इस्लामिक बैंकिंग की योजना पर हाईकोर्ट की रोक :- डॉ स्वामी जीते… क्या भाजपा कोई सबक लेगी?...... Islamic Banking, Kerala, NBFC, Terror Funding
जैसा कि अब धीरे-धीरे सभी जान रहे हैं कि केरल में इस्लामीकरण और एवेंजेलिज़्म की आँच तेज होती जा रही है। दोगले वामपंथी और बीमार धर्मनिरपेक्षतावादी कांग्रेस मुसलमानों के वोट लेने के लिये कुछ भी करने को तैयार हैं, इसी कड़ी में केरल के राज्य उद्योग निगम (KSIDC) ने केरल में “इस्लामिक बैंक” खोलने की योजना बनाई थी।
जिन्हें पता नहीं है, उन्हें बता दूं कि “इस्लामिक बैंकिंग” शरीयत के कानूनों के अनुसार गठित किया गया एक बैंक होता है, जिसके नियमों के अनुसार यह बगैर ब्याज पर काम करने वाली वित्त संस्था होती है, यानी इनके अनुसार इस्लामिक बैंक शून्य ब्याज दर पर लोन देता है और बचत राशि पर भी कोई ब्याज नहीं देता। यहाँ देखें… (http://77e57899.linkbucks.com)
आगे हम देखेंगे कि क्यों यह आईडिया पूर्णतः अव्यावहारिक है, लेकिन संक्षेप में कहा जाये तो “इस्लामिक बैंकिंग” एक पाखण्डी अवधारणा है, तथा इसी अवधारणा को केरल राज्य में लागू करवाने के लिये वामपंथी मरे जा रहे हैं, ताकि नंदीग्राम घटना और ममता की धमक के बाद, पश्चिम बंगाल और केरल में छिटक रहे मुस्लिम वोट बैंक को खुश किया जा सके। परन्तु केरल सरकार की इस “महान धर्मनिरपेक्ष कोशिश” को डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी की याचिका ने धक्का देकर गिरा दिया है और केरल हाईकोर्ट ने फ़िलहाल इस्लामिक बैंकिंग सिस्टम को लागू करने की किसी भी “बेशर्म कोशिश” पर रोक लगा दी है।
http://www.thaindian.com/newsportal/business/court-stays-work-on-proposed-islamic-bank-in-kerala_100299303.html
डॉ स्वामी ने ऐसे-ऐसे तर्क दिये कि केरल सरकार की बोलती बन्द हो गई, और आतंकवादियों को “वैध” तरीके से फ़ण्डिंग उपलब्ध करवाने के लिये दुबई के हवाला ऑपरेटरों की योजना खटाई में पड़ गई। आईये पहले देखते हैं कि डॉ स्वामी ने इस्लामिक बैंकिंग के विरोध में क्या-क्या संवैधानिक तर्क पेश किये –
भारत में खोली जाने वाली इस्लामिक बैंकिंग पद्धति अथवा इस प्रकार की कोई भी अन्य नॉन-बैंकिंग फ़ाइनेंस कार्पोरेशन भारत के निम्न कानूनों और संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करती है –
1) पार्टनरशिप एक्ट (1932) का उल्लंघन, जिसके अनुसार अधिकतम 20 पार्टनर हो सकते हैं, क्योंकि KSIDC ने कहा है कि यह पार्टनरशिप (सहभागिता) उसके और निजी उद्यमियों के बीच होगी (जिनकी संख्या कितनी भी हो सकती है)।
2) भारतीय संविदा कानून (1872) की धारा 30 के अनुसार “शर्तों” का उल्लंघन (जबकि यह भी शरीयत के अनुसार नहीं है)।
3) बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट (1949) के सेक्शन 5(b), (c), 9 और 21 का उल्लंघन, जिसके अनुसार किसी भी लाभ-हानि के सौदे, खरीद-बिक्री अथवा सम्पत्ति के विक्रय पर ब्याज लेने पर प्रतिबन्ध लग जाये।
4) RBI कानून (1934) का उल्लंघन
5) नेगोशियेबल इंस्ट्रूमेण्ट एक्ट (1881) का उल्लंघन
6) को-ऑपरेटिव सोसायटी एक्ट (1961) का उल्लंघन
इसके अलावा, शरीयत के मुताबिक इस्लामिक बैंकिंग पद्धति में सिनेमा, होटल, अन्य मनोरंजन उद्योग, शराब, तम्बाकू आदि के व्यापार के लिये भी ॠण नहीं दे सकती, जो कि संविधान की धारा 14 (प्रत्येक नागरिक को बराबरी का अधिकार) का भी उल्लंघन करती है, क्योंकि यदि कोई व्यक्ति अपनी आजीविका के लिये सिनेमा या दारू बार चलाता है, तो उसे कोई भी बैंक ॠण देने से मना नहीं कर सकती। जब केरल सरकार का एक उपक्रम “राज्य उद्योग निगम”, इस प्रकार की शरीयत आधारित बैंकिंग सिस्टम में पार्टनर बनने का इच्छुक है तब यह संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का भी उल्लंघन है। डॉ स्वामी के उपरोक्त तर्कों से यह सिद्ध होता है कि इस्लामिक बैंकिंग टाइप का “सिस्टम” पूरी तरह से भारत के संविधान और कानूनों के विरुद्ध है, और इस्लामिक बैंक खोलने के लिये इनमें बदलाव करना पड़ेगा। दिक्कत यह है कि केरल सरकार और वहाँ की विधानसभा इस प्रकार कानूनों में बदलाव नहीं कर सकती, क्योंकि वित्त, वाणिज्य और संस्थागत फ़ाइनेंस के किसी भी कानून अथवा संवैधानिक प्रावधानों में बदलाव सिर्फ़ संसद ही कर सकती है, और “सेकुलरिज़्म” के पुरोधाओं द्वारा इसके प्रयास भी शुरु हो चुके हैं, इस्लामिक बैंकिंग के पक्ष में सेमिनार आयोजित हो रहे हैं, RBI और SEBI में लॉबिंग शुरु हो चुकी है, राज्यसभा में इस पर बाकायदा बहस भी हो चुकी है…
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अब देखते हैं कि “इस्लामिक बैंकिंग पद्धति” अव्यावहारिक और पाखण्डी क्यों है? कहा जाता है कि इस्लामिक बैंक कोई ब्याज न तो लेते हैं न ही देते हैं। फ़िर सवाल उठता है कि आखिर ये बैंक जीवित कैसे रहते हैं? दरअसल ये बैंक “पिछले दरवाजे” से ब्याज लेते हैं, अर्थात कान तो पकड़ते हैं, लेकिन सिर के पीछे से हाथ घुमाकर। मान लीजिये यदि आपको मकान खरीदने के लिये 10 लाख का लोन लेना है तो साधारण बैंक आपसे गारण्टी मनी लेकर ब्याज जोड़कर आपको 10 लाख का ॠण दे देगी, जबकि इस्लामिक बैंक वह मकान खुद खरीदेगी और आपको 15 लाख में बेच देगी और फ़िर 10-15 वर्षों की “बगैर ब्याज” की किस्तें बनाकर आपको दे देगी। इस तरह से वह बैंक पहले ही सम्पत्ति पर अपना लाभ कमा चुकी होगी और आप सोचेंगे कि आपको बगैर ब्याज का लोन मिल रहा है।
इस्लामिक विद्वान इस प्रकार की बैंकिंग की पुरज़ोर वकालत करते हैं, लेकिन निम्न सवालों के कोई संतोषजनक जवाब इनके पास नहीं हैं –
1) यदि बचत खातों पर ब्याज नहीं मिलेगा, तो वरिष्ट नागरिक जो अपना बुढ़ापा जीवन भर की पूंजी के ब्याज पर ही काटते हैं, उनका क्या होगा?
2) जब ब्याज नहीं लेते हैं तो बैंक के तमाम खर्चे, स्टाफ़ की पगार आदि कैसे निकाली जाती है?
3) “हलाल” कम्पनियों में इन्वेस्टमेंट करने और “हराम” कम्पनियों में इन्वेस्टमेंट करने सम्बन्धी निर्णय बैंक का “शरीयत सलाहकार बोर्ड” करेगा, तो यह सेकुलरिज़्म की कसौटी पर खरा कैसे हो गया?
4) दुबई के पेट्रोडालर वाले धन्ना सेठ इस्लामिक बैंकिंग का प्रयोग सोमालिया, अफ़गानिस्तान और चेचन्या में क्यों नहीं करते? जहाँ एक तरफ़ सोमालिया में इस्लामिक लुटेरे जहाजों को लूटते फ़िर रहे हैं और अफ़गानिस्तान में तालिबान की मेहरबानी से लड़कियों के स्कूल बरबाद हो चुके हैं और बच्चों को रोटी नसीब नहीं हो रही, वहाँ इस्लामिक बैंक क्यों नहीं खोलते?
5) पाकिस्तान जैसा भिखमंगा देश, जो हमेशा खुद की कनपटी पर पिस्तौल रखकर अमेरिका से डालर की भीख मांगता रहता है, वहाँ इस्लामिक बैंकिंग लागू करके खुशहाली क्यों नहीं लाते?
http://www.emeraldinsight.com/Insight/viewContentItem.do?contentId=1571781&contentType=Article
6) क्या यह सच नहीं है कि हाल ही में दुबई में आये “आर्थिक भूकम्प” के पीछे मुख्य कारण इस्लामिक बैंकिंग संस्थाओं का फ़ेल हो जाना था?
7) पहले से ही देश में दो कानून चल रहे हैं, क्या अब बैंकिंग और फ़ाइनेंस भी अलग-अलग होंगे? सरकार के इस कदम को, देश में (खासकर केरल में) इस्लामिक अलगाववाद के “टेस्टिंग चरण” (बीज) के रूप में क्यों न देखा जाये? यानी आगे चलकर इस्लामिक इंश्योरेंस, इस्लामिक रेल्वे, इस्लामिक एयरलाइंस भी आ सकती है?
अन्त में एक सबसे प्रमुख सवाल यह है कि, जब प्रमुख इस्लामिक देशों को अल्लाह ने पेट्रोल की नेमत बख्शी है और ज़मीन से तेल निकालने की लागत प्रति बैरल 10 डालर ही आती है, तब “अल्लाह के बन्दे” उसे 80 डालर प्रति बैरल (बीच में तो यह भाव 200 डालर तक पहुँच गया था) के मनमाने भाव पर क्यों बेचते हैं? क्या यह “अनैतिक मुनाफ़ाखोरी” नहीं है? इतना भारी मुनाफ़ा कमाते समय इस्लाम, हदीस, कुरान आदि की सलाहियतें और शरीयत कानून वगैरह कहाँ चला जाता है? और 10 डालर का तेल 80 डालर में बेचने पर सबसे अधिक प्रभावित कौन हो रहा है, पेट्रोल आयात करने वाले गरीब और विकासशील देश ही ना…? तब यह “हलाल” की कमाई कैसे हुई, यह तो साफ़-साफ़ “हराम” की कमाई है। ऐसे में विश्व भर में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जमाने भर को इस्लामिक बैंकिंग की बिना ब्याज वाली थ्योरी की पट्टी पढ़ाने वाले अरब देश क्यों नहीं 10 डालर की लागत वाला पेट्रोल 15 डालर में सभी को बेच देते, जिससे समूचे विश्व में अमन-शान्ति-भाईचारा बढ़े और गरीबी मिटे, भारत जैसे देश को पेट्रोल आयात में राहत मिले ताकि स्कूलों और अस्पतालों के लिये अधिक पैसा आबंटित किया जा सके? यदि वे ऐसा करते हैं तभी उन्हें “इस्लामिक बैंकिंग” के बारे में कुछ कहने का “नैतिक हक” बनता है, वरना तो यह कोरी लफ़्फ़ाजी ही है।
वर्तमान में देश में तीन वित्त विशेषज्ञ प्रमुख पदों पर हैं, मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी और चिदम्बरम, फ़िर क्यों ये लोग इस प्रकार की अव्यावहारिक अवधारणा का विरोध नहीं कर रहे? क्या इन्हें दिखाई नहीं दे रहा कि इस्लामिक बैंकिंग का चुग्गा डालकर धर्मान्तरण के लिये गरीबों को फ़ँसाया जा सकता है? क्या यह नहीं दिखता कि अल-कायदा, तालिबान और अन्य आतंकवादी नेटवर्कों तथा स्लीपर सेल्स के लिये आधिकारिक रुप से पैसा भारत भेजा जा सकता है? बार-बार कई मुद्दों पर विभिन्न हाईकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट में “लताड़” खाने के बावजूद क्यों कांग्रेसी और वामपंथी अपनी हरकतों से बाज नहीं आते?
सभी को, सब कुछ पता है लेकिन मुस्लिम वोट बैंक की पट्टी, आँखों पर ऐसी बँधी है कि उसके आगे “देशहित” चूल्हे में चला जाता है। भाजपा भी “पोलिटिकली करेक्ट” होने की दयनीय दशा को प्राप्त हो रही है, वरना क्या कारण है कि जो काम अरुण जेटली और रविशंकर प्रसाद को करना चाहिये था उसे डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी को करना पड़ रहा है? जब रुपये-पैसों से मालामाल लेकिन “मानसिक रूप से दो कौड़ी की औकात” रखने वाले विभिन्न NGOs घटिया से घटिया मुद्दों पर जनहित याचिकाओं और मुकदमों की बाढ़ ला देते हैं तो भाजपा के कानूनी सेल को जंग क्यों लगा हुआ है, क्यों नहीं भाजपा भी देशहित से सम्बन्धित मुद्दों को लगातार उठाकर सम्बन्धित पक्षों को न्यायालयों में घसीटती? MF हुसैन नामक “कनखजूरे” को न्यायालयों में मुकदमे लगा-लगाकर ही तो देश से भगाया था, फ़िर भाजपा राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों पर इतना शर्माती क्यों है? डॉ स्वामी से प्रेरणा लेकर ऐसे मामलों में मुकदमे क्यों नहीं ठोकती? अकेले डॉ स्वामी ने ही, कांची कामकोटि शंकराचार्य के अपमान और रामसेतु को तोड़ने के मुद्दे पर विभिन्न न्यायालयों में सरकार की नाक में दम कर रखा है, फ़िर भी भाजपा को अक्ल नहीं आ रही। भाजपा क्यों नहीं समझ रही कि, चाहे वह मुसलमानों के साथ “हमबिस्तर” हो ले, फ़िर भी उसे मुस्लिमों के वोट नहीं मिलने वाले…
बहरहाल, डॉ स्वामी की बदौलत, इस्लामिक बैंकिंग की इस बकवास पर कोर्ट की अस्थायी ही सही फ़िलहाल रोक तो लगी है… यदि केन्द्र सरकार संसद में कानून ही बदलवा दे तो कुछ कहा नहीं जा सकता, क्योंकि “भले आदमी”(?) और “विश्व के सबसे अधिक पढ़े-लिखे प्रधानमंत्री” पहले ही कह चुके हैं… “देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है…” क्योंकि हिन्दू तो…
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48 comments:
भाजपा से उम्मीद जाया है क्योंकि यह भी बेईमान और सत्ता के भूखे हैं. गडकरी को संघ ने भाजपा का मुखिया बनाया है? लगता है सत्ता पाते ही दिमाग फिर गया... गडकरी मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने चला है, उसने कहा है कि वह भाजपा में ज्यादा से ज्यादा मुसलमानों को लायेगा ताकी मुसलमानों में संदेह कम हो...
जो पार्टी इस तरह के बयान दे उससे आशा करना बेकार है कि वह समान कानून, आर्टिकल 356, या मुस्लिम तुष्टीकरण रोकने की इच्छुक है.
सत्य यह है कि भाजपा अब एक निकृष्ट सत्ता-लोलुप पार्टी है जो पद के लिय कातिलों से (शिबु-सोरेन) से भी जुड़ जाती है.
संघ को गडकरी को फौरन लाइन पर लाना चाहिये... यह आदमी भाजपा के जो वोटर बचे है उनको भी दूर करने में लगा है.
जो पार्टी इस तरह के बयान दे उससे आशा करना बेकार है..........सत्य यह है कि भाजपा अब एक निकृष्ट सत्ता-लोलुप पार्टी है जो पद के लिय कातिलों से (शिबु-सोरेन) से भी जुड़ जाती है.
भाऊ सच तो ये है कि भारत देश सरकार भरोसे नही भगवान भरोसे चलता है! एक अखन्ड राष्ट्र नागरिकसमता के विरुद्द चल रहे कानूनो के भरोसे अखन्ड नही रहेगा देखियेगा एक दो दशक मे मियाँ भाई लोग वामपन्थी जयचन्दो के साथ मिलकर भारत से पाकिस्तान पार्ट 2/3/4 बनवा चुके होन्गे !!!
सुब्रमण्यम स्वामी सुलझॆ हुयॆ अक्लमन्द राजनॆता है, भाजपा कॊ इनसॆ सीख लॆनी चाहियॆ
शिबू सॊरॆन् कॆ साथ् भाजपा का गठबन्धन एक अवसरवादिता थी
लॆकिन् फिर् भी मॆरी आशा तॊ भाजपा सॆ ही है.
भाजपा सॆ आशा न् करॆ तॊ क्या काग्रॆस् सॆ करॆ?
bharat sarkar ki %$%#$$%$#%()$#$###$#$$$%
sakularion ki %$#@$^^$$#@#$$%%$#$#$$%#%$%%%
bjp ki %$#^%$%$##@$%%%^%^%^%$%$$$##@#@#
mein aur kuchh nahin kar sakata bhai logon
bhai sahb hindu dhrm ki sb se jyada durgti krne ka shrey bh j pa ko hi hai
yh hinduon ke sath sanp chhchhondr vali sthiti me rhrti hai n to vh hindon ko bkar pati hai aur n hi khul kr smrthn kr pati hai inhe bhi ab bs kisi bhi trh kursi chahiye
aap ne bhut thik kha hai
bdhai
kripya smprk sootr bhejen
dr. ved vyathit
भाजपा भी तो मुस्लिम तुष्टीकरण कर रही है नकवी को दमाद का दर्जा देती है .शहनवाज को सर पर बैठाती है . सिकन्दर बख्त को जन्म भर ढोती रही . लेकिन सुब्रमणियम स्वामी अछूत है भाजपा के लिये . वहा के नेता अपने से ज्यादा काबिल आदमी को बर्दाश्त नही कर पाते . छोटे दिल वाले नेताओ की बडी पार्टी है भा ज पा
हिन्दू को न अक्ल आई है न आयेगी..
श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि "एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान" नहीं हो सकता, लेकिन आज की भाजपा को देखकर नहीं लगता कि वो अपने संस्थापक के विचारों को याद भी रखी है। वोट के लिए ’इस्लामी क्रूरता व आतंकवाद’ के पोषक-पालक "इटलीपुरम् की रहवासी सोनिया मादाम की कांग्रेस", मार्क्स-लेनिन-माओ के अवैध संतानों के भारतीय संस्करण कम्युनिस्ट और सपा-बसपा-द्रमुक-इत्यादि क्षेत्रीय कही जाने वाली परिवारवादी दलों से हम कोई अपेक्षा नहीं रख सकते। गडकरी जी एवं पार्टी, जनमानस की थोड़ी-बहुत आशा आपही लोगों से है। कृपया इस आशा को टूटने ना दें। और सुब्रहमण्यम स्वामी जी से राष्ट्र के लिए सेवा करने का यह तरीका सीख लें तो बेहतर होगा।
उम्दासोच से सहमत। वह दिन दूर नहीं जब इस देश के नेताओं की कृपा से लादेन के भक्त, नराधम औरंगजेब, म्लेच्छ बाबर, हरामी गोरी व गजनी की सोच को लेकर इस भारत भूमि पर पैदा होकर इसको दारुल-इस्लाम बनाने की मंशा के साथ हर तरफ़ आतंकवाद फैलाने वाले पाकिस्तान पार्ट-2,3,4,5,......100,..... का निर्माण कर लेंगे।
कुछ समझ में नहीं आ रहा ?
भाजपा शिव सेना की तरह हिंदुत्व की आवाज प्रखर रूप से क्यों नहीं उठा पाती.
संघ सृष्टि का एक भाग होकर भी भाजपा के लिए ये कदम उठाना मुश्किल क्यों है ??
वैसे सुरेश जी आपके हर लेख में कुछ नया और कुछ विचारणीय बातों के बारे में जानकारी मिलती है.
आप इस ब्लॉग के दीपक के द्वारा अंधकारमय जगत में प्रकाश की दिव्य किरने बिखेरते रहे.
मैं तो शरियत बैंक का समर्थन करता हूँ. हर मुस्लमान को उसके जमा राशि पर ब्याज नहीं देना चाहिए और शरियत विरूद्ध के कामों के लिए लोन नहीं देना चाहिए. कितने मुसलमानों को मंजूर होगा? यही एक रास्ता है समान कानून लागू करवाने का. हर मुसलमान के लिए शरियत कानून लागू कर दो, बाप बाप करते हुए आधूनिक कानून माँगेगें.
@संजय बेंगाणी ji
Provided:वह बैंक जमा खाता मुसलमानों का खोले और लोंन हिन्दुओ को दे ! :)
इस्लामिक बैंकिंग एक ऐसा फलसफा है....जिसे खुद इस्लामिक देश ही नहीं मानते.... फिर भी स***ले सब खुद को इस्लामिक कहते हैं.... जहाँ रुपये -पैसे की बात आएगी.... तो यह लोग सबके कान काटेंगे.... और भारत में चाहे भा.ज. पा. हो या कांग्रेस .... यह लोग सब अपना अपना फायदा देखते हैं.... अभी ही देखिये .... उस कसाब को अब तक फांसी दे देनी चाहिए.... लेकिन फिर से फैसला सुरक्षित कर लिया गया है.... अब यह क्या है....? अब इस देश से सबसे ज़रूरी है की सेक्युलरिज्म हटाया जाए.... अब कल जो मैंने आपसे कहा था फोन पर .... उसकी बहुत ज़रूरत है.... और युवा को भौतिकता का झुनझुना पकड़ा दिया गया है... कि ले भैया...इसे ही बजा और देश के बारे में मत सोच....
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आपके ब्लॉग पर एक कोई वेद व्यथित साहब हैं.... इनकी रोमन हिंदी देख कर ऐसा लगता है.... कि यह साहब खुद ही व्यथित हैं.... इनकी रोमन हिंदी देख कर मन करता है कि दुआ करूँ कि इनके हाथों में पोलिओ हो जाए.... या फिर खुद की आँखें फोड़ लूं.... इनका कमेन्ट पढने के लिए दिमाग को पूरा आत्महत्या करना पडा.... मतलब..... बता रहा हूँ.... आपको.... इन्हें बोलिए कि या तो हिंदी लिखें जैसे ब्लॉग लिखते हैं.... या फिर अच्छी रोमन इंग्लिश में कमेन्ट लिखें....कि आदमी समझ सके.... नाम के आगे डॉ. लगा रखा है...इन्होने.... प्रोफाइल देख कर और लिखने का तरीका देख कर लगता है कि .... बहुत लम्बी लम्बी फेंकी है इन्होने.... इन्हें बोलिए कि अंग्रेजी में एक कहावत है कि "Face is the index of mind" इसी तरह लिखने का तरीका भी सब कुछ बता देता है....बाई गौड़ ...बता रहा हूँ आपसे... इन साहब का कमेन्ट कई बार कई जगह पढ़ा है .... लेकिन आज सब्र का बाँध टूट गया है.... मैं जानता हूँ कि व्यथित साहब को मेरा यह कमेन्ट बुरा लगेगा .... पर क्या करूँ.... अब बर्दाश्त के बाहर था....क्या पता यह कमेन्ट देख कर ही व्यथित साहब सुधार कर लें.....
नोट: कृपया इस कमेन्ट पर कोई विवाद न खडा करें.... मेरी तरह आप सबको दिक्कत होती होगी.... लेकिन अब किसी को तो बोलना ही था न.... इसलिए शुरुआत मैंने ही कर दी.... वेद व्यथित साहब से गुजारिश है कि ऐसा लिखें.... कि आसानी से इंसान पढ़ ले... शब्दों को आपस में जोड़ कर न पढना पड़े... के. जी. के बच्चों की तरह....
मुझे “इस्लामिक बैंकिंग” का क्रेडिट कार्ड चाहिए.
आपने सही लिखा हे सर की इस्लामिक बैंक तो शुरुवात हे अलगाव वाद की ,धीरे धीरे ये और भी मांग करेंगे ,और ये धरत रास्ट्र मांगे मानते जायेंगे ,केसे कपूत पैदा हो गए जो अपने ही देश के टूकड़े करने पर तूले हुवे हे ,आखिर क्यों सो रहा हे हिन्दू ?लकिन जाये भी तो कंहा किसको कहे अपना |,भा ज पा.... को सूखी तपती सड़क पर पानी जेसा नजर आ रहा हे ,बल्की मिलना कुछ नहीं हे ,जनता इन्हें एक ही थाली के बेंगन की तरह देखती हे , खुद को कुछ अलग कहने वाली पार्टी ही कांग्रेस की रह पर चल पड़े तो ,वोर्केरो का मनोबल भी गिरता हे ,जीस मूदे के दम पर बी जे पी ने राज किया उन्ही मूदो को भुला दिया |इतना कुछ होते हुवे बड़े नेताओ की अक्ल पान खाने गयी हुई हे |कंही में सेकुलर और मोर्डेन थिंकिंग वालो के बीच धरम वाला नहीं लगू ,,,ये सोच ही बी जे पी के बड़े नेतावो के चलते पार्टी की विचार धरा को तहस नहस कर दी ?
क्या यह सच नहीं है कि हाल ही में दुबई में आये “आर्थिक भूकम्प” के पीछे मुख्य कारण इस्लामिक बैंकिंग संस्थाओं का फ़ेल हो जाना था\
kya america ke kai bankon ka fail hone ke peeche bhi islamic banking system tha?
ab to bade ho ja bachche.
The boom in Islamic banking is providing a crescent-shaped sliver of good news for the City, London's beleaguered financial district. It's fast becoming the main hub of Islamic banking outside the Middle East, a development encouraged by Britain's Labor government, which laid out the welcome mat to sharia-compliant banks several years ago. "The government sees it as another way to draw business to London, to bring investors to the U.K.," says Duncan McKenzie, director of economics at International Financial Services London.
Growth field. London now is home to 25 companies offering some form of Islamic financing. BLME is the largest of five wholly sharia-compliant banks operating in Britain. The first, the Islamic Bank of Britain, opened in 2004, and the number is expected to double within five years. Moreover, most of Britain's conventional banks also have established "Islamic windows," units that offer sharia-compliant products. Globally, the sector's total assets are pegged at between $500 billion and $1 trillion and growing at a rate of 10 to 15 percent a year.
Plz read.
http://www.usnews.com/articles/news/world/2008/12/10/the-rise-of-islamic-banking-in-a-time-of-economic-crisis.html
अजमेर ब्लास्ट के सिलसिले में जो दो संघी आतंकवादी पकडे गए हैं क्या इस पर कुछ लिखने के लिए आपके पास कुछ समय है. वैसे लगता है ये मुस्लिम तुष्टिकरण हैं.
भाई सुरेस जी बैद्धिक गुलाम हिन्दूओं की आंखें खोल दने वाला लेख लिखने पर आपको बधाई ।उम्मीद है जागरूक हिन्दूओं की जानकारी में बृद्धि होगी व सेकुलर गिरोह के समर्थकों को अपनी बेबकूफी का ऐहसास होगा।
अहमद जी जिस तरह इराक में आक्रमणकारी इसाईयों के विरूद्ध लड़ रहे मुसलमानों को आप आतंकवादी नहीं कह सकते उसी तरह भारत में पाक समर्थक आतंकवादियों द्वारा लगातार किए जा रहे हमलों से त्रस्त हिन्दू अगर उनके अड़डों को उड़ाते हैं तो आप उन्हें आतंकवादी नहीं कह सकते । बैसे हम आपको 100% गारंटी के साथ कह सकते हैं कि ये हमले हिन्दू क्रांतिकारियों ने नहीं बल्कि पाक समर्थक आतंकवादियों ने ही किए होंगे या फिर उनके हित चिंंतक सेकुलर गिरोह ने।
क्या आपको याद नहीं कि मंबई पर हमले के दौरान भी यही अपवाह फैलाइ गई थी कि हमला हिन्दूओं ने किया है बदला लेने के लिए ।आज सच्चाई सबके सामने है। अधिका जानकारी के लिए
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है
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इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली व्यवहारिक नहीं है... इसलिए ख़ुद को इस्लामी कहने वाले भी इस बैंकिंग प्रणाली में यक़ीन नहीं करते... सुरेश जी ने इस्लामी बैंकिंग प्रणाली मुद्दों पर जो सवाल उठाए हैं, उन्हें किसी भी सूरत में नकारा नहीं जा सकता है...
हम हमेशा से कहते रहे हैं की हिन्दुस्तान का 'धर्म निरपेक्ष' होना ही मुल्क के लिए खतरनाक साबित हो रहा है... इस मुल्क की अनेक समस्याएं तो इसके तथाकथित 'धर्म निरपेक्ष' होने की वजह से ही हैं... इस मुल्क में जो भी व्यक्ति शरीयत की बात करे... उस पर 'शरीयत क़ानून' लागू कर देना चाहिए.. फिर देखिये वो ख़ुद ही 'शरीयत क़ानून' से तौबा करता नज़र आएगा...
एक और तरीक़ा है... जो 'शरीयत' के गुण गाये, उसे हमेशा के लिए किसी इस्लामी मुल्क में भेज दिया जाए...
एक पसंद का चटका भी...
पता नहीं ये लोग और क्या क्या इस्लामिक लागू करना चाह रहे हे ,इनको खुद को पता हे के ये व्य वहारिक नहीं हे फिर भी क्योकि शरियत कहती हे ?आज शरियत के नाम पर ढेरो बच्चे पैदा कर के उनके लिए और रास्ट्र के लिए मुसीबत खडी कर रहे हे |आधुनिक सिक्षा से महरूम बना के उन्हें धर्मान्धता का पाठ पढाया जा रहा हे |आज अरब के रिंगर कपडा बांधने वाले शेख किसी भी शरियत का पालन नहीं करते केवल अयाशी और हरम और बेशरम को छोड़ के ? शरियत की पलना केवल आम मुसलमानों के लिए मुल्लावो ने लागू की हे ...अरब के शेखो के खिलाफ कभी फतवा जरी किया हे क्या मूलावो ने ?नहीं जबकि वो कोई भी करम इस्लाम के हिसाब से नहीं करते ...शराब शबाब ,सब शोजो पश्चीमी संसार करता हे ,,सब करते हे ,,फतवा जरी हुआ ?फ़तवा जरी कर के देखो ..पेट और पीठ एक हो जाये उनकी ..कोवे मंडराने लग जाये उनको घरो पे ,,,कम काज मजदूरी तो इनकी कई पीढियों ने नहीं की ?आज दुबई में हर गलीच करम होता हे बोले मुल्ले इनके खिलाफ ...नहीं ना ..बोल दे माचिस खरीदने के फोड़े पड़ जाये ..?फिर आम और गरीब मुसलमान इनके चकार में क्यों आरहा हे ...समय के हिसाब से खुद को बदलने में कोनसी बेवकूफी हे ,,,केवल मरयादा और इजात का ख्याल रखो |
संजय बेंगाणी said...
"मैं तो शरियत बैंक का समर्थन करता हूँ. हर मुस्लमान को उसके जमा राशि पर ब्याज नहीं देना चाहिए और शरियत विरूद्ध के कामों के लिए लोन नहीं देना चाहिए. कितने मुसलमानों को मंजूर होगा? यही एक रास्ता है समान कानून लागू करवाने का. हर मुसलमान के लिए शरियत कानून लागू कर दो"
आपने बिलकुल सही कहा है, मैं इसके लिए तैयार हूँ।
आज ब्याज़ की वजह से ही दुनिया से इंसानियत समाप्त होती जा रही है।
किसी भी चीज़ का सिर्फ इसलिए विरोध करना कि वह इस्लाम का तरीका है, यह बिलकुल भी सही बात नहीं है। उक्त बात के सही और गलत पहलु भी देखे जाने चाहिए। आज ब्याज़ की वजह से ही दुनिया से इंसानियत समाप्त होती जा रही है। पहले अगर कोई रिश्तेदार मदद मांगता था तो लोग खुशी-खुशी देते हैं पंरतु आज सोचते हैं कि इसको पैसे देने की जगह किसी बीमा पालिसी को ले लिया जाए तो आर्थिक फायदा होगा। क्या इसका जवाब है किसी के पास???
आज लादेन का कोई भी बेटा क्यों नहीं फिदायनी बना ,मुस्लिम क्यों गरीब हो के फिदैनियो की रह पर जा रहे हे ? आज सेकड़ो मुस्लिम देश हो कर भी क्यों अमेरिका के तलवे चाट रहे हे ,जबकि ऐसा व्यवहार भारत के साथ नहीं कर सकता ,चाइना के साथ भी नहीं ,जिसका धरम भारतीय मूल का हे ,बोध धरम हिंदुवो का ही धरम हे ,आज जब चाहे वो इरान की पूंगी बजा सकता हे ,ईराक की बजा ही चुका हे ढोलक ,चंग अफगानिस्तान की भी बज गयी ,पाकिस्तान का तो वालियां सूर अभी चालू हे ,कभी जोर दे के कभी हलके हाथ .,,,,क्या कारन हे ,इनके पास धरती तो हे लकिन रास्ट्र का जज्बा नहीं हे ,केवल और केवल इस्लामिक शरियत कानून ,माँ को सलाम या परनाम करने पर फतवा ,अगर इस्लामिक शिकाशाये पर्संगिक होती तो ये रास्ट्र उन्ती नहीं करते क्या ?आज ISRIEL के पास वोही धरती हे जो फिलिस्तीन के पास हे ,आज पकिया के पास वो ही धरती हे जो भारत के पास हे ,केवल बारबार युग की इछ्हा ही इनके पतन का कारन बनेगी
dear sir, islam & islamic bank bank are good things. but it is very difficult to put them in reality, not impssible.to follow the path of dharma is always difficult. everybody wants to talk about dharma but nobody is ready to follow. though we show much.if u follow islam then follow in total not only islamic bank. haram & halal & farz have some meaning in this context.even manu has said something for the people those who live their lives on intrest.
@ खुर्शीद अहमद और
@ शाहनवाज़ - यहाँ मुख्य सवाल यह नहीं है कि इस्लामिक बैंकिंग सही है या नहीं? बल्कि मुख्य सवाल है कि
1) जब भारत धर्मनिरपेक्ष देश है तो यहाँ दो कानून, दो प्रकार के बैंक कैसे और क्यों?
2) डॉ स्वामी ने जो संवैधानिक सवाल उठाये हैं उनके बारे में भी कुछ उचरिये श्रीमान…
3) इस्लामिक बैंक बनाने के लिये भारत के कानून और संवैधानिक बदलाव करने पड़ेंगे? क्या यह भारत के लिये इतना जरूरी है?
4) शरीयत लॉ बोर्ड तय करेगा कि किसे लोन देना है और किसे नहीं? ये कैसी धर्मनिरपेक्षता है?
5) आज इस्लामिक बैंक माँग रहे हैं, कल इस्लामिक इंश्योरेंस, परसों इस्लामिक रेल्वे, अगले दिन इस्लामिक एयरलाइंस आदि की माँग नहीं उठेगी इसकी क्या गारण्टी है?
6) तथाकथित ब्याजरहित लोन देकर गरीबों को इस्लाम की तरफ़ खींचने की चालबाजी तो नहीं?
तात्पर्य यह कि मूल सवालों के जवाब दीजिये, खामखा इस्लामिक बैंक कितना महान है, जैसी इधर-उधर की मत हांकिये…
मैं फिर दोहराऊंगा कि हमारे महफूज जी और फिरदौस जी जैसे सच्चे इन्सानों को और प्रोत्साहन दिया जाये और बाकी सभी लोग इन महानुभावों से सबक लें कि ये जाति-धर्म से ऊपर उठकर सफेद को सफेद और काले को काला कहने की हिम्मत रखते हैं.. फिर चाहे वह हिन्दुओं से सम्बन्धित हो या मुसलमानों से.. काश दस प्रतिशत लोग भी ऐसे हो जायें.. नमन..इन्हें और इनकी सोच को...
महान पोस्ट !!!
मेरे ताजे-ताजे ब्लॉग पर अवश्य पधारें
जमाल, सलीम, कैरान्वी, अयाज जैसी ( कई नाम और भी हैं) हराम की औलादों ने ब्लोग्वानी को गंदा कर दिया है
Shah Nawaz भाई में आप की बात से किसी हद्द तक इत्याफाक करता हूँ की " किसी भी चीज़ का सिर्फ इसलिए विरोध करना कि वह इस्लाम का तरीका है, यह बिलकुल भी सही बात नहीं है। उक्त बात के सही और गलत पहलु भी देखे जाने चाहिए। आज ब्याज़ की वजह से ही दुनिया से इंसानियत समाप्त होती जा रही है।" आप के कथन का आख़री वाक्य आशिक रूप से hee सही है. वास्तब में इंसानियत की खात्मे की मुख्य वजह ब्याज नहीं बल्कि आतंक वाद है और आतंकवाद के अन्तेर राष्ट्रीय थोक विक्रेता दुर्भाग्यवश मुस्लिम ही हैं.
पुरी दोनिया में कहीं भी जब आतंकवाद की बात होती है तब सब से पहले इस्लाम का ही नाम क्यों लिया जाता है? क्या इस के पीछे भी संघ का हाथ है? कभी अपने दिल पर हाथ रख कर सोचें आज पुरी दुनिया में आतंकवाद का पर्याय बन चुका इस्लाम धर्म कब तक आतंकवाद में अपने विलय से खुद को महफूज़ रख पाय गा? इस सब के विपरीत विशव में जब भी शांती या भाईचारे की बात होती है तो हिंदुत्व का ज़िक्र जरूर आता है. जानते हैंक्यों?
हिन्दू धर्म की इसी विशालता और व्यापकता का विवरण मेरे एक मित्र ने मुझे लिख भेजा था, जिसे मेने आप के अवलोकनार्थ अपने ब्लॉग पर रखा हुआ है - http://dixitajayk.blogspot.com/search/label/*WHY%20I%20AM%20A%20HINDU%20-%20MUST%20READ*
Regards
Dikshit Ajay K
डॉ स्वामी jee ke paryas saraahniy hai
@ सुलभ सतरंगी जी
कहीं ऐसा ना हो कि क्रेडिट कार्ड या लोन के लिये इस्लाम धर्म अपनाना अनिवार्य कर दिया जाये।
भाई इस सरकार के भरोसे कुछ भी हो सकता है।
प्रणाम
एक सवाल,
अगर दुबई में आर्थिक भूचाल इस्लामी बैंकिंग के कारण आया तो अमरीका में आर्थिक सूनामी किसके कारण आया? जिसमें थोक के भाव बैंक...
excellent telling sir ji !!!
दादा, उम्मीद करता हूँ, इस पोस्ट की गहराई तक आप कम करेंगे. पता नहीं आजकल क्या क्या ब्लॉग्गिंग हो रही है.
http://hamarianjuman.blogspot.com/2010/05/blog-post_04.html
dear suresh ji
for this post i can say only
"GOOD GREAT ANd Best"
good article and good news at approprite time bring in focus.
House is going on. BJP should raise it in parliament too.
Atleast somebody is who can restircted this bullshit in Bharat.
Credit goes to honorable Dr. Swammy.
Regards
parshuram27.blogspot.com/
Suresh Ji ! Namskar,
Pahli bar aapke blog par tippani kar raha hoon,
@Khursheed~
Yadi Islamic bank itna hi success hai to kyon nahi iski ekadh branch Pakistan me bhi khol deni chahiye. Phir wo katora lekar bheekh to nahi mangega!
Suresh Ji ! Aapke post hamesha hi behad jagrukta wale hote hain !
Likhte rahiye ! NAMASKAR.
एक एक बिंदुओं पर धराशायी कर दिया आपने पृथकतावादी सोच को।
इस्लाम सहअस्तित्व की अवधारणा पर विश्वास नहीं रखता। इस्लामिक बैंकिंग भी उसी प्रवृति का एक हिस्सा है। अपनी एकरूपता से और ग़ैर-इस्लामियों से ख़ुद को आला और अलग समझने की प्रवृति ने ही बेड़ा गर्क कर रखा है।
बैंकिंग के आधारभूत सिद्धांतों को किनारे रखकर भला कोई कैसे बाज़ार में टिक सकता है।
आज शरीयत चाहिए, इस्लामिक बैंक चाहिए, कल फुल बाडी स्कैनर के बिना वाली एयरलाइंस चाहिए परसों मुल्क भी इस्लामिक चाहिए। १९४७ में यही तो हुआ था। मोटे तौर पर उससे हिन्दुओं ने सबक नहीं लिया। कश्मीर में अलगाववाद चरम पर है और अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुका है। वजह सिर्फ और सिर्फ़ यही कि उन्हें अलग मुल्क चाहिए क्योंकि वे वहां बहुमत में हैं।
वैसे धंधेवालों के लिए शेर है---
''दुआ खुदा से करो बंदे से नहीं.. दोस्ती हमसे करो हमारे धंधे से नहीं''
तमिल अभिनेत्री खुश्बू के बयानों के खिलाफ हिंदू मुन्नानी ने याचिका दायर की थी अदालत में, नतीजा क्या हुआ ? भद्द पिट गयी , संस्कृति का दंभ भरने वालों की. खुश्बू को न सिर्फ़ बरी किया गया बल्कि न्यायाधीश ने राधाकृष्ण के बारे में भी आपत्ति जनक टिप्पणी कर दी. इस प्रकार के गैर ज़ुरुई मामलों को अदालत में ले जाने से हासिल क्या होना है? इससे सिर्फ़ अदालत और न्यायपालिका का वक़्त ज़ाया होता है फिर आप ही चीखते हैं की अफ़ज़ल कसाब को फाँसी क्यों नही चढ़ाया.
आपको इस्लामिक बॅंक से एतराज़ है , मुसलमानों के ब्याज़ वसूलने पर आपको आपत्ति है ज़रा गरुड़ पुराण भी पढ़ने का कष्ट करें जनाब, बताया गया है कि सूदखोर व्यक्तियों को नर्क में खौलते तेल के कड़ाहे में तला जाता है , इसका अर्थ तो यह हुआ कि सभी हिंदू बॅंकर्स का परलोक ही बिगड़ गया बेचारे चाहे जितना धर्म कर्म कर लें जाना नर्क में ही है. तो साहब सूदखरी और ब्याज को हर धर्म ग्रंथ में बुरा ही कहा गया है , यह बात अलग है की आज के युग में बिना ब्याज के दुनिया का गुज़ारा मुश्क़िल है
ब्लॉग पर सक्रीय चंद बेअक्ल तथाकथित मुसलमान , तथाकथित इसलिए कि वो इस्लाम के मुताबिक मुसलमान नहीं है खुद जामिया मिल्लिया इस्लामिया जैसे संस्थान के इस्लामिक विद्वान इन जाकिर नायक के चेलों और इनके गुरु को सच्चा मुसलमान मानने से इनकार करते हैं . वो ऐसे किसी भी आदमी को काफिर समझते हैं जो अवतारवाद में यकीन रखता है और मुहम्मद साहब को कल्कि अवतार बताता है . अब , ये लोग पहले आपस में मशविरा करके आम राय कायम करें फ़िर ऐसे किसी सिद्धांत को ब्लॉग में फैलाएं . वैसे इससे जनता को कोई लेना-देना नहीं है . जनता अमन -चैन से अपने अपने भगवान, अपने खुदा के साथ खुश है . उनको भूखे पेट धर्म पर बहस करने की जरुरत और फुरसत दोनों नहीं है . अच्छा होगा यदि ये स्वघोषित धर्मगुरु अपने समाज में व्याप्त बेकारी, गरीबी , अशिक्षा आदि को दूर करें ताकि संसद में धर्म के आधार पर संख्या के आधार पर इनको आरक्षण की भीख ना मांगनी पड़े !
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जैसा आपने कहा इस प्रकार के बैंक की धारणा अव्यवहारिक तो है ही साथ ही इसके पीछे जरुर कोई छिपा हुआ एजेण्डा भी है कि *कुछ लोगों* तक धन पहुँचाने का सुरक्षित तरीका बनाया जाय। ऐसे किसी भी प्रयास को प्रतिबंधित किया जाना चाहिये।
BJP and RSS are two sides of the same coin. Their definition of a Hindu is inclusive of all those who are living in India. Thus it is very clear that they do not exclude Muslims and Christians from their plans.
The intentions of Bajpayee and Advani were clear when they behaved as chamcha of Nehru who banned Balkanisation of India a book by Proffessor Balraj Madhok and these worthies removed him from Jan Sangh.Later they them selves joined Janatadal.
In the present circumstances revival of Jansangh and joining hands with Subramaniam Swamy is the only alternative for true Hindus.
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