Monday, September 27, 2010

देशसेवा करते शहीद होना अच्छा है या जहरीली दारु पीकर मरना…?...... Major Unnikrishnan, CPM Kerala, Achyutanandan

यह प्रश्न सुनने में अजीब लगता है और सामान्यतः जवाब यही होगा कि देशसेवा के लिये शहीद होना निश्चित रुप से अच्छा है। लेकिन केरल के माननीय(?) मुख्यमंत्री वामपंथी श्री अच्युतानन्दन ऐसा नहीं सोचते, उनकी निगाह में जहरीली दारु पीकर मरने वाले की औकात, देश के एक जांबाज़ सैनिक से कहीं अधिक है… क्या कहा विश्वास नहीं होता? लेकिन ऐसा ही है साहब…। आपको तो याद ही होगा, पिछले साल जब ताज होटल के आतंकवादी हमले में शहीद हुए युवा कमाण्डो मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के घर पर जब अच्युतानन्दन जी उनके पिता के पास संवेदना व्यक्त करने (?) गए थे, उस समय मेजर के घर की चेकिंग खोजी कुत्तों द्वारा करवाई गई थी, जिस कारण बुरी तरह से भड़के हुए शोक-संतप्त पिता ने मुख्यमंत्री अच्युतानन्दन को दुत्कार कर अपने घर से भगा दिया था…। धिक्कारे जाने के बावजूद अच्युतानन्दन का बयान था कि "यदि वह घर संदीप का नहीं होता तो उधर कोई कुत्ता भी झाँकने न जाता…"। बाद में माकपा ने मामले की सफ़ाई से लीपापोती कर दी थी और मुख्यमंत्री ने शहादत का सम्मान(?) करते हुए, मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के परिजनों को केरल सरकार की तरफ़ से 3 लाख रुपए देने की घोषणा की थी (जो अब तक मिले या नहीं, पता नहीं चल सका है)।



अभी कुछ दिनों पहले केरल के मलप्पुरम जिले में जहरीली ताड़ी पीने से अब तक 26 लोगों की मौत हो चुकी है, और कुछ अंधे भी हुए हैं। वही राज्य, वही मुख्यमंत्री… लेकिन जहरीली शराब पीकर मरने वालों को "माननीय" ने 5 लाख रुपये प्रति व्यक्ति के मुआवज़े की घोषणा की है, जबकि अंधे होने वालों को 4 लाख रुपये एवं अन्य को एक लाख रुपये का मुआवज़ा देने की घोषणा की है। इसी के साथ सभी प्रभावितों का इलाज़ केरल सरकार के खर्च पर होगा।



अब आप ही सोचिये कि देशसेवा करते हुए शहीद होना ज्यादा फ़ायदे का सौदा है या जहरीली शराब पीकर मरना? यदि देशसेवा करते शहीद हुए, तो बूढ़े माता-पिता को सरकारी बाबुओं के धक्के खाने पड़ेंगे, मानो किसी मक्कार किस्म के मंत्री ने पेट्रोल पम्प देने की घोषणा कर भी दी तो वह इतनी आसानी से मिलने वाला नहीं है, जबकि पेंशन लेने के लिये भी दिल्ली के 10-15 चक्कर खाने पड़ेंगे सो अलग (हाल ही में खबर मिली है कि एक वीरता पदक प्राप्त सैनिक की विधवा को 70 रुपये… जी हाँ 70 रुपये मासिक, की पेंशन मिल रही है… सिर्फ़ 5 साल के लिये संसद में हल्ला मचाने के एवज़ में हजारों की पेंशन और सुविधाएं लेने वाले बतायें कि क्या 70 रुपये में वह विधवा एक किलो दाल भी खरीद सकेगी?)। इसकी बजाय परिवार के दो सदस्य जहरीली शराब पीकर मरें, तो दस लाख लो और मजे करो…

अब अच्युतानन्दन जी की इस "विलक्षण" सोच के पीछे की वजहों को समझने की कोशिश करते हैं। मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के माता-पिता को 3 लाख रुपये देने की घोषणा शायद इसलिये की होगी, कि उनका धकियाकर घर से बाहर किया जाना मीडिया की सुर्खियाँ बन चुका था, वरना शायद 3 लाख भी न देते, जबकि जहरीली शराब पीने वाले लोग पिछड़ी जातियों के "वोट बैंक" हैं इसलिये उन्हें 5 लाख दे दिये, वैसे भी उनकी जेब से क्या जाता है?

अब एक आश्चर्यजनक तथ्य भी जान लीजिये, जैसा कि सभी जानते हैं केरल देश का सर्वाधिक साक्षर प्रदेश है (साक्षरता दर लगभग 93% है), यही सबसे साक्षर प्रदेश आज की तारीख में सबसे बड़ा "बेवड़ा प्रदेश" बन चुका है। केरल में प्रति व्यक्ति शराब की खपत 8.3 लीटर हो चुकी है, अर्थात अमेरिका के बराबर और पोलैण्ड (8.1 लीटर) और इटली (8.0 लीटर) से भी अधिक (जबकि पंजाब का नम्बर दूसरा है - प्रति व्यक्ति खपत 7.9 लीटर)। पिछले साल केरल सरकार ने शराब पर टैक्स से 5040 करोड़ रुपये कमाए हैं, और यदि इस साल की पहली तिमाही के आँकड़ों को देखा जाये तो इस वर्ष लगभग 6500 करोड़ रुपये शराब से केरल सरकार को मिलने की सम्भावना है। यदि कोई व्यक्ति 100 रुपये की शराब खरीदता है तो लगभग 80 रुपये केरल सरकार की जेब में जाते हैं, 18 रुपये शराब निर्माता को और बाकी के 2 रुपये अन्य खर्चों के, यानी औसतन केरल का प्रत्येक व्यक्ति साल भर में 1340 रुपये की शराब पी जाता है… (कौन कहता है कि साक्षरता अच्छी बात होती है…?)।

लेकिन असली पेंच यहीं पर है… सोचिये कि जब आधिकारिक रुप से प्रतिवर्ष केरल सरकार को 5000 करोड़ रुपये मिल रहे हैं तो अनाधिकृत तरीके से नकली, जहरीली और अवैध शराब बेचने पर गिरोहबाजों को कितना मिलता होगा। मिथाइल अल्कोहल मिली हुई नकली और जहरीली शराब के रैकेट पर माकपा और कांग्रेस के कैडर का पूरा कब्जा है। अवैध शराब और ताड़ी की बिक्री से मिलने वाला करोड़ों रुपया जो शराब निर्माता की जेब में जाता है (राज्य सरकार को प्रति 100 रुपये की बिक्री पर मिलने वाले 80 रुपये), उसमें से एक मोटा टुकड़ा माकपा कैडर और नेताओं के पास पहुँचता है। कांग्रेस और वामपंथी दोनों पार्टियाँ मिलीभगत से अपना बँटवारा करती हैं, क्योंकि यही दोनों अदला-बदली करके केरल में सत्ता में आती रही हैं। कई बार, कई मौकों पर जहरीली शराब दुर्घटनाओं के बाद जाँच आयोग वगैरह की नौटंकी होती है, परन्तु फ़िर मामला ठण्डा पड़ जाता है। दारुकुट्टे और उनके परिजन मुआवज़ा लेकर चुप बैठ जाते हैं…

ऐसे में इस बार जहरीली शराब पीकर मरे हुए 26 लोगों के परिवार को 5 लाख रुपये देकर उनका मुँह बन्द करने की कोशिश की गई है, ताकि वे ज्यादा हल्ला न मचायें। (उल्लेखनीय है कि दुर्घटना के पहले दिन मुआवज़ा 1 लाख ही घोषित किया गया था, लेकिन जैसे ही हल्ला-गुल्ला अधिक बढ़ा, जाँच आयोग वगैरह की माँग होने लगी… तो अच्युतानन्दन ने इसे बढ़ाकर सीधे 5 लाख कर दिया…)

तात्पर्य यह कि शहीद संदीप उन्नीकृष्णन को 3 लाख रुपये का मुआवज़ा भले ही मजबूरी में दिया गया हो, लेकिन शराब से हुई इन 26 मौतों को 5 लाख रुपये का मुआवज़ा देना बहुत जरूरी था…वरना पोल खुलने का खतरा था। अब भले ही शहीद का मान और देश का सम्मान वगैरह जाये भाड़ में…
(सन्दर्भ : http://www.hindu.com/2010/09/09/stories/2010090958070400.htm)

हालांकि वर्तमान मामला "शहीद" और "बेवड़ों" के बीच मुआवज़े की तुलना का है, लेकिन कांग्रेसियों और वामपंथियों द्वारा मृतकों को मुआवज़े बाँटने में भी "सेकुलरिज़्म" का ध्यान रखा जाता है इसके दो उदाहरण हम पहले भी देख चुके हैं… यदि भूल गये हों तो याद ताज़ा कर लीजिये -

1) 17 अक्टूबर 2009 को कासरगौड़ जिले की ईरुथुंकादवु नदी में डुब जाने से चार बच्चों की मौत हो गई, जिनके नाम थे अजीत(12), अजीश(15), रतन कुमार(15) और अभिलाष(17), जो कि नीरचल के माहजन स्कूल के छात्र थे।

2) 3 नवम्बर 2009 को त्रिवेन्द्रम के अम्बूरी स्थित नेय्यर नदी में एक छात्र की डूब जाने की वजह से मौत हुई, जिसका नाम था साजो थॉमस(10)।

3) 4 नवम्बर 2009 को मलप्पुरम के अरीकोड में चेलियार नदी में आठ बच्चों की डूबने से मौत हुई, नाम हैं सिराजुद्दीन, तौफ़ीक, शमीम, सुहैल, शहाबुद्दीन, मोहम्मद मुश्ताक, तोइबा और शाहिद।

अर्थात केरल में एक माह के अन्तराल में 13 बच्चों की मौत एक जैसी वजह से हुई, ज़ाहिर सी बात है कि राज्य सरकार द्वारा मुआवज़े की घोषणा की गई, लेकिन त्रिवेन्द्रम और मलप्पुरम के हादसे में मारे गये बच्चों के परिजनों को 5-5 लाख का मुआवज़ा दिया गया, जबकि कासरगौड़ जिले के बच्चों के परिजनों को 1-1 लाख का… ऐसा क्यों हुआ, यह समझने के लिये अधिक दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है… (यहाँ पढ़ें…

इससे पहले भी पिछले साल एक पोस्ट में ऐसी ही ओछी और घटिया "सेकुलर" राजनीति पर एक माइक्रो पोस्ट लिखी थी (यहाँ देखें…) जिसमें बताया गया था कि समझौता एक्सप्रेस बम विस्फ़ोट में मारे गये प्रत्येक पाकिस्तानी नागरिक को दस-दस लाख रुपये दिये गये (सम्मानित-प्यारे-छोटे भाई टाइप के पड़ोसी हैं… इसलिये), जबकि इधर मालेगाँव बम विस्फ़ोट में मारे गये प्रत्येक मुसलमान को पाँच-पाँच लाख रुपये दिये गये, लेकिन अमरावती के दंगों में लगभग 75 करोड़ के नुकसान के लिये 137 हिन्दुओं को दिये गये कुल 20 लाख। धर्मनिरपेक्षता ऐसी ही होती है भैया…जो मौत-मौत में भी फ़र्क कर लेती है।

इसी प्रकार की धर्मनिरपेक्षता का घण्टा गले में लटकाये कई बुद्धिजीवी देश में घूमते रहते हैं… कभी नरेन्द्र मोदी को भाषण पिलाते हैं तो कभी हिन्दुत्ववादियों को नसीहतें झाड़ते हैं… लेकिन कभी खुद का वीभत्स चेहरा आईने में नहीं देखते…। काश, शहीद मेजर संदीप की एकाध गोली, कसाब के सीने को भी चीर जाती तो कम से कम हमारे टैक्स के करोड़ों रुपये बच गये होते… जो उसे पालने-पोसने में खर्च हो रहे हैं। टैक्स के इन्हीं पैसों को अपने "पूज्य पिता" का माल समझकर, नेता लोग इधर-उधर मुआवज़े बाँटते फ़िरते हैं… जबकि शहीद सैनिकों के बूढ़े माँ-बाप, विधवा और बच्चे धक्के खाते रहते हैं…


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31 comments:

उम्दा सोच said...

अब कुछ विकल्प नहीं है देशप्रेमियो को संगठित होना ही होगा ! सोचना होगा हम मिलकर कुछ सकारात्मक कर सकते है क्या ???

संजय बेंगाणी said...

जब सरकार ही नागरिकों को शराब पिलाएगी तो....


और कहने को कुछ है नहीं...

सुलभ § Sulabh said...

नेता लोग ही जहरीले शराब का व्यापार करते है.... मतलब ये मौत के सौदागर हैं.
वीरों को मुआवजा देना सिर्फ एक रस्मनिभाई है कि देश उन्हें याद रखता आया है.

बाकी सेकुलरों की चाल पर क्या कहूँ :( :(

अन्तर सोहिल said...

%^*^(*&)

मुझे तो ठीक से गाली देना भी नहीं आता और किसको दूं। खुद को, इन अच्युतानंदनों को या इन्हें वोट देने वाली जनता को।
हमतो बस आपको पढ लेते हैं। कुछ बातें जो मीडिया छुपाता है जान जाते हैं, दोस्तों में, रेल में जिक्र करते हैं और भूल जाते हैं।

प्रणाम स्वीकार करें

दिवाकर मणि said...

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अब क्या कहें...सारा कुछ तो आपके आलेख में शीशे की तरह साफ दिखाई दे रहा है.

वैसे काहे को परेशान होना?? देश और उसके संसाधनों पर पहला हक तो इन्ही अल्पसंख्यकों का है ना, आखिर कुछ इज्जत MMS को उनकी बातों को मिलना चाहिए कि नहीं??

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हिंदुत्व और राष्ट्रवाद said...

कितना घोर "कलियुग" आ गया है सुरेशजी, जो देश के लिए जान देते है उनको और उनके परिवार की सुध लेने वाला कोई नहीं है. न मंत्री न संत्री. और ये वामपंथ अब भारत के लिए एक बिमारी और नासूर बन चूका है ये लोग चीन की दलाली करते करते खुद अपने देश अपनी मातृभूमि की दलाली करने लगे है.
इन जैसे सेक्युलर लोगों की वजह से अब तो सेना में भी असंतोष फ़ैल रहा है. और वो दिन दूर नहीं जब कोई सैनिक ही इन सेक्युलर गद्दारों को उनकी असली औकात बताएगा. वो यह क्यूँ भूल रहे है " जो जान दे सकता है वो जान ले भी सकता है"
.
राजेंद्र जांगिड-
हिंदुत्व और राष्ट्रवाद

सागर नाहर said...

आप जानते हैं परमवीर चक्र विजेता कैप्टन बाना सिंह को कितनी पेंशन मिलती है?
आपको यह जानकर आश्‍चर्य होगा कि इस बहादुर नायक को मात्र 166/- पेंशन मिलती है।
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/2595769.cms?prtpage=1

रंजना said...

क्या कहें...

RAJENDRA said...

जितनी जानकारी आप देते हैं उससे भी देश की नींद नहीं खुलती सेकुलर मन्त्र मार कर कान्ग्रेस सत्ता हड़प लेतीहै भाजपा भी लगता है इस नशे को ललचाई नजर से देखती है और पार्टियों की क्या बिसात जन आन्दोलन ही एकमात्र रास्ता है

ajit gupta said...

असल में तो शराब पीकर मरने वालों पर जुर्माना लगना चाहिए। लेकिन बेवड़ी सरकारें बेवड़ों का ही पक्ष लेती है।

abhishek1502 said...

ऐसे सेकुलर लोग जो मौत में भी फर्क करते है जूते मार मार कर गधे पर बैठा कर (म़ू काला करना न भूले ) ,चप्पलो की माला पहना कर सड़े अंडे और टमाटर से उन की विदाई इस देश से कर दे

DEEPAK BABA said...

दद्दा राम राम

आपको याद होगा की मार्च-अप्रैल में एक हवाई जहाज कि दुर्घटना हुई थी - और मृतकों को १०-१५ लाख मिले थे............. मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा मार्च या अप्रैल - बेंगलोर या कहीं और दक्षिण में और मुवावजा भी नहीं १० लाख या फिर १५ लाख. किन्तु एक चीज़ है - उस समय भी मेरे दिमाग में यही प्रशन उभर रहे थे - क्या उनको मात्र इसलिए मुवावजा ज्यादा मिला कि उनके पास एयर टिकट थे........


सरकार को सोचना चाहिए. देश बचा है तो मात्र सेना से. अगर सेना न हो तो इन लोगों की हरकत से हम तबाह हो जाएँ.

man said...

वन्देमातरम श्री मान ,
तथ्य परख लाल बंदरो और सफ़ेद पोशो के पेय्जामे का नाडा खोलता लेख | शर्म आती हे सर की रीढ़ विहीन जनता और रीढ़ विहीन लीडरो के बीच रहने में |साले मास के लोथड़े ,भारत माता के नाम पर कलंक हे | जनता इसी लायक हे की जब अंग्रेज कहा करते थे की जब तक पिछवाड़े पर पपंड नहीं पड़े ,तब तक ये सही नहीं चलते हे ?रही बात अ चुतानान्दियो की तो सालो का हिसाब किताब सब हे वंहा ,कुतो की जूण{योनी} भी नसीब नहीं होगी ?

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

शर्म शर्मनाक ............. लेकिन यह लेनिन, माओ के कुत्ते ( इन्हे यही भाषा समझ आती है )ना सुधरे है और ना सुधरेंगे

VICHAAR SHOONYA said...

सुरेश जी आपके लेखों पर टिप्पणी करना बहुत मुश्किल होता है. पहले तो ये कि आप जो भी खबर लाते हैं वो हिला देने वाली होती है. मन मष्तिष्क टिप्पणी देने लायक ही नहीं रहता और दूसरा ये कि आपके लेख इतने सम्पूर्ण होते हैं कि कुछ और कहना मुनासिब ही नहीं लगता.

बस मुझे ब्लॉग जगत के इन बुद्धिजीवी लोगों से शिकायत है कि वो बेकार कि पोस्टों पर जाकर तो खूब वाह वही कर आते हैं और जाने क्यों यहाँ उस अनुपात में उनकी सहमती नहीं दिखती.

यार अगर ब्लॉगर सही लिख रहा है तो सही कहो और नहीं लिख रहा है तो विरोध करो. चुप क्यों रहते हो ?

गौतम राजरिशी said...

क्या कहा जाये सुरेश जी अब इस पर....

Mahak said...

नरेंद्र मोदी जी का असली चेहरा दिखाने का दावा करने वाले मीडिया को इस अच्युतनंदन का असली चेहरा दिखाने में सांप क्यों सूंघ जाता है ??

हमें तो शुक्र मनाना चाहिए की सिर्फ दो राज्यों को छोड़कर इन घटिया वामपंथियों की सरकार बनाने की दाल कहीं ओर नहीं गली ,वरना आज केरल ओर बंगाल की जो दुर्दशा हो रही है वही हमारी होती

सुरेश जी ,आपका आभार इनका असली चेहरा दिखाने के लिए

महक

Bhavesh (भावेश ) said...

जब देश की बुनियादे ही गलत नीव पर रखी गई हो तो फिर उस से अच्छे फल की उम्मीद करना बेमानी है. वोट की राजनीति हर राज्य में अपने तरीके से चल रही है. कही शराबी लोगो को पैसे देकर, कही दलित के नाम पर मूर्तियां बनवा कर, पर तो कही मुस्लिम कार्ड खेल कर.
हमारी सरकार कितनी काबिल है ये कोमनवे़ल्थ खेल के रोज पढ़ रहे समाचारों से पता चल ही जाता है. हम लोगो की याददाश्त बहुत कमजोर है. हम भूल जाते है कि ये वो सरकार है जिसने देश को आज से करीब बीस साल पहले दिवालिया घोषित करवाने की नौबत पर ला दिया था और इसी वजह से मजबूरन सर्कार को अपनी आर्थिक नीतियों में परिवर्तन करना पड़ा. आज जो कुछ भी देश ने हासिल किया है वो प्राइवेट सेक्टर की दें है सरकार ने तो हमेशा देश को गर्त में ही धकेला है. जय हो ऐसी सरकारों को वोट देने वाले मतदाता.

बी एस पाबला said...

ऐसे ही मौकों पर मुझे व्यंग्यात्मक तरीके से कहना पड़ता है -आओ विलाप करें!

धिक्कार है हम नपुंसक नागरिकों पर

kaverpal said...

Dear suresh ji namaskar.aap ne jo yeh lekh likha hai iske bare me ,pahle aap yeh socho ki saheed ke maa baap jaiso ki tadad thodi hai,s aur sharab pi kar marne walo ki tadad jyada hai.achutanand jaise kutte vote ki khatir kisko jyada fayda karenge aap ne yeh nahin socha. vote ke liye to yeh haramjade apne riste naton ko bhi nahin pahchnte ki maa aur bahin me kya antar hai

शिवम् मिश्रा said...


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

{-Bhagat singh-} said...

वामपंथियो की तो £$§€€;-);-(........
केरल मे साक्षरता दर 93% होने के बाद भी अगर ऐसे चिरकुट नेता गद्दी पर बैठे हो.
तो इसका मतलब कि केरल की जनता पढ़ी लिखी "पप्पू" है

ऐसी 'पप्पू' टाइप की जनता के कारण ही पूरा देश गढढे मे जा रहा है.

Gourav Agrawal said...

@सुरेश जी आपके लेखों पर टिप्पणी करना बहुत मुश्किल होता है. पहले तो ये कि आप जो भी खबर लाते हैं वो हिला देने वाली होती है. मन मष्तिष्क टिप्पणी देने लायक ही नहीं रहता और दूसरा ये कि आपके लेख इतने सम्पूर्ण होते हैं कि कुछ और कहना मुनासिब ही नहीं लगता.

विचारी जी से सहमत

आनंद जी.शर्मा said...

इस पूरे लेख में मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा जिसे पढ़ कर सिक-यू-लायरों कि जमात को किसी भी प्रकार की शर्म आये |
ना ही इस लेख में मुझे कुछ ऐसा लगा जिस पर उन्हें गाली दी जाय |
वे तो अपने मत पंथ सम्प्रदाय के उसूलों पर एकदम चुस्त हैं |
वे जो भी कर रहें हैं वह उनके मत पंथ सम्प्रदाय की मौलिक शिक्षाओं पर आधारित है |
मैं तो उन्हें १०० में से १०० नंबर दूंगा - क्योंकि उसूलों पर कायम रहना बहुत मुश्किल है |
यदि इस देश के हिन्दुओं से अपना घर नहीं संभलता है तो इसके लिए कोई भी विदेशी आक्रमणकारी कतई जिम्मेदार नहीं है |

sanjay said...

@सुरेश जी आपके लेखों पर टिप्पणी करना बहुत मुश्किल होता है. पहले तो ये कि आप जो भी खबर लाते हैं वो हिला देने वाली होती है. मन मष्तिष्क टिप्पणी देने लायक ही नहीं रहता और दूसरा ये कि आपके लेख इतने सम्पूर्ण होते हैं कि कुछ और कहना मुनासिब ही नहीं लगता.

gourav ji se sahmat.

pranam

अवधेश पाण्डेय said...

हिन्दू पतन के रास्ते पर आगे बढ रहे है, जिसे अपने स्वाभिमान की चिन्ता नही उनका क्या करे.
आईना दिखाने के लिये धन्यवाद.

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

सुरेश जी अब तो शर्म भी आनी बंद हो गयी है इस शर्मनिर्पेक्शियों पर, इनसे और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? महक जी की बात से बिलकुल सहमत हूँ कि मोदी के पीछे पड़े मीडिया वाले अचुतानंद के समय कहाँ सो रहे थे? पता नहीं कब तक ये नंगा नाच चलता रहेगा? पता नहीं देश का हिन्दू कब जागेगा, कब एकजुट होगा? शायद इन कलियुगी दानवों का सर्वनाश करने के लिये भगवान् विष्णू को ही कोई अवतार लेना पड़ेगा...अब बस उसी से आशा है, इन कांग्रेसियों और वामपंथियों के भरोसे तो अब जीवन भी संभव नहीं है.
सत्य से अवगत करवाने कके लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद सुरेश जी...

krishna kumar soni said...

देश के सबसे साक्षर प्रदेश के माननीय मुख्यमन्त्री जी की सोच निराक्षरों से भी गई बिती है एवं यह वोट कि राजनीति से प्रेरित है.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

सिकुलर सारे हिन्दुओं को मुस्लिम बनाकर ही मानेंगे.

JANARDAN MISHRA said...

KAYA MANTRIJI KO DESBHAKT SE JYADA DARUPINE WALOSE PREM HAI.......

आनंद जी.शर्मा said...

विश्व के एकमात्र सिक्यूलर देश में शराब पीना सिक्युलरिज्म है क्योंकि शराब बनाने वाले - पीने और पिलाने वाले किसी भी जात पात - मत पंथ सम्प्रदाय - मित्र देश या दुश्मन देश का भेद अपने मन में नहीं रख कर विश्व बंधुत्व की भावना से शराब का सेवन करते हैं |

इतनी पवित्र भावना भला भारत भूमि की रक्षा करने वाले सैनिक के मन में कैसे आ सकती है ? क्योंकि भारत भूमि की रक्षा करने वाला सैनिक तो सर्वथा कौम्यूनल है |

यह तो सर्व विदित है कि भारत मूलतः एक सनातन धर्मी देश है एवं सनातन धर्म के सिद्धांत सिक्युलरिज्म के विपरीत हैं - अतः भारत भूमि की रक्षा करने वाले सैनिक को तो सिक्युलरिज्म के सिद्धांत के अनुरूप दुश्मन के लिए "Cannon Fodder" बनना ही पड़ेगा | यदि सैनिक भारत भूमि की रक्षा के लिए प्राण न्योंछावर करता है तो सिक्युलरिज्म के सिद्धांत के अनुरूप वह सिक्यूलर मीडिया में केवल एक संख्या के रूप में उद्धृत होने का सन्मान पाने का हक़दार है - एवं उसकी विधवा पत्नी झूठे आश्वासनों अथवा १००-२०० रुपल्ली की हक़दार है |

इस से अधिक आप लोग आखिर क्या और क्यों चाहते हो इस सिक्युलरिज्म से ?

सिक्युलरिज्म में रहना है तो शराब पी कर प्राणोत्सर्ग कर के अपने परिवार के लिए ५-१० लाख रुपयों का इंतजाम कर जाना श्रेयस्कर है - बजाय सैनिक बन कर देश की रक्षा में प्राण गवाने की बेवकूफी करना |