Monday, April 18, 2011

रामदेव Vs अण्णा, “भगवा” को “गाँधीटोपी मार्का सेकुलरिज़्म” से बदलने की साजिश?? (भाग-1)…… Anna Hajare, Jan-Lokpal Bill, National Advisory Council

अक्सर आपने देखा होगा कि लेख समाप्त होने के बाद “डिस्क्लेमर” लगाया जाता है, लेकिन मैं लेख शुरु करने से पहले “डिस्क्लेमर” लगा रहा हूँ –
डिस्क्लेमर :- 1) मैं अण्णा हजारे की “व्यक्तिगत रूप से” इज्जत करता हूँ… 2) मैं जन-लोकपाल बिल के विरोध में नहीं हूँ…

अब आप सोच रहे होंगे कि लेख शुरु करने से पहले ही “डिस्क्लेमर” क्यों? क्योंकि “मीडिया” और “मोमबत्ती ब्रिगेड” दोनों ने मिलकर अण्णा तथा अण्णा की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को लेकर जिस प्रकार का “मास हिस्टीरिया” (जनसमूह का पागलपन), और “अण्णा हजारे टीम”(?) की “लार्जर दैन लाइफ़” इमेज तैयार कर दी है, उसे देखते हुए धीरे-धीरे यह “ट्रेण्ड” चल निकला है कि अण्णा हजारे की मुहिम का हल्का सा भी विरोध करने वाले को तड़ से “देशद्रोही”, “भ्रष्टाचार के प्रति असंवेदनशील” इत्यादि घोषित कर दिया जाता है…

सबसे पहले हम देखते हैं इस तमाम मुहिम का “अंतिम परिणाम” ताकि बीच में क्या-क्या हुआ, इसका विश्लेषण किया जा सके… अण्णा हजारे (Anna Hajare) की मुहिम का सबसे बड़ा और “फ़िलहाल पहला” ठोस परिणाम तो यह निकला है कि अब अण्णा, भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले एकमात्र “आइकॉन” बन गये हैं, अखबारों-मीडिया का सारा फ़ोकस बाबा रामदेव (Baba Ramdev) से हटकर अब अण्णा हजारे पर केन्द्रित हो गया है। हालांकि मीडिया का कभी कोई सकारात्मक फ़ोकस, बाबा रामदेव द्वारा उठाई जा रही माँगों की तरफ़ था ही नहीं, परन्तु जो भी और जितना भी था… अण्णा हजारे द्वारा “अचानक” शुरु किये गये अनशन की वजह से बिलकुल ही “साफ़-सूफ़” हो गया…। यानी जो बाबा रामदेव देश के 300 से अधिक शहरों में हजारों सभाएं ले-लेकर सोनिया गाँधी, कांग्रेस, स्विस बैंक आदि के खिलाफ़ माहौल-संगठन बनाने में लगे थे, उस मुहिम को एक अनशन और उसके प्रलापपूर्ण मीडिया कवरेज की बदौलत “पलीता” लगा दिया गया है। ये तो था अण्णा की मुहिम का पहला प्राप्त “सफ़ल”(?) परिणाम…

जबकि दूसरा परिणाम भी इसी से मिलता-जुलता है, कि जिस मीडिया में राजा, करुणानिधि, कनिमोझि, भ्रष्ट कारपोरेट, कलमाडी, स्विस बैंक में जमा पैसा… इत्यादि की हेडलाइन्स रहती थीं, वह गायब हो गईं। सीबीआई या सीवीसी या अन्य कोई जाँच एजेंसी इन मामलों में क्या कर रही है, इसकी खबरें भी पृष्ठभूमि में चली गईं… बाबा रामदेव जो कांग्रेस के खिलाफ़ एक “माहौल” खड़ा कर रहे थे, अचानक “मोमबत्ती ब्रिगेड” की वजह से पिछड़ गये। टीवी पर विश्व-कप जीत के बाद अण्णा की जीत की दीवालियाँ मनाई गईं, रामराज्य की स्थापना और सुख समृद्धि के सपने हवा में उछाले जाने लगे हैं…

अंग्रेजों के खिलाफ़ चल रहे स्वतंत्रता संग्राम की याद सभी को है, किस तरह लोकमान्य तिलक, सावरकर और महर्षि अरविन्द द्वारा किये जा रहे जनसंघर्ष को अचानक अफ़्रीका से आकर, गाँधी ने “हाईजैक” कर लिया था. न सिर्फ़ हाइजैक किया, बल्कि “महात्मा” और आगे चलकर “राष्ट्रपिता” भी बन बैठे… और लगभग तानाशाही अंदाज़ में उन्होंने कांग्रेस से तिलक, सरदार पटेल, सुभाषचन्द्र बोस इत्यादि को एक-एक करके किनारे किया, और अपने नेहरु-प्रेम को कभी भी न छिपाते हुए उन्हें देश पर लाद भी दिया… आप सोच रहे होंगे कि अण्णा हजारे और बाबा रामदेव के बीच यह स्वतंत्रता संग्राम कहाँ से घुस गया?

तो सभी अण्णा समर्थकों और जनलोकपाल बिल (Jan-Lokpal Bill) के कट्टर समर्थकों के गुस्से को झेलने को एवं गालियाँ खाने को तैयार मन बनाकर, मैं साफ़-साफ़ आरोप लगाता हूँ कि- इस देश में कोई भी आंदोलन, कोई भी जन-अभियान “भगवा वस्त्रधारी” अथवा “हिन्दू” चेहरे को नहीं चलाने दिया जाएगा… अंग्रेजों के खिलाफ़ आंदोलन में जिस तरह तिलक और अरविन्द को पृष्ठभूमि में धकेला गया था, लगभग उसी अंदाज़ में भगवा वस्त्रधारी बाबा रामदेव को, सफ़ेद टोपीधारी “गाँधीवादी आईकॉन” से “रीप्लेस” कर दिया गया है…। इस तुलना में एक बड़ा अन्तर यह है कि बाबा रामदेव, महर्षि अरविन्द (Maharshi Arvind) नहीं हैं, क्योंकि जहाँ एक ओर महर्षि अरविन्द ने “महात्मा”(?) को जरा भी भाव नहीं दिया था, वहीं दूसरी ओर बाबा रामदेव ने न सिर्फ़ फ़रवरी की अपनी पहली जन-रैली में अण्णा हजारे को मंच पर सादर साथ बैठाया, बल्कि जब अण्णा अनशन पर बैठे थे, तब भी मंच पर आकर समर्थन दिया। चूंकि RSS भी इतने वर्ष बीत जाने के बावजूद “राजनीति” में कच्चा खिलाड़ी ही है, उसने भी अण्णा के अभियान को चिठ्टी लिखकर समर्थन दे मारा। ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में अभी भी वह “घाघपन” नहीं आ पाया है जो “सत्ता की राजनीति” के लिये आवश्यक होता है, विरोधी पक्ष को नेस्तनाबूद करने के लिये जो “राजनैतिक पैंतरेबाजी” और “विशिष्ट प्रकार का कमीनापन” चाहिये होता है, उसका RSS में अभाव प्रतीत होता है, वरना बाबा रामदेव द्वारा तैयार की गई ज़मीन और बोये गये बीजों की “फ़सल”, इतनी आसानी से अण्णा को ले जाते देखकर भी, उन्हें चिठ्ठी लिखकर समर्थन देने की कोई वजह नहीं थी। अण्णा को “संघ” का समर्थन चाहिये भी नहीं था, समर्थन चिठ्ठी मिलने पर न तो उन्होंने कोई आभार व्यक्त किया और न ही उस पर ध्यान दिया…। परन्तु जिन अण्णा हजारे को बाबा रामदेव की रैली के मंच पर बमुश्किल कुछ लोग ही पहचान सकते थे, उन्हीं अण्णा हजारे को रातोंरात “हीरो” बनते देखकर भी न तो संघ और न ही रामदेव कुछ कर पाये, बस उनकी “लार्जर इमेज” की छाया में पिछलग्गू बनकर ताली बजाते रह गये…। सोनिया गाँधी की “किचन कैबिनेट” यानी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) के “NGO छाप रणबाँकुरों” ने मिलजुलकर अण्णा हजारे के कंधे पर बन्दूक रखकर जो निशाना साधा, उसमें बाबा रामदेव चित हो गये…

मैंने ऊपर “राजनैतिक पैंतरेबाजी” और “घाघ” शब्दों का उपयोग किया है, इसमें कांग्रेस का कोई मुकाबला नहीं कर सकता… अंग्रेजों के खिलाफ़ आंदोलन से लेकर अण्णा हजारे तक कांग्रेस ने “परफ़ेक्ट” तरीके से “फ़ूट डालो और राज करो” की नीति को आजमाया है और सफ़ल भी रही है। कांग्रेस को पता है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया का देश के युवाओं पर तथा अंग्रेजी प्रिण्ट मीडिया का देश के “बुद्धिजीवी”(?) वर्ग पर खासा असर है, इसलिये जिस “तथाकथित जागरूक और जन-सरोकार वाले मीडिया”(?) ने रामलीला मैदान पर बाबा रामदेव की 27 फ़रवरी की विशाल रैली को चैनलों और अखबारों से लगभग सिरे से गायब कर दिया था, वही मीडिया अण्णा के अनशन की घोषणा मात्र से मानो पगला गया, बौरा गया। अनशन के शुरुआती दो दिनों में ही मीडिया ने देश में ऐसा माहौल रच दिया मानो “जन-लोकपाल बिल” ही देश की सारी समस्याओं का हल है। 27 फ़रवरी की रैली के बाद भी रामदेव बाबा ने गोआ, चेन्नई, बंगलोर में कांग्रेस, सोनिया गाँधी और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जमकर शंखनाद किया, परन्तु मीडिया को इस तरफ़ न ध्यान देना था और न ही उसने दिया। परन्तु “चर्च-पोषित” मीडिया तथा “सोनिया पोषित NGO इंडस्ट्री” ने बाबा रामदेव की दो महीने की मेहनत पर, अण्णा के “चार दिन के अनशन” द्वारा पानी फ़ेर दिया, तथा देश-दुनिया का सारा फ़ोकस “भगवा वस्त्र” एवं “कांग्रेस-सोनिया” से हटकर “गाँधी टोपी” और “जन-लोकपाल” पर ला पटका… इसे कहते हैं “पैंतरेबाजी”…। जिसमें क्या संघ और क्या भाजपा, सभी कांग्रेस के सामने बच्चे हैं। जब यह बात सभी को पता है कि मीडिया सिर्फ़ “पैसों का भूखा भेड़िया” है, उसे समाज के सरोकारों से कोई लेना-देना नहीं है, तो क्यों नहीं ऐसी कोई कोशिश की जाती कि इन भेड़ियों के सामने पर्याप्त मात्रा में हड्डियाँ डाली जाएं, कि वह भले ही “हिन्दुत्व” का गुणगान न करें, लेकिन कम से कम चमड़ी तो न उधेड़ें?

अब एक स्नैपशॉट देखें…

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की 4 अप्रैल 2011 को लोकपाल बिल के मुद्दे पर बैठक होती है, जिसमें अरविन्द केजरीवाल, बड़े भूषण, संदीप पाण्डे, हर्ष मन्दर, संतोष मैथ्यू जैसे कई लोग शामिल होते हैं। सोनिया गांधी की इस “पालतू परिषद” वाली मीटिंग में यह तय होता है कि 28 अप्रैल 2011 को फ़िर आगे के मुद्दों पर चर्चा होगी…। अगले दिन 5 अप्रैल को ही अण्णा अनशन पर बैठ जाते हैं, जिसकी घोषणा वह कुछ दिनों पहले ही कर चुके होते हैं… संयोग देखिये कि उनके साथ मंच पर वही महानुभाव होते हैं जो एक दिन पहले सोनिया के बुलावे पर NAC की मीटिंग में थे… ये कौन सा “षडयंत्रकारी गेम” है?

इस चित्र में जरा इस NAC में शामिल “माननीयों” के नाम भी देख लीजिये –


हर्ष मंदर, डॉ जॉन ड्रीज़, अरुणा रॉय जैसे नाम आपको सभी समितियों में मिलेंगे… इतने गजब के विद्वान हैं ये लोग। “लोकतन्त्र”, “जनतंत्र” और “जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों” वाले लफ़्फ़ाज शब्दों की दुहाई देने वाले लोग, कभी ये नहीं बताते कि इस राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को किस जनता से चुना है? इस परिषद में आसमान से टपककर शामिल हुए विद्वान, बार-बार मीटिंग करके प्रधानमंत्री और कैबिनेट को आये दिन सलाह क्यों देते रहते हैं? और किस हैसियत से देते हैं? खाद्य सुरक्षा बिल हो, घरेलू महिला हिंसा बिल हो, सिर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने सम्बन्धी बिल हो, लोकपाल बिल हो… सभी बिलों पर सोनिया-चयनित यह परिषद संसद को “सलाह”(?) क्यों देती फ़िरती है? या कहीं ऐसा तो नहीं है कि संसद में पेश किया जाने वाला प्रत्येक बिल इस “वफ़ादार परिषद” की निगाहबीनी के बिना कैबिनेट में भी नहीं जा सकता? किस लोकतन्त्र की दुहाई दे रहे हैं आप? और क्या यह भी सिर्फ़ संयोग ही है कि इस सलाहकार परिषद में सभी के सभी धुर हिन्दू-विरोधी भरे पड़े हैं?

जो कांग्रेस पार्टी मणिपुर की ईरोम शर्मिला के दस साल से अधिक समय के अनशन पर कान में तेल डाले बैठी है, जो कांग्रेस पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) के अध्यक्ष की अलग राज्य की माँग की भूख हड़ताल को उनके अस्पताल में भर्ती होने तक लटकाकर रखती है…और आश्वासन का झुनझुना पकड़ाकर खत्म करवा देती है… वही कांग्रेस पार्टी “आमरण अनशन” का कहकर बैठे अण्णा की बातों को 97 घण्टों में ही अचानक मान गई? और न सिर्फ़ मान गई, बल्कि पूरी तरह लेट गई और उन्होंने जो कहा, वह कर दिया? इतनी भोली तो नहीं है कांग्रेस…

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ताजा खबर ये है कि -
1) संयुक्त समिति की पहली ही बैठक में भ्रष्ट जजों और मंत्रियों को निलम्बित नहीं करने की शर्त अण्णा ने मान ली है,
2) दूसरी खबर आज आई है कि अण्णा ने कहा है कि "संसद ही सर्वोच्च है और यदि वह जन-लोकपाल बिल ठुकरा भी दे तो वे स्वीकार कर लेंगे…"
3) एक और बयान अण्णा ने दिया है कि "मैंने कभी आरएसएस का समर्थन नहीं किया है और कभी भी उनके करीब नहीं था…"

आगे-आगे देखते जाईये… जन लोकपाल बिल "कब और कितना" पास हो पाता है… अन्त में "होईहे वही जो सोनिया रुचि राखा…"। जब तक अण्णा हजारे, बाबा रामदेव और नरेन्द्र मोदी के साथ खुलकर नहीं आते वे सफ़ल नहीं होंगे, इस बात पर शायद एक बार अण्णा तो राजी हो भी जाएं, परन्तु जो "NGO इंडस्ट्री वाली चौकड़ी" उन्हें ऐसा करने नहीं देगी…

(जरा अण्णा समर्थकों की गालियाँ खा लूं, फ़िर अगला भाग लिखूंगा…… भाग-2 में जारी रहेगा…)

104 comments:

honesty project democracy said...

सुरेश जी आपने दो गलती कर दी इस लेख में एक तो डिस्क्लेमर लगाकर..दूसरा खुलकर समर्थन का मतलब यह नहीं की आप मेरी निगरानी ही ना करें और मेरे कुकर्म को भी सद्कर्म की श्रेणी में रख दें...देखिये आलोचना होनी चाहिए लेकिन सिर्फ बुराइयों का ना की किसी के अच्छे राह पर चलने या बुराई से लड़ने के जज्बे का....मेरे ख्याल से अन्ना और रामदेव का लक्ष्य एक ही है लेकिन अन्ना का तरीका ज्यादा बेहतर और पारदर्शी है...अन्ना के मुहीम की सफलता में रामदेव के मेहनत व जागरूकता अभियान का भी योगदान महत्वपूर्ण है....किसी ने किसी को पलीता नहीं लगाया बल्कि एक नेक उद्देश्य के लिए दोनों एक दुसरे के पूरक के रूप में काम कर रहें हैं...

MRINALINI said...

विरोधी पक्ष को नेस्तनाबूद करने के लिये जो “राजनैतिक पैंतरेबाजी” और “विशिष्ट प्रकार का कमीनापन” चाहिये होता है

YAH 'KAMINAPAN' shabd thik nahi ji ! yah ek gun hota hai jo har rajnitigya ko aana chahiye

jay said...

आपने इस आंदोलन की बखिया उधेर दिया है. अपना शुरू से यह मानना था कि यह आंदोलन केवल कांग्रेस के विरुद्ध जनाक्रोश के लिए सेफ्टी वाल्व का काम करने वाला है. अन्ना साहब के लिए निश्चय ही अच्छी भावना है मन में लेकिन कांग्रेस के घाघपन का वे शिकार हो गए हैं इसमें रंचमात्र भी संदेह नहीं है. गांधी की वैचारिक हत्या करने के बावजूद उन्हें बेच कर अभी तक कांग्रेस के घर की चुला जलती रही है अब एक अन्न भी मिल गए हैं शायद कांग्रेसियों को.
जहां तक संघ परिवार का सवाल है तो एक सस्ते फ़िल्मी डायलाग उद्धृत करना चाहूँगा मुझसे (कांग्रेस से ) लड़ने का जज्बा तो ले आओगे....'कमीनापन' कहां से लाओगे.....! लेकिन अलख जगाते रहिये सुरेश जी....कम से काम क़यामत के वक्त हमारे पास यह संतुष्टि रहेगी कि हमने भरसक प्रयास तो किया...बधाई आपको.
पंकज झा.

vishwajeetsingh said...

आपके लेख ने अन्ना हजारे के आन्दोलन के विषय में समग्रता से सोचने पर मजबूर कर दिया हैं । जो गलती देशवासियों ने गांधी का अन्ध समर्थन करके की थी कही उसी की पुनरावृति हम अन्ना हजारे के प्रति तो नहीं कर रहें हैं !
स्वामी रामदेव जी एक सच्चे राष्ट्रभक्त हैं लेकिन उनकी उपस्थिति में देवबंद में मौलाओं द्वारा वन्दे मातरम् के विरूद्ध फतवा पारित पारित किया जाना बहुत ही दुखित करने वाला था ।
भाजपा में आडवाणी जी जैसे छद्म रामराज्य भक्त हैं तथा शिवसेना क्षेत्रवाद की राजनीति में उलझकर रह गयी हैं और हिन्दू महासभा का जनाधार हैं नहीं । समझ में नहीँ आता ऐसी रिक्तता की स्थिति में किसका साथ दें ।
तथ्यात्मक और चिंतनीय लेख के लिए...... आपका आभार ।

RAJ SINH said...

इसमें सब से बड़ी धूर्तता का खेल अरविन्द केजरीवाल का है . किसी तरह से उन्होंने अन्ना को ही हाईजैक कर लिया है . इसका भांडा भी फूटेगा .यह सत्ता प्रतिष्ठान से मिला हुआ वो धूर्त है जो अन्ना को सब से अलग थलग कर उनका दुरूपयोग कर रहा है और भोले अन्ना को मानसिक कैदी बना लिया है .दुर्भाग्य है की अन्ना इसकी धूर्तता समझ ही नहीं रहे हैं .सोनिया के गुर्गे बाकी का काम तमाम कर देंगे और जन लोकपाल बिल का झुनझुना भी गर मिला तो बेअसर ही रहेगा . इस संगठन ' INDIA AGAINST CORRUPTION ' के बनने की प्रक्रिया और इतिहास देख लें सब साफ़ दिखने लग जायेगा .

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

क्या कहें, अपनी जनता को देखिये ... मुर्ख बने जा रही है | चुनाव के समय वोट कांग्रेस को देती है बाद में रोती है|

वाह री अपने देश की जनता ... धन्य है ये देश ..

Abhishek said...

मैं भी अब तक अन्ना जी का समर्थक था. किन्तु अब मुझे दुबारा सोचना पड़ेगा. और एक बात मैं अन्ना का समर्थक जरुर हूँ किन्तु अँधा नहीं हु इसलिए आप इसी तरह लिखते रहिये आपको गालिया नहीं पड़ेंगी.लेख के लिए धन्यवाद.

P K Surya said...

मैं भी अब तक अन्ना जी का समर्थक था. किन्तु अब मुझे दुबारा सोचना पड़ेगा. और एक बात मैं अन्ना का समर्थक जरुर हूँ किन्तु अँधा नहीं हु badlte mahol mai aanna g ko dhalte dekha,, jo congres ne chaha he lagta hai bus wahi anna g ko karte dekha.. (nahi dekha to dekhne k liye tyar ho jao doshto)1) संयुक्त समिति की पहली ही बैठक में भ्रष्ट जजों और मंत्रियों को निलम्बित नहीं करने की शर्त अण्णा ने मान ली है,
2) दूसरी खबर आज आई है कि अण्णा ने कहा है कि "संसद ही सर्वोच्च है और यदि वह जन-लोकपाल बिल ठुकरा भी दे तो वे स्वीकार कर लेंगे…"
3) एक और बयान अण्णा ने दिया है कि "मैंने कभी आरएसएस का समर्थन नहीं किया है और कभी भी उनके करीब नहीं था…
bat to sach much mai samajh kal he aa gai jab ye news tv pe suna.. wah bhai wah jab congres kee mannne thi to phir ye ansan kyon /???????

संजय बेंगाणी said...

तमाम तरह के नक्सलवादी, वामपंथी, मानावाधिक्कारवादी, देशद्रोंहियों से सहानुभुति रखने वाले लोग, संगठन, चैनल वाले एक मंच पर आकर अन्ना को नायक बनाया. अब अग्निवेश ने साफ किया है कि अन्ना को सबसे पहले वे गुजरात लाएंगे और भांड़ा भेड़ेंगे. खेल क्या है भाई?


हमारी इस पोस्ट को भी टिप्पणी मानें:

http://www.tarakash.com/joglikhi/?p=1890

सागर नाहर said...

Ranjaan Mohanot ki kalam se

Ashish Shrivastava said...
This comment has been removed by the author.
Suresh Chiplunkar said...

@ आशीष श्रीवास्तव जी - स्वागत है आपका, कृपया तर्क और तथ्यों से मेरी बात काटने की कृपा करें…। मैं सभी आलोचनाओं एवं विरोध वाली टिप्पणियाँ प्रकाशित करूंगा…

मोडरेशन तो सिर्फ़ कुछ "गंदगी फ़ैलाने वालों" के लिए लगा रखा है…

Ashish Shrivastava said...
This comment has been removed by the author.
Suresh Chiplunkar said...

@ आशीष भाई -

1) हो सकता है कि अन्ना इस्तेमाल कर लिए गये हों! (बिलकुल, जल्दी ही यह साबित हो जाएगा)

2) अन्ना की नियत पर मुझे ना कभी शक था ना होगा! (मुझे भी नहीं है, मैं पहले ही डिस्क्लेमर लगा चुका हूं)

3) रामकिशन यादव के बारे मे इतने विश्वास कह सकते है ? (विश्वास से तो कोई किसी के भी बारे में नहीं कह सकता, लेकिन रामदेव का प्रयास अधिक परिणामकारक है, ऐसा मेरा व्यक्तिगत मत है)

4) आप व्यक्ति पूजक कब से हो गये ? (हम सभी लोग भगवान राम के जमाने के भी पहले से व्यक्ति पूजक ही रहे हैं)

5) रामकिशन यादव को मै साधु नही मानता ! वो एक व्यापारी है, इससे ज्यादा कुछ नही! (हो सकता है, लेकिन फ़िर भी कांग्रेस के लिये अण्णा के मुकाबले रामदेव अधिक घातक हैं)

बाकी RTI एवं जन-लोकपाल बिल की बातों से सहमत, परन्तु बात यहाँ "राजनीति" और "अण्णा के साथ खड़ी चौकड़ी" की बदनीयती की है…। क्या अण्णा यह आंदोलन बाबा रामदेव को साथ लेकर नहीं कर सकते थे? चुन-चुनकर सोनिया के चमचों और हिन्दुत्व-विरोधियों को मंच पर लाने का क्या मतलब है? अग्निवेश को मंच पर लाइमलाइट में लाकर तथा उमा भारती को धकियाकर क्या साबित हुआ?

आशीष भाई, जब तक किसी राजनैतिक विचारधारा और संगठन का साथ नहीं होगा तब तक ऐसे आंदोलन की सफ़लता संदेहास्पद है, खासकर मोदी की तारीफ़ के बाद हुई थुक्का-फ़जीहत से मामला और बिगड़ा भी है और संदेहास्पद तो पहले से ही था…

अण्णा कितने ही पाक-साफ़ हों… परन्तु अब देश में कोई भी आंदोलन या बदलाव नरेन्द्र मोदी, बाबा रामदेव, गोविन्दाचार्य इत्यादि को शामिल किये बिना सफ़ल नहीं होगा…। कम से कम NGO इंडस्ट्री के "वीरों" को साथ रखकर तो बिलकुल नहीं…

Suresh Chiplunkar said...

@ आशीष भाई - हमारी प्रतिबद्धता "हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद" के प्रति है, उसकी राह में जो भी अडंगे लगायेगा, उसकी भी आलोचना की जाएगी…
आडवाणी का साक्षात उदाहरण आपके सामने है… हम व्यक्ति पूजक होते तो आडवाणी और वाजपेयी की भी आलोचना कभी न करते…

लेकिन आडवाणी को जिन्ना प्रसंग के लिये एवं वाजपेयी को कंधार प्रकरण के लिये कभी कोई माफ़ी नहीं…

सुजीत सिंह said...

मैं आश्चर्य रह गया था जब मैंने समाचार पत्र में पढ़ा कि अन्ना में कहा कि संसद ही सर्वोच्च है | अन्ना ने जिस प्रारूप को लेकर अनशन किया था, उसी प्रारूप में रहना चाहिए ना कि कांग्रेस के हिसाब से | जनता ने समर्थन उसी प्रारूप में किया था |
हमें लगता है कि अन्ना कांग्रेस के दबाव में दब गए है |उनकी हर मांग अब ढीली पड़ती नजर आरही है |

आपने जो शब्द "होईहे वही जो सोनिया रुचि राखा…" लिखा है सच हो कर ही रहेगा |

आप ने अन्ना के अनशन का दूसरा पहलू दिखाया इसके लिए धन्यबाद |
मुझे भी ऐसा लगा था कि अन्ना क्यों कांग्रेस के आगे हाथ खड़े कर रहे है |

एम सिंह said...

सुरेश जी, आपकी बात से सहमति जताई जा सकती है, लेकिन तब, जब यह साबित हो जाएगा। हां, एक बात तो तय है कि बाबा रामदेव पर शक नहीं किया जा सकता। वह एक फकीर है और फकीर कभी नंग-धड़ंग नहीं होते। उनके पास देने को बहुत कुछ होता है। कांग्रेस रूपी रोग की दवा सिर्फ रामदेव ही है।
और हां, कुछ लोगों को रामदेव के खरे व्यापार पर आपत्ति है, लेकिन शरद पवार जैसे लोगों के दो नंबरी व्यापारों पर कोई आपत्ति नहीं। ऐसे लोगों की बदौलत ही इतनी विकट परिस्थितियां देखने को मिल रही हैं।
अन्ना हजारे एक ईमानदार व्यक्ति हैं, शक नहीं। लेकिन उनकी भी हालत भी अगर हमारे ‘‘ईमानदार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह’’ जैसी हुई तो फिर..... फिर तो खुदा बचाए।
इस लेख के लिए आप कम से कम गालियों के हकदार तो कतई नहीं हैं।


मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है -
मीडिया की दशा और दिशा पर आंसू बहाएं
भले को भला कहना भी पाप

Ratan Singh Shekhawat said...

आपका हर लेख आँखें खोलना वाला होता है और यह भी है |

सञ्जय झा said...

jisko hum apna rahnuma man lete hai.....agar o 'mudde' se marhoom
kare to uske rahnumai pe 'shak' hota
hi hai..........

bakiya, hamare jaise 'grass-root' ka
banda unhen poojne me gurv karte hain.....

post 100% yield hai....'lpparatmak'
jise lagega 'o' sahla lega.....

pranam.

Anonymous said...

Please provide the link of the NAC refrences you have mentioned above.

pramod said...

suresh ji Ram Ram
aap ka lekh karib ek mahine se padh raha hoon rat ke teen teen baje tak jag kar aap ka har lekh rago me ubal la deta hai akhir anna hajare bhi sonia madam se harte hue najar aa gaye sahi kaha aap ne jab tak narendra modi jaise asli nayak ka samrthan nahi milega enka abhiyan kamyab hona muskil hai eska kya matlab samjah jaye ke sansad ke nirny ko manege agar sansad pe ya sarkar pe etna bharosh hai to anshan kiya hi kyon

nayana.kanitkar said...

देश चिंटी कि चाल से ही सही समझने लगा हे कि स्वतंत्रता सिर्फ़ गांधीजी की बपौती नहि थी.लोकमान्य तिलक,सवरकर,भगतसिंग ने पहले अलख जगया मशाल उठाई उस मशाल के उजियारे मे हि गांधीजी चमक उठे.बाबा रामदेव को भले मीडिया ने पीछे धकेला हो जनता उनके काम को जानेगी क्योकिं वे सभी राज्यो में धीरे धीरे अलख जगाने का काम कर रहे हे "देर आये दुरुस्त आये" कि तर्ज पर.इतने अच्छे लेख के लिये साधुवद.

हिन्दुस्तानी said...

बहुत ही सुन्दर सुरेश जी, बहुत ही सधे हुए शब्दों में आपने सच्चाई बयान की है, वाकई रामदेव की वर्षों की मेहनत को काग-रेस ने बाकायदा षड्यंत्र कर अपने पक्ष में कर ही लिया है और साथ दिया है एनजीओ, मीडिया और अन्ना के साथ लगे सियारों ने जिन्होंने सच्चाई की खाल ओढ़ रखी थी.. सबसे ज्यादा गुनाहगार तो आम जनता है मध्यमवर्गीय युवा वर्ग जों मीडिया के आधार पर अपनी बुद्धि तोलता है और वही सोचता और देखता है जों मिशन के तहत देश के नए राजगुरु बना मीडिया उनको दिखाता है.
वाकई ये आजादी की लड़ाई ही है और वही इतिहास अपने आपको दोहरा रहा है जैसे उस समय राष्ट्रवादियों के आंदोलन को गाँधी ने हथिया लिया था ठीक उसी प्रकार इस नए गाँधी ने ........

बड़े ही दुःख का विषय है.. समझ नहीं आता क्या किया जाए, ये हिन्दुस्थान की आम जनता कौनसी अफीम खाई हुई है जिसमें उनको कुछ नजर ही नहीं आता !!

nayana.kanitkar said...

सुरेशजी देश चिंटी की चाल से हि सही समझने लगा है कि स्वतंत्रता सिर्फ़ गांधीजी कि बपौती नहिं थी.लोकमन्य तिलक,सावरकर, भगतसिंग ने पहले अलख जगाया ,मशाल उठाई उस मशालके उजियारे मे ही गांधीजी अन्त मे चमक उठे .बाबा रामदेव को मीडीया ने भले धकेला हो जनता उनके काम को जानेगी.वे धीरे-धीरे कांग्रेस के खिलाफ अलख जगा रहे है "देर आये दुरुस्त आये कि तर्ज पर".इतने अच्छे लेख के लिये साधुवाद.

राज भाटिय़ा said...

अन्ना हजारे के बारे मै ज्यादा नही जानता, हां बाबा राम देव के बारे भी ज्यादा नही जानता, लेकिन मुझे कही ना कही बू आ रही हे अन्ना हजारे के इस अभियान से जो मिडिया ने इसे चार दिन मे ही हीरो बना दिया, कही ना कही कोई चक्कर चला हे जिस मे राम देव बाबा को दुर किया जाये, फ़ेल किया जाये शायद इस मे अन्ना हजारे जी को ना पता हो वो अन्जान हो ओर उन्हे इस्तेमाल किया जा रहा हो, इस लिये जनता को चाहिये की अपना दिमाग ओर आंखे खुली रखे... इस बार गेंद इस काग्रेस के हाथो ना लपकी जाये, बाबा राम देव ओर अन्ना हाजरे की मेहनत उन लोगो को मिले जो हक दार हे, ना कि इन नेताओ ओर काग्रेस को वर्ना बहुत बुरा होगा जनता के संग, अगर इस मोके को खो दिया तो

MANGLESHWER said...

EK UDDESHYA THA, BHARAT KA PAISA JO SWISS BANK AUR DOOSARE DESHON ME JAMA HAI, WO KAALA DHAN WAPIS LAANE KA.. PAR CONGRESS NE EK CHHOTE SE CHHADM LOKPAAL BILL KO BADA MAAHOL DE KAR LOGON KA JOSH SHANT KAR DIYA.. SAAMP BHI MAR GAYA AUR LAATHI BHI NA TUTI.. CONGRESS KE NETAAON KO YE KHEL KHOON ME MILA HAI, YA YON KAHEN, CONGRESS EK GANDE KHEL KHELANE WAALON KA MANCH HAI, JABKI SANGH ME SAAF DIL KE AADMI HAIN, AUR WO YE PENTARE BAAZI NAHI JAANTE.. JAB TAK SAMAAJ SHIKSHIT NAHI HOGA, USKA VIVEK NAHI JAAGEGA, WO SAMAJHDAAR NAHI HOGA, TAB TAK WO IN PENTAREBAAJON KE SHADYANTRA KA SHIKAAR HOTA RAHEGA AUR APNE HAATHON APNA GHAR LUTWAATA RAHEGA.. KHEL USI DIN SAMAJH AA GAYA THA JAB TOI AUR OTHER ENGLISH MEDIA NE ANNA KE ANSHAN KO NEWS CHANNEL KI FULL COVERAGE DI THI JABKI AASTHA JAISE CHANNEL KO BHI BABA RAMDEV KI COVERAGE KARNE SE ROK DIYA THA... BHOLI PUBLIC, BEWAKOOF PUBLIC.. YUN HI BEWAKOOF BANTI RAHEGI.
AB BABA RAMDEW KO BHAAJPA KI TARAH EK JAN RAILY NIKAALNI CHAHIYE, KAASHMIR SE KANYAKUMARI TAK.. AUR TARGET KEWAL EK, KAALA DHAN JO VIDESHON ME JAMA HAI WO WAPIS BHARAT LAAO... ISE BAHUT BADE SCALE PAR ORGANIZE KARNA CHAHIYE..

अवनीश सिंह said...

एक के बाद एक लगातार हमले झेल रही कांग्रेस (वस्तुतः सोनिया और राहुल) नेतृत्व यूपीए सरकार बेचैन हो गयी है। सोनिया के इशारे पर बाबा रामदेव के खिलाफ दिग्गिलिक्स (दिग्विजय) ने जमकर भौंका, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि अब तक हजारे के खिलाफ भौंकने के लिए इटली की रानी के खेमे में कोई वफादार (कुत्ता)खुलकर आगे नहीं आ रहा है।

सम्वेदना के स्वर said...

आपका लेख पढ़्कर यही कहेंगे कि अन्ना पर इस तरह का अविश्वास करने का साहस नहीं है।
एक बात समझने की है कि अन्ना उस व्यक्ति का नाम है जो हमारे दिलों में एक उम्मीद की तरह रहता है, देश की एक ऐसी तस्वीर उस अन्ना की शक्ल है जो भर्ष्टाचार से मुक्त हो। इसी अन्ना को अपने प्रतिनिधि के तौर पर देश के लोगों ने अपना समर्थन दिया है। कल यदि अन्ना अपने एजेंड़े से इधर उधर हुये तो वह अपना नेतृत्व खो सकते हैं। यह बात वह भी जानते हैं शायद। रही बात उनके आस पास वाले लोगों के जमावड़े की तो वह कोई भी हों, मुद्धे यदि लोकपाल, चुनाव सुधार और सत्ता का विकेन्द्रीकरण है तो फिर ये मुद्धे ही नेता हैं।
और रामदेव जी भी अपना काम कर रहे हैं। जैसा किसी ने उपर कहा भी है यह दोनों पूरक हैं।

रामदेव जून माह में राज्नैतिक पार्टी बना कर खुले में आने वाले हैं। वह गावॉं के 70% भारत में जो काम कर रहें हैं वह भी अपना असर दीखायेगा। अन्ना ने जो माहौल बनाया है वह बाकी 30% शहरी सुविधाभोगी वर्ग में व्यवस्था के विरोध को जगा रहा है।

121 करोड़ का देश जाग रहा है...।

Man said...

वन्देमातरम सर ,
बिलकुल सटीक और तथ्यात्मक विश्लेषण ,आप ने सही लिखा हे की बाबा रामदेव के सोनिया ,और गाँधी नेहरु परिवार पे हो रहे हमलो , और भ्रसटाचार घोटालो की मेखली गले में लटकाए यु .पि .ऐ सरकार खुद भ्रसटाचार के खिलाफ खुद साबित करने के लिए अन्ना को प्रमोट किया गया |और अन्ना बलेक्मैल हो गए ?मोमबत्ती बिर्गेड भी रातो रात लालटेन ले के खड़ी हो गयी जिन में एन. जी .ओ टाइप ,भीखमंगे ,भी अन्ना मण्डली के साथ हो गए |कुल मिला के जिस प्रकर अन्ना बेक फुट बटिंग कर रहे उस से साबित हो जाता हे की सोनिया गाँधी के बॉडी लाइन बोलर उन पे हावी हो गए हे |

Anonymous said...

अमिताभ, अभिषेक ओर एश्वर्या की फिल्म "सरकार" याद आ गयी......

शंकर फुलारा said...

@श्रीवास्तव जी , आप को बाबा रामदेव जी व्यापारी दीखते हैं; लेकिन ये नहीं दीखता कि अगर विदेशी कम्पनियों का विरोध करना है तो स्वदेशी उच्च गुणवत्ता युक्त उत्पाद उपलब्ध कराना बहुत बड़ी देश सेवा है | जिस एलोवेरा(घृतकुमारी) जूस को लोग "विदेशी कम्पनियों का बारह सौ रूपये"में खरीद कर लुट रहे थे उसे कौन सी स्वदेशी कम्पनियां एक सौ अस्सी या दो सौ रूपये किलो में उपलब्ध करा रहीं थी ? केवल स्वामी रामदेव जी ने वह उपलब्ध करवाया; या कोई भी आयुर्वेदिक दवा दूसरी स्वदेशी कम्पनियों की कम असर कर रही हैं और स्वामी जी दवा अच्छा असर कर रहीं हैं, उस पर आप उन्हें व्यापारी कहें ये केवल एक तरफ़ा बात हुयी जो किसी सोचने समझने वाले को शोभा नहीं देती | जो भी अपने को देशभक्त कहता है और उसमे स्वदेशी के प्रति जागरूकता न हो तो उसके इस तरह के आरोप छिछोरापन ही लगेंगे | और जल्द ही उनका मुहं बंद होने का समय आने वाला है जब देश में गाँव-गाँव में वही उत्पाद बनने शुरू हो जायेंगे जिन्हें रामदेव जी का व्यापार कहा जा रहा है |
बाकि रही साधू न मानने वाली बात, तो जिसने केवल चिलमची साधू ही देखे हों वो ज्ञान की बातो को क्या जाने वरना इस तरह की बात न बोले आज इस देश के जितने भी वास्तविक साधू हैं वो सभी स्वामी रामदेव जी के साथ हैं बाकि जो खीर खाऊ या दम लगाऊ साधू हैं वही इक्का दुक्का विरोध में हैं |

indianrj said...

सुरेशजी, आपसे पूर्णतया सहमत हूँ. दरअसल देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ माहोल तो स्वामी रामदेव द्वारा ही तैयार किया गया था ये अलग बात है कि उससे फायदा कुछ और लोगों को हो गया. हम अन्ना हजारे की इज्ज़त करते हैं लेकिन माफ़ कीजिये स्वामी रामदेव के जनजागरूकता अभियान का योगदान नहीं भूल सकते. रही बात व्यापार की तो कितने लोग हैं जो मुफ्त में किसी के लिए कुछ करें और कर भी दें शायद छोटे पैमाने पर लेकिन स्वामीजी का दवायों का कार्य काफी फैला हुआ है और उनके पतंजलि योगपीठ में लगातार अनुसन्धान भी हो रहे है जो बिना धन के मुमकिन नहीं.

त्यागी said...

शायद एक मोटा अंतर लोग नहीं जानते की योगी और संत में एक अंतर होता है. बाबा रामदेव योगी है कोई संत नहीं. योगी का आत्मविश्वास तोडना टट्टू टाइप के नेताओ के बसकी नहीं है. श्री कृष्ण एक योगी थे संत नहीं और इसी योग माया से महाभारत का इतना बड़ा युद्ध सफलतापूर्वक न केवल संचालित किया बल्कि कोरोवो को हरवा कर ही दम लिया. सभी पत्रकार मोहद्यो को मेरा विनम्र निवदन है बाबा रामदेव के बारे में लिखने से पहेले कुछ समय हिमालये की तराई में या काशी में समय बीताये. काले, कालवे और कल्लू धन के मालिक भ्रष्ट नेता अपने अपाहिज बच्चो पर इस धन को खर्च करेंगे, तो करो भाई करो. परन्तु राम देव के लड़ाई बहुत से लोगो को बड़ी भरी पड़ने वाली है. इस बात को नोट करले.
Tyagi
www.parshuram27.blogspot.com

vijay jha said...

धन्यवाद सुरेश जी एक बेहतरीन पोस्ट के लिए ! अभी तक तो मैं भी आस्थागत होकर अन्ना-भक्ति में लीन था ! आपने तन्द्रा तोड़कर और इस आन्दोलन के पीछे छिपे एजेंडे को उजागर कर एक बहुत ही सराहनीय काम किया ! दो दिन मैं भी जंतर मंतर पर अन्ना के धरना के समर्थन में गया था !जब अन्ना ने खर्चों का व्योरा और दानदाताओं की सूची जारी किया तो मैं भी सन्न रह गया ! टोटल लगभग ९० लाख चंदा मिला जिसमें २५ लाख (Jindal Aluminium Ltd/Mr.Sitaram Jindal 2500000
)अकेले जिंदल समूह ने दिया ! जिंदल समूह का कोंग्रेस पार्टी से क्या सम्बन्ध है ये कोई छिपा नहीं है, फिर तो सारा कहानी आईने की तरह साफ हो जाता है !

Mukul Harne said...

muje lagta hai ki ab jo bi kattar hindutva ki baat karta hai to usko is desh ki janta bjp ya dhongi maan leti hai kyo ki is desh ko aaj tak ak bhi sachha hindutva ki baat karne vala nai mila. is liye shayad anna hajare ko modi ki tarif karne ke baad afai deni padi, aur ab vo apna kaam pura karne ke liye congress ka jhuta sath de rahe ho,par baba ramdev ki party launch hone do pura naksha badal jayega.....

JANARDAN MISHRA said...

जिश दिन से जंतर मंतर वाला ड्रामा सुरु हुआ तभी मैंने मंच पर अग्निवेश को देख कर ही लिखा था ये प्रोग्राम कोंग्रेश संचालित है, और मै मानने को तैयार नहीं हूँ कि अन्ना को बहलाया फुसलाया गया होगा, अन्ना ने जीवन मैं सात दशक से ज्यादा देखा है, और फिर भी उन्हें कोई भला फुसला दे,,,, ये बात कुछ हजम नहीं हुई, खैर मुद्दे कि बात तो यह है कि बाबा रामदेव कि इस मुहीम से कोंग्रेशी इतने डर गए थे कि उन्होंने बली का बकरा अन्नाजी को बना दिया,, भ्रष्टाचार कि नैया मजधार में है, खेवैया नरेन्द्र मोदी और बाबा रामदेव होंगे, तो ये नैया जरुर पार जाएगी वर्ना डूबना तो निश्चित ही है...

एम सिंह said...

मेरे ब्लॉग पर आयें, आपका स्वागत है
मीडिया की दशा और दिशा पर आंसू बहाएं

ajeet said...

सुरेश भाई आपका यह लेख इस साल का सर्वश्रेष्ठ लेख है, इस लेख पर की गयी टिप्पणीयों में राज सिंह जी टिप्पणी बहुत संशिप्त एवं धारदार है और आशीष श्रीवास्तव की टिप्पणी नकारात्मक है,और इस लेख पर शंकर फुलारा की अब तक की गयी टिप्पणीयों में सर्वश्रेष्ठ है बल्कि इस टिप्पणी को हमें अंतर्मन में बिठाल लेना चाहिए, और लोगों को भी इस बारें में बताना चाहिए, बाबा रामदेव या रामकिशन यादव के बारें मैं नकारात्मक टिप्पणियाँ वे ही करते हैं जो बाबा रामदेव को केवल मीडिया के माध्यम से जानते हैं जो उनसे कुछ दिनों तक संपर्क में रहा हो वह अच्छी तरह बता सकता है की यह व्यक्ति अद्भुत व्यक्तित्व, अद्भुत चरित्र, अद्भुत बुद्धी का स्वामी है, और अपने लक्ष्य को पाने के लिए दीवाने पन की हद तक कर्मयोगी है, मेरी इन बातों को कुछ लोग अंध भक्ति का नाम भी दे सकते हैं लेकिन मुझे उन दिग्गी दिमागी लोगों की कतई परवाह नहीं, आप यह निश्चित मानिए कल जैसे अन्ना हजारे कांग्रेस की हर बात का समर्थन करते नज़र आये स्वामी रामदेव अपने लक्ष्य को पाने के लिए ऐसे अनुचित बयान देते कभी नज़र नहीं आयेंगे. और अंत में यही कहूंगा इस अनशन ने बाबा रामदेव के अभियान को कुछ समय के लिए नेपथ्य में भले ही धकेल दिया हो लेकिन उनके एवं स्व.राजीव दीक्षित के प्रयासों ने अधिकतर लोगों के मन में बड़े ही अच्छे ढंग से भ्रष्टाचार के दुष्परिणामों को रोपित कर दिया है और यह बीज एक दिन बड़े वृक्षों के रूप में हमें दिखेंगे. शंकर फुलारा जी को मैं व्यक्तिगत रूप से धन्यवाद देता हूँ.

अजित भोसले
(मध्य-प्रदेश)

K M Mishra said...

इन तथ्यों को एक दम से नाकारा नहीं जा सकता है. सुरेश जी अगली कड़ी का इंतज़ार है. ये भी हो सकता है की पुरे देश को मूर्ख बनाया गया हो और अन्ना को हथियार. बात में दम है.

पद्म सिंह said...

आपका लेख सार्थक है... मै भी तीन दिन अन्ना के साथ जंतर मंतर पर रहा, और अनुभव किया कि अन्ना वास्तव में बेहद सीधे सादे और छल प्रपंच से दूर लगे... अपनी बात भी बेहद सादगी से साधारण शब्दों में कहते हैं... ऐसे सीधे सादे इंसान को मोहरा बना कर इस्तेमाल कर लेना कोई कठिन कार्य नहीं है... अन्ना भ्रष्टाचारियों के लिए चिंता का विषय नहीं हैं... अन्ना को तो जन लोकपाल के संसद तक पहुँचने से पहले ही इतना उलझा देंगे कि अन्ना चारों खाने चित नज़र आयेंगे... लेकिन बाबा रामदेव की बुद्धि और ओज के आगे पूरे देश के भ्रष्टाचारियों की एक नहीं चल रही है... समिति के सदस्यों पर पहला प्रश्न चिन्ह बाबा रामदेव जी ने लगाया था... वो कहीं न कहीं भांप गए थे मसले को... एक फ़िल्मी डायलोग है.. मुझसे लड़ने का जज्बा तो पा लोगे ... लेकिन मुझ जैसा कमीनापन कहाँ से लाओगे... लेकिन कांग्रेस सहित सारे भ्रष्टाचारी जानते हैं कि बाब राम देव का बुलडोज़र एक लंबे रास्ते से लेकिन पूरी गति पाते हुए आने वाला है... और उसी हथियार से इन दुष्टों का वध किया जाने वाला है जिसके बल पर ये देश पर डकैती डालते रहे हैं...
अन्ना ने यह बयान दे कर कि "यदि संसद बिल पास नहीं करती तो" सरकार को बहुत बड़ी राहत दे दी है और एक तरह से सरेंडर कर दिया है... होइहैं उहै जो राम रचि राखा...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

अन्ना के पहले बिल में जो चीजें थीं, वह धीरे-धीरे दरकती नजर आ रही हैं. फिर भी "पहले वाला बिल" एक अच्छी शुरूआत था.
रामदेव जी जो काम कर रहे हैं, उसमें वे सफल अवश्य होंगे, आखिर हर जिले में, हर तहसील में जाकर लोगों से मिल रहे हैं. जिस प्रकार से लोग उनकी सभाओं में जुड़ रहे हैं, बहुत आशायें दिखाई दे रही हैं, लेकिन आशंका यही है कि इन सभाओं में जुटने वाले लोग वोटिंग के समय जाति-धर्म के आधार पर वोट न कर बैठें, जिसमें स्वामी जी पिछड़ जायेंगे.
मीडिया का यह रुझान मुझे भी शंकास्पद लगता है जिसमें कई मौकों पर स्वामी जी की लाखों लोगों वाली रैलियों को पांच मिनट तक नहीं दिये, दूसरा इस रैली में विश्वबन्धु गुप्ता जी द्वारा इतना सनसनीखेज खुलासा करने पर एक भी बड़े नाम से पत्रकारों ने एक सवाल पूछना आवश्यक नहीं समझा, कल्पना कीजिये कि यदि तथाकथित दांये-मार्ग वाली पार्टियों के लोगों के नाम इस लिस्ट में होते तो क्या हाल किया होता. मीडिया की भूमिका कुछ और ही बयान कर रही है..

PRATUL said...

raamdev जी ke sandarbh में :

कोई किस वर्ग से रहा है? किसने क्या व्यवसाय अपनाया हुआ है? कोई पहले मोची था, धोबी था, दूधिया था, चपरासी था........ कोई कुछ भी रहा हो ... लेकिन अपने सत्कर्मों से साधु होकर प्रसिद्धि पा रहा हो तो उसे वैसा ही सम्मान milnaa भी चाहिए. यदि सुरेश जी अपनी आजीविका आज फोटोकोपी और अनुवाद करके चलाते हैं तो क्या भविष्य में वे राष्ट्र का नेतृत्व करने वाला पद नहीं ले सकते? राष्ट्रीयता और चरित्र किसी की बपौती नहीं और न ही संभ्रांत वर्ग की उपज है. ......... ये sabhii गुण ज़मीन से जुड़े लोगों में ही milte हैं.

aapkii doordrashti samay की zaroorat है.

Anonymous said...

जनसंघर्ष को अचानक अफ़्रीका से आकर, गाँधी ने “हाईजैक” कर लिया था.

मेरे विचार से गांधी ने भले ही आजादी का जनसंघर्ष हाईजैक कर लिया हो। पर कब उस वक्त के व्यापारियों ने गांधीजी को हाइजैक कर लिया वो खुद भी नहीं जान पाए। आजादी सिर्फ इसलिए मिली क्यूंकि देसी व्यापारियों को लगा की जो पैसा अंग्रेज यहां से कमा के ले जाते हैं उससे हम क्यों ना अपनी जेबें भरें।
इसके बाद व्यापारियों ने पहले बड़े खुर्राट नेताओं को और सत्तालोलुपों को लपेटा फिर उनके द्वारा गांधी बाबा को फंसाया।
देश को आजादी तो मिली लेकिन इसका फायदा सिर्फ उस व्यापारी वर्ग और नेताओं को ही मिला।
चाहें तो इतिहास उठा कर देख लें आजादी के बाद से अब तक का। हमारे देश की तरक्की सिर्फ एक बड़े बाजार के रूप में हो रही है। जहां आने वाले समय में दुनिया के सबसे ज्यादा युवा खरीददार होंगे। चूंकी हमारे देश में पैसा फेंक कर कुछ भी तमाशा हो सकता है इसलिए भारत का नाम दुनिया भर में चमक रहा है ना कि चीन का जिसकी जनसंख्या हम से कहीं अधिक है लेकिन वो भी हमें ही माल बेच रहा है।
शायद जब सरदार पटेल जैसे नेताओं का कद कम किया जाने लगा तब तक गांधी ये चाल समझ गए होंगे। लेकिन तब तक चिड़िया खेत चुग गई थी।
और गांधीजी विचारों की जगह नोटों पर छपे रह गए।
तो बात का लब्बो लुआब यह कि जिस काम(आजादी) के शुरू होने से पहले ही लुटेरे आ गए थे तो उस मामले में अब छोटे गांधी क्या कर पाते हैं यह सब लोग देख रहे हैं।और हम भी।

lokendra singh rajput said...

पहले दिन तो मुझे कुछ ऐसा नहीं लगा था.. लेकिन जैसे जैसे आन्दोलन ने जोर पकड़ा और अन्ना के साथ मंच पर जो चेहरे नजर आये उन्हें देख कर दाल में कुछ काला नजर आने लगा... सच कहूँ तो अन्ना को मोहरा बनाया जा रहा है... मैंने भी अपने ब्लॉग अपना पंचू पर इस सम्बन्ध में चिंता व्यक्त की है....
....... संसद के हिसाब से ही चलना था तो फिर इतना तामझाम क्यों फैलाया, क्यों लोगों की भावनाओं को उद्वेलित किया? क्यों लोगों का मजमा लगवाया? क्यों फोकट में अग्निवेश जैसे माओवादी और नक्सलियों के समर्थक को मंच साझा करने दिया? क्यों बेवजह प्रोफेसनल एनजीओ संचालकों को हीरो बनवा दिया? सबसे बड़ा सवाल आखिर क्यों भ्रष्टाचार के खिलाफ बाबा रामदेव के आंदोलन को छोटा साबित करने की कोशिश की गई? क्यों घोटालों के आरोपों से घिरी कांग्रेस नीत यूपीए सरकार से लोगों का ध्यान भटकाया? बहुत से सवाल हैं जिनके जवाब भी अन्ना हजारे को ही देने पड़ेंगे। वे इन सवालों के जवाब दिए बिना अपने गांव रालेगन सिद्धि वापस नहीं लौट सकते।
http://apnapanchoo.blogspot.com/2011/04/blog-post_19.html

Ashish Shrivastava said...
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Baba Mourya said...

Aashish ji
Uncha uthane ki koshish to aapane bhee ki hogi ....na utha paye to ....digvijay singh ki tarah gali dekar hi santusta ho rahe ho.
Ramkishan Yaday jin baba ko aap kah rahe ho unhone Tapu karida ya Arabo ki sampatti banai...kisi ko luta to naheen....koi bhrshachar to naheen kiya...
Aur kaun Moorkh kahata hai... sadhu ke pas paisa naheen hona chahiye....Bharat men raja Maharajao se jyada dhan mandiro aur sadhuon ke pas raha hai....ha uska sahee upyog hona chahiye....jo baba Ramdev kar rahe hai..
dhan ke liye aap Bharat chhod kar Videsh jate ho...us dhan se apane bachche palane ke alava kiya kya hai...kya kioi school chalaya hai....ab abab Ramdev ko log lakhon ru. dekar sune ...aur aapko fockat me sunane gali mohalle ka bhee koi na aaye ...to Digvijay ki tarah bhokane se se koi fayada naheen...
Suresh ji ne baba ke nam se mudda uthaya hai...use dheela karane ki koshish na hee kare to behatar hai.

Ye Tuippani aapane Soniya ke ishare par nachane vale Swami Agnivesh par ki hoti to lagata ki aap such ko such kahane ka sahas rakhate hai.

Anand G.Sharma आनंद जी.शर्मा said...

आदरणीय सुरेश जी,
एक्सेल शीट में - सब्जेक्ट वाइज - एक कम्पेरिजन टेबल बनाइये |
कॉलम A = सब्जेक्ट
कॉलम B = स्वामी/बाबा रामदेव
कॉलम C = अन्ना हजारे
कॉलम D = परिणाम एवं टिप्पणी

उसके बाद कॉलम A में निम्नलिखित सब्जेक्ट भरिये - खुद भी सोच कर - जितने याद आ सकें - सब लिखते जाइये :
१. उम्र
२. शारीरिक क्षमता (जीर्णावस्था/ अक्षमता अथवा स्वस्थ सुदृढ़ आगामी १०-२० वर्षों तक आन्दोलन नेतृत्व सामर्थ्यवान)
३. बुद्दिमत्ता
४. वाक चातुर्य
५. मुखौटे (छल प्रपंच के पीछे के सत्य को समझने की मानसिक शक्ति)
६. विवेचनात्मक शक्ति
७. किसी विषय पर धारा प्रवाह - सोदाहरण - तथ्य सहित - बोलने की शक्ति
८. खरी खरी मुंह पर सुनाने का साहस (Courage to call a spade - a spade)
९. झुनझुना पकड़ा देने पर भूलुंठित हो कर क्रंदन छोड़ कर खुश हो जाने की विधा
१०. समस्त भारत एवं विदेशों में अनुकरण
११. हुक्मरान किससे अधिक भयभीत हैं
सब्जेक्ट तो और भी याद आ रहें हैं परन्तु आपके एकाधिकार क्षेत्र में अनधिकृत प्रवेश करना मेरे लिए एक घृष्ट कृत्य होगा अतः आगे का आप ही लिखें ताकि भारत की बाल-बुद्धि जनता को जल्दी और ठीक से समझ में आ जाय |

ajeet said...

आशीष जी व्यक्ति पूजा के बारें में इतना ही कहूंगा की यह हर दौर में होती आयी है और होती रहेगी, क्योंकि कुदरती रूप से कुछ लोग नेतृत्व के लिए जन्म लेते हैं और अध्संख्य लोग अनुगमन करने के लिए, किसी भी धर्म, देश को उठा कर देख लीजिये महापुरुषों का ही अनुगमन करके लोग आज तक चलते आयें है और आगे भी करते रहेंगे, कांग्रेस मैं जितने भी सोनिया पूजक हैं हैं वे दुनिया के किसी भी कोने के लोगों को शर्मिन्दा करने के लिए काफी है व्यक्ति पूजा को लेकर बाबा रामदेव की सोनिया जैसे लोगों से तुलना करना बेमानी है, क्योंकि बाबा राम देव को लोग अंतर्मन से स्नेह,या प्रेम करते हैं और सोनिया गांधी की पूजा केवल स्वार्थों की पूर्ती के लिए की जाती है.

सौरभ आत्रेय said...

जो मीडिया दिन –रात राष्ट्र के विरुद्ध षड्यंत्र में सम्मलित हो – क्या वो किसी को अत्यधिक महत्व ऐसे ही दे देगा मुझे अन्ना हजारे का इतिहास-भूगोल अधिक नहीं पता पर इस घाघ राष्ट्र-विरोधी मीडिया के इतना महत्व देने से कोई भी समझदार व्यक्ति सोच सकता है निश्चित ही दाल में कुछ काला है. भारत की जनता की बुद्धि को भी कांग्रेस, मीडिया आदि राष्ट्र-विरोधी शक्तियों ने अपने अधिकार में ले लिया है – तभी इनकी धूर्तता भरी चालों में आसानी से फंस जाते हैं. मंच पर अग्निवेश जैसे धूर्त देश- विरोधी स्वघोषित-विद्वानों को देख कर ही पता लग जाता है की इनका प्रयास कितना निस्वार्थ है – क्योंकि जो पूर्णतयः ईमानदार लोग हैं वो ऐसे लोगो को अपने पास भी नहीं फटकने देंगे – कांग्रेस से इतने साल भी ठगे और लूटे जाने पर भी जनता को उसकी चाल और उद्देश्य नहीं दीखते तो कोई क्या बचाए देश को – सही कहा आपने अनेक क्रांतिकारियों के प्रयासों को दो टके के गाँधी के नाम से दबा दिया गया था और जनता आज भी उसी अन्धश्रद्धा में जी रही है चाहे उसको कितना ही तर्कपूर्ण उत्तर दो.
राम के ज़माने से हम व्यक्तिवादी पूजक नहीं हैं – इसका इतिहास केवल २००० साल पुराना है किन्तु यह पूजा कुछ १०० वर्षों से अत्यधिक प्रचलन में है- लोग किस प्रकार से एक व्यक्ति को और उसके पीछे की साजिश को जाने बिना महत्व देते हैं – घोर आश्चर्य होता है.

anusoni said...

ताजा खबर ये है कि -
१)६०,००० करोड़ के लिए मीडिया अन्ना को क्या हर किसी को हीरो बना सकती हे , और जब इनाम में भरत रत्न होतो फिर ४ दिन भूका रहने में क्या हे



2) संयुक्त समिति की पहली ही बैठक में भ्रष्ट जजों और मंत्रियों को निलम्बित नहीं करने की शर्त अण्णा ने मान ली है,
3) दूसरी खबर आज आई है कि अण्णा ने कहा है कि "संसद ही सर्वोच्च है और यदि वह जन-लोकपाल बिल ठुकरा भी दे तो वे स्वीकार कर लेंगे…"
4) एक और बयान अण्णा ने दिया है कि "मैंने कभी आरएसएस का समर्थन नहीं किया है और कभी भी उनके करीब नहीं था…"

GHANSHYAM said...

ashish shrivastava ji !

दुनिया जिसे "बाबा रामदेव" के नाम से ही जानती है आपके द्वारा बार बार उस शख्स को "राम किशन यादव" कहना आपकी सोच और मानसिकता की दिशा और दशा को दर्शाता है, अब और आपको कुछ भी सफाई देने की जरूरत नहीं है |

Anand G.Sharma आनंद जी.शर्मा said...

कुछ और पॉइंट याद आ रहें हैं :
१२. किसके जनांदोलन में - प्रकट रूप से - कितने नकाबपोश (मुखौटाधारी) वाइरस घुसे हुए है - गिन कर बताइए - क्योंकि किसी कार्य का पूरा होना वायरसों की संख्या एवं सिस्टम की प्रतिरोधी क्षमता पर निर्भर करता है |
१३. किस के पास फंड्स निरंतर आ रहें हैं - और किस के मात्र ४ दिन के आन्दोलन को - बेईमानों द्वारा कहा गया कि वो कॉर्पोरेट सेक्टर से ८२ लाख रुपये ले कर किया गया था और उसके हिसाब पर टिप्पणी की गयी |
१४. किसके जनांदोलन में हुक्मरानों को बिके हुए मीडिया द्वारा ४ दिन तक खूब हवा भरी गयी - और जिस तरह भरी गयी - मनमुताबिक न चलने पर उसी तरह निकाल भी दी जाएगी |
१५. किसके आन्दोलन में अधिकांश लोग सिर्फ तमाशा देखने आये थे - याने कि सोडावाटर के बुलबुलों का सा जोश पैदा हुआ था - और किसके जनांदोलन में परिपक्व - पीड़ित एवं भुक्तभोगी लोग आते हैं |
एक बात स्पष्ट कर दूँ - मैं भी अन्ना हजारे के जनांदोलन का पूर्णरूपेण समर्थक हूँ परन्तु जीती मक्खी निगलने की आदत नहीं है |

Bharti (Kanpur) said...

Main aapke lekh se poori tarah sahmat hoon. Mujhe lagta hai ki Anna Ji ka aandolan poori tarah se fail ho chuka hai....aur Anna ji ka andolan ulte Congress ko hi bahut faayeda pahoonchaya ke liye tha. Ye kuch points hain jin pe vichar kiya jaa sakta hai...

(1)Anna Ji ki team main ek bhi saaf suthari political background ka aadmi(For example Dr. Subramaniyam Swamy) nahin hai isliye Anna ji ki team ko political ground pe aaram se bevkhoof banaya jaa sakta hai. Aur to aur corruption ke mudde pe bahut pahile se bolne wale Dr. Subramaniyam Swamy ko koi value nahin mili aur unki energy aur dimaag ka istemaal Anna ji nahin kar paye. Isse Soniya Gandhi ka ek dushman kam ho gaya.

(2)Kuch kuch yahi haal Baba Ramdev ka bhi hua Jinko congress nahin chahti thi ki wo team main aaye jabki Baba Ramdev aur Dr. Subramaniyam Swamy alag alag manch se aur Phichle 3 saalon se Congress ki corruption policy ko Janta main ujaagar kar rahe the.Isse Soniya Gandhi ka dossra dushman bhi kam ho gaya.

(3)Anna ji ka kissi bhi political party ko is mission main saamil nahin karne se janta ko koi option nahin mila....keval yahi hua ki pahile janta janti thi Congress sabse Brasht hai aur baad main ye samjhne lagi sabhi bhrast hain. Agar aaj election ho jaye to janta confuse ho ke keval Congress ko vote karegi.Isse Soniya Gandhi ka parliament main sare dushman kam ho gaya.
Isliye mera manna hai Anna ji ko apni muhim band kar deni chahiye, kyonki janta main aur confucion badega aur ultimately congress hi faayde main rahegi

आशीष श्रीवास्तव said...

सुरेश जी,

व्यक्तिगत हमले शुरू हो गये है, मै अपनी सारी टिप्प्णीयां हटा रहा हूं !

Suresh Chiplunkar said...

नहीं आशीष जी, ऐसा नहीं कीजिये…
क्या मैंने आपसे कुछ कहा है?
बहस को आप व्यक्तिगत क्यों ले रहे हैं?

Lakshay said...

Ye peeche ke baatein aapko koi bata kar jaata hai ya phir aap apni Budhi ka prayog karte hain.......... wah bhai wah.. Lath gaad rakha hai chore ne....... Hariom

Ashok said...

priya Suresh Ji, Namaste!

aapkaa anna hajaare ke jan lokpal bill ke liye aandolan ki prushthbhoomi par likha aalekh bahut achha aur satiik laga. Hundutv virodhi psudo-secular hathkando ke mukaable seedha sapat Hindu sangathan ka raasata lambaa jaroor hai par sahii bhi hai. Aur gometry me kaha jaata hai ki " the shortest distance between two points is the straitline."
Ashok Kulkarni

Anonymous said...

hamarey payarey kejriwal jee asal me 1 income tax officer hai , jinka istifa sarkaar ne aaj tak manjoor nahee kiya hai kyno? ab wo sarka ke mohrey ka kaam kartey hain

Anonymous said...

@Suresh ji - Please dont be defensive. Mr Ashish started to be personal in the first place.
@Ashish - Please explain if "आप व्यक्ति पूजक कब से हो गये ?" is not a remark personal enough?
Please have the guts to stand by your conviction. Chickening out and removing your comments will only demonstrate your intellectual corruption.

Naresh said...

खिडकी दरवाजे खोल दिये दिमाग के, देखते हैं क्या होता है?

Ashok said...

Priya Suresh Ji
Kripaya comments Hindi me type karne hetu vidhi aapke blog website par bataaye
ashok kulkarni

GHANSHYAM said...

Dear Ashok Ji !
Please follow the link for hindi typing.

http://translate.google.co.in/?hl=&ie=UTF-8&text=&sl=hi&tl=en#

Siddharth Sharma said...

मेरे मन भी इसी तरह की शंकाएं थी . आप का कथन सत्य प्रतीत होता है . उस पर विश्वास करने को दिल करता है . जो कांग्रेस भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण बेकफुट पर थी अब वह भ्रष्टाचार से लडती प्रतीत हो रही है . ध्यान बंटाने में कांग्रेस बहुत होशियार है .

dr katyayan mishra said...

v have been cheated so many times that v can not trust anybody now now i can see that some I A S shall become C E O of this bill and screw it fuck it like these I A S have been doing to our country if at all v want to change any thing for good it can not b done without removing these IAS in fact rather than our servants they have become our masters they have more black money than our politicians katyayan mishra

ajeet said...

@ प्रिय मित्र अशोक कुलकर्णी
शायद सुरेश भाई पर इतना समय ना हो की आपको बता पायें की हिंदी टाइपिंग कैसे करें, मैं भी कंप्यूटर और नेट के इस्तेमाल मैं लगभग अंगूठा छाप हूँ, लेकिन हिंदी, एवं हिंदुत्व का कट्टर प्रचारक अवश्य हूँ, अतः अपनी भावनाएं व्यक्त करने के तरीकों पर दिन रात मेहनत कर रहा हूँ,आप को अपनी छोटी सी बुद्धी से हिंदी मैं टाइप करने की विधी बताते हुए मुझे अत्यंत हर्ष हो रहा है, अगर आपका e-mail id जी-मेल पर है तो यह बहुत आसान है, अगर नहीं है तो जी-मेल पर एक e-mail id बनाएं फिर उसके compose mail मैं जाए, आपको कोने मैं "अ" लिखा दिखाई देगा उस पर क्लिक मारें, और तत्पश्चात रोमन लिपी मैं अपनी भावनाएं टाइप करना शुरू कर दे टाइप हो जाने के बाद राईट क्लिक मारें सिलेक्ट all करें, फिर उसे copy कर लें फिर सुरेश जी के ब्लॉग पर या जिस किसी के लेख पर टिप्पणी करना है वहां जा कर राईट क्लिक करके पेस्ट कर दे , हो गया आपका काम आसानी से, इसके बावजूद कोई दिक्क़त हो तो बताएं आपकी समस्या का निदान किया जाएगा. तरीके और भी हैं पर यह थोड़ा आसान है.

अजित भोसले
ग्वालियर (मध्य-प्रदेश)

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

माय गोंड, इतने आगे भी सोच लेते है लोग ??
मैं तो अभी भी यही प्रार्थना करता हूँ कि आपकी बात गलत निकले

Man said...

बिलकुल सही कहा स्वामी ने ,अन्ना जी के साथ फर्जी लोगो की मीडिया प्रेमी भीड़ खडी हे केवल बाबा रामदेव को छोड़ |विदेशी चंदो से पोषित भीख मांगे ज्यादा चंदे की आस में अन्ना जी के मंच पर आ गए स्वामी अग्निवेश जेसे षड्यंत्र कारी और नक्सल समर्थक इसाई के पक्ष धर लोग अन्ना के मंच का गलत फायदा उठा रहे हे और विजुअल मिडिया में में अपने थोबड़े दिखा रहे जिस से इनके चंदे में अच्छी खासी बढ़ोतरी हुई हे और ये माला मॉल हो रहे हे |अन्ना जी को सवामी सुब्रमन्यम जेसे और बाबा रामदेव नरेंद्र मोदी जेसे वक्य्तिव के साथ की आवश्यकता हे |स्वामी सुब्रमन्यम इसे वन मेन आर्मी हे जिन्होंने वर्षो से भ्रस्ट गाँधी नेहरु परिवार के खिलाफ अकेले दम पर मोर्चा खोल रखा हे वर्तमान में करीब करीब सभी घोटलो को स्वामी ने ही उजागर किया हे |पता नहीं बी. जे.पि को सुब्रमन्यम स्वामी से क्या एलर्जी जो उनका किसी भी मुद्दे पे साथ नहीं देती क्योकि इस पार्टी में भी चोर भरे पड़े हे हाँ कांग्रेस के बनिस्पत 15% ही हे |विपक्ष में ही दम होता तो बाबा राम देव का उनकी भ्रसटाचार के खिलाफ मुहीम साथ देता लेकिन आन्दोलन भगवा से सफ़ेद गाँधी टोपी पे आ गया जिसे कांग्रेस अपनी बपोती मानती हे |अन्ना का आन्दोलन हायजेक हो गया हे |एन .जी. ओ जेसे फोकटिये चंदा चाटू लोगो को साथ ले केर अन्ना ने आन्दोलन पर अपनी पकड़ ढीली कर ली हे ओए वो ही लोग अन्ना के साथ लगे हे जो कांग्रेस और सोनिया की गोद में खेलते हे ,उन से क्या आशा की जा सकती हे ?अन्ना एक इमानदार व्यक्ति हे लेकिन जिस प्रकार आशा जगाई थी उसी प्रकार निराशा भी बढ़ रही हे क्योकि अन्ना झुक रहे उसमे इनके साथ वाले लोगो हाथ हे उनकी डोर दस जनपथ में हे ..........जय हो

Man said...

अन्ना तो यु.पि .ऐ गोर्व्मेंट घ्याबिन करने वाले थे ,अचानक यु.पि ,आसाम केसे याद आ गए ?धोती की लांग खोल के वापस ठूंस ली अन्ना ने ?

ajeet said...

आशीष जी व्यक्ति पूजा से संबधित जवाब आपको सुरेश भाई ने दे ही दिया हैं,इस देश के ही नहीं दुनिया के अधिसंख्य लोग व्यक्ति पूजक ही रहे हैं, चाहे ईसाइयों को देखें,बोद्धों को देखे किसी को भी देखें,कुछ ही लोगों मैं नेतृत्व का गुण होता है बाकी लोग अनुगामी ही होते हैं आप कितने भी तर्क दे ले लेकिन जितने सोनिया पूजक कांग्रेस मैं है वे दुनिया के किसी भी व्यक्तिपूजक को शर्मिन्दा करने के लिए काफी हैं, रही बात देश से बाहर रहने की तो अपने विषय में आपको बता दूं, की कर्म और स्वभाव से मैं व्यवसाई हूँ लेकिन शायद महाराष्ट्रियन होने के कारण बेहद गरीबों के लिए एक दर्द जन्म से ही पाया है और इस हेतु यूरोप छोड़ कर दुनिया के हर गरीब को पास से देखने का प्रयास किया है, आप भी देश से बाहर रहते हैं तो महसूस किया होगा की ऑस्ट्रेलिया मैं भी बेहद गरीब लोग रहते हैं, कहने का तात्पर्य यह है की दुनिया में कुछ स्थानों को छोड़ कर हर जगह भ्रष्टाचार के कारण गरीबी है और एक आश्चर्य जनक बात बताता हूँ की जितना देश गरीब होगा वहां के करोडपति या कहू अरब,खरब पति संपन्न देशों के धनाड्य लोगों से ज्यादा धनाड्य होते हैं, और हो सकता हैं भारत इसमें चैम्पियन साबित हो, तो ऐसे लोगों को अगर बाबा रामदेव देशभक्ति सिखाना चाहते हैं तो हम लोगों को उनका समर्थन करना चाहिए या व्यक्ति-पूजा जैसे जुमलों से हतोत्साहित करना चाहिए एक बात और वर्षों से जमे इन भ्रष्टाचारियों को उखाड़ फेकने के लिए अथाह पूंजी की आवश्यकता पडनी थी जो रामदेव बाबा ने अपने वाक् चातुर्य से योग से दान से शुद्ध देसी व्यापार को आधुनिक तरीके से करके और विदेश मैं बसे लेकिन मन से कट्टर देश-भक्तों की सहायता से जुटा ली, यह एक कड़वा सच है की चालीस साल से ऊपर की उम्र के विदेशों मै बसे भारतीय लोगों मैं देश मैं रहने वालों की अपेक्षा ज्यादा देश-भक्ति का भाव देखा जा सकता है, अतः उनके दिए दान को आप देश सेवा के रूप मैं देखे, आप विदेश मैं ज्यादा रहते है तो यह भी जानते होंगे की जितना आसान काला धन रखना भारत मैं है अन्यत्र कहीं नहीं. इसे व्यक्तिगत प्रहार मत समझयीगा और मेरी बात का बुरा मत मानियेगा बल्कि एक बात कहना चाहूँगा आप जैसे लोगों के कारण और ज्यादा लिखने की इच्छा बलवती होती है कृपया प्रेरणा स्त्रोत बने रहें. मेरी पहली टिप्पणी मैं आपके लेख को नकारात्मक लिखने से आपको जो मानसिक संताप हुआ है उसके लिए क्षमा-प्रार्थी हूँ.
अजित भोसले.

Ratan Singh Shekhawat said...

इस आन्दोलन रूपी षड्यंत्र पर कुंवरानी निशाकँवर नरुका ने ज्ञान दर्पण पर अपने एक लेख में ये आशंकाएं पहले ही जाता दी थी आपने उनकी आशंकाओं पर मोहर लगा दी है कि वे सच थी |
भ्रष्टाचार की समाप्ति जन लोकपाल विधेयक से संभव ही नहीं | ज्ञान दर्पण : विविध विषयों की हिंदी वेब साईट:

PGC NEWS said...

bhaut hi achha hai suresh ji
kya aap hume raght denge is lekh ko ya or lekh humare web portal ke liy
www.pgcnews.com
rajvir singh
pgc news
sub-editor
+919810857360

Ankit.....................the real scholar said...

हिन्दुत्ववादी और राष्ट्रवादी शक्ति तो जुटा लेंगे ................पर शर्म्निर्पेक्षों वाला कमीनापन कहाँ से लायेंगे

Anonymous said...

सुरेश भाई, ..आज कुछ असहमत होना चाहता हूं..हमे कुछ बिंदुओं पर नए सिरे से विचार करना चाहिए। कृपया पूरा जवाब अवश्य पढ़ें।
पहली बात..हम लोकपाल के समर्थन में क्यों हैं? संसदीय और प्रतिनिधि लोकतंत्र पर आक्षेप करने वाली और 'सुपरकॉप' की तरह संविधानेत्तर संस्था बनाए जाने की कोशिशों के विरोध में जो वाद-विवाद हो रहे हैं, उस पर क्या? या हम अधिनायकवाद के समर्थक हैं।
बहस अब लोकपाल के तकनीकी बिंदुओं पर होनी चाहिए। जो नहीं हो रही है क्योंकि प्लास्टिक की तरह चबाने का सुख उसमें नहीं मिलता। ऐसे विषयों पर जानकारी के लिए क़ानून की तकनीकी पेचीदगियों और व्यवहारिक लोकतंत्र की बारीकियों पर पैनी निगाह रखनी पड़ती है। भावनाओं का शोषण और भय का दोहन करने की यहां कोई गुंजाइश नहीं होती। सच में ऐसा ही है तो व्यक्तिविशेष द्वेष की बजाय लोकपाल के तकनीकी बिंदुओं पर हम बहस क्यों नहीं करते? क्यों हमेशा प्लास्टिक चबाने का सुख उठाते हैं। दो महीने के लिए बनाई गई इस कमेटी में ना किसी को तनख्वाह मिलनी है और ना ही लालबत्ती की कार का कथित सुख। ना मुझ जैसे महाप्रलय-महाविनाश दिखाने वाले बेघर(किराए)बे(कार)और बर्बाद पत्रकार को चवन्नी मिलता है अन्ना की ओर से।

Anonymous said...

दूसरी बात..लोकपाल और अन्ना के आंदोलन का समर्थन कर रहे हर हाथों पर क्यों भगवा-लाल-हरे रंग तलाशे जा रहे हैं? जिस राष्ट्रीय विकास परिषद को आप ‘पालतू परिषद’ क़रार दे रहे हैं क्या उसमें भूषण पिता-पुत्र, अन्ना, अरविंद केजरीवाल, संतोष एन हेगड़े स्थायी सदस्य हैं? जिनके नाम आपने लिए हैं वे तो जंतर-मंतर पर आए ही नहीं । ‘पालतू परिषद’ की सब कमेटी अरसे से लोकपाल पर विचार कर रही है लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है। उल्टे कविता श्रीवास्तव, अरुणा रॉय और हर्षमंदर सरीखे लोग अन्ना से खार खा रहे हैं। मैं तो इन्हें जानता ही हूं। नया क्या है इसमें? इनके समर्थन में दिग्विजय सिंह ‘पालतू परिषद’ के इन लोगों को ड्राफ़्ट कमेटी में नहीं लिए जाने पर ग़ुस्सा रहे हैं। क्यों अमर सिंह ड्राफ़्ट कमेटी के मेंबर्स के ख़िलाफ़ चैनल-अख़बारों के दफ़्तर जा-जाकर सीडी बंटवाते हैं। क्यों कॉग्रेस पोषित अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स के पालतू पत्रकार विनोद शर्मा सीडी को अंथेटिक बताते हुए लेख लिख मारते हैं। जिसकी पुष्टि अगले दिन टाइम्स ऑफ़ इंडिया भी कर देता है।
अहम सवाल- क्यों शांतिभूषण की प्रेस कॉफ्रेंस को केवल टाइम्स-नाऊ, न्यूज़ एक्स और स्टार न्यूज़ लाइव दिखाते हैं। फिर आधे में ही ऑफ़ एयर कर देते हैं? जबकि अगले ही दिन जवाबन होने वाली अमरसिह की प्रेस कॉफ्रेंस को लाइव सारे चैनल दिखाते हैं? क्यों? आखिर क्यों 'स्वामी' अग्निवेश अगले दिन एनडीटीवी पर आकर विनोद दुआ को यह बताते हैं कि अन्ना अब गुजरात में जाकर एक लाख मुस्लिमों के आंदोलन में शरीक होंगे। मुझे नहीं पता कि वाक़यी होंगे या नहीं किंतु इतना अवश्य कह सकता हूं कि अरविन्द केजरीवाल और किरण बेदी सरीखों को जिनसे उम्मीद थी.. वे महज़ इसलिए साथ छोड़ रहे हैं क्योंकि इस पूरे आंदोलन में क्रेडिट नहीं दिए जाने से इन दिनों स्वामी रामदेव नाराज़ से हैं। बात यही है।

अन्ना पिछले साल नवंबर में और इस साल जनवरी में दिल्ली आए थे। कार्यक्रम और रैली थी भारत स्वाभिमान आंदोलन की। केवल आस्था टीवी ने लाइव किया। बाक़ी ने न्यूज़ का हिस्सा बनाया। पिछले साल तो किरण बेदी को चीफ़ इन्फर्मेशन कमिश्नर बनाने की मांग के लिए यहां दिल्ली में अन्ना-रामदेव और केजरीवाल साथ आए थे। मुझे तो कहीं भी तब अग्निवेश,कविता-मेधा वगैरह दिखाई नहीं दिए। तब तक तो आप को अच्छा लग रहा होगा।

Anonymous said...

मुफ़ीद वक़्त आने पर अग्निवेश को साइडलाइन किया गया। किरण बेदी भी किनारे लगाईं गईं। क्या इतना काफ़ी नहीं था? अब ड्राफ़्ट कमेटी के मेम्बरों पर नज़र डालिए।

1>>संतोष एन हेगड़े- ये वही संतोष हेगड़े हैं जिनके लिए आडवाणी पितातुल्य हैं। आडवाणी के अनुरोध पर इस्तीफ़ा वापस तक लेते हैं। वही जज जिन्होंने आरक्षण के मसले पर अर्जुन सिंह को लपेटे में लिया था। वही जज जो कर्नाटक की बीजेपी सरकार के कार्यकाल में लोकायुक्त नियुक्त किए जाते हैं।
अन्ना हज़ारे- अनेकों बार बीजेपी-शिवसेना युति से लेकर कॉग्रेस-एनसीपी की सरकारों की नाक में दम कर दिया। इनकी इंटिग्रिटी को लेकर सवाल फर्ज़ी उठाए जा सकते हैं लेकिन आपको बताऊं कि इनके ट्रस्ट में घालमेल के आरोपों की जांच करने वाले जज ने भी आंदोलन को समर्थन दिया है।
2>>>शांतिभूषण-प्रशांत भूषण- दुनिया जानती है कि शांतिभूषण ही वे शख्‍स हैं जिन्होंने इंदिरा गांधी के खिलाफ़ राजनारायण के केस में पैरवी की थी। जिस ऐतिहासिक मुकदमे में हार से इंदिरा गांधी की फजीहत हुई,वह शांतिभूषण की उपलब्धि था। यही शांतिभूषण आडवाणी-वाजपेयी के साथ मोरारजी केबिनेट का हिस्सा था। आज ही एक प्रसिद्ध चिंतक ने बताया कि वीपीसिंह के मंडल से कई बरस पहले कर्पूरी ठाकुर ने जिस आरक्षण नीति को 78 मे बिहार में लागू किया था.. वह फार्मूल्या शांतिभूषण का ही सुझाया हुआ था।

3>>>केजरीवाल बेहद छोटे हैं। इनका सार्वजनिक जीवन क्या है, आपके सामने है। प्रशासकीय सेवा का पद छोड़कर सार्वजनिक जीवन में आए है। चार दिन पहले मेरे सामने ज़मीन पर बैठे थे। आगे उनको भी पाइपलाइन में रखा गया है। छवि खराब करने के लिए दिग्गी-अमर सिंहों ने पूरी तैयारी कर रखी है।

Anonymous said...

<<>>अब आइए देखें कि अन्ना जिस जंतर मंतर पर धरना दे रहे थे वहां पांच दिनों तक मंच पर क्या क्या हुआ? वह क्यों कांग्रेस या वामपोषित आंदोलन नहीं है।

मंच पर पार्श्व में मां भारती की तस्वीर लगी है। फर्क बस इतना है कि आरएसएस कल्पित भारतमाता के हाथ भगवा ध्वज होता है यहां राष्ट्रध्वज तिरंगा फहरा है। मंच के ठीक सामने और अन्ना से बमुश्किल पंद्रह फीट पर पांच दिनों तक एक खंबे पर एक बोर्ड लटका रहा जिस पर लिखा था.. 25कोड़ा=1कलमाड़ी.. 4कलमाड़ी=1राजा.. 100राजा=1 रानी (किसी ने यहां लिख दिया जनपथ वाली इटली वाली- चित्र अवश्य देखें।) कृपया बताने का कष्ट करें कि यह आंदोलन ‘पालतू परिषद’ अथवा किसी भी वामपंथी का होता तो वे इस तरह के वहां लगी दो-तीन तख्तियों पर लगे इतने दिन लगे रहने देते?

इतना ही नहीं, भाषणों के बीच लगने वाले वंदेमातरम् के नारे, भारतमाता की जय का घोष और इंडिया गेट तक पर इकट्ठा युवाओं का इन नारों के साथ जुलूस में शामिल होना किस कॉग्रेसवाद की निशानी है? आखिर किसे लाल सलामों के लाल बुझक्कड़ दिखने लगे हैं ये लोग? मोमबत्ती जलाना हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं लेकिन हमारी यह संस्कृति भी नहीं रही कि मोमबत्ती जलाने-बुझाने वालों का ‘सामूहिकीकरण’ और ‘वर्गीकरण’ करते हुए इन्हें किसी भी तरह के आंदोलन के अपात्र और निर्विचार मान लिया जाए।

यह आरोप हमारी चिंता का विषय अवश्य होना चाहिए कि राजनेताओं को अछूत क्यों मान लिया गया। यह ट्रस्ट डेफिसिट आखिर क्यों हुआ? क्यों विपक्ष की भूमिका कहीं दिखाई नहीं पड़ी? प्रतिनिधि लोकतंत्र को क्यों अवनत माना गया? फिर आपको यह विचार करना चाहिए कि इसी मंच से हटाए जाने वाली उमा भारती से अन्ना ने सार्वजनिक माफ़ी मांगी। यहीं से भगाए गए ओमप्रकाश चौटाला से नहीं। यही फर्क है।


अनुपम खेर बीजेपी की महिला कमेटी की सदस्य किरण खेर के पति हैं। व्यक्तिगत तौर पर वे स्वतंत्र हैं किंतु उन्हें कांग्रेस-एनसीपी के पैसों से खऱीदे गए आरपीआई एक्टिविस्टों द्वारा निशाना बनाया गया। शोभा डे जो राज ठाकरे के बिहारी भगाओ को सपोर्ट करती रही हैं- वे भी अन्ना के साथ आईं। ये बात अलग कर दो कि इसी राज ठाकरे ने 'मोमबत्ती बुझाकर' भैया नाम का केक काटा था।

स्वामी रामदेव और अन्ना हज़ारे के साथ कई एनजीओ चलाने वाले भी पिछले साल नवंबर में इसी दिल्ली के रामलीला मैदान में इकट्ठा हुए थे। भारत स्वाभिमान आंदोलन के तत्वाधान में आयोजित इस रैली का सीधा प्रसारण था। हां यह ज़रूर है कि इसे चैनलों ने दिखाने लायक इसलिए नहीं समझा क्योंकि इसमें अर्बन मिडिल क्लास (मल्टीनेशनल का बड़ा कन्ज्यूमर) शामिल नहीं था। इसी कन्ज्यूमर ने तो टीआरपी का शोशा खड़ा किया है।

Anonymous said...

अब, आखरी बात। रामदेव ने इस पूरे आंदोलन को फंड किया। जिंदल ग्रुप के कुछ पैसों का जिक्र एक भाई ने किया है। मैं ऐसे दस नाम बता सकता हूं जो संघ परिवार से करीबी वाले कारोबारी ग्रुप हैं। ध्यान रहे ये खर्च चार महीनों का है। चार दिन का नहीं जिस पर दिग्गी उंगलियां उठा रहे हैं।

वे रामदेव ही हैं जिनके बैनर यहां जंतर-मंतर पर लगे थे। श्री श्री रविशंकर के लोग इस रैली में शामिल हुए। आखरी तक वे ही छाए रहे क्योंकि वे अंग्रेज़ीदां मध्यवर्गीय हैं। कम से कम रामदेव के फॉलोअरों से ज्यादा उच्चवर्गीय।
गायत्री परिवार अनशन पर रहा। आरएसएस के लोग परदे के पीछे बैठे। लेकिन अग्निवेश के सामने होने पर केवल तीन-चार लोग वामपंथी सामने आए। शबाना (मुंबई में), मेधा (दिल्ली में), मल्लिका (अहमदाबाद में) दिखाईं दीं।

अब असल वजह कि क्यों छुआछूत हो रही है-
क्या लोकपाल बिल असली मकसद नहीं है। राजनीति और उसके भरोसे अपनी दुकानें चलाने वाले बुद्धिजीवियों की असली दिक्कत इसके क्रेडिट को लेकर है। या बहुत हद तक ज़ोर इस बात पर है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ़ यह बिल कहीं पास ना हो जाए। इसके लिए तमाम वितंडे खड़े किए जाएं।

अहम बात यह है कि रामदेव ने तीन महीने का खर्च उठाया और उनके 'कालेधन आंदोलन' पर जंतरमंतर पर किसी ने कुछ नहीं कहा। धन्यवाद ज्ञापित तक नहीं किया गया। लेकिन आप रिकॉर्ड देखें कि किस संगठन को धन्यवाद ज्ञापित किया गया? इंडिया अंगेस्ट करप्शन तक वंचित रह गया। रामदेव की राजनीतिक महत्वाकांक्षा होंगी किंतु बीजेपी और उसके संघ परिवार का क्या जिसके लोग यहां कल तक इकट्ठा हो गए थे? क्या यहां से माओवादियों-बिनायक सेन वगैरह के समर्थन में कुछ बोल दिया गया? क्या प्रशांत भूषण के शौकतहुसैन केस का समर्थन किया गया या जेठमलानी (अन्ना के साथ आए) के इंदिरा हत्या केस की पैरवी पर शोर मचाए गए? फिर हंगामा क्यों?
रामदेवजी, आपने जो फसल बोई है वही आप काटो। कोई नहीं रोक रहा है। किंतु लोकपाल बिल के समर्थन में हो तो इतना बताओ कि लोकपाल को ऐसिच्च पास करना है? कोई संशोधन करना है? आप सरकार बनाओगे तो पास करोगे? जो ड्राफ्ट कमेटी है क्या वो कांग्रेसी है- पालतू है? कालेधन की वापसी के स्वप्न के तकनीकी बिंदुओं पर चर्चा करूंगा तो पता नहीं UBSके टफ़-टर्म से घबराकर कहां जाएँगे हम लोग?

वैसे अब वक़्त इस बात है कि बीजेपी-संघ परिवार और रामदेव अन्ना और ड्राफ्ट कमेटी के ऊपर लग रहे आरोपों में उनके साथ खड़ें होंगे या अग्निवेश-मेधा सरीखे एजेंट इसे कॉग्रेस के कोर्ट मे ले जाएंगे। आज अग्निवेश ने अन्ना के सामने वॉटरप्रूफ जैकेट फेक तो दिया है और इशारों में कह दिया है कि डूबने से बचना है तो चलो मोदी के खिलाफ़ रैली निकालते हैं। अलबत्ता, मुझे नहीं लगता कि संतोष हेगड़े-भूषण-केजरीवाल डिगने वाले है। अन्ना का कह नहीं सकता क्योंकि वे वाकयी भोले हैं। ईमानदारी के साथ मुश्किल यही है कि वह आपका हर परिस्थिति में साथ नहीं देती। वह 'अपेक्षित कमीनेपन' के भी साथ नहीं होती जिसका आह्वान अक्सर आप किया करते हैं।

[नाम नहीं देना चाहता..बस बात रखनी थी. सो कह गया ]

GHANSHYAM said...

Anonymous जी !
आपकी सारी टिप्पणियां पढ़ीं, वाकई आप शब्दों के बाज़ीगर हैं, अगर किसी के पक्ष में बड़े बड़े निबंध लिख देने मात्र से कोई राजा हरिश्चंद या देशभक्त सिद्ध हो जाता तो इस दुनिया में कांग्रेस से बड़ा शायद ही कोई देशभक्त होता ? कांग्रेस में ऐसे ऐसे धूर्त बाज़ीगर मिल जायेंगे कि बस पूंछो मत, कांग्रेसियों के अनुसार भारत में कांग्रेस के आलावा बाकी सारे लोग भ्रष्ट और देशद्रोही हैं ये बात खानग्रेसी अपने अकाट्य तर्कों द्वारा सिद्ध भी कर देंगे ? तो क्या मैं या आप (अगर आप कांग्रेसी नहीं हैं तो ) कांग्रेसियों की इस बात पर यकीं कर लें ?......भाग दो में जारी

GHANSHYAM said...

भाग एक का शेष......
Anonymous जी आपने लम्बे चौड़े तथ्य रखे लेकिन 2 बातों का जवाब आप गोल कर गए ?
1 ) लोकपाल बिल में भ्रष्ट जज और मंत्रियों का बर्खास्तगी का पॉइंट हटाकर क्यूँ इस बिल को अपाहिज बना दिया गया ?
2 ) लोकपाल बिल को अगर संसद पास नहीं करती तो अन्ना जी आगे से कुछ नहीं कहेंगे उनके अनुसार संसद ही सर्वोच्च है ? अब अगर यही था तो ये आमरण अनशन क्यूँ ?

क्या ये कांग्रेस की चाल नहीं थी कि एक अच्छी छवि वाले अन्ना जी की आड़ में बाबा रामदेव जी और उनके भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन को हासिये पर धकेल दिया जाय क्यूंकि अन्ना जी को तो फिर से बहला फुसला लिया जाएगा, लेकिन अगर बाबा रामदेव भ्रष्टाचार के दानव को अपनी कांख में दबा लिया तो छुटकारा पाना असंभव हो जाएगा और आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी कांग्रेस यही नहीं चाहती |

क्या उपरोक्त दोनों बिन्दुओं और तर्कों का कोई जवाब आपके पास है ?

anusoni said...

कदम उठाओ ताकि बदले इंडिया !
कदम उठाओ ताकि खून में हरकत हो ,
हाथ पे हाथ रखना कही हमारी आदत ना बन जाये,
कमजोरी कही हमारी बैसाखी ना बन जाये ,
रुक जाने के गर बहाने बहुत है ,
चलने कि भी वजह कुछ कम नहीं है ,
एक कदम तो बढाओ ,
हमारा विश्वास है हज़ार उठेंगे ,
शुरुआत तो करो बदलेगा इंडिया !!

Anonymous said...

GHANSHYAM जी,
कृपया तथ्य पता कीजिए। न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लिया गया है। जनलोकपाल का वर्ज़न 2.2 पढ़िए।
बर्खास्तगी और निलंबन का फर्क है। पहली बैठक में कोई सहमति नहीं हुई है। ना कोई झुका है। वैसे आप मुझे यह बताएं कि केवल आरोपों से मंत्री अफ़सरो को हटा दिया जाना ठीक होगा या आरोपपत्र दायर होने के बाद?

आपने जन लोकपाल बिल पढ़ा ही नहीं है। मैं किसी भी संस्करण का समर्थक या विरोधी नहीं हूं। खुशी इस बात की है कि अब आप लोकपाल के तकनीकी बिंदुओं पर बहस चाह रहे हैं। जो दोनों सवाल आपने उठाए हैं. उनके जवाब ऊपर टीप में शामिल हैं। शब्दों की बाज़ीगरी नही है बंधु। कॉग्रेसी कहो या संघी या कुछ और। मैं पहले भारतीय हूं। थोड़ी-सी बहस की गुंजाइश सुरेश चिपलूनकर जी ने छोड़ी है। इसी का लाभ उठाएँ। केवल पक्ष पक्ष पढ़ने-लिखने से कूपमंडूप हो जाएंगे ना?

Ashok said...

प्रिय सुरेश जी,
जनजागृति के आपके इस अभियान को हमारा पूर्ण समर्थन है | उच्च शिक्षा या आंग्ल विद्या का क्या उपयोग यदि वह आपको सूर, रैदास, मीरा, तुलसी, कबीर, रहीम, गुरुनानक, नरसी मेह्ता, तुकाराम, रामदास, जैसे हजारो संतो के उपदेश के प्रति अश्रद्धा पैदा करे | संघ के सर्व समावेशक हिंदुत्व से अन्ना को बिदकने की जरूरत नहीं है | हिंदुत्व से जिन्हें परहेज है उनकी सारासार विवेकशक्ति कुंठित हो गई है | ऐसे लोग अपने आपको राष्ट्रविरोधी लोगो के खेमे में पाएंगे | अन्ना को कालनेमियों से बचने की आवश्यकता है |
-अशोक कुलकर्णी

GHANSHYAM said...

anonymous जी !

कष्ट के लिए क्षमा प्रार्थी |

असल में मैं शब्दों का चयन करने में पारंगत नहीं हूँ और इसीलिये हो सकता है मैं आपको अपनी बात न समझा पाया हूँ ? इसलिए मैं आपको दूसरे तरीके से बताता हूँ और वो ये है कि

"कौरव और कांग्रेस" दोनों के सफाए से ही समाज और धर्म का उत्थान हुआ है और होगा | भले ही इसके लिए "जरासंध" को उसी के तरीके (धोखे से ) से ही क्यूँ न मारा जाए ?

इसलिए साथ आयें
मिलकर कांग्रेस को लतियाएं
देश को बचाएं ||

न्याय और धर्म की जय
भारत माता की जय
भ्रष्टाचारियों की पराजय
भ्रष्टाचारियों के साथियों की पराजय ||

Sanjay Shyamji said...

आदरणीय सुरेश जी ,
उपरोक्त लेख के लिए हार्दिक साधुवाद . मेने इस पृष्ठ को Facebook पर शेयर करने की बहुत कोशिश की पर लगता है कुछ गड़बड़ है , कृपया चेक कराये .

संजय
अजमेर

ajeet said...

अशोक भाई आपकी समस्या दूर हो गयी बहुत खुशी हुई. पर कैसे हुई मुझे भी बताएं.

Anonymous said...

हे राम! अब दूसरा बापू और दूसरा नेहरू खानदान यह देश नहीं झेल पायेगा। प्राण लेंने के लिए एक ही बहुत है।

Rajesh said...

Bahut hi badhiya likha hai Sureshji. Dhanyawad

उम्दा सोच said...

सुरेश भाऊ अन्ना को भाव मिलने के बाद से जिस तरह वो स्वामी रामदेव से छिटक कर मनमानी कर रहे है और कांग्रेस की हां से हां मिला रहे है और हौले से ( युवा ४२ साल के *???) राहुल गाँधी को भी परिधि में ले रहे है ... गुरु किसी लालच में तो पक्का है वो !!! देश के राजनैतिक क्षितिज में सदा से एडा बन कर पेडा खाने वालो की जमात रही है मनमोहन के बाद अन्ना भी सोनिया के साथ शामिल हो चले है ! घबराइये नहीं देश का और बेडा गर्क करने के बाद ये हज़रात भी मजबूरी की दुहाई देते फिरते नज़र आयेंगे !

आशीष श्रीवास्तव सरीख बुद्धिजीवियों(???) के लिए
जो सोया हो उसे जगाया जा सकता है पर जो सोने का नाटक करते है उनको उस तरह से जगाया नहीं जा सकता ! पिछवाडा जोर से गरम कीजिये फिर देखिये कैसे खटिया से कूद कर उठते है !
तुम्हे हिन्दुस्तान लीवर और पेप्सी कोला से, न क्वात्रोची और पवार से कोई गुरेज़ नहीं पर बाबा से ... जैसे तुम्हारे पिछवाड़े पर मिर्ची घिस दिया हो ! तुम्हारी परेशानी क्या है भाई ?? दिन rअकल ढेचू ढेचू क्यों करती है तुम्हारी ???

हल्ला बोल said...

क्या आप सच्चे हिन्दू हैं .... ? क्या आपके अन्दर प्रभु श्री राम का चरित्र और भगवान श्री कृष्ण जैसा प्रेम है .... ? हिन्दू धर्म पर न्योछावर होने को दिल करता है..? सच लिखने की ताकत है...? महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवा जी, स्वामी विवेकानंद, शहीद भगत सिंह, मंगल पांडे, चंद्रशेखर आजाद जैसे भारत पुत्रों को हिन्दू धर्म की शान समझते हैं, भगवान शिव के तांडव को धारण करते हैं, जरूरत पड़ने पर कृष्ण का सुदर्शन चक्र उठा सकते हैं, भगवान राम की तरह धर्म की रक्षा करने के लिए दुष्टों का नरसंहार कर सकते हैं, भारतीय संस्कृति का सम्मान करने वाले हिन्दू हैं. तो फिर यह साझा ब्लॉग आपका ही है. एक बार इस ब्लॉग पर अवश्य आयें. जय श्री राम

नम्र निवेदन --- यदि आप सेकुलर और धर्मनिरपेक्ष हिन्दू बनते है तो आप जैसे लोग यहाँ पर आकर अपना समय बर्बाद न करें. पर चन्द शब्दों में हमें यह जरूर बताएं की सेकुलर और धर्मनिरपेक्षता का मतलब आपको पता है. यदि पता न हो तो हमसे पूछ सकते हैं. हम आपकी सभी शंकाओ का समाधान करेंगे.
हल्ला बोल-

tarun_kt said...

To be Hindu is now a challenge and thus its prescribed that only lion hearted ppl should dare themselves to be declared as Hindu.

"Mera desh ab gantantr ho gayaa hai jisame Hindu bali pavitr maani jaati hai "

Anonymous said...

suresh ji ye janta ki hi majburi he kyo ki janta ab congresh se trahimam ho gai he ,bat kare ghandi ki to aaj our ghandhi ka waqt barabar hi chal rha he ,jis taraha se janta ne angrejo se pareshan hokar ghandhi par bharosa kiya tha aaj Anna par kar rhi he ,janta congresh our uske tanashah raweyye se chhutkara pana chahti he to kisi par to bharosa karna padega !Bat Ramdev ji ki kare to ye sahi he ki janta our midiya ne unka sath nhi diya kyo ki janta janti thi ki bhasno se our badi sabhaye karne se unhe aajadi nhi milegi unhe chahiye tha 1 fast formula jo jaldi se unki taqlifo ko dur kar sake ,our janta ko aana se behatar our koi nhi laga kyo ki waha natija jaldi hone wala tha

Anonymous said...

YAH KISI KO NAHI BHULNA CHAHIYE KI JANTA NE SAMARTHAN ANNA YA KISI AUR KO NAHI BALKI BHRASTACHAR KI MUHIM KO DIYA HAI,JO ISASE SAMJHAUTA KAREGA VAH MIT JAYEGA, AB HM ITNE MURAKH NAHI HAI KI HMARE KOYI DURUPYOG KAR LE AUR HME PTA NA CHALE, AP JAISE JAGRUK LEKHAK JAGANE KA KAM KARTEW HI RAHENGE PAR KABHI KABHI JYADA SANKAWADI HONA BHI KHATARNAK HOTA HAI,LOG PEEDIT THE USKE LIYE MEETINGS KI GAYIN ANSHAN KA PRACHAR PRASAR KIYA GYA, DESH KE BAHUT SE LOGON NE APNI APNI JAGAH ASHAN BHI KIYA, MAINE TO KIYA HI MERE DONO CHHOTE BETON NE BHI APNI JINDAGI KA PAHLA VRIT RAKHA PAR YAH ANNA KE LIYE NAHI DESH KO BHRASTACHAR SE MUKTI KI KAMNA SE KIYA THA, KRIPYA BHAUK NA HON, NIYATI APNA KAM KAREGI,JO SAHI KARM KARE HM USKA UTNA SAMARTHAN KAREN,BABA KI MEHNAT BHI RANG LAYEGI PAR MERE VICHAR SE ABHI ANNA KE PRATI SASANKIT HONA JALDBAJI HOGI, DUSPRACHAR SE BACHA JAY.

Niraj Vidyarthi said...

Aap SAb Logon se anurodh hai Ki Yog karen Saare confusion apane aap dur ho jayenge.... Dost aur Dushman, Desh Bhakt aur Desh Drohi, sab apane aap najar aane lagenge.
Yogi banane ke baad hi pata chal payega ki Swami Ram Dev kitane bade durdarshi hain.

Anonymous said...

Suresh ji aap sirf blog likh sakte hain..Aapne kya kiya desh k liye..2-4 blog likhkar desh ko gumrah karna bahut asan hai.sur desh k liye kuch karna bahut mushkil.App log ki to aadat hai koi agar kuch kar raha hai to uspe bas comment karo...Arey gandhiji ko desh ki janta ne hero banaya tha aur annaji ko bhi desh ki janta n hi hero banaya hai..Rahi bat kuch karne ki to is andolan se ye to pata chala ki desh ke janta me ekta hai aur sabke sabra ka bandh tut chuka hai...Aaj nahi to kal Congree k rone k din aa rahe hain....

रूपेश मिश्र said...

बहुत ही बेहत‍रीन लेख है

ankit said...

Pathetic... thats the only word I can use for you...

अरुण कुमार said...

क्या संविधान से अपने लिए जीने का हक मांगने के लिए चुन कर आना अनिवार्य होगा?

जो लोग सिर्फ सरकारी तंत्र (नेता और अफसर) के भ्रष्टाचार की बात करते हैं वे चाहते हैं सिर्फ प्राइवेट लोग(कार्पोरेट) मस्त होकर खाते रहें. भ्रष्ट सरकारी लोग उनसे हिस्सा न मांगें. भकोसने का हक सिर्फ उन्ही को है.यह तो उनका जन्म सिद्ध अधिकार है-बोले तो जीने का हक! अभी क़ानून बना कर सरकारी की ऐसी तैसी कर देते हैं.

क्या सभी संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रियाएं चुने हुए लोगों के बीच ही पूरी होती हैं?

सिविल सोसायटी प्रक्रिया में शामिल तो है - कहाँ रूकावट है भाई?

क्या चुनाव के बाद मतदाता-जनता का वजूद खत्म हो जाता है?

नहीं.. तभी तो सिविल सोसायटी को जनता ने चुना है.

तब क्या चुनाव जीतने के बाद कोई राजनीतिक दल सिर्फ मेनिफेस्टो में दर्ज वादों पर ही काम करता है?

सिविल सोसायटी भी अपने मेनिफेस्टो से डगमगा जाय तो कोई क्या उखाड़ लेगा?

क्या अब किसी लड़ाई में होने के लिए मध्यमवर्ग से नहीं होना पहली शर्त होगी?

लड़ाई तो जनता भी लडती है-शोषण,दमन,उत्पीडन के खिलाफ,लेकिन जब मध्यम वर्ग(उपभोक्ता) दिखाई देता है - तभी मीडिया के क्रांतिकारी कैमरे चमकते हैं.

क्या धरना-प्रदर्शन करना अब से ब्लैक मेलिंग हो जाएगा?

इरोम शर्मीला इतने दिन से ब्लैकमेल कर रही है.किस पर असर हुआ?



क्या अब लोगों को अपनी मांगों की अर्जी राजनीतिक दलों के दफ्तर में देनी होगी?

वैसे सिविल सोसायटी के एनजीओ भी कौन बुरे हैं.उनको भी मौका मिल रहा है.

क्या लाखों लोगों का अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करना हिस्टीरिया है?

अन्ना समर्थक ही ईमानदार बाकी सब भ्रष्टाचारी की रट लगाए उन्मादी लोगों के लिए कृपया सही शब्द सुझाएँ.

क्या अब हर आंदोलन अराजक और दक्षिणपंथी ही कहा जाएगा?

ऐसा कौन कहता है? आन्दोलन काफी सुनियोजित था 'यूथ फ़ार् इक्वेलिटी' के जाबान्ज प्रोफ़ेश्नल्स का क्या कहना. भारत पाकिस्तान के मैच जैसा रोमांच लग रहा था.

Anonymous said...

सुरेश भाई आपका यह लेख इस साल का सर्वश्रेष्ठ लेख है, इस लेख पर की गयी टिप्पणीयों में राज सिंह जी टिप्पणी बहुत संशिप्त एवं धारदार है और आशीष श्रीवास्तव की टिप्पणी नकारात्मक है,और इस लेख पर शंकर फुलारा की अब तक की गयी टिप्पणीयों में सर्वश्रेष्ठ है बल्कि इस टिप्पणी को हमें अंतर्मन में बिठाल लेना चाहिए, और लोगों को भी इस बारें में बताना चाहिए, बाबा रामदेव या रामकिशन यादव के बारें मैं नकारात्मक टिप्पणियाँ वे ही करते हैं जो बाबा रामदेव को केवल मीडिया के माध्यम से जानते हैं जो उनसे कुछ दिनों तक संपर्क में रहा हो वह अच्छी तरह बता सकता है

Anonymous said...

Lekh to badhiya hai. Ek bat kahana chahunga Gandhi topi ke bare men; ki yah topi Gandhi ke nam par mashhur hui hai magar asal men muslim skull cap hai bas use thoda niche ki taraf lamba karke fir upar mod[fold] kar diya hai; aur sare hindustan ki janata ko bevkoof bana diya hai. kangresi ise bade shan se pahnate hain sir par aur muslimprem ka bhut sawar ho jata hai.

K.R.Baraskar said...

baap re baap ye to kisine socha hi nahi yaar.. BJP agar yah soch rahi hai ki is aandolan ke baad BJP ka janadhar badhega to murkhta hai kyunki anna pure desh ko ek karke sonia ki tareef kar denge lokpal bill parit karwane ke liye.. bas ho gaya kabada..

Mirchi said...

मुझे अन्ना और उनकी टीम कि सबसे बुरी बात यह लगी कि अना के अनशन कि समाप्ति पर केजरीवाल और अन्ना ने सभी लोगों का आभार व्यक्त किया , लेकिन उन्होंने गलती से भी बाबा रामदेव के प्रति आभार का एक भी शब्द नहीं कहा आभार व्यक्त करना तो दूर की बात है उन्होंने बाबा का नाम तक लेना उचित नहीं समझा . जबकि सारा जगत जानता है की देश में कालाधन वापस लाने और भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए बाबा ने अथक परिश्रम किया है . ऐसे में अन्ना और उनकी टीम द्वारा बाबा के सम्मान में एक भी शब्द न कहना कृतघ्नता है . अनशन की समाप्ति के बाद ही अन्ना मेरी दृष्टि से गिर गए . मैं श्री सुरेश जी के विचारों से सहमत हूँ .

Mohan said...

अन्ना V/s बाबा रामदेव
कुछ मेरे निष्कर्ष .........

१- बाबा राम देव का उभार, जगह जगह सभाएं, कांग्रेस और काले धन के विरुद्ध जन सभाएं.
२- कांग्रेस चिंतित और लगातार स्थिति पर नजर.
३- बाबा का दिल्ली में धरना और कांग्रेस पर दबाव. (बाबा की मंशा साफ़ थी काले धन की वापसी)
४- बाबा और सत्याग्रहियों की पिटाई और सत्याग्रह स्थल तबाह.
५- लम्बे कशमकश के बाद अन्ना का उदय.
६- अन्ना को मिडिया के सामने भ्रस्टाचार के विरुद्ध एक नए हीरो की तरह पेश किया गया.
७- जबरदस्त मिडिया हाई लाइट.
८- अन्ना अचानक रातोंरात सुपर स्टार.
९- बिना किसी ठोस कारण सिर्फ आश्वासनों पर आन्दोलन वापस.
१०- आरोप प्रत्यारोप की राज नीति.
११- टीम अन्ना के सदस्यों का कच्चा चिटठा जनता के सामने.
१२. लेकिन फिर भी जनता की आँखों पर अन्ना के नाम की पट्टी.
१३. टीम अन्ना के सदस्यों का मुस्लिम प्रेम व हिन्दू संस्थाओ से दूरी.
१४. अन्ना का चार राज्यों के चुनाव में कांग्रेस के विरुद्ध प्रचार का ऐलान.
१४. दिसम्बर में संसद अधिवेशन के समय दिल्ली से दूर मुंबई में बिना किसी "खास" तैयारी के (जान बूझ के )आन्दोलन की शुरुआत. (याद कीजिये अगस्त में टीम अन्ना की दिल्ली में तैयारी)
१५. एक कमजोर बिल की प्रस्तुति और बिल का राज्यसभा में गिरना.
१६- अन्ना का धरना समाप्त.
१७- अन्ना का चुनावों में कांग्रेस के विरुद्ध प्रचार से मनाही.

निष्कर्ष आप निकालें, ये सारी घटनाएँ क्या कहती हैं, बाबा रामदेव के आन्दोलन को नेपत्थ्य में करने की सम्पूर्ण साजिश. घटनाएँ दोनों आपके सामने हैं विश्लेषण आपको करना है. आम जनता को किस आन्दोलन से क्या मिलना था? आम जनता को दोनों आंदोलनों से बहुत कुछ मिलना था. लेकिन एक गलत व्यक्ति (अन्ना) के चुनाव से दोनों हाथ फिर भी खाली. एक व्यक्ति सरकारी (बाबा रामदेव) दफ्तरों के चक्कर लगा रहा है, दूसरे का अतापता नही हैं. टीम अन्ना मलाई खा के गायब है....... १२०० सालों की गुलामी का असर जाने में अभी बहुत समय लगेगा, ये देश भगवान भरोसे ही चलेगा. भारत की जनता की मानसिक रूप से गुलाम है और गुलाम ही रहेगी ये उसे अपने जेहन में अच्छी तरह से बिठा लेना चाहिए. क्योंकि इतने बड़े राष्ट्रीय आंदोलनों और उसकी परिणति देखते हुए भी मौन. क्योंकि उसकी मानसिकता गुलामी की है.............. अगर किसी को बुरा लगता है तो लगता रहे..... गुलाम कसमसाने और गुर्राने के अलावा कर भी क्या सकता है.

RohitRajpurohit said...

सुरेशजी आपकी लेखनकला की तारीफ करनी पड़ेगी. वैसे ये लड़ाई नपुंसक हिन्दू और पुन्सक हिन्दू के बीच की हैं.

diya shah said...

aaj 20 march 2012 hai ab aap aapka khud ka ye lekh padhke coment kare ki kya aapka view sahi tha