Monday, July 26, 2010

ट्रेजरी मुद्दे पर मीडिया का दोगलापन और नीतीश की चुस्त कार्यप्रणाली… … Bihar Assembly Lalu Yadav and Congress

कुछ दिनों पहले बिहार की विधानसभा में जो कुछ हुआ उसने लोकतन्त्र को शर्मिन्दा तो किया ही है, लेकिन लोकतन्त्र भी अब ऐसी शर्मिन्दगी बार-बार झेलने को अभिशप्त है, और हम सब इसके आदी हो चुके हैं। बिहार विधानसभा में लालूप्रसाद और कांग्रेस ने जो हंगामा और तोड़फ़ोड़ की उसके पीछे कारण यह दिया गया कि महालेखाकार एवं नियंत्रक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में यह कहा है कि सन् 2002 से 2007 के बीच शासकीय कोषालय से करोड़ों रुपये निकाले गये और उनका बिल प्रस्तुत नहीं किया गया।

सिर पर खड़े आगामी विधानसभा चुनावों में मुद्दों के लिए तरस रहे लालू और कांग्रेस को इसमें "भ्रष्टाचार" की बू आ गई और उन्होंने बिना सोचे-समझे और मामले की तह में गये बिना हंगामा मचा दिया। बिहार विधानसभा के चुनावों में नीतीश अपनी साफ़-सुथरी छवि और बिहार में किये गये अपने काम के सहारे जाना चाहते हैं, जो लालू को कैसे सहन हो सकता है? और कांग्रेस, जो कि बिहार में कहीं गिनती में ही नहीं है वह भी ऐसे कूदने लगी, जैसे नीतीश के खिलाफ़ उसे कोई बड़ा मुद्दा हाथ लग गया हो और विधानसभा चुनाव में वे राहुल बाबा की मदद से कोई तीर मार लेंगे। विधानसभा में मेजें उलटी गईं, माइक तोड़े गये, गालीगलौज-मारपीट हुई, एक "वीरांगना" ने बाहर आकर गमले उठा-उठाकर पटके… यानी कुल मिलाकर जोरदार नाटक-नौटंकी की गई। मीडिया तो नीतीश और भाजपा के खिलाफ़ मौका ढूंढ ही रहा था, सारे चैनलों ने इस मामले को ऐसे दिखाया मानो यह करोड़ों का घोटाला हो। मीडिया के प्यारे-दुलारे लालू के "जोकरनुमा" बयान लिये गये, मनीष तिवारी इत्यादि ने भी जमकर भड़ास निकाली।



हालांकि पूरा मामला "खोदा पहाड़ निकली चुहिया" टाइप का है, लेकिन लालू, कांग्रेस और मीडिया को कौन समझाए। महालेखाकार एवं नियंत्रक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में सिर्फ़ इतना कहा है कि 2002 से 2007 के बीच कोषालय (Treasury) से जो पैसा निकला है उसका बिल प्रस्तुत नहीं हुआ है। अब भला इसमें घोटाले वाली बात कहाँ से आ गई? हालांकि यह गलत परम्परा तो है, लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि राज्य शासन के अधिकारी और विभिन्न विभाग अपनी आवश्यकतानुसार धन निकालते हैं और उसे खर्च करते हैं। विभागीय मंत्री को तो इन पैसों के उपयोग (या दुरुपयोग) से कोई मतलब होता नहीं, तो बिल और हिसाब-किताब की चिन्ता क्यों होने लगी। सम्बन्धित कलेक्टर और कमिश्नर की यह जिम्मेदारी है, लेकिन जब उन पर किसी का जोर या दबाव ही नहीं है तो वे क्यों अपनी तरफ़ से सारे शासकीय कामों के बिल शासन को देने लगे? ऐसा लगभग सभी राज्यों में होता है और बिहार भी कोई अपवाद नहीं है, हमारी "मक्कार कार्यसंस्कृति" में आलस और ढिलाई तो भरी पड़ी है ही, भ्रष्टाचार इसमें उर्वरक की भूमिका निभाता है। तात्पर्य यह कि 2002 से 2007 के बीच करोड़ों रुपये निकाले गये और खर्च हो गये कोई हिसाब-किताब और बिल नहीं पहुँचा, परन्तु विधानसभा में हंगामा करने वाले राजद और कांग्रेस सदस्यों ने इस बात पर दिमाग ही नहीं लगाया कि जिस CAG की रिपोर्ट के कालखण्ड पर वे हंगामा कर रहे हैं, उसमें से 2002 के बाद 42 माह तक लालू की ही सरकार थी, उसके बाद 11 माह तक राष्ट्रपति शासन था, जिसके सर्वेसर्वा एक और "महा-ईमानदार" बूटा सिंह थे, उसके बाद के 2 साल नीतीश सरकार के हैं, लेकिन गमले तोड़ने वाली उस वीरांगना से माथाफ़ोड़ी करे कौन? उन्हें तो बस हंगामा करने का बहाना चाहिये।


अब आते हैं हमारे "नेशनल"(?), "सबसे तेज़"(?) और "निष्पक्ष"(?) चैनलों के दोगलेपन और भाजपा विरोधी घृणित मानसिकता पर… जो लालू खुद ही करोड़ों रुपये के चारा घोटाले में न सिर्फ़ नामज़द आरोपी हैं, बल्कि न्यायालय उन्हें सजा भी सुना चुका… उसी लालू को पहले मीडिया ने रेल्वे मंत्री रहते हुए "मैनेजमेण्ट गुरु" के रुप में प्रचारित किया, जब ममता दीदी ने बाकायदा श्वेत-पत्र जारी करके लालू के मैनेजमेण्ट की पोल खोली तब वह फ़ुग्गा फ़ूटा, लेकिन फ़िर भी मीडिया को न तो अक्ल आनी थी, न आई। विधानसभा के हंगामे के बाद चैनलों ने लालू के बाइट्स और फ़ुटेज लगातार दिखाये, जबकि सुशील मोदी की बात तक नहीं सुनी गई। असल में मीडिया (और जनता) के लिये लालू एक "हँसोड़ कलाकार" से ज्यादा कुछ नहीं हैं, वह उनके मुँह से कुछ ऊटपटांग किस्म के बयान दिलवाकर मनोरंजन करवाता रहता है, लेकिन विधानसभा में जो हुआ वह मजाक नहीं था। ज़रा इन आँकड़ों पर निगाह डालिये -


झारखण्ड सरकार के 6009 करोड़ और जम्मू-कश्मीर सरकार के 2725 करोड़ रुपये के खर्च का बरसों से अभी तक कोई हिसाब प्रस्तुत नहीं किया गया है।

- महाराष्ट्र सरकार का 3113 करोड़ रुपये के खर्च का बिल नहीं आया है।

- पश्चिम बंगाल सरकार ने 2001-02 में 7140 करोड़ रुपये खर्च किये थे, उसका हिसाब अब तक प्रस्तुत नहीं किया गया है।

- यहाँ तक कि केन्द्र सरकार के परिवार कल्याण मंत्रालय ने 1983 से लेकर अब तक 9000 करोड़ रुपये के खर्च का बिल नहीं जमा करवाया है।

कभी मीडिया में इस बारे में सुना है? नहीं सुना होगा, क्योंकि मीडिया सिर्फ़ वही दिखाता/सुनाता है जिसमें या तो महारानी (और युवराज) का स्तुति-गान होता है या फ़िर भाजपा-संघ-हिन्दूवादी संगठनों का विरोध होता है। क्या झारखण्ड, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के इन प्रकरणों को घोटाला माना जा सकता है? यदि "हाँ", तो कथित रुप से सबसे तेज मीडिया अब तक सो रहा था क्या? कई-कई बार बाकायदा उदाहरण देकर साबित किया जा चुका है कि भारत का वर्तमान मीडिया पूरी तरह से "अज्ञात शक्तियों" के नियन्त्रण में है, जो "निष्पक्ष" तो कतई नहीं है। ट्रेजरी से सम्बन्धित जिस तकनीकी गलती को "घोटाला" कहकर प्रचारित किया गया, यदि सभी राज्यों के हाइकोर्ट, सभी राज्यों के खर्चों का हिसाब-किताब देखने लगें तो सारे के सारे मुख्यमंत्री ही कठघरे में खड़े नज़र आयेंगे।

इस बीच 26 जुलाई को पटना उच्च न्यायालय में होने वाली सुनवाई के लिये नीतीश ने विपक्ष के विरोध को भोथरा करने के लिये ताबड़तोड़ काम करने के निर्देश जारी कर दिये हैं। सभी जिला कलेक्टरों को दिशानिर्देश जारी करके 2002 से 2008 तक के सभी खर्चों के बिल पेश करने को कह दिया गया है, लगभग सभी जिलों में बड़े उच्चाधिकारियों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गईं और वे रात-रात भर दफ़्तरों में बैठकर पिछले सारे रिकॉर्ड खंगालकर बिल तैयार कर रहे हैं। सीवान, बक्सर, समस्तीपुर, गया, जहानाबाद, सासाराम और छपरा में विशेष कैम्प लगाकर सारे पिछले पेण्डिंग बिल तैयार करवाये जा रहे हैं, तात्पर्य यह है कि विपक्ष की हवा निकालने और खुद की छवि उजली बनाये रखने के लिये नीतीश ने कमर कस ली है… फ़िर भी इस बीच मीडिया को जो "खेल" खेलना था, वह खेल चुका, अब चुनिंदा अखबारों, वेबसाईटों और ब्लॉग पर पड़े-पड़े लेख लिखते रहिये, कौन सुनेगा?  वैसे, बिहार के आगामी चुनावों को देखते हुए "मुसलमान-मुसलमान" का खेल शुरु हो चुका है, नीतीश भी नरेन्द्र मोदी को छूत की बीमारी की तरह दूर रखने लगे हैं और कांग्रेस भी मुस्लिमों को "आरक्षण" का झुनझुना बजाकर रिझा रही है… और वैसे भी चैनलों द्वारा "साम्प्रदायिकता" शब्द का उपयोग उसी समय किया जाता है, जब "हिन्दू" की बात की जाती है…
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चलते-चलते : उधर पूर्वोत्तर में ऑल असम माइनोरिटी स्टूडेंट्स यूनियन (AAMSU) ने राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के विरोध में बन्द का आयोजन किया, जिसमें जिला कलेक्टर के कार्यालय पर हमला किया गया और पुलिस फ़ायरिंग में चार लोग मारे गये। बांग्लादेशी शरणार्थियों (बल्कि हरामखोरों शब्द अधिक उचित है) द्वारा अब वहाँ की जनसंख्या में इतना फ़ेरबदल किया जा चुका है, कि असम में कम से कम 10 विधायक इन बाहरी लोगों की पसन्द के बन सकते हैं। इतने हंगामे के बाद NRC (National Register for Citizens) को स्थगित करते हुए मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं कि "बातचीत" से मामला सुलझा लिया जायेगा। क्या आपने यह खबर किसी तथाकथित "निष्पक्ष" और सबसे तेज़ चैनल पर सुनी है? नहीं सुनी होगी, क्योंकि मीडिया को संत शिरोमणि श्रीश्री सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर और अमित शाह की खबर अधिक महत्वपूर्ण लगती है…


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33 comments:

दिवाकर मणि said...

आजकल अधिकांश समाचार माध्यम चाहे वह प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक दोगली रिपोर्टिंग के सरताज हैं। आपने ठीक ही उद्धृत किया है कि "मीडिया को न तो अक्ल आनी थी, न आई। विधानसभा के हंगामे के बाद चैनलों ने लालू के बाइट्स और फ़ुटेज लगातार दिखाये, जबकि सुशील मोदी की बात तक नहीं सुनी गई। असल में मीडिया (और जनता) के लिये लालू एक "हँसोड़ कलाकार" से ज्यादा कुछ नहीं हैं, वह उनके मुँह से कुछ ऊटपटांग किस्म के बयान दिलवाकर मनोरंजन करवाता रहता है, लेकिन विधानसभा में जो हुआ वह मजाक नहीं था।" यही सच्चाई है.....

संजय बेंगाणी said...

राजकुमार की ताजपोशी की लम्बी योजना चल रही है. दो राज्य गुजरात और बिहार हाथ में आने जरूरी है. सीटों के लिए भी और सम्भावित प्रतिद्वंदी मोदी व नितिश को हटाने के लिए भी. जय हो...

Ganesh Prasad said...

भाई साहब, अगर आपकी पहुच है तो कृपया लालू (जोकर) जी से पूछिये की खुद वो बिहार के लिए कुछ नहीं कर पाए अपने कार्यकाल में तो तुसरो पे कीचड़ उछालना छोड़ दे.
उनके और पासवान जी के हर बयान पे "छि" कहने को जी करता है !

Anonymous said...

Lalu and Paswan are the most corrupt and Joker type people, they should been thrown out of the state.

plz sonia ji keep lalu in delhi only, he spits his KHAINI here and there. the dirty fellow Chara Chor

बिहारी छोरा said...

Dear Suresh,

please keep writing about media's double standards in-depth,

NDTV and Star was already against Sangh Parivar, now after getting stick AAJ TAK also going same way.

Definitely media is in suspected WHITE HANDS

Kirtish Bhatt, Cartoonist said...

प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक, मीडिया रवैय्या चिंताजनक है.
वैसे संजय जी की बात से शत प्रतिशत सहमत हुआ जा सकता है , राजकुमार की ताजपोशी की तगड़ी तैयारिया चल रही हैं. इतिहास गवाह है ताज के चक्कर में इस देश में क्या कुछ नहीं हुआ है.

Kirtish Bhatt, Cartoonist said...

वैसे मीडिया की दशा दुर्दशा पर आपसे लेखन की उम्मीद है.
काफी कुछ लिखा जा सकता है.
मेरी एक पोस्ट पर कमेन्ट आया था कि इन्हें RTI के दायरे में लाया जाए ताकि पता किया जा सके कि चेनलों और मीडिया हाउस के पास कहाँ कहाँ से पैसा आ रहा है.
बड़े मीडिया हाउस तो फिर भी ठीक है लेकिन कुकुरमुत्तों कि तरह उगने वाले चेनल आखिर करोड़ों का मासिक खर्चा कैसे वहन कर रहे हैं ??

RAJAN said...

shayad ab neetish bhi narendra modi ke sath naam jode jane ke baad "paap" dhone ki taiyari kar rahe hai.isiliye unse doori banani shuru kar di hai.
lekin modi me aisi kya baat hai ki rashtriya raajneeti me bade se bada neta bhi modi ke saamne aate hi khud ko bauna samajhne lagta hai.

उम्दा सोच said...

काँग्रेस और मीडिया का काम चमत्कार नही बलात्कार पर बलात्कार करना है ।
भारत की जनता को अपना बलात्कार करवाते रहनें का अभ्यास हो चला है, विशेष रूप से हिन्दुवों को।

26 करोड की संख्या और अल्पसंख्यक , भारत सरकार की बुद्धीमता को सलाम ।

Bhavesh (भावेश ) said...

बाजारीकरण की इस स्पर्धा में सबको केवल अपना स्वार्थ साधने की चिंता है फिर चाहे वो कैसा प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रोनिक. लल्लू जैसे नालायको को अच्छी तरह से पता है कि मीडिया कि नस किस तरह दबाई जाती है इसलिए इन सरीके कार्टूनों को मीडिया से हर समय को जरुरत से ज्यादा तवज्जो मिल जाती है. अफ़सोस ये कलंक इस देश के दुर्भाग्य ही है.

RAJENDRA said...

आप इन दोगले लोगों की पोल खोलते रहिये

सुमन कुमार said...

भाई साहब, अगर आपकी पहुच है तो कृपया लालू (जोकर) जी से पूछिये की खुद वो बिहार के लिए क्या कर पाए अपने कार्यकाल में



भारत में ही नहीं..
पुरे विश्व में
चर्चित राज्य बिहार.
जहां शासन था.
आधुनिक कृष्ण का
वही कृष्ण जिसके मुख में
बिहार ही नहीं
समा सकता है, पूरा भारत भी.
ट्रक ही नहीं.
स्कूटर पर भी
करा सकता है भैंस को,
एक शहर से दुसरे शहर तक की
लम्बी यात्रा.
हाँ वही कृष्ण
जो उपदेशक है.
आधुनिक गीता का.
(2)
कोई बात नहीं
होने दो नरसंहार,
बह जाने दो लोगों को
बाढ़ में,
मर जाने दो भूखे
सुखाड़ में.
(3)
घबड़ाओ नहीं
आत्मा अमर है.
वह न तो मरती है नरसंहार मैं,
न ही गलती है बाढ़ में.
और न ही भूख से तड़पती है
सुखाड़ में.
(4)
उसे तो मोक्ष की
प्राप्ति होती है.
वह त्याग देती है
इस नश्वर शरीर को,
जिसके जूते भी नहीं बनते
मरने के बाद.
(5)
तुम्हारा क्या गया?
जो तुम चिल्लाते हो,
बढ़ जाने दो टैक्स,
हो जाने महंगाई
छू जाने दो कीमतों को आसमान.
(6)
रे मुर्ख किसान
क्यों रोते हो ?
क्यों लगाते हो हम पर
झूठे इल्जाम ?
कहाँ बढ़ाई है हमने ?
कीमत तुम्हारे फसलों की.
जो चिलाते हो
महंगाई रोको ...
महंगाई रोको ...
हाँ थोड़ी कीमत बड़ी है
नमक पर, साबुन पर,
चीनी और तेल पर.
पर तुम्हे इससे क्या ?
ये तो किराना सामान है.
हाँ तोड़ी टैक्स बढ़ा है,
गाड़ियों पर.
लेकिन तुम्हे कहाँ जाना ?
अपने खेत छोड़ कर.
अगर जाना भी है
तो क्या ?
थोड़ा पैसा ज्यादा ही देदो.
तुम्हारा क्या जाता है ?
जो तुम रोरे हो.
जो लिया यहीं से लिया
जो दोगे यहीं दोगे.
(7)
क्या बकते हो ?
चोरी डकैती बढ़ी है,
गुंडागर्दी है इस राज्य में.
क्या रंगदारी टैक्स माँगा जाता है ?
तुम नहीं समझोगे,
परिवर्तन ही संसार का नियम है.
जो आज तुम्हारे पास है,
कल किसी और के पास था,
परसों किसी और के पास होगा.
इस लिए कुछ मत बोलो,
सिर्फ देखो
मूक बधिरों की तरह.
क्योंकि देखना नहीं,
बोलना पाप है.

man said...

सर सादर वन्दे ,
फिर चोडी कर दी आप ने इस भांड की पोल ,पर हरामी पना कूट कूट के भरा हे इस दोगले मीडियाई संसथान में ,साले मंगतो की जेसे बिछे हुवे हे ,इन देश्दरोही ताकतों के सामने |,इनके जमीर को इनके मंग्तेपने ने खा लिया ,एक चेनल चलाने के लिए करोडो रुपये चाहिए ,सभी जानते हे की इन ताकतों के साथ सोये बगेर ये चेनल चला नहीं सकते ,पता नहीं किस किस को आगे करते होंगे ये log केवल एक वेर्चुअल पेर्सोंलिटी बन ने के लिए |
इस मद में रहने के लिए की हम कुछ भी कर सकते हे ,केसे ये तताकथित बड़े नामो के पत्रकार जो की टी.वी पर नेतिकता का झूठा लबादा ओढ़े ,साले पीछे से एक शेम्प्न की बोटल में बिक जाते हे ये फोक्क्तिये भांड (जो हर चीज को फ़ोकट में पाना चाहते हे ).छोटे झमूरे तो साले एक पव्वे के ग्राहिक होते हे |मेने देखी हे ये स्थिति इन फ़ोकट के भांडो की ,तो फिर मीडिया सन्सथानो के पर्मूखो की बात ही अलग हे .वो अपने को सता के समान्तर समझते हे ,जो की मद की स्थिति हे ,वो उच्ह शाकीय सुविधाए पाते हे .सत्ता और उनके बीच का सम्बन्ध सम लेंगिंगो की तरह होता हे ,क्योकि रिश्ते होते हुवे भी नजरो में नहीं होते हे |इस नापाक गंदगी से उम्मीद करना बेकार हे |इनके तो सबक केवल नागरिको की जागरूकता ही सिखा सकती हे या कोई उच्ह रास्ट्र वादी मिदाई संसथान ,जो की इस गंदे मेल में पनप नहीं सकता हे |हाँ गुजरात की जनता और नरेन्द्र मोदी बार बार इसकी भादी कर देती हे (नसबंदी )फिर टर टराने लग जाता हे |सारे देश के आधे लोग भी पलास और रसी ले कर खड़े हो जाये to बैल की जेसे पैर बांध के फोड़ दे ?

Dr. Anil Kumar Tyagi said...

संसार में अकाट्य नियम है कि कोइ कितनी भी उंची उडान भर ले उसे निचे आना ही पडेगा। अपने को सबसे तेज कहने वाले चेनल ने एक सर्वे कराया
http://aajtak.intoday.in/poll.php/poll/prevresults जिसमें आर एस एस को बद्नाम करने के बाद के हमले को गलत ठहराने की कौशिश की गयी थी लकिन जगरुक नेट उजर्स ने नाकार दिया, लेकिन भांड मीडिया ने ये सर्वे अपने चेनल ने नही दिखाया। लोकप्रियता को हजम करपाना बहुत ही दुश्कर कार्य है,यह एसा नशा है जो बडे-बडे संयमी की बुद्धी हर लेती है। हिन्दू, हिन्दू संस्क्रिती को मिटाने वाले कितने ही चले गये जिन्के राज मे कभी सूरज नही डूबता था, ये बेचारे बहुरुपिये भी अपना सिर पटक-पटक चले जयेंगे।

BS said...

सरेश जी,

आपका ब्लॉग कांग्रेस सरकार द्वारा भारत सरकार के निकनेट जो की भारत के सभी कार्यालयों में इंटरनेट देता है पर शायद प्रतिबंधित हो चुका है। एक दिन मैंने स्थानीय एनआईसी के कार्यालय में विभिन्न हिंदी के ब्लॉग खोले तो सब खुल गये लेकिन आपका नहीं खुला। कृपया आप अपने जिले के एनआईसी आफिस में टेस्ट करके देखो।

honesty project democracy said...

मिडिया की बात करना ही अब बेकार है ,अब तो कुछ गिने चुने पत्रकार हैं जो विशेस प्रोग्राम के जरिये कभी-कभी मिडिया के कराहते हुए जिन्दा होने का एहसास करा देते हैं | जहाँ तक बात नितीश जी के शासन का है इसमें कोई शक नहीं की कांग्रेस या लालूजी,या सोनिया जी ,या उनके गरीबों के हितैषी राहुल बाबा नितीश जी के सामने उनके घुटने के बराबर भी नहीं हैं लेकिन जमीनी स्तर पर नितीश जी को अभी बहुत मेहनत करने की जरूरत है असल जरूरतमंद लोगों तक सरकारी योजनाओं को पहुँचाने के लिए अगर अपने शासन के बचे-खुचे चंद महीनो में भी नितीश जी इस दिशा में मेहनत व ईमानदारी दिखाएँ तो कांग्रेस क्या कोई भी उनको दुबारा बिहार का मुख्यमंत्री बनने से नहीं रोक सकता है |

Deshi Vicharak said...

chhoti chhoti bataon ko media dwara badha chadha kar saty ko juthlane ki koshis kangres ko bhari padegi...
satymev jayte.

सौरभ आत्रेय said...

इन नेताओं से पहले इन मीडिया वालो को मारना चाहिये , इनके ऑफिस तोड़ डालने चाहिये क्योंकि ये लातो के भूत ही हैं इनके आगे आप कितना ही तार्किकता का राग अलाप लो ये नहीं सुनेंगे. एक बार उत्तर प्रदेश के हरामी मुल्ला मुलायम ने मिडिया पर 'हल्ला बोल' के नाम से एक फरमान अपने कार्यकर्ताओं को जारी किया था तब सपा के कार्यकर्ताओं ने मिडिया वालो को खूब मारा भी और उनके ऑफिस पर हमले किये गये जब से मुलायम के बारे में अधिक मुंह नहीं फाड़ते. तो देखा ये हैं ही लातो के भूत, अभी RSS ने जो थोड़ी बहुत तोड़-फोड की थी वो वास्तव में बहुत कम थी, यदि ये इस कार्य को ढंग से अंजाम देते तो आज तक वाले इतना मुंह नहीं फाड़ते और आगे भी थोड़ा सावधान रहते, यदि फिर ऐसी बकवास NEWS देते फिर इनको मारो और ऑफिस तहस-नहस कर डालो, फिर देखो किस तरह से सीधे होते हैं. RSS काफी बड़ा संगठन है और सक्षम भी है इनको ये फ़ालतू की शान्ति का राग अलापना छोड़ कर (जिसको कोई नहीं सुनने वाला) इस मिडिया को ढंग से घेरना और मारना चाहिये, ये मिडिया वाले तभी ठीक हो सकते हैं वरना RSS कितना ही महान कार्य करले ये उसको आतंकवादी दल ही घोषित करेंगे, बिगाड़ लो इनका क्या बिगाडो.

आज का मीडिया सभी हरामियों नेताओं,गुंडों-मवालियों और मुसलामानों का सबसे बड़ा हथियार है, इसी हथियार को सबसे पहले कब्जाना चाहिये , पता नहीं RSS, BJP आदि अपने news channel वगैरहा क्यों नहीं बनाती है, कभी-२ इनकी हरकतों पर भी संदेह होता है क्योंकि ये बहुत सी बातों का वैसा प्रतिकार नहीं करते जोकि इनका करना चाहिये.

शत्रु का दमन शस्त्र से ही होता है शान्ति से नहीं. जितना गांधी की तरह शान्ति-२ अहिंसा गाओगे उतना शत्रु तुम्हारे सर पर चढेगा. जिस दिन गांधी का भूत इस देश की जनता से उतरेगा और ये नोट पर छपना बन्द होगा तभी यह देश इस कायरता से निकल पायेगा अन्यथा ऐसा ही लुटता-पिटता रहेगा. इस गांधीवाद ने देश को नरक में झोंक रखा है और शत्रु अपनी चाल में कामयाब होते जा रहे हैं.

@सुमन
आपकी शायद भावना अच्छी है किन्तु कविता बिलकुल नहीं.

Sachi said...

लालू के बाद के सुखद परिवर्तन को एक आम बिहारवासी ने देखा और महसूस किया है| जो सब कुछ एक सरकार को नहीं करना चाहिए था, लालू के शासन काल में वही सब कुछ हुआ| इमेल और फीमेल के बारे में फालतू बयान देने वाले इस चतुर कपटी ने अपनी एक लड़की की शादी एक कम्प्यूटेर इंजिनयर से की|

अब इन्हें चूंकि कहने और करने के लिए कुछ भी नहीं है, तो नित रोज नई कहानियाँ गढ़ते हैं|

एक बार फिर से आँखें खोल देने वाले ब्लॉग के लिए आपको साधुवाद|

सुलभ § Sulabh said...

पहली बात:
असल में मीडिया (और जनता) के लिये लालू एक "हँसोड़ कलाकार" से ज्यादा कुछ नहीं हैं, वह उनके मुँह से कुछ ऊटपटांग किस्म के बयान दिलवाकर मनोरंजन करवाता रहता है, लेकिन विधानसभा में जो हुआ वह मजाक नहीं था।" यही सच्चाई है.

दूसरी बात:
लालू और पासवान जैसे गिरे हुए राजनीतिज्ञओं के साथ कांग्रेस भी घटिया खेल बिहार में खेल रही है.

अगर नीतीश चुनाव हारते है, इसमें भ्रष्ट मीडिया का बड़ा हाथ होगा.

Anonymous said...

Dear Sureshji,
aap ke sabhi lekh main padata hun.
ek request hai. please aap likhana band kar dijiye...
yeh sab padake bardast hi nahi hota...
please bar bar hme mehsos na karayiye... ki hum hijade hai

Shiv said...

मीडिया कई मुद्दों पर जो कुछ कह रहा है या दिखा रहा है वह बेहद ही नीच कर्म है. मीडिया के अनुसार नीतीश कुमार ग्यारह हज़ार करोड़ रुपया डकार गए. लेकिन नंगों के बारे में क्या कहा जाय?

सम्वेदना के स्वर said...

आपके ब्लोग पर मीडिया की धुलाई देखकर मन बहुत हल्का हुआ, वरना रोज़ रोज़ इनको झेलना दूभर हो रहा है.एक भी चैनल नहीं बचा जो बीमार नहीं हो.
हाँ! लोकसभा चैनल अभी भी एक अच्छा चैनळ है, पर उसके कार्यक्रमों की एक लिमिटेशन है..

आते रहेंगे आप के इस ब्लोग पर.
आभार!

( BHAGAT SINGH ) said...

सारी चीजे बाद की बात है .सबसे पहले
इन बांग्लादेशी हरामखोरो को भगाया जाना चाहिये. दिन प्रतिदिन कुकुरमुत्तो की तरह फैलते जा रहे है.
साला कोई नेता इस बड़ी समस्या की और ध्यान ही नही देता.
सब साले हिँजड़े है.

victor unicorn said...

1 obc christian keral me HIndu Dalit bana aur 5 baar MP bana ,us pe bhee kuch likh do maharaj

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

हिन्दुओं को अकल कहां से आयेगी. कम से कम एक दो टीवी चैनल और पत्र निकाला जाना चाहिये, जिसके बारे में मैंने कई वर्षों से तमाम हिन्दू नेताओं को लिखा है, लेकिन खेद की बात है कि किसी ने जबाव देना तक पसन्द नहीं किया.

दिवाकर मणि said...

आपके इस आलेख पर बज्जपुरम्‌ में मान्यवर आनंद जी शर्मा जी ने अपने कुछ विचार प्रस्तुत किये हैं. सुरेश जी, शायद आपने भी अब तक नहीं देखा होगा तो मैं आपके और अन्य टिप्पणीकारों के ध्यानार्थ उनके विचार को यहां प्रतिलिपित कर रहा हूं. आनंद जी शर्मा कहते हैं-

"आदरणीय सुरेश चिपलूनकर जी,

आपकी पोस्ट को पढने का समय मिलने तक के बीच में इतनी टिप्पणियां पोस्ट हो जाती हैं कि मेरे द्वारा कोई टिप्पणी करना आपके विचारों के समर्थकों के विचारों की पुनरावृत्ति होगी - तदुपरांत - एक मंतव्य प्रकट करने की अनुमति चाहता हूँ |

भारत की प्राचीन राजकीय परंपरा में राजाश्रय में पोषित व्यवसायों में - विदूषक - भांड - चारण - वंदी इत्यादि का भी समावेश होता था |

नगर श्रेष्ठि - धनाढ्य अपने उपभोग के लिए विशिष्ठ नगर वधुएँ एवं रुदालियों का भरण पोषण करते थे |

राजा बदल जाते हैं - परम्पराएं और स्वभाव नहीं बदलते हैं |

गौरांग महाप्रभु अंग्रेजों ने पराधीनता हस्तांतरण अपने श्यामवर्णी मानसिक एवं शारीरिक दासों को कर दिया था |

वे श्यामवर्णी भारतीय दास गौरांग महाप्रभु अंग्रेजों की अनुकम्पा से राजा बन गए तो प्राचीन भारतीय राजाओं की परंपरा के अनुसार विदूषक - भांड - चारण - वंदी - नगरवधू - रुदाली इत्यादि व्यवसायों का भरण पोषण राजकोष से तो करना ही पड़ेगा - परंपरा का त्याग कैसे कर सकते हैं |

इस संसार में - एवं विशेषतः भारत में - हरामखोरों की तो कभी भी कोई कमी नहीं रही है |

लोलुपता समस्त विकारों का मूल है परन्तु वर्तमान में येन केन प्रकारेण धनार्जन ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य है |

गौरांग महाप्रभु अंग्रेजों की कुटिल शिक्षा नीतियों के अंतर्गत बाल्यकाल से ही लोलुपता के संस्कार विकसित किये जाते हैं अतः कालांतर में पढ़ा लिखा व्यक्ति भी अपनी प्रतिभा का सदुपयोग लोकहित एवं देशहित में कर के श्रमसाध्य धर्नार्जन करने की अपेक्षा राजपोषित विदूषक - भांड - चारण - वंदी - नगरवधू - रुदाली इत्यादि बनना श्रेयस्कर समझता है |

पहले भी नक्कारखाने होते थे और वहां तूती बजाने वालों की तूती की आवाज किसी को सुनाई नहीं पड़ती थी |

परम्परा आज भी यथावत है - राजपोषित विदूषक - भांड - चारण - वंदी नंगाड़े बजा रहे हैं - कार्यकुशल नगरवधुएं - गणिकाएँ - रुपजीवाएं प्रवीणता से कार्य सम्पादित कर रहीं हैं - रुदालियाँ अति उत्साहित हो कर राजमहिषी को प्रसन्न करने के लिए स्वेच्छा से नाना प्रकार से कारुणिक स्वर में - समवेत स्वर में - भूलुंठित हो कर - हृदयविदारक विलाप कर रहीं हैं | सब राजा की कृपादृष्टि के याचक हैं | सब कुछ परंपरागत है |

अत्याचार - अनाचार - भ्रष्टाचार - व्यभिचार - दुराचार का प्रतिकार करने वाले नक्कारखाने में परंपरागत रूप से अपनी तूती बजाते रहते थे - आप भी अपनी तूती बजाते रहिये - हम सुन रहें है |

मीडिया राजपोषित रुदाली का स्थान सुशोभित कर रहा है - एक दशक पहले मैंने अपनी कविता - The Real Face of Media में लिखा था |"

man said...

बीजिंगमें 2008 में हुए ओलिंपिक का सफलतापूर्वक आयोजन कर चीन ने दुनिया भर मेंअपना लोहा मनवाया था। 8-24 अगस्त, 2008 के बीच हुए इस आयोजन के लिए 12 नएस्टेडियम तैयार किए गए थे। केवल दो साल पहले हुए ओलिंपिक के लिए 20,000 करोड़ रुपये का बजट था (जबकि दिल्‍ली में होने जा रहे कॉमनवेल्‍थ गेम्‍सका बजट 35 हजार करोड़ रुपये पहुंच चुका है)।

man said...

खर्चा पूरा, काम कम : दिल्‍ली में आयोजन के लिए अभी एक-तिहाई से भी ज्‍यादा काम होना है।यहां तक कि सारे स्‍टेडियम तैयार नहीं हुए हैं। एक स्‍टेडियम (तालकटोरास्‍टेडियम, जिसका नया नाम एसपी मुखर्जी स्‍टेडियम है) को तैयार घोषित कियागया, लेकिन पहले ट्रायल में ही स्‍वीमिंग पूल के टाइल्‍स निकल जाने की वजहसे दो तैराक घायल हो गए। इस पूल को तैयार करने में 377 करोड़ रुपये खर्चलगे थे। दिल्‍ली सरकार ने तीन साल पहले 770 करोड़ रुपये के बजट के साथ इसआयोजन के लिए काम शुरू किया था। पर वह अब तक 11000 करोड़ रुपये खर्च करचुकी है। यानी 1,328 फीसदी ज्‍यादा।

Anonymous said...

@SURESH CHIPLUNKAR,

AAP KYA UKHHAD LOGE JI LIKHKAR,, KUCH NAHI KAR SAKATE..AGAR KISI CONGRESSI YA SECULAR KI AANKH ME KHATAK GAYE TO AAPKO HI UKHAD DEGA..
CHUP BAITH KE TAMASAHA NAHI DEKHA JATA TO LOGO KE BEECH JAKAR UNHE JAGROOK KARO..

bade aaye blogger banae>

nitin tyagi said...

Saurabh ATREY IS RIGHT

wahreindia said...

सोहराबुद्दीन का सच
http://wahreindia.blogspot.com/2010/07/blog-post_24.html

Neeraj नीरज نیرج said...

दरअसल, घोटाले सभी जगह होते हैं। या यूं कहें कि बिल कई जगह पेंडिंग हैं।
मीडिया भी नहीं दिखाता। दरअसल दिखाया वो जो एक्शन था। मसलन, गमले तोड़ना..कुर्सियां फेंकना।
यदि महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना ऐसा कुछ करे तो वो भी दिखेगा।
अभी सांप सांप खेले तो शिवसेना को दिखाया था ना।
मीडिया को एक्शन चाहिए। घोटाला वगैरह से कुछ लेना देना नहीं। सब जानते हैं कि हर कोई "कमाई" में लगा हुआ है।