Wednesday, November 3, 2010

वामपंथी पाखण्ड धारावाहिक का एपिसोड क्रमांक 34872… Indian Communist Parties Double Standards

हाल ही में कैम्ब्रिज विवि में एक व्याख्यान के दौरान प्रकाश करात ने माना कि "भारत के वामपंथी" देश में होने वाले आर्थिक बदलावों को समझने में असफ़ल रहे तथा भारतीय वामपंथ आज भी 1940 के ज़माने की मानसिकता में जी रहा है। कुछ माह पहले यही स्वीकारोक्ति वचन, वामपंथियों के पितातुल्य फ़िदेल कास्त्रो भी अपने मुँह से उचर चुके हैं (यहाँ देखें…)

आज़ादी के पिछले 60 साल से भारत की जनता ने वामपंथियों को लाल झण्डे उठाये, मुठ्ठियाँ भींचे, नारे लगाते देखा है, यह सारी प्रक्रिया अक्सर (लगभग हमेशा) उद्योगपतियों के खिलाफ़, निजीकरण के विरोध में, सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों को बचाने के नाम पर बरसों से दोहराई जाती रही है।



विभिन्न सरकारी संस्थानों, उपक्रमों, सार्वजनिक कम्पनियों, नवरत्न कम्पनियों से लेकर रेल्वे तक वामपंथी नेता, विदेशी पुस्तकों से एवं विदेशी विचारकों से उधार ले-लेकर भाषण, सिद्धान्त जनता के माथे पर झाड़ते रहे। बात-बात पर हड़ताल, तालाबन्दी, कलमबन्दी, घेराव, प्रदर्शन, तोड़फ़ोड़, नारेबाजी, उकसाना, प्रबन्धन को हड़काना, मजदूर नेताओं(?) द्वारा हाजिरी मस्टर पर हस्ताक्षर करके दिन भर गायब हो जाना, प्रबन्धन को मनचाहा झुकाने के बावजूद ब्लैकमेल करना, अपने-अपने आदमियों को विभिन्न संस्थानों में दबाव से फ़िट करवाना… जैसे कई मार्क्सवादी(?) पुनीत काम पिछले कुछ दशकों से हम देखते आये हैं। उदारीकरण के दौर के बाद, इन लोगों के इसी रवैये की वजह से देश के सार्वजनिक उपक्रम निजी उपक्रमों से टक्कर लेने में कमजोर पड़ने लगे, फ़िर भी ये सुधरे नहीं। देखते-देखते पिछले 20 साल में निजी क्षेत्र तरक्की के नये सोपान चढ़ता गया और कामगारों के हमदर्द कहे जाने वाले वामपंथियों ने सरकारी उपक्रमों की टाँग खींचना जारी रखा।

इनके अधिकतर आंदोलन तनख्वाह बढ़ाने, कर्मचारियों की सुविधाएं बढ़ाने, छुट्टियाँ और भत्ते बढ़वाने तक ही सीमित रहते हैं, बहुत कम आंदोलन ऐसे हुए हैं जिसमें इन्होंने उच्च प्रबन्धन के भ्रष्टाचार को लेकर तालाबन्दी की हो, ऐसा भी कम ही हुआ कि किसी कर्मचारी नेता या संस्थान के कर्मचारियों की काम के प्रति जवाबदेही और उसके कर्तव्यों के निर्वहन में मक्कारी के खिलाफ़ इन्होंने कोई आन्दोलन किया हो… नतीजा ये हुआ कि कई सार्वजनिक उपक्रम पूरी तरह बैठ गये, कुछ बीमार हो गये और कुछ बिकने की कगार पर हैं। इसका सारा दोष वामपंथी हमेशा दूसरी सरकारों पर डालते आये हैं, कि इन्होंने ऐसा नहीं किया इसलिये यह कम्पनी बन्द हो गई या उन्होंने वैसा मैनेजमेण्ट किया इसलिये वह संस्था बरबाद हो गई… तात्पर्य यह कि कामचोरी, मक्कारी, हड़ताल, कर्मचारी यूनियन नेताओं की दादागिरी और कदाचरण तथा कर्मचारियों और मजदूरों को "सिर्फ़ अधिकार-सुविधाएं लेना" के साथ "कर्तव्य नहीं करना" की शिक्षा देना जैसे कामों में इनका कोई दोष नहीं है, सारा दोष दूसरों का ही है (यह इनकी पुरानी आदत रही है)। अपनी असफ़लता को स्वीकार करने में इन्हें हिचक तो होती है, अतः खुलकर कुछ कह नहीं पाते।


इतिहास गवाह है कि हर नये विचार का वामपंथियों ने विरोध किया है, इन्होंने कम्प्यूटर का विरोध किया, उस समय इसके फ़ायदे इन्हें समझ नहीं आये… और अन्त में वामपंथ मुख्यालय में कम्प्यूटर लगाने ही पड़े। ये लोग केरल और बंगाल में हड़तालें करवाते रहे, सरकारी उपक्रमों का भट्टा बैठाते रहे, कार्यसंस्कृति का सत्यानाश करते रहे और इनके पड़ोसी राज्य तेजी से आगे बढते चले गये… अब जाकर इनकी आँख खुली है। इन्होंने ट्रैक्टर का विरोध किया, इन्होंने थ्रेशर का विरोध किया, इन्होंने 10+2 शिक्षा पद्धति का विरोध किया, इन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में निजी भागीदारी का विरोध किया… तात्पर्य यह कि वास्तविकता को स्वीकार करने की बजाय रेत में मुँह दबाये बैठे रहे… फ़िलहाल इनका यही रवैया इस्लामिक उग्रवाद को लेकर है, अभी भी ये समझ नहीं पा रहे हैं कि केरल और बंगाल में मुस्लिम वोटों की खातिर जिस "भस्मासुर" को ये पाल रहे हैं, वह अन्ततः इन्हें ही भस्म करने वाला है…

लेकिन हाल ही में केरल की एक और घटना ने इनके "पाखण्डों के धारावाहिक" का एक और एपीसोड प्रदर्शित किया है। केरल में वामपंथियों का एक "भोंपू" है (भोंपू यानी मुखपत्र अखबार) जिसका नाम है "देशाभिमानी" (नाम ही विचित्र है, क्योंकि इसका नाम तो मार्क्साभिमानी होना चाहिये था)। इस अखबार के विभिन्न दफ़्तरों और संवाददाताओं को BSNL के नेटवर्क (टेलीफ़ोन, मोडम, राऊटर, लीज़ लाइन्स इत्यादि) से जोड़ा गया था। हाल ही में CPM की केन्द्रीय समिति ने इस अखबार से BSNL का ठेका समाप्त करके रिलायंस टेलीकॉम कम्पनी की सेवाएं लेने का फ़ैसला कर लिया है। अब देशाभिमानी अखबार और वेबसाइट से माकपा ने BSNL को बाहर करके रिलायंस का हाई-स्पीड डाटा नेटवर्क ले लिया है। BSNL को माकपा अखबार से बाहर करने का कारण "खराब और गुणवत्ताहीन सेवाएं" बताया गया है। BSNL की धीमी गति, लाइनों में बार-बार खराबी और डाटा नष्ट होने की वजह से परेशान होकर माकपा की केन्द्रीय समिति के सदस्य ईपी जयराजन और समिति के अन्य सदस्यों ने BSNL को बाहर का रास्ता दिखाने का फ़ैसला किया। "…आखिर कब तक हम BSNL को झेलते, उनकी सेवाएं बहुत खराब हैं और ऊपर से उनके बिल भी भारी-भरकम होते हैं…" ऐसा कहना है समिति के सदस्यों का।

BSNL के स्थानीय प्रबन्धन ने इस बात से साफ़ इंकार किया है कि खराब सेवाओं के कारण उन्हें बन्द किया गया है, जबकि BSNL में ही कार्यरत यूनियन (माकपा से जुड़ी) के सदस्य भी इस निर्णय से बेहद शर्मिन्दा और खफ़ा हैं। BSNL एम्पलाइज़ यूनियन के सचिव के. मोहनन कहते हैं, "…हमारा प्रयास हमेशा BSNL की सेवाओं में सुधार का ही होता है, हम अपने सभी मिलने-जुलने वालों को BSNL की सेवाएं लेने हेतु प्रेरित करते हैं, लेकिन देशाभिमानी के इस निर्णय से हमारी स्थिति अजीब हो गई है…"।

उल्लेखनीय है कि CPM और CITU ने BSNL को "निजीकरण से बचाने" के नाम पर जमकर (राजनैतिक और आर्थिक) रोटियाँ सेंकी हैं और UPA पर BSNL को कमजोर करने का आरोप लगाते रहे हैं, परन्तु जब बात खुद पर और "धंधे" पर आई तो BSNL को लात मारने में देर नहीं लगाई। यदि CPM वाले वाकई BSNL को सुधारने के प्रति गम्भीर होते तो अपनी यूनियन के जरिये सेवाओं में सुधार के लिये प्रबन्धन पर दबाव बनाते या फ़िर अपनी यूनियन सदस्यों को अच्छा काम करने को प्रेरित करते, सेवाओं में सुधार के लिये CPM की यूनियनें एक घण्टा अधिक काम करतीं, जो कर्मचारी दोषी या मक्कार है उसे सजा दिलाने के लिये CPM की यूनियन आवाज़ उठाती… ऐसा तो कुछ नहीं किया गया, उलटा BSNL का एक हजारों रुपये मासिक का बड़ा ग्राहक (यानी पार्टी का अखबार) खुद ही तोड़ दिया। ये कैसा मार्क्सवाद है भाई…?

जबकि हकीकत यह है कि यदि BSNL को उचित माहौल, सही प्रबन्धन, नेतागिरी और यूनियनबाजों से से मुक्ति मिल जाये तो रिलायंस, आईडिया, एयरटेल किसी भी औकात नहीं है कि उसके सामने टिक सकें। ऐसे आरोप आम हैं कि निजी कम्पनियों को बढ़ावा देने के लिये BSNL के अफ़सरों ने शुरुआत में जानबूझकर "सिम" को दबाये रखा, उसका ब्लैक होने दिया, जल्दी-जल्दी टावर खड़े नहीं किये… तब मार्क्सवादियों ने इसके खिलाफ़ कोई आंदोलन नहीं किये? निजी कम्पनियाँ ग्रामीण क्षेत्रों में लैण्डलाइन सेवाएं देना नहीं चाहतीं, जबकि BSNL बाज़ार में मौजूद है इसलिये उन पर "कम रेट्स" रखने का दबाव भी है…। क्यों नहीं CPM वाले दूरसंचार मंत्री राजा को उसके भ्रष्टाचार के लिये रगड़ते?

असल में मार्क्सवादी हों, वामपंथी हों, CPM-CPI आदि जैसे जो भी हों, इनके सिद्धान्त सिर्फ़ बघारने के लिये होते हैं, कार्यकर्ताओं को लुभाने और जनता को बरगलाने के लिये होते हैं। माकपा की असली ताकत "गरीबी और बेरोज़गारी" है, इसलिये ये चाहते हैं कि गरीबी बनी रहे…, बेरोज़गार इनके झण्डे उठाते रहें। "विकास" से इनकी दुश्मनी है, क्योंकि जैसे ही उद्योग-धंधे लगेंगे… बाज़ार पनपेगा, क्रय शक्ति बढ़ेगी… गरीब आगे बढ़कर निम्न-मध्यम और मध्यमवर्ग बनेगा… तो सबसे पहले इन्हें ही लात मारेगा। फ़र्जी विदेशी सिद्धान्त झाड़ते-झाड़ते ये लोग यथार्थ से दूर हो गये हैं। सामाजिक सुरक्षा, गरीबी उन्मूलन की सिर्फ़ बातें ही बातें इनसे करवा लो… जबकि "सरकारी एजेंसी द्वारा" करवाये गये सर्वे में यह बात सिद्ध हुई है कि गरीबों के लिये चलाये जाने वाले "बीस सूत्री कार्यक्रम" का सबसे सफ़ल क्रियान्वयन भाजपा शासित गुजरात (क्रमांक 1) और कर्नाटक (क्रमांक 2) राज्यों में हुआ है, जबकि केरल का नम्बर पाँचवा और बंगाल का 14वां है…। अब बताईये, क्या फ़ायदा हुआ एक ही राज्य में 30 साल शासन करने का और गरीबी-गरीबी भजने का? लेकिन फ़िर भी न तो ये सुधरेंगे, न ही झूठे सिद्धान्त बघारना छोड़ेंगे, न ही जनता की आमदनी बढ़ाने और विकास करने के लिये कुछ करेंगे…।
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विशेष टीप -
1) इतने सालों तक सड़कों पर "संघर्ष"(?) करने के बावजूद वामपंथी लोग बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कुछ नहीं उखाड़ पाये, लेकिन जब अकेले रामदेव बाबा ने अपने योग के प्रचार के जरिये इन शीतल पेय, जंक फ़ूड, दवा आदि कम्पनियों को अरबों रुपये का नुकसान करवा दिया तब भी इनके पेट में दर्द हो रहा है और ये रामदेव बाबा की आलोचना में लग गये हैं… कारण एक ही है कि रामदेव बाबा भारतीय संस्कृति की बात करते हैं तथा "भगवा" वस्त्र पहनते हैं…। इसी पाखण्ड की वजह से वामपंथ तेजी से अपना जनाधार खोता जा रहा है…

2) अन्त में एक आसान सा सवाल - खबर है कि बिल क्लिंटन और जॉर्ज बुश की भारत यात्रा के दौरान जमकर विरोध करने वाले वामपंथी, ओबामा का बहिष्कार भी नहीं करेंगे और संसद में ओबामा के भाषण को सुनेंगे भी… बताईये ऐसा क्यों? जी हाँ, सही समझे आप… ओबामा के नाम में "हुसैन" शब्द जो आता है। स्वाभाविक है कि भारतीय संस्कृति को भले ही ये लोग जब-तब ईंट मारते रहें, लेकिन "हुसैन" से इनका "प्यार और दुलार" जगज़ाहिर है, फ़िर जल्दी ही केरल और बंगाल में विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं… ऐसे में "हुसैन" शब्द जहाँ भी दिखेगा, सारे वामपंथी जीभ लपलपाते हुए उधर दौड़े चले जायेंगे…

लेख का सन्दर्भ :- http://expressbuzz.com/cities/thiruvananthapuram/deshabhimani-dumps-bsnl-prefers-reliance/216340.html


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29 comments:

संजय बेंगाणी said...

आपने बातें तो खरी कही है, मगर वैसा शब्दाडम्बर नहीं रच पाए जैसा वामपंथी रचते है. :) इस मामले में इन "नाकारापन के आकाओं" का कोई सानी नहीं.

Agyaani said...

बहुत सुन्दर सुरेश जी,
इतना ही कह सकते हैं की ऐसे ही लिखिए और खूब लिखिए!!!

सम्वेदना के स्वर said...

भारत के चारों ओर जो चीनी संकट बड़ता जा रहा है, आने वाले वर्षों में गम्भीर चुनौती का बायस बनेगा, ऐसे में वामपथींओं पर नज़र रखनी होगी। सत्ताहीन होकर ये और खतरनाक न हो जायें कहीं।

"डंकाधिपति ओरामा की अवध यात्रा और दीवाली" पर आप सादर आमंत्रित हैं।

डॉ महेश सिन्हा said...

क्यों बेचारों के पेट में लात मार रहे हो सुरेश भाई। गरीबी और बेरोजगारी खत्म हो गई तो ये क्या करेंगे ?
आपने इनको स्तर वाला बताकर बहुत बड़ा सम्मान दे दिया, दोहरा हो या तिहरा।

डॉ महेश सिन्हा said...

आज एक कमेन्ट कहीं पढ़ा " अरुंधति को भाव न देकर सरकार ने अच्छा किया " याने इस देश का कानून सरकार के हाथ में है की वह देशद्रोही को तो छोड़ दे और पाकेटमार को जेल भेज दे। कौन सा अपराध बड़ा है भाई !!

शंकर फुलारा said...

वामपंथियों का एक और दोगलापन | एक नयी कहावत मुंह से निकल रही है कि वामपंथी "गू(ड़) खाएं और बदबू से परहेज करें "| पर आप भी बहुत मेहनत करते हैं इन वामपंथियों का चिटठा खोलने में | पर ये लातों के भूत होते हैं इन्हें शर्म नहीं आएगी |

man said...

सादर वन्दे सर ,
बिलकुल ही ताजा , तथ्यात्मक और वामपंथी दोगलो की चोडी पोल करता लेख |आज वामपंथी आज घुटनों के बल आ चुके ,कारन इनकी विचार्धरावो की ढीली पड़ चुकी नसे ,इनके दोगले कुकर्मो की वजह आज ये एड्स के रोगी की तरह अछूत होते जा रहे हे |जल्द ही इनकी सदगति हो .....हरे |

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

हकीकत यह है कि यदि BSNL को उचित माहौल, सही प्रबन्धन, नेतागिरी और यूनियनबाजों से से मुक्ति मिल जाये तो रिलायंस, आईडिया, एयरटेल किसी भी औकात नहीं है कि उसके सामने टिक सकें। ऐसे आरोप आम हैं कि निजी कम्पनियों को बढ़ावा देने के लिये BSNL के अफ़सरों ने शुरुआत में जानबूझकर "सिम" को दबाये रखा, उसका ब्लैक होने दिया, जल्दी-जल्दी टावर खड़े नहीं किये… तब मार्क्सवादियों ने इसके खिलाफ़ कोई आंदोलन नहीं किये? निजी कम्पनियाँ ग्रामीण क्षेत्रों में लैण्डलाइन सेवाएं देना नहीं चाहतीं, जबकि BSNL बाज़ार में मौजूद है इसलिये उन पर "कम रेट्स" रखने का दबाव भी है…

यही सही है...

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

ये हुई न खरी-खरी...। वामपंथी राजनीति की कलई खोलती आपकी पोस्ट वाकई काबिले तारीफ़ है।

Ranjan Jain said...

बहुत ही बढिया लेख. जब तक इन मार्क्स के बचे खुचे नाजायज औलादों के पिछवाडे का रंग, मार मार कर इनके झंडे के रंग का ना कर दिया जाये, ये सुधरने वाले नहीं हैं! ये तो साफ़ साफ़ ज़ाहिर है कि ये प्रकाश कारंत चीन का दलाल है वरना ये परमाणु समझौते के विरोध में ये ना कहता कि "ये समझौता चीन को घेरने की साजिश है". अगर खाते यहाँ की हो तो चीन कि क्यों गा रहे हो?

JANARDAN MISHRA said...

SURESH JI
mera manna hai ki ye vampanthi chaina jaishe kuch desho ke dalal hai hindustan me huriyat confrensh aur vampanthi jaishe log apne kuch labho ke liye agar hindustan ka sauda karna pada to vo bhi kar dege......... lekin hindusta ko prem karne vale desh bhakkat in gaddaro ko kabhi kamyab nahi hone dega

धनंजय said...

"2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि लाइसेंस मनमाने तरीके से बांटकर केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने सरकारी खजाने को 1 लाख 76 हजार 379 करोड़ रुपये का चूना लगाया।"

सुरेश भाई आप गलत साबित हो गए. आपका आंकड़ा ६० हज़ार करोड का था. इधर तो ये तीन गुना घोटाला है. वैसे इसमें आपकी गलती भी नहीं है, आप भी जीरो लगाते लगाते थक गए होंगे. अभी जब राष्ट्रमंडल खेलों का भांडा फोड करें तो कृपया जीरो लगाने में कंजूसी न करें. Remember you are talking about Congress government. No zero can do justice to their corruptions.

abhishek1502 said...

पाखंडी है कमुनिस्ट , अब ये देश में बची खुची सांसे गिन रहे है ,
ये जो पब्लिक है सब जानती है ........................................

kaverpal said...

Dear Suresh ji
in vampanthiyon ki sarkar pichhle 25 saalon se west bangal me hai aur mai wahan posting raha hun wah ki halat in haramjado ke karan kaisi hai yeh mujhse behtar koi nahin janta prakash ho ya chutiyanand ho inko bharat ki sanskrit ke bare me itna hi malum hai jitna ki ek najayaj ko apne baap ke baare men

Anonymous said...

"वामपंथियों के पितातुल्य फ़िदेल कास्त्रो"

क्या इसके यह मायने लगायें कि कुछ वामपंथी विचारकों के लिये फिदेल का अपनी .... के साथ .... होना गौरवपूर्ण है?

http://www.cubaheadlines.com/2009/09/27/18476/fidel_castro_womanizer_a_less_known_aspect_el_comandante.html

Ratan Singh Shekhawat said...

ये कम्युनिस्ट तो शुरू से दोगले है जनता सब समझती है पर अपने काडर रूपी गुंडों के बल पर अभी तक ये कुछ राज्यों में सत्ता में बनी हुई है जो देखते कब तक चलती है !!

man said...

http://jaishariram-man.blogspot.com/2010/11/blog-post.html

lokendra singh rajput said...

वामपंथियों का आपने जो पोल-पट्टी खोली है वह सत्य है। इस बात में कोई दो राय नहीं इन्हें भारत की संस्कृति का विरोध करने में बहुत ही आत्मीय सुख प्राप्त होता है।
आपको और आपके परिवार को महापर्व दीपोत्सव की शुभकामनाएं।

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

मैंने आपके पास इन्हें भेजा है.... इन लोगों का अपने घर पर दीवाली ( 5 Nov 2010) शुक्रवार को स्वागत करें.
http://laddoospeaks.blogspot.com/

जी.के. अवधिया said...

दीपावली के इस शुभ बेला में माता महालक्ष्मी आप पर कृपा करें और आपके सुख-समृद्धि-धन-धान्य-मान-सम्मान में वृद्धि प्रदान करें!

amar jeet said...

बदलते परिवेश मैं,
निरंतर ख़त्म होते नैतिक मूल्यों के बीच,
कोई तो है जो हमें जीवित रखे है ,
जूझने के लिए प्रेरित किये है,
उसी प्रकाश पुंज की जीवन ज्योति,
हमारे ह्रदय मे सदैव दैदीप्यमान होती रहे,
यही शुभकामना!!
दीप उत्सव की बधाई...........

bhagvatprasad mishra said...

मेरे भाई हिन्दुस्तान मे राजनीति के हमाम मे सब नंगे है।
सारी पार्टियां चोर चोर मोसेरे भाई हैं ये पब्लिक को दिखाने के लिये एक दूसरे के विरोधी हैं।देश मे जितने भी संगठन या पार्टी है सबका मकसद सत्ता है

बहिरा बांटे रेवड़ी अंधरा चीन्ह चीन्ह के देय

ऐसी कौन सी पार्टी है या ऐसा कौन सा नेता है जो भ्रष्ट नही है आज कल तो भ्रष्टाचार की होड़ मे संत महत्मा भी कूद पड़े हैं। राजनीती मे धर्म और धर्म मे राजनीती घुस कर खिचड़ी बन
गयी है। मेन मकसद है पैसा कैसे कमायें क्योंकि करोंड़ो रुपये फूंक कर गद्दी पायी अगले चुनाव मे लगाना है।
अपने भारत मे गुलामी का जींस फुल फॉम मे है हम और आप लोग ही उसे जिंन्दा रखे हुऐ है जैसे हर नेता हर पार्टी के पीछे भारी भीड़ है। नेता चाहे जो करवा दे गुलाम मरने मारने पर उतारु हो जाते हैं।
जिस दिन ये गुलामी का जींस मर जायेगा उस दिन ये नेता और अपना भारत सुधर जायेगा।
अब देखिये यदि मै किसी पार्टी से जुड़ा हूं तो विरोधी पार्टी के उूपर खीज उतारुंगा क्योकि वो सत्ता मे है जिस दिन मेरी पार्टी सत्ता मे आजायेगी मुझे अपनी पार्टी जिससे मै आस्था से जुड़ा हूं उसकी गलती पर मजबूरी है मै आंखें बंद कर लूंगा।
क्योकि मे गुलामी की जंजीरों से जकड़ा हूं कही न कहीं मेरा स्वार्थ भी जुड़ा है।

भाई खीज कर अपने खून को मत जलाओ कमजोर हो जाओगे। चिल्लाते चिल्लाते कई उूपर चले गये नेताओं को कोई फर्क नही पड़ता मोटी खाल के होते है नेताओ की जात अलग होती है। इनके इंसान का दिल नही रहता और न ये इंसान रह जाते हैं
>>>>> एक लेख पढ़ा था <<<<<<
अगर दुनिया को बदलना है तो खुद को बदल डालो दुनिया अपने आप बदल जायेगी।

इस जींस को मारने की शुरुआत हमे और आपको करनी पड़ेगी।

फालतू मे अपनी एनर्जी नंगा करने मे वेस्ट कर रहे हैं।

आसमान मे थूंकोगे थूक वापस मंुह पे गिरेगा

पहले हम इस गुलामी से बाहर निकले और फिर दूसरो को निकालने मे ताकत लगाये।

अच्छे प्रयास सार्थक होते है

Comrade Rudra said...

Dear Mr. Chiplunkar,

I happened to chance upon this write up of yours, which I find substantially and intellectually vacuous. Apart from your disability to see the things without your prejudiced vision, your command over reading and understanding English language is also questionable. Please do not take this criticism in a negative way. The Prakash Karat article you point to, merely states Karat's denial of what has been wrongly attributed to him by the press. Anyone with a little command over English will know that the article is about Karat's denial of what has been attributed to him falsely. Regarding Fidel Castro's admission, Faux News is the same same news channel that talked of Iraq having WMDs and said they had solid evidence. We all know, where does Faux News stand on all this now.

अगर आपकी अंग्रेजी भाषा में हाथ ज़रा तंग हैं, तो उपरोक्त लेख का हिंदी में अनुवाद करके आपको प्रेषित कर सकता हूँ!

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

@rudra-You have not answered the questions raised by Suresh Ji. We all will be grateful if your goodself translate the said article and mail it to us.
@मिश्र जी-गलत को गलत न कहने वाले उस पाप में बराबर के भागीदार हैं. रामदेव जी के राजनीति में आने भर की घोषणा भर से आप व्यथित प्रतीत होते हैं..

nitin tyagi said...

प्रभु इस रास्ट्र के लोगों को अकल दो जिससे इस देश को देश द्रोहियों से बचाया जा सके |

Divya Singh said...

@bhagvatprasad mishra

bevkuf hote hai jo aasman par thuk kar vahi ke vahi khade rahte hai asman par thuk kar vahan se hat jane me hi buddhimani hai.....bas samajh jao....

Anonymous said...

bahut hi badiya likha hai suresh ji, in 'kaam- redo' ki sacchai samay samay par ati rahti hai.

सुलभ § Sulabh said...

देश की मिट्टी पलीद कर रहे हैं ये लोग.

GHANSHYAM said...

"ये मेरा आखिरी पत्र है इस पोस्ट पर.. मैं अपनी गलती स्वीकार करता हूँ, मेरी गलती यह है कि मैं ऐसी जगह लिख गया जहाँ असहमतियों के लिए कोई जगह नहीं है.. जो सामने वाला कह गया उसे ब्रह्मवाक्य मानो, वरना!!"

उपरोक्त वाक्य आपके ही कमेन्ट का अंश है |
जैसा कि मेरे कमेन्ट के प्रतिउत्तर में आपने कहा कि ये क्रोध नहीं बल्कि व्यंग है ?
PD बाबू उपरोक्त लाईनें व्यंग नहीं बल्कि झल्लाहट की पराकाष्ठ है जिसमें आप दुबारा इस ब्लॉग पर नहीं आने की बात करते हैं क्यूंकि आपकी बात नहीं मानी जा रही ? ये कैसा व्यंग है ?

PD बाबू या तो आप व्यंग की परिभाषा नहीं जानते या फिर आप PD नहीं बल्कि KLPD है ?


ब्लॉग पर दुबारा नहीं आने के लिए धन्यवाद |||