Wednesday, February 2, 2011

यदि कोर्ट का निर्णय चर्च के खिलाफ़ है…… तो नहीं माना जायेगा (भाग-1)...... Church, Vatican, Conversion and Indian Judiciary

देश में गत कुछ दिनों में तीन बेहद महत्वपूर्ण घटनाएं हुई हैं, पहला मामला है, सुप्रीम कोर्ट द्वारा ग्राहम स्टेंस मामले में अपने ही निर्णय के शब्दों में संशोधन करना…

ग्राहम स्टेंस को जिन्दा जलाये जाने के मामले में दारा सिंह को फ़ाँसी दिये जाने की माँग को उम्रकैद में तब्दील करते समय सुप्रीम कोर्ट ने शुरु में अपने निर्णय में कहा था कि “किसी भी व्यक्ति अथवा संस्था को किसी की धार्मिक आस्थाओं को बदलने की कोशिश, चाहे वह आर्थिक प्रलोभन के जरिये हो अथवा जबरन, नहीं करना चाहिये… ग्राहम स्टेंस की नृशंस हत्या उड़ीसा के आदिवासी इलाकों में चल रहे धर्म-परिवर्तन का नतीजा है…”, इस वाक्य पर चर्च से जुड़े मिशनरी एवं एवेंजेलिस्ट संगठनों ने बवाल मचा दिया, उनके सुर में सुर मिलाने के लिये हमारे यहाँ फ़र्जी NGOs एवं ढेर सारे विदेशी पालतू-कुत्तेनुमा मानवाधिकार संगठन हैं…सभी ने मिलकर “धर्म परिवर्तन” शब्द को लेकर आपत्ति के भोंपू बजाना शुरु कर दिया… और सभी को अचरज में डालते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही निर्णय के कुछ अंशों को बदलते हुए उन सभी को खुश कर दिया, जो भारत की तथाकथित “गंगा-जमनी” संस्कृति का ढोल बजाते नहीं थकते। लेकिन इससे चर्च द्वारा गरीबों को आर्थिक प्रलोभन देकर एवं बहला-फ़ुसलाकर किये जाने वाले धर्म परिवर्तन की हकीकत बदलने वाली नहीं है… और जो “कथित सेकुलर” यह माने बैठे हैं कि भारत में बैठे मिशनरी के पिठ्ठू सिर्फ़ “गरीबों की सेवा” के लिये हैं, तो उन्हें अपना मुगालता जल्दी ही दूर कर लेना चाहिये। (यहाँ क्लिक करके अरुण शौरी का विचारोत्तेजक लेख पढ़िये...)



“चर्च” की मीडिया पर कितनी तगड़ी “पकड़” है यह इस बात से साबित होता है कि सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय में अपने “शब्दों” को एक-दो दिन बाद बदला, लेकिन इन दिनों के दौरान “मुख्य रूप से बिकाऊ एवं हिन्दू विरोधी मीडिया”(?) के किसी भी व्यक्ति ने “धर्म परिवर्तन” एवं मिशनरी संस्थाओं के संदिग्ध आचरण के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा, आदिवासी क्षेत्रों में चलाये जा रहे धर्मान्तरण पर कोई बहस नहीं हुई… जबकि दारा सिंह को लेकर हिन्दूवादी संस्थाओं को घेरने और गरियाने का सिलसिला लगातार चलाया गया। मैं जानना चाहता हूँ, कि क्या किसी ने भारत के “तथाकथित मुख्य मीडिया” में “चर्च” के बढ़ते दबाव एवं प्रभाव को रेखांकित करने की कोशिश करते देखा है? क्या इस मामले को लेकर मीडिया के किसी हिस्से मिशनरीज़ द्वारा किये जा रहे “धर्म परिवर्तन” पर कोई गम्भीर बहस पढ़ी-सुनी है? असल में ग्राहम स्टेंस की हत्या के मूल कारण अर्थात “धर्मान्तरण” मामले को चुपचाप दफ़नाकर, सारा का सारा फ़ोकस दारासिंह एवं हिन्दुत्ववादियों पर ही रखा गया। परन्तु चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने खुलेआम स्टेंस मामले में चर्च को धर्मान्तरण के मुद्दे पर “नंगा” कर दिया, इसलिये इस निर्णय के खिलाफ़ जमकर हो-हल्ला मचाया गया…



दूसरी घटना है कर्नाटक में 2008 में विभिन्न चर्चों पर हमले की घटनाओं के सम्बन्ध में न्यायिक आयोग की रिपोर्ट। इस रिपोर्ट में माननीय जज महोदय ने 2 साल की तफ़्तीश, सैकड़ों गवाहों के बयान, वीडियो फ़ुटेज एवं अखबारों के आधार पर साफ़ कहा कि चर्च पर हमले के पीछे “संघ परिवार” का हाथ नहीं है, बल्कि यह कुछ भटके हुए नौजवानों का काम है जो चर्च के ही एक गुट “एवेंजेलिस्टों” द्वारा हिन्दुओं के भगवानों के खिलाफ़ दुभावना फ़ैलाने वाला साहित्य बाँट रहे थे। आयोग ने अपना निर्णय 28 जनवरी शाम को पेश किया, लेकिन मीडिया ने आयोग की सैकड़ों पेज की रिपोर्ट को पढ़े बिना ही 28 तारीख की रात से ही हल्ला मचाना शुरु कर दिया… कि आयोग की रिपोर्ट निराशाजनक है, एकतरफ़ा है, संघ परिवार को क्लीन चिट कैसे दे दी गई आदि-आदि। इस मुद्दे पर टीवी पर बहस भी आयोजित करवा ली गई, और टाइम्स नाऊ का अर्नब गोस्वामी (नाम तो हिन्दू जैसा ही रखता है, बाकी पता नहीं) संघ परिवार को क्लीन चिट दिये जाने के कारण बेहद दुखी दिखाई दे रहा था। शायद उसे नहीं मालूम था कि मध्यप्रदेश में भी झाबुआ तथा रतलाम में दो चर्चों पर हुए हमलों में चर्च के ही पूर्व कर्मचारी दोषी पाये गये थे, लेकिन चूंकि न्यायिक आयोग ने चर्च के हो-हल्ले के बहकावे में न आकर उसके खिलाफ़ निर्णय सुनाया है, तो “हम नहीं मानेंगे…”, तब तक चीख-पुकार करेंगे जब तक कि संघ परिवार को दोषी न ठहरा दिया जाये…। ग्राहम स्टेंस वाले जिस पहले मामले का उल्लेख ऊपर किया है उसमें भी मिशनरी को इस बात का “मलाल” था कि दारा सिंह की फ़ाँसी की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद में क्यों बदल दिया? यानी कि मिशनरी और वेटिकन तभी संतुष्ट होंगे, जब उनके मन-मुताबिक निर्णय मिले…  (चित्र में मिशनरी के बढ़ चुके तथा बढ़ते प्रभाव वाले क्षेत्र लाल रंग से दर्शाए गये हैं…)

तीसरी घटना भी अपने-आप में अनूठी है… छत्तीसगढ़ में बिनायक सेन के मामले में कोर्ट में सुनवाई के दौरान यूरोपीय यूनियन के सदस्यों ने उपस्थिति की माँग कर दी है, केन्द्र की पिलपिली, भारत के आत्मसम्मान और स्वाभिमान को गिरवी रखने वाली एवं कोई भी निर्णय लेने में आगे-पीछे देखने वाली, केन्द्र सरकार ने मामला राज्य सरकार के पाले में धकेल दिया है। यूरोपीय यूनियन के सदस्य छत्तीसगढ़ पहुँच भी गये, किसी ने नहीं पूछा कि आखिर “बाहर” वालों को हमारी न्यायिक व्यवस्था में दखल देने का क्या अधिकार है? यूरोपियन यूनियन के सदस्य बिनायक सेन से इतनी हमदर्दी क्यों रखे हुए हैं? क्या कभी भारत की किसी संस्था को इंग्लैंड अथवा ऑस्ट्रेलिया में सिखों अथवा हिन्दुओं पर हुए हमले की सुनवाई के दौरान उपस्थित रहने की अनुमति दी गई या भारत सरकार ने माँगी? उल्लेखनीय है कि बिनायक सेन का मामला अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों(?) द्वारा जोरशोर से उठाया जा रहा है, बड़ा हल्ला मचाया जा रहा है कि बिनायक सेन पर अन्याय हो गया, गजब हो गया… आदि-आदि-आदि, जबकि अभी सिर्फ़ “लोअर कोर्ट” में ही केस चल रहा है। अयोध्या मामले पर बार-बार हिन्दुओं को “कानून अपना काम करेगा” की नसीहत देने वाले नकली और चन्दाखोर मानवाधिकार संगठनों में इतना भी धैर्य नहीं है कि हाईकोर्ट-सुप्रीमकोर्ट में मामला चलने दें और कानून को अपना काम करने दें… लेकिन कोर्ट को “दबाव” में लाने के लिये, अब चर्च यूरोपियन यूनियन के सदस्यों को कोर्ट में बैठायेगा… (मैं जानता हूं, आपको “साइमन कमीशन गो बैक” की याद आ गई होगी, लेकिन लाला लाजपतराय वाला ज़माना अब कहाँ रहा?)। आप सोच रहे होंगे कि बिनायक सेन तो नक्सलवादियों के समर्थक हैं, उनका चर्च से क्या लेना-देना?

पढ़ते रहिये…… भाग-2 में जारी रहेगा…

21 comments:

Satish Chandra Satyarthi said...

काफी गंभीर मुद्दे पर ध्यान दिलाया है आपने.. सिर्फ भारत में ही नहीं पूरे एशिया और अफ्रीका में चर्च जिस तरह से अति सक्रिय है वह चिंता का विषय है. अपने धर्म को फैलाने के मामले में चर्च इस्लाम से भी ज्यादा ताकत और पैसा झोंक रहा है. मैं कोरिया में हूँ और यहाँ देखता हूँ कि हर १० कदम पर एक फाइवस्टारनुमा चर्च है. हर बाजार और मेट्रो स्टेशन पर मिशनरी खड़े रहते हैं जो कोरियाई और विदेशियों को धन और अन्य सुविधाओं का लालच देकर ईसाई बनाने की कोशिश करते हैं. इन मिशनरियों को इस काम के लिए तगड़ा वेतन मिलता है.
सरकार को इन 'सामाजिक सेवकों' की तह तक जाना चाहिए. तब असलियत सामने आयेगी..

JANARDAN MISHRA said...

सुरेश जी
इसाईओं को हिन्दुस्थान में सारी सुख सुविधा मिलती ही रहेगी, क्यों कि हिन्दुस्थान कि सर्वोपरि माइनो कौन है हम सब जानते हैं, (सैयां भये कोतवाल अब डर कहे का) और इन बिकाऊ मिडिया को धन कहाँ से मिलता है येभी हम जानते हैं, तो ये मिडिया वाले अपनी दुकान चलाने के लिए इनके आका के इशारे पर ही काम करेंगे, मुझे तो आर.एस.एस. से भी पूछना है कि, क्या आपलोग हिंदुत्व वादी और देश भक्त मिडिया का निर्माण क्यों नहीं करते, ताकि इन बिकाऊ मिडिया का बहिष्कार करदिया जाय, और जब इनकी भांय भांय कोई सुनेगा ही नहीं तो ये अपनाप चुप हो जाएँ गे.

Darshan said...

जिस तरह ग्राहम स्टेंस को जलाने की घटना थी, उसी तरह से मुंबई में राधा बाई चाल में 'अल्पसंख्यक' समूह ने चार औरतों, दो आदमी और दो बच्चियों को घर के बाहर ताला लगा कर मिट्टी का तेल दल कर जिन्दा जला दिया था. स्थानीय कोर्ट ने अपराधियों को उम्रकैद की सजा दी थी. इस पर मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी ने कोर्ट के फैसले का विरोध किया. जमायते उलेमा, मुस्लिम काउन्सिल और अबू आजमी जैसे लोगों ने चंदा इकट्टा किया और माजिद मेनन ने इनका केस लड़ा.

ग्राहम स्टेंस के केस में दारा सिंह के विरुद्ध उतने साक्ष्य नहीं थे जितने राधाबाई चाल के केस में, लेकिन राधाबाई चाल के हत्यारे आश्चर्य जनक रूप से सुप्रीम कोर्ट ने छोड़ दिए.

उस समय कोइ भी आँख के अंधे सेक्यूलर को इस ह्त्या या हत्यारों को छोड़े जाने में में कुछ खराबी नहीं दिखी. सभी सेक्यूलर अपनी आँख, कान और न जाने कहाँ कहाँ, क्या क्या ठूंसकर बैठे रहे.

दिवाकर मणि said...

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* भारत वह एकमात्र देश है बंधुवर, जहां अल्पसंख्यकों (केवल ईसाई और मुस्लिम समझें) की गुंडागर्दी, छिछोरापन, नंगई, आतंकवादी वारदातें आदि हर कुकृत्य को एक अबोध बच्चे की हरकत समझ के नजर-अंदाज कर दिया जाता है और बहुसंख्यक समाज के द्वारा यदि छींक भी दिया जाता है तो वह मानव-इतिहास अथवा धर्मनिरपेक्ष समाज पर बहुत बड़ा धब्बा मान लिया जाता है।

* भारत वह एकमात्र देश है बंधुवर, जहां अपने लोग (कश्मीरी हिंदू, सिक्ख) ही अपने देश में एक खास किंतु बर्बर कौम की खातिर शरणार्थी बनकर रहने को अभिशप्त हैं।

"बहुसंख्यक के ऊपर अल्पसंख्यक को वरीयता" से संबंधित ऐसी बहुत सी बातें हैं, जिनमें से 1% को भी बताने के लिए एक ग्रंथ लिखा जा सकता है, लेकिन फिर भी इन मुल्लाओं की नाजायज पाखंडी शर्मनिरपेक्ष संतानों को इससे कोई फर्क पड़ सकता है, ऐसा नहीं लगता।

संजय बेंगाणी said...

आपका लेख पढ़ने पर रक्तचाप बढ़ जाता है. दुसरी ओर पढ़ना टाला भी नहीं जाता.

Manish Sangwan said...

बहुत हो चूका एस देश में ये सब
कोई तो बोलो अब बस अब बस
जब लड़नी अपने अपने अधिकार की लड़ाई
तब होगी नहीं आसन अपनी राही
लकिन जिसमे है अपनों के लिया सच्चा प्यार
उठो यारों और हो जाओ तयार
उठा लो अपने हतियार
और दिखा दो उनको अपना दम
की लड़ सकते है अपने लिए हम
जहाँ दुश्मनों को भे प्यार दिखा सकते है
वहीँ उनको चीर भे सकते है हम

K.R. Baraskar said...

भाई साहब,
साहब ये लोग अपनी मालकिन को खुस करने के लिए इस देश को इसाई मिस्नरियो के हाथ बेच डालना चाहते है बस..
बहुत दिल दुखी होता है ऐसे समाचार पढ़कर..
इनके एक और कलुषित कृत्य पर मैंने थोड़ा सा लिखने की कोशिश की है ये सायद आपके लिए कच्चा मटेरिअल बन जाए...
http://svatantravichar.blogspot.com/2011/02/blog-post_02.html

जीत भार्गव said...

विगत कई वर्षो से न्यायपालिका को सेकुलर अपने पक्ष में दूषित करने में जुटे हुए हैं. इसके लिए सेकुलर नेतागिरी के साथ ही मीडिया, मानवाधिकार और महेश भट्ट नुमा सेलिब्रिटी का इस्तेमाल किया जाता रहा है. लोकतंत्र के तीन खम्भे संसद, मीडिया और हर्ष मंदर जैसे अफसर तो पहले ही इस सेकुलर सोच के शिकार हो चुके हैं. और जेहादियों व चर्च-चीन की गोद में बैठकर हिन्दू-विरोध की रोटियाँ सेंक रहे हैं.
अयोध्या मामले से लेकर दारा सिंह और कर्नाटक के मामलों में न्यायपालिका को प्रभावित करने का प्रयास हमने खुले आम देखा है. पहले शाहबानो में भी ऐसा ही दबाव बनाया गया था. अब नेहरू द्वारा प्रणीत और चर्च-जेहादियों द्वारा परिभाषित सेकुलरिज्म के प्रभाव में न्यायालय भी अपने फैसले बदलने लगे तो हिन्दुओं को इन्साफ कहीं भी नहीं मिलेगा... सिर्फ हिंद महासागर में डूबकी ही लगानी पड़ेगी (क्योंकि एकमात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल भी कम्युनिस्ट चीन की रखैल माओवादियों की बलि चढ़ा गया है).
आपने सही कहा की विनायक सेन जैसे 'मानवाधिकारवादी' के ताल्लुकात संदेहास्पद हैं. उड़ीसा के कंधमाल में स्वामी कृष्णानंद की निर्मम ह्त्या के लिए भी चर्च ने नक्सलवादियो का 'सहयोग' लिया था. और इसी के चलते मेडम सोनिया आये दिन नक्सलवादियो /माओवादियों को लेकर 'नरम' बयान देती रहती है. हैरत की बात ये भी है की देश के जिस हिस्से में चर्च सक्रीय है, वहां चर्च मिशनरियां भी 'मानव-सेवा' में 'समर्पित' हैं...यानी कुछ न कुछ लिंक जरूर हैं.

जीत भार्गव said...

गोधरा के गुनेहगार खुले आम घूम रहे हैं..लेकिन गुजरात में मासूम 'जेहादियों' के कथित हत्यारों, मासूम इशरत जहां और सोराबुद्दीन के कथित हत्यारों को सजा दिलाने के लिए कोर्ट पर बनाए गए दबाव और गुजरात से बाहर न्याय दिलाने की गुहार जैसी 'सेकुलर करतूते' तो हम देख ही चुके हैं.
आपने यह भी देखा होगा कि बेस्ट बेकारी बडौदा की चश्मदीद जाहिरा ने जब हिन्दुओं और भाजपा नेताओं के खिलाफ कोर्ट में बयान दिया तो वह सभी सेकुलरो के आँख की तारा थी लेकिन जब उसने अपना बयान बदला तो सेकुलरो को ज़रा भी नहीं सुहाया और तुरंत उसके खिलाफ बिकाऊ तरुण तेजपाल ने स्टिंग ओपरेशन किया!!

I and god said...

every time we blame, leaders, church, media etc.

what we hindus, indians are doing.

to be honest , we hindus at majority are lazy, ignorant, selfish, a-patriotic , and uncerned.

so many comment writers on this blog.

make a column also for the individuals to share / show the other bloggers, what they are doing, other than writing blogs.

yours
ashok gupta
delhi.

P K Surya said...

Ye kaisa satya ka samna he hum hindustani phir se Gulami kee or badh rahe hen kyonke Bhartiye Garibo ka % amiro se jayda he, yadi yahi hal raha to bahut jaldi he ye sale haramkhor jis thali me khate he us thali ko bom se uda k en masum ya kahen ki maha BURBAK garib deshwasiyon k karan desh ka bahut bura hal ho jayega, en Gadho ko lagta he he Dharm pariwartan karne se ye koi mahan lakshya ko pa lenge to enhe mallum nahi free no to ye sale charch ke haramkhor lomri kee bachche enka bahut ganda estmal kar k usi tarah chodenge, ye sale angrez k aulad ko to apne baap k bare bhi nahi malum hota YE mai bilkul satya bata raha hun kee amirak britain me to mother name to hota he lekin father name ke jagah pe sale ye mother friend name likhte hen,ye Janwar bhi humare murakh janta ko yahee siksha dene wale hen or es mahan desh ka Band bajane wale hen, pr mujhe ek bat ka garv he kee ye sale Angrezon khud se he Hindu dharam ko uncha manne lage hen, Jai Hind Jai Bharat,

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

ईसाई मिशनरी द्वारा धर्म परिवर्तन कराना अब बहुत आम बात हो गयी है....हिन्दु धर्म के मानने वालों में जितने नीची ज़ात के लोग वो तो ईसाई धर्म अपना रहे है लेकिन अब पिछले कुछ सालों से मैं देख रहा हूं कि ऊंची ज़ात के लोग जैसे ठाकुर वगैरह भी ईसाई धर्म में जा रहे हैं...


मैं ऐसे बहुत से ठाकुरों को जानता हूं जिन्हे हम बरसों हिन्दु समझते रहें लेकिन क्रिसमस के दिन पता लगा के वो ईसाई है...

ठाकुर पद्म सिंह said...

सीधी सी बात है हिन्दू आज नहीं जागा तो ज़्यादा दिन नहीं जब उसका अस्तित्व खतरे मे होगा... जो भी हिन्दू है... जहाँ भी है... अपना इतिहास पढ़े, अपनी संस्कृति पर गर्व करे और अंधविश्वासों को बढ़ावा न देते हुए समय के साथ चले... सिर्फ कोसने से कुछ नहीं होने वाला है... स्वयं को हर तरह से समृद्ध करना होगा...
हिन्दुत्व क पहचानें
हिन्दुत्व को सहारा दें


अब हवाएँ ही करेंगी रोशनी का फैसला
जिस दिये मे जान होगी वो दिया रह जाएगा

रूपेश मिश्र said...

एकदम सही बात है और अशोक गुप्‍ता जी की बात में दम है लीखना जरूरी है क्‍योंकि इससे ही जानकारी का आदान प्रदान होगा साथ ही कुछ समूह एक्टिविस्‍ट भी तैयार होना चाहिएा

निशाचर said...

सुरेशजी, धर्मान्तरण एक गंभीर मुद्दा है परन्तु इसके मूल कारणों की समीक्षा जरूरी है. कृपया इस पर एक पोस्ट जरूर लिखें.

vijender said...

suresh ji namaskar

aapne church ki pol kohli he wo tarif ke kabil he/ church suru se he darmantran ke kaam me lage he/ jarurat aaj kandriya kanun banane ki jo church ke gairkanunai gatibidhio per lagam laga sake/
dura person janardan mishra ji ka
deshbhakt, hinduvadi print electronic media ka nirman R.S.S. he kiyo ? hum aru aap tatha dusre rashtbhakt log(Hidu,Muslim,Sikh, isai) kiyo nahi kar sakte

Meenu Khare said...

संजय बेगाणी की बात से पूरी तरह सहमत.

Menaria Bablu said...

श्री मान सुरेश जी को सदर प्रणाम !!
आप जो भी लिखते है उससे किसी भी सच्चे हिन्दू का खून खोल सकता है
मै काफी समय से सोंच रहा हूँ की क्यों न ये सरे ब्लॉग एक किताब में संकलित कर के हर घर में पहुंचा दिया जाये
जंहा इसे जो भी पढ़े वो कुछ सोंचे की हम हिन्दू है और अगर अगले कुछ समय मै नहीं चैते तो हमारा हश्र भी उन कश्मीरी पंडितो जैसा हो जाना है जो आज अपने ही देश मै बेगानों के जैसे जी रहे है
वैसे मै तो आपके सरे ब्लॉग अपने ईमेल के जरिये भेजता रहता हूँ अपने दोस्तों को !!
मै चाहता हूँ की आप ही इसकी शुरुआत कंरें
हमारा अपेक्षित सहयोग हमेशा आपके साथ है
वन्दे मातरम !!

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

अस्तित्व बचा कहां है...

रंजना said...

कितने आराम से देश को गुमराह किया जा रहा है.....छिः है..

आपका साधुवाद !!!

अगले भाग की प्रतीक्षा रहेगी.

Rakesh Bharti said...

Sh.Dara Singh ke mamle me pehli appeal Orisa High court me hui thhi aur H.C. ne Sessions Court dwara di gai phansi ki saja ko umer kaid me badal diya thha. Supreme Court ne H.C. ke nirnay ko sahi mana aur umer kaid ki saja ko banaye rakha.
Christian missionaries ne S.C.ke nirnay ke baad aisa mahol banaya ki isaiyon par S.C. bhi atyachar kar raha hai.
S.C. ne bina sune 2 paras judgment se hata diye yeh theek nahi hai.