शौचालय के मल-मूत्र से सोना उपजाता, गाजियाबाद का प्रगतिशील युवा किसान…… Ecosan Technology Toilets, Sanitation in India
जो लोग ग्रामीण जीवन से परिचित हैं, वे भलीभाँति जानते हैं कि अक्सर गाँवों में सुबह शौच के लिये लोग खेतों की ओर निकल लेते हैं, यह परम्परा भारत में बहुत पुरानी है और कमोबेश आज की स्थिति अधिक बदली नहीं है। अन्तर सिर्फ़ इतना आया है कि गाँवों में कुछ घरों में शौचालय स्थापित हो गये हैं, जबकि बाकी के गाँववाले खेतों की बजाय सामुदायिक शौचालयों में निवृत्त होने जाते हैं।
ग्रामीण जनजीवन को थोड़ा सुगम बनाने और उनके कठिन जीवनयापन की परिस्थितियों को आसान बनाने के लिये वैज्ञानिक लगातार काम करते रहते हैं। इसी कड़ी में “सेनिटेशन विशेषज्ञों” ने एक शौचालय बनाया है, जिसका नाम है “ईको-सैन शौचालय” (EcoSan = Ecological Sanitation)। अब यदि किसी सार्वजनिक शौचालय से गाँव का भला होता हो तथा साथ-साथ उससे कमाई भी होती हो तो यह सोने पर सुहागा ही हुआ ना… इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए उत्तरप्रदेश के गाजियाबाद के पास स्थित ग्राम असलतपुर के एक युवा किसान श्याम मोहन त्यागी ने इस नई तकनीक वाले शौचालय को हाथोंहाथ लिया और अब वह इस शौचालय से अच्छी कमाई कर रहे हैं। शौचालय से कमाई??? जी नहीं, आप गलत समझे… यह सुलभ इंटरनेशनल वाले “पैसा दो शौचालय जाओ” वाली स्टाइल में नहीं कमा रहे, बल्कि गाँववालों को प्रेरित कर रहे हैं कि वे उनके शौचालय में रोज सुबह आयें, क्योंकि त्यागी जी इस शौचालय के मल-मूत्र को एकत्रित करके उसकी कम्पोस्ट खाद बनाते हैं और उसे खेतों में छिड़कते-बिखेरते हैं, और इस वजह से जोरदार “ईको-फ़्रेण्डली” फ़सल ले रहे हैं। त्यागी ने अपने खेतों में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग सन् 2006 से ही बन्द कर दिया है। श्याम मोहन त्यागी, जो कि खुद भी इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएट हैं, को दिल्ली के एक NGO द्वारा बनाये जा रहे ईकोसैन तकनीक वाले शौचालयों के बारे में पता चला, तब उन्होंने अपने खेत के एक हेक्टेयर क्षेत्र में टेस्टिंग के तौर पर इसे आजमाने का फ़ैसला किया।
ज़रा पहले जानिये, इस “ईको-सैन शौचालय” के बारे में… फ़िर आगे बात करते हैं। जैसा कि विज्ञान के छात्र जानते हैं कि एक व्यक्ति अपने मल-मूत्र के जरिये एक वर्ष में 4.56 किलो नाइट्रोजन (N), 0.55 किलो फ़ॉस्फ़ोरस (P), तथा 1.28 किलो पोटेशियम (K) उत्पन्न करता है। यह मात्रा 200 X 400 के एक सामान्य खेत की उर्वरक क्षमता को सन्तुष्ट करने के लिये पर्याप्त है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत की एक अरब से अधिक की आबादी का कुल मल-मूत्र लगभग 60 लाख टन होता है, जो कि भारत में रासायनिक उर्वरकों की कुल खपत का एक-तिहाई है।
ईकोसैन शौचालय की सीट की डिजाइन परम्परागत फ़्लश शौचालय से थोड़ी अलग होती है। परम्परागत शौचालय की सीट में मानव मल-मूत्र दोनों एक साथ, एक ही टैंक में जाता है, जहाँ से उसे सीवर लाइन में भेज दिया जाता है, जबकि ईकोसैन तकनीक शौचालय की सीट दो भागों में होती है, इसके द्वारा मल एक टैंक में एकत्रित किया जाता है, जबकि मूत्र अलग टैंक में… दोनों आपस में मिलने नहीं चाहिये। एक शौचालय के लिये दो सीटों की आवश्यकता होती है, पहली सीट के नीचे का टैंक जब पूरा भर जाता है, तब उस सीट को चार माह तक बन्द करके मानव मल को सूखने और उसमें बैक्टीरिया और जीवाणु उत्पन्न होने के लिये वैसे ही छोड़ दिया जाता है, व तब तक दूसरी सीट उपयोग में लाई जाती है। इसी प्रकार क्रम से अदला-बदली करके एक शौचालय को उपयोग किया जाता है। हाथ-पाँव धोने के लिये व्यवस्था अलग होती है, तात्पर्य यह कि मल-मूत्र और पानी आपस में मिलना नहीं चाहिये। इस शौचालय में उपयोगकर्ता को शौच करने के बाद सिर्फ़ एक मुठ्ठी राख सीट के मल वाले छेद में डालना होता है, राख डालने की वजह से मल जल्दी सूख जाता है, उसमें बदबू भी नहीं रहती और “मित्र-बैक्टीरिया” भी सलामत रहते हैं। इसी प्रकार मूत्र वाले 500 लीटर के टैंक को भी 2 माह के लिये एयर टाइट ढक्कन लगाकर बन्द कर दिया जाता है, ताकि उसमें स्थित अमोनिया बरकरार रहे। दो माह बाद इसमें 1:10 के अनुपात में पानी मिलाकर खेतों में (2000 लीटर प्रति हेक्टेयर) छिड़काव किया जाता है। जबकि राख डालने की वजह से सूख कर ठोस चुके मल को खेतों की मिट्टी के “कण्डीशनर” और उर्वरक क्षमता बढ़ाने के काम में लिया जाता है।
(चित्र में श्याम मोहन त्यागी अपनी फ़सल के ढेर पर बैठे हुए)
इस प्रकार का एक शौचालय (सारे टैंक, सीट, ड्रम और निर्माण सहित) सिर्फ़ 18,000 रुपये में तैयार हो जाता है। जब NGO वालों ने इसे ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को दिखाया तो सैद्धान्तिक रूप से तो सभी ने इसमें रुचि दिखाई, लेकिन मल-मूत्र एकत्रित करने और शौचालय के रखरखाव के नाम पर सभी पीछे हट गये, तब श्याम मोहन त्यागी ने यह पहल की और अपने खेत के पास यह शौचालय लगवाया। त्यागी मजाक-मजाक में कहते हैं कि “जो किसान शुरु में मेरे इस काम को देखकर नाक-भौंह सिकोड़ते थे, अब उन्हीं के बच्चे मेरे खेतों से सब्जियाँ चुराकर ले जाते हैं। 2007 से पहले त्यागी को अपने छोटे से खेत के लिये प्रतिवर्ष रासायनिक उर्वरकों पर लगभग 2000 रुपये तथा बीजों-मिट्टी की क्षमता बढ़ाने के उपायों पर 3000 रुपये खर्च करने पड़ते थे, जबकि आज स्थिति यह है कि आसपास के किसान त्यागी जी से मानव मल-मूत्र निर्मित पर्यावरण-मित्र उर्वरक माँगकर ले जाते हैं। असलतपुर में सार्वजनिक शौचालय निर्मित करने वाले इस युवा किसान से गाँव के दलित भी खुश हैं, क्योंकि पहले कई बार दलितों को दबंग लोग अपने खेतों के आसपास शौच करने के लिये मना करते थे, जबकि त्यागी का शौचालय उनके लिये “मुफ़्त सुविधा” है और त्यागी के लिये फ़ायदे का सौदा।
त्यागी आगे बताते हैं कि दूसरे किसान जहाँ दिन में दो बार सिंचाई करते हैं, वहीं मुझे सिर्फ़ एक बार सिंचाई करनी पड़ती है, क्योंकि मेरे खेत की मिट्टी अब बेहद उपजाऊ हो चुकी है। उनकी योजना है कि मूत्र निर्मित उच्च अमोनिया वाला तरल-उर्वरक पचास पैसे प्रति लीटर की दर से गरीब किसानों को बेचा जाये। (चित्र में त्यागी अपने खेतों में छिड़काव करते हुए)
संक्षेप में कहूं, तो भारत का पढ़ा-लिखा युवा किसान कुछ नया करने के लिये उत्सुक है, सिर्फ़ उसे उचित मार्गदर्शन और सही दिशानिर्देशों की आवश्यकता है। इस प्रकार के ग्रामीण-मित्र शौचालयों की सबसे बड़ी बात तो यह है कि ये विशुद्ध रूप से पर्यावरण मित्र हैं, पानी की बचत करते हैं, धरती पर बढ़ रहे रासायनिक कचरे को कम करने में मदद करेंगे और शक्तिशाली बहुराष्ट्रीय उर्वरक कम्पनियों की दादागिरी और मनमर्जी से किसानों को थोड़ी मुक्ति दिलायेंगे…
ईकोसैन शौचालय की पूरी तकनीक समझने के लिये यू-ट्यूब पर यह वीडियो देखिये…
http://www.youtube.com/watch?v=YV-1To9DkJQ
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विषयान्तर और मनोगत :- (मित्रों-पाठकों, कुछ वरिष्ठों द्वारा मुझसे यह अनुरोध किया गया है कि मैं “राष्ट्रवाद” के अलावा भी, जरा “हट-के” पोस्ट लिखा करूं। हालांकि मुझे किसी के सामने कुछ भी साबित करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन मेरे कुछ और प्रेमी पाठकों के इस अनुरोध पर यह “शौचालय और मल-मूत्र” वाली पोस्ट दे रहा हूं (मल-मूत्र पर सामाजिक पोस्ट लिखना… है ना हट-के? ऐसे सब्जेक्ट पर लिखो जिस पर कम लोग लिख रहे हों, उसे कहते हैं “हट-के”)। पहले भी ऐसे कई सामाजिक लेख मैं लिख चुका हूं, परन्तु देशहित और राष्ट्र के सामने मंडरा रहे खतरों के मद्देनज़र मेरी लिखी गई तीखी पोस्टों की वजह से मेरी एक विशिष्ट “छवि” बना दी गई है, और सेकुलरिज़्म-कांग्रेस-पाकिस्तान-इस्लामी आतंकवाद-धर्मान्तरण आदि शब्द सुनते ही, खौलते खून से लिखी गई पोस्टों को दुर्भाग्य से मुस्लिम विरोधी मान लिया जाता है…। मैं अपने पाठकों को विश्वास दिलाना चाहता हूं कि “ईकोसैन शौचालय” जैसी “हट-के” पोस्ट बीच-बीच में आती रहेंगी… परन्तु इस ब्लॉग का तेवर चिरपरिचित वही राष्ट्रवादी रहेगा, चाहे किसी के पिछवाड़े में कितनी भी मिर्ची लगे…। क्रिकेट पर भी बहुत दिनों से कुछ नहीं लिखा उस बारे में भी कुछ पाठक ईमेल से शिकायत कर चुके हैं… जल्दी ही उस पर भी कुछ लिखूंगा…)
इस लेख के लिये सन्दर्भ साभार – पत्रिका “डाउन टू अर्थ”, दिनांक 16/11/2008 तथा www.indiawaterportal.org
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35 comments:
badhiya jaankari wali post!
kunwar ji,
सार्थक लेख. धन्यवाद! डाउन टू अर्थ मैंने भी बहुत पढ़ी है... कुछ साल पहले उसमें एक लेख था जिसमें हाथी के मल से कागज बनाने के बारे में जानकारी थी...यह तो उससे भी आगे है. ये हुई सच्चे मायनों में 'आर्गेनिक' खेती. :)
जय हिंद
सचमुच एक हट कर पोस्ट. वैसे ये त्यागी जी का प्रयास भी सराहनीय है.
ये एक खबर है लेकिन इसमें कोई sensation या controversy नहीं है, तो शायद लोग ऐसी इसे चाव से नहीं पढते इसलिए अफ़सोस, हमारे मीडिया को भी ऐसी चीजे कम पसंद है और ऐसी खबरों को सही प्रचार नहीं मिल पाता.
मुझे नहीं लगता यह पोस्ट राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरित नहीं है.
भारत (और दुनिया) को रासायणिक खाद से मुक्त कराने का मार्ग दर्शाती है यह पोस्ट.
भारतीय किसानों के लिए प्रेरणा वाली खबर.
लाभ के लिए ही सही जातिवाद को तोड़ती तकनीक.
एक भारतीय का भला, भारत का भला भी है. अतः इस पोस्ट को अलग कैसे मान लें.
[भारत के कुछ नन्हे अविष्कारों पर इण्डिया टूडे के ताजा अंक में जानकारी दी गई है. जरूर पढ़ें, कुछ करने की प्रेरणा मिलती है]
भाई जानकारी बढिया है, गुप्ता जी का कमेंटस देख के इधर आया, बाकी भी बहुत अच्छा लगा, गुप्ता जी को हमारी नमस्कार कहियेगा
बहुत ही अच्छी जानकारी दी आपने सुरेश जी!
"इस प्रकार के ग्रामीण-मित्र शौचालयों की सबसे बड़ी बात तो यह है कि ये विशुद्ध रूप से पर्यावरण मित्र हैं, पानी की बचत करते हैं, धरती पर बढ़ रहे रासायनिक कचरे को कम करने में मदद करेंगे और शक्तिशाली बहुराष्ट्रीय उर्वरक कम्पनियों की दादागिरी और मनमर्जी से किसानों को थोड़ी मुक्ति दिलायेंगे… "
आज जरूरत है तो सिर्फ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से मुक्त होने की। ये कम्पनियों ने विज्ञापन के माध्यम से हमारी मानसिकता को पूरी तरह से बदल डाला है और हमारी गाढ़ी पसीने की कमाई को लूट रहे हैं। ये तो हमारे देश के पानी को भी हमीं को बेचकर हमें लूट रहे हैं। कोल्ड ड्रिंक्स, सोडा और पैकेज्ड वाटर के रूप में पानी बेचा जा रहा है।
सार्थक प्रयास । त्यागीजी साधुवाद के पात्र हैं ।
suresh ji aapki sabhi post achi hoti hai or yah post bhut hi hatke thi
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पैसों पर पलने वाला अपना मिडिया थोड़े ही इस तरह की ख़बरों को दिखायेगा. जिस भी बात से भारत देश का भला होता है, उन बातों को तो ये मीडिया वाले एक मीटर की डंडी से भी नहीं छूते हैं. आज हमें जरूरत है त्यागी जैसे लोगों को बढ़ावा देने की. मेरा सवाल है की क्या हमारी सरकार भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पैसों पर पलती है? यदि नहीं, तो ये इस तरह की सार्थक बातों के लिए पहल क्यों नहीं कराती है?
भारतीय उद्यमाशीलता पर इस बार का इंडिया टूडे का अंक भी इसी पोस्ट की तरह प्रेरणादायक है। उसे भी पढ़ें और गुणें।
सुरेश जी, इस घोर राष्ट्रवादी पोस्ट के लिए धन्यवाद!
धन्यवाद सुरेशजी यह लेख लिख कर आपने राष्ट्रीयता की भावना के प्रति समर्पण ही व्यक्त किया है. त्यागीजी तो धन्यवाद के पात्र
हैं ही .अपने देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है अब लोग यह मानने भी लग गए हैं.
धन्यवाद सुरेशजी यह लेख लिख कर आपने राष्ट्रीयता की भावना के प्रति समर्पण ही व्यक्त किया है. त्यागीजी तो धन्यवाद के पात्र
हैं ही .अपने देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है अब लोग यह मानने भी लग गए हैं.
धन्यवाद सुरेशजी यह लेख लिख कर आपने राष्ट्रीयता की भावना के प्रति समर्पण ही व्यक्त किया है. त्यागीजी तो धन्यवाद के पात्र
हैं ही .अपने देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है अब लोग यह मानने भी लग गए हैं.
Informative post.
Thanks.
सार्थक सोच की अच्छी अभिव्यक्ति / अच्छी विवेचना के साथ प्रस्तुती के लिए धन्यवाद / मैं तो कहता हु ब्लॉग सामानांतर मिडिया के रूप में उभर कर ,इस देश में वैचारिक क्रांति का सबसे बड़ा वाहक बनकर ,इस देश में बदलाव जरूर लायेगा / बस जरूरत है एकजुट होकर सच्ची इक्षा शक्ति से प्रयास करने की / आपको मैं , जनता के द्वारा प्रश्न पूछने के लिए ,संसद में दो महीने आरक्षित होना चाहिए, इस विषय पर बहुमूल्य विचार रखने के लिए आमंत्रित करता हूँ /आशा है देश हित के इस विषय पर,आप अपना विचार कम से कम सौ शब्दों में जरूर रखेंगे / अपने विचारों को लिखने के लिए नीचे लिखे हमारे लिंक पर जाये /उम्दा विचारों को सम्मानित करने की भी व्यवस्था है /
http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html
उपयोगी जानकारी के लिए धन्यवाद सुरेश जी.
अवधिया जी की बात पर मेरी मोहर.
कुछ साल पहले की बात याद आई. महंगे विदेशी सेविंग क्रीम उत्पाद के जगह पर दूध से दाढ़ी बना सकते हैं. मुंबई के एक राष्ट्रभक्त कोई जैन है, जिन्होंने दाल-रोटी नाम से अभियान भी चलाया था.
रासायनिक उर्वरक बहुत खतरनाक होते हैं. स्वदेशी और इको-फ्रेंडली तकनीक अधिकधिक उपयोग समय की मांग है. देशहित में है. किसान मित्र को बधाई.
इस प्रेरणादायक और जनोपयोगी वाली पोस्ट के लिये आभार
प्रणाम
आपका प्रत्येक आलेख सामाजिक अलख जगाने वाला होता है। हां, ये सही है कि सभी आलेखों का प्रक्षेत्र अलग-अलग होता है, किन्तु सबमें जो उभयनिष्ठ तत्त्व है, वह यह है कि सबमें भारतीयता अर्थात् राष्ट्र-वर्धन हेतु दिशा दिखाई गई होती है।
very nice post sir
कृषको के लिए इतनी बढ़िया जानकारी देती पोस्ट भी तो राष्ट्रवाद की ही श्रेणी में आती है :)
जिस बात से राष्ट्र का भला हो हम तो उसे ही राष्ट्रवादी मानते है :)
an eye open post
और हमारे यहां के कामचोर क्या करते हैं कि फसल काटने के बाद ठूंठ को जुताई कर हटाने की जगह जला देते हैं जिससे मिट्टी की पैदावार कम होती है क्योंकि उपजाऊ परत खराब हो जाती है और मित्र कीट खत्म हो जाते हैं...
यही तो हिंदुत्व है चिपलूनकर भ्राता. :)
सर्वे भवन्तु सुखिनः .............
बहुत ही सुन्दर ज्ञानवर्धक आलेख. आभार.
सार्थक लेख, इसलेख की सबसे बड़ी सार्थकता ये है कि नदियो को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है।
पढ़ता तो नियमित हूँ, लगता है आप यहाँ नियमित टिप्पणी लिखने वाला भी बना देंगे :)
200 X 400 फुट है, मीटर है, यार्ड है, जो भी है - बता दीजिए।
मानव मल में ई कोलाइ पाए जाते हैं। खाद बनने के बाद क्या उनके समाप्त हो जाने पर कोई शोध है? यह इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि पीने वाले पानी में पैथोजेनिक बैक्टीरिया का मापन ई कोलाई गिनती से किया जाता है।
सामान्यत: अच्छी कम्पोस्ट खाद में बहुत कम दुर्गन्ध होती है। क्या यह खाद भी दुर्गन्ध रहित होती है ?
"prabhu"
bahut hi badhiya, lekin maafi chahunga aapko is post ke aakhir me soochna dene ki jarurat hi nai thi ki ye mahaj hat ke post hai , rashhrwadi wali post aati hi rahengi, kynki jo aapko, aapke lekhan ko jante hain, ve yeh bhi jante hai ki is tarah ki alag hatkar lekhn aapke blog par aate rahte hain..isliye alag se ullekhit kar ke aap khud hi ek tarah se safai de rahe hain aisa pratit ho raha...
ho sakta hai mai galat hou...
sadar
"sunil"
इनके बारे में काफी पहले इंडिया वाटर पोर्टल पर पढ़ चुका हूं।
प्रेरणादायक, सचमुच भारतीय किसान को यदि सही दिशा मिले तो वह जैविक तरीके से भी बेहतर खेती कर सकता है साथ ही कचरे, मल-मूत्र का सही निपटान भी होगा।
कुछ और भी बाते स्वच्छतागृह की समस्या की बारे मे.सुरेश जी आप इस पर ही अगर कुछ लेख बनाऎ। समस्या एक संधी के तौर पर रुपांतरीत कैसे हो सकती है ये एक विषय बन सकता है!
http://mr.upakram.org/node/1171#comment-19532
http://vishesh.maayboli.com/node/26
http://www.misalpav.com/node/10175
अच्छी और प्रेरणादायक है यह "हट के पोस्ट"
- आनंद
सुरेश भाई
आप राष्ट्रवाद पर लिखते हैं या हिंदुत्व पर! दोनों एक ही हैं आप कहेंगे तो बेहतर नहीं लगेगा क्योकि ये जवाब सुन चूका हूँ!
राष्ट्रवाद बंटवारे का नहीं होना चाहिए एकीकरण का होना चाहिए एक बंटवारे ने कम नासूर नहीं दिए हैं! अब छोडिये भी हिन्दू मुसलमान
ये राष्ट्रवाद नहीं है और अगर है तो कोई दूसरा संस्करण ढूंढने की कोशिश कीजिये मै भी कर रहा हूँ! भारतीय गणराज्य को हम संकीर्ण क्यों बनाना चाहते हैं समग्र क्यों नहीं!
सामाजिक चीजें वास्तव में अधिक राष्टवादी हैं इन्ही की बात किया कीजिये! इसमें आप समग्र लगते हैं
सुरेशजी, आपके लेख तथ्यों पर आधारित जानकारी वाले होते हैं। लेकिन पहिले हिन्दु धर्म की खामियों पर लेख लिखें। क्यों दलित हिन्दु स्वधर्म छोडकर इस्लाम या इसाई धर्म अपना रहे हैं । क्यों हिन्दु धर्म में एक ब्राह्मण को एक हरिजन समुदाय के व्यक्ति से जबर्दस्त श्रेष्ठता प्राप्त है? हिन्दुओं में व्याप्त अस्प्रष्यता के बारे में भी आप अपने विचार रखें। डा.अम्बेडकर ने हिन्दु धर्म छोडकर क्यों बुद्द्ध धर्म अपनाया? क्या जाति और वर्ण व्यवस्था ने हिदु धर्म की अकल्पनीय क्छति नहीं की है? हम अपने ही धर्म के लोगों से नफ़रत भी करते हैं और उनको अपने साथ जोडकर भी रखना चाहते हैं । यह कैसे संभव हो सकता है? हिन्दु धर्म की हजारों विकृतियों पर अपने सशक्त लेखो के जरिये आप इस लुप्तप्राय: धर्म को जीवित रखने में महती भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं।
सुरेशजी, आपके लेख तथ्यों पर आधारित जानकारी वाले होते हैं। लेकिन पहिले हिन्दु धर्म की खामियों पर लेख लिखें। क्यों दलित हिन्दु स्वधर्म छोडकर इस्लाम या इसाई धर्म अपना रहे हैं । क्यों हिन्दु धर्म में एक ब्राह्मण को एक हरिजन समुदाय के व्यक्ति से जबर्दस्त श्रेष्ठता प्राप्त है? हिन्दुओं में व्याप्त अस्प्रष्यता के बारे में भी आप अपने विचार रखें। डा.अम्बेडकर ने हिन्दु धर्म छोडकर क्यों बुद्द्ध धर्म अपनाया? क्या जाति और वर्ण व्यवस्था ने हिदु धर्म की अकल्पनीय क्छति नहीं की है? हम अपने ही धर्म के लोगों से नफ़रत भी करते हैं और उनको अपने साथ जोडकर भी रखना चाहते हैं । यह कैसे संभव हो सकता है? हिन्दु धर्म की हजारों विकृतियों पर अपने सशक्त लेखो के जरिये आप इस लुप्तप्राय: धर्म को जीवित रखने में महती भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं।
किसान मित्र के िलय बहुत अच्छा है जाे महंगी रासायिनक ख्ाद के कजर् से लदे हुए हैं। इकाे फ्रेडली भी है।
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