Friday, June 18, 2010

जनगणना में “धर्म” शामिल करने की माँग साम्प्रदायिकता है क्या??…… Religion & Caste in India Census 2011

जब इन्फ़ोसिस के पूर्व सीईओ नन्दन नीलकेणि ने बहुप्रचारित और अनमोल टाइप की “यूनिक आईडेंटिफ़िकेशन नम्बर” योजना के प्रमुख के रूप में कार्यभार सम्भाला था, उस समय बहुत उम्मीद जागी थी, कि शायद अब कुछ ठोस काम होगा, लेकिन जिस तरह से भारत की सुस्त-मक्कार और भ्रष्ट सरकारी बाबू प्रणाली इस योजना को पलीता लगाने में लगी हुई है, उस कारण वह उम्मीद धीरे-धीरे मुरझाने लगी है। UID (Unique Identification Number) बनाने के पहले चरण में जनगणना की जानी है, जिसमें काफ़ी सारा डाटा एकत्रित किया जाना है। पहले चरण में ही तमाम राजनैतिक दलों, कथित प्रगतिशीलों और जातिवादियों ने जनगणना में “जाति” के कॉलम को शामिल करवाने के लिये एक मुहिम सी छेड़ दी है। चारों तरफ़ से हमले हो रहे हैं कि “जाति एक हकीकत है”, “जाति को शामिल करने से सही तस्वीर सामने आ सकेगी…” आदि-आदि। चारों ओर ऐसी हवा बनाई जा रही है, मानो जनगणना में “जाति” शामिल होने से और उसके नतीजों से (जिसका फ़ायदा सिर्फ़ नेता ही उठायेंगे) भारत में कोई क्रान्ति आने वाली हो।

इस सारे हंगामे में इस बात पर कोई चर्चा नहीं हो रही कि –

1) जनगणना फ़ॉर्म में “धर्म” वाला कॉलम क्यों नहीं है?


2) धर्म बड़ा है या जाति?


3) क्या देश में धर्म सम्बन्धी आँकड़ों की कोई अहमियत नहीं है?


4) क्या ऐसा किसी साजिश के तहत किया जा रहा है?

ऐसे कई सवाल हैं, लेकिन चूंकि मामला धर्म से जुड़ा है इसलिये इन प्रश्नों पर इक्का-दुक्का आवाज़ें उठ रही हैं। बात यह भी है कि मामला धर्म से जुड़ा है और ऐसे में वामपंथियों-सेकुलरों और प्रगतिशीलों द्वारा “साम्प्रदायिक” घोषित होने का खतरा रहता है, जबकि “जाति” की बात उठाने पर न तो वामपंथी और न ही सेकुलर… कोई भी कुछ नहीं बोलेगा… क्योंकि शायद यह प्रगतिशीलता की निशानी है।

सवाल मुँह बाये खड़े हैं कि आखिर नीलकेणि जी पर ऐसा कौन सा दबाव है कि उन्होंने जनगणना के इतने बड़े फ़ॉर्म में “सौ तरह के सवाल” पूछे हैं लेकिन “धर्म” का सवाल गायब कर दिया।

अर्थात देश को यह कभी नहीं पता चलेगा कि –

1) पिछले 10 साल में कितने धर्म परिवर्तन हुए? देश में हिन्दुओं की संख्या में कितनी कमी आई?

2) भारत जैसे “महान” देश में ईसाईयों का प्रतिशत किस राज्य में कितना बढ़ा

3) असम-पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में मुस्लिमों की संख्या कितनी बढ़ी,

4) किस जिले में मुस्लिम अल्पसंख्यक से बहुसंख्यक बन गये

5) उड़ीसा और झारखण्ड के आदिवासी कहे जाने वाले वाकई में कितने आदिवासी हैं और उनमें से कितने अन्दर ही अन्दर ईसाई बन गये।

उल्लेखनीय है कि पिछले 10-15 साल में भारत में जहाँ एक ओर एवेंजेलिस्टों द्वारा धर्म परिवर्तन की मुहिम जोरशोर से चलाई गई है, वहीं दूसरी ओर बांग्लादेश से घुसपैठ के जरिये असम और बंगाल के कई जिलों में मुस्लिम जनसंख्या का अनुपात चिन्ताजनक तरीके बढ़ा है। ऐसे हालात में नीलकेणि जी को तो धर्म वाला कॉलम अति-आवश्यक श्रेणी में रखना चाहिये था। बल्कि मेरा सुझाव तो यह भी है कि “वर्तमान धर्म कब से” वाला एक और अतिरिक्त कॉलम जोड़ा जाना चाहिये, ताकि जवाब देने वाला नागरिक बता सके कि क्या वह जन्म से ही उस धर्म में है या “बाद” में आया, साथ जनगणना में पूछे जाने वाले सवालों को एक “शपथ-पत्र” समान माना जाये ताकि बाद में कोई उससे मुकर न सके।

मजे की बात यह है कि जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द ने भी “धर्म” का कॉलम जुड़वाने की माँग की है, हालांकि उनकी माँग की वजह दूसरी है। जमीयत का कहना है कि सरकार मुसलमानों की जनसंख्या को घटाकर दिखाना चाहती है, ताकि उन्हें उनके अधिकारों, सुविधाओं और योजनाओं से वंचित किया जा सके। (यहाँ पढ़ें…)


इससे लगता है कि मौलाना को विश्वास हो गया है कि पिछले 10 साल में भारत में मुस्लिमों की जनसंख्या 13 या 15% से बढ़कर अब 20% हो गई है? और इसीलिये वे चाहते हैं कि उचित प्रतिशत के आधार पर “उचित” प्रतिनिधित्व और “उचित” योजनाएं उन्हें दी जायें, जबकि हिन्दुओं द्वारा जनगणना में धर्म शामिल करवाने की माँग इस डर को लेकर है कि उनकी जनसंख्या और कुछ “खास” इलाकों में जनसंख्या सन्तुलन बेहद खतरनाक तरीके से बदल चुका है, लेकिन यह तभी पता चलेगा जब जनगणना फ़ॉर्म में “धर्म” पता चले। प्रधानमंत्री ने “जाति” की गणना करने सम्बन्धी माँग को प्रारम्भिक तौर पर मान लिया है, लेकिन “धर्म” सम्बन्धी आँकड़ों को जाहिर करवाने के लिये शायद उन्हें सोनिया से पूछना पड़ेगा, क्योंकि मैडम माइनो शायद इसे हरी झण्डी दिखाएं, क्योंकि ऐसा होने पर “ईसाई संगठनों” द्वारा आदिवासी इलाके में चलाये जा रहे धर्म परिवर्तन की पूरी पोल खुल जाने का डर है।

जमीयत के मौलाना के विचार महाराष्ट्र के अल्पसंख्यक आयोग सदस्य और “क्रिश्चियन वॉइस” के अध्यक्ष अब्राहम मथाई से कितने मिलते-जुलते हैं, मुम्बई में अब्राहम मथाई ने भी ठीक वही कहा, जो मौलाना ने लखनऊ में कहा, कि “धर्म सम्बन्धी सही आँकड़े नहीं मिलने से अल्पसंख्यकों को नुकसान होगा, उन्हें सही “अनुपात” में योजनाएं, सुविधाएं और विभिन्न गैर-सरकारी संस्थाओं में उचित प्रतिनिधित्व नही मिलेगा… अर्थात हर कोई “अपना-अपना फ़ायदा” देख रहा है। (इधर देखें…)


जनगणना के पहले दौर में मकानों और रहवासियों के आँकड़े एकत्रित किये जायेंगे, जबकि दूसरे दौर से बायोमीट्रिक आँकड़े एकत्रित करने की शुरुआत की जायेगी। जनगणना के पहले ही दौर में सरकारी कर्मचारी इतनी गलतियाँ और मक्कारी कर रहे हैं कि पता नहीं अगला दौर शुरु होगा भी या नहीं। भारत पहले भी मतदाता पहचान पत्र की शेषन साहब की योजना को शानदार पलीता लगा चुका है और अब वे कार्ड किसी काम के नहीं रहे। 2011 की जनगणना पर लगभग 2200 करोड रुपया खर्च होगा, जबकि बायोमीट्रिक कार्ड के लिये 800 करोड रुपये का प्रावधान अलग से किया गया है।

हमारी नीलकेणि जी से सिर्फ़ इतनी गुज़ारिश है कि “जाति-जाति-जाति” के शोर में “धर्म” जैसे महत्वपूर्ण मसले को न भूल जायें। यदि गणना में जाति शामिल नहीं भी करते हैं तब भी “धर्म” तो अवश्य ही शामिल करें।

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अन्त में एक सवाल : क्या केन्द्रीय मंत्री अम्बिका सोनी पुनः हिन्दू बन गई हैं? या अब तक ईसाई ही हैं? और आखिर वह ईसाई बनीं कब थीं?… 2011 जनगणना फ़ॉर्म से “धर्म” को गायब करने की वजह से ही ऐसे सवाल मेरे “भोले मन में हिलोरें” ले रहे हैं क्योंकि नेट पर खोजने से एक वेबसाईट (यहाँ देखें…) उन्हें “हिन्दू” बताती है, जबकि एक वेबसाईट “ईसाई” (यहाँ देखें…)… हम जैसे “अकिंचन” लोगों को कैसे पता चले कि आखिर माननीया मंत्री महोदय किस धर्म को “फ़ॉलो” करती हैं…


प्रिय पाठकों, नीचे दी हुई लिंक पर देखिये, “भारत के माननीय ईसाईयों” की लिस्ट में आपको - विजय अमृतराज, अरुंधती रॉय, प्रणव रॉय, बॉबी जिन्दल, राजशेखर रेड्डी और जगनमोहन रेड्डी, टेनिस खिलाड़ी महेश भूपति, अभिनेत्री नगमा, दक्षिण की सुपरस्टार नयनतारा, अम्बिका सोनी, अजीत जोगी, मन्दाकिनी, मलाईका अरोरा, अमृता अरोरा जैसे कई नाम मिलेंगे… जिन्होंने धर्म तो बदल लिया लेकिन भारत की जनता (यानी हिन्दुओं) को “*$*%%**” बनाने के लिये, अपना नाम नहीं बदला।

http://notableindianchristians.webs.com/apps/blog/

तो अब आप खुद ही बताईये नीलकेणि साहब, जब देश के बड़े शहरों में यह हाल हैं तो भारत के दूरदराज आदिवासी इलाकों में क्या हो रहा होगा, हमें कैसे पता चलेगा कि झाबुआ का “शान्तिलाल भूरिया” अभी भी आदिवासी ही है या ईसाई बन चुका? और जब बन ही चुका है, तो खुद को “पापी” क्यों महसूस करता है, नाम भी बदल लेता?

नन्दन जी, उठिये!!! अब क्या विचार है? जनगणना 2011 के फ़ॉर्म में - 1) “धर्म” और 2) “वर्तमान धर्म में कब से”, नामक दो कॉलम जोड़ रहे हैं क्या? या “किसी खास व्यक्ति” से पूछना पड़ेगा?


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42 comments:

Suresh Chiplunkar said...

नोट : दोपहर को "पावर कट" की वजह से 2 बजे से 6 बजे तक एवं रात में कम्प्यूटर से दूरी की वजह से रात 10 बजे से सुबह 10 बजे तक आने वाली टिप्पणियाँ देर से प्रकाशित हो सकेंगी…। प्रकाशित अवश्य होंगी…

अमित शर्मा said...

धर्म तो बदल लिया लेकिन भारत की जनता (यानी हिन्दुओं) को “*$*%%**” बनाने के लिये, अपना नाम नहीं बदला।

“*$*%%**” to hamesha se hi banaye jate rahe hai, or badi shan se bante bhi hai ham dharmnirpekshta ke naam par

kunwarji's said...

@-"मजे की बात यह है कि जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द ने भी “धर्म” का कॉलम जुड़वाने की माँग की है, हालांकि उनकी माँग की वजह दूसरी है। जमीयत का कहना है कि सरकार मुसलमानों की जनसंख्या को घटाकर दिखाना चाहती है, ताकि उन्हें उनके अधिकारों, सुविधाओं और योजनाओं से वंचित किया जा सके।"



क्या इस बात का अपने मुन्नू(मनमोहन सिंह) जी को भी पता है क्या...?वो तो मर गए बेचारे इनके लिए अपना सब कुछ(मतलब देश का और देश की जनता का) न्योछावर करते और इन्हें अब भी उन पर भरोसा नहीं है.....


बेचारे प्रधानमंत्री और सोनिया की कांग्रेस..... इतना कुछ करने पर भी कोई इज्ज़त नहीं मिली....

कुंवर जी,

मुगैम्बो said...

मुगैम्बो खुश हुआ

सुनील दत्त said...

आपकी पोस्ट ने सेकुलर गिरोह की मक्कारी व हिन्दूओं से दगावाजी का क्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया।
साथ ही आपने ये भी बकता दिया किस तरह मुसलिम व ईसाई अपनी बढ़ी हुई जनशंख्या को लेकर इतने उतसुक क्यों हैं?

'उदय' said...

.... सब गड्ड-मड्ड है!!!!

दिवाकर मणि said...

वैसे तो आपके सभी आलेखों का विषय तर्कसंगत और समसामयिक होता है, यह आलेख कुछ ज्यादा ही समसामयिक है। आज हर ओर जाति की संकीर्ण राजनीति करने वाले अपनी चिल्ल-पों मचाकर धर्मनिरपेक्षता के पहरेदार बने हुए है, इसमें धर्म की बात उठाना ही साम्प्रदायिक बना देने के लिए काफी है। और आप इस आधार पर पूरे ही साम्प्रदायिक हैं, और हमारे जैसे समर्थनकर्ता भी। लेकिन क्या करें, अगर गलत के विरुद्ध आवाज उठाना ही हमें गलत ठहराता है, तो फिर गलत बनना भी मंजूर है।

[जरा इधर भी तो नजर डालिए, जनाब.. ->http://diwakarmani.blogspot.com/2010/06/blog-post_17.html]

हिंदुत्व और राष्ट्रवाद said...

सुरेशजी, दो बात..

1) अब आप धर्म की वकालत क्यूँ कर रहे है..?? .क्या 21वीं सदी मे अब हम लोगो को फिर अलग -अलग वर्गों मे बताना चाहते है.. ?? क्या अब ये जनगणना सिर्फ़ "भारतीयों" के लिए नही हो सकती....
2) दूसरी बात ये की मैने एक बार टीवी पर "समाजवादी सेक्युलर" सांसद को जातीय आधारित जनगणना पर हद से ज़्यादा ज़ोर देकर इसकी वकालत करते हुए देखा था, क्या आपको नही लगता की अगर जातीए आधारित जनगणना हुई तो फिर ये लोग अलग से आरक्षण और पिछड़े वर्ग मे सामिल करने की माँग करेंगे..??? और आप तो जानते है की हमारी दयालु "तुरिन सरकार" इनलोगों की माँग कभी नही टालेगी चाहे "लतियाते हिंदुओं" का कितना भी हक़ मारना पड़े..

मेरी राय मे तो ये जनगणना धर्म के आधार पर नही होनी चाहिए..

हिंदुत्व और राष्ट्रवाद said...

सुरेशजी, दो बात..

1) अब आप धर्म की वकालत क्यूँ कर रहे है..?? .क्या 21वीं सदी मे अब हम लोगो को फिर अलग -अलग वर्गों मे बताना चाहते है.. ?? क्या अब ये जनगणना सिर्फ़ "भारतीयों" के लिए नही हो सकती....
2) दूसरी बात ये की मैने एक बार टीवी पर "समाजवादी सेक्युलर" सांसद को जातीय आधारित जनगणना पर हद से ज़्यादा ज़ोर देकर इसकी वकालत करते हुए देखा था, क्या आपको नही लगता की अगर जातीए आधारित जनगणना हुई तो फिर ये लोग अलग से आरक्षण और पिछड़े वर्ग मे सामिल करने की माँग करेंगे..??? और आप तो जानते है की हमारी दयालु "तुरिन सरकार" इनलोगों की माँग कभी नही टालेगी चाहे "लतियाते हिंदुओं" का कितना भी हक़ मारना पड़े..

मेरी राय मे तो ये जनगणना धर्म के आधार पर नही होनी चाहिए..

Anonymous said...

Britain bans Indian Muslim preacher

LONDON: Britain has banned a radical Indian preacher, who claimed that “every Muslim should be a terrorist,” from entering the country, a paper reported Friday, citing the interior minister.
Zakir Naik, a 44-year-old television preacher, had been due to give a series of lectures in London and northern England but new Home Secretary Theresa May decided to bar him, said the Daily Telegraph.

“I have excluded Dr Naik from the UK,” said May, cited by the paper.

“Numerous comments made by Dr Naik are evidence to me of his unacceptable behaviour.

“Coming to the UK is a privilege not a right and I am not willing to allow those who might not be conducive to the public good to enter the UK.”

man said...

सर अजीब बात हे इस तथ्य का हर पहलू ही सभी को किसी ने किसी रूप से फायदे बंद नजर आ रह हे ,सर खतरा हे तो केंद्र सरकार की नियत से जो रास्ट्र और बहुसंख्यक समाज के पर्ती आने वाले इसके खतरों को छूपा ले |अल्पसंख्यक पहले ही विशेष श्रेणी में हे ,कई अतिरिकत लाभ उठा रहा हे ,लकिन इसके जरिये वो और अपनी स्थिति को शक्तिशाली दिखाना चाह रहा हे ,जीस से और अधिक से अधिक इन जीभ लटकाए बेठे वोटो के कूतो को ललचा सके |मुल्ला मनमोहन ,लल्लू कुरैशी.,सोनिया बानो ,राहुल खा , उमर दिग्विजय ,.शफी अमर ,मिया मुलायम ,परनव शाह ,बुध गिलानी ,वंदना आजमी ,परकास शरीफ ,जेसे कई"" रोंग जेनेटिक कोड" वाले हे ,जो खुल के इनके लिए अधीक से अधीक pakage की मांग करेंगे|केंद्र सरकार कंही आंकड़ो को तोड़ मरोड़ के तो अपने मन माफिक बन्येगी ?ये भी जवलन्त पेर्ष्ण हे ,क्यों की जो धिटाई और नकटा पन अभी दिखा रही हे उस से आशा करना व्यर्थ हे ,बे शर्मी की हद तक कह रहे हे की अन्दर्सन मारा जाता यदि भागते नहीं तो,एक बूढ़ी शर्मीला टेगोर कहा रही हे की कानून वयवस्था बिगड़ेगी यदी अजफल को फांसी लगी तो ,,,शेम शेम.....थू सालो

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

इस मुद्दे पर आप के साथ

Vivek Rastogi said...

पता नहीं आप क्यों मैडम के पीछे नहा धोकर पड़े हैं :) लगता है कि आपको भी टिकट चाहिये :D

पहले अंग्रेज आये थे अब देश के अंग्रेज हैं जो फ़ूट डालकर राज कर रहे हैं। सुरेश जी हम आपकी लेखनी के सामने नतमस्तक हैं, आप तो क्या गजब ही लिखते हैं।

ये धर्म के कितने कितने लोग हैं, ये तो जनसंख्या वाले नहीं देख पाये, पर क्या कोई और तरीका हो सकता है कि सही सही नहीं परंतु कुछ अंदाजा तो लगे, जैसे इन क्रास वालों ने झाबुआ में पहले २० रुपये में भी और एक वक्त के खाने में भी भीलों को क्रिश्चन बनाया है, और फ़िर विहिप या भाजपा की यंग ब्रिगेड ने अभियान चलाकर वापस हिन्दू बनाना शुरु किया। आप देखिये यहाँ पर भी मैडम का ही हाथ होगा।

जहाँ एक वक्त के खाने के लिये लोग धर्म बदल लेते हैं, वहाँ पर क्या हमारे हिन्दू संगठनों को कार्य नहीं करना चाहिये। आप देखेंगे कि उन जगहों पर ये क्रास वाले अपनी जड़े फ़ैला चुके हैं।

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

सुरेश जी धन्यवाद.. आपने एक महत्वपूर्ण और सार्थक मुद्दे की और ध्यान आकर्षित करवाया है |

पर आज की मीडिया और हिन्दू शिक्षित जनता दोनों के दिमाग में क्षद्म सेकुलरवाद का वाईरस घुस गया है | ऐसे दूषित सोच से तो देश का भला होने से रहा | सच ही कहा है "आवहिं काल विनाशय बुद्धि" |

ajit gupta said...

वर्तमान सरकार की मंशा स्‍पष्‍ट है वह जातियों में समाज को बांटकर हिन्‍दुओं की एकता और संख्‍याबल को नगण्‍य करना चाहती है जबकि धर्म का कॉलम नहीं रखकर अल्‍पसंख्‍यकों के अधिकारों को सुरक्षित रखना चाहती है। अंग्रेज यह बीज बोकर गए थे, उन्‍होंने सर्वप्रथम जनजातियों को हिन्‍द़ओं से पृथक किया फिर सिक्‍खों को। 1936 की जनगणना के पूर्व तक सभी हिन्‍दु थे। अब इस गणना के बाद हिन्‍दु या भारतीय कोई नहीं रहेगा सब अपनी जातियों में बंट जाएंगे। फिर कैसा हिन्‍दुस्‍थान और कैसा भारत? जिसकी संख्‍या ज्‍यादा होगी वह नाम इस देश का हो जाएगा। बिना युद्ध किए भारत समाप्‍त।

Rajeev Pathak said...

जहाँ एक वक्त के खाने के लिये लोग धर्म बदल लेते हैं, वहाँ पर क्या हमारे हिन्दू संगठनों को कार्य नहीं करना चाहिये। आप देखेंगे कि उन जगहों पर ये क्रास वाले अपनी जड़े फ़ैला चुके हैं।
विवेक जी , आप ऐसे जगहों पर सायद नहीं गए जहा भारत माता का दिया सब है लेकिन सत्ता भी जबरन धर्म परिवर्तन करबाने में जुटी है.......आइये कभी पूर्वोत्तर भारत सब आँखों से देख लेंगे.
और आप श्री सुरेश जी के भाव को समझिये वो भी यही कह रहे है कि इस प्रकार का जानगणना और समाज में विकृतिया लाएगी...और राष्ट्र विरोधी भारत के कमजोर कड़ी का उपयोग करेंगे.

दीर्घतमा said...

Suresh ji
Namaste
hame lagta hai ki jangadna dharm ke adhar par thik nahi honi chahiye.
waise to bharat me do prakar ki nagrikta honi chahiye ,alpsankhyako ko mul subidhao se banchit karna padega.
lekin kangresiyo ki malkin Soniya ka kya hoga

Mahak said...

@सुरेश जी

सच में @हिंदुत्व एवं राष्ट्रवाद की बात सही और है और मैं उससे सहमत हूँ की जनगणना जातीय और धार्मिक आधार पर ना करकर एक भारतीय के आधार पर की जाए , जो @हिंदुत्व एवं राष्ट्रवाद ने आपसे प्रश्न किया है वही मेरा भी है ,आपको इसका उत्तर अवश्य देना चाहिए .

महक

नवीन त्यागी said...

suresh ji aapka lekh ek or dhyaan dilata hai ki congres ki mammi va baaba rahul ka dharam kya hai.agar dharam ke aadhar par jansankhya ginti ho to shayad inka dharam bhi pata chal jaea.

JanMit said...

aap ke lekh abhhi kuchh hi dino se parhna suru kiya hai. bahoot achha vishay uthaya hai aapne.dhanyawad.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

उचित है, गणना कराई जाये और देश में तीन प्रशासनिक इकाइयों की व्यवस्था की जाये, एक अल्पसंख्यकों के लिये, एक आरक्षित और एक अनारक्षित.

सुलभ § Sulabh said...

बहुत से आवेदन प्रपत्रों पर धर्म का कॉलम क्यूँ होता है?
वैसे ये तो बहुत ही गलत है की जाति का उल्लेख हो रहा है जनगणना में और धर्म का नहीं.

वे लोग किस श्रेणी में होंगे जो परिवर्तित हैं या अज्ञात धर्म?

गिरिजेश राव said...

ब्रिटेन द्वारा मुल्ला ज़ाकिर नाइक को प्रवेश की अनुमति न देना एक महत्वपूर्ण समाचार है।
धर्म का कॉलम तो अवश्य होना चाहिए। वैसे इस कार्य में निलकेनी जी का हस्तक्षेप या प्रभाव नगण्य है। उनके अधिकार क्षेत्र में जनगणना नहीं आती। उन्हें भी पता चल रहा होगा कि प्राइवेट और सरकारी तंत्र में कितना फर्क है ! :)

भज्जी said...

पोस्ट से हटकर लिख रहा हूँ
आज भज्जी ने जो पाकिस्तानी कुत्तो की हवा निकाली उससे बड़ा मजा आया. साले पाकिस्तानी कुत्ते मैच के बीच मे बहुत भौक रहे थे . ऐसी पिछवाड़े पे लात लगी. कि मुहँ देखने लायक था .इस जीत का तो जश्न होगा
हिँदुस्तान जिँदाबाद
पाकिस्तानी कुत्ते मुर्दाबाद

skmeel said...

pando ko hi problem kyon hai jati ginti se??

skmeel said...

pando ko hi problem hai jati ki gimti se.....kis baat se darte ho,aukaat aa jayegi samne???

man said...

संसद में महिलाओ को ३३% rijervetion मिल जाताहे तो .५० % से ज्यादा नेता अमेरिका जा कर लिंग परिवर्तन करने की तेयारी में हे ?

इस्लाम की दुनिया said...

great

Victor unicorn said...

सुरेश जी धन्यवाद मेरे उठाये बिंदी पर या आपने अपनी प्रेरणा से ही सही वह लेख तो लिख दिया जो लिखना तो मुझे था ,लेकिन भारत सरकार की सेवा शर्तो मे बंधा होने के चलते नाही लिखा ,इसे प्रकाशित मत करे ,जल्द ही आपको माइक्रोसॉफ्ट की गुलामी से बचने वाले सॉफ्टवेयर बताऊँगा ,जो मुफ्त मिलते है ,अगर आप इनके लिंक अपने ब्लाग पे दाल दे बड़ी मेहरबानी होगी

Common Hindu said...

Hello Blogger Friend,

Your excellent post has been back-linked in
http://hinduonline.blogspot.com/

- a blog for Daily Posts, News, Views Compilation by a Common Hindu
- Hindu Online.

Anonymous said...

सुरेश जी, एक बार के लिए मान लीजिए की इस जनगणना मैं धर्म के बाबत भी एक कॉलम है. और उसके आधार पर आँकड़े भी एकत्रा हो जाते है. मान के चलिए की इन आँकड़ो मैं यह पता चलता है की मुसलमान 22 प्रतिशत से बढ़कर 26 प्रतिशत हो गये है. अब इन आँकड़ो का क्या कीजिएगा? क्या कोई भी सरकार चाहे वह भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी अंग की ही क्यों ना हो, क्या सारे मुसलमानो की पकड़कर नसबंदी करा सकती है? क्या आप सारे मुसलमानो को इस आधार पर रॅशन पानी, किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य सेवाएँ, शैक्षिक सुविधाए आदि बंद कर सकते हो (याद रखे की लालू जैसे कई उदाहरण आपको हिंदू समाज मैं भी मिल जाएँगे). क्या वर्तमान के वैश्विक परिदृश्य मैं आप किसी धर्म विशेष को समूल नष्ट करके अपना राज्य स्थापित कर सकते है? ज़रा विचार कीजिए की उन आँकड़ो का आज के भारत मैं क्या होगा? सारी बातों का अंतिम सिरा दिल्ली की 542 स्वार्थी जयचन्द की पंचायत मैं जाकर ही मिलता है. जनगणना आप कभी भी पुन्ह आदेशित कर सकते है. पर पहले उन्हे ले के आइए जो उन आँकड़ो का समुचित रूप से बौध्हिक स्तर पर उपायोग कर सकें. याद रखें की आप मुसलमानो से कितनी भी घृणा करते हों पर अब वो समय नही है की आप मुसलमानो के लिए एकविशेश अत्यंत दमनकारी क़ानून बनाकर उन्हे प्रताड़ित कर सकें और उन्हे इस बात के लिए विवश कर सकें की वह इस भूखंड को छोड़कर किसी भी अग्यात स्थान की और प्रस्थान कर जाए, उन्हे समूल इस भूखंड से निकाल कर बाहर फेंकने का दुस्साहस कर सके या फिर भारतवर्ष मैं उन्हे हिंदू का गुलाम बना कर रख सकें. यह विचार ना केवल मूर्खतापूर्ण हा वरण बचकाना वा असामयिक भी है. आप ऐसे कई उदाहरण देख सकते है की आज भी इसराइल एक अशांत क्षेत्र है व ऐसी चिंगारी है जिसमें पूरी पृथ्वी जलकर राख हो सकती है, कोसोवो या सारजेयेवो या अन्या कोई भी देश का आप उदाहरण ले ले. मैं ऐसे अनेक उदाहरण आज के समय के या इतिहास के पन्नो से आपके समक्ष रख सकता हूँ जो अस्थिर है केवल एक कारण से की वहाँ आतिशाया घृणा व परस्पर वैमान्यस्या है. जिस प्रकार के घृणित विचार यहाँ आपके ब्लॉग पर कुछ सभ्या लोग व्यक्त कर रहे है उससे तो यही लगता है की इन्होने शांति काल मैं जन्मा लिया है इसलिए इन्हे उसकी कीमत नही मालूम है, पूछिए किसी आफ्रिका या पाकिस्तान या वज़ीरिस्तान या अफ़ग़ानिस्तान या कोम्बोडिया या सोमालिया या घाना या किर्गिस्तान या इसी प्रकार के किसी देश के लोगो से की वह क्या जिंदगी जी रहे है. आप के घृणा का स्तर इस देश को इन्ही देशो की श्रेणी मैं लाकर खड़ा कर देगा, जबकि आप आज अमेरिका या ऐसे ही दूसरे देशो के साथ श्रेणी मी खड़े हो पा रहे है. हम और आप बहुत बेहतर जिंदगी जी रहे है दुनिया के बहुतेरे देशो से भले ही वह गाँधी परिवार की या कॉंग्रेस की दी हुई क्यूँ ना हो. जब पूरी दुनिया 21 बी सदी मैं चल रही हो तो हम इस देश को पुन्ह 1800 सदी मैं ले जाने का और इस देश को दूसरा अफ़ग़ानिस्तान या पाकिस्तान बनाने का जोखिम नही उठा सकते. गुस्से से या चिढ़ने से कुछ नही होने वाला, अपना ही खून जलेगा या ब्लॉग का कीमती समय जया जाएगा. मेरी आपसे नम्र विनांती है की इसे मेरी कायरता ना समझिए, गुस्सा मुझे भी बहुत आता है. पर इसे ही उपयुक्त दिशा मैं संतुलित प्रकार से ले जाने के आवश्यकता है. किसी भी राष्ट्रा का निर्माण एक पाँचवर्षीया योजना नही होती वरण उसे बनाने मैं कई पीढ़ियों को अपना पूर्ण जीवन होम करना होता है. हमे हमारे पूर्वाजो के पापों का प्रयशचित्त करना है सो कर रहे है. ज़रूरत है इस बात की आज हम जागे है तो अब ना सोए, अपनी आक्रामकता, आवेश और आक्रोश को नियंत्रित करें व्यर्थ ना गवाए, निस्वार्थी और सही अर्थो मैं पराक्रमी बने, समयानुकूल विचारशीलता दिखाएँ, एक दिशा निश्चित करें और इसे भूखंड को एक ऐसे राष्ट्रा बनाने मैं अपना जीवन होम करें, जिससे पूरा विश्व मार्गदर्शित हो सके.

एक दूसरा विचार जो बहुत से लोगो को नागवार होगा. वैसे देखा जाए तो हम आर्य भी कोई दूध के धुले नही है. इतिहास के सही जानकार जानते है वा मानते है की आर्य इस भूखंड के मूल निवासी नही है वरण एक आक्रांता के रूप मैं इस भूखंड पर आकर अपना अधिपत्य जमाया. वर्ण भेद आर्यो की समाज पधत्ति का एक अभिन्न् अंग है. अब आप स्वयं देख लीजिए की इस ब्लॉग मे हिन्दुत्व के शुभचिंतक सारे उच्च जाती या वर्ण व्यवस्था से है. तो इस सोच मैं ग़लती कहाँ है इस उच्च जाती वर्ग को आज अपना वर्चस्व खोता दिख रहा है इसलिए ही यह छटपटाहट या बौखलाहट है.

SHIVLOK said...

भारत के मुसलमानों से कोई भी घृणा नहीं करता है, कतई घृणा नहीं करते| जहाँ तक मेरा मानना है, सुरेश जी भी घृणा नहीं करते बल्कि भारत के मुसलमानों से हम सब जोरदार प्यार करते हैं ,सच्चा प्यार करते हैं| असल समस्या तुष्टिकरण की राजनीति है, हमें वास्तविक घृणा तुष्टिकरण से है|
तुष्टिकरण की इस राजनीति के लिए बहुसंख्यक हिंदू ही ज़िम्मेदार है क्योंकि वो बँटा हुआ है | बहुसंख्यक हिंदू यदि एक हो जाए तो ये सारे राजनीतिक दल हिंदुओं के तुष्टिकरण में लग जाएँगे|
तुष्टिकरण किसी का भी अच्छा नहीं होता, सरकार को तो न्यायप्रिय ही होना चाहिए, लेकिन ऐसा तभी हो सकता है, जब जनता सुशिक्षित हो और लोभी लालची ना हो ,क्योकि लोभी लालची अशिक्षित का ही तुष्टिकरण किया जा सकता है |
सभी राजनीतिक दल मुसलमानों का तुष्टिकरण करने में लगे हैं क्योंकि सारे राजनीतिक दल जानते हैं की तुष्टिकरण किसका किया जा सकता है तुष्टिकरण की आवश्यक शर्त है
"लोभी - लालची - अशिक्षित होना"
राष्ट्र की समस्याओं की ज़्यादा ज़िम्मेदारी बहुसंख्यक वर्ग की ही है | जिस राष्ट्र का बहुसंख्यक वर्ग सुसूप्तावस्था में हो उस राष्ट्र की बर्बादी होनी ही होती है|
अगर देश को बचाना है तो बहुसंख्यक वर्ग की एकता का अभियान चलाना होगा| कवियों को , लेखकों को,धर्माचार्यों को, शिक्षित वर्ग को एकजुट होकर बहुसंख्यक वर्ग की एकता का महा अभियान चलाना पड़ेगा | तभी भारत में तुष्टिकरण रुकेगा और न्यायप्रिय व्यवस्था बनेगी |

Shreekant Athawale said...

सुरेश जी, उपर्युक्त "बेनामी" पोस्ट मेरा ही है. वो मैने जानबूझकर लिखा था, यह जानने के लिए की दूसरे ब्लॉगगेर्स को नाम से ज़्यादा प्यार है या की विचार से. इसके लिए मैं सभी महनुभवो से क्षमा चाहता हूँ.
@शिवलोक जी, आपके विचार काफ़ी परिपक्व लगे. धन्यवाद. और एक ऐसे विचारक से परिचय हुआ जो यह मानता है की समस्या कॉंग्रेस या गाँधी परिवार या मुसलमान नही अपितु हम स्वयं है. हमारे मराठी मैं एक कहावत है की “नसेल ते बेटा आनी असेल ते मीट्वा” अर्थात जो नही है उसकी अपेक्षा करो जबकि जो है उसे दुरलक्ष्य करो या नष्ट करो. क्षमा चाहता हूँ पर कुच्छ ब्लॉगगेर्स के विचार इसी प्रकार के है.
@ सुरेश जी, जब हम लोगो मैं से कोई कहता है की भारत अभी लोकतंत्र के लिए परिपक्व नही हुआ है तो उसमे हम भी आते है. हम सभी महनुभव मैं से कितने लोकतंत्र को पूर्ण रूप से जीते है. “स्वतंत्रता”, “स्वछ्न्दता” और “स्वराचारिता” मे बहुत अंतर होता है. हम स्वतंत्रता और लोकतंत्र को स्वछ्न्दता का और स्वराचारिता का पर्ययवाची मान लेते है. मुझे विश्वास है की आप सृजनात्मक आलोचना के पक्षधर है और किसी भी स्वस्थ्य विचार गोष्टी का अभिन्न अंग मानते है, तथा किसी के द्वारा स्वयं की सृजनात्मक आलोचना को भी सहर्ष स्वीकारते है. मुझे क्षमा करे कभी कभी मुझे आपके विचार भी अन्य ब्लॉगगेरो की तर्ज पर साम्राज्यवादी लगते है ना की राष्ट्रवादी. आज का काल साम्राज्या विस्तार का नही है. हमारे मध्य युग के पूर्वाजो ने हमे जिस भारत को सौपा है उसके लिए वह तिरस्कार के पात्र है. इस पीढ़ी को उनके नपुंसक व स्वार्थि जीवन का बोझा ढोना है वा प्रयशचित्त करना है.

Devendra Sharma said...

I second your opinion

Rupesh Pant said...

वर्तमान समय में ना तो धर्म का कोई अर्थ रह गया है ना ही जाति का, अब तो केवल पैसा का अर्थ रह गया है और जनगणना भी केवल पैसा बहाने (खाने) के लिये की जा रही है। इसमें किसको कितना फायदा होगा बस केवल यही देखना है। अब केवल उसी घोटाले के इन्‍तजार में।
www.ritualslab.blogspot.com

उम्दा सोच said...

कुछ तथाकथित सेकुलर हिन्दुओं के चलते देश मे हिन्दू होना ही साम्प्रदायिक है वर्तमान मे जनगणना एक कुचक्र है और इसके गम्भीर परिणाम होंगे, समाज को जागरूक करने के प्रति आपका ये प्रयास सराहनीय है ।

अरूण साथी said...

तुष्टिकरण की इस राजनीति के लिए बहुसंख्यक हिंदू ही ज़िम्मेदार है क्योंकि वो बँटा हुआ है | बहुसंख्यक हिंदू यदि एक हो जाए तो ये सारे राजनीतिक दल हिंदुओं के तुष्टिकरण में लग जाएँगे|

विभु said...

हां बंधु धर्म का कॉलम तो इस लिए भी जरूरी है कि जो "नास्तिक" लिखाना चाहे वह लिखा दे - बहुत सी जगह यह छूट है और निरंतर नास्तिकों की संख्या बढ़ रही है। http://www.adherents.com/largecom/com_atheist.html
कट्टर व सहिष्णु धार्मिकता की सब "अच्छाइयां" तो इस देश ने देख लीं शायद नास्तिकता काम कर जाए, बदलाव के इस ओबामा काल में धर्म का कॉलम वह भी नास्तिक के विकल्प के साथ जोर शोर से आना चाहिए।

JANARDAN MISHRA said...

SURESH JI
jangan man ka agar english anuvad aap kar do to sayad medam aur unke gurge khush ho jayenge.....

kapil said...

धर्म और जाति दोनों की गिनती में कोई बुरे नहीं है |निश्चय रूप से धर्म का कोलम तो होना ही चाहिए |

Latest Bollywood News said...

Very Very Nice Blog Thanks for sharing with us

Personal loan said...

very nice post