Wednesday, February 9, 2011

लेनिन के शव से हमें क्या लेना-देना यार…? (मानसिक गुलामी की इंतेहा…) …… Lenin Burial Russia Indian Communists

मॉस्को (रूस) में बोल्शेविक क्रांति के नेता व्लादिमीर लेनिन का शव उनकी मौत के पश्चात रासायनिक लेप लगाकर सन 1924 से रखा हुआ है। मॉस्को के लाल चौक पर एक म्यूजियम में रखे हुए व्लादिमीर लेनिन के इस शव (बल्कि “ममी” कहना उचित है) को देखने देश-विदेश से पर्यटक आते हैं। हाल ही में रूस की यूनाइटेड रशिया पार्टी (वहाँ की सरकारी राजनैतिक पार्टी) ने ''www.goodbyelenin.ru'' वेबसाइट पर एक सर्वे करवाया कि “क्यों न अब लेनिन के शव को वहाँ से निकालकर दफ़ना दिया जाये…” पाठकों से “हाँ” या “ना” में जवाब माँगे गये थे। लेनिन के शव को दफ़नाया जाये अथवा नहीं इसे लेकर रूस के विभिन्न इलाके के 1600 लोगों की राय ली गई। वैसे रूस की सरकार सैद्धान्तिक रुप (Michael Gorbachev's View) से लेनिन के शव को दफ़नाने की इच्छुक है।



यह तो हुई उस देश की बात… लेनिन (Vladimir Lenin) के शव को दफ़नाने की बात पर हजारों किमी दूर यहाँ भारत में वामपंथियों ने प्रदर्शन कर डाला (नीचे का चित्र देखें…)। सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ़ इंडिया (कम्युनिस्ट) (SUCI) के कार्यकर्ताओं ने बंगलोर में रूस के इस कदम की आलोचना की और रूस विरोधी नारे लगाये… एक ज्ञापन सौंपा गया और माँग की गई कि लेनिन के शव को नहीं दफ़नाया जाये…। (यह खबर पढ़कर कुछ को हँसी आ रही होगी, कुछ को आश्चर्य हो रहा होगा, जबकि कुछ को वामपंथी “बौद्धिक कंगलेपन” पर गुस्सा भी आ रहा होगा)… अब आप खुद ही सोचिये कि रूस की सरकार, लेनिन के शव को दफ़नायें या जलायें या वैसे ही रखे रहें, इससे भारत के लोगों को क्या मतलब? कहाँ तो एक तरफ़ वामपंथी लोग आये दिन "हिन्दू प्रतीकों" को दकियानूसी बताकर खुद को “नास्तिक” प्रचारित करते फ़िरते हैं और कहाँ तो लेनिन की बरसों पुरानी लाश को लेकर इतने भावुक हो गये कि यहाँ भारत में प्रदर्शन कर डाला? कहाँ तो वे हमेशा “वैचारिक जुगालियों” और “बौद्धिक उल्टियों” के जरिये भाषण-दर-भाषण पेलते रहते हैं और लेनिन के शव को दफ़नाने के नाम से ही उन्हें गुस्सा आने लगा? क्या लेनिन के शव को दफ़नाने से उनके विचार खत्म हो जाएंगे? नहीं। तो फ़िर किस बात का डर? सरकार रूस की है, लेनिन रूस के हैं… वह उस “ममी” के साथ चाहे जो करे… यहाँ के वामपंथियों के पेट में मरोड़ उठने का कोई कारण समझ नहीं आता।




लेकिन जो लोग यहाँ की जड़ों से कटे हुए हों, जिनके प्रेरणास्रोत विदेशी हों, जिनकी विचारधारा “बाहर से उधार” ली हुई हो… वे तो ऐसा करेंगे ही, इसमें आश्चर्य कैसा? चीन में बारिश होती है तो ये लोग इधर छाता खोल लेते हैं, रूस में सूखा पड़ता है तो इधर के वामपंथी खाना कम कर देते हैं, क्यूबा में कास्त्रो (Fidel Castro) की तबियत खराब होती है तो भारत में दुआएं माँगने लग पड़ते हैं… ऐसे विचित्र किस्म के लोग हैं ये।

लेनिन का शव अगले सौ साल रखा भी रहे या दफ़ना दिया जाये, उससे हमें क्या लेना-देना? हद है मानसिक दिवालियेपन और फ़ूहड़ता की…। मजे की बात तो यह है कि इस सर्वे में भाग लेने वाले 1600 लोगों में से 74% लोग लेनिन को दफ़नाने के पक्ष में थे और 26% उसे रखे रहने के…। जो 26% लोग लेनिन के शव को बनाये रखना चाहते हैं उनमें भी बड़ा प्रतिशत ऐसा इसलिये कह रहा है कि क्योंकि “लेनिन के शव से पर्यटक आते हैं…” (यानी श्रद्धा-वद्धा कुछ नहीं, कमाई होती है इसलिये)। साफ़ है कि रूस के लोग तो वामपंथ के खोखले आदर्शों से काफ़ी आगे बढ़ चुके हैं, चीन तो कभी का वाम विचारधारा को तिलांजलि दे चुका है… लेकिन इधर भारत में अभी भी ये लोग इसे मुँह तक ओढ़े बैठे हैं, जबकि बाहर दुनिया बदल चुकी है… इन्हें पता ही नहीं है। जब कोई “राष्ट्रवाद” की बात करता है तो ये कुनैन की गोली खाये जैसा मुँह बनाते हैं… हिन्दुत्व को कोसते-कोसते अब ये भारतीय संस्कृति और भारत की मिट्टी से पूर्णतः कट चुके हैं…। इन्हें तो यह भी पता नहीं है कि आदिवासी इलाकों में इस “कथित वामपंथ” को अब “चर्च” अपने हित साधने के लिये “चतुर स्टाइल” से टिश्यू पेपर की तरह इनका इस्तेमाल कर रहा है…

बहरहाल, चलते-चलते यह भी जानते जाईये कि मुम्बई हमले के अमर शहीद संदीप उन्नीकृष्णन (Sandeep Unnikrishnan) की शवयात्रा में केरल की वामपंथी सरकार का एक भी नुमाइन्दा मौजूद नहीं था…(शायद संदीप के पिता द्वारा अच्युतानन्दन को घर से धकियाए जाने का बदला ले रहे होंगे…), और अब संदीप के चाचा ने कसाब (Ajmal Kasab) और अफ़ज़ल (Afzal Guru) को दामाद बनाये रखने के विरोध में आत्मदाह कर लिया, तब भी वामपंथियों ने कोई प्रदर्शन नहीं किया, ज़ाहिर है कि उन्हें लेनिन के शव की चिन्ता अधिक है…, ठीक उसी प्रकार जैसे छत्तीसगढ़ में एक "कथित मानवाधिकारवादी" के जेल जाने की चिन्ता अधिक है, लेकिन पिछले 10-12 दिनों से अपहृत पुलिस के जवानों की कोई चिन्ता नहीं…।

अब आप सोच-सोचकर माथा पीटिये, कि लेनिन को दफ़नाने या न दफ़नाने से भारत का क्या लेना-देना है यार…?

स्रोत :
http://www.sify.com/news/60-percent-of-russians-want-lenin-s-body-to-be-buried-news-international-lcdjucbghia.html


http://news.in.msn.com/international/article.aspx?cp-documentid=4831649

30 comments:

Rakesh said...

मैं अपना माथा क्यों पीटूं?
जिन देशद्रोहियों को पीटना चाहिए उन्हें ही क्यों न पीटूं?

उम्दा सोच said...

भारत का दुर्भाग्य है की देश के गद्दार देश की छाती पर बैठे मौज मारते है और यहाँ का क़ानून इनकी रक्षा भी करता है, वरना इन सब के पिछवाड़े में आधा आधा किलो डाइनामाईट बाँधना बनता है !

योगेन्द्र पाल said...

क्या किया जा सकता है, हर जगह ही आपको ऐसे लोग मिल जायेंगे.

dinesh said...

YE MURKHO KI JAMAAT HAI, IN MURKHO NE LENIN KE SHAV KO BHARAT LANE KI MAANG NAHI KI NAHI KI YE BADE SHARM KI BAAT HAI , IN GADHO KO CHAHIYE APNE MARNE KE BAAD KHUD KO BHI LEP LAGWA KAR RAKHE, SOCHENE SE HI MAJA AA RAHA HI KI IN VAAMPANTHIYO KE NETA JAISE, SITARAAM, PRAKASH, YA D RAJA LEP LAGE HUE KAISE DEKHINGE

संजय बेंगाणी said...

क्यों नहीं है जी?

अगर किसी दूर देश में खलिफा हटाया जाता तब भी हमें दर्द हो सकता है.


अगर इजराइल के गाजा कब्जे (?) पर दर्द हो सकता है.

तो लेनीन पर दर्द क्यों नहीं हो सकता?

हत्यारा हिटलर हो सकता है. लेनिन, स्टालिन, माओ तो आदर्श पुरूष है. भारत के अनुयायी उन्ही के कदमों पर चल रहे है. हे कामरेड - बन्द बुद्धी रेडीमेड.

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

हा-हा-हा .... ये हरामखोर , poorest of the poor के नुमाइंदे, गरीबी, महंगाई और बेरोजगारी का मुदा नहीं उठाएंगे मगर .... !

संजय बेंगाणी said...

यह तो हुई उस देश की बात…

किस देश की? कामरेड किसी देश वेश को नहीं मानते. यही तो समानता है इस्लामिक व वामपंथी विचार धारा में. दोनो वैश्विक है और अपनी विचारधारा के लिए रक्त की धारा धरा पर कहीं भी बहा सकते है.

लाल सलाम!

सम्वेदना के स्वर said...

वामपंथीयों के कंफूज़न अब अपवाद नहीं नियम बन चुके हैं।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

हमेशा की तरह सटीक...!

P K Surya said...

ye desh tha vir jawano ka albelo ka mastano ka, ab es desh ka yaroo kya kahana tV me ane ka dhong he karna, men bat to ye he bhaiya ye dogle sale khate es desh ka hen or raag alap to videshiyon ka he karenge, waise bhi angrej chale gaye gandhi nehru pariwar or caroro baikupho ko chhod gayen, 100 me 80 baiman ya baikuph phir bhi mera desh mahan, jai Bharat

रंजना said...

Aabhar bhaai sahab...

aur kya kahen ???

nitin tyagi said...

@इन्हें तो यह भी पता नहीं है कि आदिवासी इलाकों में इस “कथित वामपंथ” को अब “चर्च” अपने हित साधने के लिये “चतुर स्टाइल” से टिश्यू पेपर की तरह इनका इस्तेमाल कर रहा है…

aukat dikha di aap ne comunist ki

lokendra singh rajput said...

कम्युनिस्ट भारत के प्रति कम निष्ठावान लोग हैं, ये कुछ भी कर सकते हैं।

दिवाकर मणि said...

भारत देश में कुकुरमुत्ते की तरह बिखरे कमीनिस्टों के इसी मानसिक दिवालियेपन को देखकर कहा गया है कि-
"मार्क्स ने कहा- ये रात है।
लेनिन ने कहा- ये रात है।
माओ ने कहा- ये रात है।
मित्रो! ये सुबह-सुबह की बात है॥"
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इनकी हरकतें पढ़कर हँसी के मारे पेट में बल पड़ गए...

VICHAAR SHOONYA said...

मुझे लगता है कि ये भारतीय वामपंथियों के मानसिक दिवालियापन कि इन्तेहां है.

JANARDAN MISHRA said...

भाई साहब इन दो कौड़ी के देश द्रोही वामपंथी यों कि भारत के राजनीती में अब कोई औकात तो रही नहीं, अब ये बेचारे करेभी तो क्या करें, देश और समाज हित का तो कोई काम ये कर नहीं सकते, भारत में तो ये रहते भर है,, खाते भर है,, और कमाते भर है,, लेकिन गुंडगान तो ये चाइना और रसिया का ही गायेंगे, ये हमारे देश में "दीमक" के सामान हैं, ये धीरे धीरे हमें कुतर रहें हैं, इनके ऊपर किशी "पेष्टकंट्रोल" का कोई असर नहीं होगा, इनके तो पिछवाड़े पेट्रोल डाल कर तिल्ली लगा देनी चाहिए. इनसे कहदो लेनिन के शव को अपने घर में लाकर पूजा पाठ करें......!!!!!!!

धनंजय said...

लेनिन का तो पता नहीं पर इन कमीनिस्ट विचारधारा के लोगों को ज़रूर दफनाने की ज़रुरत है जिन्हें हम अपने कंधे पर ढो रहे हैं.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

क्या कहा जाये... लोगों की मानसिकता पर... देश के हालात सुधारे नहीं जाते और विदेशों को लेकर...

राज भाटिय़ा said...

मानसिक दिवालियेपन और फ़ूहड़ता के कारण ही तो हम आज तक गुलाम बने हुये हे

सुलभ § Sulabh said...

कम्युनिस्टों को आजादी इसलिए चाहिए थी कि वे अपनी बुद्धि ताक पर रख देश में सिर्फ नारे लगाए??
हद है भाई. इनको सख्ती से नियंत्रित करना होगा.

Satyajeetprakash said...

पुस्तक मैंने जो पढ़ी, वही पढ़े तुम ग्रंथ।
मेरी राह दक्षिण भई, तुम चले वामपंथ।।

मेरा धर्म उधार का, तूने दिया था नाम।
हर हठ हमने छोड़ दी, फिर काहे संग्राम।।

तू छोटे न मैं बड़ा, समय बड़ा बलवीर।
बंधु तुम चंचल बनो, मैं बनूं गंभीर।।

R K GUPTA said...

श्रीमान वीरेंद्र जैन साहब की भी जय हो.

Man said...

वन्दे मातरम सर ,
"""चीन में बारिश होती है तो ये लोग इधर छाता खोल लेते हैं, रूस में सूखा पड़ता है तो इधर के वामपंथी खाना कम कर देते हैं"'''
हाहाहा हा बिलकुल सही कहा आपने सावन के अन्धो गधो को हरा ही हरा नज़र आता हे |

INDIAN said...

बस सिर्फ दो लात की दरकार है वामपंथियो को उनकी औकात मे लाने के लिये

Vishwa Hindu said...

बिन बादल,बिन बरसात,बिना धूप,सरपर छाता!एक लाल मित्र मुम्बई में मिले।पूछा, भाई छाता क्यों, पकडे हो?बारीष तो है नहीं?तो बोले,वाह जी,मुम्बई में बारीष हो,या ना हो, क्या फर्क?मास्को में तो, बारीष हो रही है।१० साल बाद। जब मास्को से भी कम्युनिज़्म निष्कासित है। अब भी वे मित्र, बिन बारीषछाता ले घुम रहे हैं। हमने किया वही सवाल–कि भाई छाता क्यों खोले हो? अब तो मास्को में भी बारीष बंद है?तो बोले देखते नहीं अब तो जूते बरस रहें है।

पद्म सिंह said...

कुत्ते भी जिस दरवाजे पर खाते हैं उसी मालिक के लिए भौकते हैं... इंसानी फितरत का नमूना है ये

सनातन कुमार said...

सुरेश जी आपका ब्लॉग रोज पढता हूँ, कभी कभी अपनी अकर्मण्यता से शर्म उपजती है तो सोचता हूँ अन-सबस्क्राइब कर दूं अपनी जिंदगी चैन से बिताऊँ. लेकिन जिस दिन ये ख्याल आ जाता है उसी दिन रात को बुरे सपने आते है और सुबह तक कब्ज हो जाती है. भाई साहब आप जो काम कर रहे हैं में मानता हूँ इससे मुझ जैसे नालायक लोगों का ही भला हो रहा है और साथ ही देश का भी , लेकिन सत्य कहने का और असत्य उघाड़ने आपका तरीका दिन और रात का चैन ले रहा है| खैर आप लगे रहो , लेकिन ऐसा कोई उपाय भी तो बताओ कि बिना कष्ट और कब्ज के हम भी सच्चाई को हजम कर ले और आगे कुछ काम करें, सिवाय ब्लॉग पढ़ने के और कमेन्ट करने के | मेरा मन हमेशा द्रवित रहता है ऐसा लग रहा है कि ऐसे कुचक्रों के बारे में देखकर सुनकर कहीं क्रोनिक डिप्रेशन न हो जाये| कोई हल है ? देश का नहीं , मेरे जैसे नालायकों का|

प्रतुल वशिष्ठ said...

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भारत में कम्युनिस्ट पार्टियाँ अपने मेनोफेस्टो में उल्लिखित कथित 'समाजवाद' की अब केवल लाश घसीटती प्रतीत होती हैं.
सभी जानते होंगे कि जो आज इन पार्टियों के सदस्य हैं उनका चरित्र क्या है.
इनकी मानसिकता चौतरफा लाभ लेने की बन गयी है.
— अपने नाम के पीछे ब्राहमण आदि ऊँची जाति के संबोधन जोड़कर भी उच्च वर्ण वालों को गाली देते नहीं थकते.
इन्हें अपनी पार्टी में ही उच्च नाम राशी होने का लाभ भी मिलता है. "हमारी अवचेतन सोच अभी भी वर्ण-व्यवस्था के अनुसार आदर-सत्कार देने की है." इस बात को ये लोग भी जानते हैं.
— पूँजीवाद और सामंतवादी प्रवृत्ति के खिलाफ बना यह संगठन स्वयं इन दोषों से लिप्त हो चुका है.
इनकी दावतों में इसका मुआयना किया जा सकता है. गरीबी और गरीब की बात पान खाते हुए की जाती है.
गरीब को कैसे गरीब ही रखा जाये - इनका मोटिव है.
— बंधुआ मजदूरी और बाल मजदूरी पर जमकर भाषण पेलने वाले ही अपने घरों में आदर्श तरीके से एक बच्चे [नौकर] को पालते हैं. उतनी ही शिक्षा दिलवाते हैं जिससे वह उनकी भावी जरूरतें पूरा कर सके.


अन्य बातों का आपको भी अनुभव होगा. मुझे फिलहाल इतना ही है.


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डॉ महेश सिन्हा said...

कलकत्ता जो इस देश का सबसे बड़ा और पुराना शहर था उसकी क्या दुर्गति की है इनहोने जग जाहिर है।
कलकत्ता जुलूस, आंदोलन और बंद का शहर होकर रह गया है ।

आज इसी वाम शासित इलाके में मई 2010 से रात को कोई भी ट्रेन नहीं चलती, हावड़ा- मुंबई मुख्य मार्ग पर, रोज 10-12 घंटे देर से ट्रेने चल रही हैं ।

एक सज्जन ने बताया की एक दिन तो हद हो गयी जब लाल झंडे वाले जुलूस निकालकर नारे लगा रहे थे "बारिश बंद करो" !! पता नहीं किससे और क्या मांग रहे थे, भगवान तो इनके शब्दकोश में नहीं है ।

anurag wani said...

dada karara juta mara hai...hardik abhinandan