Monday, November 1, 2010

IIT रुड़की लिपस्टिक काण्ड और ABVP को एक सलाह… ... IIT Roorkee Lipstick and ABVP

अमूमन ऐसा माना जाता है कि IIT में आने वाले छात्र भारत के सबसे बेहतरीन दिमाग वाले बच्चे होते हैं, क्योंकि वे बहुत ही कड़ी प्रतिस्पर्धा करके वहाँ तक पहुँचते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि यहाँ से निकले हुए प्रतिभाशाली दिमाग अपने नये-नये आईडियाज़ से देश और समाज को लाभान्वित करने के प्रकल्पों में लगायेंगे। जिन लोगों ने IIT रुड़की के छात्रों को टीवी पर “लिपस्टिक लगाओ प्रतियोगिता” में भाग लेते देखा होगा, उनकी कुछ धारणाएं अवश्य खण्डित हुई होंगी।

जिन लोगों ने IIT के “प्रतिभाशाली” छात्रों के “पुण्य प्रताप” नहीं देखे या इस बारे में नहीं जानते होंगे, उन्हें बताना जरुरी है कि रुड़की स्थित IIT  के छात्रों ने कॉलेज में एक प्रतियोगिता आयोजित की थी, जिसे लिपस्टिक लगाओ प्रतियोगिता कहा गया। इसमें लड़कों ने मुँह में लिपस्टिक दबा रखी थी और उसे सामने वाली लड़की के होंठों पर उसे ठीक से लगाना था (मुझे यह नहीं पता कि यह “प्रतिभाशाली” आइडिया किस छात्र का था, किस शिक्षक का था या किसी आयोजन समिति का था), ऐसा “नावीन्यपूर्ण” आइडिया किसी IITian के दिमाग में आया होगा इस बात पर भी मुझे शक है… बहरहाल आइडिया किसी का भी हो, IIT रुड़की में जो नज़ारा था वह पूर्ण रुप से “छिछोरेपन” की श्रेणी में आता है और इसमें किसी भी सभ्य इंसान को कोई शक नहीं है।

इस घटना की तीव्र निंदा की गई और उत्तराखण्ड सरकार ने इसकी पूरी जाँच करने के आदेश दे दिये हैं।

पहले आप "छिछोरग्रस्त वीडियो" देखिये, फ़िर आगे बात करते हैं…



जब यह वीडियो टीवी चैनलों पर दिखाया गया तो स्वाभाविक रुप से “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता”(?) के पक्षधर अपने-अपने तर्क लेकर खड़े हो गये। जब भी कभी इस प्रकार की कोई “अ-भारतीय” और “अशोभनीय” घटना होती है तो अमूमन उसका विरोध ABVP या विहिप द्वारा किया जाता है (NSUI के आदर्श, चूंकि रॉल विंसी घान्दी हैं इसलिये वह ऐसी घटनाओं का विरोध नहीं करती)। फ़िर मीडिया जिसे कि कोई बहाना चाहिये ही होता है कि वे किस तरह “भारतीय संस्कृति” की बात करने वालों को “पिछड़ा”, “बर्बर” और “हिंसक” साबित करें तड़ से इस पर पैनल चर्चा आयोजित कर डालता है। इस पैनल चर्चा में अक्सर “सेकुलरों” के साथ (खुद को तीसमारखां समझने वाले) “प्रगतिशीलों”(?) और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता वाले “वाचाल” मौजूद होते हैं।

ऐसे प्रगतिशील रटे-रटाये तर्क करते रहते हैं, जैसे कि “…यह प्राचीन देश “कामसूत्र” का देश है और हम ऐसे कृत्यों को सामान्य समझते हैं…” (इनसे पूछना चाहिये कि भईया जब यह कामसूत्र और खजुराहो का देश है तो क्या हम फ़ुटपाथ पर सेक्स करते फ़िरें?), या फ़िर तर्क ये होता है कि पुराने जमाने में भी भारतीय संस्कृति में इस तरह का खुलापन और “कामुकता” को राजा-महाराजों ने सामाजिक मान्यता दी थी (तो भईया, क्या हम भी राजाओं की तरह हरम और रनिवास बना लें और उसमें कई-कई औरतें रख लें? हमें मान्यता प्रदान करोगे?)…। इसी मूर्खतापूर्ण तर्क को आगे बढ़ायें तो फ़िर एक समय तो मनुष्य बन्दर था और नंगा घूमता था, तो क्या दिल्ली और रुड़की में मनुष्य को नंगा घूमने की आज़ादी प्रदान कर दें? कैसा अजीब तर्क हैं… भाई मेरे… यदि भारत में खजुराहो है… तो क्या हम भी अपने घरों में “इरोटिक” पेंटिंग्स लगा लें?

रही बात “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता” की… तो इसका “वीभत्स देशद्रोही रुप” एक औरत हाल ही में हमें रायपुर, दिल्ली और कश्मीर में दिखा चुकी है, क्या "वैसी" अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता चाहते हैं ये प्रगतिशील लोग? भारत में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का फ़ायदा एक "घटिया चित्रकार" पहले भी उठा चुका है, जिसे बड़ी मुश्किल से खदेड़ा गया था इस देश से।

और सबसे बड़ी बात यह कि, क्या IIT के ये छात्र, लड़कियों को लिपस्टिक लगाने को “स्वतन्त्रता” या “स्वस्थ प्रतियोगिता” मानते हैं? यदि मानते हैं तब तो इनकी बुनियादी शिक्षा पर ही सवाल उठाये जाने चाहिये। क्या IIT में पढ़ने वाले इन छात्रों को पता नहीं है कि आज भारत के गाँव-गाँव में बच्चे यहाँ तक पहुँचने के लिये कड़ी मेहनत कर रहे हैं और IIT उनके लिये एक सपना है, एक आदर्श है… वहाँ ऐसी छिछोरी हरकते करते उन्हें शर्म नहीं आई? कभी सोचा नहीं कि इस कृत्य के दृश्यों का प्रभाव “बाहर” कैसा पड़ेगा? नहीं सोचा तो फ़िर काहे के “प्रतिभाशाली दिमाग” हुए तुम लोग? भारत के इन चुनिंदा प्रतिभाशाली बच्चों को "अल्हड़"(?) और इसे "नादानी में किया गया कृत्य" कहा जा सकता है? जिस छिछोरे ने यह आइडिया दिया, क्यों नहीं उसी समय उसके मुँह पर तमाचा जड़ दिया गया? आज तुमने लिपस्टिक लगाओ प्रतियोगिता रखी है और “प्रगतिशील” उसका गाल बजा-बजाकर समर्थन कर रहे हैं…। इन सड़े हुए दिमागों का बस चले तो हो सकता है कि कल कॉलेज में तुम “ब्रा पहनाओ प्रतियोगिता” भी रख लो, जिसमें लड़के अपनी लड़की सहपाठियों को एक हाथ से “ब्रा पहनाकर देखें”…। फ़िर ABVP और विहिप को गालियाँ दे-देकर मन भर जाये और भारतीय संस्कृति और शालीनता को बीयर की कैन में डुबो दो… तब हो सकता है कि 3-4 साल बाद आने वाली IIT बैच के लड़के “पैंटी पहनाओ प्रतियोगिता” भी रख लें। यदि सड़क पर खुलेआम चुम्बन लेना और देवताओं के नंगे चित्र बनाना अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता है, तो उसके थोबड़े पर हमें भी चार चप्पल लगाने की स्वतन्त्रता दो भईया… यह भेदभाव क्यों?

ऐ, IIT वालों… माना कि तुममें से अधिकतर को भारत में नहीं रहना है, विदेश ही जाना है… तो क्या पश्चिम का सिर्फ़ नंगापन ही उधार में लोगे? तरस आता है ऐसी घटिया सोच पर…। कुछ दिन पहले दिल्ली के राजपथ पर BSF का एक जवान अपने चार बच्चों के साथ पूर्ण नग्न अवस्था में विरोध प्रदर्शन कर रहा था… उसका वह नंगापन भी “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता” था, लेकिन नौकरी गंवाने और बच्चों को भूख से बेहाल देखकर उसने व्यवस्था के खिलाफ़ नंगा होना स्वीकार किया, जबकि IIT के इन छात्रों ने “नंगापन” सिर्फ़ और सिर्फ़ मस्तीखोरी के लिये किया… और यह अक्षम्य है… अपने घर के भीतर तुम्हें जो करना है करो, लेकिन सार्वजनिक जगह (और वह भी कॉलेज) पर ऐसी “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता” कतई बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिये…।

अब अन्त में कुछ सलाह ABVP और विहिप के लिये –

1) वर्तमान समय में यह बात हमेशा याद रखो कि मीडिया पर एक “वर्ग विशेष” का पूरा कब्जा है, जो हमेशा इस ताक में रहता है कि कैसे आपको बदनाम किया जाये, इसलिये प्रत्येक विरोध का तरीका शालीन, तर्कपूर्ण और सभ्य रखने की पूरी कोशिश करो…

2) छिछोरों को “जमकर रगेदने” का सबसे बढ़िया तरीका है “अदालत” का रास्ता, आपके पास वीडियो उपलब्ध है, उसमें दिखाई दे रहे लड़कों के खिलाफ़ “अश्लीलता फ़ैलाने” का आरोप लगाकर उन्हें कोर्ट में घसीटो। ऐसे दसियों कानून हैं और यदि जेठमलानी और जेटली जैसे वकीलों को छोड़ भी दिया जाये तो कोई भी सामान्य सा वकील इन उच्छृंखल और असभ्य लड़कों को कोर्ट के कम से कम 10-20 चक्कर तो आसानी से खिलवा सकता है। ये IIT के लड़के हैं, कोई ऊपर से उतरे हुए देवदूत नहीं हैं, जब MF हुसैन जैसे घाघ को सिर्फ़ मुकदमों के बल पर देशनिकाला दे दिया तो इन कल के लौण्डों की क्या औकात है। कोर्ट के 2-4 चक्कर खाते ही अक्ल ठिकाने आ जायेगी और फ़िर ऐसी छिछोरी हरकतें भूल जायेंगे और पढ़ाई में ध्यान लगाएंगे। इस प्रक्रिया में एकाध लड़के (जिसने यह फ़ूहड़ आइडिया दिया होगा) को IIT से बाहर भी निकाल दिया जाये तो देश पर कोई आफ़त नहीं टूट पड़ेगी… कम से कम आगे के लिये एक सबक तो मिलेगा।

तात्पर्य यह कि जिस तरह अक्षय कुमार को सरेआम अपनी पत्नी ट्विंकल द्वारा पैंट की चेन खोलने को लेकर पहले सार्वजनिक रुप से और फ़िर कोर्ट में रगेदा गया था, वैसा ही इन लड़कों को भी रगेदना चाहिये… अक्षय-ट्विंकल तो फ़िर भी पति-पत्नी थे, रुड़की के ये छात्र तो पति-पत्नी नहीं हैं। राखी सावन्त या मल्लिका शेरावत टीवी पर ऐसी हरकतें करें तो उसे एक-दो बार "इग्नोर" किया जा सकता है लेकिन कॉलेज (वह भी कोई साधारण दो कौड़ी वाला नहीं, बल्कि IIT) के सांस्कृतिक कार्यक्रम में ऐसी बदनुमा हरकत!!!

3) यही तरीका उन लड़कियों के लिये भी अपनाया जा सकता है जो कि हो सकता है अपने बॉयफ़्रेण्ड की फ़जीहत देखकर उसके बचाव में आगे आयें, लेकिन विरोध का तरीका वही अदालत वाला ही…। वरना कई “पिंक चड्डियाँ” भी आप पर हमला करने को तैयार बैठी हैं।

भारतीय संस्कृति को गरियाने और लतियाने का यह उपक्रम काफ़ी समय से चला आ रहा है और इसमें अक्सर “रईसों की औलादें” शामिल होती हैं, चाहे मुम्बई की रेव पार्टियाँ हों, रात के 3 बजे दारु पीकर फ़ुटपाथ पर गरीबों को कुचलना हो, कॉलेज के सांस्कृतिक कार्यक्रम में कपड़े उतारना हो, या फ़िर एमटीवी मार्का “चुम्बन प्रतियोगिता”, “वक्ष दिखाओ प्रतियोगिता”, “नितम्ब हिलाओ प्रतियोगिता”…इत्यादि हो। परन्तु IIT के छात्रों द्वारा ऐसा छिछोरा मामला सार्वजनिक रुप से पहली बार सामने आया है जो कि गम्भीर बात है। फ़िर भी जैसा कि ऊपर कहा गया है, श्रीराम सेना जैसा मारपीट वाला तरीका अपनाने की बजाय, इन “हल्के” लोगों को न्यायालय में रगड़ो, देश के विभिन्न हिस्सों में पार्टी और संगठन के वकीलों की मदद से ढेर सारे केस दायर कर दो… फ़िर भले ही इन के बाप कितने ही पैसे वाले हों… जेसिका लाल को गोली मारने वाले बिगड़ैल रईसजादे मनु शर्मा की तरह जब एड़ियाँ रगड़ते अदालतों, थानों, लॉक-अप के चक्कर काटेंगे, तब सारी “पश्चिमी हवा” पिछवाड़े के रास्ते से निकल जायेगी…। ध्यान में रखने वाली सबसे प्रमुख बात यह है कि “कथित उदारतावादियों”, “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के कथित पक्षधरों”, “अश्लील से अश्लील बात को भी हमेशा भारतीय इतिहास और संस्कृति से जोड़ने वालों” इत्यादि की कतई परवाह न करो… ये भौंकते ही रहेंगे और मीडिया भी इन्हीं को अधिक कवरेज भी देगा।

फ़िर ऐसा भी नहीं है कि ABVP या विहिप को “इन जैसों” के खिलाफ़ आक्रामक रुख अपनाना ही नहीं चाहिये, जब पानी सिर के ऊपर से गुज़रने लगे तो इन पर और आसपास मौजूद कैमरों पर कम्बल ओढ़ाकर एकाध बार “जमकर सार्वजनिक अभिनन्दन” करने में कोई बुराई नहीं है। फ़िर भी कोई इस मुगालते में न रहे कि ये लोग मुन्ना भाई की तरह सिर्फ़ गुलाब भेंट करने से मान जायेंगे… गुलाब के नीचे स्थित चार-छः कांटों वाली संटी भी खास जगह पर पड़नी चाहिये…।


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38 comments:

Rupesh said...

bhai sahab namashkar, bahut badiya likha hai. ye saare hi convent educated hote hain aur inhe hindustani sabhyata aur sanskriti se koi lagao nahi hai. inka ek hi nara hai. apni maouj masti aur apna shankdar carrier. mujhe samjh nahi ata akhir har bar bar is tarah ke pradarshano ke khilaf bjp, vihip ya anya hinduvadi sangathan hi kyu khade hote hain. aakhir congress aur anya dalo me bhi to kaafi dharmik log hain. (mai apke pichhle lekh pad raha hnoo, bahut pasand aa raha hai. bus ek lekh se thodi aptti hai - kya ap bhagawan ko mante hain, kyon. mere manana hai.bhagwan tark se pare chij hain. wo hamara vishwas hain. jo manav bhagvan ko khoj leta hai, ya tark se sidhh kar de wo manav ho hi nhi sakta. wo ya to koi mahtapashwi hoga. ya koi dev. is kalyug me to ye sambhav ho hi nahi sakta.ek anurodh hai ki bhagwan ke baare me tarkshastra ka prayog na karein)

रचना said...

parents and teachers are equally responsible for such incidents

iit has students who mostly come from very elite class as they are able to pay a lot of money for tutions which secures the seat for then in iit

very few are genuine students and they are made fun of as well

Anirudh Pratap Singh Yadav said...

लगता है ये निचे के होटों पर भी लिपस्टिक यूं ही लगाते है

champu said...

लगता है ये निचे के होटों पर भी लिपस्टिक यूं ही लगाते है

champu said...

ये अपनी माँ बहन के भी यूँ ही लिपस्टिक लगाते होगे

जी.के. अवधिया said...

विद्यालय, महाविद्यालय आदि शिक्षास्थलों को सरस्वती का मन्दिर माना जाता है, किन्तु कुछ लोगों को माता सरस्वती के स्थान पर कामदेव अधिक भाते हैं; इसलिए वे अब सरस्वती के मन्दिर को कामदेव तथा रति के मन्दिर में परिवर्तित करने का प्रयास कर रहे हैं।

अवधेश पाण्डेय said...

apanae layak idea, kort ke chakkar men padenge to maa-baap ki bhi akal thikane aa jayegi...

awyaleek said...

मुझे तो बहुत ज्यादा आश्चर्य है कि इस बात पर इतना हंगामा क्यों हो रहा है और ये मीडिया में इतना जगह कैसे पा रहा है क्योंकि ये तो आजकल आम हो गया है..साधारण राँची में ही बहुत से काँलेजों में फ़्रेशर पार्टी में लड़का-लड़की हदों को तोड़ देते हैं..और अगर इसमें कुछ खास है तो "लक्स डांस इंडिया डांस" जैसे शो में कला दिखाने के नाम पर जिस तरह से लड़के-लड़की एक-दूसरे को जहाँ-तहाँ छूते हैं,एक-दूसरे का चुम्बन लेते हैं तो वो खास क्यों नहीं है,उस पर सवाल क्यों नहीं उठाया जाता है,उसे बढ़ावा क्यों दिया जाता है..लोग उसे सिर्फ़ टी.वी. पर देखते हैं पर मैं अपने कालेज में देखता हूँ जब मेरे दोस्त लोग उसी शो "डांस-इंडिया-डांस" की विडियो क्लिप को देखकर रिहर्सल कर रहे थे..कितनी बेशर्मी से लड़का लड़की के नितम्ब और स्तन दबा रहा था नृत्य के कला दिखाने के नाम पर और सब तालियाँ बजा रहे थे..मैं शर्म से वहाँ खड़ा भी नहीं रह पाया....
और एक बात सुरेश भैया कि IIT के छात्र समान्य ही होते हैं,उनका चरित्र समान्य या समान्य से भी गंदा होता है.. उनकी विशेषता बस यही है कि उनका सिर्फ़ दिमाग तेज होता है..और कुछ भी नहीं..अगर देश का ख्याल होता तो अपने दिमाग का उपयोग देश के लिए करता ना कि विदेश के लिए.जो देश उसे एक अच्छा इंजीनियर बनाने के लिए लाखों खर्च कर देता है वही देश अपमानित होता है इनसे.."ये तो धूलों का देश है यहाँ कौन रहेगा"-ये इनका वक्तव्य होता है...जो घड़ा १०किलो दूध अपने अंदर समा सकता है वो १० किलो नाली का गंदा पानी भी अपने अंदर रख सकता है.कहने का तात्पर्य ये है कि इनका तेज दिमाग जब गंदे काम में व्यस्त होता है तो ये समान्य की तुलना में ज्यादा गंदा काम करते हैं...आपने बार-बार इस बात पर जोर दिया था कि ये लोग IITian होने के बावजूद ऐसा कैसे कर सकते हैं इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि मुझे पता है इनसबकी असलियत..
ये ज्यादातर अंग्रेजी माध्यम के होते हैं जिनके सर पर अंग्रेजियत का भूत सवार होता है..ये हिंदी फ़िल्म और गाने से नफ़रत करते हैं..ये विदेशी गाने और फ़िल्म ही देखते रहते हैं इसकारण इनकी सोच भी विदेशियों जैसी ही होती है इसकारण इनका चरित्र हिंदी माध्यम वाले की तुलना में ज्यादा गंदा होता है....
एक और बात कि इस विडियो में जिस व्यक्ति के बारे में आप इशारा कर रहे हैं खजुराहो और कामसूत्र के बारे में वो अच्छा भारतीय संस्कृति के समर्थक हैं विरोधी नहीं..उनकी और भी विडियो देखी है मैंने इसलिए कह रहा हूँ..इस विडियो में भी तो उन्होंने कहा है कि भले ये देश कामसूत्र का देश है लेकिन हरेक चीज के लिए उचित समय और उचित स्थान होता है...

JANARDAN MISHRA said...

ye jin logo ki idea hai kya vo pahle apni maa aur bhan ko kisi ke sath riharsal karvaya hai ya nahi ya vo hindustan ki shanshkruti ke bare me kuch jante bhi hai ki nahi..........

ajit gupta said...

सुरेश जी, आपने दो बातों पर ध्‍यान आकर्षित किया है। एक तो उस घटना पर जो कई दिनों तक मीडिया की आँखों से सभी ने देखी थी और दूसरी एबीवीपी पर। यह सत्‍य है कि हमारे महाविद्यालयों में इस प्रकार की अनेक हरकते रोज ही होती हैं और कई बार एबीवीपी आदि संगठन इसका खुलेआम विरोध करते हैं जो ना तो मीडिया को और ना ही जनता को पसन्‍द आता है। इसलिए समय की नजाकतता को देखते हुए इन्‍हें आपके बताए रास्‍ते पर याने कि अदालती कार्यवाही पर ही ध्‍यान देना चाहिए। या फिर शालीनता से विरोध का कोई मार्ग निकालना चाहिए।

संजय बेंगाणी said...

थोड़ा सा अजीब लग रहा है. या फिर विचित्र सा. अजीबो-गरीब डे मनाए जाते रहे है, यह भी एक आइडिया (?) है! क्या इंजिनियरिंग है बाप... :)

विरोध का तोड़-फोड़ मार्का तरीका केवल मीडिया को लाभ दिलाता है. अतः सोच समझ कर.....

Anonymous said...

मैं यहाँ IIT की घटना का समर्थन नहीं कर रहा हूँ और न ही विरोध,
केवल कुछ बातें रख रहा हूँ -
१. दो वयस्क लोगों (लड़का और लड़की ) का अपनी इच्छा से कुछ करना भारतीय संस्कृति के खिलाफ,
मगर जब हर रोज हर जगह लडके लड़कियों को छेड़ते हैं, और परेशां करते हैं (उसमे ABVP, हिंदी मीडियम, और अंग्रेजी मीडियम सभी होते हैं ) वो ?
२. इन लोगों ने जो किया वो भारतीय संस्कृति के खिलाफ,
और जो इनकी माँ बहनों के उदाहरण देकर विरोध कर रहे हैं, वो ?
३. यदि मीडिया से ये खबर देश भर में फ़ैल गयी तो भारतीय संस्कृति को खतरा, और यदि किसी को न पता लगता तो ?
४. पढने वाले लोगों ने कुछ किया तो संस्कृति का विनाश, और रोज जब हम रिश्वत लेते और देते हैं, जब हम गलत होता देखकर आँख कान बंद करके निकल लेते है, वो?
५. वो लड़के और लड़की शायद उस बात को एक घंटे बाद भूल भी गए हों पर इस बात को अपने दिमागों में हफ़्तों , महीनो तक लादकर जो हम अपने और समाज के अन्दर प्रदुषण कर रहें है, वो ?

honesty project democracy said...

सुरेश जी अब शिक्षा के मायने बदल गए हैं ...अब शिक्षा बिल्डर माफिया ,दलाल कांग्रेस की सरकार तथा शिक्षा माफिया के द्वारा चलाया जा रहा है और ऐसे में IIT में भडुआगिरी सिखाया जा रहा है क्योकि यहाँ के सभी शिक्षक भी लोभी लालची हैं ..इनका शिक्षा से दूर -दूर तक कोई वास्ता नहीं, इनको तो पैसा चाहिए और पैसा शिक्षा से ज्यादा भडुआगिरी में है अब इन संस्थानं से भडुए ही निकलेंगे और इस देश और समाज को आगे भडुए ही चलाएंगे ....

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

@anony-दो व्यस्क अपनी मर्जी से सम्भोग भी कर सकते हैं. मां-बहनों के उदाहरण इसलिये दिये हैं कि कुछ शर्म तो आये. सामने मक्खी नहीं निगली जाती. रिश्वत के लिये सुरेश जी ने कभी हां कहा है क्या, दूसरा रिश्वत के लिये आज भी सामाजिक, कानूनी मान्यता नहीं मिली है. हिरोशिमा-नागासाकी पर एक ही बार बम गिराया गया, आज तक अमेरिका को कोसा जाता है.

वैसे मैंने एक जगह लिखा भी था कि इस होंठ रंगने की प्रतियोगिता के बाद के सारे कर्म-कुकर्म कर के दिखा दिये जाते तो और भी अच्छा होता...

रंजना said...

नंगई आज प्रगतिशीलता के लिए परमावश्यक ठहरा दी गयी है भाई साहब...ठहराई किसने है,यह सभी जानते हैं,पर रोकेगा कौन यह सबसे बड़ा प्रश्न है..



मन घिना गया यह सब पढ़ देख कर...बहुत बहुत आहत है मन..क्या इस रात की भी कभी सुबह होगी या रात ही मनुष्यता की नियति बनेगी...

Anonymous said...

@ भारतीय नागरिक -
१. दो व्यस्क अपनी मर्जी से सम्भोग भी कर सकते हैं
बिलकुल कर सकते हैं, उन्हें ये अपनी मर्जी और सहमती से ही करना चाहिए, न की किसी एक को दुसरे के साथ बलात,
२. रिश्वत के लिये सुरेश जी ने कभी हां कहा है क्या
मैने कब कहा की सुरेश ने ऐसा कहा है, मैं तो इसलिए कह रहा हूँ, की ये सब जगह हो रहा है, सब जानते हैं, मगर जिस तरह हम सब मिलकर एक lipstick के ऊपर
कूद पडे वैसे ही पिछले ६० साल में किसी ऐसे आदमी के ऊपर नहीं कूदे? वो हमें भारतीय संस्कृति के खिलाफ नजर नहीं आता जबकि असल जड़ तो वो ही है |
३. सामने मक्खी नहीं निगली जाती
तो टीवी बंद कर दीजिये
@ Honesty
शिक्षा संस्थाओं से तो पता नहीं कितने सालों से भडुए निकल रहे हैं, आपने देखा नहीं इन्होने इतनी सालों में अपनी माँ (हिंदुस्तान) को कहाँ कहाँ बेचा?
हाँ आजकल critical mass shift हो गया है, और ये कुछ ज्यादा ही निकल रहे हैं |
मगर इस सब के लिए इनसे ज्यादा जिम्मेदार हम लोग और हमारे से पहले की पीढ़िया हैं , जिन्होंने इनका विरोध नहीं किया,
*********बुराई के जीतने के लिए एक ही चीज़ चाहिए अछे का चुप रहना *********
मैं तो ये कह रहा हूँ की हम एक राइ का पहाड़ बना रहें हैं, जबकि इससे बहुत बड़ी चीज़ें हमारे सामने हैं |

केवल राम said...

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था , उसको चलाने वाले, नीति नियंता , और विद्यार्थी , सब के सब अपने कर्तव्यों से मुंह फेर कर बस अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हैं , ऐसी अवस्था में यह हश्र तो होना ही है , खेर आप जैसे चिन्तक जब तक इस धरती पर हैं तब तक सुधार की अपेक्षा की जा सकती है
सुंदर विचार ...!

ZEAL said...

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Mockery of our culture can be seen everywhere now a days. Its indeed very disgusting.

I raised this issue on my following post a couple of days ago.

http://zealzen.blogspot.com/2010/10/hiss.html

एक खूबसूरत महिला का आतंक -- भारतीय संस्कृति की चिता मत जलाइए -- Hiss

Regards,

.

Anonymous said...

कमाल हो गया नया अगर iit में लडको ने लड़कियों को लिपस्टिक लगा दी , अरे दोस्तों ये बात तो सिर्फ लिपस्टिक लगाने की है ,क्या आप ने टीवी में पिल -७२ के विज्ञापन को नहीं देखा , वह तो लड्कियियो को खुले आम सलाह दी जाती है ,की आप बिना protaction ke अगर कर (सेक्स) बठी हो तो टाइम को ध्यान करो , और ७२ घंटे में पिल -७२ खा लो ,
सबसे पहले इन को बंद करो , या stayfree के us vigyapan ko , jo kahta hai ,yahi to soch badalni hai

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

सांस्कृतिक कार्यक्रम में लिपस्टिक चुम्बन प्रतियोगिता .. ये किस संस्कृति का हिस्सा है? और जो लोग इसे कामसूत्र आदि की दुहाई देकर सही ठहराने कि कोशिश कर रहे हैं, उन तथाकथित प्रगतिशील लोगों ने original कामसूत्र पढ़ी ही नहीं है ( सिर्फ फोटो :) वाली कामसूत्र देखि हो तो बात अलग है) | कामसूत्र के वास्तविक अर्थ में नंगापन का कोई स्थान नहीं है ... पर तथाकथित प्रगतिशील लोग फोटो वाली कामसूत्र देखकर ही कामसूत्र में अपने को पंडित समझने लग गए हैं |

खैर तथाकथित प्रगतिशील लोग तो अपनी नंगई दिखाते रहेंगे पर हम अभिभावक क्या कर रहे हैं ? इस गन्दी नौटंकी करने वाले लड़के के मा-बाप भी अपने लड़के को कोई दोष नहीं देंगे, अभिभावक से पूछिए उनका जवाब यहो होगा की इसमें उन्हें कोई बुराई नहीं दिखती और ये काम उनके लड़के ने नहीं किया किसी ने उन्हें फसा दिया है | अब का कहें ?

awyaleek said...

http://www.facebook.com/video/video.php?v=173903985953752#!/video/video.php?v=173903985953752


एक नजर इस विडियो पर भी डाल लीजिए और देखिए कैसे हमारे देश को नर्क बनाने पर तुला हुआ है ये मुस्लिम नर-पिशाच...

VICHAAR SHOONYA said...

हमेशा की तरह से एक सामायिक मुद्दे पर अपने एक विचारोत्तेजक लेख लिखा है और हमेशा की ही तरह से आपकी सभी बातों से सहमत हूँ.

ई-स्वामी said...

आपसे असहमत हूं सुरेश!
इसके प्रत्युत्तर में मैने अपने चिट्ठे पर एक प्रविष्टी लिखी है - कडी - http://hindini.com/eswami/archives/439

Anonymous said...

E-swami ji
बहुत बढ़िया , यही बात मैं समझाना चाह रहा था की इससे भारतीय संस्कृति खतरे में नहीं आई, भारतीय संस्कृति कोई इस्लाम नहीं की हर छोटी सी बात में खतरे में आ जाये | लेकिन ऐसी सोच और बातें जरूर इसे उस श्रेणी में ला देंगी (शायद ये ही मीडिया में खबर उड़ाने का उद्देश्य हो) |
इससे कई गुना ज्यादा खतरा तो हम लोगों के रोज के भ्रष्टाचार से है | हमारे झूट बोलने से है, जो हम कहीं न कहीं बोलते हैं; हमारे सही काम न करके जुगाड़ से अपना ही काम निकलवाने में है| सब को एक ही डब्बे में बंद करके एक ही नजरिये से सोचने और और behave करने को लेकर है |
आपने सही कहा
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प्रेमहीन और हास्यबोध से रहित एक कुण्ठित समाज में रहने से तो बेहतर है विदेश मे चले जाना |
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Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

@Anonymous जी देखिये अकेले लिपस्टिक चुम्बन प्रतियोगिता ही भारतीय संस्कृति के लिए ख़तरा नहीं बल्की इसतरह की हर एक नगई भारतीय संस्कृति के लिए ख़तरा है. बूंद-बूंद से ही तालाब भरता है ना !

रही बात भ्रष्टाचार की तो, निश्चित तौर पे भ्रष्टाचार भी अपनी संस्कृति के लिए एक बड़ा ख़तरा है, पर इसका मतलब ये तो नहीं की सिर्फ भ्रष्टाचार पे ही चर्चा हो और और अन्य प्रकार की नंगई को नजरंजाग किया जाय ?

indian citizen said...

@anony-सम्भोग अवश्य कर सकते हैं, पैसा दे-लेकर भी करते हैं, लेकिन खुले-आम नहीं करते.
संस्कृति कभी खतरे में नहीं पड़ती, लेकिन लोगों की तमीज का स्तर गिर जाता है. कोई बेशक हत्या कर दें और किसी को पता न चले, अलग बात है, लेकिन पता चलते ही उस जुर्म के प्रति मशीनरी सक्रिय हो जाती है. बेशक यह लड़के-लड़कियां सम्भोग कर लेते और आपके द्वारा संदर्भित मायनों में कर लेते, कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन जब वीडियो बनवायेंगे तो अवश्य दिक्कत होगी. समाज में जो रीति-नियम-प्रथायें बनती हैं, वह मनुष्यों के आचरण से बनती हैं और हर समाज के लिये एक स्टैण्डर्ड तय किया जाता है, क्या यह कृत्य उन सामाजिक मानकों पर खरा उतरता है. अंत में बेटी को विदा करने वाला हर बाप जानता है कि शादी के बाद क्या होता है. लेकिन किसी भारतीय बाप को अपनी बेटी से पूछते सुना है कि सुहागरात कैसी बीती...

YM said...

जहां सब जगह गन्दगी और कीचड़ हो और वहाँ से किसीका गुजरना मजबूरी हो तो साफ़ सुथरा भी उस गंदगी से बच नही सकता !

वहि कोई ऐसा भी है कि कीचड़ में लथपथ है और वो कीचड़ में ऐसे चलता है कि दूसरों पर भी कीचड़ उछले और दुसरा भी गंदा हो !

लेकिन उस इंसान का दिल का हाल भी जाने जो मजबूरी में कीचड़ में फंसा और लथपथ हुआ जिसकी वजह से वो झुंझलाया हुआ है, चिडचिडा है अब कोई पत्थर या पानी उस कीचड में डाले और उससे कुछ छींटे उस इंसान को लगे तो उसे और गुस्सा आ जाता है, अगर उस व्यक्ति से कहा जाए कि भई आप तो वैसे ही गन्दगी में सरोबर है अगर किसी ने थोड़ा और गंदाकर दिया तो आपको क्या फर्क पड़ा ?

उसे गन्दगी के बढने से फर्क नही पड़ा लेकिन वो ये नही चाहता की उसकी इस मजबूरी का फायेदा उठा कर कोई उसे और गंदा करके अपने मन की मुराद पूरी करे या उसका मजाक बनाए!

बस कुछ ऐसा हाल ही आज हर भारतीये का है, सब जानते है कि बुरइयो की दलदल में में भारतीये समाज डूबा हुआ है लेकिन वो ये नही चाहता कि कोई उस कीचड़ में पत्थर फेंके और दो छींटे उसे और लगे !

कुछ ऐसी ही मनोदशा इस पोस्ट में है!

PD said...

फिलहाल तो मैं अनामदास और ईस्वामी के ही विचारों से सहमत हूँ सुरेश जी.. आपसे नहीं..

GHANSHYAM said...

ठीक कहा PD साहब आपने ?
आखिर उन लड़कियों में आपकी कोई बहन या बेटी नहीं थी
तभी आपको वहां क्रिएटिविटी दिखी ?

PD said...

हा हा हा.. मैं इसी तरह के कमेन्ट के इन्जार में था कि कब कौन आकर मुझसे व्यक्तिगत बहस और लान्क्षण लगाए..
फिर भी लोग कहते हैं कि बेनामी बनकर कमेन्ट लोग क्यों करते हैं..

यहाँ तो लोग इतने बुद्धिमान हैं कि अपने विचार से असहमति भी बर्दास्त नहीं कर सकते हैं..

GHANSHYAM said...

PD साहब बहस की बात ही नहीं है , बस एक दृश्य है आप इसी तरह "खुले दिमाग" से इस दृश्य में भी अपनी "क्रिएटिविटी" भरे दिमाग से "क्रिएटिविटी" के ऐसे ही दो शब्द लिख दीजिये जैसे आपने ई स्वामी के शब्दों का समर्थन किया है मैं वादा करता हूँ आज से सुरेश जी का ब्लॉग और उनका समर्थन छोड़ दूंगा ?
लेकिन पहले दृश्य तो जान लीजिये,
दृश्य है एक "क्रिएटिव" लड़का, जिसे अपने हाथों से लिपस्टिक पकड़ना पसंद नहीं,
मुंह से भी लिपस्टिक पकड़ना पसंद नहीं,
वो "क्रिएटिव" लड़का अपने नितम्बों के बीच में लिपस्टिक दबाकर आपकी बेटी के होठों पर लिपस्टिक लगा रहा है |
PD साहब, ई स्वामी ! दृश्य कैसा है ?
मुझे उम्मीद है आप लोगों की क्रिएटिविटी अभी भी उतनी ही "स्वस्थ" होगी ?
उपरोक्त दृश्य के बारे में मैं आपके क्रिएटिव विचारों का इन्तेजार करूँगा |

अब चूँकि आप लोगों की अपनी बेटी की बात आ गयी है लिहाजा आप अपना आप नहीं खोएंगे और उतने ही "खुले दिमाग" से अपने विचार देंगे जितने खुले दिमाग से आप लोगों ने IIT के सन्दर्भ में दिए |

Anonymous said...

@घनश्याम -
नितम्ब में lipstick creativity से ज्यादा वाहियात और उबकाई भरा idea लगा,
पर फिर भी निम्न शर्तों पर ,
१. यदि लड़की वयस्क है
२. उसे अपना भला बुरा सोचने की समझ है
३. और वो जानती है की वो क्या कर रही है, क्यों कर रही है, (न की किसी मीडिया, प्रतियोगिता, peer pressure अदि में, और इसमें टीवी telecast भी शामिल है)
और वो तब भी करना चाहती है, तो कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि एक वयस्क को इस बात का अधिकार होना चाहिए, कि जो वो सामाजिक और कानूनी मर्यादा में करना चाहता है, वो कर सके |
IIT में ये प्रोग्राम (ये प्रतियोगिता नहीं ) हर साल होता है इस साल मीडिया ने coverage क्यों दी, आज से पहले १५० साल में तो अखबार में भी एक कालम नहीं छपा |
शायद किसी ने मोबाइल से विडियो लेकर न्यूज़ चैनल को भेज दिया; और मीडिया ने अपनी TRP तथा सस्ती लोकप्रियता के लिए , और समाज की कुछ ग्रुप की ख़ास reaction के लिए ये न्यूज़ चलाई होगी,
पर खुशकिस्मती से ऐसा कुछ नहीं हुआ |
ये बातें हमारे समाज को कम सहिष्णु दिखाने के लिए है, जबकि ऐसा है नहीं |
ये बात अलग है पिछले १७०० साल से आक्रमण सहते हुए हम लोग एक ज्यादा वर्जित समाज में बदल गए हैं | जो की तब समय की जरूरत भी रही हो |
पर अब ऐसा नहीं है , हमें फिर से एक खुले दिमाग और दिल वाले समाज में बदलना चाहिए, जैसे की हम हजारों साल पहले थे, न की कुछ मुस्लिम देशों की तरह बंद समाज में |

PD said...

ना जी, आप बिलकुल नहीं खोयेंगे.. हम तो उस महान देश के निवासी हैं जहाँ बचपन से ही माँ-बहन कि गालियाँ इतनी सुनाई जाती है कि इम्यून हो जाते हैं.. इसी महान देश के ये संस्कार हैं जहाँ कई घरों में बाप बेटे को भैनचो कि गाली देता है, आप तो कुछ और भी अधिक संस्कारी हैं जो दूसरों कि बेटियों का शब्द चित्रण मात्र कर रहे हैं..

हमारे देश के महान संस्कारित लोगों कि एक और खूबी गिनाता हूँ.. बिना हकीकत एवं विचार जाने खुद से Assume करके अपने विचार कि भूमि तैयार करके कुछ भी सोच-कह लेना.. जैसा कि आपने पिछले कमेन्ट में कहा("तभी आपको वहां क्रिएटिविटी दिखी?" जबकि मैंने कहीं भी ये नहीं कहा कि वह क्रिएटिव था या ऐसा कुछ)..

यहाँ कोई पहचान का संस्कारित व्यक्ति माँ-बहन कि गाली दे तो लोग बुरा नहीं मानते हैं, खैर आप तो फिर भी बिना किसी पहचान के हैं(मतलब आपका कोई प्रोफाइल नहीं है,"पहले ही साफ़ बता दिया हूँ, नहीं तो आप फिर से उसी महान देश के महान परंपरा का पालन करते हुए कुछ नया Assume करते") :)

सच में ऐसे महान देश कि भाषाओं से इसके संस्कार पर कोई फर्क नहीं पड़ता है.. अगर फर्क पड़ता है तो इस तरह कि हरकतों से.. :)

ये मेरा आखिरी पत्र है इस पोस्ट पर.. मैं अपनी गलती स्वीकार करता हूँ, मेरी गलती यह है कि मैं ऐसी जगह लिख गया जहाँ असहमतियों के लिए कोई जगह नहीं है.. जो सामने वाला कह गया उसे ब्रह्मवाक्य मानो, वरना!!!

सतीश सक्सेना said...

इस बेहूदगी को जितना बुरा कहा जाए कम होगा ! हार्दिक शुभकामनायें !

GHANSHYAM said...

PD साहब !
आखिर आप बुरा मान ही गए आप लाख ना नुकर करें, लेकिन आपके शब्द आपकी पोल खोल रहे हैं ?

खैर कुछ बातें जो आपने कहीं उन पर गौर करें

आपने कहा ..
१- ""जबकि मैंने (PD) कहीं भी ये नहीं कहा कि वह क्रिएटिव था या ऐसा कुछ)..
२- इसी महान देश के ये संस्कार हैं जहाँ कई घरों में बाप बेटे को भैनचो कि गाली देता है,
३-कोई पहचान का संस्कारित व्यक्ति माँ-बहन कि गाली दे तो लोग बुरा नहीं मानते हैं,
४- महान देश कि भाषाओं से इसके संस्कार पर कोई फर्क नहीं पड़ता है.. अगर फर्क पड़ता है तो इस तरह कि हरकतों से.. :)""


आपके द्वारा कहे उपरोक्त चारो विन्दुओं पर मेरे तर्क ..
१- आपने खुद इसी ब्लॉग में अपने पिछले कमेन्ट में ई स्वामी की उन बातों का जिसमें ई स्वामी ने IIT के छात्र /छात्राओं की कारगुजारियों को "क्रिएटिविटी" की संज्ञा देकर उनके सम्मान में अपनी पगड़ी उतार दी थी (हैट्स ऑफ़), बातों का समर्थन किया है |

२- जिस बाप और बेटे का उदाहरण आपने दिया है वो दिल्ली और एन सी आर की संस्कृति है न कि इस देश की|

३- अगर पहचान का व्यक्ति माँ बहन की गाली दे तो उसे आप गलत नहीं मानते लेकिन बाप अगर बेटे को गाली देता है तो आप उसे गलत मानते हैं ?

४- किसी व्यक्ति की "भाषा" कैसी होगी ये उसके "संस्कार" तय करते हैं, किसी व्यक्ति की "हरकत" कैसी होगी ये उसकी "सोच" तय करती है और "सोच" का स्तर संस्कार तय करते है |

और अंत में श्लीलता और अश्लीलता का पता लगाने के लिए एक "सूत्र" दे रहा हूँ...

किसी भी लड़की या लड़के की "हरकतों" को जिसे आप "क्रिएटिव" कहकर उसके सम्मान में अपनी पगड़ी उतार देते हों, उस लड़की या लड़के की जगह अपनी बेटी या बहन को रखकर (कल्पना करके) देखें, अगर अब भी उन हरकतों पर आप अपना "हैट्स ऑफ़" करने में अपना गौरव समझते हैं तो वो "हरकत" श्लीलता की श्रेणी में आएगी, बशर्ते आप वेश्यावृत्ति के धंधे से ताल्लुक न रखते/ रखती हों |

PD said...

आपने सब बाते तो पॉइंट आउट किया मगर एक और भारत कि महान परंपरा को पॉइंट आउट करना भूल गए कि बातों को समझे बिना कुछ भी अज्यूम कर लेते हैं और कुछ भी कह जाते हैं.. जैसे कि आपने कहा "अगर पहचान का व्यक्ति माँ बहन की गाली दे तो उसे आप गलत नहीं मानते लेकिन बाप अगर बेटे को गाली देता है तो आप उसे गलत मानते हैं ?" एक और उदाहरण, आपने "हैट्स ऑफ" शब्द का प्रयोग किया..
अब आपके अन्य बातों का जवाब मैं क्यों दूं भला जब आप इसी तरह बिना बात को सोचे-समझे अपनी समझ से कुछ भी कहें?

और हाँ, ऊपर कहे बातों को आपा खोना नहीं व्यंग्य में बाते करना कहते हैं.. जो आप समझे नहीं या समझना नहीं चाहे..

"Unable to post this comment from my ID, But its PD only."

Anonymous said...

iss matter ko jarurat se jyada uthaya ja raha hai. aap kaun hote hai unhe blame kerne waale . jab IITian desh ke hazaaro laakho logo ko rozgaar dete hai to koi unhe blame nahi kerta ,jab unki develop ki gayi technology aapke life ko aasaaan banaaa deti hai tab koi blame nahi kerta. aapne unko wahaaa padne bheja nahi na , to aap kaun hote hai unn kamiya ginaane waale .pehle log apne girwaaan me jhaake fir kissi ko blame kare !!!!!

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

@Anonymous जी, एक समझदार इंसान किसी की बुराई ही निंदा (blame) करता है, भला अच्छाई की 'निंदा' (blame) कोई क्यूँ करे?

जी हाँ उन्हें वहां पढने के लिए ही भेजा है, खुले-आम चुम्मा-चाटी और आवारागर्दी के लिए नहीं भेजा है.

और एक बात, जो भी ऐसी नंगई करते हैं या नंगई पसंद करते हैं वो इसका विरोध नहीं करते. जो इसका विरोध करते हैं वो ऐसी नंगई नहीं करते. अब इसमें गिरेबान झाकने वाली क्या बात है?