बराक हुसैन ओबामा भी "इंडियन स्टाइल सेकुलरवाद" की राह पर??…… Obama India Tour American Secularism
जैसा सभी जानते हैं कि भारत की तथाकथित "सेकुलर" सरकारें पिछले 60 साल से लगातार "छद्म-सेकुलरवाद" की राह पर चलती आई हैं, जहाँ सेकुलरिज़्म का मतलब किसी अंग्रेजी की डिक्शनरी से नहीं, बल्कि मुस्लिम वोटों को अपनी तरफ़ खींचने की बेशर्मी का दूसरा नाम रहा है। जॉर्ज बुश भले ही पूरी इस्लामिक दुनिया में खलनायक की छवि रखते हों, लेकिन उनके उत्तराधिकारी बराक "हुसैन" ओबामा धीरे-धीरे भारत की तमाम राजनैतिक पार्टियों वाले "सेकुलर पाखण्ड" को अपनाते जा रहे हैं, तर्क दिया जा रहा है कि हमें "मुस्लिमों का दिल जीतना…" है। भारत से तुलना इसलिये कर रहा हूं, क्योंकि ठीक यहाँ की तरह, वहाँ भी "भाण्डनुमा मीडिया" बराक हुसैन की हाँ में हाँ मिलाते हुए "सेकुलरिज़्म" का फ़टा हुआ झण्डा लहराने से बाज नहीं आ रहा।
ताज़ा मामला यह है कि इन दिनों अमेरिका में जोरदार बहस चल रही है कि 9/11 के हमले में ध्वस्त हो चुकी "ट्विन टावर" की खाली जगह (जिसे वे ग्राउण्ड जीरो कहते हैं) पर एक विशालकाय 13 मंजिला मस्जिद बनाई जाये अथवा नहीं? स्पष्ट रुप से इस मुद्दे पर दो धड़े आपस में बँट चुके हैं, जिसमें एक तरफ़ आम जनता है, जो कि उस खाली जगह पर मस्जिद बनाने के पक्ष में बिलकुल भी नहीं है, जबकि दूसरी तरफ़ सत्ता-तन्त्र के चमचे अखबार, कुछ "पोलिटिकली करेक्ट" सेकुलर नेता और कुछ "सेकुलरिज़्म" का ढोंग ओढ़े हुए छद्म बुद्धिजीवी इत्यादि हैं, यानी कि बिलकुल भारत की तरह का मामला है, जहाँ बहुसंख्यक की भावना का कोई खयाल नहीं है।
जिस जगह पर और जिस इमारत के गिरने पर 3000 से अधिक लोगों की जान गई, जिस मलबे के ढेर में कई मासूम जानों ने अपना दम तोड़ा, कई-कई दिनों तक अमेरिकी समाज के लोगों ने इस जगह पर आकर अपने परिजनों को भीगी पलकों से याद किया, आज उस ग्राउण्ड जीरो पर मस्जिद का निर्माण करने का प्रस्ताव बेहद अजीबोगरीब और उन मृतात्माओं तथा उनके परिजनों पर भीषण किस्म का मानसिक अत्याचार ही है, लेकिन बराक हुसैन ओबामा और पोलिटिकली करेक्ट मीडिया को कौन समझाये? ग्राउण्ड जीरो पर मस्जिद बनाने का बेहूदा प्रस्ताव कौन लाया यह तो अभी पता नहीं चला है लेकिन भारतीय नेताओं के सिर पर बैठा हुआ "सेकुलरिज़्म का भूत" अब ओबामा के सिर भी सवार हो गया लगता है। जब से ओबामा ने कार्यभार संभाला है तब से सिलसिलेवार कई घटनाएं हुई हैं जो उनके "इंडियन स्टाइल सेकुलरिज़्म" से पीड़ित होने का आभास कराती हैं।
यह तो सभी को याद होगा कि जब ओबामा पहली बार मिस्त्र के दौरे पर गये थे, तब उन्होंने भाषण का सबसे पहला शब्द "अस्सलामवलैकुम" कहा था और जोरदार तालियाँ बटोरी थीं, उसके बाद से लगातार कम से कम नौ मौकों पर सार्वजनिक रुप से ओबामा ने "I am a Moslem...American Moslem" कहा है, जिस पर कई अमेरिकियों और ईसाईयों की भृकुटि तन गई थी। चलो यहाँ तक तो ठीक है, "अस्सलामवलैकुम" वगैरह कहना या वे किस धर्म को मानते हैं यह घोषित करना, यह कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन सऊदी अरब और जापान के दौरे के समय जिस तरीके से ओबामा ने सऊदी के शाह और जापान के राजकुमार से हाथ मिलाते समय अपनी कमर का 90 डिग्री का कोण बनाया उससे वे हास्यास्पद और कमजोर अमेरिकी राष्ट्रपति नज़र आये थे…(यहाँ देखें...)।
बहरहाल, बात हो रही है बराक हुसैन ओबामा के मुस्लिम प्रेम और उनके सेकुलर(?) होने के झुकाव की…। आगामी नवम्बर में ओबामा का भारत दौरा प्रस्तावित है, जहाँ एक तरफ़ भारत की "सेकुलर" सरकार उनकी इस यात्रा की तैयारी में लगी है, वहीं दूसरी तरफ़ अमेरिकी सरकार भी इस दौरे का उपयोग अपनी "सेकुलर" (बल्कि पोलिटिकली करेक्ट) होने की छवि को मजबूत करने के लिये करेगी। विगत 6 माह के भीतर अमेरिका के सर्वोच्च अधिकारियों की टीम में से एक, श्री राशिद हुसैन ने मुम्बई की माहिम दरगाह का दो बार दौरा किया है, इस वजह से अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि बराक हुसैन माहिम की दरगाह पर फ़ूल चढ़ाने जायेंगे। दरगाह के ट्रस्टी सुहैल खाण्डवानी ने कहा कि ओबामा भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति जानने के लिये उत्सुक हैं। ध्यान दीजिये… पहले भी अमेरिका का एक दस्ता USCIRF के नाम से उड़ीसा में ईसाईयों की स्थिति जानने के लिये असंवैधानिक तौर पर आया था, और अब ओबामा भी अल्पसंख्यकों (यानी मुस्लिमों) की भारत में स्थिति जानने आ रहे हैं… भारत की सरकार पहले भी USCIRF के सामने लाचार दिखी थी, और अब भी यही होगा। ये हाल तब हैं, जबकि अमेरिका को अपने कबाड़ा हो चुके परमाणु रिएक्टर भारत को बेचने हैं, और मनमोहन सरकार नवम्बर से पहले ओबामा को खुश करने के लिये विधेयक पारित करके रहेगी।
खैर… अमेरिकी अधिकारी रशद हुसैन ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का भी दो बार दौरा किया है और हो सकता है कि भारत सरकार भी उन्हें वहाँ ले जाने को उत्सुक हो, क्योंकि "मुस्लिमों का दिल जीतना है…"(?)। हालांकि माहिम दरगाह के ट्रस्ट ने कहा है कि ओबामा की सुरक्षा से सम्बन्धित खोजी कुत्तों द्वारा जाँच, दरगाह के अन्दर नहीं की जायेगी। रशद हुसैन के पूर्वज बिहार से ही हैं और वे इस्लामिक मामलों के जानकार माने जाते हैं इसीलिये ओबामा ने भारत की यात्रा में उन्हें अपने साथ रखने का फ़ैसला किया है। रशद हुसैन जल्दी ही अलीगढ़, मुम्बई, हैदराबाद और पटना का दौरा करेंगे, तथा मुस्लिम बुद्धिजीवियों और सरकारी अधिकारियों से मुस्लिमों का दिल जीतने के अभियान के तहत, चर्चा करेंगे…। रशद हुसैन के साथ कुरान के कुछ जानकार भी आ रहे हैं, जो विभिन्न मंत्रणा करने के साथ, बराक हुसैन ओबामा को कुछ "टिप्स"(?) भी देंगे।
उधर अमेरिका में 9/11 के ग्राउण्ड जीरो पर मस्जिद बनाने के प्रस्ताव पर भारी गर्मागर्मी शुरु हो चुकी है। कई परम्परावादी और कट्टर ईसाई इस प्रस्ताव को मुस्लिम आक्रांताओं के बढ़ते कदम के रुप में प्रचारित कर रही है। एक ईरानी मूल की मुस्लिम लड़की ने भी ओबामा को पत्र लिखकर मार्मिक अपील की है और कहा है कि उसकी अम्मी की पाक रुह इस स्थान पर आराम फ़रमा रही है और वह एक मुस्लिम होते हुए भी अमेरिकी नागरिक होने के नाते इस जगह पर मस्जिद बनाये जाने का पुरज़ोर विरोध करती है। इस लड़की ने मस्जिद को कहीं और बनाये जाने की अपील की है और कहा है कि उस खाली जगह पर कोई यादगार स्मारक बनाया जाना चाहिये जहाँ देश-विदेश से पर्यटक आयें और इस्लामिक आतंकवाद का खौफ़नाक रुप महसूस करें।
बराक हुसैन ओबामा फ़िलहाल इस पर विचार करना नहीं चाहते और वह मुस्लिमों का दिल जीतने की मुहिम लगे हुए हैं। सवाल उठता है, कि क्या ऐसा करने से वाकई मुस्लिमों का दिल जीता जा सकता है? हो सकता है कि चन्द नेकदिल और ईमानपसन्द मुस्लिमों इस कदम से खुश भी हो जायें, लेकिन कट्टरपंथी मुस्लिमों का दिल ऐसे टोटकों से जीतना असम्भव है। बल्कि 9/11 के "ग्राउण्ड जीरो" पर मस्जिद बन जाने को वे अपनी "जीत" के रुप में प्रचारित करेंगे। महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ के मन्दिरों से लूटे गये जवाहरात और मूर्तियों को काबुल की मस्जिदों की सीढ़ियों पर लगाया गया था… हिन्दुओं के दिल में पैबस्त लगभग वैसा ही मंज़र, ग्राउण्ड जीरो पर मस्जिद बनाने को लेकर अमेरिकी ईसाईयों के दिल में रहेगा, इसीलिये इसका जोरदार विरोध भी हो रहा है, लेकिन ओबामा के कानों पर जूं नहीं रेंग रही।
मुस्लिम विश्वविद्यालयों में जाना, मज़ारों पर चादरें और फ़ूल चढ़ाना, जालीदार टोपी पहनकर उलेमाओं के साथ तस्वीर खिंचवाना, रमज़ान के महीने में मुस्लिम मोहल्लों में जाकर हें-हें-हें-हें करते हुए दाँत निपोरते इफ़्तार पार्टियाँ देना इत्यादि भारतीय नेताओं के ढोंग-ढकोसले हैं, समझ नहीं आता कि बराक हुसैन ओबामा इन चक्करों में कैसे पड़ गये, ऐसी "सेकुलर" गुलाटियाँ खाने से मुस्लिमों का दिल कैसे जीता जा सकता है? नतीजतन सिर्फ़ एक साल के भीतर ही ओबामा की लोकप्रियता में जबरदस्त गिरावट आई है, और अमेरिकी लोग जैसा "मजबूत" और दूरदृष्टा राष्ट्रपति चाहते हैं, ओबामा अब तक उस पर खरे नहीं उतरे हैं।
अफ़गानिस्तान में जॉर्ज बुश ने अपने ऑपरेशन का नाम दिया था, "ऑपरेशन इनफ़िनिट जस्टिस" (अर्थात ऑपरेशन "अनन्त न्याय") लेकिन ओबामा ने उसे बदलकर "ऑपरेशन एन्ड्यूरिंग फ़्रीडम" (अर्थात ऑपरेशन "स्थायी स्वतंत्रता") कर दिया, क्योंकि मुस्लिमों के एक समूह को आपत्ति थी कि "इन्फ़िनिट जस्टिस" (अनन्त न्याय) सिर्फ़ अल्लाह ही दे सकता है…। किसी को "झुकने" के लिये कहा जाये और वह लेट जाये, ऐसी फ़ितरत तो भारत की सरकारों में होती है, अमेरिकियों में नहीं। स्वाभाविक तौर पर मस्जिद बनाने की इस मुहिम से कट्टरपंथी ईसाई और परम्परागत अमेरिकी समाज आहत और नाराज़ है, बराक हुसैन ओबामा दोनों समुदायों को एक साथ साधकर नहीं रख सकते।
इसी नाराजी और गुस्से का परिणाम है, डव वर्ल्ड आउटरीच सेंटर के वरिष्ठ पादरी डॉक्टर टेरी जोंस द्वारा आगामी 9/11 के दिन आव्हान किया गया "कुरान जलाओ दिवस" (Burn a Koran Day)। टेरी जोंस के इस अभियान (यहाँ देखें…) को ईसाई और अन्य पश्चिमी समाज में जोरदार समर्थन मिल रहा है, और जैसा कि हटिंगटन और बुश ने "जेहाद" और "क्रूसेड" की अवधारणा को हवा दी, उसी के छोटे स्वरूप में कुछ अनहोनी होने की सम्भावना भी जताई जा रही है। डॉक्टर टेरी जोंस का कहना है कि वे अपने तरीके से 9/11 की मृतात्माओं को श्रद्धांजलि देने का प्रयास कर रहे हैं। डॉ जोंस ने कहा है कि चूंकि ओसामा बिन लादेन ने इस्लाम का नाम लेकर ट्विन टावर ढहाये हैं, इसलिये यह उचित है। मामला गर्मा गया है, इस्लामी समूहों द्वारा यूरोप के देशों में इस मुहिम के खिलाफ़ प्रदर्शन शुरु हो चुके हैं, भारत में भी इसके खिलाफ़ उग्र प्रदर्शन हो रहे हैं। यदि बराक हुसैन ओबामा वाकई इस्लामिक कट्टरपंथियों से निपटना चाहते हैं तो उन्हें बहुसंख्यक उदारवादी मुस्लिमों को बढ़ावा देना चाहिये, उदारवादी मुस्लिम निश्चित रूप से संख्या में बहुत ज्यादा हैं, लेकिन चूंकि उन्हें सरकारों का नैतिक समर्थन नहीं मिलता इसलिये कट्टरपंथियों द्वारा वे पीछे धकेल दिये जाते हैं। ज़रा कल्पना कीजिये कि यदि तीन-चौथाई बहुमत से जीते हुए राजीव गाँधी, शाहबानो मामले में आरिफ़ मोहम्मद खान के समर्थन में डटकर खड़े हो जाते तो न सिर्फ़ मुस्लिम महिलाओं के दिल में उनके प्रति छवि मजबूत होती, बल्कि कट्टरपंथियों के हौसले भी पस्त हो जाते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बराक हुसैन ओबामा को भी विश्व के उदारवादी मुस्लिम नेताओं को साथ लेकर अलगाववादी तत्वों पर नकेल कसनी होगी, लेकिन वे उल्टी दिशा में ही जा रहे हैं…
कुल मिलाकर सार यह है कि बराक हुसैन ओबामा "इंडियन स्टाइल" के सेकुलरिज़्म को बढ़ावा देकर नफ़रत के बीज बो रहे हैं, बहुसंख्यक अमेरिकियों की भावनाओं को ठेस पहुँचाकर वे दोनों समुदायों के बीच वैमनस्य को बढ़ावा दे रहे हैं…
(क्या कहा??? इस बात पर आपको भारत की महान पार्टी कांग्रेस की याद आ गई…? स्वाभाविक है…। लेकिन अमेरिका, भारत नहीं है तथा अमेरिकी ईसाई, हिन्दुओं जैसे सहनशील नहीं हैं… छद्म सेकुलरिज़्म और वोट बैंक की राजनीति का दंश अब केरल में वामपंथी भी झेल रहे हैं… इसलिये देखते जाईये कि ओबामा की ये कोशिशें क्या रंग लाती हैं और इस मामले में आगे क्या-क्या होता है…)।
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जाते-जाते एक हथौड़ा :- यदि कोई आपसे कहे कि 26/11 को यादगार बनाने और पाकिस्तान का दिल जीतने के लिये मुम्बई के ताज होटल की छत पर एक मस्जिद बना दी जाये, तो आपको जैसा महसूस होगा… ठीक वैसा ही इस समय अमेरिकियों को लग रहा है…
Reference : http://www.mid-day.com/news/2010/aug/040810-mahim-dargah-barack-obama-special-envoy-rashad-hussain.htm
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38 comments:
हर मुसलमान का मकसद है " जेहाद जेहाद जेहाद "!
बराक हुसैन हुसैन हुसैन ओबामा क्या अलग कर रहा है ???
thanks for a vigilent and appropriate write up
अब क्या कहा जाए. सब कुछ तो आपने कह ही दिया. भई ग्राउंड जीरो पर मस्जिद तो बन कर ही रहेगी. और ताज की छत पर भी मस्जिद का ख्याल बुरा नहीं है. आखिर कुछ बनाने की ही तो बात हो रही है (खबरदार राम मंदिर बनाने की बात मत करना). अमेरिकियों ने सोचा था कि एक पढ़े लिखे जहनी आदमी को अपने देश कि कमान सौंप रहे हैं जो अमेरिका को नयी नयी उचाईयों पर ले जाएगा. लेकिन वो लोग एक बात भूल गए कि सांप भी कहीं काटना भूलता है? वो शहजाद साहब जो न्यू यार्क में बम लगाने के आरोपी हैं, वो भी काफी जहनी आदमी हैं. आख़िरकार क्या हुआ. भई इसमें इनकी भी कोई गलती नहीं है, ये लोग तो सिर्फ वही कर रहे हैं जो इनकी किताब में लिखा है. बस्स...
अमेरिका भारत नहीं है.
रजनीश ओशो को बाहर का दरवाजा दिखाने वाला समाज बदला नहीं है.
ओबामा कुछ भी कहे एक अमेरिकी कम धूर्त नहीं होता. अतः यह सब मूर्ख बनाने की बाते हैं. मुस्लिम भारत में मूर्ख बनता आया है, वहाँ भी बन लेगा. तुष्टिकरण की लॉलिपोप पसन्द है इसे.
मैंने तो सन २००८ में ही कई बार टिपण्णी देकर कहा था कि यह दुनिया को चिकनी चुपड़ी बाते कहकर बरगला रहा है, देखना यह देर सबेर अपनी जरूर दिखाएगा ! लोगों के जज्बातों से खेलने के लिए उसने पाकिस्तान के प्रति उस समय क्या-क्या हुंकारे भरी थी क्योंकि उसे मालूम है अमेरिकी राजनीति में इंडो-अमेरिकन की अहम् भूमिका है, एक बार वोट मिल गए, सब भूल गया ! और आज सब कुछ सामने है, सेक्युलारिस्म की दुहाई देने वाले बहुत से गोरे अमेरिकन भी आज पछता रहे है !
क्या मुस्लिम खुश होंगें लाशों पर मस्जिद बनवाकर?
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@ सुरेशजी, साँप का बच्चा "सँपोला" उतना ही जहरीला होता है जितना कि साँप . . "ओबामा" भी तो उसी खेत कि सड़ी हुई मूली है.. वो क्यूँ अपना असली रंग नहीं दिखायेगा..
रही बात "कुरआन" जलाने कि,, तो उस मौके का इन्तेजार हमारे सेकुलर कर रहे है.. जन ये "जालीदार" टोपी पहनकर अपने आपको "मुस्लिमों" का हमदर्द बताएँगे.. हमारे कुनेता बसपा के शफीकुर रहमान बर्क ने इस मुद्दे को संसद में उठाया कि भारत सरकार को अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के समक्ष इस मसले को रखना चाहिए। भारत और दुनिया के मुसलमान अपने पवित्र धर्मग्रंथ के किसी भी तरह के अपमान को बर्दाश्त नहीं कर सकते।..
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नोट :- इस महाशय ने कभी-भी उस वक्त आपत्ति दर्ज नहीं कराई, जब मुस्लिमों द्वारा कई बार बीच सड़क पर भारत के राष्ट्रीय ध्वज जलाए। लगता है ये देश का अपमान बर्दाश्त कर सकते हैं... साथ ही इन्हें दूर देश में क्या हो रहा है इस बात की तो चिंता रहती है, लेकिन अपने देश में सांप्रदायिक ताकतें क्या गुल खिला रही हैं यह नहीं दीखता....
(अब वीरेंदर जैन यहाँ अपनी पारिवारिक "कांग्रेस अंध-भक्ति" के लिए 2 -4 कुतर्क देगा)
कट्टरपंथी मुस्लिमों का दिल ऐसे टोटकों से जीतना असम्भव है। बल्कि 9/11 के "ग्राउण्ड जीरो" पर मस्जिद बन जाने को वे अपनी "जीत" के रुप में प्रचारित करेंगे।
सुरेश जी मेरी जानकारी के अनुसार, मस्जिद ग्राउंड जीरो पर नहीं बल्कि उसकी बगल में एक ११ मंजिला ईमारत की जगह पर प्रस्तावित है. आशा है आप पूरी छानबीन करेंगे. वैसे मस्जिद का ९/११ की घटना से कोई सम्बन्ध भी नहीं है. क्योंकि जो बेक़सूर लोगों की जान लेते हैं वह वैसे भी मंदिर-मस्जिदों को मानने वाले नहीं होते. ऐसे लोग तो पूरी इंसानियत के दुश्मन होते हैं.
भईया, जीरो ग्राउङ पर मस्जिद बने या न बने लेकिन ताज के उपर व संसद भवन के केन्द्रीय कक्ष में तो मस्जिद लाल मूंह के बन्दर व गुलाम मानसिकता के प्रतीक सोनिया के चम्चे काग्रेसी बनवा सकते हैं क्योंकि भारत में विरोधि ईसाइ तो हैं नहीं। यहाँ तो हिन्दू है जिनका कोई जमीर है ही नही। कृष्ण जन्म भूमि के उपर मस्जिद है काशी विश्वनाथ के उपर मस्जिद है। राम जन्म भूमि का क्या हाल है सबको पता है। तो होटल ताज क्या, संसद भवन क्या।
सादर वन्दे सर ,
सामयिक और विचारोतेज्मक लेख ,सियारों के रंग में अब अमेरिकी रास्ट्रपति भी भी रंग रहे हे ,बल्कि ये रंगा सियार ही था |अमेरिका के नागरिक बात करने से पहले मुक्का मारते हे यदि उन्हें थोड़ी खूनस हो ,और ज्यादा हो तो सीधी गोली ?वंहा भारत नहीं हे ,वंहा के नागरिक भले ही खुलेपने के हो लकिन यंहा की तरह घटिया नहीं जोकि आबादी का ७०% हे |साले जाहिल कमीने पन के .पढ़े लिखे भी साले भर्स्ट ,विष्ठा खाने वाले ?वंहा खिचाई होती हे सरकार की , नागरिको की और सरकारी कावडियो की भी |अमेरिकी कतई बर्दाशत नहीं करेंगे की जीरो ground पे मस्जीद बने |पूरा संसार आजीज हे इस कट्र्र आतंक वाद से अमेरिकियों की ४०% आबादी का झुकाव हिन्दू धरम की तरफ हो चूका हे ,वो अब शवो को जलना पसंद करते हे ,इस का ताजा उदाहरन जूलिया राबर्ट हे ,एक असीम शांती हे हिन्दू धर्म में |सांसारिक पापो में इस्लाम की तरह जलाने की बात नहीं होती हे बल्की ,एक नाम से उदार की बात होती हे |अमेरिकी समाज अभी जवान हे ,वो इस तरह के कूपर्यतन को सफल कतई नहीं होने देगा |१५ अगुस्त १९४७ को भारत आजाद नहीहुवा था बल्की इन देशी कूतो का गुलाम हुवा था ?
साहब जी जाते जाते अपने हथोडा तो जोरदार मारा है. मुझे भी लगता है कि हमारे देश के ये तथाकथित सेकुलर नेता लोग ताज होटल कि छत पर मस्जिद बनवाने और उसके इमाम कि पदवी निर्दोष अजमल कसाब देने कि मांग ना कर बैठें. अच्छा ये मस्जिद १३ मंजिल कि होगी ये बात कुछ समझ नहीं आयी. १३ का अंक तो पश्चिमी लोग अशुभ मानते हैं.....
सुरेश जी,
इस खबर को पढ़ कर तो आप हंस हंस कर लोट पोट हो जाएंगे कि हुसैन ओबामा ने अब नासा को भी दिल जीतने के इस पाक ? मिशन पर लगा दिया है
लिंक
http://www.nowpublic.com/world/nasa-s-muslim-mission-say-what
विडियो यहाँ देखें
http://theweek.com/article/index/204685/nasas-new-muslim-mission
पहले तो कहते थे कि इस देश को भगवान ही बचाएगा लेकिन अब कहना पडेगा कि दुनिया को भगवान बचाएगा।
शाहनवाज़ साहब की बात से सहमत हूँ.
इसके अतिरिक्त निम्नलिखित बातों पर गौर करके देखें-
मुसलमानों को जितना नुकसान अमेरिका ने पहुंचाया है उतना किसी ने नहीं पहुँचाया. इराक की बर्बादी सब की नज़र में है. अफ़गानिस्तान की खनिज के रूप में अकूत दौलत हासिल करने के लिए लाखों बेगुनाह मुसलमानों के क़त्ल में अपने पूर्व राष्ट्रपतियों की तरह ओबामा भी बराबर का हिस्सेदार है. ड्रोन हमलों के द्वारा किये जा रहे मुसलमानों पर अत्याचार पर भी गौर करके देख लें.
शरीफ बुजर्गवार ,मेरा परनाम स्वीकार करे ,
अमेरिका ने मुसलमनो को ही नुक्सान क्यों पहुँचाया ?इतने संसाधन और शक्तिशाली विचारधारा के बावजूद अमेरिका ने क्यों मुस्लिम देशो को रोंदा ?और इस से पहले अरबी मुस्लमान बादशाहों ने संसार में कितनी मारकाट मचाई ?जेसा करोगे वेसा भरोगे |इसका उत्तर आप हीके प्रश्नों में छुपा हे दादा की संसार में तेल का अकूत भण्डार रखने वाले अरबी देश ,क्यों आज भारत और चाइना की तुलना में पिद्दी हे ,क्योकि वो वंहा सदियों पुरानी मानसिकता में जी रहे हे ,कोई विजन नहीं ?कोई दूरदर्शिता नहीं ,जो भी किया धरा हे विदेशियों का किया धरा हे हे वंहा ,आज अकूत भण्डार तो भारत और चाइना के पास भी हे ,लकिन वो उनके साथ ऐसा व्यहवार नहीं कर सकता ,जेसा उसने अफगानिस्तान और इराक के साथ किया जेसा एक पागल कुते के साथ किया जाता हे |
अमेरिका सबसे खतरनाक देश है, यह उसकी चाल हो सकती है ओबामा के जरिये दुनिया में बड़ते अमेरिकी विरोध की आंच को कम करने की...
..यह बहुत सांकेतिक बात है,अमेरिका के लिये.
हाँ, भारत एक बेबकूफ देश है (पता नहीं, अब तो "देश" की परिभाषा में भी नहीं समाता लगता यह स्थान!)यहाँ इन बातों का मतलब बहुत खतरनाक है.
ओशो कहते हैं, हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई कहने के कारण ही विभाजन का ख्याल पैदा हुआ, क्योकिं विभाजन दो भाईयों के बीच विवाद का आखिरी निबटारा होता है, हमेशा ही!
पुनश्च :-
पीछे हमने एक पोस्ट लगायी ठीक " सुरेश चिप्नूकर की ईवीएम घोटाला पोस्ट पर एक ब्लोग चर्चा" आप की प्रतिक्रिया नहीं मिली?
क्या आप कुछ कहेंगें सुरेश जी!
mai suresh ji se sahmat hoon. shah nawaj ji ap soft nazar aate hain par kahin na kahin apke ander bhram ki shthiti bani hui hai. maine khud dekha hai kis tarah maszido me shukrawar ki namaz ke baad kattarvad ka lecture diya jata hai. apni burai ko swikar karne ka matlab ye nahi ki ap haar rahe hain balki iska matlab yah hai ki apne jeet ki taraf ek kadam badaya hai.
भाई मुझे ओबामा की तिकड़म कुछ और लगाती है संभव है की वो जो कर रहा है बिलकुल ठीक कर रहा है ! उसने नासा को मुहीम दी है की मुस्लिम दुनिया की पीढ़ी को खगोल और विज्ञान की ओर प्रेरित करो , आप को ठीक से पता है की -विज्ञान, मय खगोल शास्त्र और इस्लाम परस्पर विरोधाभाषी है ! खैर मै बुद्ध नहीं हूँ सिर्फ अनुमान लगा रहा हूँ !
लिंक यहाँ देखे
http://theweek.com/article/index/204685/nasas-new-muslim-mission
क्या बताएं साहब........
पूरे ईसाई समाज में रोष है ९/११ की घटना को लेकर। वे इस दिन को अंतरराष्ट्रीय कुरान जलाओ दिवस के रूप में मना रहे हैं। साथ ही वे इस्लाम को कपटी और धूर्त लोगों का धर्म बता रहे हैं वैसे वे भी दूध के धुले नहीं हैं बल्कि सिर तक कीचड़ से सने हैं। और इधर भैया बराक मुस्लिमों के दिल पर छाने के लिए ईसाई समाज का मजाक बना रहा है। सही है उस घटना से मंदिर-मजिस्द का कोई संबंध नहीं। या फिर मस्जिद ग्राउंड जीरो पर बन रही है या उसके बगल में, बात यह है कि वहां उसकी जरूरत ही क्या है। क्या पूरे अमेरिका में कहीं और जगह नहीं मिली। भारत में तो यह हुआ ही है कि हिन्दूओं के जहां-जहां बड़े धर्मस्थल में वहां सीना ताने मस्जिद खड़ी हैं। एक आक्रांता की कथित मस्जिद के लिए हिन्दुओं के आराध्य राम के माथे पर कील ठोकने के लिए तैयार बैठे हैं।
कपटी लोगों का धर्म इस्लाम पढें अपना पंचू पर...... www.apnapanchoo.blogspot.com
मुमकिन है के आप मुझे छद्म पंथनिरपेक्ष कहें!
लेकिन एक ओर आप टिपण्णी देने के लिए भी आग्रह करते नज़र आ रहे हैं, इसलिए कह रहा हूँ!
बाऊ जी,
जो लोग मासूमों की जान लेतें हैं, उनका ना तो मस्जिद और ना मंदिर से वास्ता होता है! बुरा मनाने वाली बात तब होती के जब ओसामा का बुत बनाके उसकी पूजा की जाती! आपका हथोडा कुछ खास जोर से नहीं लगा.... अगर बेगुनाहों की शाहदत की जगह इबादत के लिए इमारत बनाई जाये, तो इसमें मुझे कुछ गलत नज़र नहीं आता!
हेविंग सैड दैट, इसके पीछे किन लोगों की क्या राजनीतिक मंशाएं हो सकतीं हैं... ये शोध का विषय है!
ज़िंदगी को सीर्यसली नहीं सिंसिअर्ली लीजिये...... खुश रहिये!
खुशियों का पता:
www.myexperimentswithloveandlife.blogspot.com
@Mr.आशीष/ ASHISH
हो सकता है कि आप एक बहुत अच्छे इंसान हों लेकिन अच्छाई के साथ अपनी अक्ल पर ताला लगा लेने को बेवकूफी के सिवा कुछ नहीं कहा जाएगा , सामान्य से सामान्य व्यक्ति को समझ में आता है कि इस मांग का मकसद इबादत करना नहीं बल्कि कट्टरपंथियों के द्वारा पूरे विश्व में इसे अपनी जोरदार जीत के तौर पर पेश करना है
महक
@ महक,
हा हा हा हा हा!
बस और कुछ नहीं!
और हां आप भी, ज़िंदगी को सीर्यसली नहीं सिंसिअर्ली लीजिये...... खुश रहिये!
खुशियों का पता:
www.myexperimentswithloveandlife.blogspot.com
भाई महक आप सही हो ,इस खुश रहने की गलत फहमी ने ही तो इस युवा पीढ़ी को हिंजड़ा बना दिया |आग लगती हे अगर खानदानी ओलाद हो तो जो कुछ गलत हो रहा हो तो ?बाकि शर्म निर्पेक्सो के बारे में क्या कहे ?
@Mr.आशीष/ ASHISH
भई ये साहब कुछ गलत नहीं हैं बल्कि आज के समाज में किस तरह के लोग रहते हैं उसका एक नमूना भर हैं. इनकी सोच शुतुरमुर्ग से मिलती-जुलती है. वो तो बेचारा रेत में अपना सर डाल देता है, ऐसे लोग तो अपने घर के दरवाजे बंद करके ऊंची आवाज में म्यूजिक चला देते हैं ताकि बाहर का हो हल्ला सुनाई न दे और अपना मनोरंजन भी होता रहे. जब कोई शर्म निरपेक्षी का दुलारा इनके पिछवाड़े पर लात जमाएगा तब इन्हें अक्ल आयेगी कि काश जिंदगी को थोडा सीरिअसली भी ले लिया होता.
सुरेश जी ओबामा तो हुसेन है ही लेकिन ईशाई वर्ल्ड को इस्लामिक वर्ल्ड से लड़ना ही होगा ,यदि ओबामा मुसलमानों से नहीं लड़ पायेगे तो अमेरिका में रहना मुस्किल होगा आज ईशाई वर्ल्ड क़ा नेता अमेरिका है उसे अपने बर्चस्वा को कायम रखने हेतु मुस्लिम वर्ल्ड से लड़ना ही होगा नहीं तो ओबामा को अमेरिका छोड़ना पड़ेगा. रहा मस्जिद बनाने की बात यह तो संभव ही नहीं योरप क़े कई देश तो मस्जिद बनाने क़े बिरोध में है कई देश तो मुसलमानों को अपने देश से बाहर करना चाहते है.
बहुत अच्छी पोस्ट है
धन्यवाद.
hello sir,
jhanha tak mene pada hai masjid ground zero ke samne ban rahi hai..... jiske liye zamin allot ki gaye hai
यह सत्य है कि वहां मस्जिद बनाने की बात हो रही हैं, ओबामा की इन हरकतों की वजह से उसकी लोकप्रियता निश्चित तौर पर कम हुई है, यू. एस भारत नहीं है क्योंकि अगले चुनाव में वहां की जनता उसको बुरी तरह हराने भी वाली है. लेकिन भारत में जनता उसको ही जिता देती है जो सुबह-शाम तीनो पहर हर समय मुल्ला-मुल्ला ही करते रहते हैं देश जाये भाड़ में.
@ man,
शुक्रिया!
इतना गुस्सा सेहत के लिए अच्छा नहीं!
शांत गदाधारी भीम! शांत!
होई सोई जो राम रची राखा!
हा हा हा ..............गुस्सा बेचारे आशीष भाई को आ रहा है और कह रहा है @man को
@आशीष भाई मन के द्वारा आपको आईना दिखाने पर आपका चिढना स्वाभाविक है लेकिन आपको एक सलाह देना चाहूँगा ,ये " हा हा हा हा हा " रुपी कमेन्ट जो आपने मुझे दिया था ये भूलकर भी man भाई को मत कर देना वरना इस ब्लॉग पर आने की सोचने भर से आपको बुखार होना शुरू हो जाएगा ,आप अभी जानते नहीं हैं man भाई को
महक
महक भाई ऐसानहीं यार ,मेने सीधी किसी के नाम से टिपण्णी नहीं की, कोई भाई ऐसा समझ गया तो आप और में क्या करे ?
जिन सभी ज्ञानियों ने प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से मेरी शान में कसीदे पढ़े, उन सभी का हृदय से आभारी हूँ!
पूरी विनम्रता के साथ मैं अपनी बात पर कायम हूँ!
दरअसल आप कन्विंसड हैं के आप सही हैं................
खैर छोडिये! कोई फायदा नहीं!
आप चाहें तो मेरा महिमामंडन जारी रख सकते हैं!
आप सभी को मेरा सादर राम राम!
सधन्यवाद!
आशीष
masjid amerika me ban rahi hai aur pet dard sawarkar ke auladon ko ho rahi hai.
jinna ke bete kyo uchhala rahe hai??lasho ki foundation par apana dharmsthal banana to muslmano ka bahut hi purana shok raha hai,esame hinduo our esaeyo ko jyada chhati pitane ki jarurat nahi hai,ek mulle ko ek esae bahul desh me jita kar ab esae soce ki vo vaha jesus ki statu banayega,to ye to murkhata hai sirf...............
आपके लेख में एक तथ्यात्मक त्रुटी है.
ऑपरेशन ईन्फीनीट जस्टीस का नाम ओबामा द्वारा नहीं, बुश द्वारा ही दि. २५ सितंबर २००१ को बदला गया था..तब ओबामा राजनिती में प्रवेश कर ही रहे थे.
वैसे भी यदि एक नोबेल शांति पुरस्कार विजेता राष्ट्रप्रमुख कथित रुप से मुस्लिम प्रेम व्यक्त कर रहा है तो किसी को क्यों आपत्त्ति होना चाहिये ?
और ओबामा ने कब कहा है की वे ग्राउंड जीरो पर मस्जिद देखना चाहते है ? कृपया संबधित समाचार की लिंक देंवे..
एक भारतीय नेता की तरह ओबामा ने मस्जिद बनाने की बात को लेकर पलटी मार दी है. देखें :-
http://www.abc.net.au/news/stories/2010/08/16/2983776.htm
@khursheed kuran jal america me raha hai aur hindustan ke suar(PIG)halla macha rahe hai
Jaise cartoon denmark me chapa tha aur kaise uchal kud mullao ne desh me machi thi
विदेशी रंग में रंगा हुआ हमारा प्रधानमंत्री ( हिजड़ा ) झूठे सब्ज बाग दिखलाता हुआ कहता है ना की "हम दुनिया की ताकत है या बनेंगे" क्यों पता है, हम ताकत इसलिए है क्योकि हम दुनिया के ग्राहक है हम अंधी भीढ़ है, जो हर चीज सामने आये वह उठा लेते है, न की हम दुनिया को माल बेचते है या कुछ पैदा करते है हम ताकत इसलिए है क्योकि हम गुलाम है, विदेश की हर चीज के क्योकि हमारे यहाँ पर एक बड़ी काली अंग्रेजी आबादी है जो उनके चेनलो की शोभा बढ़ाती है, उनके कंपनियों के समान खरीदती है शान से बदले में वे लोग छापते है की इंडिया सुपर पॉवर बनेगा, इंडिया कभी सुपर पॉवर नहीं बन ही सकता है, इण्डिया तो एक बाजार है, सुपर पॉवर बन सकता है तो वह है भारत, इंडिया तो गुलाम है, इण्डिया और भारत का दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है, ये बात सभी देश भक्त जानते है, देशभ्रष्टो के दिमाग में ये बाते नहीं बैठती, भारत सुपर पॉवर बनेगा जरुर लेकिन ये काले अंग्रेजो के बल पर नहीं, नकली बाजारवाद के बल पर नहीं
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