Thursday, June 10, 2010

चूंकि वीर सावरकर हिन्दुत्ववादी हैं, ब्राह्मण भी हैं और उनके नाम में "गाँधी" भी नहीं, इसलिये…... Savarkar France Marcelles Hindutva

8 जुलाई 2010 को स्वातंत्र्य वीर सावरकर द्वारा अंग्रेजों के चंगुल से छूटने की कोशिश के तहत फ़्रांस के समुद्र में ऐतिहासिक छलांग लगाने को 100 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। भारतवासियों के इस गौरवशाली क्षण को मधुर बनाने के लिये फ़्रांस सरकार ने मार्सेल्स नगर में वीर सावरकर की मूर्ति लगाने का फ़ैसला किया था, जिसे भारत सरकार के अनुमोदन हेतु भेजा गया… ताकि इसे एक सरकारी आयोजन की तरह आयोजित किया जा सके।


लेकिन हमेशा की तरह भारत की प्रमुख राजनैतिक पार्टी कांग्रेस और उसके पिछलग्गू सेकुलरों ने इसमें अड़ंगा लगा दिया, और पिछले काफ़ी समय से फ़्रांस सरकार का यह प्रस्ताव धूल खा रहा है। इस मूर्ति को लगाने के लिये न तो फ़्रांस सरकार भारत से कोई पैसा ले रही है, न ही उस जगह की लीज़ लेने वाली है, लेकिन फ़िर भी “प्रखर हिन्दुत्व” के इस महान योद्धा को 100 साल बाद भी विदेश में कोई सम्मान न मिलने पाये, इसके लिये “सेकुलरिज़्म” के कनखजूरे अपने काम में लगे हुए हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि “यह एक संवेदनशील मामला है…(?) और मार्सेल्स नगर के अधिकारी इस बात पर सहमत हुए हैं कि इतिहास के तथ्यों पर पुनर्विचार करने के बाद ही वे कोई अगला निर्णय लेंगे…”। (आई बात आपकी समझ में? संसद परिसर में सावरकर की आदमकद पेंटिंग लगाई जा चुकी है, लेकिन फ़्रांस में सावरकर की मूर्ति लगाने पर कांग्रेस को आपत्ति है…, इसे संवेदनशील मामला बताया जा रहा है)


(चित्र में युवा कार्यकर्ता फ़्रांस में सावरकर की मूर्ति हेतु केन्द्र सरकार के नाम ज्ञापन पर हस्ताक्षर अभियान चलाते हुए)

आपको याद होगा कि 2004 में तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर ने अंडमान की सेल्युलर जेल से सावरकर के कथ्यों वाली प्लेट को हटवा दिया था, और तमाम विरोधों के बावजूद उसे दोबारा नहीं लगने दिया। मणिशंकर अय्यर का कहना था कि सावरकर की अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ाई संदिग्ध है तथा गाँधी की हत्या में उनका हाथ है, इसलिये पोर्ट ब्लेयर के इस ऐतिहासिक स्मारक से सावरकर की यह पट्टी हटाई गई है (यह वही मणिशंकर अय्यर हैं जो 1962 के चीन युद्ध के समय चीन के पक्ष में इंग्लैण्ड में चन्दा एकत्रित कर रहे थे, और कहने को कांग्रेसी, लेकिन दिल से “कमीनिस्ट” मणिशंकर अय्यर… प्रकाश करात, एन राम और प्रणय रॉय के खास मित्रों में से हैं, जो अंग्रेजी में सोचते हैं, अंग्रेजी में ही लिखते-बोलते-खाते-पीते हैं)।

सावरकर के अपमान जैसे दुष्कृत्य के बदले में मणिशंकर अय्यर को देशप्रेमियों और राष्ट्रवादियों के दिल से निकली ऐसी “हाय और बद-दुआ” लगी, कि पहले पेट्रोलियम मंत्रालय छिना, ग्रामीण विकास मंत्रालय मिला, फ़िर उसमें भी सारे अधिकार छीनकर पंचायत का काम देखने का ही अधिकार बचा, अन्त में वह भी चला गया। 2009 के आम चुनाव में टिकट के लिये करुणानिधि के आगे नाक रगड़नी पड़ी, बड़ी मुश्किल से धांधली करके चन्द वोटों से चुनाव जीते और अब बेचारे संसद में पीछे की बेंच पर बैठते हैं और कोशिश में लगे रहते हैं कि किसी तरह उनके “मालिक” यानी राहुल गाँधी की नज़रे-इनायत उन पर हो जाये।

http://www.hindustantimes.com/rssfeed/newdelhi/Govt-against-Hindutva-icon-s-statue-coming-up-in-France/Article1-516015.aspx

वीर सावरकर पर अक्सर आरोप लगते हैं कि उन्होंने अंग्रेजों से माफ़ी माँग ली थी और जेल से रिहा करने के बदले में अंग्रेजों के खिलाफ़ न लड़ने का “अलिखित वचन” दे दिया था, जबकि यह सच नहीं है। सावरकर ने 1911 और 1913 में दो बार “स्वास्थ्य कारणों” से उन्हें रिहा करने की अपील की थी, जो अंग्रेजों द्वारा ठुकरा दी गई। यहाँ तक कि गाँधी, पटेल और तिलक की अर्जियों को भी अंग्रेजों ने कोई तवज्जो नहीं दी, क्योंकि अंग्रेज जानते थे कि यदि अस्वस्थ सावरकर भी जेल से बाहर आये तो मुश्किल खड़ी कर देंगे। जबकि सावरकर जानते थे कि यदि वे बाहर नहीं आये तो उन्हें “काला पानी” में ही तड़पा-तड़पाकर मार दिया जायेगा और उनके विचार आगे नहीं बढ़ेंगे। इसलिये सावरकर की “माफ़ी की अर्जी” एक शातिर चाल थी, ठीक वैसी ही चाल जैसी आगरा जेल से शिवाजी ने औरंगज़ेब को मूर्ख बनाकर चली थी। क्योंकि रिहाई के तुरन्त बाद सावरकर ने 23 जनवरी 1924 को “हिन्दू संस्कृति और सभ्यता के रक्षण के नाम पर” रत्नागिरी हिन्दू सभा का गठन किया और फ़िर से अपना “मूल काम” करने लगे थे।

तात्पर्य यह कि उन्होंने कभी भी अंग्रेजों के सामने “दिल-दिमाग” से समर्पण नहीं किया था, वहीं हमारे “ईमानदार बाबू” हैं जो ऑक्सफ़ोर्ड में जाकर ब्रिटिश राज की तारीफ़ कर आये… या फ़िर “मोम की गुड़िया” हैं जो “राष्ट्रमण्डल के गुलामों हेतु बने खेलों” में अरबों रुपया फ़ूंकने की खातिर, इंग्लैण्ड जाकर “महारानी” के हाथों बेटन पाकर धन्य-धन्य हुईं।

उल्लेखनीय है कि सावरकर को दो-दो आजीवन कारावास की सजा दी गई थी, सावरकर ने अण्डमान की सेलुलर जेल में कई वर्ष काटे। किसी भी सामान्य व्यक्ति की मानसिक हिम्मत और शारीरिक ताकत जवाब दे जाये, ऐसी कठिन परिस्थिति में उन्हें रहना पड़ा, उन्हें बैल की जगह जोतकर कोल्हू से तेल निकलवाया जाता था, खाने को सिर्फ़ इतना ही दिया जाता था कि वे जिन्दा रह सकें, लेकिन फ़िर भी स्वतन्त्रता आंदोलन का यह बहादुर योद्धा डटा रहा।

सावरकर के इस अथक स्वतन्त्रता संग्राम और जेल के रोंगटे खड़े कर देने वाले विवरण पढ़ने के बाद एक-दो सवाल मेरे मन में उठते हैं –

1) नेहरु की “पिकनिकनुमा” जेलयात्राओं की तुलना, अगर हम सावरकर की कठिन जेल परिस्थितियों से करें… तो स्वाभाविक रुप से सवाल उठता है कि यदि “मुँह में चांदी का चम्मच लिये हुए सुकुमार राजपुत्र” यानी “नेहरु” को सिर्फ़ एक साल के लिये अण्डमान की जेल में रखकर अंग्रेजों द्वारा उनके “पिछवाड़े के चमड़े” तोड़े जाते, तो क्या तब भी उनमें अंग्रेजों से लड़ने का माद्दा बचा रहता? क्या तब भी नेहरु, लेडी माउण्टबेटन से इश्क लड़ाते? असल में अंग्रेज शासक नेहरु और गाँधी के खिलाफ़ कुछ ज्यादा ही “सॉफ़्ट” थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि ये तो “अपना ही आदमी” है? [मैकाले की शिक्षा पद्धति और लुटेरी “आईसीएस” (अब IAS) की व्यवस्था को ज्यों का त्यों बरकरार रखने वाले नेहरु ही थे]

2) दूसरा लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि यदि सावरकर हिन्दू ब्राह्मण की बजाय, दलित-OBC या मुस्लिम होते तो क्या होता? शायद तब मायावती पूरे उत्तरप्रदेश में खुद ही उनकी मूर्तियाँ लगवाती फ़िरतीं, या फ़िर कांग्रेस भी “गाँधी परिवार” के अलावा किसी स्टेडियम, सड़क, नगर, पुल, कालोनी, संस्थान, पुरस्कार आदि का नाम सावरकर के नाम पर रख सकती थी,

लेकिन दुर्भाग्य से सावरकर ब्राह्मण थे, गाँधी परिवार से सम्बन्धित भी नहीं थे, और ऊपर से “हिन्दुत्व” के पैरोकार भी थे… यानी तीनों “माइनस” पॉइंट… ऐसे में उनकी उपेक्षा, अपमान होना स्वाभाविक बात है, मूर्ति वगैरह लगना तो दूर रहा…
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नोट : मूर्ति लगाने सम्बन्धी फ़्रांस के प्रस्ताव पर “ऊपर वर्णित यथास्थिति” फ़रवरी 2010 तक की है, इस तिथि के बाद इस मामले में आगे क्या हुआ, अनुमति मिली या नहीं… इस बारे में ताज़ा जानकारी नहीं है…। लेकिन पोस्ट का मूल मुद्दा है, स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों के अपमान और एक “परिवार” की चमचागिरी में किसी भी स्तर तक गिर जाने का।


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57 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

इस देश का यही दुर्भाग्य है कि हिन्दू को आपस में बांट दिया गया है और अब भी हिन्दू नहीं चेतता..
क्या ब्राह्मण होने से सावरकर का योगदान कम हो गया? नहीं... गौर करने लायक बात यह है कि सावरकर को अंडमान क्यों भेजा गया जबकि अन्य लोगों को भारत की मुख्य जमीनी भूमि पर बनी अन्य जेलों में रखा गया...

nilesh mathur said...

पहले तो आपका बहुत धन्यवाद् जो आपने ये जानकारी हम लोगों तक पहुचाई, बहुत ही निंदनीय है, वीर सावरकर ने जो बलिदान दिया और देश के लिए जो कष्ट सहे उसे भुलाया नहीं जा सकता, चाहे उनकी मूर्ति लगे या ना लगे वो हमारे दिलों में बसते हैं!

सलीम ख़ान said...

मैं चैलेन्ज के साथ यह ऐलान करता हूँ कि कम से कम भारत में अगर कोई राष्ट्रवाद का हिमायती है तो वह हिन्दू धर्म का हो ही नहीं सकता है, हिंदुत्व की तो बात ही छोडिये, जानना चाहेंगे कैसे तो आईये मैं बताता हूँ::: अगर कोई राष्ट्रवाद की परिकल्पना में विश्वास रखता है और यह विश्वास करता है कि वह राष्ट्रवाद के संघी पैमाने पर खरा उतर कर ही रहेगा तो फ़िर उसका पुनर्जन्म हो ही नहीं सकता. और अगर वह पुनर्जन्म में अक़ीदा रखता है तो फ़िर वह एक राष्ट्रवादी हो ही नहीं सकता.

मिसाल के तौर पर अगर सावरकर जी का पुनर्जन्म अफ़गानिस्तान में तालिबान समर्थक में हुआ तो इस बात की गारंटी कौन लेगा कि भारत के ख़िलाफ़ किसी भी आतंकी घटना में वे लिप्त नहीं होंगे??? और अगर ऐसा हुआ तो उस राष्ट्रवाद का क्या होगा जिसे वीर सावरकर अपने कथित खून पसीने से सींचा था !!!???

जी.के. अवधिया said...

"लेकिन हमेशा की तरह भारत की प्रमुख राजनैतिक पार्टी कांग्रेस और उसके पिछलग्गू सेकुलरों ने इसमें अड़ंगा लगा दिया"

इनकी नजरों में तो गांधी और नेहरू परिवार के अलावा कोई अन्य देशभक्त हो ही नहीं सकता। हमारे देश का दुर्भाग्य है कि यह हमेशा स्वार्थी तत्वों के षड़यंत्रों का शिकार होते रहा है।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

स्वतन्त्रवीर सावरकर की महानता पर कोई फ़र्क नही पडेगा मुर्ति या ना लगने से . आज के यह काले अंग्रेज ज्यादा खतरनाक है उन अंग्रेजो से . संसद के केन्द्रिय कक्ष मे सिर्फ़ सावरकर ,सुभाष बाबू,गांधी जी और सी राजगोपालाचार्य के अलावा सबके चित्र आदमकद है .
सावरकर हमारे दिलो मे जिन्दा है और रहेन्गे .

संजय बेंगाणी said...

सब कहेंगे दिलों में जिन्दा है. मैं कहता हूँ केवल दिलों के ही क्यों जिन्दा रहे? आपके मरने के बाद आने वाली पिढ़ी के दिलों में कौन भरेगा? वे कैसे जानेगी हमारे नायक? आने वाला काल नेट है, इस पर जानकारियाँ भर दो. किताबों से निकालने वालों के बाप की हिम्मत नहीं जो यहाँ मिटा सके.

पी.सी.गोदियाल said...

बस यही कहूँगा कि धिक्कार है !

उम्दा सोच said...

दुर्भाग्य से सावरकर ब्राह्मण थे, गाँधी परिवार से सम्बन्धित भी नहीं थे, और ऊपर से “हिन्दुत्व” के पैरोकार भी थे… यानी तीनों “माइनस” पॉइंट… इससे बडा दुर्भाग्य है कि खुद हिन्दुओं की तथाकथित सेकुलरगिरी और विदेशियो की चाटु-कारिता के बदौलत हिन्दू होना "माइनसपॉइंट" होता जा रहा है।

सुरेश भाऊ आप को प्रधानमंत्री होना चाहिये ।

अनुनाद सिंह said...

वीर सावरकर का क्रान्तिकारी चरित्र भारत के हर सपूत के लिये दीपक के समान है। उनकी विस्तृत जीवनी एवं उनका दर्शन सभी विद्यार्थियों को पढ़ाया जाय तो इस देश का कभी कोई बाल बांका न कर पाये।

केवल वीर सावरकर ही नहीं, सभी क्रान्तिकारियों और देशभक्तों को दरकिनार कर दिया गया है और ब्रिटिशभक्तों, चीनभक्तों, पाकभक्तों की पूछ हो रही है।

जागो भारत, जागो !

दिलीप said...

sahi kaha..savarkar ji ne jis hindutv ke liye jeevan samarpit kar diya wo hindutv hi aaj mar gaya..raajnetaon ne yuvaaon ko kabhi asli dharm aur itihaas jaanne ka samay hi nahi diya unhe pet ki aag me hi jala diya

सुनील दत्त said...

कांग्रेस की स्थापना एक विदशी द्वारा विदेशीयों के हित साधने के लिए की गई है । इस पार्टी का भरातीयों के हितों से दूर का भी बास्ता नहीं।
नेहरू जैसे विदेशीयों के बफादारों ने जाने कितने क्रांतिकारियों को अंग्रेजों के हाथों मरवाया जिससे खुश होकर अंग्रेजों ने विभाजित भारत का सासन अपने गुलाम नेहरू के हबाले किया।
उसी गुलामी की परम्परा को निभाते हुए आज कांग्रेसी इटालियन अंग्रेज के गुलाम हैं व भारत के शत्रुओं के प्रति अपनी बफादारी निभाते हुए सच्चे देशभक्त वीर सावरकर जी का विरोध कर रहे हैं ।

सुनील दत्त said...

कांग्रेस की स्थापना एक विदशी द्वारा विदेशीयों के हित साधने के लिए की गई है । इस पार्टी का भरातीयों के हितों से दूर का भी बास्ता नहीं।
नेहरू जैसे विदेशीयों के बफादारों ने जाने कितने क्रांतिकारियों को अंग्रेजों के हाथों मरवाया जिससे खुश होकर अंग्रेजों ने विभाजित भारत का सासन अपने गुलाम नेहरू के हबाले किया।
उसी गुलामी की परम्परा को निभाते हुए आज कांग्रेसी इटालियन अंग्रेज के गुलाम हैं व भारत के शत्रुओं के प्रति अपनी बफादारी निभाते हुए सच्चे देशभक्त वीर सावरकर जी का विरोध कर रहे हैं ।

दिवाकर मणि said...

स्वातंत्र्यवीर सावरकर, आप धराधाम पर शीघ्रातिशीघ्र पुनः पधारें और आकर सोनिया मादाम के भक्ति-पुराण की एक कॉपी किसी भी कांग्रेसी नेता से लेकर उसका सस्वर वाचन करें, तभी आप इनके लिए अस्पृश्य नहीं हो सकते। अन्यथा भले ही आप देशवासियों के लिए कितने भी प्रेरणास्रोत क्यों ना हों, वर्ना हम मादाम माइनो सोनिया के पालतु, बिना दुम के भी पुछल्ली हिलाने वाले कांग्रेसी आपका हर मंच से विरोध करते रहेंगे।
॥जय हो.....जय हो....॥

man said...

आजादी की लड़ाई तो केवल नेहरु जी ने ही लड़ी थी ,तो पार्को के नाम ,सडको के नाम , गली मोहल्लो के नाम ,हवाई अड्डो के नाम .बस स्टैंड के नाम ,सर्किलो पर इन्ही की मूर्तिया सभी कुछ इन्ही के नाम से हे | चैनल भी इन्ही के नाम से चल रहा हे ,कई रैले भी इन्ही के नाम से चल रही होगी ?क्या क्या इनके नाम से नहीं हे?सभी कुछ तो हे ?नाम तो हिंदुस्तान हे लेकिन ,है असल में नेहरु गाँधी स्तान ,होसकता हे की किसी बड़े पहाड़ का नाम भी इन्ही में से ना रख दे ?साला मदारी खानदान ,इन पीछ लगे झमूरो के साथ ,आज १०० सालो से नोटंकी दिखा रह हे पूरे देश को ,नए नए उस्ताद पैदा हो रहे हे और झमूरो की तो कोई गिनती नहीं है सालो की ओकात है मालिश का तेल बेचने जीतनी ,वो देश को बेचने में लगे हुवे हैं ईन उस्तादों के कारण |उस्ताद कभी किसी झोले से सांप निकालता हे लाल पीले ,कभी नेवले सांप की लड़ाई दिखता हे ,जनता समझ नहीं पाती हे क्या माजरा हे ?
इतिहास को तोड़ मरोड़ दिया गया ,बच्चे सोचते हे की चच्चा नेहरु वो गुलाब का फूल इनके लिए रखते थे लेकिन जब उन्हें पता लगेगा की ,साला ये तो अय्याश रांड बाज था तो थूकंते हे साले पर ?एक फोटो में तो ये रंगीला सरे आम मिस मोंत्बेतन से चुहल कर रहा हे ,एक फोटो में साला उसकी चरस की सिगरेट सुलगा रहा हे ,और खुद भी पी रहा हे ,,इन को अनु करनीय बनाया गया अगली पीढ़ी के लिए ,एक किताब में साफ़ लिखा गया हे की महत्मा गाँधी अपने बरहम चर्या के परीक्षण के लिए अपनी चेलियो के बीच नंग धडंग होके सोते थे |
अभी ऐसा होता तो नित्य नद के जेसे गुजरात पोलिसे उन्हें गिरप्तार कर लेती ?
जिसने कस्ट सहे ,उसे गुमनामी के अँधेरे में धकलने का पर्यास किया जा रहा हे ,लेकिन जागरूकता अभी मरी नहीं हे ,internate अभी जवान नहीं हुवा हे ,जीस दिन जवान हो गया ये झूट के किले दरकने में टाइम नहीं लगेगा |पढ़े लिखे लोग समझने लग गए इन मदारियों और झमूरो की हकीकत |पिछली पीढ़ी इन मदारियों के मुगालते में नहीं रहेगी |
सर आप जीस तरह जागरूकता फैलाराहे धीरे रौशनी दिखाई देने लगी हे|कोई शुरुवात विचारो से ही होती हे |धन्य वाद |

Shreekant Athawale said...

किसी भी सभ्यता, समाज या राष्ट्र को उर्जा, शक्ति और मार्गदर्शन उसे उसके अतीत या इतिहास से मिलता है. हमारे यहाँ इसे बदलने का काम कई शताब्दियों पहले बड़े ही सुनियोजित प्रकार से शुरू हो गया था और उसे गति मिली मध्य युग के दर्शनिको जैसे महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, बाबा साहेब अंबेडकर, इंदिरा गाँधी, (अपवाद स्वरूप वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री, राम मनोहर लोहिया इत्यादी) आदि के पदार्पण के बाद. इन्होने हमारे अतीत और उसके दर्शन को तत्कालीन युग की सामाजिक और राजनैतिक आवश्यकताओं के अनुरूप ना केवल बदल दिया वरन महर्षि अरविंद, महर्षि द्‍यानंद, चाणक्य, विवेकानंद, महाराजा रंजीत सिंगइत्यादि जैसे महान दर्शनिको के दर्शन को भी प्रतिस्थापित भी कर दिया. इसे हम इस पीढ़ी का दुर्दैव ही कह सकते है की उनका मार्गदर्शन यह विखंडित इतिहास और दर्शन करते है और वो अपने आप को आधार विहीन पाते है. आज के महान दर्शनिको और समाज सुधारको की श्रेणी मैं जो विभूटिया सुशोभित होती है वह भी इन्ही मध्य कालीन महापुरुषों के जीवन दर्शन से प्रभावित है और उसी भटकाव को आगे बढ़ा रही है जो राष्ट्र के लिए नितांत घातक है, कुछ उदाहरण इन महान विभूतियों के इस प्रकार है, श्री मणिशंकर अय्यर, श्री अर्जुन सिंग, श्रीजावेद अख़्तर, श्री नितिन गडकरी, श्री राहुल गाँधी, सुश्री तीस्ता सीतलवाड़, श्री प्रणव रॉय, सुश्री बरखा दत्त, श्री शाहरुख ख़ान, श्री आमिर ख़ान, श्री कूलदीप नैयर, श्री ख़ुशवंत सिंग, श्री लालू प्रसाद यादव, सुश्री मायावती, सुश्री अरुंधती रॉय, श्री रजत शर्मा, श्री सचिन पायलट, श्री महेश भट्ट, श्री दीपक चौरसिया, श्री प्रबल प्रताप सींग, इत्यादि. इन सभी महान विभूतियों ने हमारे जीवन की दर्शन और दिशा दोनो बदल दी है.
यह पुराना ग़ूढ मंत्र है की यदि किसी राष्ट्र या शासन करना है तो ज़रूरी है की उस राष्ट्र की अपनी मौलिक पहचान को ही नष्ट कर दो या उसे अपने चश्मे से देखने की आदत डाल दो. मैकले अपने समय का उच्च कोटि का दार्शनिक था ऐसा मे मानता हूँ, क्योंकि उसने शताब्दी पहले जिस विचार की नींव रखी थी वह आज साकार रूप लेती दिख रही है. भारत ने मौलिक आधार खो दिया है, उसकी पहचान बदल गयी है. दोषी और कोई नही हम स्वयं है.

आज भी हम द्रौपदी का चिर हरण होते देखते बैठे रहते है और आशा करते है की श्री कृष्ण पुनः अवतरित होंगे और उसकी आबरू की रक्षा करेंगे. हम अपना अस्तित्व खोने के कगार पर बैठे है.

श्रीकांत

honesty project democracy said...

इनकी नजरों में तो गांधी और नेहरू परिवार के अलावा कोई अन्य देशभक्त हो ही नहीं सकता। हमारे देश का दुर्भाग्य है कि यह हमेशा स्वार्थी तत्वों के षड़यंत्रों का शिकार होते रहा है।

एकदम सही कहा अवधिया जी आपने ,इनको अपना कपूत भी सपूत दीखता है लेकिन इनका नाश भी उसी कपूत के हाथ होगा क्योंकि प्रकृति का नियम है जो अँधा होने का बहाना करता है उसे भगवान अंधा के साथ-साथ लंगरा भी बना देता है |

L.R.Gandhi said...

देश को बेच देने पर उतारू इन सेकुलर शैतानों से 'सावरकर जी जैसे भारत माता के महान सपूत ' के सम्मान की आशा कैसे की जा सकती है। .... आने वाली पीढ़ी को इस महान स्वतंत्रता सेनानी के बारे में बहुमूल्य जानकारी देने के लिए ,सुरेश जी आप को कोटि कोटि साधुवाद...

RAJAN said...

savarkar ka naam sunte hi in nakli secularon ke pet me marod uthne lagte hai.

Pratik Pandey said...

आपकी बात से पूरी तरह सहमत होते हुए भी मेरे मन में वही संशय है, जो बार-बार वीर सावरकर के विरुद्ध प्रयोग में लाया जाता है। आख़िर काले पानी की सज़ा से मुक्त होने के बाद उन्होंने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ कुछ भी क्यों नहीं कहा या किया? उससे पहले ख़ास तौर पर लन्दन प्रवास के अपने 5 वर्षों के दौरान उन्होंने अंग्रेज़ सरकार की नाक में दम कर दिया था, वो भी ब्रिटेन में। रिहा होने के बाद ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने कभी अंग्रेज़ों के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं कहा और विदेशी आक्रांतों से लोहा लेने के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों से भी इति कर ली? कृपया निराकरण कीजिए।

Anonymous said...

क्या कांग्रेस में सिर्फ कुत्ते भरती हैं वह भी दोगले तलवे चाटू?

Suresh Chiplunkar said...

@ प्रतीक भाई -
ऊपरी तौर पर देखा जाये तो यह सही लग सकता है, लेकिन सावरकर ने काला पानी से छूटने के बाद "कुछ नहीं" किया यह कहना अर्धसत्य है…

हाँ ये सही है कि "खुलकर कुछ नहीं" किया… दबे-छिपे बहुत कुछ किया… सजा के दौरान उन के शरीर को इतने कष्ट दिये गये थे कि रिहा होने के बाद वे पूरी तरह कभी स्वस्थ हो ही नहीं पाये…

सबसे बड़ी बात थी "उनकी उपस्थिति", वह ज्यादा जरूरी थी क्रांतिकारियों के नैतिक बल के लिये… और अंग्रेजों से लड़ने के लिये उन्हें कोई तलवार तो उठाना नहीं था, सिर्फ़ गाइडेंस देना था और वह गाइडेंस जेल से बाहर आये बिना नहीं दिया जा सकता था। अंग्रेज भी यह जानते थे, इसीलिये गाँधी-नेहरु आदि को उन्होंने भारत की जेलों में ही रखा आराम से, सभी से मेल-मुलाकात, चिठ्ठी-पत्री आदि के साथ।

लेकिन सावरकर को "काला पानी" भेजा गया, जहाँ उसी जेल में बन्द अपने भाई से वे सालों बाद मिले तब पता चला कि वह भी वर्षों से उसी जेल में है…

narayan bhushania said...

VEER SAWARKAR KI PRATIMA FRANCE ME WANHA KI SARKAR UNKI SMRITI ME LAGANA CHAHTI HAI,TO HAR HINDUSTHANI KO ES PAR GARV HONA CHAHIYE.PAR EK VIDESHI DUARA STHAPIT KI GAI CONGRESS PARTY KI VIDESHI NETA KO EK HINDU KO MILNE WALE ES SAMMAN SE PIDA TO HOGI HI,KYOKI USNE AVM USKE PARIWAR KE KISI BHI SADASY NE AISA KOI KAM KIYA HI NAHI HAI JISASE BHARAT KO GARV HO.SURESH JEE AAP KHOJ KHOJ KE JO JANKARIYA DE RAHE HAIN USKE LIYE AAPKA ABHINANDAN HAI.AAPKA CELL NO. DIJIYE KAM KI BAT KARANA HAI.
NARAYAN BHUSHANIA RAIPUR(C.G.)

sunil patel said...

स्कूल कालेज में सच्चा इतिहास तो पढाया नहीं जाता है. जो पढंगे वोही पता होगा. हमें सच्चा इतिहास बता कर आप एक महान कार्य कर रहे है. सुरेश जी लिखते रहित.

त्यागी said...

सुरेश जी हमेशा की तरह अपने हिंदुत्व के ध्वज को आगे ही बढाया है. आपको सही समय पर सही बात के लिए साधुवाद.
बहुत लम्बी लड़ाई है जो कई सौ साल से चल रही है और न जाने कब तक चलती रहेगी. लाखो वीर सावरकर आएंगे और अपने खून से हिंदुत्व नामक बिज को रक्त से सींचते रहेंगे.
सिर्फ एक तथ्य के तरफ आपका धयान इंगित करूँगा की भारत माता की कोख से उसका एक नाज्यय्ज कुपुत्र मणिशंकर अय्यर अभी भी लोकसभा का मेम्बर नहीं है और २००९ का लोकसभा चुनाव हार गया था. उसको कांग्रेस ने साहित्य (जब की उसके बाप को भी सहिय्त्य नहीं पता की किस चिड़िया का नाम है) को का विद्वान् घोषित करते हुए चोर रस्ते से विद्वता के कोटे से राज्य सभा में मनोनीत किया है. और आजकल हिजड़ा शकल दिखा कर वहीँ से राहुल की भीख पर गुजर बसर कर रहा है. हाँ एक बात जरुर कहूँगा बहुत दुष्ट देखे परन्तु मणिशंकर जैसा हिजड़ा नेता मेने भी नहीं देखा जो लोक सभा में हार कर भी राज्य सभा में राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत नेता विद्वान कोटे से राज्य सभा में गया है. और जहाँ तक बात वीर सावरकर की है तो जिधर वो लघु शंका भी कर दे वहां भी इसका (कुपुत्र अय्यर का ) नाम उस जगह को भी अपवित्र कर देगा. धिक्कार है मणिशंकर तेरी अगली हजार पुश्तो पर. थू थू
parshuram27.blogspot.com/

महफूज़ अली said...

पहले तो आपका बहुत धन्यवाद् जो आपने ये जानकारी हम लोगों तक पहुचाई, बहुत ही निंदनीय है, वीर सावरकर ने जो बलिदान दिया और देश के लिए जो कष्ट सहे उसे भुलाया नहीं जा सकता, चाहे उनकी मूर्ति लगे या ना लगे वो हमारे दिलों में बसते हैं!.... निलेश जी का यह सुंदर और सार्थक कमेन्ट.... यही मैं भी कह रहा हूं.... बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट.....

ajit gupta said...

भारत की वर्तमान सरकार नहीं चाहती कि इस देश में और देश के बाहर गांधी-नेहरू परिवार के अतिरिक्‍त किसी का नाम भी जाना जाए। इसलिए वो फ्रांस सरकार को कभी भी अनुमति नहीं देगी। लेकिन हम सबको कम से कम इन्‍टरनेट और अन्‍य माध्‍यमों से इस बात का भरपूर प्रचार करना चाहिए। अभी इस देश को वास्‍तविक आजादी के लिए लड़ना शेष है।

abhishek purohit said...

bahut bahut danyavad bharat ma ke mahan saput ke bare me likane par.veer vinayak damodar savarkar matr ek vakti ka nam nahi blki us atulani manviya samrthy ke pratik ka nam he jisane vishv ki sabse badi maha shakti ko hila diya tha.
rajsthan me jab bjp ki goverment ayi to savrakar ji ka nam ek sabd se nikalkar ek path v chitra ke sath ho gaya tha,chhoti class ka bchchha bhi savrkar ji ko janane laga tha,par kayar rajniti ne use nahi suhaya us nam v chitra k nirmamta se etihas ki book se bahar kar diya or hum bethe bethe gyapan dete rahe.
dny he vo ma ji sane savrkar ko janm diya jisane apane pure vansh ko matr bhumi par nyochhavar kar diya par badale me es kritagn rastr ne us mahan saput ko kya diya????apaman,jillat,tirskar,usaki deshbhakti par saval,use ek hatyara kaha gaya,use brhmleen ho jane par bhi use nahi baksha,do kodi ka chavvni chhap ayyr ne usake nam ko hataya,gaddar v comunist gundo ne usaka fir apaman kiya,ye sare apaman savarkar ke nahi the blki bharat ma ke the jisane es maha prakrmi saput ko janm diya.
barlin radio se subhash babu savrkar ji ki tarif karate he par in kayar congressiyo ko sunayi nahi deti.andaman ane vale deshbhkt vicharo ke rashiya gume log savarkar ka nam us communist rush me bhi "famous" batate he par yaha communit gundo ko sunayi nahi deti.
dhikkar hai,he hindu samaj tuje!!!!
tu in gadho ko sar par bethata he or savarkar jese veero ke prati upeksha ka bhav rakhata he,jab kabhi is mahan hindu rastr ka itihash likha jayega tak us mahan saput ka nam sabse upar ayega bharat ko savtntr karane me..................naman he veer tujhe naman..........

Ravindra Nath said...

कांग्रेस ने यह निश्चित कर रखा है कि इस देश में नेहरु खानदान के अतिरिक्त किसी को कोई महत्व न मिल सके| यह तो बहुत पुराणी बात है, आज़ादी के पश्चात् भी उनके कारनामे देखने जैसे हैं, लाल बहादुर शास्त्री जी को इंदिरा राजघाट क्षेत्र में जगह देने को तैयार नही थी उनके मौत पर, आखिर क्यों? जब ललिता जी ने अनशन कि धमकी दी तब ही उनका अंतिम संस्कार वहां हो पाया| P V narasimharao के परिजनों को मजबूर किया कि वो उनका अंतिम संस्कार आन्ध्र में करे जिससे राजघाट क्षेत्र में वो नेहरु खानदान कि बराबरी में न दिखे| एक पूर्व प्रधानमंत्री को वहां जगह नही मिलती है, और जरा सोचिये संजय गाँधी को वहां किस हैसियत से जगह मिल जाती है?

शिवम् मिश्रा said...

इस जानकारी के लिए आपको साधुवाद !

Bhavesh (भावेश ) said...

कांग्रेस के लिए ये कोई नई बात नहीं है. आजादी के पहले या बाद कांग्रेस ने जनता को बेवकूफ अनपढ़ और गरीब अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए ही बना रखा है. कांग्रेस से सीख कर अब ये काम देश के सब राजनितिक पार्टिया कर रही है क्योंकि सत्ता का सुख तो सब को चाहिए. अगर ज्यादा पीछे न जाए तो भोपाल गैस शर्तिया विश्व की पहली घटना है जब किसी देश की सरकार ने अपने हजारों नागरिकों की मौत के जिम्मेदार व्यक्ति को सुरक्षित निकल भागने का मार्ग सुलभ करा दिया हो। वैसे तो हमारा कानून किसी अपराधी को मदद करने वाले को भी अपराधी मानता है। और इस मामले में मददगार और कोई नहीं बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी, तत्कालीन गृहमंत्री नरसिंह राव, मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह, मुख्य सचिव ब्रम्हस्वरूप और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए.एम. अहमदी थे। एंडरसन को एक अति विशिष्ट व्यक्ति की तरह उसे विशेष सरकारी विमान से दिल्ली पहुंचा दिया गया। दिल्ली पहुंचा एंडरसन तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह और अन्य नेताओ से मुलाकात करता है और फिर फुर्र्र... आज कुछ लोग उस नब्बे साल के व्यक्ति को यहाँ लाने की बात कर रहे है. मेरा प्रश्न है की सर्वप्रथम तो उसे जाने ही क्यों दिया. दूसरी बात, वैसे तो अमेरिका उसे प्रतार्पित करेगी ही नहीं लेकिन अगर कही गलती से भी अब उस नब्बे साल के बूढ़े को लेकर भारत आ भी गए तो जब तक उसके खिलाफ कोई कार्यवाही शुरू हो वो अगर जिन्दा रहा तो सौ साल से ऊपर का हो चूका होगा. तब तक उसकी मिजाजपुर्सी का खर्चा भी हमारे देश के करदाताओ को अपनी कमाई से भरना पड़ेगा. हमारे देश की कांग्रेस सरकार के द्वारा पाल पोस कर बड़ा किया हुआ ये लचर कानून और न्याय प्रणाली को देखते हुए एंडरसन अमेरिका में ही रहे तो हमारे लिए ठीक है. गलती जनता की है जो कांग्रेस, माया, लालू, जया जैसो को वोते देती है और फिर तरक्की की उम्मींद करती है.

नवीन त्यागी said...

१९ दिसंबर ,सन १९१३ में सर केड्रोक (जो की उस समय भारत सारकार का गृह सचिव था) सावरकर की चिठ्ठी पढ़कर सावरकर से मिलने अंडमान गया था. और वीर सावरकर से अंग्रेजी सरकार से छमा मांगने को कहा .
जब वह वहां से वापस आया तो उसने लिखा था ,"सावरकर के किसी भी प्रकार का खेद या पश्चाताप प्रकट नहीं किया है. सावरकर को अंडमान में किसी भी प्रकार की आजादी देना संभव नहीं है. मेरा मानना है कि वह इतना महत्वपूर्ण नेता है की भारतीय क्रांतिकारियों का यूरोपियन दस्ता कुछ ही संमय में उसके पलायन का षड्यंत्र रच देगा."
अब ये कोंग्रेसी कुत्ते क्यों भोकते हैं ये तो वो ही जाने.

नवीन त्यागी said...

१९ दिसंबर ,सन १९१३ में सर केड्रोक (जो की उस समय भारत सारकार का गृह सचिव था) सावरकर की चिठ्ठी पढ़कर सावरकर से मिलने अंडमान गया था. और वीर सावरकर से अंग्रेजी सरकार से छमा मांगने को कहा .
जब वह वहां से वापस आया तो उसने लिखा था ,"सावरकर के किसी भी प्रकार का खेद या पश्चाताप प्रकट नहीं किया है. सावरकर को अंडमान में किसी भी प्रकार की आजादी देना संभव नहीं है. मेरा मानना है कि वह इतना महत्वपूर्ण नेता है की भारतीय क्रांतिकारियों का यूरोपियन दस्ता कुछ ही संमय में उसके पलायन का षड्यंत्र रच देगा."
अब ये कोंग्रेसी कुत्ते क्यों भोकते हैं ये तो वो ही जाने.

नवीन त्यागी said...

प्रतीक भाई अगर सावरकर न होते तो आज तुम मुसलमान बना दिए गए होते. सावरकर ने ही अंग्रेजी सेना में १५ लाख हिन्दू युवा भारती कराये थे. जिससे अंग्रेजी भारतीय सेना में जो हिन्दू अनुपात केवल १५% था उसे ६५% कर दिया ,उससे पहले ७०% मुसलमान थे. सोचो अगर बटवारे के समय सेना में मुस्लिम पहले अनुपात में होते तो क्या होता? ये सावरकर की ही दूरदर्शिता थी.
सुभाष चन्द्र बोश ने सिंगापूर रेडियो पर स्वीकार किया था कि मुझे आइ० एन० ए० के संगठन को दोबारा से संगठित करने का परामर्श वीर सावरकर ने ही दिया था. कोंग्रेस की पूर्ण रूप से मुसलमानों के पक्ष में हिन्दू समाज की ब्लेकमेलिंग भी सावरकर ने रोकी थी.सन १९२९ में सरदार भगत सिंह स्वं सावरकर से आशीर्वाद लेने रत्ना गिरी गए थे. जब सावरकर का सारा इतिहास कोंग्रेस ने समाप्त ही कर दिया तो आप व हमको तो यही लगेगा कि सावरकर कोंन थे.

नवीन त्यागी said...

और जिस मणिशंकर के सोनिया के इशारे पर सावरकर के चरित्र पर कीचड़ उछली जरा उसके बारे में भी जानिए. .....................
मणिशंकर का चरित्र एक ऐसे राष्ट्रद्रोही का रहा है,जिसको कभी छमा नही किया जा सकता।
१९६२ में जिस समय चीन ने भारत पर आक्रमण किया था,उस समय ये नेता लन्दन में पढ़ाई कर रहा था। पूरा का पूरा देश इस आक्रमण से शोकग्रस्त था। गाँव गाँव व नगर नगर से भारतीय सैनिको के लिए धन एकत्र किया जा रहा था।माता व बहनों ने अपने हाथों के जेवर व मंगलसूत्र तक भारतीय सेना के लिए दे दिए थे। सारा देश रो रहा था। परंतु लन्दन में ये देशद्रोही कुछ और ही खेल खेल रहा था। अय्यर व इसके साथी भी सैनिको के लिए चंदा एकत्र कर रहे थे किंतु वो जो धन एकत्र कर रहा था,वो भारतीय सैनिको के लिए नही बल्कि लाल सेना (चीनी सेना) के लिए धन एकत्र कर रहा था।
उसकी इस बात का नेहरू को भी पता था।क्यो कि जिस समय अय्यर का चयन इंडियन फ़ौरन सर्विस में हुआ था, तो देश की सबसे बड़ी जासूसी संस्था ने प्रधानमंत्री कार्यालय को एक पत्र लिखा,तथा उपरोक्त बात का हवाला देते हुए उसके चयन पर रोक लगाने को कहा। परन्तु देश के इस महान? नेता ने भी अय्यर का पक्ष लेते हुए उसके चयन को मान्यता दे दी।

nitin tyagi said...

इस जानकारी के लिए आपको साधुवाद !

nitin tyagi said...

इस जानकारी के लिए आपको साधुवाद !

सुलभ § Sulabh said...

वीर सावरकर जब तक जीये तब तक सैकड़ों देशभक्तों को प्रेरणा मिलती रही... अगर उनके सम्मान में कोई बाधा डालता है तो वो सबसे बड़ा देशद्रोह है.
अब अपना काम तो यही है की आने वाली पीढ़ी अपने स्वातंत्र्य इतिहास और उनके सच्चे नायकों की अमर जीवन गाथा से परिचित रहे. इसके लिए समानांतर रूप से कार्य करते रहने की जरुरत है.

बड़े आश्चर्य की बात है अपने बहुत सारे बुद्धिजीवी लेखक आदि भी राष्ट्र अभिमान से जुड़े ऐसे महत्वपूर्ण मामलों पर अपनी सक्रियता नहीं दिखाते.

Deepesh said...

@sureshchiplunkar भारत में यह भी हो रहा है। जरा इसे तो पढिए, खून खौल जाएगा...

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/6033793.cms

Anonymous said...

is sabko khatm karney ka ek hi tarika hai, hum sab ko khud satta mein aakar saari gandgi saaf karni hogi.

Anonymous said...

vaise to me aap ki bat se sahmat hun lekin jab aap hi kehte ho ki hindu me ekta hi nahi hai aur phir aap hi pandit aur sc/obc beech me la dete ho.
pehle aap hi soch lijiye ki sab logon me ekta chahiye ya phir kewal high caste ke log.

Indra said...

सावरकर की देश भक्ति पर शक करने वालों को ये सोचना चाहिए कि अंग्रेजों ने सावरकर को नेहरु गाँधी कि तरह आम जेलों में क्यों नहीं रखा जहाँ पर नेहरु को तो इतनी सुविधा दी जाती थी कि उसने daily soap के लेखक कि तरह पूरी एक series में अपनी बेटी को पत्र लिख डाले. जहाँ तक अय्यर #@!!@##&^% कि बात है इसमें कोई शक नहीं कि उसकी इंग्लिश vocabulary बहुत अच्छी है मगर वो हमेशा उसका उपयोग गाली देने के लिए ही करता है. गाँधी परिवार की चमचागिरी और पाकिस्तान की तारीफ़ यही एक काम है.

rohit said...

पोस्ट तो बहुत अच्छी है लेकिन .................

rohit said...

शहीदों की चिताओ पर लगेंगे चाट के ठेले वतन पर मरने बालो को यही हमारा सलाम होगा
कही पढ़ा था आज सही लग रहा है

rohit said...

बंधू नेहरू ने जो देश के लिए किया वोह आज भी हमारे सामने है दूसरी पञ्च वर्षीय योजना काल में देश में जो औधोगिकी करण को उन्होंने बढ़ावा दिया वोह उनकी दूरदर्शिता को दिखाता है आज हम सार्वजनिक क्षेत्र की प्रगति के करण ही इतना आगे बढ़ सके . बड़े बांधो का निर्माण किया गया .इंदिरा जी को तो स्वयं अटल जी ने भी दुर्गा का अवतार कहा और उनकी कूटनीति देखिये की पाकिस्तान को किस खूबसूरती से तोड़ दिया अगर ऐसा नहीं होता तो हम दो मोर्चो पर लड़ रहे होते एक पूर्वी और एक पश्चिमी . जो सही किया उसे सही कहने में कोई गलती नहीं है बांको का रास्ट्रीय करण किया जो कितना सही फैसला था उन परिस्तिथियों में हरित क्रांति का आगाज हुआ उनके ही समय में.ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया उनके ही समय में थी किसी में इतनी हिम्मत. आज भी हम कश्मीर को रो रहे है नाक्साली समस्या से परेशां हो रहे है लेकिन कोई कठोर कदम नहीं उठा पा रहे है
मुझे गलत ना समझा जाये लेकिन इन बातो पर भी विचार किया जाए

देखिये हर आदमी हर जगह सही नहीं हो सकता है उन्होंने भी बहुत से गलत फैसले लिए जैसे चीन के साथ संबंधो को लीजिये

rohit said...

dont take me otherwise.i am not against to anybody all are mu brothers.

शंकर फुलारा said...

kangresiyon ke is gande khun ki asliyat aakhir hamre desh ki janta kab samjhegi | in logon me asli bhartiy khun hota hi nahin | kyonki ye jyadatar anaitikta ki baat hi karte hain| aapne bahut hi acchhi jankari di uske liye dhanyavaad hamne savarkar ji ke vishay me itna nahin padha tha |

Anonymous said...

सावरकर जैसे नेता युगों में एक बार जन्म लेते है. उनका अवतरण हिन्दू जाति के उत्थान के लिए ही हुआ था. आजादी के बाद सावरकर और सुभाष बाबु के साथ जो कुछ सरकार ने किया वह अक्षम्य है, मणिशंकर अय्यर नाम के नासपीटे को लानत हर देशप्रेमी भेजेगा. जय हिंद, जय भारत. सावरकर जी की इतनी अच्छी जानकारी देने को साधुवाद.

Anonymous said...

रोहित जी की बात से सहमत "शहीदों की चिताओ पर लगेंगे चाट के ठेले वतन पर मरने बालो को यही हमारा सलाम होगा"

Common Hindu said...

Hello Blogger Friend,

Your excellent post has been back-linked in
http://hinduonline.blogspot.com/

- a blog for Daily Posts, News, Views Compilation by a Common Hindu
- Hindu Online.

Yogesh said...

Hi all.
Thanks Mr. Suresh for this blog. Here I would like all of you to go through this link
http://www.esamskriti.com/essay-chapters/Why-was-Gandhi-killed-(full)-1.aspx

this is very long and will take time to read and finish but do read it. This will explain us what a great damage Mr. Gandhi has done to India and Hindu and why he got killed.

Samir Jain said...

Suresh Ji,AApka Ye prayaas Bahut Acha Hai....Lekin Hindustan Ka Bhagwaan Hi Malik hai..Aam Janta aise hi pareshaan hoti rahegi....kyunki Chahe Congress ho ya BJP,Communist Ho Ya Samazwadi sab ke sab ek hi thaili ke chette batte hain......Aap aur Hum kuch nahi ker sakte.....kyunki aaj jo vatawaran hai,jaise (TV,MEdia, Newspapers,Industrialist,Education System,Neta, IAS,ICS aur sabhi Government Infrastructure)==(Samaz ke Mafia), ye sab ke sab AAm Janta ko Gumraha ker rahe hai....Kisi Bacche mei bhi Rastarbhakti nahi paida hoti hai,kyunki usko KG mei aate hi Doctor ya Engineer ya Bada Businessmen Banne ki iccha jagrat karai jaat hai...Aur tou aur Ab is Bhaand Media ne Reality Show aur chalu ker ke hamare Bacchon(Children) ko Pahle se hi Bhaand Banana chalu ker diya hai.....tou inke tou adarsh ye bhaand hi haonge.Veer Savrkar,Bhagat Singh,Netaji Bose jaise logon ko kaun jaanta hai......Tou Sabse Pahle IIs Education System Ko Todna Hoga......Phir iis Media Ki Lagam lagani Padegi.....Phir Jab Sanskaar honge tou ham ache Neta Bhi Khade Ker Sakte hain.......ye ek lamba process hai.....lekin billi ke gale mei ghanti kaun bandhe???????

berojgar said...

अफजल गुरु या अजमल कसाब की मूर्ती लगवा सकती है कांग्रेस,सावरकर की नहीं.

निशाचर said...

नेहरु खानदान जेल सिर्फ एक पिकनिक के रूप में ही जाता था. कमला नेहरु टी0 बी० से पीड़ित होकर भुवाली सेनेटोरियम( नैनीताल) में भर्ती हुईं तो नेहरु को उनके पास रहने और उनसे मिलने की सुविधा देने के लिए नैनी जेल (इलाहाबाद) से नैनीताल जेल में शिफ्ट कर दिया गया (आखिर अंगरेज भी इंसानियत पसंद थे लेकिन सिर्फ इस खानदान के लिए) जबकि कालापानी की सजा काट रहे देशभक्तों के पूरे परिवार मर - खप गए और उन्हें खबर भी नहीं हुई, भगत सिंह की लाश भी घर वालों को नहीं मिली.
नेहरु को एक बार नाभा रियासत की पुलिस ने पकड़ लिया और जेल में बंद कर दिया ( नाभा रियासत, अंग्रेजी अधिकार क्षेत्र से बहार स्वतंत्र राज्य था). मोतीलाल नेहरु ने सीधे वायसराय से संपर्क किया और उसके हस्तक्षेप से जवाहरलाल नाभा जेल से रिहा हुए. घर पहुचने पर टायफाइड ने धर दबोचा (जेल में पिस्सुओं ने खासी सेवा की थी), छः महीने लगे ठीक होने में... नेहरु ने फिर कभी अंगरेजों के सिवा किसी और के अधिकार वाली जेल में नहीं पड़ने की कसम खायी.

सुरेश जी, आपकी इस "ब्राह्मण" वाली थ्योरी पर मुझे सख्त ऐतराज है. हिन्दुओं के बेडा जातिवाद ने ही गर्क किया है और जातिवाद किसी दलित या obc की देन नहीं है.........

dinesh said...

savarkar ji par di hui jankari badhia hai .bahut-2 dhanyavad.

dinesh said...

आपका बहुत धन्यवाद् जो आपने ये जानकारी हम लोगों तक पहुचाई, बहुत ही निंदनीय है, वीर सावरकर ने जो बलिदान दिया और देश के लिए जो कष्ट सहे उसे भुलाया नहीं जा सकता

Saffron HinduRashtra said...

प्रतिक जी, आपका ये कथन की सावरकर जी ने नजरबंदी के बाद कुछ नहीं किया गलत है, सावरकर जी ने जो कुछ पहले उग्र होकर किया बाद में वही नरम होकर किया, उनके ह्रदय में वही अग्नि थी जो 1910 में समुद्र में कूदने के समय थी, पर इससे उनकी ह्रदय की अग्नि बुझी नहीं, याद है आपको 1935 में हैदराबाद में उन्होंने हिन्दू महासभा के 10000 के जत्थे भेज कर निजाम की सत्ता को धुल में मिटा दिया था, उन्होंने ही 1941 में सिंध में सत्यार्थ प्रकाश के प्रतिबंध के बाद उग्र प्रदर्शन किये थे और सभी हिन्दू राज्यों में कुरान को प्रतिबंध करने की मांग की थी, आपने शायद सावरकर जी को पढ़ा ही नहीं जाना ही नहीं, वरना आप भी मणि शंकर ayyar की तरह ऐसी मुर्खता पूर्ण बाते न करते, गाँधी जी तो नोआखली के बाद शांत रहे पर जब बिहार में हिन्दुओ ने मुल्लो को काट काट कर पूर्वी पाकिस्तान में खदेड़ा तो ये बैठ गये अनशन पर, ये याद है या नहीं,

Amol Bajpai said...

बहुत अच्छा लेख सुरेश जी