भी तुम्हारे साथ हु में भी आगे से ऐसा होते देखुगी तो ऐसे लोगो के खिलाफ आवाज उठाउगी, अंकिता थैंक्स तुमने हिमत की और हमारी हिमत बडाही| थैंक्स अंकिता|