Wednesday, September 22, 2010

वुई आर शेमफ़ुल, वुई आर शेमफ़ुल… कहता, घिघियाता-मिमियाता हुआ सर्वदलीय प्रतिनिधिमण्डल… All Party Delegation in Kashmir, Kashmir Issue

दिल्ली में सम्पन्न हुई सर्वदलीय बैठक के बेनतीजा रहने के बाद मनमोहन सिंह, सोनिया गाँधी, अब्दुल्ला पिता-पुत्र तथा "सेकुलर देशद्रोही मीडिया" के दबाव में एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमण्डल ने कश्मीर जाकर सभी पक्षों से बात करने का फ़ैसला किया था। 20 सितम्बर को यह सर्वदलीय प्रतिनिधिमण्डल श्रीनगर में अवतरित हुआ। इस प्रतिनिधिमण्डल के स्वागत में पलक-पाँवड़े बिछाते हुए, अली शाह गिलानी ने इनसे बात करने से ही मना कर दिया और महबूबा मुफ़्ती की पार्टी PDP ने इनका बहिष्कार कर दिया। इधर के लोग भी कम नहीं थे, प्रतिनिधिमण्डल की इस फ़ौज में चुन-चुनकर ऐसे लोग भरे गए जो मुस्लिम वोटों के सौदागर रहे, एक चेहरा तो ऐसा भी था जिनके परिवार का इतिहास जेहाद और हिन्दू-विरोध से भरा पड़ा है। इस तथाकथित "मरहम-टीम" का शान्ति से कोई लेना-देना नहीं था, ये लोग विशुद्ध रुप से अपने-अपने क्षेत्र के मुस्लिम वोटों की खातिर आये थे, इस प्रतिनिधिमण्डल में जाने वालों के चुनाव का कोई पैमाना भी नहीं था।


महबूबा मुफ़्ती और लोन-गिलानी के अलगाववादी तेवर कोई नई बात नहीं है, इसलिये इसमें कोई खास आश्चर्य की बात भी नहीं है, आश्चर्य की बात तो यह थी कि प्रतिनिधिमंडल में गये हुए नेताओं की मुखमुद्रा, भावभंगिमा और बोली ऐसी थी, मानो भारत ने कश्मीर में बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो। शुरु से आखिर तक अपराधीभाव से गिड़गिड़ाते नज़र आये सभी के सभी। मुझे अभी तक समझ नहीं आया कि अरुण जेटली और सुषमा स्वराज जैसे लोग इस प्रतिनिधिमण्डल में शामिल हुए ही क्यों? रामविलास पासवान और गुरुदास दासगुप्ता  जैसे नेताओं की नज़र विशुद्ध रुप से बिहार और पश्चिम बंगाल के आगामी चुनावों के मुस्लिम वोटों पर थी। यह लोग गये तो थे भारत के सर्वदलीय प्रतिनिधिमण्डल के रुप में, लेकिन उधर जाकर भी मुस्लिम वोटरों को लुभाने वाली भाषा से बाज नहीं आये। जहाँ एक ओर रामविलास पासवान के "नेतृत्व"(?) में एक दल ने यासीन मलिक के घर जाकर मुलाकात की, वहीं दूसरी तरफ़ दासगुप्ता ने मीरवायज़ के घर जाकर उनसे "बातचीत"(?) की। यासीन मलिक हों, अली शाह गिलानी हों या कथित उदारवादी मीरवायज़ हों, सभी के सभी लगभग एक ही सुर में बोल रहे थे जिसका मोटा और स्पष्ट मतलब था "कश्मीर की आज़ादी", यह राग तो वे कई साल से अलाप ही रहे हैं, लेकिन दिल्ली से गये वामपंथी नेता गुरुदास दासगुप्त और पासवान अपनी मुस्लिम भावनाओं को पुचकारने वाली गोटियाँ फ़िट करने के चक्कर में लगे रहे।


चैनलों पर हमने कांग्रेस के शाहिद सिद्दीकी और वामपंथी गुरुदास दासगुप्ता के साथ मीरवायज़ की बात सुनी और देखी। मीरवायज़ लगातार इन दोनों महानुभावों को कश्मीर में मारे गये नौजवानों के चित्र दिखा-दिखाकर डाँट पिलाते रहे, जबकि गुरुदास जैसे वरिष्ठ नेता "वुई आर शेमफ़ुल फ़ॉर दिस…", "वुई आर शेमफ़ुल फ़ॉर दिस…" कहकर घिघियाते-मिमियाते रहे। मीरवायज़ का घर हो या गिलानी का अथवा यासीन मलिक का, वहाँ मौजूद इस सेकुलर प्रतिनिधिमण्डल के एक भी सदस्य की हिम्मत नहीं हुई कि वह यह पूछे कि कश्मीर से जब हिन्दू खदेड़े जा रहे थे, तब ये सब लोग कहाँ थे? क्या कर रहे थे? आतंकवादियों और हत्यारों से अस्पताल जा-जाकर मुलाकातें की गईं, पत्थरबाजों से सहानुभूति दर्शाई गई, पासवान ने बिहार के चुनाव और गुरुदास ने बंगाल के चुनाव के मद्देनज़र आज़ाद कश्मीर की माँग करने वाले सभी को जमकर तेल लगाया… लेकिन किसी ने भी नारकीय परिस्थिति में रह रहे जम्मू के पण्डितों और हिन्दुओं के ज़ख्मों के बारे में एक शब्द नहीं कहा… किसी भी नेता(?) में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह उन आतंकवादियों से पूछे कि धारा 370 खत्म क्यों न की जाये? मुफ़्त की खाने के लिये अरबों का पैकेज चाहिये तो हिन्दुओं को फ़िर से घाटी में बसाने के लिये उनकी क्या योजना है? कुछ भी नहीं… एक शब्द भी नहीं… क्योंकि कश्मीर में पिटने वाला हिन्दू है, मरने-कटने वाला अपना घर-बार लुटाकर भागने वाला हिन्दू है… ऐसे किसी प्रतिनिधिमण्डल का हिस्सा बनकर जेटली और सुषमा को जरा भी शर्म नहीं आई? उन्होंने इसका बहिष्कार क्यों नहीं किया? जब कश्मीर से हिन्दू भगाये जा रहे थे, तब तो गुरुदास ने कभी नहीं कहा कि "वुई आर शेमफ़ुल…"?

"पनुन कश्मीर" संगठन के कार्यकर्ताओं को बैठक स्थल से खदेड़ दिया गया, इसके नेताओं से जम्मू क्षेत्र को अलग करने, पण्डितों के लिये एक होमलैण्ड बनाने, पर्याप्त मुआवज़ा देने, दिल्ली के शरणार्थी बस्तियों में मूलभूत सुविधाओं को सुधारने जैसे मुद्दों पर कोई बात तक नहीं की गई, उन्हें चर्चा के लिये बुलाया तक नहीं। इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है कि 1947 में पाकिस्तान से भागकर भारत आये हुए सैकड़ों लोगों को अभी तक भारत की नागरिकता नहीं मिल सकी है, जबकि पश्चिम बंगाल में लाखों घुसपैठिये बाकायदा सारी सरकारी सुविधाएं भोग रहे हैं… कभी गुरुदास ने "वुई आर शेमफ़ुल…" नहीं कहा।




वामपंथियों और सेकुलरों से तो कोई उम्मीद है भी नहीं, क्योंकि ये लोग तो सिर्फ़ फ़िलीस्तीन और ईराक में मारे जा रहे "बेकसूरों"(?) के पक्ष में ही आवाज़ उठाते हैं, हिन्दुओं के पक्ष में आवाज़ उठाते समय इन्हें मार्क्स के तमाम सिद्धान्त याद आ जाते हैं, लेकिन जेटली और सुषमा से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि ये लोग पासवान जैसे व्यक्ति (जो खुलेआम घुसपैठिए बांग्लादेशियों की पैरवी करता हो) के साथ खड़े होकर तस्वीर खिंचवाएं, या फ़िर असदुद्दीन ओवैसी जैसे घोर साम्प्रदायिक हैदराबादी (जिनका इतिहास हिन्दुओं के साथ खूंरेज़ी भरा है) के साथ हें-हें-हें-हें करते हुए एक "मक्खनमार बैण्ड" में शामिल होकर फ़ोटो खिंचवायें…। लानत है इन पर… अपने "मूल" स्टैण्ड से हटकर "शर्मनिरपेक्ष" बनने की कोशिश के चलते ही भाजपा की ऐसी दुर्गति हुई है लेकिन अब भी ये लोग समझ नहीं रहे। जब नरेन्द्र मोदी के साथ दिखाई देने में, फ़ोटो खिंचवाने में देशद्रोही सेकुलरों को "शर्म"(?) आती है, तो फ़िर भाजपा के नेता क्यों ओवैसी-पासवान और सज्जन कुमार जैसों के साथ खड़े होने को तैयार हो जाते हैं? इनकी बजाय तो कश्मीर की स्थानीय कांग्रेस इकाई ने खुलेआम हिम्मत दिखाई और मांग की कि सबसे पहले इन अलगाववादी नेताओं को तिहाड़ भेजा जाए… लेकिन सेकुलर प्रतिनिधिमण्डल के किसी सदस्य ने कुछ नहीं कहा।

अब एक सवाल भाजपा के नेताओं से (क्योंकि सेकुलरों-कांग्रेसियों-वामपंथियों और देशद्रोहियों से सवाल पूछने का कोई मतलब नहीं है), सवाल काल्पनिक है लेकिन मौजूं है कि - यदि कश्मीर से भगाये गये, मारे गये लोग "मुसलमान" होते तो? तब क्या होता? सोचिये ज़रा… तीस्ता जावेद सीतलवाड कितने फ़र्जी मुकदमे लगाती? कांग्रेसी और वामपंथी जो फ़िलीस्तीन को लेकर छाती कूटते हैं वे कश्मीर से भगाये गये मुस्लिमों के लिये कितने मातम-गीत गाते? यही है भारत की "धर्मनिरपेक्षता"…

जो लोग कश्मीर की समस्या को राजनैतिक या आर्थिक मानते हैं वे निरे बेवकूफ़ हैं… यह समस्या विशुद्ध रुप से धार्मिक है… यदि भारत सरकार गिलानी-लोन-शब्बीर-महबूबा-यासीन जैसों को आसमान से तारे तोड़कर भी ला देगी, तब भी कश्मीर समस्या जस की तस बनी रहेगी… सीधी सी बात है कि एक बहुसंख्यक (लगभग 100%) मुस्लिम इलाका कभी भी भारत के साथ नहीं रह सकता, न खुद चैन से रहेगा, न भारत को रहने देगा… निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा (अल्लाह के शासन) से कुछ भी कम उन्हें कभी मंजूर नहीं होगा, चाहे जितने पैकेज दे दो, चाहे जितने प्रोजेक्ट दे दो…।

इस आग में घी डालने के लिये अब जमीयत उलेमा-ए-हिन्द (JUH) ने भी तैयारी शुरु कर दी है। जमीयत ने अगले माह देवबन्द में मुस्लिमों के कई समूहों और संगठनों की एक बैठक बुलाई है, जिसमें कश्मीर में चल रही हिंसा और समग्र स्थिति पर विचार करने की योजना है। JUH  की योजना है कि भारत के तमाम प्रमुख मुस्लिम संगठन एक प्रतिनिधिमण्डल लेकर घाटी जायें… हालांकि जमीयत की इस योजना का आन्तरिक विरोध भी शुरु हो गया है, क्योंकि ऐसे किसी भी कदम से कश्मीर समस्या को खुल्लमखुल्ला "मुस्लिम समस्या" के तौर पर देखा जाने लगेगा। 4 अक्टूबर को देवबन्द में जमीयत द्वारा सभी प्रमुख शिया, सुन्नी, देवबन्दी, बरेलवी संगठनों के 10000 नुमाइन्दों को बैठक के लिये आमंत्रित किया गया है। क्या "जमीयत" इस सम्मेलन के जरिये कश्मीर समस्या को "मुस्लिम नरसंहार" के रुप में पेश करना चाहती है? लगता तो ऐसा ही है, क्योंकि जमीयत के प्रवक्ता फ़ारुकी के बयान में कहा गया है कि "कश्मीर में हालात बेहद खराब हैं, वहाँ के "मुसलमान" (जी हाँ, सिर्फ़ मुसलमान ही कहा उन्होंने) कई प्रकार की समस्याएं झेल रहे हैं, ऐसे में मुस्लिम समुदाय मूक दर्शक बनकर नहीं रह सकता…", अब वामपंथियों और कांग्रेसियों को कौन समझाये कि ऐसा बयान भी "साम्प्रदायिकता" की श्रेणी में ही आता है और जमीयत का ऐसा कदम बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। सम्मेलन में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमात-ए-इस्लामी, ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशवारत तथा ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल जैसे कई संगठनों के भाग लेने की उम्मीद है। भगवान (या अल्लाह) जाने, कश्मीर के "फ़टे में टाँग अड़ाने" की इन्हें क्या जरुरत पड़ गई? और जब पड़ ही गई है तो उम्मीद की जानी चाहिये कि देवबन्द के सम्मेलन में माँग की जायेगी की कश्मीर से भगाये गये हिन्दुओं को पुनः घाटी में बसाया जाये और सदभाव बढ़ाने के लिये कश्मीर का मुख्यमंत्री किसी हिन्दू को बनाया जाये… (ए ल्ललो… लिखते-लिखते मैं सपना देखने लगा…)।

सुन रहे हैं, जेटली जी और सुषमा जी? "शर्मनिरपेक्षता" के खेल में शामिल होना बन्द कर दीजिये… ये आपका फ़ील्ड नहीं है… खामख्वाह कपड़े गंदे हो जायेंगे… हाथ कुछ भी नहीं लगेगा…। आधी छोड़, पूरी को धाये, आधी भी जाये और पूरी भी हाथ न आये… वाली स्थिति बन जायेगी…। जब सभी राजनैतिक दल बेशर्मी से अपने-अपने वोट बैंक के लिये काम कर रहे हैं तो आप काहे को ऐसे सर्वदलीय प्रतिनिधिमण्डल में जाकर अपनी भद पिटवाते हैं? क्या कोई मुझे बतायेगा, कि असदुद्दीन ओवैसी  को इसमें किस हैसियत से शामिल किया गया था और औचित्य क्या है? क्या सपा छोड़कर कांग्रेसी बने शाहिद सिद्दीकी इतने बड़े नेता हो गये, कि एक राष्ट्रीय प्रतिनिधिमण्डल में शामिल होने लायक हो गये? सवाल यही है कि चुने जाने का आधार क्या है?

बहरहाल, ऊपर दिया हुआ मेरा प्रश्न भले ही भाजपा वालों से हो, लेकिन "सेकुलर"(?) लोग चाहें तो इसका जवाब दे सकते हैं कि - कल्पना करो, कश्मीर से भगाये गये लोग पण्डितों की बजाय मुस्लिम होते… तब समस्या की, उस पर उठाये गये कदमों की और राजनीतिबाजों की क्या स्थिति होती?


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36 comments:

Anonymous said...

इन शर्मनिर्पेक्षियो की निंदा करना बहुत ज़रूरी है. भारत देश के असल दुश्मन बंगलादेशी या पाकिस्तानी नहीं वरन ये ही लोग हैं. भगवान जाने कब इन $@##&&$@%$$ से छुटकारा मिलेगा. भाजपा को अभी भी समय है कि वो चेत जाये नहीं तो धोबी का कुत्ता न हिन्दुवों का और मुसलमानों का तो है ही नहीं.

हिंदुत्व और राष्ट्रवाद said...

@ सुरेशजी,
जम्मू कश्मीर की समस्या इतनी उलझी नहीं है जितना की इस "कांग्रेस और सेक्युलर" सरकारों ने उलझा के रखा है, इस पर मैंने पहले भी एक लेख लिखा है. इस तरह के अलगाववाद और उग्रवाद से कैसे निपटा जाता है इसे चीन और अफगानिस्तान को देखकर समझा जा सकता है. अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों ने कितने नागरिकों को मारा? क्या उसकी कहीं कोई निंदा हुई? कोई उससे जवाब मांगने वाला भी नहीं है. फिर पता नहीं ये क्यूँ अपने ही देश की रक्षा करने में इन "सेक्युलर और रीढविहीन सरकारों" पिछवाड़े पर पसीना आ जाता है, ..??
इन अलगावादियों में से कई का यह भी मानना है की कश्मीर कभी अलग राष्ट्र बनकर सुरक्षित नहीं रहेगा, उसे 3 तरफ से खतरा हो जायेगा. भारत और पाकिस्तान के अलावा "चीन" भी उसे जीना नहीं देगा.. फिर पता नहीं क्यूँ ये "रीढविहीन सरकारे" कोई कदम नहीं उठती.

दरअसल सुरेशजी बात ये की कांग्रेस और सेक्युलर नहीं चाहते ही कश्मीर की समस्या का समाधान हो.

१. जब भी देश की संसद में कांग्रेस को किसी मुद्दे पर विपक्ष के द्वारा घेरा जाता है तो देश की जनता का ध्यान बांटने के लिए "कश्मीरी अलगावाद" के भूत को आगे कर दिया जाता है, (उदहारण के लिए हर मोर्चे पर विफल कांग्रेस को जब महंगाई और कोमन्वेल्थ में भ्रस्टाचार के मुद्दे पर घेरा गया तभी "कश्मीरी अलगावाद का जिन्न " बहार निकल आया.!. क्यूँ..? और बदले में उन् अलगावादियों के नेताओं को "फाइव स्टार होटलों और रात रंगीन करने" की सुविधा मिलती है.

२. "सेक्युलर और वामपंथियों" के लिए तो ये वोते बैंक की राजनीति खेलने का सुनहरा मौका होता है. ऐसे मौके पर ये "हिन्दुओं को मरवाकर, गालियाँ देकर " अपने आप को इन "कट्ठ्मुल्लों" का सबसे बड़ा वफादार और हमदर्द साबित कर सके.


अब आप ही बताइए ये कश्मीर मुद्दे को क्यूँ सुलझाने देंगे...????
सुरेशजी अच्छा हुआ भाजपा के नेता सुषमा स्वराज और अरुण जेतली साथ गए थे वरना ये लोग पता नहीं वहां क्या "बबूल के बीज" बोकर आते.. हो सकता था की ये "अलगाववादियों को कोई नया "पत्थरफेंकू" पॅकेज देके आ जाते. अच्छा हुआ भाजपा के कुछ नेता साथ गए थे नहीं तो पता नहीं अपने काले समझोतों में क्या-क्या बेच के आते..
राजेंद्र जांगिड -
हिंदुत्व और राष्ट्रवाद -

दिवाकर मणि said...

सुरेश जी, आप भी पता नहीं किन दुमछल्लों से अपेक्षाएं रख रहे हैं? मुस्लिम आतंकियों व आतंकी मानसिकता के लिए किसी भी हद तक बिछ जाने वाला गुरुदास हो या या फिर रामविलास पासवान, या कोई अन्य शर्मनिरपेक्ष....इनको ना देश से मतलब है, ना उसके भविष्य से....इन्हें तो बस कुर्सी चाहिए, चाहे जैसे आए...लेकिन इन दोगलों को पता नहीं कि आज इन्हें जो कुर्सी मिली है, या मिलेगी वो इस लिए कि आज भी देश की अधिकांश जनसंख्या हिन्दू है....इन हरामी नेताओं को यह नहीं दिखाई पड़ता कि आज ये कश्मीर में होते तो ना नेता होते और ना ही एक आम आदमी भी बन कर रह पाते. इन हरामियों को तो ओसामा बिन लादेन जैसा बस एक चेहरा चाहिए, जब प्रेस कांफ्रेस कर रहे हो तो. भगवान जाने, ये अवैध राजनेता इस देश का कितना बेड़ा गर्क करना चाह्ते हैं....प.बंगाल में हिन्दुओं के प्रति मुस्लिम गुंडों का खेला गया खूनी खेल और क्रूर अत्याचार इन हरामियों को नहीं दिखता................

बाकी जेटली और सुषमा जी के बारे में क्या कहें, इन भाजपाइयों पर भी आजकल शर्मनिरपेक्षता का भूत सवार हो गया है, और लगता है कि ये भी कुर्सी की खातिर इन बर्बर-मध्यकालीन सोच वाले मुस्लिम गुंडों के प्रति किसी भी हद तक बिछने को तैयार हैं......

एक बात जो मुझे बहुत से शिक्षित हिन्दू युवाओं में दिखाई दे रही है कि वे आजकल इन मुस्लिम और इसाइयत के षडयंत्र को देखकर बहुत व्यथित रहने लगे हैं....आगे आने वाले दिनों में कहीं शायद, ये भी ईंट का जवाब पत्थर से देने वाला रास्ता न प्रयोग करने लगें... शरमनिरपेक्षता दिखलाने को आज जिस विषबेल को ये हरामी नेता तुष्टिकरण के द्वारा और संवर्धित कर रहे हैं, वो आज ही अपना रूप दिखाने लगा है.....

सम्वेदना के स्वर said...

कितना विवश है आज का भारत ?!

{-Bhagat singh-} said...

मै तो सोचता हूँ कि जब संसद पर आतंकवादी हमला हुआ था .काश उस हमले मे ये कमीने तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेता अल्लाह को प्यारे हो जाते तो कितना अच्छा होता.

क्यो कि देखा जाये तो इस देश की समस्याये कुछ है ही नही.
असली समस्या तो ये सेकुलर नेता है
जिन्होने अपने स्वार्थ के लिये हर छोटी से छोटी समस्या { जो एक मिनट मे सुलझ सकती है } को खीच खीच कर इतना बड़ा कर दिया .

भारत अब इन थकेले और पानी जैसा खून { जिसको अगर गैस पे भी गर्म करो तो भी उबाल न आये} वाले नेताओ को झेलते -2 थक गया है.

अब मुझे ये नही समझ मे आता कि कश्मीर मे उस हरामखोर कुत्ते सैयद गिलानी से बात करने की क्या जरुरत आ पड़ी.
क्या उसकी इतनी औकात भी है कि उससे बात की जाये.

उसको तो पकड़ कर जूते जूते मारना चाहिये.

इन सब समस्याओ का हल इंदिरा गांधी जैसी फौलादी नेता ही कर सकती थी.

और अगर आज की बात करु
तो कश्मीर समस्या का हल कोई गर्म खून वाला युवा नेता ही कर सकता है.

Raj Kumar said...

मजाक कर रहें है, गुरुदास कामत तो पक्के खांटी बेशर्म नेता किस्म के नेता है, इन्हें शर्म कैसे आ सकती है?

Neeraj नीरज نیرج said...

सबकी नज़रे मुस्लिम वोट बैंक पर है क्योंकि हिन्दू महामूढ़ता की दलदल में फंसा हुआ है।
ये सब पढ़ देखकर अब दिल का दुखना भी बंद हो गया। बेहद व्याकुल कर दिया आपके लेख ने।

गौतम राजरिशी said...

क्या कहा जाये सुरेश जी। और कुछ नहीं तो कम-से-कम आपके आलेख तो हैं जो मरहम का काम करते हैं तनिक.....वर्ना यहाँ नाशुक्रों की इस पूरी जमात में एक-एक को धुनने का मन करता है।

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

सुरेश भाई सबसे पहले तो मै यही कहना चाहूँगा कि "WE ARE SHAMEFUL ... जो ऐसे नेताओं का अस्तित्व हमारे देश में है. WE ARE SHAMEFUL ... कि हमने इन जैसे धूर्तों को राजनैतिक सत्ता पर विराजमान किया. WE ARE SHAMEFUL ... जो आज भी धर्मनिरपेक्षता का सही अर्थ हम नहीं समझ सके. WE ARE SHAMEFUL ... जो हम आज भी धर्मनिरपेक्षता को समझना नहीं चाहते. WE ARE SHAMEFUL ... जो कि हमारे ही देश के ८०% हिन्दुओं के धर्मगुरु कहलाने वाले पंडितों को आज अपने घर से दूर दिल्ली की बदबूदार झुग्गियों में अपना जीवन काटना पड़ रहा है. WE ARE SHAMEFUL कि हमारे ही देश पर आक्रमण करने वाले आक्रान्ता बाबर की वकालत आज हमारे ही देश के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष कर रहे हैं. WE ARE SHAMEFUL कि हमारे ही देश के मर्यादा पुरषोत्तम जिनमे हिन्दुओं की अविचल आस्था है आज अपने ही जन्मस्थान पर एक टैन्ट के नीचे बैठे हैं. WE ARE SHAMEFUL कि हमने ही अपने देश को विश्वगुरु के पद से उठा कर इसे एक गटर में बदल दिया. WE ARE SHAMEFUL कि हमारी माँ हिंदी आज अपने ही देश में अपने ही बच्चों द्वारा प्रताड़ित हो रही है और एक विदेशी आंटी (ENGLISH) से हारकर परायों सा जीवन गुजार रही है" और पता नहीं कितनी ही बातों पर WE ARE SHAMEFUL ...इस लम्बे राजनैतिक प्रवास में कुछ भी ऐसा नहीं है जिस पर इस धरा के पुत्र को गर्व हो... नेताओं पर से तो हमारा विश्वास पहले ही उठ चूका था किन्तु एक उम्मीद थी कि शायद भाजपा कुछ ऐसा कर दिखाए जिससे कि हमारा भारत गौरव भूषित हो. किन्तु अब तो वे भी सेक्युलरिज्म के महाजाल में फंसते दिखाई दे रहे हैं. जिस मकसद से उन्होंने भाजपा को जन्म दिया था वे उसे भूलता जा रहे हैं...WE ARE SHAMEFUL ..
सुरेश भाई आपने लेख में बहुत अच्छे मुद्दों को उठाया है, और बहुत सलीके से इसे हमारे सामने रखा है. इस सब के लिए आपको बहुत धन्वाद...आप जैसे व्यक्तियों को पढ़कर एक आशा की किरण दिखाई देती है कि आज भी कुछ ऐसा है जिस पर हम कह सकते हैं WE ARE NOT SHAMEFUL ... WE ARE PROUD OF YOU सुरेश भाई...हमें आप पर गर्व है, हमें भारत पर गर्व है...

Kailaash Sharma said...

राजेंद्र जांगिड भाई....
यार क्या बात कही है.. ये कांग्रेसी कुत्ते (सोनिया के पिल्लै) अपनी सरकार बचाने के लिए साले कुछ भी कर सकते है. सबके सब हरामी है.
राजेंद्र भाई की बात से 100 % सहमत .

संजय बेंगाणी said...

अपना कश्मीर "स्टेंड" जस का तस है. सेना को भेजो. मीडिया को बाहर फेंको और आँखे मूंद लो. सेना अभी भी देशभक्त है, इसलिए फ्रिक नॉट.

नहीं तो हरामियों पर देश की कमाई लूटाते रहो...

उम्दा सोच said...

भाई हम अपने वेदउपनिषद से कोई शिक्षा क्यों नहीं लेते ?
श्रीमद भागवत में श्री कृष्ण ने कहा है - संघे शक्ति कलायुगे !

अब करना ये होगा कम से कम एक ऐसा संसदीय क्षेत्र चुने जहा कश्मीरी हिन्दुओ का वोट निर्णायक हो और उन्हें संगठित करे एकमत करे यहाँ से देखिये राजनेता उनकी कैसी चाटना शुरू करते है !!!

ab inconvenienti said...

Totally agree with राजेंद्र जांगिड

DEEPAK BABA said...

निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा (अल्लाह के शासन) से कुछ भी कम उन्हें कभी मंजूर नहीं होगा, चाहे जितने पैकेज दे दो, चाहे जितने प्रोजेक्ट दे दो





येही सत्य है बाकी सब मिथ्या.

पूरा भारत इनको दे दो - ये उसको कश्मीर और पकिस्तान बना देंगे.

जैसे कि चुटकला है : लालू को जापान के प्रधानमंत्री नें कहा : मुझे एक साल के लिए बिहार दे दो - मैं जापान बना दूंगा.
लालू का जवाब था : मुझे ६ महीने के लिए जापान दे दो - मैं बिहार बना दूंगा.






अब कुछ भी नहीं हो सकता.........
मेरे आदरनिये - जिन पर भरोसा था कुछ कर गुजरने का - वो फोटो खिचवा रहे हैं.

ePandit said...

कश्मीर हो या अल्पसंख्यकवाद का कोई और प्रसंग, कथित "धर्मनिरपेक्ष" हिन्दू ही हिन्दुओं के दुश्मन बने हुये हैं। वोटों के लिये इनका बस चले तो अपनी माँ-बहनों को भी बेच दें। ये क्यों नहीं समझते कि जब एक दिन इनकी करतूतों से देश मुस्लिम बहुल हो जायेगा तो वे लोग इन्हें सबसे पहले मार भगायेंगे।

जैसा संजय भाई ने कहा कश्मीर समस्या का कोई राजनैतिक हल नहीं है, इसका हल खालिस्तान की तरह ही हो सकता है। यदि खालिस्तान समस्या के लिये भी सरकार बातचीत के चक्कर में रहती तो पंजाब में कभी शान्ति न हो पाती।

VICHAAR SHOONYA said...

अगर कश्मीर को भी पंजाब कि ही तरह भारत का एक हिस्सा मानकर वहां उग्रवाद का सफाया किया जाता तो ये समस्या कभी कि हल हो चुकी होती पर क्या करें कश्मीर मुस्लिम बाहुल्य प्रदेश है जहाँ पर चित भी उनकी पट भी उनकी और anta पाकिस्तान का होता है.

Neeraj नीरज نیرج said...

मुस्तफ़ा पैगंबर मोहम्मद का नाम है.. निजामे मुस्तफ़ा का शाब्दिक अर्थ- मोहम्मद का शासन.. जिसे 'मुहम्मदी वर्ल्ड ऑर्डर' भी कहते हैं। जैसे हाफ़िज़ सईद और बाक़ी वहाबी कहते हैं।

इसका अल्लाह के शासन से कोई लेना-देना नहीं है। वैसे क़ुरआन के मुताबिक़ अल्लाह निराकार नहीं है। क़ुरआन कहती है कि अल्लाह का आकार है।

अब उसके हाथ-पैर है या नहीं या ढेर सारे है या आम इंसान की तरह या किसी और तरह दिखता है। यह नहीं पता।

कई हिन्दू ये मान लेते हैं कि मुस्लिम भी निराकार ब्रह्म के उपासक होते हैं।
दिक्कत अल्लाह की शरण में जाने से भी नहीं होती। लेकिन एक लाख चौबीस हज़ार पैगंबरों वाले इस्लाम में सिर्फ़ मोहम्मद को आला दर्ज़ा मिला है। वे रसूल अल्लाह बताए जाते हैं। ये वे खुद घोषणा करते हैं कि उनका उनके रसूल है। मित्र हैं। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में दिलचस्प उल्लेख किया है। पूरा समुल्लास इस्लाम को समर्पित है। हरेक हिन्दू को पढ़ना चाहिए।

प्रवीण शाह said...

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आदरणीय सुरेश जी,

सच पूछिये तो मुझे समझ ही नहीं आया कि यह सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल कश्मीर घाटी में गया ही क्यों है...

यह सही समय है कि दिल्ली कहता कि पत्थर फेंकना बंद करो, अपनी पाकिस्तान से भीख में मिली एके ४७/५६ राइफलें जमा करो, फौज व सुरक्षाबलों पर हमले बंद करो... यह सब होने के बाद ही कोई बात होगी... और जब तक यह नहीं होगा हमारे लिये अपराधियों से अधिक कुछ नहीं हो तुम लोग...और वैसे ही सलूक के हकदार भी...

मैं शर्मसार हूँ कि दिल्ली ने यह सब नहीं कहा...और प्रतिनिधिमंडल अलगाववादी पाकिस्तान परस्त कश्मीरियों के घरों में बिना बुलाये जाकर लल्लो-चप्पो करने में लगा है... कुछ नहीं हासिल होगा इससे... देश के दुश्मनों का हौसला ही बढ़ेगा!


...

महफूज़ अली said...

मैं अभी फिर से आता हूँ .... पूरा अच्छे से पढ़ कर और समझ कर...

yeh to attendance hai... subah aata hoon itminaan se....

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

हिन्दू कभी एक नहीं हो सका. हर समय खामखयाली में खोया रहने वाला प्राणी है. अभी आंखे खोलना नहीं चाहता और जब खोलना चाहेगा तो गर्दन पर रखी तेग खोलने नहीं देगी. नेता तो अपनी पीढ़ियों के लिये स्विस बैंक में खाते खोल चुके हैं और विदेशों में सम्पत्तियां खरीद चुके हैं.

सौरभ आत्रेय said...

इन सब बातों का एक ही कारण है आज देश में हिन्दू नहीं है केवल जातियों और विभिन्न सम्प्रदायों में विभाजित सुबह-शाम अपने-२ समूहों के या साम्प्रदायिक आकाओं द्वारा तथाकथित शान्ति(कायरता) का रट्टा लगाने वाले बेवकूफ प्राणी रहते हैं .
कोई माने या न माने पर इस दुर्दशा का कारण ढोंगी संतो द्वारा दिन रात अनवरत जनता को शान्ति(कायरता) का राग सुनाकर दिशाविहीन कर देना है जिसके कारण हिन्दुओं का रक्त ठण्डा पड़ चुका है. क्या इन
सभी कथित धार्मिक गुरुओं का कर्तव्य नहीं बनता कि हिन्दुओं को एकजुट करके देश में क्रान्ति लायें. यदि ये सभी सच्चे धार्मिक गुरु होते तो निश्चित तौर पर ऐसा करते लेकिन ये सभी स्वार्थी तो अपने वर्चस्व को बनाने में और
अपनी रासलीला में ही मग्न हैं. जबकि दूसरी तरफ मोलवियों या मुल्लाओं द्वारा निरन्तर अपने सम्प्रदाय को अल्लाह के नाम पर जान लेने और देने का रट्टा घोट-२ के पिलाया जा रहा है. अब स्वयं ही सब लोग इसका नतीजा अपने सामने
देख सकते हैं कि हम एक महास्वार्थी और महामक्कार कायरता की मूर्ति को सन्त या महात्मा गाँधी बोलते हैं जबकि दूसरी तरफ इन मुसलमानों के आदर्श मोहम्मद बिन कासिम से लेकर ओसामा बिन लादेन जैसे लोग हैं तो कैसे मुकाबला कर पायेगे हम ?
जब तक इस देश का नागरिक इस छद्म सेकुलरता की भांति तथाकथित शान्ति अथवा सीधे शब्दों में कायरता का गांधीवाद राग अलापता रहेगा तब तक ऐसे ही होता रहेगा.

भाजपा अब कांग्रेस हो चुकी है और कांग्रेस लश्करे तैयेबा की प्रतिनिधि बन चुकी है.

पी.सी.गोदियाल said...

इन हरा***** को शायद शेमफुल की भी मीनिग न मालूम हो !

विजयप्रकाश said...

शर्म को भी शर्म आ रही है.

अवधेश पाण्डेय said...

लेकिन जेटली और सुषमा से ऐसी उम्मीद नहीं थी
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Ye log in gaddaron se milane kyon gaye the, samajh nahi aata.

sunil patel said...

आदरणीय सुरेश जी. बिलकुल सत्य कह रहे है. सच हमेशा कडवा होता है. राजनीती जो न कराय thoda . जिन्हें काल कोठारी में डाल देना चाहिय था उनके सामने हमारे देश का प्रतिनिधि मंडल घिगिया रहा है, बेहद शर्म की बात है

Anonymous said...

Paswan tou ek musalmaan lagta hai.....uska khatna(circumcision)ckeck kerna chaiye..pata lag jayega ki hindu hai ya muslim.....harketen tou muslim jaise hi kerta hai........

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

जय हो ..... नीच है सब शेमफ़ुल वाले

sanjay said...

कितना विवश है आज का भारत ?!

alakh jagaye rahen....biswas banaya rahen.....

pranam.

Ravinder Raina said...

Suresh ji namaskar, Artical bhut acha he,aaj ki kashmir ki halaat ke asli jimewar omar or cong(rahul baba)he, NC ke agenda (ATONMY)ko ye lagu karne ke liye kiya gaya he,omar ne 11june ko kha ki kashmiriyon ka khoon sasta nhi he,phir kajikund me PM ke samne kha ki economic package nhi poltical solution chahiye he,ye sub baate algawadion wali bol rhe he,is ko inhone jaanbujkar badaya he,ye jo aaj gilani ke kholne par curfew lgane ka kaam kar rhe he ye phale kar dete to itni baat hi nhi badti........Mout ke sodagar he ye...Kashmir me na ta uri ke log inke(AZADI) saath he,na hi shiya musalmaan,hajaro log jammu delhi or benglure chale gaye he...8 9 10 12 etc. student hi bus pathar baaj bane he or vo bhi josh me or mouton ki pratikiriya swarop........... in sub ke doshi omar or rahul he.
Ravindr Raina.

man said...

सादर वन्दे सर ,
मुस्लिम वोटो के लालची कुतो के साथ शुष्मा सवराज और अरुण जेतली का ना जाना इन हरामियो के लिए थोडा झटका साबित होता,की इस पार्टी का कश्मीर के पार्टी एक मोलिक नजरिया हे,लकिन अब शर्म्निर्पेक्स्ता एक राजनितिक ब्रांड सी हो गयी हे जीस से हेर कोई चहरा चमका रह हे | गिलानी जेसे बूढ़े ""कश्मीरी सियार """ ka सूनी वादी में ले जाकर अन्कोउन्टर कर देना चाहिए ?और साले ये जो मीरवायज,यासीन मालिक ,महबूबा मूप्ती ,जेसे अलगाव की आग पर हजारो करोडो की खेरात लेने वाले मंगतो को millatry के हवाले कर देना चाहिए ,|जेसे ही कॉमनवेल्थ गेमो में सरकार का सलवार निचे खिसकता दिखा ,कश्मीर में आग लग गयी ये , ये हे कांग्रेस का असली चेहरा ? यंहा भांड के नाम पर ११ रुपये वारुंगा की कॉमनवेल्थ गेमो की तेहरवी के कार्यकर्म पर देल्ही सरकार ,केंद्र सरकार ,""""सुरसा """" कलमाड़ी ,की पेंट उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ी |
यंहा संजय बेगानी से सहमत ,......
अपना कश्मीर "स्टेंड" जस का तस है. सेना को भेजो. मीडिया को बाहर फेंको और आँखे मूंद लो. सेना अभी भी देशभक्त है,

berojgar said...

कश्मीरी पंडित लड़े बगैर भाग खड़े हुए यही उनकी गलती है. अपनी नारकीय जिंदगी के लिए वे खुद और इस देश के हिन्दू और सिख जिम्मेदार हैं. लड़ोगे तो हक़ मिलेगा, भीख मांगोगे तो दुत्कार. बम और ए.के.४७ तो हिन्दू भी चला सकते हैं. पनुन कश्मीर वाले मांग रहे हैं, लड़ नहीं रहे हैं.

वो वक्त दूर नहीं जब इस देश के अन्य हिस्सों से भी हिन्दू खदेड़े जायेंगे. बजाते रहना ताली......

Anonymous said...

Saadho, ye muaradon kaa gaaon......

सुलभ § Sulabh said...

पासवान जैसे नेताओं जो सिर्फ दलित-मुस्लिम का समीकरण बना कर इस लोकतंत्र में ऐश करते हैं, शर्म पी पी कर थेथ्थर हो गए हैं.

मुस्लिम वोटबैंक क्या होता है, किसी भी चुनाव से पहले आसानी से समझा जा सकता है. परन्तु देश की सुरक्षा से खिलवाड़; इसे कैसे बर्दाश्त किया जाये.

Ravinder Raina said...

Bharat ne 60 salon se kashmir ko sath rakha he or 600 salon taq use rakhna aata he ,kashmiri leaders ko ye nishcit karna he ki unhe Bharat ke sath kese rhna ke liye kya karna he,ye sandesh sare bharat (Paksh or Vipaksh)or Janta ko ek sath in leadron ko dena he,kashmir ka awam in kashmiri leadro se tang aachuka he.26 oct.ko JK ka viley diwas sara desh ek sath mna kar in leadro ki bolti band kare.563 riyaston ka viley Full & Final he. VANDEMATARAM

Ravinder Raina said...

Plz contact me on 09419141719 and oblige me.

JANARDAN MISHRA said...

narendrabhai modi ke sath photo khichvane me jinko sharm aati hai unhe samaz lena chahiye ki modiji ke party ke dam par hi wo CM bane hai unki akele ki takat nahi hai........