Thursday, March 3, 2011

“असली दलितों-पिछड़ों” के लिये खतरनाक संकेत मिलने शुरु हो गये हैं… SC-ST Reservation and Minorities Education in India

कुछ ही दिन पूर्व अल्पसंख्यक शिक्षण संस्था आयोग (NCMEI) के अध्यक्ष एमएसए सिद्दिकी ने एक विवादास्पद निर्णय के तहत दिल्ली के जामिया मिलिया विवि को “अल्पसंख्यक संस्थान” का दर्जा दे डाला। श्री सिद्दीकी साहब ने अपने इस निर्णय के पीछे जो तर्क दिया है वह भी अपनेआप में आपत्तिजनक है, कहते हैं “इस बात में कोई शंका नहीं है कि जामिया विवि (Jamia Milia) की स्थापना मुसलमानों द्वारा, मुसलमानों के फ़ायदे के लिये की गई थी और इस विवि ने कभी भी अपनी “अल्पसंख्यक पहचान” को खोने नहीं दिया है…” इसलिये इसे “अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान का दर्जा” दिया जाना उचित है। किसी भी केन्द्रीय विवि को इस प्रकार का “धार्मिक” आधार दिये जाने का यह सम्भवतः पहला मामला है। इस निर्णय से इस विवि में 50 प्रतिशत सीटें “सिर्फ़ मुसलमानों” के लिये आरक्षित हो जाएंगी। (Jamia Milia University Become Minority Institute) 



जामिया मिलिया विवि को सन 1988 में केन्द्रीय विवि का दर्जा दिया गया था, लेकिन अब इस निर्णय के बाद इसका केंद्रीय दर्जा (Central Universities of India) तो बरकरार रहेगा ही, साथ ही “विशेष अल्पसंख्यक दर्जा” भी रहेगा, बड़ी अजीब सी बात है, लेकिन ऐसा हो रहा है। अपने निर्णय में अल्पसंख्यक आयोग एक और खतरनाक बात फ़रमाता है, “चूंकि इस विश्वविद्यालय की स्थापना “भारत के संविधान” से पहले ही हो गई थी इसलिये इसे अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दिये जाने में कोई हर्ज नहीं है…” (यानी 1947 या 1950 से पहले वाली स्थिति मानी जायेगी, क्या इसके पीछे की “मानसिकता” अलग से समझाने की जरुरत है? या इसे यूं कहें कि, चूंकि यह सड़क आज़ादी और संविधान लागू होने के पहले मेरे दादाजी ने बनवाई थी, इसलिये इस सड़क पर अब सिर्फ़ हमारे परिवार के लोग ही चलेंगे…)।

असली मुश्किल SC/ST छात्रों के लिये है, क्योंकि आयोग के इस निर्णय के चलते अब यह विश्वविद्यालय केन्द्र सरकार के आरक्षण नियमों (Reservation Rules in India) को मानने के लिये बाध्य नहीं है। संक्षेप में कहा जाये तो पहले 50% सीटें सिर्फ़ मुसलमानों के लिये होंगी, बची हुई 50% सीटों में से “यदि विवि प्रशासन देना चाहे तो…” SC/ST छात्रों को आरक्षण देगा। तात्पर्य यह कि केन्द्र सरकार से मदद लेंगे, पैसा लेंगे, ज़मीन लेंगे… लेकिन आरक्षण नहीं देंगे। सिद्दिकी साहब आगे फ़रमाते हैं कि जामिया विवि की स्थापना मुस्लिमों में शिक्षा का प्रसार करने के लिए मुसलमानों द्वारा ही की गई है इसलिये इस पर किसी “बाहरी नियंत्रण”(?) को स्वीकार नहीं किया जा सकता…।

अब तमाम दलित संगठन चाहे लाख चिल्लाचोट कर लें, लेकिन केन्द्र सरकार ही हिम्मत नहीं है कि वह अपने “वोट बैंक” पर कोई “बाहरी नियंत्रण” (यानी भारत सरकार) स्थापित करे। जबकि कानूनी हकीकत यह है कि चूंकि केन्द्र सरकार संविधान के तहत काम करती है और संविधान “धर्मनिरपेक्ष” है इसलिये कोई केन्द्रीय विवि “धार्मिक आधार” पर अपने छात्रों के साथ भेदभाव नहीं कर सकता। अल्पसंख्यक शिक्षा आयोग के इस निर्णय के बाद विवि में प्रवेश हेतु “प्राथमिकता” मुसलमानों को मिलेगी, उसके बाद “यदि मर्जी हुई तो” बाकी सीटों पर SC/ST छात्रों को प्रवेश मिलेगा (शर्मनिरपेक्षता की जय हो… एवं “सभी छात्रों को बराबरी के आधार पर, जाति-धर्म के भेदभाव रहित” शिक्षा का अधिकार गया तेल लेने…। (Constitution of India) 

अल्पसंख्यक शिक्षा आयोग के इस निर्णय से कई मुश्किलें खड़ी होने का अनुमान है, पहला… संसद द्वारा कानून पारित करके बनाया गया केन्द्रीय विवि धर्मनिरपेक्ष संविधान में “अल्पसंख्यक” कैसे बनाया जा सकता है? दूसरा… इनकी देखादेखी अन्य “अल्पसंख्यक संस्थान”(?) भी इस “विशेष दर्जे” की माँग करेंगे, तब तो SC/ST छात्रों की सीटें और भी कम हो जाएंगी?


“असली दलितों-पिछड़ों” के लिये जिस संकेत की तरफ़ ऊपर के घटनाक्रम में इशारा किया गया है उसी की एक और झलक तमिलनाडु में भी देखने को मिली है। स्वयं को “दलितों का मसीहा और ब्राह्मणवाद के विरोधी कहे जाने” की हसरत पाले (तथा इस फ़ानी दुनिया को किसी भी समय अलविदा कहने की स्थिति में व्हील चेयर पर स्थापित) हुए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर माँग की है कि “राज्य में धर्मान्तरित ईसाईयों को भी दलितों के समान आरक्षण दिया जाये, धर्म परिवर्तन कर चुके ईसाईयों को संविधान की दलित सूची में रखा जाये… एवं प्रधानमंत्री इस मामले को स्वयं की देखरेख में निपटाएं…” (SC Status to Converted Christians)। करुणानिधि ने आगे कहा है कि जिस प्रकार संविधान में बदलाव करके सिखों एवं बौद्ध धर्म के दलितों को SC का दर्जा दिया गया, उसी प्रकार संविधान में बदलाव करके “दलित ईसाईयों”(?) (Converted Christians in India) को भी SC की सीटों पर आरक्षण दिया जाये”। करुणानिधि चाहते हैं कि संसद में कानून पास करके दलितों-पिछड़ों को मिलने वाली सारी सुविधाएं “दलित ईसाईयों” को भी दिलवाई जाएं… (कम से कम अब तो दलित-पिछड़े संगठन इन “तथाकथित धर्मनिरपेक्ष” नेताओं के मंसूबे समझ जाएं…)। (आंध्रप्रदेश में भी मुसलमानों को मिलने वाला 5% आरक्षण OBC के हिस्से में से ही दिया गया है)

पहले आप यह वीडियो देखिये, जिसे किसी ब्राह्मण ने नहीं बनाया है, बल्कि प्रसिद्ध फ़्रेंच लेखक फ़्रेंकोइस गोतिए ने बनाया है… और सारे पात्र “असली” हैं…

Direct Link :- http://www.youtube.com/watch?v=P7Xgc4ljHKM&feature=player_embedded



चालबाजी और षडयन्त्र स्पष्ट दिखाई दे रहा है, ऐन पश्चिम बंगाल, असम, केरल और तमिलनाडु चुनाव के पहले प्रणब मुखर्जी ने बजट में अलीगढ़ मुस्लिम विवि (Aligarh Muslim University) की दो नई शाखाओं के लिये 100 करोड़ रुपये आबंटित किये हैं (हालांकि “परम्परागत कांग्रेसी चालबाजी” इसमें भी खेल ली गई है कि मलप्पुरम-केरल और मुर्शिदाबाद-बंगाल के AMU को 50-50 करोड़ दिये हैं, क्योंकि वहाँ चुनाव हैं और “सजा के तौर पर” किशनगंज-बिहार को धेला भी नहीं दिया क्योंकि वहाँ के मुसलमानों ने नीतीश कुमार को वोट दिया था)। आगे चलकर अलीगढ़ मुस्लिम विवि सहित तमाम अल्पसंख्यक संस्थान अपने यहाँ “कानून के अनुसार आरक्षण नहीं देने” की माँग करेंगे। चेन्नई से कोयम्बटूर और वेल्लूर जाने वाली सड़कों के किनारे क्राइस्ट की बड़ी-बड़ी मूर्तियों और भव्य चर्चों की संख्या को देखते हुए तमिलनाडु में “धर्मान्तरण” किस पैमाने पर चल रहा है कोई मूर्ख भी समझ सकता है…। एक पक्का वोट बैंक बनने के बाद अब वहीं के एक “फ़र्जी हिन्दू” मुख्यमंत्री करुणानिधि, “दलित ईसाईयों” के लिये SC कोटे में से आरक्षण माँग रहे हैं… यानी “असली दलितों” पर खतरा दो-तरफ़ा मंडरा रहा है।

ब्राह्मणों को तो पहले ही “बदनाम” करके समाज में हाशिये पर डाला जा चुका है, “जेहादियों और एवेंजेलिस्टों” का पहला लक्ष्य था ब्राह्मणों को सबसे पहले नेस्तनाबूद करना, क्योंकि उनके अनुसार ब्राह्मण ही सबसे ज्यादा “राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व” के बारे में गुर्राते रहते हैं…। पहला चरण काफ़ी कुछ पूरा होने के बाद अब तेजी से धर्मान्तरण करना और ईसाई बन जाने के बावजूद “असली दलित हिन्दुओं के हक” के आरक्षण को हथियाना अगला चरण है…। सवाल यही है कि क्या दलित अब भी जागेंगे, या अभी भी ब्राह्मणों के अंध-विरोध की आग में ही जलते रहेंगे? ब्राह्मणों का तो जो नुकसान होना था, वह आरक्षण से हो चुका है… लेकिन अब “आरक्षण” को ही हथियार बनाकर “असली दलितों” का नुकसान “अ-हिन्दू धार्मिक नेता” न करने पाएं, यह देखना SC/ST संगठनों का काम है…
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नोट :- उम्मीद है कि टिप्पणियों में “जातिवाद-ब्राह्मण-दलित” इत्यादि पर अन्तहीन और बेमतलब की बहस न हो, “मुख्य मुद्दे” पर ध्यान केन्द्रित रहे…

32 comments:

Ashwani said...

where are all "Social justice" screamers? dates for state election declared...any correlation?

vivek said...

kya hoga is desh ka soch soch kar dimaag jhanna uthata hai

Suresh ji is desh ko patan se yadi bachana hai to chahe BJP kitni bhi buri ho use hi satta me lana padega aur ye kaam "HINDU VOTE BANK" banaye bina nahi ho sakta hai

दिवाकर मणि said...

शर्मनिरपेक्षता के नाम पर संविधान का बलात्कार करते हुए केंद्र की कांग्रेसी सरकार एक खास कौम का वोट पाने के लिए कुछ भी कर सकती है और किसी हद तक गिर सकती है। इसी का नमूना है- केंद्र के पैसे पर चलने वाले केंद्रीय विश्वविद्यालय के रूप में मान्य जामिया मिलिया को अभी हाल ही में "अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान" का दर्जा दिया जाना, और उसमें अनुसूचित जाति और जनजातियों को आरक्षण से महरुम करना। ये घटना भारत को पाकिस्तान बनाने की और एक कदम है। भारत को सऊदी अरब, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि बर्बर देश बनाने से रोकने के लिए युवाओं को आगे आना ही होगा...

संजय बेंगाणी said...

दलित अत्याचार से मुक्त होने के लिए ईसाई बने अब दलितों के उत्थान वाला आरक्षण भी चाहिए. क्यों? क्योंकि आरक्षण के लालच में कोई ईसाई न बने तो? अब यह बाधा दूर हो... फिर... जय मदर टेरेसा की...

rohit said...

यह सब फालतू का प्रचार है सुरेश भाऊ का क्या गलत हुआ जो जामिया को अल्पसंख्यक दर्जा मिल गया कोन सा पहाड़ टूट पड़ा ? कोन सी आफत आ गयी? भाऊ ने शायद पढाई छोड़ दी या इनकी यद् दश्त कमजोर हो गयी गई है जब सरदार जी ने पहले ही कह दिया था की देश के संसाधनों पर मुस्लिमो का पहला हक है तो फिर यह कोन होते है फाएं पीटने बाले? उनका हक उनको दिया ज रहा है आपको क्यों बुरा लग रहा है ?

P K Surya said...

sab pagal ho chuke hain saale,jis desh mai 75 % hindu hain or P M, se lekar sabhi pramukh isai, muslim bhare pade hen to or kya ummid kee ja sakti hai....

Man said...

vandematrm sir,
bahut hi visheshnatmk r tathyatmk ekh ...................................परम्परागत कांग्रेसी चालबाजी” इसमें भी खेल ली गई है कि मलप्पुरम-केरल और मुर्शिदाबाद-बंगाल के AMU को 50-50 करोड़ दिये हैं, क्योंकि वहाँ चुनाव हैं और “सजा के तौर पर” किशनगंज-बिहार को धेला भी नहीं दिया क्योंकि वहाँ के मुसलमानों ने नीतीश कुमार को वोट दिया था)। .................bilkul sahee baat he |ye he secularo asli chehra

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

कुछ भी तो ठीक नहीं चल रहा इस देश में ! किसी को शर्म ही नहीं आती , या यूँ कहूँ कि शर्म बेच खाई है , अब आज का सीवीसी का केस ही देख लीजिये, एक को भी ज़रा सी भी शर्म नहीं आई !

JANARDAN MISHRA said...

सुरेश जी आप लिखते रहें, हम पढ़ कर अपनी राय देतें रहें, ये सिलसिला कबतक चलाना है, अबतो इन कमीनों, नकली हिन्दुओं को ठीक करने के बारेमे कोई कठोर प्रोग्राम बनाइये, मै आप को विश्वाश दिलाता हूँ के सबसे पहला वार मेरा होगा...

अयोध्या प्रसाद वासिष्ठ said...

सुरेश जी, सच्चे मायनों में पत्रकारिता आप कर रहे हैं| आपके लेखों का प्रभाव न केवल मेरे बच्चों को आंदोलित किये रहता है बल्कि उसका दूरगामी प्रभाव समाज में देखने को नज़र आने लगा है आज कोई कांग्रेसियों को अच्छी दृष्टि नहीं देख रहा| उसकी गांधीवादी विचारधारा पूरी तरह समाप्तप्राय है| आज यदि कोई कांग्रेसी 'गांधीवाद' से प्रेम कर भी रहा है तो वह केवल भारतीय मुद्रा पर छपे गांधी से प्रेम कर रहा है| और उसे दंद-फंद से जमा करने में लगा हुआ है| ब्राह्मण वर्ण का दर्द आपने वीडिओ से जो दिखाया है - यथार्थ स्थिति यही है|

समय मिलने पर अपने ब्लॉग पर ब्राह्मण वर्ग से जुड़े तमाम तथ्य देने का सोचा है| आपके लेखों को मेरा बेटा पढ़कर सुनाता है और चर्चा करता है| और मुझ जैसे कांग्रेसी को भी बदलने को कहता रहता है|
आपके लेख जन-जागृति की दृष्टि से बेहद उत्तम हैं| मेरी शुभकामनाएँ !

कृष्ण मोहन मिश्र said...

Well said. Daliton ke asli dusmano
ka chehra dikhane ke liye dhanyawad
jai Hind.

Sachi said...

मैं तो हमेशा से यही पढ़ता था, "किसी गाँव में एक गरीब ब्राम्हण था।" मैं खुद एक ब्रांहण परिवार से हूँ, you tube की यह विडियो यथार्थ को हे बयान करती है। दक्षिण भारत के दलितों का तो धर्म परिवर्तन ये करा चुके, अब इनके निशाने पर उत्तर भारत के दलित है। लेकिन यहाँ कार्यक्रम की राह विपरीत अर्थात ऊपर से नीचे है। धर्म परिवर्तित लोग अपने मूल नाम को बनाए रखते हैं, और दीमक की तरह व्यवस्था को चाट रहे हैं।

सुलभ said...

कहाँ है दलित अत्याचार एक्ट?

lokendra singh rajput said...

कांग्रेस खा जाएगी इस देश को... और इस देश के बहुसंख्यक सोते ही रहेंगे... और कहते रहेंगे कौन सा पहाड़ टूट गया जो ऐसा हो गया...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

ये सब दलितों का हिस्सा मार देंगे..

त्यागी said...

जब तक हम लोग मुख्य धारा की पिक्चरो में पंडित चरित्र को हंसोड़ प्रस्तुति पर हंसेगे, ब्रहमन नाम, भगवान् नामो पर खलनायकों की चरित्र को पिक्चरो में देख देख ठट्टे लगाते रहेंगे. बहुत बड़ी बड़ी बांते तो दूर की बात है, हम लोगो ने अपनी शक्ति को तो खुद ही हंसी का मुजरा बनाया है. अब भुगतो ! नाटको, पिक्चरो के जरिये जबरदस्ती ब्रह्मण चरित्र को हंसी का और खल्नायिकता का पात्र बनाया. तब मुस्लिम और इसाइओ ने इस पर कोई प्रतिकिर्या होते न देखा तो अपने मिशन को आगे बढाया. कोई भी पहेले ही सीधा हाथ नहीं डालता पहले टेस्ट करता है, हम हर टेस्ट में पास हो रहे है और देश बेच रहे है, आज टीवी और पिक्चरो में घर के माँ और बेहें नंगी की जा रही है यह तो टेस्ट है अभी तो देखना आगे आगे होता क्या है. घर के भाई को भाई से दलित को लड़ाने के लिए भरमाया जा रहा है और जा चूका है, अब तो प्रशाद उनको भी जल्द मिलने वाला है. जीन लोगो को दो दो देश काटने के, अपनी लाखो माँ बहेनो की इज्जत लुटवाने और, लाखो के क़त्ल होने पर भी अकाल नहीं आई , अभी तो कुछ भी नहीं बिगड़ा, अरे आने वाले १०-१५ सालो में देखना यह अंग्रेज न तुम्हारा बैंकोक बना दिया तो जानना. हर हाथ में क्रेडिट कार्ड के रूप में कटोरा आ चूका है. और यह भी हम हिन्दू पास होगे है इस टेस्ट में. देश का क्या कोई नौकरशाह, बड़ा नेता एसा है जिसके बच्चे हिन्दुस्तान से बहार सेटल नहीं हो चुके है, जहाज के चूहे जहाज छोड़ चुके है, आपका भी पकिस्तान बनना निश्चित है, समय है चेत जाओ दलितों से निवेदन है ब्रह्मण का महत्व समझे एक "दलित" श्री बाला कृष्णन जी ने सुप्रीम कोर्ट के जज बनकर क्या गुल खिलाये है इस को पूरा देश अभी और भी जानेगा. दलित - ब्राहमण खेल खेलने से अच्छा है जागो !!!!!! www.parshuram27.blogspot.com

निशाचर said...

सुरेश जी, सेकुलरिस्टों की कारस्तानी तो जगजाहिर है लेकिन ब्राह्मणों का जो दुखड़ा आपने सुनाया है खेद के साथ कहना पड़ता है कि इस स्थिति के लिए वे स्वयं ही जिम्मेदार हैं. भारत में सनातन धर्म को सबसे ज्यादा चोट इस कुटिल ब्राह्मणवाद ने ही पहुँचाया है. स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और अपने ही अन्य धर्मावलम्बियों के बहुसंख्यक हिस्से के साथ अमानवीय बर्ताव और अमानुषिक शोषण ने भारत में इस्लाम और इसाई धर्म के लिए जगह बनायीं. और अत्यंत दुःख की बात है कि आज भी इस मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. भारतभूमि से यदि हिन्दू धर्म विलुप्त हो जाता है तो इसके लिए ब्राह्मण वर्ग ही दोषी होगा.

मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग मेरी बात का विरोध करेंगे अतः इस विषय पर मैंने सुरेश जी से ही एक आलेख की प्राथना की थी. समय मिला तो मैं उपरोक्त निष्कर्ष को सप्रमाण सम्मुख रखूँगा.हिन्दू धर्म और समाज के हित में अब इस विषय पर विस्तृत चर्चा का समय आ गया है.

Prabhat Kr. Rajan said...

Suresh Sir Taj Mahal Ke Bare Mein Pt. Krishna Kumar Panday Ne Kuchh Likha Tha. Us Bare Mein App Jarur Likhe.

Suresh Chiplunkar said...

@ वासिष्ठ जी - बहुत धन्यवाद आपकी टिप्पणी के लिये…
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@ निशाचर जी - आपकी बात से अंशतः सहमत, ब्राह्मणों ने निश्चित रुप से ज़ुल्म किये हैं, परन्तु अब वे इस स्थिति में नहीं हैं कि वे कोई नीतिगत परिवर्तन कर सकें, इसलिये जेहादियों-एवेंजेलिस्टों की पौ-बारह है…। जल्दी ही दलितों को समझ आ जायेगा कि उनके हिस्से का माल बाहर वाले खा जाएंगे…
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@ बेंगाणी जी - आपने एकदम सही फ़रमाया है, यदि दलित ईसाईयों(?) को भी आरक्षण का लाभ मिलने लगे, तो धर्मान्तरण में जबरदस्त उछाल आयेगा…

निशाचर said...

सुरेश जी, ब्राह्मणों के लिए एक अनाम "निशाचर" कुछ लिखे तो शायद प्रामाणिक न माना जाये परन्तु आपसे आग्रह है कि इस विषय में स्वयं आदरणीय सावरकर जी एवं हुतात्मा गोडसे और उनके बंधुवर श्री गोपाल गोडसे के विचार भी देखें.

"ब्राह्मण कोई नीतिगत परिवर्तन कर सकने की स्थिति में अब नहीं हैं"- ऐसा कहना सही नहीं है. वास्तव में हर नीति तय करने वाली जगह पर ब्राह्मण काबिज हैं परन्तु अब ब्राह्मण का नैतिक तेज समाप्त हो चुका है. वह समाज को राह दिखाने की जगह स्वयं स्वार्थ की अंधी गलियों में भटक गया है वरना मायावती की सरकार में सतीश चन्द्र मिश्र मायावती के बाद दूसरी सबसे ताकतवर हस्ती न होते. अन्य किसी भी पार्टी में देख लीजिये सभी ताकतवर पदों पर ब्राह्मण ही काबिज हैं. यहाँ तक कि हिंदुत्व को गालियाँ देने वाले "कमीनिस्टों" में भी ब्राह्मणों का ही बोलबाला है.

दूसरी बात, वैदिक साहित्य कहीं भी यह नहीं कहता कि "ब्राह्मण का बेटा ब्राह्मण और नाई का बेटा नाई ही होगा". जब धर्मग्रंथों ने इसे जन्मगत नहीं बनाया तो यज्ञोपवीत का अधिकार सिर्फ ब्राह्मण को क्यों ??

ब्राह्मण सफाई कर्मचारी बन सकता है लेकिन एक दलित मंदिर का पुजारी नहीं बन सकता. क्या यह स्वघोषित आरक्षण नहीं ?

वीडियो में एक सज्जन कहते हुए दिखाई दिए _"मुझे सुलभ शौचालय में नौकरी मिली थी लेकिन हमने की नहीं. हम जान दे देंगे लेकिन धर्म नहीं देंगे, ब्राह्मण होकर लैट्रिन थोड़े ही साफ़ करेंगे!"
यह किसी पुरातनपंथी बुजुर्ग के नहीं एक २६-२७ साल के युवा के शब्द थे.
आप बताईये, जिस मल को आप अपने शरीर में लिए फिरते हैं उसे एक दलित साफ़ करेगा लेकिन आप नहीं करेंगे. क्या ब्राह्मण माताएं अपने शिशुओं का मल-मूत्र साफ़ नहीं करतीं या फिर ब्राह्मण अपने कृशकाय, अशक्त, रुग्ण और असमर्थ बुजुर्गों की सेवा-सुश्रूषा नहीं करते ?

यह केवल एक जातिवादी अहंकार है जिसने हिन्दू समाज को आज अवनति के गर्त में धकेल दिया है. अगर ब्राह्मण अपने इस अहंकार को छोड़कर हिन्दू समाज में एकाकार हो जाएँ, अन्य जातियों से रोटी-बेटी के समबन्ध कायम कर एकरस हो जाएँ तो न ही इस्लाम और न ही ईसाइयत में इतना दम है कि हिंदुत्व को चुनौती दे सके.

nitin tyagi said...

IT proves that India is not secular country

it is islamic country

can any hindu open a university only for hindus in india ????

nitin tyagi said...

Congress has made this country islamic

Anonymous said...

suresh ji aap ki kalam se aag nikalti hai aap sachche rasthrvadi hai

abhishek said...

nishachar ji brahaman varg hi doshi hai desh ke patan ke liye sahi hai bilkul to sath me ye bhi maniyega ki vo hi doshi hai desh ke utthan ke liye.pichhale 5 hajar salo se khud bhukhe rah kar bhi vedo ko bachane vale doshi hai desh ke patan ke liye.
kisi bhi parivrtan ko apane me atmsakt karane ko sabse pahale udhayt rahne vale doshi hai desh ke patan ke liye.
chahe vo boudho ko apanana ho ya jaino ko ya nastikata ko bhi,chahe kamyunism ko chahe rashtrvad ko chahe kongres vad ko in sab ko apanaane vale doshi hai desh ke patan ke liye.
desh ko ajad karane vale mangal pande doshi hai,savarkar doshi hai,tilak doshi hai,vo lakho sanyasi doshi hai jo bangal-yupi-bihar me khet rahe,vo nana sahab doshi hai.
our baki sab jatiyo ne to bahut tyaga kiya hai keval brahamn hi apane jatigat ahmkar ko bana kar dusaro ko hin samjha rahe hai.
sahi hai nishachar ji bilkul sahi hai..............jara ye bhi jaan lena ki koyi bhi bada parivrtan is desh me safal ya vifal kinake karan huva hai.desh se gaddari karane valo ki koyi jat nahi hoti,varana shivarashi somanath ka gupt dvar nahi kholata,jaychand nahi bhidata prithviraj se.jo brahm me ramn kare vo brahaman hai our durbhagy se aaj us brahm ke prati jigyasa bhi rakhane vale kitane gair jati ke brahamn hai?????

abhishek said...

histhan ki rajaniti me pichhale 5000 salo se vartaman me shudra kahe jane vale rajao ne hi jyada raj kiya hai.usake bad bhi keval matr brahmano ko hi galiya baki jati hai,jaki kahi bhi kabhi bhi brahamano ke atyachar ke koyi chhoti se kivdanti bhi nahi hai,ha apane jatiy amhkar me chur brahman apane ko dev bhale hi samajh le likin jin dharm granto ko vo sarvopriy manate hai vo dharm hi to "pandita samdarshin..." kahata hai.jise badalane ka jativadi brahamano ne kabhi prayas nahi kiya balki is durlabh granto ko unake gyan ko apane rakt ki kimat par bhi bachaya hai our shayad ye hi karan hai ki aaj bhi janm se braham par samaj ka vishvas hai fir chahe vo khud kitane bhi nitigat rup se brahaman virodhi ho...............samajhana thoda kathin hai lekin asambhav nahi..........ahmkari lekin rashtrvadi,dhrmvadi brahaman nahi balki ahmakari,svarthi v nasik brahamn hi desh ke patan ke liye doshi hai..........chahe shivrashi ho ya neharu............ya koyi nambudaripad

निशाचर said...

अभिषेक जी, जब मैं हिन्दू धर्म की अवनति और पतन के लिए ब्राह्मणों को दोषी ठहराता हूँ तब मेरा तात्पर्य उन्ही ब्राह्मणों से होता है जो सिर्फ जन्म से ब्राह्मण हैं कर्म से नहीं. आपने आदरणीय सावरकर जी का उल्लेख किया - मेरा आपसे अनुरोध है कृपया उन्हें पढ़ें, उनके विचारों को जाने , आपको अपने प्रश्नों का उत्तर स्वयं मिल जायेगा.(स्व० सावरकर कृत - "मेरा आजीवन कारावास" और एक लघु उपन्यास- "मोपला, अर्थात मुझे इससे क्या?" इस विषय में आपकी सहायता कर सकते हैं).

उपरोक्त टिप्पणी में कुछ प्रश्न मैंने वर्तमान परिवेश के सन्दर्भ में किये थे, कृपया उन पर भी विचार करें.
आप और मैं दोनों ही एकजुट, शक्तिशाली हिन्दू समाज और हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना करते हैं परन्तु यह तब तक साकार नहीं हो सकता जब तक जातिगत वर्गभेद का उन्मूलन नहीं हो जाता. सहमति - असहमति आप पर निर्भर करती है.

BraHma SatYaṃ said...

ब्राह्मणों का तो जो नुकसान होना था, वह आरक्षण से हो चुका है… लेकिन अब “आरक्षण” को ही हथियार बनाकर “असली दलितों” का नुकसान “अ-हिन्दू धार्मिक नेता” न करने पाएं, यह देखना SC/ST संगठनों का काम है…

यह कथन ही बताता है कि अभी भी लोगों के मन में मेरा-तेरा की भावना है, ' मेरा जो होना था हो चुका, तू अपना देख', बेहतर रहता ' मेरा जो नुक्सान होना था हो चुका, तेरा न हो इसको हम देखेंगे. क्योकि अंतत: नुक्सान हमारा है '. निश्चित तौर पर इस तरह की कोई पहल अमानवीय-धर्मांतरण, द्वेष, कटुता, साम्प्रदायिकता को बढावा देगी.

निशाचर जी से पूरी तरह सहमत.

अब बात विडियो की- पंडित का अर्थ भी पता है इनको, नाम के आगे लगा के बैठे हैं, संपत मिश्र ने कहा ''हम जान दे देंगे लेकिन धर्म नहीं देंगे, ब्राह्मण होकर लैट्रिन थोड़े ही साफ़ करेंगे.'' यहाँ भी इन तोते जी का धर्म से तात्पर्य 'जाति' से है, हिन्दु धर्म से नहीं. यही इनके पंडित(?) होने का प्रमाण है. इसी तरह के पंडितो ने हिन्दु समाज की दुर्गति में, देश को गुलाम बनाने में योगदान किया है. ऐसे पंडित तोते की तरह हैं, ज्ञान के नाम पर बस उतना ही आता है, जितना किताब से रट लिया, या किसी बड़े ने रटा दिया. राधे श्याम मिश्र ने कहा, ''पहले लोग ब्राह्मण को पूजते थे, आज के युग में कोई ब्राह्मण को ब्रह्मण नहीं समझता.'' ब्राह्मण(विद्वान्) को तो आज भी सभी सम्मान देते हैं पर इन जैसे (वसियती) ब्राह्मण (मुफ्तखोरों) को कोई नहीं देगा, न ही देना चाहिए.

आपने कहा-"सवाल यही है कि क्या दलित अब भी जागेंगे, या अभी भी ब्राह्मणों के अंध-विरोध की आग में ही जलते रहेंगे?"

सवाल गलत है, होना चाहिए, क्या ब्राह्मण अब भी जागेंगे, या अभी भी दलितों के अंध-विरोध की आग में ही जलते रहेंगे? जागना वास्तव में उनको है जो अपने को (वसियती) ब्राह्मण मानते हैं. मेरे पुरखे ज़मीदार थे, राजा थे तो मुझे आज भी वाही राजसी ठाट-बाट मिलना चाहिए जो उनको मिले. भले ही मैं इस काबिल न हूँ. और आज जो काबिल है उनको आज भी सिर्फ इसलिए चप्पल उठानी पड़ेगी क्योकि उनके पुरखे कभी शूद्र थे. इसी एक महान कारण की वजह से दुनिया में सिर्फ 'हिंदुस्तान' ही एक मात्र ऐसा दुर्लभ देश है, जिस पर हर ऐरे-गैरे नथ्थू-खैरे ने राज कर लिया.

abhishek said...

कौन काबिल है ये तो प्रत्येक परीक्षा का परीणाम बता देता है।

abhishek said...

1 हिन्दु समाज के ह्रास को धर्म से जोडना गलत है। 2 विध्यार्थियोँ की गलति को अध्यापक की गलती कहना नीतिगत रुप से सहि है 3 सम्पुर्ण समाज जन्मना बामण के मत्ते अपनी गुलामी को ओर उससे उत्पन्न दोषोँ को मढ. कर खुद किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी से भागना चाहता है जबकी एक लम्बी श्रृंखला है जो जन्मना बामण के त्याग व संघर्ष को बताता है जन्मना किसी दुसरी जाती के बारे मेँ पता हो बताना।कुछ ने कब किया कुछ ने कब किया लेकिन लगातार ?4 आजादि के 60 से उपर साल साल हो गये है वेद.गीता.ब्रह्रमसुत्र हर किताब कि दुकान पर मिल जाती है कितने लोग जाकते है ऊसमेँ?जो देखते है इनको उसमेँ कौन ज्यादा है?5 पुजारी का काम मन्दिर मेँ घण्टि बजाना व शादि के मन्त्र किताबोँ से टिपना और 90 फिसदी बामण वो काम ना करते थे ना है वैसे भी पुजारी के बच्चेँ उस काम को नहि करना चाहते

abhishek said...

6 समाज को वेद को धारण करना कठिन जान पडता था इसलिये जिन्होँने उसको सम्भाला उसके प्रती श्रृध्दा का निर्माण हुवा जो भी उसे धारण करेगा वो चाहे किसी प्रकार के घर मेँ पैदा हुवा पूज्य होगा आज कोयी बँधन नहि कौन सिखना चाहता है?7 मैँ अपने सभी जातियोँ के दोस्तोँ को पकड कर गीता की कक्षा मेँ ले गया सब भाग गयेँ.क्योँ?उससे कुछ मिलता नहि ऊर्जा लगानी पडती है खुब.कौन लेगा उस ज्ञान को?8 अगर जन्मना बामण अपना "जातीय धर्म"भी समझ कर ही उसे बचाये हूवे हो तो दुसरोँ के पेट मेँ बल क्योँ पडता है?9 आपको आना हो तो आवो अनेक सन्त महात्मा जन्मना बामण तैयार बैठे सिखाने को कौन आता है?

abhishek said...

विषय बहुत स्पष्रठ था जातिगत भेद दूर करने के लिये दिये गये लाभ को वो लोग हडपना चाहते है जो अपने यहा समानता का दाँवा ठोकते है। क्या इस कुरीती के शिकार हुवे बन्धु इस चीज को समझेँगे?या बामण को गालिया बकने को ही अपनी समानता मानेँगेँ?क्योँकि जन्मना बामण को ज्यादा र्फक नहि पडेगा।

B.R. ANSH PARIHAR said...

देखा जाये तो शुद्र वर्ग ने आरंभ से ही अत्याचार सहा है...
मोटे तौर पर 5000 वर्षोँ तक..
आरक्षण मिले हुए तो सिर्फ 60 वर्ष ही बीते हैँ अभी 4940 वर्ष शेष हैँ उतर-पातर होने मेँ।
स्वर्ण,क्षत्रिय व वैश्य वर्ग अभी से सहम गये...
जरा सामना करने की हिम्मत रखेँ।