Monday, August 2, 2010

ये तय करना मुश्किल है कि राहुल महाजन अधिक छिछोरा है या हिन्दी न्यूज़ चैनल…… Rahul Mahajan, News Channels, Celebrity Media in India

विगत दो दिनों से जिसने भी भारतीय टीवी चैनलों (हिन्दी) को देखा होगा, उसने लगभग प्रत्येक चैनल पर स्वर्गीय प्रमोद महाजन के "सपूत"(?) राहुल महाजन और उसके द्वारा पीटी गई उसकी "बेचारी"(?) पत्नी डिम्पी गांगुली की तस्वीरें, खबरें, वीडियो इत्यादि लगातार देखे होंगे। राहुल महाजन ने ऐसा किया, राहुल महाजन ने वैसा किया, उसने अपनी बीवी को कब-कहाँ-कितना और कैसे पीटा? डिम्पी की जाँघों और पिंडलियों पर निशान कैसे थे? राहुल महाजन ऐसे हैं, राहुल महाजन वैसे हैं… आदि-आदि-आदि, ब्ला-ब्ला-ब्ला-ब्ला… 

हालांकि वैसे तो पहले से ही भारतीय हिन्दी न्यूज़ चैनलों की मानसिक कंगाली जगज़ाहिर है, लेकिन जिस तरह से सारे चैनल "गिरावट" की नई-नई इबारतें लिख रहे हैं, वैसा कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा। भारत में लोकतन्त्र है, एक स्वतन्त्र प्रेस है, प्रेस परिषद है, काफ़ी बड़ी जनसंख्या साक्षर भी है… इसके अलावा भारत में समस्याओं का अम्बार लगा हुआ है फ़िर चाहे वह महंगाई, आतंकवाद, नक्सलवाद, खेती की बुरी स्थिति, बेरोजगारी जैसी सैकड़ों बड़े-बड़े मुद्दे हैं, फ़िर आखिर न्यूज़ चैनलों को इस छिछोरेपन पर उतरने क्या जरूरत आन पड़ती है? इसके जवाब में "मीडियाई भाण्ड" कहते हैं कि 24 घण्टे चैनल चलाने के लिये कोई न कोई चटपटी खबर चलाना आवश्यक भी है और ढाँचागत खर्च तथा विज्ञापन लेने के लिये लगातार "कुछ हट के" दिखाना जरूरी है।



चैनलों के लिये राहुल महाजन "इज्जत" से पुकारे जाने योग्य ऐसे-वैसे हैं, लेकिन मेरी ऐसी कोई मजबूरी नहीं है, क्योंकि वह आदमी इज्जत देने के लायक है ही नहीं। सवाल उठता है कि राहुल महाजन  आखिर है क्या चीज़? क्या राहुल महाजन बड़ा खिलाड़ी हैं? क्या वह बड़ा अभिनेता है? क्या वह उद्योगपति है? क्या उसने देश के प्रति कोई महती योगदान दिया है? फ़िर उस नशेलची, स्मैकची, बिगड़ैल, पत्नियों को पीटने का शौक रखने वाले, उजड्ड रईस औलाद में ऐसा क्या है कि जीटीवी, आज तक, NDTV जैसे बड़े चैनल उसका छिछोरापन दिखाने के लिये मरे जाते हैं? (इंडिया टीवी को मैं न्यूज़ चैनल मानता ही नहीं, इसलिये लिस्ट में इस महाछिछोरे चैनल का नाम नहीं है)।

जिस समय प्रमोद महाजन की मौत हुई थी, तब शुरुआत में ऐसा लगा था कि राहुल महाजन की दारुबाजियों और अवैध हरकतों को मीडिया इसलिये कवरेज दे रहा है कि इससे प्रमोद महाजन की छवि को तार-तार किया जा सके, लेकिन धीरे-धीरे राहुल महाजन तो "पेज-थ्री" सेलेब्रिटी(?) बन गया। पहले बिग बॉस में उसे लिया गया और उस प्रतियोगी शो में भी राहुल महाजन पर ही कैमरा फ़ोकस किया गया, कि कैसे उसने स्वीमिंग पूल में फ़लाँ लड़की को छेड़ा, कैसे राहुल ने पायल रोहतगी (एक और "सी" ग्रेड की अभिनेत्री) के साथ प्यार की पींगें बढ़ाईं, इत्यादि-इत्यादि। माना कि "बिग बॉस" अपने-आप में ही एक छिछोरेपन वाला रियलिटी शो कार्यक्रम था, लेकिन और भी तो कई प्रतियोगी थे… अकेले राहुल महाजन को ऐसा कवरेज देना "फ़िक्सिंग" की आशंका पैदा करता है।

खैर जैसे-तैसे बिग बॉस खत्म हुआ, और फ़िर भी राहुल महाजन का भूत चैनलों के सर से नहीं उतरा। एक और टीवी चैनल इस "रंगीले रसिया" को स्वयंवर  के लिये ले आया, इस चैनल ने एक बार भी नहीं सोचा कि अपनी बचपन की सहेली के साथ मारपीट करके घर से निकालने वाले इस "वीर-पुरुष" के सामने वह कई लड़कियों की "परेड" करवा रहे हैं। जहाँ एक तरफ़ बिग बॉस "छिछोरा" कार्यक्रम था, तो "राहुल दुल्हनिया ले जायेंगे" पूरी तरह से फ़ूहड़ था, जिसका विरोध नारी संगठनों ने आधे-अधूरे मन से किया, लेकिन मीडिया के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। (शायद "राहुल" नाम में ही कुछ खास बात है, कि "मीडियाई भाण्ड" इसके आगे बगैर सोचे-समझे नतमस्तक हो जाते हैं... आपको राहुल भट्ट याद ही होगा जो डेविड कोलमैन से रिश्तों के बावजूद आसानी से खुला घूम रहा है, जबकि प्रज्ञा ठाकुर रासुका में बन्द है…)



और अब जबकि एक और "राहुल" ने अपनी दूसरी बीबी को बुरी तरह पीटा है तो फ़िर से चैनल अपना-अपना कैमरा लेकर दौड़ पड़े हैं, उसकी बीबी की मार खाई हुई टांगें दिखा रहे हैं, फ़िर दोनों को मुस्कराते हुए साथ खाना खाते भी दिखा रहे हैं… ये कैसा "राष्ट्रीय मीडिया" है? दिल्ली और मुम्बई के बाहर क्या कोई महत्वपूर्ण खबरें ही नहीं हैं? लेकिन जब "पेज-थ्रीनुमा" फ़ोकटिया हरकतों की आदत पड़ जाती है तो चैनल दूरदराज की खबरों के लिये मेहनत क्यों करें, राखी सावन्त पर ही एक कार्यक्रम बना लें, या अमिताभ के साथ मन्दिर का चक्कर लगायें, या धोनी की शादी  (जहाँ धोनी ने उन्हें अपने दरवाजे से बाहर खड़ा रखा था) की खबरें ही चलाएं। (एक चैनल तो इतना गिर गया था कि उसने धोनी की शादी और हनीमून हो चुकने के बाद, उस होटल का कमरा दिखाया था कि "धोनी यहाँ रुके थे, धोनी यहाँ सोए थे, धोनी इस कमरे में खाये थे… आदि-आदि), क्या हमारा तथाकथित मीडिया इतना मानसिक कंगाल हो चुका है? क्या लोग न्यूज़ चैनल इसलिये देखते हैं कि उन्हें देश के बारे में खबरों की बजाए किसी फ़ालतू से सेलेब्रिटी के बारे में देखने को मिले? इस काम के लिये तो दूसरे कई चैनल हैं।

चलो कुछ देर के लिये यह मान भी लें कि न्यूज़ चैनलों को कभीकभार ऐसे प्रोग्राम भी दिखाने पड़ते हैं, ठीक है… लेकिन कितनी देर? राहुल महाजन को "कितनी देर का कवरेज" मिलना चाहिये, क्या यह तय करने लायक दिमाग भी चैनल के कर्ताधर्ताओं में नहीं बचा है? राहुल महाजन जैसे "अनुत्पादक" व्यक्ति, जो न तो खिलाड़ी है, न अभिनेता, न उद्योगपति, न ही राजनेता… ऐसे व्यक्ति को चैनलों पर इतना समय? क्या देश में और कोई समस्या ही नहीं बची है? तरस आता है इन चैनल मालिकों की बुद्धि पर और उनके सामाजिक सरोकारों पर… क्योंकि एक और "राहुल" (गाँधी) द्वारा दिल्ली की सड़कों पर साइकल चलाना भी इनके लिये राष्ट्रीय खबर होती है।

भारत जैसे देश में "सेलेब्रिटी"(?) होना ही पर्याप्त है, एक बार आप सेलेब्रिटी बन गये तो फ़िर आप में अपने-आप ही कई गुण समाहित हो जायेंगे। सेलेब्रिटी बनने के लिये यह जरूरी नहीं है कि आप किसी क्षेत्र में माहिर ही हों, अथवा आप कोई बड़ा सामाजिक कार्य ही करें… सेलेब्रिटी बनने की एकमात्र क्वालिफ़िकेशन है "किसी बड़ी राजनैतिक हस्ती" से निकटता या सम्बन्ध होना… बस इसके बाद आपके चारों तरफ़ मीडिया होगा, चमचेनुमा सरकारी अधिकारी होंगे, NGO बनाकर फ़र्जी चन्दा लेने वालों की भीड़ होगी, किसी समिति-वमिति के सदस्य बनकर विदेश घूमने का मौका मिलेगा… यानी की बहुत कुछ मिलेगा।

उदाहरण के लिए मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा महिला प्रौढ़ शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिये जो ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाये जाने वाले हैं, उनकी सूची ही देख लीजिये कि अधिकारियों ने किस मानसिकता के तहत उक्त नाम भेजे हैं - नीता अम्बानी, प्रियंका वढेरा (सॉरी, गाँधी), कनिमोझी और सुप्रिया सुले । अब आप अपना सिर धुनते रहिये, कि आखिर इन चारों महिलाओं ने सामाजिक क्षेत्र में ऐसे कौन से झण्डे गाड़ दिये कि इन्हें महिला प्रौढ़ शिक्षा का "ब्राण्ड एम्बेसेडर" बनाया जाये? इनमें से एक भी महिला ऐसी नहीं है जो "ज़मीनी हकीकत" से जुड़ी हुई हो, अथवा जिसकी अपनी "खुद की" बनाई हुई कोई पहचान हो। नीता अम्बानी जो भी हैं सिर्फ़ मुकेश अम्बानी और रिलायंस की वजह से, प्रियंका गाँधी के बारे में तो सभी जानते हैं कि यदि नाम में "वढेरा" लगाया जाये तो कोई पहचाने भी नहीं… सुप्रिया सुले की एकमात्र योग्यता(?) शरद पवार की बेटी होना और इसी तरह कनिमोझि की योग्यता करुणानिधि  की बेटी होना है, अब इन्हें प्रौढ़ शिक्षा का ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाने की सिफ़ारिश करना मंत्रालय के अधिकारियों की चमचागिरी का घटिया नमूना नहीं तो और क्या है? क्या इस सामाजिक काम के लिये देश में "असली सेलेब्रिटी" (जी हाँ असली सेलेब्रिटी) महिलाओं की कमी थी? साइना नेहवाल, मेरीकॉम, किरण बेदी, चंदा कोचर, शबाना आज़मी, मेधा पाटकर  जैसी कई प्रसिद्ध लेकिन ज़मीन से जुड़ी हुई महिलाएं हैं, यहाँ तक कि मायावती और ममता बनर्जी की व्यक्तिगत उपलब्धियाँ और संघर्ष भी उन चारों महिलाओं से कहीं-कहीं अधिक बढ़कर है। लेकिन जैसा कि मैंने कहा, "मीडिया और चाटुकार" मिलकर पहले सेलेब्रिटी गढ़ते हैं, फ़िर उनके किस्से-कहानी गढ़ते हैं, फ़िर दिन-रात उनके स्तुतिगान गाकर जबरदस्ती जनता के माथे पर थोपते हैं।

हालांकि सच्चे अर्थों में संघर्ष करने वाले ज़मीनी लोग कैमरों की चकाचौंध से दूर समाजसेवा के क्षेत्र में अपना काम करते रहते हैं फ़िर भी मीडिया का यह कर्तव्य है कि वह ऐसे लोगों को जनता के सामने लाये… और उन पर भी अपना "बहुमूल्य"(?) समय खर्च करे…। हमारे मालवा में पूरी तरह से निकम्मे (Useless) व्यक्ति को "बिल्ली का गू" कहते हैं, यानी जो न लीपने के काम आये, न ही कण्डे बनाने के… जब भी, जहाँ भी गिरे गन्दगी ही फ़ैलाए…। टीवी पर बार-बार राहुल महाजन के कई एपीसोड देखने के बाद एक बुजुर्ग की टिप्पणी थी, "यो प्रमोद बाबू को छोरो तो बिल्ली को गू हे, अन ई चेनल वाला भी…"

ताज़ा खबर दिखाई गई है कि "राहुल महाजन ने अपनी पिटाई की हुई बीबी के साथ सिद्धिविनायक के दर्शन किये…" यानी कि तीन दिन बाद भी राहुल महाजन मीडिया की हेडलाइन था, सो अब यह तय करना मुश्किल होता जा रहा है कि राहुल अधिक छिछोरा है या हमारा "सो कॉल्ड नेशनल मीडिया"…



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37 comments:

संजय बेंगाणी said...

कौन छिछोरा है? जी दोनों में होड़ लगी है अतः कहना मुश्किल है.

आपको लगता है राखी, राहुल का कोई योगदान नहीं है तो यह आपकी सोच है. पेज थ्री में आना ही सबसे बड़ा योगदान है, और आदमी अपने को कैसे प्रुव करे? जिन्हे काम करना है घिसते हुए करते है, मरते, क्या दिखाए उन्हें?

आपसे पता चला राहूल पर मीडिया इतना मेहरबान था. टीवी देखते ही नहीं तो पता कैसे चले....

उम्दा सोच said...

मीडिया को क्यूँ कोस रहे है भाई वो तो पहले ही खुदको धंधा वाले मानते है (प्रभुचावला का बयान) और कौनसा उन्हे सब्सिडी या बेल आउट देशभक्ति दिखाने पर मिलेगा जो वो समाजसेवा करें???
हाँ ईतावली माता की भक्ति से अपार शक्ति मिलेगी ये वो अच्छी तरह जानते है॥


दोगली तो जनता है जो भांन्डगिरी को टी आर पी से नवाजती है।

मैनें इतिहास की किताबों मे पढा था कि फ़लाँ राजा विलासी था, सारा समय खेल न्रित्यसगीत और विलासिता मे गुज़ारता था, उसका राजपाट छिन गया।
राजा तो राजा उस देश का हाल सोचिये जहाँ जनता ही विलासी हो उठी है, भारत का भविष्य बहुत भयानक मालूम पडता है।

महफूज़ अली said...

आपके लेख से विद्रोह का ज्वालामुखी फूट पड़ता है मेरे अन्दर... आपके कीन समझ को सलाम....

सम्वेदना के स्वर said...

देश का टेलिविज़न मीडिया, साबुन-तैल-शैम्पू के विज्ञापनों के बीच पागलों की तरह चीखता चिल्लाता एक ऐसा मूर्ख बन्दर है, जिसने अपनी विश्वस्नीयता खो दी है. इस मूर्ख बन्दर ने विज्ञापनों के अंगूरी पैसों से बनी मदिरा पी रखी है और “सर्वशक्तीमान होने के अहंकार” के बिच्छू ने इसे डस लिया है. अब हालात इतने खतरनाक हो चुके हैं, कि “भ्रष्ट नेताओं तथा उधोगपतियों” का भूत इसकी सवारी कर रहा है.”

अन्तर सोहिल said...

"यो प्रमोद बाबू को छोरो तो बिल्ली को गू हे, अन ई चेनल वाला भी…"

हमें भी यही लगता है जी
बाकि चैनलों और मीडिया के बारे में क्या कहें।
हमने तो खबरें सुनना ही छोड दिया है।
और मीडिया कितना है और क्या है ये तो आपको पढकर जान ही जाते हैं।

हमेशा की तरह सच्ची और सही सवालों को उठाती पोस्ट के लिये धन्यवाद

प्रणाम स्वीकार करें

RAJENDRA said...

सुरेशजी धन्यवाद - मानसिक रूप से छिछोरों का बहुमत ही इन तथाकथित राष्ट्रीय चैनलों को टीआरपी से मालामाल करता है - अफ़सोस इस बात का है सरकारी मशीनरी का इन पर कोइ अंकुश ही नहीं है - आप जेसे जागरूक कलम के धनी लोग कम से कम लोगों तक सही बात तो पहुंचा रहे हैं - एक बार पुनः धन्यवाद

संजय बेंगाणी said...

सरकारी मशीनरी का इन पर कोइ अंकुश ही नहीं है....

सरकारी मशीनरी तो दूध से धूल कर स्वर्ग से उतरी है क्या? फिर तो दूरदर्शन को ही देखते लोग.... :)

उम्दा सोच said...

वैसे ये जानकारी कि राहुल महाजन एक नंबर का आवारा,छिछोरा,बेहुदा,बिगडैल,नसेडीगजेडीभंगेडी,बीबी लतियाऊ,कमीना और करप्ट है ,हमें चैनेल के माध्यम से ही हुई है।

Dhananjay said...

आप भी इन चेनलों से कम छिछोरे नहीं हो जो पूरी की पूरी एक पोस्ट ही राहुल के नाम कर दी. अरे उस मलेच्छ पर तो मैं एक लाइन नहीं लिखूं. मैं समझ सकता हूँ आपका गुस्सा, मेरे गुस्से से थोडा ही ज्यादा होगा. पर एक पूरी पोस्ट???? आपकी पोस्ट से तो वह मलेच्छ और धन्य धन्य हो गया. I beg you not to waste your time and energy on %$%^$#%&*^&*%^$%$%%%$ (ठेठ हिंदी गालियाँ) persons.

ab inconvenienti said...

बिल्ली का गू, लीपे का न जलाए का. ...सही उपमा है.
---------------

@बेंगाणीजी दूरदर्शन ? मंडी हाउस, प्रसारण मंत्रालय और प्रसार भारती को मीडिया कार्टेल करोड़ों देता है अपने कार्यक्रमों का स्तर थर्ड क्लास रखने का. दूरदर्शन में बुनियाद, हमलोग, मिर्ज़ा ग़ालिब, मुंगेरीलाल, महाभारत, ये जो है जिंदगी, ब्योमकेश बक्षी, टीपू सुल्तान, चाणक्य, भारत एक खोज जैसे कार्यक्रम फिर आने लगें तो काफी दर्शक सैटेलाईट चैनल देखना छोड़ देंगे. पर अब ऐसे कार्यक्रम अब नहीं बनेंगे.

सज्जनपुर और पीपली लाइव की लोकप्रियता बताती है की लोगों का टेस्ट वही है, पर ऐसा न मानाने के पीछे ऊँचे लोगों के न्यस्त स्वार्थ हैं.

प्रकाश गोविन्द said...

एक छिछोरे की छिछोर-पुराण प्रस्तुत करके
रही सही कसर आपने पूरी कर दी :)

VICHAAR SHOONYA said...

आप कि बात सही हैं. भारतीय खबरी चैनलों का व्यवहार अति भावुकता से भरा होता है. एक क्षण में किसी को जमीन से उठा कर भगवान बना देना और दुसरे ही क्षण उस वापस जमीन में पटख देना तो इनके बाएं हाथ का खेल है. कई बार लगता है जिस प्रकार सिनेमा अपने शुरुवाती दौर में नाटकीय और बचकाना हुआ करता था उसी तरह से आज के खबरी चैनल हैं अति नाटकीय और बचकाने. हो सकता है समय के साथ कुछ अच्छे चैनल आयें पर अभी तो जो है उसे ही सहना होगा वो चाहे बिल्ली का गू हो या कुत्ते का.

ललित शर्मा said...

यही इलेक्ट्रानिक मीडिया है,जब दंतेवाड़ा में 76 जवान शहीद हो जाते हैं तो स्क्रोल पट्टी पर समाचार दिखाया जाता है और किसी गधे के छिछोरेपन पर सारा इलेक्ट्रानिक मीडिया केन्द्रित हो जाता है।

क्या कहें इनके दिमागी दिवालिएपन पर्।

Neeraj नीरज نیرج said...

राहुल-डिम्पी, राखी-मीका, कश्मीरा-संभावना, पायल रोहतगी, केआरके ऐसे रचे हुए किरदार हैं जैसे यूरोपीय पापरात्ज़ियों के लिए लेडी गागा, पेरिस हिल्टन, किम कर्देशियन, ऐमी वाइनहाउस, ब्रिटनी वगैरह हैं। ये किरदार यूरोपीय पापरात्ज़ियों (हमारे यहां मुख्यधारा का मीडिया) के अपने गढ़े-बुने और बिगाड़े हैं। ऐन मौक़े पर ये सरमाएदारों के ...लिए संकटमोचक बनते हैं जब पब्लिक का ध्यान असल मुद्दों से हटाना हो।

दरअसल, ऐसा होता रहा है सदियों से।
कुछ लोग योद्धा होते हैं.. कुछ लोग शासक.. बहुत बड़ा वर्ग इनके पीछे होता है या अपनी जान खोता है। बोलने का मतलब यह कि बहुसंख्यक चूतिया किस्म का होता है। ये ऐसे ही रहेंगे। ऐसे ही वर्ग को उपभोक्ता कहा जाता है जिसे ऐसे चुतियापे दिखाए जाते हैं। परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। उनको साथ लेकर चलना है जो जागे हुए हैं। योद्धा है और शासक बनने की योग्यता रखते हैं। चूतियों और चूतिया दर्शन चैनलों से दूर रहना ही ठीक।

सलीम ख़ान said...

तमाम विरोध के बावजूद इस मुद्दे पर आपके साथ! सौ में सौ अंक!! बेहद उम्दा चीज़ कहीं आपने !!!

दीपक 'मशाल' said...

समर्थन में एक हाथ मेरा भी है..

Bhavesh (भावेश ) said...

आप पूछ रहे है कि यह तय करना मुश्किल होता जा रहा है कि राहुल अधिक छिछोरा है या हमारा तथाकथित नेशनल मीडिया. मैं इसमें एक और पहलु जोड़ना चाहूँगा और वो है आम जनता. अधिकतर जनता शायद ऐसी ही मसालेदार खबरों को ज्यादा चटखारे ले कर पढ़ती है इसलिए ये बिकती है और मीडिया अपने फायदे के लिए वो ही परोसता है जो बिकता है.
आम आदमी जो मानसिक रूप से दिवालिया हो चुका है, अपने चारो और गंदगी की तरह फैला हुआ भ्रष्टाचार देखता है इसलिए उसे शायद एक मनोरोगी की तरह इस तरह की उलटी सीधी खबरों में मजा आता है.
समाज में गंदगी हर जगह फैली हुई है और मीडिया एक जिम्मेवार समाजसेवक होने के बजाये अपने नफे नुकसान में ही लगा हुआ है.
मैं भी सोचता अक्सर हूँ कि कैसे बने हमारे सपनो का भारत जहाँ पर लोग असली मुद्दों को सुलझाने का प्रयास करे लेकिन इस ताले की चाबी अभी तक शायद बनी नहीं है.

सौरभ आत्रेय said...

भारत का तथाकथित मीडिया दुनिया में सबसे घटिया है. इन्होने एक ऐसा गन्दा और झूठा माहौल बना रखा है जिसका कोई हिसाब नहीं. जब इनसे पूछो की ऐसा क्यों दिखाते हो तो कहते हैं ऐसा जनता पसन्द करती है इसलिए दिखाते हैं. अब इनसे कोई पूछे की फिर तो और अधिक गन्दी अश्लील दृश्य दिखाने आरम्भ कर दो जनता और अधिक देखेगी. जनता को बुराई और गन्दगी दिखाओगे तो जनता तो देखने पर मजबूर होगी ही. किसी किशोरवय बालक को यदि अश्लील दृश्य यह कह कर दिखाये जायें कि इसको पसन्द हैं तो यह कहाँ का न्याय है. आम जनता भी उस किशोरवय बालक की तरह ही होती है और बुद्धिमान व्यक्तियों को उसका चरित्र बनाना चाहिये न कि बिगाड़ना. खैर इस भाण्ड और चरित्रहीन मीडिया को इस बात से कोई सरोकार नहीं है. ये लातो के ही भूत हैं बातो से नहीं मानने वाले चाहे जो तर्क देलो.

@धनञ्जय
वैसे आपकी भावना सही है किन्तु ये भी समझना चाहिये यदि किसी बात का ढंग से पुरजोर विरोध किया जाये तो वो टाइम-वेस्ट नहीं है, ऐसे तो किसी गलत बात का विरोध करना ही मुश्किल हो जाएगा क्योंकि विरोध करने वाले को सभी यही कहेंगे कि क्यों गलत बात पर इतना टाइम-वेस्ट कर रहे हो. इसलिए यह लेख लोगो को मीडिया का चरित्र बताने के लिये आवश्यक है.

@उम्दा सोच
"राहुल महाजन एक नंबर का आवारा,छिछोरा,बेहुदा,बिगडैल,नसेडीगजेडीभंगेडी,बीबी लतियाऊ,कमीना और करप्ट है हमें चैनेल के माध्यम से ही हुई है"

राहुल महाजन जो भी हो अपनी बला से पर इस बात को जानकार हमें करना क्या है और इससे देश को मिलेगा क्या.यदि वो कमीना है क़ानून अपना काम करे मीडिया क्यों इसका बवाल मचा रहा है.

वैसे मैंने तो काफी समय से टी.वी. न्यूज़ चैनल देखना ही बन्द कर दिया है क्योंकि इनकी हरकतों को देख कर अत्यन्त क्रोध ही आता है और ढंग के समाचार और सच ये दिखाते ही नहीं हैं.

आनंद जी.शर्मा said...

सुरेश जी,

ये तय करना बहुत मुश्किल है कि राहुल महाजन अधिक छिछोरा है या हिन्दी न्यूज चैनल

इसमें क्या मुश्किल है ? यह तो बिलकुल आसान सी बात है कि कौन सिर्फ छिछोरा ही नहीं बल्कि - असली छिछोरा है |

निर्विवाद रूप से हिन्दी न्यूज चैनल्स खाँटी छिछोरे हैं - शोहदे हैं |

क्यों ?

क्योंकि राहुल महाजन ने जो कुछ भी किया अपने घर की चारदीवारी के अन्दर किया |

राहुल महाजन में वे सभी गुण हैं जिन्हें अपने लिखा है परन्तु उसके चारदीवारी में होने वाले छिछोरेपन को सार्वजनिक तौर पर कौन उदघाटित कर के अपना पेट पाल रहा है ?

मीडिया वाले - हिन्दी और अंग्रेजी के भी - जैसे किसी बच्चे को कोई मन मांगी मुराद मिल जाती है और वो ख़ुशी के मारे पागल हो जाता है - वैसे ही ये लोग भी पगला जाते हैं |

इन्हें कोई ऐसे मामले की भनक भर मिल जाये जिसमें सैक्स (इसकी हिन्दी क्या होती है - कृपया बताइयेगा) की ज़रा सी भी गंध आ रही हो - बस उसे पकड़ कर तिल का ताड़ बना कर जनता को जबरदस्ती बार बार दिखायेंगे |

वैसे इनका भी कोई दोष नहीं है |

भारत के संविधान में जीवन यापन - रोजगार कर के पेट पालने का अधिकार दिया गया है |

जब वैश्यावृत्ति - देह विक्रय कर के जीवन निर्वाह किया जा सकता है - तो फिर मानसिक अथवा वैचारिक वैश्यावृत्ति करने में क्या हर्ज है ?

प्रत्येक व्यक्ति अपने से सामान विचार के व्यक्ति चाहता है |

जो नहीं हैं - उन्हें अपने विचारों के अनुरूप परिवर्तित करने का सतत प्रयत्न करता है |

क्यों ?

क्योंकि - संघे शक्ति कलियुगौ - Saftey lies in Numbers |

इस देश में जितने वैचारिक वैश्यावृत्ति करने वाले या उसका अनुमोदन करने वालों की संख्या बढ़ेगी - उतना उनका अथवा उनके असली मालिकों का धंधा बढेगा - धंधा बढेगा तो ताकत बढ़ेगी - ताकत बढ़ेगी तभी आप और हम जैसे मूर्खों पर अखंड शाशन कर सकेंगे |

सुरेश जी, एक बात समझ में नहीं आयी |

पूरे देश में हिन्दी के चैनल देखने वाले - भारतीय संस्कारों की रक्षा के सजग स्वनामधन्य प्रहरी - नारी अस्मिता के नाम पर बवाल मचाने वाले संगठन - किसी के दिमाग-ए-शरीफ में ये सब बातें क्यों नहीं आती है - जो आपके आती हैं ?

बहुत खुराफाती दिमाग है भई आपका |

देश पर काबिज तथाकथित हुक्मरान यदि १% भी आपकी तरह देशभक्त हो जाएँ - तो निश्चित रूप से भारत का कल्याण हो जाये |

काश ऐसा हो पाना सम्भव होता !!!!!

SHIVLOK said...

सच में अगर मेरा वश चले तो भारत के
सूचना-प्रसारण मंत्रालय,
गृह मंत्रालय
और मानव संसाधन मंत्रालय
को एक साथ सम्मिलित करके
भारत उत्थान मंत्रालय बना कर उसका प्रभार
सुरेश चिप्लुन्कर को सौंप दूं |

क़ानून व्यवस्था सेना के ज़िम्मे और सारे नेताओं के पिच्छवाड़े पर सौ सौ कोडो की सज़ा |

वाह वाह कल्पना करने मात्र से ही सिरदर्द सही हो गया |

अब सिरदर्द की गोली कम से कम आज तो नही लेनी पड़ेगी |

प्रयत्न करूँगा की ऐसी कल्पनाएँ रोज ही कर लिया करूँ, रोज दर्द सही हो जाएगा |

anil yadav said...

राहुल महाजन ,,,,,प्रमोद महाजन के किए हुए पापों का नतीजा है...

man said...

सादर वन्दे सर ,
पिछले कई सालो से अंडरवियर में नोटंकी दिखाने वाले "" आधुनिक भारतीय भांड ""की फिर आपने चड्डी खेंच ली चलते चलते |बेचारे का पानी उतर गया ?मूह काला कर दिया आपने ?पहले ही शर्म निर्पेक्स लोगो के साथ सोने के ताने सुनने पड़ते हे ,आपने तो सरे बाजार रुसवा कर दिया बेचारे को ?लेकिन इसकी भी पूरी धिटाई हे की अब नगा होके घूम रहा हे |साले ये भारतीय मीडियाई बदजात पता नहीं और कितना गिरेंगे , राहुल महाजन की लुगाई की टांगो के निशान को ,साले हराम खोरो ने रास्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया |जेसे सुनामी आयी हो ?ये हे भारतीय मिडिया का रास्ट्रीय चरित्र ?अपने को चोथा खूंटा मानते हे ये भांड ,मेरे हिसाब से साले ये लोग ""रेपुटेड मंगतो"" से ज्यादा नहीं ,गा बजा के अपना पेट भरते हे ,फिर चोथा खूटा होने का दंभ भरते हे |खूटे तो साले सभी कमजोर हो चुके हे ?ये भांड फिर केसे अछूता रह्ता |इसको भी गा बजा के पेट भरने दो भाइयो ,वेसे ही आने वाले इन्टरनेट का के टाइम में कोई राजकीय सरक्षण मिल जाये मंगतो को ?अभी गाते तो राज की ही हे लेकिन"" फिरी लांसर "" हे अभी ,कभी कभी यूं ही कुते की जेसे भोकने की भी आदत हे पड़ चुकी हे वो जाएगी थोड़े ही ?

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...


मेरे विचार में किसी को छिछोरा कहने वाले हम कौन होते हैं? क्या हम देवता/फरिश्ता हैं, जो किसी अन्य पर इस तरह के आरोप लगाएँ। सबसे पहले हम अपने आपको देखें, फिर दूसरों के बारे में टीका टिप्पणी करें, तो ज्यादा बेहतर है।

…………..
स्टोनहेंज के रहस्यमय… ।
चेल्सी की शादी में गिरिजेश भाई के न पहुँच पाने का दु:ख..

रचना said...

ham villian ko hero banaatey haen
aur media ismae sabsey badaa role play kartaa haen

रंजना said...

बड़ा छिछोरा...निसंदेह अपना न्यूज मिडिया...

man said...

नई दिल्ली. राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों के दौरान हुई अनियमितताओं की परतें एक के बाद एक खुलती जा रही हैं। स्टेडियमों के निर्माण में व्यापक घपलों की शिकायत और ब्रिटेन की एक अनजान फर्म को कथित रूप से करोड़ों के भुगतान के बाद अब ताजा मामला खेलों के लिए किराए पर लिए जा रहे खेलकूद उपकरणों का है। किराए पर ली गई मशीनों की कीमतें दिए जा रहे किराए से काफी कम हैं। इसके अलावा विदेश यात्राओं का भी `खेल` हुआ है।

मशीन की कीमत से ज्यादा किराया
राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति ने खिलाड़ियों के लिए ट्रेड मिल मशीनें 45 दिन के लिए प्रति मशीन 9,75,000 रुपए की दर से किराए पर ली गई है। दुनिया में सबसे बढ़िया क्वालिटी की ट्रेड मिल यूके की हैरोड्स कंपनी बनाती है और इसकी कीमत ज्यादा से ज्यादा 7 लाख रुपए है। लेकिन यहां करीब दस लाख रुपए केवल किराए के लिए दिए जा रहे हैं। इसी तरह कुर्सियां और फ्रिज भी कई गुना ज्यादा किराए पर लिए गए हैं। कुर्सियों की दर प्रति कुर्सी 8,378 रुपए है और प्रति फ्रिज 42,202 रुपए दिए जा रहे हैं। हांलांकि इन वस्तुओं की कुल संख्या अभी पूरी तरह तय नहीं है, लेकिन इस मद में कुल 650 करोड़ रुपए के ठेके चार कंपनियों को आवंटित किए गए हैं। सबसे बड़ा 230 करोड़ रुपए का ठेका पिको- दीपाली फर्म को दिया गया है।

man said...

राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर आयोजन समिति के क्रियाकलापों पर लगे प्रश्नचिन्ह के बाद, खेल मंत्रालय भी संदेह के दायरे में आ गया है। एक आरटीआई के जवाब में खेल मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि कॉमनखेलों की तैयारी के तहत 2005 से 2009 के बीच उनके अफसरों ने करीब 90 विदेश दौरे किए। और आश्चर्य इस बात का है कि इन दौरों में कुछ देश तो ऐसे भी थे, जो राष्ट्रमंडल खेलों का हिस्सा नहीं हैं। अभिषेक शुक्ला को एक आरटीआई के जवाब में मंत्रालय ने बताया कि सबसे ज्यादा 11 बार यात्राएं संयुक्त सचिव एस कृष्णन ने की। दूसरे संयुक्त सचिव राहुल भटनागर ने 10 और इसी स्तर के एक अन्य अधिकारी आई श्रीनिवास ने 8 बार विदेश यात्राएं कीं। इन सभी ने चीन, क्यूबा, कुवैत और दक्षिण कोरिया का भी दौरा किया, जो कॉमनवेल्थ खेलों का हिस्सा नहीं हैं।

निर्झर'नीर said...

अब यह तय करना मुश्किल होता जा रहा है कि राहुल अधिक छिछोरा है या हमारा "सो कॉल्ड नेशनल मीडिया"…

humne to decide kar liya hai ki rahul se jyada ye sale media vale chichore hai jo apna kiimti vaqt aise chichore logo ke upar waste arte hai

मिहिरभोज said...

अगर ये सवाल है तो जवाब है...मीडिया चैनल

man said...

लंदन की कंपनी एएम फिल्म्स को, क्वींस बैटन के लंदन के कार्यक्रमों से जुड़े हुए कामों का ठेका दिए जाने की सिफारिश के पक्ष में कलमाड़ी द्वारा पेश किया जा रहा ईमेल फर्जी लग रहा है। कलमाड़ी का दावा है कि उन्हें लंदन के भारतीय उच्चायोग से एक मेल मिला है, जिसमें ठेका एएम फिल्म्स को देने की सिफारिश की गई है। लेकिन उच्चायोग ने इसका खंडन किया है। आयोजन समिति ने लंदन की एएम फिल्म्स को दी गई सेवाओं के एवज में करीब साढ़े तीन करोड़ रुपए का भुगतान किया है।

कलमाड़ी इसी सिलसिले में मंगलवार को विदेश मंत्री एसएम कृष्णा से मिले, जहां उन्हें लंदन के हाईकमीशन से भेजा गया असली ईमेल दिखाया गया। असली ईमेल में किसी भी कंपनी की सिफारिश नहीं की गई है। कलमाड़ी ने पूरे मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी बना दी है। जांच दल में खेल आयोजन समिति के मुख्य कार्यपालक निदेशक जरनैल सिंह, विशेष महानिदेशक, वित्त जीसी चतुर्वेदी और मुख्य सतर्कता अधिकारी गुरज्योत कौर शामिल हैं।

कलमाड़ी का दावा है कि कंपनी की सिफारिश भारतीय उच्चायोग के दफ्तर से की गई थी। अपने बयान के समर्थन में वे एक ईमेल पेश कर रहे हैं, जो एक क्लर्क स्तर के कर्मचारी राजू सेबेस्टियन ने भेजा था। लेकिन उच्चायोग कार्यालय से इसका खंडन किया गया कि उन्होंने किसी कंपनी की सिफारिश की थी। उच्चायोग दफ्तर से यह भी कहा गया कि राजू सेबेस्टियन नाम का कर्मचारी इसके लिए अधिकृत भी नहीं है। अब आशंका है कि कलमाड़ी द्वारा दिखाया जा रहा ईमेल फर्जी है।

sam jain said...

Dear Freinds,
It is a information from wikipedia for Mr. Rahul gandhi.

Swiss Bank Accounts

Swiss magazine Schweizer Illustrierte in 11 November 1991 revealed that Rahul was the beneficiary of accounts worth $2 billion dollars controlled by his mother Sonia Gandhi.

Harvard scholar Yevgenia Albats cited KGB correspondence about payments to Rajiv Gandhi and his family, which had been arranged by Viktor Chebrikov, which shows that KGB chief Viktor Chebrikov sought in writing an "authorization to make payments in US dollars to the family members of Rajiv Gandhi, namely Sonia Gandhi, Rahul Gandhi and Paola Maino, mother of Sonia Gandhi" from the CPSU in December 1985. Payments were authorized by a resolution, CPSU/CC/No 11228/3 dated 20/12/1985; and endorsed by the USSR Council of Ministers in Directive No 2633/Rs dated 20/12/1985. These payments had been coming since 1971, as payments received by Sonia Gandhi's family and "have been audited in CPSU/CC resolution No 11187/22 OP dated 10/12/1984. In 1992 the media confronted the Russian government with the Albats disclosure. The Russian government confirmed the veracity of the disclosure and defended it as necessary for "Soviet ideological interest."

On 14 June 2002, the Delhi High Court peremptorily dismissed a Writ Petition (WP(C) 3856/2002)[40][verification needed] filed by Janata Party President, former Union minister and frivolous litigator Dr. Subramanian Swamy seeking CBI inquiry into allegations by a Russian journalist Dr. Albats that KGB funds were paid to members of the Gandhi family.
link below-http://en.wikipedia.org/wiki/Rahul_Gandhi#Swiss_Bank_Accounts

बी एस पाबला said...

सारा छिछोरापन आपकी पोस्ट से पता चला

अच्छा है, टीवी देखना बरसों पहले छोड़ दिया

बी एस पाबला

शिवम् मिश्रा said...

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

Stuti Pandey said...

मीडिया वालों से घृणा सी हो चुकी है! किसी भी हद तक चले जाते हैं खबर "भुनाने" के लिए. छी!

शिक्षामित्र said...

मीडिया के इसी समाचार-बोध का नतीज़ा है कि आज भी पढे-लिखे लोग स्वीकार करते हैं कि उन्हें समाचार के लिए तो दूरदर्शन ही देखना पड़ता है।

दिवाकर मणि said...

हालांकि जो कुछ नीचे लिखने जा रहा हूं, वह इस पोस्ट की बातों से थोड़ा इतर है, किंतु समसामयिक है, अतः सुरेश जी आपसे और अन्य टिप्पणीकार बंधुओं से इसे सहभाजित करना चाहता हूं.

"हेल्लो मेरे प्यारे देश भारत में धर्मनिरपेक्षता का झंडा हिलाने वाले और दुनिया भर की (इस्लामानुयायियों की) व्यथा पर गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने वाले (तीस्ता टाइप के ) मानवाधिकारवादियों !! जरा इस खबर को पढ़ो और झूठे मन से ही सही..पाकिस्तान को कोसो तो एकबार...

क्या कहा ? .....पाकिस्तान के साथ अमन-शांति कायम करने की तुम्हारी कोशिशों में बाधा आएगी...अच्छा. छोटे उस्ताद भी बिदक जायेंगे इससे...

ठीक है, ठीक है... तब गाते रहो अपना गाना....फिर ना कहना कि मैंने चेताया नहीं था....

आज भी हिन्दू समाज में उग्र सोच की सीमा बहुत ही न्यून है, लेकिन तुम लोगों का ऐसा ही दोगला चरित्र बना रहा तो आगे ऐसी सोच व उसे अंजाम देने वाले लोगों की संख्या में और भी वृद्धि हो सकती है...फिर पढ़ाते रहना शांति व अहिंसा का पाठ...

प्रेमचंद पाकिस्तानी उर्फ काफिर! --> http://in.jagran.yahoo.com/news/international/general/3_5_6623254.html"

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

क्या करे चैनल वाले भी....हमारे यहां की जनता बडें चटकारे ले लेकर ऐसी खबरें सुनती है...!

और जो नही सुनते है उन्हे ये लोग सुना ही देते है...!

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"हमारा हिन्दुस्तान"

"इस्लाम और कुरआन"

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